वर्षों तक युद्ध के मैदानों में धूल उड़ाते, रक्त बहाते, सम्राट अशोकवर्धन—नहीं, उसका नाम इतिहास की किताबों में नहीं लिखा गया था, पर उसकी सेनाओं का नाम सुनकर पहाड़ भी काँप जाते थे। उत्तर में हिमालय की बर्फीली चोटियाँ, दक्षिण में समुद्र की लहरें, पूर्व में सूर्योदय की पहली किरण और पश्चिम में सूर्यास्त की आखिरी लाली—सब कुछ उसकी मुहर लगी हुई सी लगती थी।
जिन राजाओं के नाम पर नगर के बच्चे रात को डरते थे, वे अब उसके सिंहासन के सामने माथा टेके खड़े थे। जिनके पिता ने कभी सपने में भी उसके सामने सिर नहीं झुकाया था, उनकी संतानें अब उसके चरणों में भेंट चढ़ाती थीं।
महासभा में शंखनाद हुआ।चारों वेदों के विद्वान एक साथ मंत्रोच्चार करने लगे।पुरोहितों ने अग्नि में घी और चंदन की आहुति दी।और फिर घोषणा हुई—“चक्रवर्ती सम्राट!”
राजधानी तीन दिन-तीन रात नाचती रही।सोने के तोरण लगे, हाथियों की टोलियाँ सजाई गईं, नृत्यांगनाओं के घुंघरुओं की झनकार से रातें जाग उठीं। कवि नए-नए छंद रचते रहे, गीतकार स्वर लुटाते रहे।
पर चौथी रात जब उत्सव थम गए, जब नगर सो गया, जब महल के अंतिम दीपक भी बुझ गए, तब वह अकेला रह गया—सिंहासन पर नहीं, अपने शयनकक्ष की खिड़की के पास खड़ा, अंधेरे में टकटकी लगाए।
उसके हाथ में अभी भी वह तलवार थी जिसने सैकड़ों युद्ध जीते थे, पर उंगलियाँ काँप रही थीं।मन में एक ही प्रश्न बार-बार उछल रहा था—“सब कुछ मिल गया... फिर यह खालीपन क्यों?”
अगले दिन उसने महामंत्री हरिशेण को बुलाया।हरिशेण वही था जो बीस वर्ष से उसके साथ था—जब वह केवल एक युवा राजकुमार था, तब भी। युद्ध के मैदान में ढाल बनकर खड़ा रहा था, संधि के समय कठोर शब्दों को नरम करने वाला था, रात के अँधेरे में जब सम्राट को नींद नहीं आती थी, तब चुपचाप पास बैठकर कथा सुनाता था।
“हरिशेण,” सम्राट की आवाज में थकान थी,“मेरे पास सारा संसार है। फिर भी मन किसी बच्चे की तरह रोता रहता है। क्या कोई प्रदेश बाकी है? क्या कोई दुश्मन बचा है जिसे जीतना बाकी है?”
हरिशेण ने पहले तो कुछ नहीं कहा।फिर धीरे से मुस्कुराया—वह मुस्कान न तो चाटुकारिता की थी, न ही डर की। वह मुस्कान एक ऐसे व्यक्ति की थी जो बहुत कुछ देख चुका हो।
“महाराज,” उसने कहा,“आपने जो प्रदेश जीते, वे बाहर के थे।पर एक प्रदेश ऐसा है जो अभी तक आपकी सेनाओं के सामने नहीं आया।वह प्रदेश है—आप स्वयं।”
सम्राट की भौंहें सिकुड़ गईं।हरिशेण ने आगे कहा,“यदि आज्ञा हो तो मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति के पास ले चलूँ, जिसके पास न कोई सेना है, न कोई साम्राज्य, न कोई मुकुट। फिर भी वह हर दिन सूर्योदय के साथ हँसता है और सूर्यास्त के साथ सो जाता है। उसकी आँखों में कोई युद्ध नहीं, कोई विजय नहीं—केवल शांति।”
अगले प्रातःकाल, बिना किसी शाही जुलूस के, बिना नगाड़ों के, बिना सैनिकों के, केवल एक सादा वस्त्र पहने सम्राट और हरिशेण नगर से बाहर निकले।वे एक पुरानी नदी के तट पर पहुँचे।
नदी धीरे-धीरे बह रही थी, जैसे समय को भी कोई जल्दी न हो।वहीं एक फटे वस्त्रों वाला फकीर बैठा था।उसके बाल खुले थे, पैर नंगे थे, और चेहरा... चेहरा ऐसा था मानो उस पर कभी कोई बोझ न पड़ा हो।सूर्य की पहली सुनहरी किरणें उसके माथे को छू रही थीं।
सम्राट ने आगे बढ़कर पूछा—“बाबा, मेरे पास सब कुछ है—सोना, राज्य, सेना, सम्मान। फिर भी रातों को नींद नहीं आती। तुम्हारे पास कुछ भी नहीं—फिर भी तुम्हारी आँखों में ऐसी शांति है जैसे तुमने कभी कोई युद्ध ही न देखा हो। इसका रहस्य बताओ।”
सम्राट ने तुरंत कहा—“जो माँगोगे, मिलेगा। सोना? भूमि? महल? वस्त्र? नाम बताओ।”
फकीर हँसा—नरम, लगभग बच्चों जैसी हँसी।फिर बोला—“अभी केवल इतना करो कि सूर्य और मेरे बीच से हट जाओ।तुम मेरी धूप रोक रहे हो।”
सम्राट जैसे पत्थर बन गया।चक्रवर्ती सम्राट।जिसके सामने पूरा संसार झुकता था।और दक्षिणा में केवल... दो कदम पीछे हटना?
कुछ पल तक वह हिल ही नहीं सका।फिर धीरे-धीरे, लगभग अनिच्छा से, वह दो कदम पीछे हटा।
सूर्य की किरणें फिर से फकीर के चेहरे पर बिखर गईं।फकीर ने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली, जैसे वह पहली बार साँस ले रहा हो।
सम्राट चुपचाप सुन रहा था।उसकी आँखें नम हो चली थीं।
फकीर ने फिर कहा—“सबसे बड़ा त्याग राज्य का नहीं, मुकुट का नहीं, सेना का नहीं...सबसे बड़ा त्याग है उस ‘मैं’ का।जिस दिन तुम उसके सामने से हट जाओगे,उसी दिन वह अनंत प्रकाश तुम्हें ढक लेगा।और तब तुम पाओगे कि जिसे तुम जीतने दौड़ रहे थे,वह तो तुममें ही बैठा था।”
नदी बहती रही।सूर्य ढलने लगा।हवा में ठंडक आ गई।
सम्राट ने कुछ नहीं कहा।वह बस धीरे से झुका।न झुकना था किसी फकीर के सामने।झुकना था उस अनंत के सामने, जो पहली बार उसे स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
उस दिन उसने कोई युद्ध नहीं लड़ा।कोई किला नहीं जीता।कोई राजा उसके सामने सिर नहीं झुकाया।
फिर भी वह जान गया था—सबसे बड़ी विजय वही है,जिसमें कोई हारा नहीं।सिर्फ ‘मैं’ हारा।
और जब ‘मैं’ हार जाता है,तब जीतने वाला भी वही रह जाता है—और हारने वाला भी वही।
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