Monday, December 29, 2025

अशोक वाटिका

 

रामायण की कथा में, जब भगवान राम की सेना वानरों के साथ दक्षिण समुद्र के तट पर पहुंची, तब उन्हें लंका जाने के लिए विशाल समुद्र को पार करने की चुनौती का सामना करना पड़ा। सीता जी को रावण द्वारा अपहरण कर लंका ले जाया गया था, और अब राम की सेना को उनकी खोज में लंका पहुंचना था। लेकिन समुद्र इतना विशाल था कि कोई भी वानर उसे पार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। सभी वानर और भालू अपनी-अपनी शक्तियों का बखान कर रहे थे, लेकिन कोई भी पूरे समुद्र को लांघने में सक्षम नहीं लग रहा था।

उस समय, वानर सेना में जामवंत जी थे, जो एक प्राचीन और बुद्धिमान भालू राजा थे। वे भगवान राम के पिता दशरथ के समय से ही जीवित थे और उन्हें देवताओं की कई कथाएं मालूम थीं। जामवंत जी ने देखा कि हनुमान जी चुपचाप बैठे हुए हैं, मानो वे अपनी शक्ति को भूल चुके हों। हनुमान जी बचपन में बहुत शरारती और शक्तिशाली थे, लेकिन एक श्राप के कारण उन्होंने अपनी शक्तियां भूल ली थीं। जामवंत जी को यह सब मालूम था, इसलिए उन्होंने हनुमान जी को प्रोत्साहित करने का फैसला किया।

जामवंत जी ने हनुमान जी से कहा, "हे पवनपुत्र! तुम्हें अपनी जन्म कथा याद है? तुम देवराज इंद्र के वरदान से अविनाशी हो, ब्रह्मा जी ने तुम्हें अजर-अमर बनाया है। तुम्हारे पिता पवन देव हैं, जो हवा की गति से तेज हैं। बचपन में तुमने सूर्य को फल समझकर निगलने की कोशिश की थी, और देवताओं ने तुम्हारी शक्ति देखकर डर गए थे। लेकिन जब तुमने इंद्र के वज्र से चोट खाई, तो पवन देव ने क्रोधित होकर सारी हवा रोक दी थी। तब देवताओं ने तुम्हें कई वरदान दिए – अग्नि तुम्हें जला नहीं सकती, जल तुम्हें डुबो नहीं सकता, और तुम्हारी गति असीम है।"

जामवंत जी ने आगे कहा, "हे वीर! तुम्हारे गुरु सूर्य देव ने तुम्हें सभी शास्त्र सिखाए हैं। तुम राम भक्त हो, और राम का कार्य करने के लिए तुम्हारी शक्तियां स्वतः जागृत हो जाएंगी। यह श्राप था कि तुम अपनी शक्ति तब तक भूलोगे जब तक कोई तुम्हें याद न दिलाए। अब मैं तुम्हें याद दिला रहा हूं – तुम समुद्र को लांघ सकते हो, पर्वतों को उखाड़ सकते हो, और राक्षसों को पराजित कर सकते हो। उठो, हनुमान! राम का कार्य करो और सीता जी की खोज में लंका जाओ!"

जामवंत जी की ये बातें सुनकर हनुमान जी की आंखें खुल गईं। वे अपनी भूली हुई शक्तियों को याद करने लगे। बचपन की सारी घटनाएं उनकी आंखों के सामने घूम गईं – कैसे वे आकाश में उड़कर सूर्य तक पहुंचे थे, कैसे देवताओं ने उन्हें वरदान दिए थे। हनुमान जी का शरीर विशाल होने लगा, उनकी आंखें लाल हो गईं, और वे जोर से गरज उठे। उन्होंने कहा, "अब मुझे सब याद आ गया। मैं राम का दूत हूं, और मैं लंका जाकर सीता जी का पता लगाऊंगा!" सभी वानरों ने जयकारे लगाए, और हनुमान जी ने समुद्र पार करने की तैयारी की।

हनुमान जी ने महेंद्र पर्वत पर चढ़कर अपनी पूंछ को लपेटा और एक विशाल छलांग लगाई। वे आकाश में उड़ चले, मानो पवन देव स्वयं उन्हें सहारा दे रहे हों। समुद्र पार करने के दौरान कई चुनौतियां आईं। सबसे पहले, मैनाक पर्वत ने उन्हें विश्राम करने के लिए आमंत्रित किया, लेकिन हनुमान जी ने मना कर दिया क्योंकि वे राम के कार्य में विलंब नहीं करना चाहते थे। फिर, सुरसा नाम की एक नागमाता ने उनका रास्ता रोका। सुरसा देवताओं की आज्ञा से आई थीं, जो हनुमान जी की परीक्षा लेना चाहते थे। सुरसा ने कहा, "तुम्हें मेरे मुंह से होकर जाना होगा!"

हनुमान जी ने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया। वे पहले अपने शरीर को विशाल बनाए, लेकिन सुरसा ने अपना मुंह और बड़ा कर लिया। फिर हनुमान जी ने खुद को बहुत छोटा कर लिया – मच्छर के आकार का – और सुरसा के मुंह में घुसकर तुरंत बाहर निकल आए। सुरसा प्रसन्न हुईं और बोलीं, "तुम्हारी बुद्धि और शक्ति दोनों अद्भुत हैं। जाओ, तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा!" इस तरह हनुमान जी ने सुरसा का सामना किया और आगे बढ़े।

समुद्र पार करने के दौरान हनुमान जी की छाया पर एक राक्षसी सिंहिका ने हमला किया, लेकिन हनुमान जी ने उसे मार गिराया। आखिरकार, वे लंका के तट पर पहुंचे। लंका सोने की नगरी थी, चारों ओर ऊंची दीवारें और राक्षस पहरेदार थे। हनुमान जी ने खुद को छोटा कर लिया और लंका में प्रवेश किया। उन्होंने पूरी नगरी की खोज की – रावण के महल, उसके कक्ष, लेकिन सीता जी कहीं नहीं मिलीं।

फिर वे अशोक वाटिका पहुंचे, जो एक सुंदर उद्यान था, जहां फूलों और वृक्षों की छांव में सीता जी कैद थीं। सीता जी उदास बैठी हुई थीं, रावण की राक्षसियां उन्हें घेरे हुए थीं। हनुमान जी एक वृक्ष पर छिपकर बैठ गए और सीता जी को देखते रहे। उन्होंने राम की अंगूठी को नीचे गिराकर सीता जी का ध्यान आकर्षित किया। सीता जी डर गईं, लेकिन हनुमान जी ने खुद को प्रकट किया और कहा, "मैं राम का दूत हूं, हनुमान। राम आपको लेने आएंगे। यह उनकी अंगूठी है प्रमाण के रूप में।"

सीता जी ने हनुमान जी को पहचाना और प्रसन्न हुईं। उन्होंने अपना चूड़ामणि हनुमान जी को दिया, जो राम तक पहुंचाने के लिए था। हनुमान जी ने सीता जी को आश्वासन दिया कि राम जल्दी ही लंका पर चढ़ाई करेंगे और रावण का वध करेंगे। फिर हनुमान जी ने अशोक वाटिका में उत्पात मचाया, कई राक्षसों को मारा, और अंत में रावण के पुत्र अक्षयकुमार को भी पराजित किया। लेकिन वे स्वयं को बंधन में डलवाया ताकि रावण के दरबार में पहुंच सकें और उसकी शक्ति का आकलन कर सकें।

इस तरह, जामवंत जी के प्रोत्साहन से हनुमान जी ने अपनी शक्तियां याद कीं, समुद्र पार किया, सुरसा का सामना किया, लंका पहुंचे और अशोक वाटिका में सीता जी से मिलकर राम के कार्य को आगे बढ़ाया। यह कथा हनुमान जी की भक्ति, शक्ति और बुद्धि का प्रतीक है, जो आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करती है।

Sunday, December 28, 2025

ईश्वर की पर्ची

शाम का समय था। छोटे से कस्बे के सरकारी अस्पताल में अब मरीजों की भीड़ छँट चुकी थी। बरामदे में फैली दवाइयों की तीखी गंध, फर्श पर गूंजते कदमों की प्रतिध्वनि और दीवार पर टंगी घड़ी की लगातार होती टिक–टिक—सब मिलकर एक नीरस, किंतु यथार्थपूर्ण वातावरण रच रहे थे।

उसी निस्तब्धता को चीरते हुए एक संत धीरे–धीरे भीतर आए। कंधे पर पुराना झोला, चेहरे पर अद्भुत शांति, पर छाती में जमी पुरानी खाँसी जो हर कुछ क्षणों में उनके शरीर को झकझोर देती थी।

डाक्टर ने ऊपर देखा। सफेद कोट में बैठा वह व्यक्ति आधुनिक विज्ञान का प्रतिनिधि था—जिसका विश्वास नाड़ी की गति, एक्स–रे की रिपोर्ट और रासायनिक दवाओं की संरचना में था। उसने संत को ऊपर से नीचे तक देखा, मानो किसी सिद्धांत का परीक्षण कर रहा हो। हल्की मुस्कान के साथ, किंचित व्यंग्य में बोला—

“बाबा, आप तो संन्यासी हैं। ईश्वर पर आपकी आस्था अटूट होगी। इतनी खाँसी है, तो अपने भगवान से ही ठीक क्यों नहीं करा लेते? यहाँ विज्ञान का क्या काम?”

यह प्रश्न केवल जिज्ञासा नहीं था—यह विज्ञान की श्रेष्ठता का एक मौन दावा था।

संत ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। उन्होंने पास पड़ी कुर्सी खींची, बैठ गए। खाँसी को थामते हुए उन्होंने गहरी साँस ली और शांत, स्थिर दृष्टि से डाक्टर की आँखों में देखा। फिर बोले—

“बेटा, यदि ईश्वर सब कुछ स्वयं ही कर देता, तो मनुष्य को बुद्धि क्यों देता? और यदि बुद्धि दी है, तो उसका प्रयोग भी उसी की इच्छा से है। उसी भगवान ने तो मुझे आपके पास भेजा है—इलाज के लिए।”

डाक्टर क्षण भर को चुप हो गया। उसकी कलम हवा में ही थम गई। यह उत्तर उसे भीतर तक चुभ गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके मन में छिपे उस अहं को छू लिया हो, जो कहता था—‘सब कुछ मैं जानता हूँ।’

फिर भी उसने तर्क का सहारा लिया—

“लेकिन बाबा, बीमारी का कारण तो जीवाणु हैं, वायरस हैं, शारीरिक कमजोरी है। इसमें ईश्वर कहाँ से आ गया?”

संत मुस्कुराए। यह मुस्कान विजय की नहीं, समझ की थी।

“और उन जीवाणुओं को पहचानने की दृष्टि किसने दी? दवाइयों की खोज किस बुद्धि से हुई? क्या कारण और कार्य की यह पूरी श्रृंखला भी किसी नियम से नहीं चलती? आप उसे प्रकृति कहते हैं, मैं उसे ईश्वर कहता हूँ—नाम अलग हैं, सत्य एक है।”

संत ने आगे कहा—

“ईश्वर केवल मंदिरों या आश्रमों में नहीं रहते, बेटा। वह प्रयोगशालाओं में भी हैं, पुस्तकों में भी हैं, और आपके हाथों में भी। जब कोई किसान बीज बोता है, तो क्या वह केवल भगवान पर निर्भर रहता है? नहीं—वह हल चलाता है, खेत सींचता है। पर भीतर कहीं यह विश्वास भी रखता है कि प्रकृति साथ देगी। यही संतुलन जीवन है।”

डाक्टर की आँखें अब झुकी हुई थीं। उसका विज्ञान अस्वीकार नहीं हुआ था, बल्कि उसे एक व्यापक अर्थ मिल गया था। उसे पहली बार लगा कि विज्ञान और भक्ति परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो पूरक मार्ग हैं—एक बाह्य जगत को समझता है, दूसरा आंतरिक को।

उसने चुपचाप पर्ची लिखी, दवा दी, और अनायास ही उसके हाथ संत के चरणों की ओर बढ़ गए। यह श्रद्धा किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि विनम्रता की थी।

संत उठे, झोला संभाला और जाते–जाते बोले—

“आप अपना कर्म करते रहिए, मैं अपनी प्रार्थना। जब कर्म और विश्वास साथ चलते हैं, तभी रोग भी हार मानता है।”

घड़ी फिर से टिक–टिक करने लगी। अस्पताल वही था, कुर्सियाँ वही थीं, दवाइयों की गंध भी वही—पर डाक्टर के भीतर कुछ बदल चुका था। अब जब भी कोई मरीज उसके सामने बैठता, उसे लगता—

शायद आज भी भगवान किसी और रूप में उसके पास आए हैं—इलाज के लिए नहीं, बल्कि उसे और अधिक मानवीय बनाने के लिए।

Saturday, December 27, 2025

मिश्रा का मतलब क्या

एक दिन रोज़ की तरह मैं ऑफिस से घर गया तो मेरा बेटा अनिकेत कुछ नाराज़-सा बैठा हुआ था।

मैंने उससे पूछा :
पिता : बेटा, क्यों नाराज़ हो?

पुत्र : पापा, आज स्कूल में मुझे डाँट पड़ी। मैडम ने मेरे नाम का मतलब मुझसे पूछा तो मैं बता नहीं पाया। पापा, आपने मुझे मेरे नाम का मतलब क्यों नहीं बताया?

पिता : बेटा, तुमने मुझसे पूछा नहीं। तुम्हारे नाम अनिकेत का मतलब होता है — जो किसी एक जगह या इच्छा से बँधा न हो।

पुत्र : इच्छा मतलब?

पिता : इसका मतलब जो तुम्हें अच्छा लगता है। जैसे कि तुम मिठाई चाहते हो।

पुत्र : लेकिन मैं तो स्पाइडर-मैन भी चाहता हूँ, डोरेमॉन भी चाहता हूँ। तो फिर आपने मेरा नाम अनिकेत क्यों रखा?

पिता : ताकि बड़े होकर तुम अपनी चाहतों से ऊपर उठ सको।

पुत्र : तो क्या चाहतों से ऊपर उठना अच्छी बात है?

पिता : हाँ।

पुत्र : तो फिर आपने अपना नाम अनिकेत क्यों नहीं रखा?

पिता : क्योंकि मेरा नाम रोहन प्रकाश तुम्हारे दादाजी ने रखा था।

पुत्र : आपने अपना नाम खुद क्यों नहीं रखा?

पिता : बेटा, आदमी अपना नाम खुद नहीं रखता, माँ-बाप ही रखते हैं।

पुत्र : लेकिन दादाजी का नाम तो हरिनाथ वर्मा था, फिर लोग उन्हें आशादीप जी क्यों कहते हैं?

पिता : क्योंकि तुम्हारे दादाजी कभी निराश नहीं होते थे।

पुत्र : तो लोग उन्हें हरिनाथ वर्मा भी तो कह सकते थे?

पिता : हाँ, लेकिन दादाजी नहीं चाहते थे कि लोग उन्हें उपनाम से पहचानें।

पुत्र : क्यों? उपनाम में बुरी बात क्या है?

पिता : बेटा, तुम्हारे दादाजी सामाजिक भेदभाव के खिलाफ थे, इसलिए।

पुत्र : अच्छा, इसीलिए आपने मेरा नाम सिर्फ अनिकेत रखा, अनिकेत वर्मा नहीं।

पिता : हाँ बेटा।

पुत्र : तो क्या किसी समाज से जुड़ना गलत बात है?

पिता : बेटा, ये सवाल तुम दादाजी से पूछ लेना।

पुत्र : नहीं पापा, मैं समझ गया। इसीलिए चाचाजी का नाम निखिल भारद्वाज है, क्योंकि वो अलग पहचान रखना चाहते हैं।

पिता : नहीं बेटा, भारद्वाज एक पारिवारिक परंपरा से जुड़ा नाम है।

पुत्र : तो क्या सब लोग भारद्वाज होते हैं?

पिता : नहीं अनिकेत, अब तुम चुप हो जाओ और पढ़ाई करो।

पुत्र : आप गंदे पापा हैं। आप मुझे समझाइए — ये परंपरा क्या होती है?

पिता : बेटा, तुम अभी नहीं समझ पाओगे।

पुत्र : पापा, आप मुझे कुछ नहीं बताते। मैं फिर स्कूल में डाँट खाऊँगा। मोहन चतुर्वेदी को कम डाँट पड़ती है क्योंकि उसके पापा उसे सब कुछ बताते हैं।

पिता : अच्छा पूछो, और क्या पूछना है?

पुत्र : पापा, चतुर्वेदी का मतलब क्या होता है?

पिता : बेटा, इसका मतलब होता है — बहुत ज्ञान रखने वाला।

पुत्र : ज्ञान क्या चीज़ है?

मैं बेटे के इतने सवालों से झुँझला उठा था, फिर भी अच्छा पापा बनने के चक्कर में जवाब देता जा रहा था।

पिता : बेटा, ज्ञान मतलब बहुत अच्छी किताबें।

पुत्र : तो क्या मेरी ए-बी-सी-डी वाली किताब जैसी?

पिता : नहीं बेटा, उससे बहुत बड़ी।

पुत्र : तो क्या मोहन चतुर्वेदी ने बहुत बड़ी किताबें पढ़ रखी हैं?

पिता : नहीं बेटा, ये नाम लोग इसलिए रखते हैं ताकि बच्चे पढ़े-लिखे बनें।

पुत्र : तो क्या अच्छे कामों के लिए लोग अच्छे-अच्छे नाम रखते हैं?

पिता : हाँ बेटा, बिल्कुल सही समझे।

पुत्र : हाँ पापा, पर मेरा दोस्त सौरभ मिश्रा मुझसे पूछ रहा था कि मिश्रा का मतलब क्या होता है। पापा, आप बताइए ना।

मैं झुँझला गया और बेटे को डाँट दिया —
बोला, ये बात बाद में बताऊँगा।

सच तो ये है पाठकों, मुझे भी नहीं पता कि मिश्रा का असली मतलब क्या है।

इसीलिए ये कहानी लिख रहा हूँ।
अब आप समझदार लोग ही मेरी मदद करें और मेरे बेटे को बताएं कि —

मिश्रा का मतलब क्या होता है?

सन्डे के बाद मंडे , सैटरडे क्यों नहीं ?

 एक दिन रविवार बहुत खुश था।

पूरे हफ्ते काम करवाने के बाद उसे आराम करने का संवैधानिक अधिकार मिला हुआ था।
लोग देर से उठते, चाय ठंडी हो जाती, और आत्मा गरम। 

लेकिन जैसे ही शाम ढली, रविवार की हँसी फीकी पड़ने लगी।

रविवार ने कैलेंडर से पूछा—
“भाई, मेरे बाद मंडे ही क्यों आता है?
कोई और क्यों नहीं?
जैसे… सैटरडे?”

कैलेंडर ने चश्मा ठीक किया और बोला—
“यह प्रश्न साधारण नहीं है, यह अस्तित्ववादी संकट है।”

मंडे काली फाइल, अलार्म घड़ी और ई-मेल्स की तलवार लेकर आया।

उसने कहा—
“देखो रविवार,
मैं दुख देने नहीं आता,
मैं अनुशासन लेकर आता हूँ।”

रविवार बोला—
“पर लोग तो तुम्हें देखकर
आत्मा तक साइलेंट मोड पर डाल देते हैं!”

मंडे मुस्कुराया—
“यही तो मेरी उपयोगिता है।
अगर मैं न होऊँ,
तो तुम्हारी कीमत कौन समझे?”

इतने में सैटरडे बीच में कूद पड़ा—

“मुझे क्यों नहीं मौका मिलता?
मैं भी तो खुशमिज़ाज हूँ,
पार्टी, पिज़्ज़ा और प्लान्स से भरा हुआ!”

कैलेंडर बोला—
“तुम्हारी समस्या यही है सैटरडे,
तुम जिम्मेदारी से एलर्जिक हो।”

तभी समय स्वयं प्रकट हुआ—

गंभीर, शांत और लेट होने वाला।

उसने कहा—
“सन्डे के बाद मंडे इसलिए है
क्योंकि जीवन में
हर सुख के बाद
एक उत्तरदायित्व आता है।

अगर सन्डे के बाद सैटरडे होता,
तो मनुष्य
कभी बड़ा ही न होता।”

रविवार ने गहरी साँस ली और कहा—

“तो मैं सिर्फ़ छुट्टी नहीं हूँ…
मैं तैयारी हूँ।”

मंडे बोला—
“और मैं सज़ा नहीं…
मैं संस्कार हूँ।”

और तभी अलार्म बजा… 

मनुष्य उठा और बोला—
“सन्डे के बाद मंडे क्यों है,
अब समझ आया…
पर मानना अभी भी मुश्किल है।”

— समाप्त, पर मंडे जारी है। 

Thursday, December 25, 2025

एक और एक दो क्यों, तीन क्यों नहीं

भारत के एक छोटे से शहर में एक स्कूल था,
और उस स्कूल में एक ऐसी चीज़ पढ़ाई जाती थी
जिससे बच्चे ज़्यादा डरते थे—
गणित।

उस दिन मैथ्स की परीक्षा थी।
क्लास में सन्नाटा ऐसा था
जैसे सबको पता हो कि
आज इमोशनल डैमेज पक्का है।

पेपर खुला।
पहला सवाल:

“एक और एक कितने होते हैं?”

पूरी क्लास ने चैन की साँस ली—
“चलो, आज ज़िंदा बच जाएँगे।”

सबने लिखा: दो
क्योंकि सिस्टम यही चाहता है।

लेकिन चीकू…
चीकू ने सिस्टम को देखा,
ज़िंदगी को देखा,
और लिखा—
तीन।

टीचर की आँखों में वही चमक आई
जो तब आती है
जब कोई बच्चा करियर बर्बाद करने पर तुला हो।

“चीकू,” टीचर बोलीं,
“एक और एक दो होते हैं।
तीन कैसे?”

चीकू बोला:

“मैडम, एक सुनसान टापू पर
एक अकेला मर्द रहता है।
इतना अकेला कि
उससे बात करने को
उसकी परछाईं भी मना कर चुकी थी।”

क्लास अब पूरी तरह अलर्ट।

“फिर एक दिन,” चीकू बोला,
“वहाँ एक लड़की आती है।
सुंदर।
ज़िंदा।
और सबसे बड़ी बात—
अकेली।”

टीचर को अब पछतावा होने लगा
कि सवाल पूछा क्यों।

“पहले बातें होती हैं,”
“फिर नज़दीकियाँ,”
“फिर प्यार,”
“और फिर वो गलती
जिसे समाज ‘भविष्य’ कहता है।”

नौ महीने बाद…
एक बच्चा पैदा होता है।

चीकू मुस्कुराया:

“तो मैडम,
एक और एक मिलकर तीन हो गए।”

टीचर ने गुस्से में कहा:

“चीकू!
गणित में हम नंबर जोड़ते हैं,
इंसान नहीं!”

चीकू ने शांत स्वर में जवाब दिया:

“मैडम,
गणित में दो होते हैं,
ज़िंदगी में तीन,
और ज़िम्मेदारियों में
हमेशा चार।
”

क्लास हँसी,
टीचर चुप,
और गणित उस दिन समझ गया कि—

वह ज़िंदगी के सामने
केवल एक थ्योरी है।

अनुभूति

बरगद और प्रश्न

संध्या थी।
बरगद की छाया लंबी हो चली थी।
एक युवक आया—आँखों में प्रश्न,
हृदय में असंतोष।

उसने ऋषि से पूछा—

युवक:
“यदि ब्रह्म है, तो दृश्य क्यों नहीं?
जो है, वह प्रमाण क्यों न दे?”

ऋषि ने उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने पास गिरे पत्ते को उठाया।

ऋषि:
“क्या यह पत्ता है?”

युवक:
“हाँ।”

ऋषि ने पत्ते को चीर दिया।
रेशे दिखे।

ऋषि:
“अब यह क्या है?”

युवक:
“रेशे।”

ऋषि ने रेशे तोड़ दिए।
धूल रह गई।

ऋषि:
“अब पत्ता कहाँ है?”

युवक मौन रहा।

कुछ क्षण बाद बोला—

युवक:
“यदि ब्रह्म अनुभव है,
तो हर अनुभूति सत्य कैसे?
भ्रम भी तो अनुभव है।”

ऋषि ने आँखें बंद कीं।

ऋषि:
“स्वप्न में जो देखा,
जागरण में सत्य था?”

युवक बोला—
“नहीं।”

ऋषि:
“फिर भी स्वप्न ने तुम्हें रुलाया।”

हवा चली।
बरगद के पत्ते हिले।

युवक:
“यदि सत्य एक है,
तो अनुभव अनेक क्यों?
हर देश में अलग देव,
अलग नाम।”

ऋषि मुस्कराए।

ऋषि:
“नदियाँ अनेक हैं,
समुद्र एक।
जो किनारे से देखे,
उसे भेद दिखे।
जो डूबे,
उसे जल ही जल।”

युवक फिर बोला—

युवक:
“यदि ब्रह्म को जानने के लिए
विशेष अवस्था चाहिए,
तो क्या वह सत्य नहीं,
मन की स्थिति है?”

ऋषि ने दीपक जलाया।

ऋषि:
“दीपक अंधकार हटाता है,
पर सूर्य नहीं बनता।
मन शुद्ध हो तो
सत्य प्रकट होता है—
नया नहीं बनता।”

कुछ देर मौन रहा।

युवक:
“यदि ब्रह्म मौन में मिलता है,
तो वेद क्यों?”

ऋषि बोले—

ऋषि:
“काँटा काँटा निकालता है,
फिर दोनों फेंक दिए जाते हैं।”

युवक ने अंतिम प्रश्न रखा—

युवक:
“यदि ब्रह्म करुणा है,
तो पीड़ा क्यों?”

ऋषि ने आकाश की ओर देखा।

ऋषि:
“अग्नि जलाती है,
पर वही पकाती भी है।
पीड़ा रूप है,
करुणा स्वरूप।”

संध्या गहरी हो गई।
ऋषि मौन हो गए।

युवक समझ गया—
उत्तर शब्दों में नहीं थे।

वह प्रणाम कर उठा।

ब्रह्म न दृष्टि का विषय है,

न तर्क का निष्कर्ष।

वह वही है
जिससे प्रश्न उठते हैं,
और जिसमें प्रश्न विलीन हो जाते हैं।

नेति—नेति।


Wednesday, December 24, 2025

भगवान कौन?

शहर का वह चौराहा बहुत प्रसिद्ध नहीं था, पर बहुत साधारण भी नहीं था।वहाँ चार सड़कों का मिलन होता था—जैसे चार विचारों का।एक सड़क बाज़ार की तरफ जाती थी, जहाँ मोलभाव जीवन का दर्शन था।दूसरी मंदिर की तरफ, जहाँ आस्था और चढ़ावे का संतुलन चलता था।तीसरी अस्पताल की ओर जाती थी, जहाँ जीवन और मृत्यु रोज़ एक-दूसरे से हाथ मिलाते थे।और चौथी… सरकारी दफ़्तर की ओर, जहाँ फाइलें कभी-कभी ही जागती थीं।

उस दिन सुबह कुछ अलग थी।चौराहे के बीचोंबीच एक आकृति खड़ी थी।गेरुए वस्त्र, माथे पर चंदन का तिलक, गले में रुद्राक्ष की माला, हाथ में लकड़ी की छड़ी।

और हाँ…चेहरा बकरे का।

पहले तो लोगों को लगा किसी ने मज़ाक किया है।शहर में पहले भी तरह-तरह के बाबा आए थे—योग बाबा, चमत्कार बाबा, ऑनलाइन प्रवचन बाबा, यहाँ तक कि बिटकॉइन बाबा भी। लेकिन बकरा बाबा पहली बार आए थे।

पहले तो लोगों को लगा किसी ने सोशल मीडिया के लिए मज़ाक रचा है।किसी ने कहा, “लगता है नई वेब सीरीज़ की शूटिंग चल रही है।”एक युवक बोला, “नहीं भाई, ये जरूर कोई यूट्यूबर होगा। आजकल कंटेंट के लिए लोग कुछ भी कर रहे हैं।”

पान वाले रामखिलावन ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा—“कंटेंट नहीं, कलियुग है।”धीरे-धीरे भीड़ जमा होने लगी।

कुछ लोग हँस रहे थे,कुछ मोबाइल कैमरे तैयार कर रहे थे,और कुछ यह तय करने में लगे थे कि यह धार्मिक कार्यक्रम है या मनोरंजन।

तभी बकरा खाँसा।भीड़ में सन्नाटा।फिर वह गहरी, लगभग प्रवचन जैसी आवाज़ में बोला—

“भाइयों और बहनों…”भीड़ में हलचल।

किसी ने फुसफुसाकर कहा—“अरे, यह तो सचमुच बोल रहा है!”

बकरा आगे बोला—“आज मैं तुमसे एक छोटा-सा सवाल पूछने आया हूँ।

कोरोना के समय मंदिर बंद,
मस्जिद बंद,
चर्च बंद,
गुरुद्वारा बंद।”

वह थोड़ा रुका, फिर गर्दन घुमाकर भीड़ को देखने लगा।

“तो बताओ…
क्या भगवान को भी कोरोना हो गया था?”

भीड़ में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई।

एक युवक ने तुरंत वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया।
दूसरे ने व्हाट्सऐप पर लिखा—
“चौराहे पर बोलता हुआ बकरा मिला, लाइव देखो।”

बकरा शांत खड़ा रहा, जैसे उसे पता हो कि सच्चे सवाल हमेशा थोड़ी देर बाद असर करते हैं।

फिर वह बोला—

“तुम कहते हो भगवान सर्वव्यापी हैं।
कण-कण में हैं।
हवा में हैं।
जल में हैं।
पत्थर में हैं।”

उसने चौराहे के चारों तरफ हाथ घुमाया।

“फिर दरवाज़ों के भीतर कैसे कैद हो गए?”

“अगर भगवान हर जगह हैं,
तो ताले किसके लिए लगे थे?
भगवान के लिए…
या तुम्हारी समझ के लिए?”

भीड़ थोड़ी असहज होने लगी।

तभी भीड़ से एक पंडित जी आगे आए।
उनका माथा गुस्से से लाल था।

उन्होंने कहा—

“यह सब धर्म का अपमान है!”

बकरा मुस्कराया।

वह मुस्कान वैसी थी जैसी किसी बूढ़े शिक्षक की होती है जब कोई छात्र गलत सवाल पूछ देता है।

“धर्म का?”
बकरा बोला।

“या तुम्हारे ठेके का?”

भीड़ अचानक चुप।

पंडित जी कुछ कहना चाहते थे, पर शब्द नहीं मिले।

बकरा अब पूरी तरह मंच पर था।

वह बोला—

“मैं बकरा हूँ।
पर इतना जानता हूँ कि कोरोना के समय डर बीमारी से कम था,
और सवालों से ज़्यादा।”

“डर था कि कहीं इंसान अपने भीतर झाँक न ले।”

उसने सामने खड़े लोगों को देखा—

“तुमने भगवान को भी क्वारंटीन कर दिया।
क्योंकि असली संक्रमण इंसान में था—
डर का,
अज्ञान का,
और अहंकार का।”

भीड़ में एक कॉलेज का लड़का खड़ा था।
उसने हिम्मत करके पूछा—

“तो क्या पूजा-पाठ गलत है?”

बकरा हँसा।

“नहीं मित्र,” उसने कहा।

“पूजा गलत नहीं है।
पर पूजा के नाम पर सोचना बंद कर देना—
सबसे बड़ा पाप है।”

अब बकरा धीरे-धीरे चौराहे के बीच टहलने लगा।

“जब अस्पताल भरे थे,” वह बोला,
“तब तुमने भगवान से पूछा—
ऑक्सीजन कहाँ है?”

“या सिर्फ़ घंटी बजाई?”

“जब लोग भूखे थे,
तब तुमने पूछा—
रोटी कौन देगा?”

“या सिर्फ़ आरती उतारी?”

अब भीड़ की हँसी गायब हो चुकी थी।

किसी ने मोबाइल नीचे कर दिया।

किसी ने नजरें झुका लीं।

बकरा बोला—

“अजीब बात है…
मैं बकरा होकर सच बोल रहा हूँ,
और तुम इंसान होकर अब भी पहचानने में लगे हो
कि बोलने वाला कौन है।”

वह एक युवक के पास गया और बोला—

“तुम पूछते हो—
यह बकरा है या साधु?”

फिर उसने जोर से पूछा—

“मैं पूछता हूँ—
तुम इंसान हो
या सिर्फ़ भीड़?”

हवा का एक झोंका आया।

चौराहे पर खड़े पीपल के पत्ते हिलने लगे।

बकरा अब आखिरी सवाल के लिए तैयार था।

उसने कहा—

“बताओ मुझे…
भगवान कौन है?”

“वह जो ताले के पीछे बैठा है?”

“या वह
जो भूखे को रोटी देता है?”

“वह जो डर फैलाता है?”

“या वह
जो डर के बावजूद सच बोलता है?”

पूरा चौराहा खामोश।

कुछ लोग गुस्से में वहाँ से चले गए।
कुछ ने वीडियो तुरंत यूट्यूब पर डाल दिया—
शीर्षक था:
“LIVE: बोलता हुआ बकरा धर्म पर सवाल उठाता हुआ!”

कुछ लोग बस चुप खड़े रहे।

और बकरा?

वह धीरे-धीरे भीड़ से निकल गया।
किसी ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।

थोड़ी देर बाद चौराहा फिर वैसा ही हो गया—
ठेले, पान की दुकान, ट्रैफिक और शोर।

लेकिन हवा में एक सवाल तैर रहा था।

वह सवाल किसी धर्म का नहीं था,
किसी किताब का नहीं था।

वह बस एक साधारण-सा सवाल था—

इंसान होना आखिर होता क्या है?

Saturday, December 20, 2025

आत्म रक्षा और अहिंसा

एक समय की बात है, एक छोटे से राज्य में एक न्यायप्रिय राजा राज्य करता था। उसका नाम था राजा विक्रमादित्य। वह प्रजा का बहुत खयाल रखता था और हमेशा धर्म व नीति के मार्ग पर चलता था। लेकिन राज्य में एक समस्या ने उसे बहुत चिंतित कर दिया था—लोगों में अहिंसा की गलत समझ फैल रही थी। कई लोग अहिंसा को इतनी चरम सीमा तक ले जा रहे थे कि अपराधी बेखौफ होकर अत्याचार कर रहे थे, और निर्दोष लोग केवल सहते रहते थे। राजा सोचता, “क्या अहिंसा का अर्थ केवल सहना ही है? क्या कभी अपनी या दूसरों की रक्षा के लिए बल प्रयोग करना भी धर्म है?”

इस दुविधा को सुलझाने के लिए राजा ने निर्णय लिया कि वह जंगल में रहने वाले एक प्रसिद्ध सद्गुरु साधु के पास जाएँगे, जिनकी बुद्धि और करुणा की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। राजा ने साधारण वेश धारण किया और अकेले ही जंगल की ओर प्रस्थान कर दिया।

घने जंगल में एक छोटी सी कुटिया में साधु मिले। राजा ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी समस्या बताई। “महाराज,” साधु ने मुस्कुराते हुए कहा, “आपकी यह दुविधा बहुत गहरी है। अहिंसा महान धर्म है, लेकिन उसे सही अर्थ में समझना आवश्यक है। मैं आपको एक कथा सुनाता हूँ, जो भय, करुणा और विवेक की सीमाओं को छूती है। यह कथा एक साँप और एक साधु की है, जहाँ अहिंसा को कमजोरी नहीं बल्कि समझदारी के रूप में परखा जाता है।”

फिर साधु ने राजा को वह प्रसिद्ध कथा सुनानी शुरू की:

भय, करुणा और विवेक की सीमाओं को छूती यह कथा एक ऐसे साँप और साधु की है, जहाँ अहिंसा को कमजोरी नहीं बल्कि समझदारी के रूप में परखा जाता है। यह घटना पाठक को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सहनशीलता का अर्थ हमेशा सहना ही होता है, या कभी-कभी स्वयं की रक्षा भी धर्म बन जाती है।

घने और रहस्यमय जंगल के बीचोंबीच एक बहुत ही विशाल और भयानक साँप रहता था। उसका शरीर मोटे वृक्षों के तने जितना चौड़ा था और आँखों में ऐसी चमक थी कि उसे देखते ही मनुष्य का कलेजा काँप उठे। जंगल से होकर जो भी उस रास्ते से गुजरता, वह साँप उसे डस लेता। उसके विष से न जाने कितने प्राणी और मनुष्य मारे जा चुके थे। धीरे-धीरे उस पूरे क्षेत्र में यह प्रसिद्ध हो गया कि वहाँ जाना मृत्यु को निमंत्रण देने जैसा है।

लोग उस इलाके से दूर-दूर तक बचते थे। बच्चे, बूढ़े, चरवाहे, लकड़हारे—सब उस जंगल का नाम सुनते ही काँप जाते। उस साँप को लोग “भुजंग” कहने लगे थे, और भय ने वहाँ अपना स्थायी निवास बना लिया था।

एक दिन एक साधु उस क्षेत्र से होकर जाने वाले थे। उनके चेहरे पर गहरी शांति थी और आँखों में करुणा। जब गाँव वालों को पता चला कि साधु उसी खतरनाक जंगल से गुजरने वाले हैं, तो वे घबरा गए। उन्होंने हाथ जोड़कर विनती की,“महात्मा, उस ओर मत जाइए। वहाँ एक भयानक साँप रहता है। वह किसी को भी जीवित नहीं छोड़ता।”

लेकिन साधु मुस्कराए।“जिस मार्ग पर भय का राज्य हो, वहीं करुणा की सबसे अधिक आवश्यकता होती है,”

यह कहकर वे निडर होकर जंगल की ओर बढ़ गए।

कुछ ही दूर गए थे कि अचानक झाड़ियों से सरसराहट की आवाज़ आई। विशाल साँप फुफकारता हुआ सामने आ गया। उसने अपना फन फैलाया और साधु की ओर बढ़ा, मानो उन्हें डस ही लेगा। जंगल का वातावरण सन्नाटे से भर गया।

लेकिन साधु तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने शांत स्वर में कहा,“तुम बार-बार दूसरों को क्यों डसते हो? तुम्हें इससे क्या मिलता है? क्या तुम्हें इससे सुख या आनंद की अनुभूति होती है?”

साँप ठिठक गया। पहली बार किसी ने उससे भय के बिना बात की थी। कुछ क्षण बाद उसने धीमी, थरथराती आवाज़ में कहा, “नहीं, मुझे कोई आनंद नहीं मिलता। सच तो यह है कि मैं स्वयं डरा हुआ रहता हूँ। इसी डर के कारण मैं अकेला हूँ। मुझे लगता है कि अगर मैं पहले न डसू, तो लोग मुझे मार डालेंगे।”

साधु की आँखों में करुणा और गहरी हो गई। “यदि तुम चाहते हो कि लोग तुमसे प्रेम करें, तो डसना छोड़ दो। किसी को अनावश्यक कष्ट मत दो। प्रेम भय से नहीं, करुणा से जन्म लेता है।”

इतना कहकर साधु आगे बढ़ गए।

साधु की बात साँप के मन में गूँजती रही। कुछ दिनों बाद उसने सचमुच लोगों को डसना बंद कर दिया। जो भी उधर से गुजरता, वह बस चुपचाप किनारे हट जाता। धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि साँप अब काटता नहीं है। भय कम होने लगा।

लेकिन मनुष्य की प्रवृत्ति विचित्र होती है। जहाँ भय कम हुआ, वहाँ निर्दयता बढ़ गई। बच्चे उसे छेड़ने लगे, लोग उस पर पत्थर फेंकने लगे, कुछ उसे मारने की कोशिश करने लगे। साँप कुछ नहीं करता, बस सहता रहता।

कुछ ही दिनों में उसका शरीर घावों से भर गया। वह लहूलुहान होकर ज़मीन पर पड़ा रहता। कमजोरी और पीड़ा से उसकी साँसें उखड़ने लगीं। उस अवस्था में उसे साधु की याद आई। उसने पूरी शक्ति लगाकर साधु को पुकारा।

साधु उसकी पुकार सुनकर वहाँ पहुँचे। जब उन्होंने साँप को उस दयनीय अवस्था में देखा, तो उनका हृदय व्यथित हो उठा।

“यह तुमने क्या कर लिया?” साधु ने पूछा।

साँप ने कराहते हुए कहा,

“मैंने आपकी बात मानी। मैंने अहिंसा का पालन किया और किसी को डसना बंद कर दिया। लेकिन लोग मुझे मारने लगे।”

साधु ने गंभीर स्वर में कहा,

“अरे भाई, मैंने तुम्हें डसने से मना किया था, आत्मरक्षा से नहीं। अहिंसा का अर्थ यह नहीं कि कोई तुम्हें मारे और तुम चुपचाप सहते रहो। अहिंसा का अर्थ है—किसी को अनावश्यक रूप से कष्ट न देना। लेकिन जब कोई तुम्हारी जान लेने आए, तब अपनी रक्षा करना भी धर्म है।”

उन्होंने आगे कहा,

“आत्मरक्षा अहिंसा के विरुद्ध नहीं है। यह उसका ही अंग है। बिना कारण किसी को चोट मत पहुँचाओ, लेकिन जब कोई तुम्हें चोट पहुँचाने आए, तो स्वयं को बचाना तुम्हारा अधिकार और कर्तव्य है।”

साधु के शब्द साँप के मन में दीपक की तरह जल उठे। उसने समझ लिया कि सच्ची अहिंसा कमजोरी नहीं, विवेक है। उस दिन से उसने न किसी को अनावश्यक डसा और न ही अत्याचार सहा।

कथा समाप्त होते ही साधु ने राजा से कहा, “महाराज, इसी प्रकार राज्य में भी अहिंसा का सही अर्थ समझाना चाहिए। प्रजा को सिखाएँ कि अहिंसा कायरता नहीं है। दूसरों को बिना कारण चोट न पहुँचाना ही अहिंसा है, और आत्मरक्षा तथा न्याय की रक्षा करना उसका सबसे महत्वपूर्ण धर्म है।”

राजा को ज्ञान की ज्योति प्राप्त हुई। वे लौटकर राज्य में आए और प्रजा को यह कथा सुनाई। इसके बाद राज्य में अपराधियों पर न्यायपूर्ण दंड दिया जाने लगा, निर्दोषों की रक्षा हुई, और सच्ची अहिंसा का प्रकाश फैल गया। राजा विक्रमादित्य का राज्य धर्म, करुणा और विवेक का प्रतीक बन गया।

इस कथा से यही शिक्षा मिलती है कि अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं है। दूसरों को बिना कारण चोट न पहुँचाना ही अहिंसा है, और आत्मरक्षा करना उसका सबसे महत्वपूर्ण धर्म।

Friday, December 19, 2025

लाला जिसे सताए, खुदा क्या उसे बचाए

 दिल्ली की रात उस दिन कुछ ज़्यादा ही बेरहम थी। हवा में ऐसी ठण्ड घुली हुई थी कि साँस लेते ही फेफड़ों तक चुभन उतर जाती। सड़कें सूनी थीं, दुकानों के शटर आधे झुके हुए, और स्ट्रीट लाइटों के नीचे धुंध किसी बूढ़े कम्बल की तरह लटक रही थी।

प्रदीप साईं बाबा के मंदिर से लौट रहा था। आरती की ध्वनि अब भी कानों में गूँज रही थी—“सबका मालिक एक…”। मन में थोड़ी शांति थी, थोड़ी उम्मीद भी, जैसे ईश्वर ने क्षणभर के लिए जीवन की कठोरता पर मरहम रख दिया हो।

बस आई। प्रदीप जल्दी से चढ़ा और भीतर की ठण्ड से जूझती हुई किसी सीट की तलाश करने लगा। बस के अंदर बैठे लोग अपने-अपने खोल में सिमटे हुए थे—कोई मफलर में मुँह छुपाए, कोई हाथों पर फूँक मारता हुआ। तभी उसकी नज़र सामने खड़े तीन युवकों पर पड़ी।

तीनों साधारण से कपड़ों में थे। पुराने स्वेटर, सस्ते जैकेट और ऐसे जूते, जिनमें चमक से ज़्यादा मजबूरी झलक रही थी। उम्र शायद पच्चीस-छब्बीस के आसपास होगी, पर चेहरों पर समय से पहले आई थकान साफ़ दिखाई दे रही थी। उनकी बातचीत से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि वे किसी छोटी-सी कंपनी में क्लर्की करते थे—वही नौकरी, जिसमें काम ज़्यादा और इज़्ज़त कम मिलती है।

बस के झटकों के साथ उनकी बातचीत भी आगे बढ़ी।

मनोज, रवि को ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोला—
“यार, तुमने तो पूरे कपड़ों की दुकान पहन रखी है। माना कि यहाँ ठण्ड है, पर दिल्ली में शिमला की बर्फ़ तो नहीं गिर रही।”

रवि मुस्कुराया, पर उस मुस्कान में मज़ाक से ज़्यादा अनुभव था।
“शिमला की बर्फ़ न सही, पर खुद को बचाकर रखने में क्या बुराई है? लगता है बिना ठण्ड का शिकार हुए नहीं समझोगे। बीमारी भी तो हमें ही पकड़ती है—मालिकों को नहीं।”

अब तक चुप खड़ा गौतम अचानक हँस पड़ा—एक ऐसी हँसी, जो गले में अटक जाती है।
“अरे यार, हम गरीब लोगों को तो खुदा पैदा ही आधा मरा हुआ करता है। अब ठण्ड मारने की क्या ज़रूरत है? ज़िन्दगी खुद ही रोज़ थोड़ा-थोड़ा मार देती है।”

बस में खड़े कुछ यात्रियों ने गर्दन उठाकर उनकी ओर देखा। किसी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, किसी की आँखों में सहानुभूति झलक गई।

रवि ने गहरी साँस ली और बोला—
“बिलकुल सही कहा। खुदा भी हमें क्या मारेगा? दिल्ली के ये लाला लोग—जिनके यहाँ हम नौकरी करते हैं—वो खुद ही हमें चूस-चूस कर मार देते हैं। सुबह नौ बजे से रात आठ बजे तक, ओवरटाइम का कोई हिसाब नहीं, छुट्टी माँगो तो जैसे कोई गुनाह कर दिया हो।”

मनोज कड़वी हँसी हँसा।
“सच में दोस्त। तनख्वाह इतनी कि महीने के आख़िर में जेब भी हमसे नज़रें चुरा लेती है।”

थोड़ी देर के लिए चुप्पी छा गई। बस की खिड़की से ठण्डी हवा अंदर घुसी और तीनों एक साथ सिहर उठे।

फिर मनोज ने कहा—
“तो भाई, यही समझ लो—लाला जिसे सताए, खुदा क्या उसे बचाए?”

उस वाक्य के साथ जैसे पूरी बस कुछ पल के लिए खामोश हो गई। प्रदीप के कानों में मंदिर में गूँजता वह वाक्य फिर से उभर आया—“सबका मालिक एक…”। मन में एक सवाल चुभ गया—अगर सचमुच सबका मालिक एक है, तो किसी की ज़िन्दगी इतनी सस्ती क्यों है?

बस अगले स्टॉप पर रुकी। मनोज, रवि और गौतम उतर गए। जाते-जाते उन्होंने अपने-अपने फटे जैकेट और कस लिए और ठण्ड में गुम हो गए—जैसे दिल्ली की रात ने उन्हें चुपचाप निगल लिया हो।

प्रदीप अपनी सीट पर बैठा रह गया। ठण्ड अब भी वही थी, पर उसके भीतर एक और ठण्ड उतर चुकी थी—
ज़िन्दगी की।

चाय और कुर्सी



नगर के सामुदायिक भवन में आज “महान नागरिक सम्मान समारोह” रखा गया था। जगह-जगह पोस्टर लगे थे, चाय की खुशबू फैली थी और कुर्सियाँ ऐसी करीने से लगी थीं मानो खुद भी पुरस्कार पाने आई हों।

हर कुर्सी पर पर्ची चिपकी थी—
विशेष अतिथि
मुख्य अतिथि
अति विशेष अतिथि
और आख़िर में—
सामान्य जनता (पीछे बैठें)

इसी बीच अंदर आए चाचा गोलमटोल।
पहनावा साधारण, चाल आरामदेह और चेहरा ऐसा जैसे अभी-अभी कचौरी खाकर आए हों।

चाचा ने चारों ओर देखा और सबसे आगे रखी बड़ी, गद्देदार कुर्सी पर जाकर बैठ गए।
पहला टोका-टोकी

तुरंत एक गार्ड आया,
“चाचा जी, ये कुर्सी खास लोगों के लिए है।”

चाचा मुस्कुराए,
“अच्छा! तभी तो इतनी आरामदेह है।”

गार्ड ने समझाया,
“आपको पीछे वाली पंक्ति में बैठना होगा।”

चाचा बोले,
“पीछे? वहाँ से मंच दिखेगा भी?”
पूछताछ शुरू

गार्ड ने पूछा,
“आप कोई मेहमान हैं?”

चाचा बोले,
“मेहमान तो हूँ, लेकिन बिना बुलाए।”

“तो आप कोई अधिकारी होंगे?”

“नहीं बेटा, मैं तो रिटायर भी नहीं हुआ।”

“कोई नेता?”

“नहीं, मैं वादा करना ही भूल जाता हूँ।”

गार्ड थोड़ा झुंझलाया,
“तो आप हैं कौन?”
महान परिचय

चाचा ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा,
“मैं हूँ—चाय पीने आया आदमी।”

गार्ड चौंका,
“ये कोई पद हुआ?”

चाचा बोले,
“बिल्कुल! बिना चाय के समारोह अधूरा रहता है।”
अंतिम फैसला

तभी आयोजक आ गए। बोले,
“चाचा जी, आप कहाँ बैठना चाहेंगे?”

चाचा बोले,
“जहाँ से भाषण कम और समोसे ज़्यादा दिखें।”

सब हँस पड़े।

आयोजक ने कहा,
“ठीक है चाचा जी, आप यहीं बैठिए।”

चाचा आराम से टिके और बोले,
“देखा! कुछ भी नहीं होने का फ़ायदा—
कोई ज़िम्मेदारी नहीं, लेकिन कुर्सी पक्की!”

और पूरा हॉल ठहाकों से गूँज उठा।

छाया की माया

यह कथा एक ऐसे राजकुमार की है, जिसके पास वैभव था, यौवन था, शिक्षा थी, पर मन में एक अजीब-सी उदासी घर कर गई थी। दिन में वह सभा में बैठता, पर उसकी दृष्टि कहीं खोई रहती। रात में शयनकक्ष में सोने की कोशिश करता, पर करवटें बदलते-बदलते भोर हो जाती। राजमहल के गलियारों में धीरे-धीरे यह चर्चा फैलने लगी कि राजकुमार किसी गहरे दुख में डूबा है।

महामंत्री, जो वर्षों से राज्य ही नहीं बल्कि राजपरिवार के मनोभावों को भी समझते आए थे, एक दिन साहस करके राजकुमार के पास पहुँचे। उन्होंने आदर से पूछा,
“राजकुमार, आपके मुख की आभा फीकी क्यों पड़ गई है? क्या राज्य में कोई संकट है, या हृदय में कोई पीड़ा?”

राजकुमार कुछ क्षण चुप रहा। फिर जैसे भीतर का बाँध टूट गया हो, वह बोला,
“महामंत्री, मैं प्रेम में पड़ गया हूँ। ऐसा प्रेम, जो हर क्षण मुझे बेचैन रखता है। उसके बिना सब कुछ व्यर्थ लगता है।”

महामंत्री चौंक गए। उन्होंने सोचा, शायद किसी राज्य की राजकुमारी होगी, या किसी दरबार में आई सुंदरी। उन्होंने संयत स्वर में पूछा,
“वह कौन है, राजकुमार? किस कुल की कन्या?”

उत्तर में राजकुमार ने कुछ नहीं कहा। वह अपने कक्ष के भीतर गया और एक पुराना चित्र लेकर आया। चित्र देखकर महामंत्री और भी अधिक चकित हो गए। उसमें एक लगभग पाँच वर्ष की बच्ची थी—बड़ी-बड़ी आँखें, कोमल मुख, राधा के वस्त्रों में सजी हुई।

राजकुमार ने भावुक स्वर में कहा,
“महामंत्री, यही वह है। देखिए, इतनी छोटी उम्र में भी कितनी सुंदर थी। सोचिए, अब जब वह बड़ी हो गई होगी, तो कितनी अनुपम होगी। मेरा मन उसी की कल्पना में डूबा रहता है।”

महामंत्री पहले तो कुछ समझ ही नहीं पाए। फिर उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई, जो धीरे-धीरे ठहाके में बदल गई। वे हँस पड़े।

राजकुमार को यह हँसी चुभ गई। वह नाराज़ होकर बोला,
“आप मेरी पीड़ा पर हँस रहे हैं?”

महामंत्री ने गंभीर होकर कहा,
“नहीं राजकुमार, मैं आपकी पीड़ा पर नहीं, आपके भ्रम पर हँस रहा हूँ। क्योंकि यह चित्र किसी और का नहीं, स्वयं आपका ही है।”

राजकुमार स्तब्ध रह गया।
“यह… मेरा?” उसने अविश्वास से पूछा।

महामंत्री ने स्मृतियों का द्वार खोला। “क्या आपको याद है, बचपन में राजमहल में श्रीकृष्ण-राधा का एक नाटक हुआ था? उस समय राधा की भूमिका निभाने वाली बच्ची अचानक बीमार पड़ गई थी। नाटक रद्द होने वाला था। तब महारानी ने, मज़ाक-मज़ाक में ही सही, आपको राधा के वस्त्र पहनाए। आपकी बड़ी आँखें, कोमल चेहरा और बालों की लटें देखकर सबने कहा—यही तो साक्षात राधा है। उसी दिन यह चित्र बनाया गया था।”

राजकुमार का चेहरा लाल पड़ गया। वर्षों से जिस प्रेम को वह अपने हृदय का सत्य मान रहा था, वह एक स्मृति-भ्रम निकला। वह देर तक चुप बैठा रहा।

महामंत्री ने धीरे से कहा, “राजकुमार, यह कथा केवल एक चित्र की नहीं है। यह मन की लीला है। मन कभी-कभी अपनी ही छाया को प्रेम समझ बैठता है। हम किसी बाहरी व्यक्ति में नहीं, बल्कि अपनी ही कल्पना में उलझ जाते हैं।”

राजकुमार की आँखों में समझ की चमक आई। उसकी उदासी जैसे धीरे-धीरे पिघलने लगी। उसने चित्र को आदर से रखा और गहरी साँस ली।

उस दिन राजकुमार ने केवल अपने भ्रम से नहीं, बल्कि अपने मन की चंचलता से भी परिचय पाया। और महल में पहली बार, बहुत दिनों बाद, उसके चेहरे पर हल्की-सी शांत मुस्कान लौट आई।

संसार पर विजय

वर्षों तक युद्ध के मैदानों में धूल उड़ाते, रक्त बहाते, सम्राट अशोकवर्धन—नहीं, उसका नाम इतिहास की किताबों में नहीं लिखा गया था, पर उसकी सेनाओं का नाम सुनकर पहाड़ भी काँप जाते थे। उत्तर में हिमालय की बर्फीली चोटियाँ, दक्षिण में समुद्र की लहरें, पूर्व में सूर्योदय की पहली किरण और पश्चिम में सूर्यास्त की आखिरी लाली—सब कुछ उसकी मुहर लगी हुई सी लगती थी।

जिन राजाओं के नाम पर नगर के बच्चे रात को डरते थे, वे अब उसके सिंहासन के सामने माथा टेके खड़े थे। जिनके पिता ने कभी सपने में भी उसके सामने सिर नहीं झुकाया था, उनकी संतानें अब उसके चरणों में भेंट चढ़ाती थीं।

महासभा में शंखनाद हुआ।चारों वेदों के विद्वान एक साथ मंत्रोच्चार करने लगे।पुरोहितों ने अग्नि में घी और चंदन की आहुति दी।और फिर घोषणा हुई—“चक्रवर्ती सम्राट!”

राजधानी तीन दिन-तीन रात नाचती रही।सोने के तोरण लगे, हाथियों की टोलियाँ सजाई गईं, नृत्यांगनाओं के घुंघरुओं की झनकार से रातें जाग उठीं। कवि नए-नए छंद रचते रहे, गीतकार स्वर लुटाते रहे।

पर चौथी रात जब उत्सव थम गए, जब नगर सो गया, जब महल के अंतिम दीपक भी बुझ गए, तब वह अकेला रह गया—सिंहासन पर नहीं, अपने शयनकक्ष की खिड़की के पास खड़ा, अंधेरे में टकटकी लगाए।

उसके हाथ में अभी भी वह तलवार थी जिसने सैकड़ों युद्ध जीते थे, पर उंगलियाँ काँप रही थीं।मन में एक ही प्रश्न बार-बार उछल रहा था—“सब कुछ मिल गया... फिर यह खालीपन क्यों?”

अगले दिन उसने महामंत्री हरिशेण को बुलाया।हरिशेण वही था जो बीस वर्ष से उसके साथ था—जब वह केवल एक युवा राजकुमार था, तब भी। युद्ध के मैदान में ढाल बनकर खड़ा रहा था, संधि के समय कठोर शब्दों को नरम करने वाला था, रात के अँधेरे में जब सम्राट को नींद नहीं आती थी, तब चुपचाप पास बैठकर कथा सुनाता था।

“हरिशेण,” सम्राट की आवाज में थकान थी,“मेरे पास सारा संसार है। फिर भी मन किसी बच्चे की तरह रोता रहता है। क्या कोई प्रदेश बाकी है? क्या कोई दुश्मन बचा है जिसे जीतना बाकी है?”

हरिशेण ने पहले तो कुछ नहीं कहा।फिर धीरे से मुस्कुराया—वह मुस्कान न तो चाटुकारिता की थी, न ही डर की। वह मुस्कान एक ऐसे व्यक्ति की थी जो बहुत कुछ देख चुका हो।

“महाराज,” उसने कहा,“आपने जो प्रदेश जीते, वे बाहर के थे।पर एक प्रदेश ऐसा है जो अभी तक आपकी सेनाओं के सामने नहीं आया।वह प्रदेश है—आप स्वयं।”

सम्राट की भौंहें सिकुड़ गईं।हरिशेण ने आगे कहा,“यदि आज्ञा हो तो मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति के पास ले चलूँ, जिसके पास न कोई सेना है, न कोई साम्राज्य, न कोई मुकुट। फिर भी वह हर दिन सूर्योदय के साथ हँसता है और सूर्यास्त के साथ सो जाता है। उसकी आँखों में कोई युद्ध नहीं, कोई विजय नहीं—केवल शांति।”

अगले प्रातःकाल, बिना किसी शाही जुलूस के, बिना नगाड़ों के, बिना सैनिकों के, केवल एक सादा वस्त्र पहने सम्राट और हरिशेण नगर से बाहर निकले।वे एक पुरानी नदी के तट पर पहुँचे।

नदी धीरे-धीरे बह रही थी, जैसे समय को भी कोई जल्दी न हो।वहीं एक फटे वस्त्रों वाला फकीर बैठा था।उसके बाल खुले थे, पैर नंगे थे, और चेहरा... चेहरा ऐसा था मानो उस पर कभी कोई बोझ न पड़ा हो।सूर्य की पहली सुनहरी किरणें उसके माथे को छू रही थीं।

सम्राट ने आगे बढ़कर पूछा—“बाबा, मेरे पास सब कुछ है—सोना, राज्य, सेना, सम्मान। फिर भी रातों को नींद नहीं आती। तुम्हारे पास कुछ भी नहीं—फिर भी तुम्हारी आँखों में ऐसी शांति है जैसे तुमने कभी कोई युद्ध ही न देखा हो। इसका रहस्य बताओ।”

फकीर ने धीरे से आँखें खोलीं।उसकी नजर सम्राट के चेहरे पर ठहरी, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला—
“मैं उत्तर दे सकता हूँ... पर पहले मेरी गुरु-दक्षिणा देनी होगी।”

सम्राट ने तुरंत कहा—“जो माँगोगे, मिलेगा। सोना? भूमि? महल? वस्त्र? नाम बताओ।”

फकीर हँसा—नरम, लगभग बच्चों जैसी हँसी।फिर बोला—“अभी केवल इतना करो कि सूर्य और मेरे बीच से हट जाओ।तुम मेरी धूप रोक रहे हो।”

सम्राट जैसे पत्थर बन गया।चक्रवर्ती सम्राट।जिसके सामने पूरा संसार झुकता था।और दक्षिणा में केवल... दो कदम पीछे हटना?

कुछ पल तक वह हिल ही नहीं सका।फिर धीरे-धीरे, लगभग अनिच्छा से, वह दो कदम पीछे हटा।

सूर्य की किरणें फिर से फकीर के चेहरे पर बिखर गईं।फकीर ने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली, जैसे वह पहली बार साँस ले रहा हो।

फिर उसने धीरे से कहा—“देखा महाराज?जैसे तुम्हारा शरीर मेरे और सूर्य के बीच आकर प्रकाश को रोक रहा था,
वैसे ही तुम्हारा ‘मैं’ तुम्हारे और उस अनंत प्रकाश के बीच खड़ा है।वह प्रकाश हर जगह है—नदी में, हवा में, पेड़ों में, तुम्हारे भीतर भी।


पर तुम्हारा ‘मैं’ बहुत बड़ा हो गया है।वह कहता है—मैं सम्राट हूँ, मैं विजेता हूँ, मैं सबसे बड़ा हूँ।जब तक यह ‘मैं’ खड़ा रहेगा, शांति की धूप तुम तक नहीं पहुँचेगी।”

सम्राट चुपचाप सुन रहा था।उसकी आँखें नम हो चली थीं।

फकीर ने फिर कहा—“सबसे बड़ा त्याग राज्य का नहीं, मुकुट का नहीं, सेना का नहीं...सबसे बड़ा त्याग है उस ‘मैं’ का।जिस दिन तुम उसके सामने से हट जाओगे,उसी दिन वह अनंत प्रकाश तुम्हें ढक लेगा।और तब तुम पाओगे कि जिसे तुम जीतने दौड़ रहे थे,वह तो तुममें ही बैठा था।”

नदी बहती रही।सूर्य ढलने लगा।हवा में ठंडक आ गई।

सम्राट ने कुछ नहीं कहा।वह बस धीरे से झुका।न झुकना था किसी फकीर के सामने।झुकना था उस अनंत के सामने, जो पहली बार उसे स्पष्ट दिखाई दे रहा था।

उस दिन उसने कोई युद्ध नहीं लड़ा।कोई किला नहीं जीता।कोई राजा उसके सामने सिर नहीं झुकाया।

फिर भी वह जान गया था—सबसे बड़ी विजय वही है,जिसमें कोई हारा नहीं।सिर्फ ‘मैं’ हारा।

और जब ‘मैं’ हार जाता है,तब जीतने वाला भी वही रह जाता है—और हारने वाला भी वही।

Thursday, December 18, 2025

स्वामित्व

बहुत समय पहले की बात है। एक विस्तृत मैदान के बीच, ऊँची पहाड़ी पर एक विशाल किला खड़ा था। उसकी मोटी पत्थर की दीवारें समय की मार सह चुकी थीं, बुर्ज़ों पर हवा सीटी बजाती थी और दरवाज़ों पर जंग लगी लोहे की कीलें अतीत की गवाही दे रही थीं। उसी किले के सामने दो व्यक्ति आमने-सामने खड़े थे, आँखों में आग और शब्दों में ज़िद।

पहला व्यक्ति ऊँचे स्वर में बोला,
“यह किला मेरे पूर्वजों का है। पीढ़ियों तक हमारे परिवार ने इसकी रक्षा की है। इन दीवारों में मेरे खानदान का पसीना और रक्त मिला है।”

दूसरा व्यक्ति तुरंत पलटकर बोला,
“यह झूठ है। यह किला मेरे पूर्वजों को उपहार में दिया गया था। राजाओं की कृपा से यह हमारे परिवार के पास आया। मैं ही इसका वास्तविक अधिकारी हूँ।”

दोनों की आवाज़ें ऊँची होती चली गईं। तर्क, आरोप और क्रोध आपस में उलझ गए। अंततः मामला राजा के पास  पहुँचा। राजा ने दोनों की बातें धैर्यपूर्वक सुनीं, पर जब उन्होंने प्रमाण माँगे तो दोनों ही चुप हो गए। न कोई दस्तावेज़ था, न कोई शिलालेख, न कोई साक्षी।

राजा कुछ देर सोचते रहे। फिर उन्होंने अपने बुद्धिमान मंत्री की ओर देखा और बोले,
“इस विवाद का कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे इन दोनों को सत्य का बोध हो सके।”

मंत्री ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार की और दोनों व्यक्तियों को अपने साथ ले चले। वे उन्हें नगर की गलियों से होते हुए एक खुले मैदान में ले आए। वहाँ दो छोटे बच्चे आपस में झगड़ रहे थे। उनके बीच ज़मीन पर एक छोटा सा लकड़ी का रथ पड़ा था—खिलौना ही सही, पर बच्चों के लिए वह किसी खजाने से कम नहीं था।

एक बच्चा रोते हुए कह रहा था,
“यह रथ मेरा है, मैंने इसे पहले देखा था।”

दूसरा बच्चा गुस्से में चिल्लाया,
“नहीं, मैंने इसे पहले उठाया था, इसलिए यह मेरा है।”

मंत्री कुछ देर बच्चों की बहस सुनते रहे। फिर मुस्कराकर दोनों वयस्कों की ओर मुड़े और बोले,
“आप इन बच्चों की बात सुन रहे हैं? एक कहता है—पहले देखा, इसलिए मेरा। दूसरा कहता है—पहले पकड़ा, इसलिए मेरा। पर क्या देखने या पकड़ने भर से किसी वस्तु का स्वामित्व सिद्ध हो जाता है?”

दोनों व्यक्ति चुप हो गए।

मंत्री ने आगे कहा,
“आप दोनों भी उसी प्रकार उस किले पर दावा कर रहे हैं। न आपके पास प्रमाण है, न साक्ष्य—केवल कथाएँ और अनुमान। जैसे ये बच्चे बिना ठोस आधार के रथ को अपना बता रहे हैं, वैसे ही आप किले को।”

फिर मंत्री ने किले की ओर देखते हुए गंभीर स्वर में पूछा,
“क्या आपने कभी उस किले से यह जानने का प्रयास किया कि वह किसे अपना स्वामी मानता है? क्या आपने उसकी रक्षा की, उसकी सेवा की, उसके अस्तित्व का भार उठाया? या केवल अधिकार की भाषा में उसे बाँटना चाहते हैं?”

दोनों व्यक्तियों की आँखें झुक गईं। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि स्वामित्व केवल वंश या उपहार की कहानी से नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व, सेवा और प्रमाण से सिद्ध होता है।

मंत्री ने शांत स्वर में निष्कर्ष दिया,
“जिसका अधिकार केवल दावे पर टिका हो, वह रेत पर खड़े महल के समान होता है। सच्चा स्वामी वही है जो भार उठाए, न कि केवल नाम ले।”

यह सुनकर दोनों व्यक्ति निःशब्द लौट गए। किला वहीं खड़ा रहा—मौन, अडिग और साक्षी—मानो कह रहा हो कि वह स्वयं किसी का नहीं, बल्कि समय का है।

Sunday, December 14, 2025

परफेक्टनेस

अदालत में उस दिन कुछ अलग ही माहौल था। वकील साहब पूरे जोश में अपनी दलीलें रख चुके थे। फ़ाइलें बंद हो चुकी थीं, पंखे की आवाज़ भी मानो अचानक तेज़ लगने लगी थी। तभी जज साहब कुर्सी पर थोड़ा आगे झुके। उनके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान तैर रही थी, वैसी मुस्कान जो आमतौर पर फैसले से पहले नहीं आती।

जज साहब बोले,
“काउंसल, कहना पड़ेगा, आपकी दलीलें बिल्कुल परफेक्ट थीं।”

पूरी अदालत में सन्नाटा छा गया। मुवक्किल ने राहत की साँस लेने से पहले ही रोक ली, विपक्षी वकील ने चश्मा ठीक किया, और स्टेनोग्राफ़र ने उँगलियाँ हवा में ही रोक दीं। सबको लगा अब वकील साहब आदतन सिर झुकाकर कहेंगे—“थैंक यू, योर ऑनर।”

लेकिन वकील साहब के चेहरे पर हल्की शरारत चमकी। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“धन्यवाद, योर ऑनर। मगर ये परफेक्टनेस यूँ ही नहीं आया है। ये उन तमाम गलतियों का नतीजा है, जो मैंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में किए थे।”

एक पल को जज साहब भी चौंके, फिर खुद को रोक नहीं पाए। अदालत ठहाकों से गूँज उठी। पेशकार हँसते-हँसते खाँसने लगा, और मुवक्किल पहली बार पूरे केस में दिल खोलकर मुस्कुराया।

जज साहब हँसी दबाते हुए बोले,
“तो मतलब ये कि आपने गलतियाँ भरपूर की हैं।”

वकील साहब ने तुरंत जवाब दिया,
“जी योर ऑनर, इतनी कि अब दूसरों की गलती पहचानने में देर ही नहीं लगती।”

इस पर जज साहब ने हथौड़ा हल्के से मेज़ पर रखते हुए कहा,
“अच्छा है, आपने गलतियों से सीख ली। बस आज आपकी सीख की फीस आपका मुवक्किल न चुकाए, यही उम्मीद है।”

Saturday, December 13, 2025

जय भारत

जलियाँवाला बाग़ कांड के कुछ ही सप्ताह बाद की एक कल्पित संध्या थी।
अमृतसर के बाहर एक पुराने आश्रम में दीपक की मद्धम लौ जल रही थी। बाहर सन्नाटा था, भीतर इतिहास साँस ले रहा था।

भगत सिंह तेज़ क़दमों से आए। आँखों में आग थी, पर आवाज़ में संयम।
सामने चटाई पर बैठे थे मोहनदास करमचंद गांधी—शांत, निर्विकार, जैसे भीतर कोई महासागर ठहरा हो।

भगत सिंह:
बापू, अमृतसर की मिट्टी आज भी गरम है। वहाँ सिर्फ़ लोग नहीं मरे, वहाँ भरोसा मरा है। क्या अहिंसा उन गोलियों को रोक सकती थी?

गांधी:
भगत, गोलियाँ शरीर को मारती हैं, पर हिंसा आत्मा को। मैं उन लाशों को भूल नहीं सकता, पर यदि हम भी वही बन गए जो जनरल डायर था, तो फ़र्क़ क्या रहेगा?

भगत सिंह (कठोर स्वर में):
फ़र्क़ रहेगा, बापू। वह सत्ता के लिए मारा, हम आज़ादी के लिए मारेंगे। उसने डर पैदा किया, हम डर तोड़ेंगे।

गांधी (धीरे मुस्कुराते हुए):
डर टूटता है साहस से, और साहस केवल बंदूक से नहीं आता। क्या तुमने उन माताओं की आँखें देखी हैं, जो अपने बेटों को खो चुकी हैं? वे और लाशें नहीं चाहतीं।

भगत सिंह:
और मैंने उन युवाओं की आँखें देखी हैं, बापू, जिनके भीतर अब सवाल नहीं, ज्वालामुखी है। वे पूछते हैं—कब तक याचना? कब तक प्रार्थना?

गांधी:
प्रार्थना कमज़ोरी नहीं, अनुशासन है। अहिंसा कायरों का हथियार नहीं, वीरों की परीक्षा है।

भगत सिंह (एक पल चुप रहकर):
अगर अहिंसा इतनी ही शक्तिशाली है, तो जलियाँवाला बाग़ क्यों हुआ?

गांधी (आँखें नम):
क्योंकि साम्राज्य भय से चलता है, और भय बहरे होते हैं। पर इतिहास का कान अंततः नैतिकता सुनता है।

भगत सिंह:
इतिहास तब सुनता है जब उसे झकझोरा जाए। बापू, मेरा रास्ता खून से सना हो सकता है, पर उसका अंत भी आज़ादी ही है।

गांधी:
और मेरा रास्ता काँटों से भरा है, पर उसका अंत भी वही है। सवाल रास्ते का नहीं, कीमत का है। तुम अपनी जान दोगे—मैं हज़ारों की जान बचाना चाहता हूँ।

भगत सिंह (नरम पड़ते हुए):
अगर मेरा बलिदान उन हज़ारों को जगाए?

गांधी:
तो वह बलिदान कहलाएगा, प्रतिशोध नहीं। पर याद रखो—क्रांति केवल शासन बदलने का नाम नहीं, मन बदलने का भी है।

भगत सिंह (गहरी साँस लेते हुए):
शायद हम दोनों एक ही पर्वत की दो ढलानों से चढ़ रहे हैं।

गांधी (मुस्कुरा कर):
और शिखर पर तिरंगा फहरेगा, चाहे कदम किसी भी दिशा से आए हों।

दीपक की लौ काँपी। बाहर कहीं मंदिर की घंटी बजी।
दो पीढ़ियाँ, दो रास्ते—पर सपना एक।
जय भारत।

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