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वकील:
हे वासुदेव! एक शंका आज भी मेरे मन को उद्वेलित करती है। आपने धर्म की स्थापना के लिए महाभारत का युद्ध कराया। युद्ध के उपरान्त कर्णपुत्र वृषकेतु पाण्डवों के साथ रहा। वह आयु में परीक्षित से बड़ा था और संबंध में उसका चाचा भी था। फिर जब महाराज युधिष्ठिर ने राज्य त्यागकर महाप्रस्थान किया, तब हस्तिनापुर का सिंहासन वृषकेतु को न देकर परीक्षित को क्यों सौंपा? क्या धर्म यह नहीं कहता कि ज्येष्ठ को अधिकार मिलना चाहिए?
श्रीकृष्ण:
वत्स, तुमने दो बातों को एक मान लिया है—रक्त-संबंध और राज्य का वैधानिक उत्तराधिकार। धर्म में दोनों सदैव एक जैसे नहीं होते।
वकील:
किन्तु कर्ण तो कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र था। जब यह सत्य सबके सामने आ गया, तब उसके पुत्र वृषकेतु का अधिकार पहले क्यों नहीं माना गया?
श्रीकृष्ण:
यदि केवल जन्म का सत्य जान लेने से राज्य का उत्तराधिकार बदल जाता, तो सबसे पहले युधिष्ठिर को अपना राज्य छोड़ देना चाहिए था। किन्तु ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि राजधर्म जन्म के गुप्त सत्य पर नहीं, स्थापित राज्य-व्यवस्था पर चलता है।
कर्ण जन्म से कुन्तीपुत्र अवश्य था, परन्तु उसने सम्पूर्ण जीवन स्वयं को सूतपुत्र और अंगराज के रूप में स्वीकार किया। वह हस्तिनापुर का युवराज कभी नहीं बना, न उसका राज्याभिषेक हुआ और न ही उसने कभी सिंहासन का दावा किया।
इसलिए उसके पुत्र वृषकेतु को भी हस्तिनापुर पर वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हुआ।
वकील:
तो क्या ज्येष्ठता का कोई मूल्य नहीं?
श्रीकृष्ण:
ज्येष्ठता का मूल्य है, किन्तु जहाँ उत्तराधिकार की वैधानिक परम्परा विद्यमान हो, वहाँ केवल आयु या रक्त-संबंध से अधिकार नहीं बदल जाता।
हस्तिनापुर की उत्तराधिकार-रेखा थी—
शांतनु → विचित्रवीर्य → पाण्डु → अर्जुन → अभिमन्यु → परीक्षित।
इसी परम्परा का अंतिम जीवित उत्तराधिकारी परीक्षित था।
कर्ण उसी कुल में जन्मे अवश्य थे, किन्तु वे उस उत्तराधिकार-श्रृंखला में कभी स्थापित नहीं हुए। अतः वृषकेतु उस वैधानिक श्रृंखला का उत्तराधिकारी नहीं बन सकता था।
वकील:
परन्तु धर्म तो न्याय भी चाहता है। क्या वृषकेतु के साथ न्याय हुआ?
श्रीकृष्ण:
न्याय का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक योग्य व्यक्ति को सिंहासन ही मिले।
युधिष्ठिर ने वृषकेतु का तिरस्कार नहीं किया। अर्जुन ने उसे पुत्रवत् अपनाया, अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी और उसे सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठित किया। उसके साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं हुआ।
किन्तु यदि हस्तिनापुर का सिंहासन वृषकेतु को दे दिया जाता, तो भविष्य में प्रत्येक राज्य में गुप्त जन्म, रक्त-संबंध और नए दावों के आधार पर गृहयुद्ध आरम्भ हो जाते। तब राजधर्म नष्ट हो जाता।
वकील:
अर्थात् युधिष्ठिर ने व्यक्ति नहीं, व्यवस्था को बचाया?
श्रीकृष्ण:
यही सत्य है।
धर्म का उद्देश्य केवल किसी एक योग्य व्यक्ति को सम्मान देना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है जिससे आने वाली पीढ़ियों में अराजकता न फैले।
यदि भावनाओं के कारण उत्तराधिकार बदल दिया जाता, तो धर्म की रक्षा नहीं होती, बल्कि धर्म संकट में पड़ जाता।
वकील:
तो क्या यह कहा जा सकता है कि वृषकेतु सम्मान का अधिकारी था, किन्तु सिंहासन का नहीं?
श्रीकृष्ण:
हाँ वत्स।
वृषकेतु को पाण्डवों ने स्नेह, सम्मान और संरक्षण दिया, क्योंकि वह कर्ण का पुत्र था और वीर था।
किन्तु हस्तिनापुर का सिंहासन परीक्षित को मिला, क्योंकि वह कुरुराज्य की वैधानिक उत्तराधिकार-परम्परा का अंतिम अधिकारी था।
वकील:
अब मैं समझ गया, प्रभु। धर्म केवल यह नहीं देखता कि कौन बड़ा है; वह यह भी देखता है कि किसे अधिकार देना समस्त राज्य और समाज के लिए हितकारी होगा।
श्रीकृष्ण (मुस्कराकर):
वत्स, यही राजधर्म का सार है—
"जहाँ केवल संबंध देखकर निर्णय लिया जाए, वहाँ पक्षपात जन्म लेता है; जहाँ केवल व्यवस्था देखकर निर्णय लिया जाए, वहाँ कठोरता जन्म लेती है; पर जहाँ व्यवस्था और लोककल्याण दोनों का संतुलन हो, वहीं धर्म प्रकट होता है।"
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वकील: हे श्रीकृष्ण एक बात मेरी समझ में नहीं आती भीम और जरासंध का युद्ध अठारह दिनों तक चला आपको तो पहले दिन से ही ज्ञात था कि जरासंध का वध कैसे होगा, फिर आपने भीम को वह उपाय पहले ही क्यों नहीं बताया
श्रीकृष्ण: वकील साहब यदि मेरा उद्देश्य केवल जरासंध का वध कराना होता तो वह प्रथम दिन ही हो जाता परंतु मेरा उद्देश्य केवल एक व्यक्ति का अंत करना नहीं था बल्कि संसार के सामने दो महायोद्धाओं का वास्तविक सामर्थ्य प्रकट करना भी था
वकील: लेकिन प्रभु यदि इस मल्ल युद्ध का परिणाम पहले से हीं निश्चित था तो फिर इन अठारह दिनों तक इस मल्ल युद्ध को कराने की आवश्यकता ही क्या थी
श्रीकृष्ण: क्योंकि जरासंध कोई साधारण राजा नहीं था वह महान पराक्रमी और असाधारण बल का स्वामी था तथा अनेक राजाओं को अपने पराक्रम से पराजित किया था यदि मैं पहले ही दिन रहस्य बता देता तो लोग कहते जरासंध शक्ति से नहीं अपितु अपने जन्म के रहस्य के कारण मारा गया इससे उसके पराक्रम का सम्मान नहीं होता
वकील: अर्थात अठारह दिनों का युद्ध जरासंध के सम्मान के लिए था
श्रीकृष्ण: संसार को यह देखना आवश्यक था कि भीम और जरासंध बल और धैर्य में एक-दूसरे के समकक्ष हैं जब अठारह दिनों तक कोई किसी को परास्त न कर सका और दुनिया ने देख लिया कि सामान्य युद्ध से निर्णय संभव नहीं था
वकील: हाँ शायद इसीलिए आपने युद्ध के 18 दिनों तक चलने के बाद आपने संकेत दिया
श्रीकृष्ण: हाँ तब पुरुषार्थ अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था यह स्पष्ट हो गया था कि युद्ध बल से नहीं बल्कि उसके जन्म के रहस्य को समझकर ही खत्म किया जा सकता है उसके बाद हीं मैंने संकेत दिया तब विजय केवल मेरी युक्ति की नहीं भीम के अद्वितीय पराक्रम धैर्य और अठारह दिनों के पुरुषार्थ की भी थी
वकील: प्रभु क्या यही हमारे जीवन पर भी लागू होती है
श्रीकृष्ण: निश्चय ही मैं जीवन में भी तुम्हें समाधान तुरंत नहीं देता पहले तुम्हें अपनी पूरी शक्ति धैर्य और पुरुषार्थ का प्रयोग करने देता हूँ जब तुम्हारा प्रयास पूर्ण हो जाता है तब मैं वह संकेत देता हूँ जो तुम्हें विजय तक पहुँचा देता है स्मरण रखो बिना पुरुषार्थ के मिला उपाय केवल सुविधा देता है पर पुरुषार्थ के बाद मिला उपाय स्थायी विजय और यश देता है
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