स्वतंत्रता का नवल पौधा, रक्त से निज सींचकर,
था उगाया वीर ने, कफ़न स्वयं शीश पर।
अमर ज्वाला-सा जला, अन्याय की दीवार में,
जयघोष गूँज उठा, रणभूमि की पुकार में।
लहू की धार बह चली, धरती हुई गुलाल-सी,
गगन थर्राने लगा, रण-ध्वनि हुई धमाल-सी।
वीर सपूत हँस पड़ा, तीरों के उस घाव पर,
वतन की जीत हो चाहे प्राण ले जाए हर।"
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ख़ुदा की बुलंदी
जो भी मिला यहाँ, ख़ुद में ही खोया मिला,
सज्दे दिखे, पर अदा-ए-ख़ुदा नहीं मिलती।
दिल से ‘मैं’ को मिटा देना ही अस्ल इबादत है,
ख़ुदा की बुलंदी यूँ ही अता नहीं मिलती।
अजय अमिताभ सुमन
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कीमत
वो जो देता है बुलंदी, कोई इनाम नहीं है,
इम्तिहान-ए-रूह है ये कोई आराम नहीं है।
आसमां छू के भी इंसां तो अधूरा ही रहा,
अब उसमें झुके हुए दिल का नाम नहीं है।
ख़ुदा जब उठाता है, तो बढ़ जाती है तन्हाई,
गुरूर के बिना हासिल कोई मुकाम नहीं है।
अजय अमिताभ सुमन
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