Wednesday, April 8, 2026

एक न्यूरोसर्जन की अलौकिक यात्रा

एक न्यूरोसर्जन की आफ्टरलाइफ की यात्रा

यह वृत्तांत डॉ. एबेन अलेक्जेंडर की असाधारण जीवन यात्रा का विवरण देती है, जो एक प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन होकर भी पहले चेतना को केवल मस्तिष्क की उपज मानते थे। वर्ष 2008 में ई. कोलाई बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस के कारण वे सात दिनों तक गहरे कोमा में रहे, जिस दौरान उनके मस्तिष्क का सोचने वाला हिस्सा पूरी तरह निष्क्रिय हो गया था। इस शारीरिक शून्यता के बावजूद, उन्होंने एक अति-वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा का अनुभव किया जिसे उन्होंने 'स्वर्ग का प्रमाण' माना है। उनकी यह कहानी एक कठोर वैज्ञानिक के हृदय परिवर्तन को दर्शाती है, जहाँ वे व्यक्तिगत साक्ष्यों के आधार पर यह तर्क देते हैं कि मृत्यु के बाद भी जीवन शेष रहता है। अंततः, यह स्पष्ट करता है कि प्रेम ही ब्रह्मांड का मूल आधार है और मानव चेतना शरीर की सीमाओं से परे स्वतंत्र रूप से अस्तित्व रखती है। यह वृत्तांत विज्ञान और आध्यात्मिकता के बीच के अंतर को पाटते हुए शाश्वत जीवन और आशा का एक गहरा संदेश प्रदान करता है।

यह किताब अमेरिकी न्यूरोसर्जन डॉ. एबेन अलेक्जेंडर की सच्ची, जीवन-परिवर्तक कहानी है। वे 25 साल से ज्यादा समय तक हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में न्यूरोसर्जरी के एसोसिएट प्रोफेसर रहे और ब्रेन सर्जरी के विश्व-प्रसिद्ध विशेषज्ञ थे। उन्होंने सैकड़ों जटिल ब्रेन ऑपरेशन किए, स्टिरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी विकसित की और 150 से ज्यादा शोध-पत्र लिखे। वे पूरे वैज्ञानिक थे — चेतना को मस्तिष्क का उत्पाद मानते थे। NDE (Near-Death Experience) की कहानियों को वे “मस्तिष्क की कल्पना” समझते थे। लेकिन 10 नवंबर 2008 को उनकी अपनी 7 दिन की कोमा ने सब कुछ बदल दिया। उनका पूरा **neocortex** (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो हमें सोचने, याद रखने, भाषा बोलने और इंसान बनाने वाला है) बैक्टीरिया से पूरी तरह नष्ट हो गया था। फिर भी उन्होंने एक गहन, ultra-real NDE अनुभव किया — जो उन्हें लगता है कि **स्वर्ग का प्रमाण** है। यह किताब विज्ञान, आध्यात्मिकता और चेतना के रहस्य को जोड़ती है।

### बचपन से कोमा तक: वैज्ञानिक जीवन और अचानक संकट
बचपन से एबेन आकाश के दीवाने थे। वे स्काईडाइविंग, ग्लाइडिंग और फ्लाइंग के शौकीन थे। एक बार 1975 में स्काईडाइविंग में उन्होंने चमत्कारिक रूप से अपनी और दोस्त की जान बचाई — माइक्रोसेकंड में फैसला लिया, जो उन्हें लगा कि उनका मस्तिष्क “सुपर-पावर्ड” हो गया था। वे मानते थे कि चेतना सिर्फ मस्तिष्क का उत्पाद है। अगर मस्तिष्क बंद, तो चेतना खत्म।

10 नवंबर 2008 को वर्जीनिया के लिंचबर्ग में सुबह 4:30 बजे उनकी कमर में तेज दर्द उठा। उन्होंने सोचा फ्लू है। पत्नी **होली** के साथ बाथटब में गए, लेकिन दर्द बढ़ गया। अचानक **ग्रैंड माल सीज़र** हुआ। होली ने 911 कॉल किया। लिंचबर्ग जनरल हॉस्पिटल में डॉ. लॉरा पॉटर ने उन्हें देखा। लुम्बर पंक्चर से निकला CSF (cerebrospinal fluid) pus से भरा, हरा-सफेद और गाढ़ा था। CSF ग्लूकोज सिर्फ 1 mg/dl (नॉर्मल 80) था। डॉक्टरों ने **E. coli बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस** का निदान लगाया — वयस्कों में 1 करोड़ में 1 से भी कम केस, और घातक। ग्लासगो कोमा स्केल 8 से नीचे गिर गया। APACHE II स्कोर 18। तीन शक्तिशाली IV एंटीबायोटिक्स दिए गए, लेकिन बचने की संभावना सिर्फ 10% थी। अगर बच गए तो वेजिटेटिव स्टेट में रहने की आशंका थी।

परिवार इकट्ठा हो गया — पत्नी होली, 10 साल का बेटा **बॉन्ड**, 20 साल का बड़ा बेटा **एबेन IV** (डेलावेयर यूनिवर्सिटी से तुरंत आया), बहनें बेट्सी, फिलिस और जीन। एबेन IV ने ICU में पिता को मशीनों से जुड़ा देखा और समझ गया — “पिता चले गए हैं, सिर्फ शरीर बचा है।”

### NDE की यात्रा — Underworld, Gateway और Core (अध्याय 5-12)
कोमा में एबेन की चेतना सबसे अंधेरे, प्राचीनतम स्तर पर जागृत हुई — **Underworld (Earthworm’s-Eye View)**। यह जगह मिट्टी जैसी गंदी जेली-ओ थी — पारदर्शी लेकिन धुंधली, क्लॉस्ट्रोफोबिक। कोई शरीर नहीं, कोई याद नहीं, कोई पहचान नहीं। सिर्फ गहरी लयबद्ध धड़कन (metal against metal), लाल-भूरा गंदा समुद्र, रक्त वाहिनी जैसी जड़ें, भयानक जानवरों के चेहरे और biological death की गंध। शुरू में आरामदायक लगा, लेकिन धीरे-धीरे घुटन बढ़ी। यह आदिम चेतना का स्तर था।

**पृथ्वी** पर परिवार ने **लंगर** (anchor) बनाया। बहन फिलिस रातभर उनका हाथ पकड़कर बैठीं और बोलीं, “We are not letting you go, Eben… You need an anchor.” दक्षिणी परिवार की परंपरा में प्यार ही सबसे बड़ा सहारा था।

अचानक अंधेरे में **घूमती हुई रोशनी (Spinning Melody)** प्रकट हुई — सफेद-स्वर्णिम, संगीतमय। यह **Gateway** का पोर्टल बन गई। एबेन ऊपर उड़े और एक हरे-भरे, अलौकिक ग्रामीण इलाके में पहुँच गए। पेड़, झरने, फूल, गाँव, गाते-नाचते लोग, बच्चे, कुत्ते — सब आनंद से भरे। रंग ultra-real, जीवंत। एक सुंदर लड़की (orb of light का रूप) — नीली आँखें, सोने-भूरे बाल — बटरफ्लाई के पंख पर उनके साथ उड़ी। लाखों तितलियाँ। शब्दों के बिना तीन संदेश मिले:  
1. You are loved and cherished, dearly, forever.  
2. You have nothing to fear.  
3. There is nothing you can do wrong.

**Gateway** से आगे **Core**। बड़े गुलाबी-सफेद बादल, गहरा नीला-काला आकाश। पारदर्शी गोले (angel-like beings) glorious chant गाते उड़ रहे थे। **Om** (ईश्वर) की उपस्थिति — inky-bright darkness। Orb interpreter थी। ज्ञान शब्दों के बिना आया: ब्रह्मांड में अनेक universes, Love ही केंद्र है, Evil बहुत कम, Free will ज़रूरी, हम cosmic womb में हैं।

**पृथ्वी** पर — डॉक्टरों को पता चला कि बैक्टीरिया KPC gene वाला हो सकता है। होली ने बताया कि एबेन कुछ महीने पहले इज़राइल गए थे। वैज्ञानिक पक्ष: बैक्टीरिया DNA swap कर सकता है।

**Core** में दूसरी यात्रा पर control मिला। Spinning Melody से ऊपर-नीचे जा सकते थे। मुख्य सबक: You are loved (तीन भागों में), Love ब्रह्मांड का basis है, Unconditional love सबसे बड़ा सत्य, Evil जरूरी लेकिन Love dominant, हम cosmic beings हैं।

इस बीच एबेन की adoption story सामने आई। वे 4 महीने के थे जब adopt हुए। 2000 में Eben IV ने खोज शुरू की। 2007-2008 में biological family (Ann, Richard, Kathy, David) से मिले। Ann ने बताया कैसे उन्होंने जन्म दिया, छोड़ा और 50 साल बाद मिले। 7 साल की डिप्रेशन (adoption rejection से) खत्म हुई। Betsy (biological sister) की 1998 में मृत्यु का दुख भी heal हुआ।

**समग्र NDE (5-12):** तीन स्तर — Underworld (अंधेरा), Gateway (सुंदर), Core (ईश्वर)। पृथ्वी (परिवार, adoption, Israel) और आध्यात्मिक यात्रा साथ चली। takeaway: हम Love से बने हैं। मस्तिष्क filter है, चेतना स्वतंत्र है।

### कोमा का अंतिम चरण और वापसी (अध्याय 13-24)
**Wednesday** को डॉक्टर सुधार की उम्मीद रखते थे, लेकिन कोई बदलाव नहीं। Bond ने पिता को देखा — शरीर था, आत्मा गायब। Eben IV और Bond ने सफेद कोशिकाओं की पेंटिंग बनाई — बैक्टीरिया से लड़ाई।

NDE **special** था क्योंकि bodily identity भूल गए थे — कोई attachment, guilt नहीं। इससे deeper realms का पूरा access मिला। Brain **reducing valve/filter** है, भूलना gift है। Higher worlds याद रहते तो पृथ्वी की चुनौतियाँ सहन मुश्किल होतीं।

Susan Reintjes ने telepathic contact किया — coma deep well जैसा, rope से tug मिला। “It’s not your time yet.”

**N of 1** — कोई precedent नहीं, mortality 90-100%। परिवार का तनाव बढ़ा। Bond ने “He’s not coming back” सुन लिया और रोया, लेकिन “You’re going to be okay, Daddy” कहता रहा।

**Friday** को antibiotics 4 दिन, कोई response नहीं। Sylvia ने hands/feet curl होते देखे। Phyllis घर गई — depression। Holley mantra दोहराती रही।

**Gateway** बंद। Clouds से नीचे उतरते praying beings दिखे — Michael Sullivan, Page। Confidence कि “Heaven will come with me.”

**Sunday** को Phyllis ने rainbow देखा। डॉक्टर Scott Wade ने antibiotics रोकने का फैसला किया। Bond ने eyelids खींचे और बोला। Suddenly एबेन की आँखें खुलीं! First words: “Thank you.” Phyllis rainbow याद करती आई — एबेन sitting up, smiling। “All is well.”

**Return** gradual थी। Bond को लगा same old dad आएगा, लेकिन delusions थे — skydiving, computer readout। Memory धीरे-धीरे लौटी। NDE ultra-real, पृथ्वी dream-like।

### रिकवरी, संदेश और अंतिम पुष्टि (अध्याय 25-35)
ICU psychosis में zombie-like लगे। धीरे-धीरे paranoia कम हुई। Outpatient rehab में NDE memories ultra-bold लौटीं। Doctors को बताया, लेकिन वे hallucinations मानते रहे।

घर वापसी पर Eben IV surprise आया। एबेन ने NDE लिखना शुरू किया — Eben IV की सलाह: observation first, interpretation later। 2-3 बजे उठकर fireplace पर हर detail लिखा।

**Ultra-real** — coma में brain off था, फिर भी hyper-real experience। ICU nightmares delusions थे, NDE असली।

NDE literature पढ़ी — ancient Greece से modern तक match। Raymond Moody की किताब पढ़ी। Medical records देखे — meningitis ने neocortex perfectly destroy किया था। एबेन का केस technically near-impeccable।

लोग उन्हें risen from the grave कहते। Susanna की पुरानी कहानी याद आई — अब समझे कि real थी।

**Three camps** — believers, unbelievers, middle group। एबेन middle group के लिए duty महसूस करते हैं। 9 neuroscientific hypotheses (Appendix B) खारिज किए — सब neocortex पर depend करते थे, जो off था।

चर्च गए — tears आए। “I didn’t just believe in God; I knew God.”

**Hard problem of consciousness** — brain consciousness produce नहीं करता। Quantum mechanics, interconnected universe। Consciousness basis of everything है।

**Final dilemma** — NDE में earthly identity याद नहीं थी, इसलिए deceased relatives नहीं मिले। Adoption wound फिर उभरा।

**The Photograph** — birth sister Kathy ने Betsy की photo भेजी। Betsy की smile heart छू गई। Poem “When Tomorrow Starts Without Me”। Betsy angel थी जो welcome कर रही थी। DNA connection। Gratitude सबसे बड़ा virtue। Family (earthly + spiritual) healing है।

**Eternea** — एबेन ने John Audette के साथ nonprofit शुरू किया, जो NDE रिसर्च, चेतना अध्ययन और दुनिया को बेहतर बनाने का काम करता है।

**Appendices** — डॉ. स्कॉट वेड का बयान: recovery miraculous। Appendix B: 9 hypotheses फेल।

**समग्र संदेश:** मृत्यु शरीर और मस्तिष्क का अंत नहीं। चेतना स्वतंत्र और अनंत है। Love ब्रह्मांड का मूल है। हम पृथ्वी पर सीखने और प्रेम करने आए हैं। विज्ञान और आध्यात्मिकता पूरक हैं। एबेन कहते हैं — यह सबसे महत्वपूर्ण कहानी है जो वे कभी बताएंगे। यह किताब आशा, प्रेम और अनंत जीवन का संदेश देती है। पढ़ने के बाद आपकी दुनिया हमेशा के लिए बदल जाएगी।

Tuesday, April 7, 2026

आत्माओं का संसार

यह खोरशेद भावनागरी की पुस्तक "द लॉज़ ऑफ़ द स्पिरिट वर्ल्ड" पर आधारित है, जो उनके दिवंगत बेटों द्वारा संचारित दिव्य संदेशों का संग्रह है। इसमें आत्मा जगत की रहस्यमयी संरचना और मृत्यु के पश्चात सात विभिन्न लोकों में होने वाली यात्रा का विस्तृत वर्णन किया गया है। लेखक बताती हैं कि पृथ्वी एक आध्यात्मिक प्रशिक्षण संस्थान है जहाँ मनुष्य अपने कर्मों के माध्यम से उन्नति या पतन प्राप्त करता है। यह पाठ पुनर्जन्म, सिल्वर कॉर्ड, और ईश्वरीय न्याय जैसे गूढ़ सिद्धांतों को समझाते हुए सही जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करता है। अंततः, यह जानकारी मनुष्य को मृत्यु के भय से मुक्त कर आध्यात्मिक शुद्धिकरण और निस्वार्थ सेवा के लिए प्रेरित करती है।

**आत्मा जगत (Spirit World)**

यह पुस्तक खोरशेद भावनागरी द्वारा लिखी गई है, जो उनके दिवंगत पुत्रों विस्पी (जन्म 9 अगस्त 1950) और रातू (जन्म 13 दिसंबर 1951) द्वारा ऑटोमैटिक राइटिंग (स्वचालित लेखन) और बाद में टेलीपैथी के माध्यम से डिक्टेट की गई है। पुस्तक का पूरा नाम "The Laws of Spirit World" है। यह 1980 में हुए एक ट्रेजिक कार एक्सीडेंट के बाद शुरू हुई, जिसमें दोनों भाई मारे गए थे। पुस्तक स्पिरिट वर्ल्ड (आत्मा लोक) के सच्चे नियमों (Real Laws of God), 7 रियल्म्स (planes), कर्म, पुनर्जन्म, स्वयं-विश्लेषण, ईश्वर की न्याय व्यवस्था और पृथ्वी पर सही जीवन जीने के तरीके को विस्तार से बताती है। यहाँ पर आत्मा जगत की रहस्यमयी संरचना और मृत्यु के बाद की अनंत यात्रा का विस्तृत वर्णन किया गया है जो की खुर्शीद भवनागरी की किताब द लॉ ऑफ़ स्पीरिट वर्ल्ड पर आधारित है  । इसमें सात अलग-अलग लोकों का उल्लेख है, जहाँ आत्मा अपने सांसारिक कर्मों के आधार पर स्वर्ग की ऊंचाइयों या नरक के अंधकार में स्थान पाती है। स्रोत सिल्वर कॉर्ड और पुनर्जन्म जैसे सिद्धांतों के माध्यम से यह समझाते हैं कि पृथ्वी एक प्रशिक्षण संस्थान है, जहाँ आत्माएं आध्यात्मिक शुद्धिकरण के लिए आती हैं। यहाँ मृत्यु को अंत नहीं बल्कि आत्मा की प्रगति का एक नया चरण माना गया है, जिसमें ईश्वरीय न्याय और व्यक्ति की अपनी स्वतंत्र इच्छा मुख्य भूमिका निभाते हैं।

खोरशेद और रुमी भावनागरी मुंबई के बायकुला में रहते थे। उनके दो बेटे विस्पी और रातू मोटरिंग के शौकीन थे। उन्होंने एक गैरेज चलाया और कई रैलियों में हिस्सा लिया। 1980 में वे 1,632 मील की क्रॉस-कंट्री मोटर रैली में हिस्सा लेने वाले थे। 23 फरवरी को शुरू होने वाली रैली से पहले 22 फरवरी 1980 की रात को वे खोपोली तक ट्रायल रन के लिए निकले। रातू ने मां को तीन बार गले लगाकर विदा ली (जो असामान्य था)। पिता रुमी को भी उन्होंने सावधानी से ड्राइव करने को कहा।

रात 8:30 बजे वे दो मैकेनिक्स और एक दोस्त के साथ निकले। अगली सुबह 8 बजे तक वापस न आने पर परिवार चिंतित हुआ। एक मैकेनिक ने बताया कि खोपोली के पास एक्सीडेंट हो गया है। रुमी दोस्तों के साथ पहुंचे तो कार एक पेड़ से टकराई हुई मिली। दोनों लड़के मौके पर ही मारे गए थे, बाकी लोग हल्की चोटों के साथ बच गए।

रुमी ने अस्पताल में खबर सुनी। घर लौटकर उन्होंने पत्नी खोरशेद को बताया। खोरशेद का भगवान पर विश्वास टूट गया। वे कहती हैं, “मैं बहुत धार्मिक थी, लेकिन अब पूछती हूं कि अगर भगवान है तो उसने मुझे यह सजा क्यों दी? मैंने कभी किसी का बाल भी नहीं बांका।” वे जीवन से थक चुकी थीं।

29वें दिन (अंतिम संस्कार के बाद) पड़ोसी मिसेज दस्तूर ने एक चमत्कारिक कहानी सुनाई। उनकी साली ने एक कॉन्सर्ट में एक महिला से सुना कि दो लड़के हाल ही में एक्सीडेंट में मरे हैं और अपने माता-पिता को मैसेज भेजना चाहते हैं। अगले दिन खोरशेद-रुमी उस महिला के घर गए। महिला ने बताया कि वह अपनी मीडियम मिसेज कपाड़िया के माध्यम से अपने भाई से संपर्क करती है। एक सांस में दो लड़कों की आवाज आई जो कह रहे थे कि वे एक्सीडेंट में मरे हैं, उनके माता-पिता दुखी हैं, लेकिन वे स्पिरिट वर्ल्ड में खुश हैं और माता-पिता को देख सकते हैं।

22 मार्च 1980 को खोरशेद-रुमी ने मिसेज कपाड़िया के घर ग्रुप सांस अटेंड की। मीडियम ने विस्पी की पहली बात कही – “Hello Mummy, fatso” (विस्पी मां को इसी नाम से पुकारता था)। यह व्यक्तिगत डिटेल सुनकर माता-पिता को यकीन हो गया कि यह उनके बेटे ही हैं। इससे उनका भगवान पर विश्वास वापस लौटा।

बाद में उन्होंने अकेले बात करने के लिए दूसरी मीडियम मिसेज ऋषि के पास गए। बेटों ने बताया कि वे मरते ही स्पिरिट वर्ल्ड पहुंच गए। “यह भगवान की इच्छा है। हम यहां बहुत खुश हैं। तुम हमें देख सकते हो, हम तुम्हारी देखभाल कर रहे हैं।” उन्होंने मां को बताया कि उन्हें पृथ्वी पर रहकर आध्यात्मिक मिशन पूरा करना है – लोगों की मदद करना और आध्यात्मिक जागरूकता फैलाना।

कुछ महीनों की प्रैक्टिस के बाद ऑटोमैटिक राइटिंग शुरू हुई। खोरशेद कलम को हल्का पकड़कर किताब पर रखतीं, एकाग्र होतीं और बेटों की आत्माएं उनके हाथ से लिखवातीं। शुरू में सिर्फ खरोंचें आतीं, बाद में पूरे वाक्य।

बेटों ने परिवार की एक कानूनी समस्या में सही वकील चुना (टेलीपैथी से), और केस जीत गया। फिर उन्होंने मां-बाप को स्पिरिट वर्ल्ड के नियमों की किताब डिक्टेट करने की अनुमति मांगी (उच्च आत्माओं से विशेष अनुमति लेकर)। किताब का उद्देश्य – पृथ्वीवासियों को सच्चे ईश्वरीय नियम बताना ताकि वे आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ सकें। लेकिन उन्होंने साफ कहा कि उनके उपदेश किसी पर जबरदस्ती नहीं थोपे जाएंगे।

**परिचय**  

कल्पना कीजिए, एक ऐसा विशाल और रहस्यमयी संसार जो हमारी आँखों से छिपा हुआ है, लेकिन हर रात हमारी आत्मा उसमें विचरण करती है। एक ऐसा जगत जहाँ कोई मृत्यु नहीं, केवल यात्रा है — सात लोकों की यात्रा, जहाँ हर आत्मा अपने कर्मों के अनुसार ऊपर उठती है या नीचे गिरती है। यहाँ प्रकाश और अंधकार, प्रेम और कष्ट, प्रगति और पुनर्जन्म का अनंत खेल चलता रहता है। क्या आप जानते हैं कि आपकी आत्मा आज कहाँ है? और मृत्यु के बाद क्या होगा? यह ज्ञान न केवल आपके मन को शांति देगा, बल्कि जीवन जीने का नया नजरिया भी प्रदान करेगा। आइए, इस रहस्यमयी आत्मा जगत की गहराई में उतरें और जानें कि हमारी आत्मा की अनंत यात्रा कैसे चलती है।

**निचले लोक (नरक: लोक 1, 2 और 3)**  

ये क्षेत्र उन आत्माओं के लिए हैं जिन्होंने पृथ्वी पर बुरे कर्म किए हैं। यहाँ की स्थिति अत्यंत कष्टदायक है।  

- **लोक 1 (सबसे निचला):** यह सबसे अंधकारमय और पृथ्वी के सबसे करीब है। यहाँ केवल नग्न चट्टानें और रेंगने वाले जीव हैं। आत्माओं के शरीर विकृत और भारी होते हैं, और वे घोर अंधकार में रहते हैं।  

- **लोक 2:** यह भी भयानक है लेकिन लोक 1 जितना अंधेरा नहीं है। यहाँ आत्माएँ चट्टानी गुफाओं में रहती हैं, एक-दूसरे से नफरत करती हैं और गंदी भाषा का प्रयोग करती हैं।  

- **लोक 3:** यहाँ वातावरण बहुत भारी और धुंध भरा होता है। शरीर लोक 1 और 2 की तुलना में हल्के होते हैं लेकिन दिखने में बूढ़े और अपूर्ण होते हैं। यहाँ की आत्माएँ नए आने वालों को अपना गुलाम बनाने की कोशिश करती हैं।

**मध्य लोक (लोक 4)**  

**लोक 4:** इसे “इन-बिटवीन” (In-between) लोक कहा जाता है, जो न तो पूरी तरह स्वर्ग है और न ही नरक। एक मानवीय आत्मा अपनी यात्रा यहीं (चरण 5 पर) शुरू करती है। यहाँ से आत्मा के पास ऊपर जाने या नीचे गिरने का विकल्प होता है। यह लोक काफी हद तक पृथ्वी जैसा ही महसूस होता है। यहाँ आत्माएँ कभी सुखी तो कभी दुखी हो सकती हैं और उनमें थोड़ी ईर्ष्या भी हो सकती है।

**उच्च लोक (स्वर्ग: लोक 5, 6 और 7)**  

जैसे-जैसे आत्मा ऊपर की ओर बढ़ती है, सुंदरता और प्रकाश बढ़ता जाता है।  

- **लोक 5:** यह स्वर्ग की शुरुआत है और पृथ्वी के किसी सुंदर स्थान जैसा दिखता है। यहाँ आकाश में हमेशा हल्की चमक रहती है और आत्माएँ एक-दूसरे की मदद करती हैं।  

- **लोक 6:** यह अत्यंत सुंदर है, जहाँ चमकीली हरी घास और ऐसे रंगों के फूल हैं जो पृथ्वी पर नहीं देखे जा सकते। यहाँ हमेशा धूप जैसा उजाला रहता है। आत्माएँ प्रेम और सद्भाव में रहती हैं और वह काम करती हैं जिसे वे पसंद करती हैं।  

- **लोक 7 (सबसे ऊँचा):** यह लोक मानवीय कल्पना से परे सुंदर है। यहाँ की आत्माओं के शरीर सबसे अधिक चमकदार, पूर्ण और युवा होते हैं और वे बादलों की तरह हल्के होते हैं। लोक 7 के चरण 9 तक पहुँचने के बाद, आत्मा को पृथ्वी पर दोबारा जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती।

**लोकों के बीच आवाजाही के नियम**  

- **दृश्यता:** एक आत्मा केवल अपने लोक और अपने से नीचे के लोकों को देख सकती है। ऊपर के लोक उसके लिए अदृश्य होते हैं।  

- **उच्च लोक की यात्रा:** किसी उच्च लोक में जाने के लिए विशेष अनुमति और आवश्यकताओं की आवश्यकता होती है:  

  1. उच्च लोक से किसी का आमंत्रण।  

  2. उस लोक के ‘हाई गुड सोल’ (High Good Soul) की अनुमति।  

  3. विशेष प्रशिक्षण और एक सुरक्षात्मक लबादा (Protective Cloak) पहनना, ताकि वहाँ की तीव्र रोशनी और कंपन को सहन किया जा सके।  

  कोई भी आत्मा अपने से केवल एक स्तर ऊपर के लोक में ही जा सकती है (जैसे लोक 5 से 6 तक)।  

- **निचले लोक की यात्रा:** उच्च लोकों की आत्माएँ निचले लोकों (1, 2, और 3) में रहने वाली आत्माओं का मार्गदर्शन करने या उन्हें सुधारने के लिए वहाँ जा सकती हैं। निचले लोकों की नकारात्मक ऊर्जा और बुरी आत्माओं से बचने के लिए वे अक्सर एक ऐसा लबादा पहनती हैं जो उन्हें अदृश्य बना देता है।  

- **न्याय का आधार:** कोई भी आत्मा अपनी योग्यता (कर्म) से ऊपर नहीं जा सकती। यह निर्णय व्यक्ति का अपना अवचेतन मन (Subconscious Mind) करता है, जो उसके हर अच्छे और बुरे काम का रिकॉर्ड रखता है।

**स्थायी आध्यात्मिक प्रगति और अस्थायी यात्रा**  

एक आत्मा निश्चित रूप से एक लोक (Realm) से दूसरे लोक में जा सकती है, लेकिन इसके लिए कुछ विशेष नियम और स्थितियाँ होती हैं। आत्माओं की आवाजाही को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:  

1. **स्थायी आध्यात्मिक प्रगति (ऊपर या नीचे जाना):**  

   शुरुआत: हर मानवीय आत्मा अपनी यात्रा लोक 4 (Realm 4), चरण 5 से शुरू करती है। यहाँ से उसके कर्मों के आधार पर वह ऊपर के लोकों में जा सकती है या नीचे के लोकों में गिर सकती है।  

   प्रगति का आधार: आत्मा की प्रगति उसके अवचेतन मन द्वारा निर्धारित होती है, जो ‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’ (कर्म के नियम) पर आधारित है।  

   सुधार और प्रायश्चित: यदि कोई आत्मा निचले लोक (नरक) में है, तो वह सच्चे और हृदय से किए गए प्रायश्चित और सुधार की तीव्र इच्छा के माध्यम से ऊँचे लोकों की ओर बढ़ सकती है। हालांकि, निचले लोकों से ऊपर उठना कठिन होता है क्योंकि वहाँ अन्य बुरी आत्माएँ सुधार में बाधा डालती हैं।  


2. **अस्थायी यात्रा (मुलाकात के लिए जाना):**  

   एक आत्मा सामान्यतः केवल अपने लोक और अपने से नीचे के लोकों को ही देख सकती है। उच्च लोकों की यात्रा के लिए विशेष नियम हैं। लोक 5 के बाद ही कोई आत्मा अपने से उच्च लोक की यात्रा कर सकती है। इसके लिए उच्च लोक से आमंत्रण और वहाँ के ‘हाई गुड सोल’ (High Good Soul) की अनुमति अनिवार्य है। आत्मा को विशेष प्रशिक्षण लेना पड़ता है और एक सुरक्षात्मक लबादा (Protective Cloak) पहनना पड़ता है ताकि वह उच्च लोक के तीव्र प्रकाश और कंपन (Vibrations) को सहन कर सके।

**पुनर्जन्म और आत्मा की प्रगति**  

आत्मा की प्रगति केवल पृथ्वी पर ही संभव नहीं है, बल्कि यह आत्मा जगत (Spirit World) में भी हो सकती है, लेकिन इन दोनों स्थानों पर प्रगति की गति में बहुत बड़ा अंतर है।  

- **आत्मा जगत में धीमी प्रगति:** उच्च लोकों (Higher Realms) की आत्माओं के पास यह विकल्प होता है कि वे पृथ्वी पर दोबारा जन्म न लें और आत्मा जगत में ही अपनी प्रगति जारी रखें। हालांकि, वहाँ प्रगति की यह प्रक्रिया अत्यंत धीमी (Extremely slow) होती है और अपने लक्ष्य तक पहुँचने में हजारों वर्ष या युग लग सकते हैं।  

- **पृथ्वी: एक प्रशिक्षण संस्थान:** पृथ्वी को एक ‘प्रशिक्षण संस्थान’ (Training Institute) माना गया है जहाँ आत्माएँ तेजी से परिणाम (Quicker results) प्राप्त करने के लिए आती हैं। जो प्रगति आत्मा जगत में हजारों वर्षों में होती है, उसे पृथ्वी पर कुछ ही जन्मों (सैकड़ों वर्षों) में पूरा किया जा सकता है।  

- **पुनर्जन्म का उद्देश्य:** आत्माएँ मुख्य रूप से तीन कारणों से पृथ्वी पर जन्म लेती हैं: अनुभव प्राप्त करने के लिए, अपने पिछले कर्मों का भुगतान (Pay off karma) करने के लिए और अपने आध्यात्मिक मिशन को पूरा करने के लिए।  

- **स्मृति का अवरुद्ध होना:** पृथ्वी पर आत्मा की प्रगति इसलिए तेज होती है क्योंकि यहाँ पिछले जन्मों और आत्मा जगत की यादें मिटा दी जाती हैं। इससे आत्मा की चुनौतियाँ और उसके चुनाव ‘प्रोग्राम्ड’ नहीं होते, बल्कि स्वाभाविक होते हैं, जो आत्मा की शुद्धि में अधिक सहायक होते हैं।  

- **पुनर्जन्म का अंत:** आध्यात्मिक यात्रा तब तक चलती रहती है जब तक आत्मा पूरी तरह शुद्ध होकर ईश्वर तक न पहुँच जाए। हालांकि, लोक 7 के चरण 9 (Realm 7 Stage 9) पर पहुँचने के बाद आत्मा के लिए पृथ्वी पर पुनर्जन्म लेना आवश्यक नहीं रह जाता।  

- **पुनर्जन्म अनिवार्य नहीं:** आत्मा की प्रगति के लिए पुनर्जन्म लेना पूरी तरह से अनिवार्य नहीं है, लेकिन आध्यात्मिक उन्नति की गति को तीव्र करने के लिए यह सबसे पसंदीदा मार्ग है।  

- **एक ही जन्म में कई लोकों की प्रगति (या गिरावट):** पृथ्वी को एक ‘प्रशिक्षण संस्थान’ (Training Institute) माना गया है जहाँ आत्माएं बहुत कम समय में अपनी आध्यात्मिक स्थिति में बड़ा बदलाव ला सकती हैं। पृथ्वी पर आप कुछ ही मिनटों में अपनी बुरी प्रवृत्तियों को छोड़कर अच्छाई की ओर मुड़ सकते हैं और आत्मा जगत की तुलना में यहाँ प्रगति बहुत तेजी से होती है। जहाँ एक ओर प्रगति संभव है, वहीं स्रोतों में चेतावनी दी गई है कि जो आत्माएँ लोक 5 या उससे नीचे के स्तर से जन्म लेती हैं, वे अपने कर्मों के कारण केवल एक ही जीवनकाल में सीधे लोक 1 (सबसे निचले स्तर) तक गिर सकती हैं। हालांकि, लोक 6 या 7 से आने वाली उच्च आत्माएं एक जन्म में लोक 4 या 5 से नीचे नहीं गिरतीं। प्रगति की गति व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर: यदि किसी आत्मा की सुधार करने की इच्छा निश्चित और वास्तविक (Definite and genuine) है, तो वह बहुत कम समय में तेजी से प्रगति कर सकती है।  

**सिल्वर कॉर्ड (Silver Cord)**  

सिल्वर कॉर्ड (Silver Cord) एक चुंबकीय तार (magnetic cord) है जो मनुष्य की आत्मा को उसके भौतिक शरीर से जोड़कर रखता है।  

- **इसका कार्य:** जब पृथ्वी पर कोई व्यक्ति गहरी और बिना सपनों वाली नींद (deep and dreamless sleep) में होता है, तब उसकी आत्मा अस्थायी रूप से भौतिक शरीर को छोड़कर आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर जाती है। इस यात्रा के दौरान, सिल्वर कॉर्ड ही वह एकमात्र कड़ी होती है जो आत्मा को शरीर से जोड़े रखती है। यदि नींद के दौरान किसी व्यक्ति को अचानक जगा दिया जाए, तो यह सिल्वर कॉर्ड ही आत्मा को तुरंत वापस शरीर में ले आता है। आत्मा इस दौरान अपने उन मृत प्रियजनों से मिलने जाती है जो उससे प्रेम करते हैं। स्रोतों में स्पष्ट किया गया है कि यह मिलन केवल तभी संभव है जब प्रेम पारस्परिक (mutual) हो; यदि प्रेम केवल एकतरफा है, तो आत्माएं नहीं मिल पातीं। हालांकि लोग हर दिन अपने प्रियजनों से इस माध्यम से मिलते हैं, लेकिन जागने पर उनके भौतिक मन (physical mind) को इन मुलाकातों की कोई याद नहीं रहती।  

- **सिल्वर कॉर्ड के टूटने पर क्या होता है:** यदि यह तार या कड़ी टूट जाती है, तो इसका परिणाम निम्नलिखित होता है:  

  - शरीर से स्थायी विच्छेद (Death): जब तक यह तार जुड़ा रहता है, आत्मा नींद के दौरान शरीर से बाहर जाने के बाद भी वापस लौट सकती है। इसका टूटना इस बात का संकेत है कि आत्मा अब अपने भौतिक शरीर में वापस नहीं लौट सकती, जिसे पृथ्वी पर मृत्यु कहा जाता है।  

  - आत्मा जगत में स्थायी प्रवेश: जब यह संपर्क टूट जाता है, तो आत्मा अपने “प्रकाशमय आध्यात्मिक शरीर” (light spiritual body) में आ जाती है और उसे भौतिक शरीर की बीमारियों, दर्द या विकृतियों से मुक्ति मिल जाती है। इसके बाद आत्मा अपने वास्तविक घर, यानी आत्मा जगत (Spirit World) में चली जाती है।  

  - वापसी का मार्ग बंद होना: नींद के दौरान, यदि कोई व्यक्ति अचानक जाग जाता है, तो यही सिल्वर कॉर्ड आत्मा को तुरंत शरीर में वापस ले आता है। लेकिन एक बार यह कड़ी टूट जाने पर, आत्मा चाहकर भी दोबारा भौतिक शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती, भले ही वह अपने प्रियजनों के दुख को देखकर वापस आने की कितनी भी कोशिश क्यों न करे।  

  - तीव्र गति से प्रस्थान: विच्छेद के बाद आत्मा को ऊपर बुलाया जाता है और वह अत्यंत तीव्र गति से अपने गंतव्य की ओर बढ़ती है।  

  - प्रियजनों द्वारा स्वागत: यदि आत्मा उच्च लोकों की ओर जा रही है, तो उसके पहले से मृत मित्र और संबंधी उसका स्वागत करने के लिए आते हैं। हालांकि, निचले लोकों (नरक) में जाने वाली आत्माओं का स्वागत करने के लिए कोई अच्छी आत्मा नहीं आती, बल्कि वहाँ बुरी आत्माएं उन्हें ले जाने के लिए तैयार रहती हैं।  

  - लोक का निर्धारण: मृत्यु के बाद आत्मा का अवचेतन मन (Subconscious mind) उसे स्वचालित रूप से उस लोक (Realm) में ले जाता है जिसका वह पात्र होती है। यह निर्णय पूरी तरह से आत्मा के पृथ्वी पर किए गए कर्मों और उसके वास्तविक स्वभाव पर आधारित होता है।

**मृत्यु के बाद की प्रक्रिया**  

**हॉल ऑफ रेस्ट (The Hall of Rest):**  

मृत्यु के बाद ‘हॉल ऑफ रेस्ट’ (The Hall of Rest) एक ऐसा विशाल स्थान है जहाँ उन आत्माओं को ले जाया जाता है जो सदमे (shock) या अत्यधिक दुख की स्थिति में होती हैं। इस हॉल में होने वाली मुख्य प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं:  

- गहरी नींद और विश्राम: सदमे से गुजर रही आत्माओं को कोमल, पंखों के समान या बादलों जैसे बिस्तरों (couches) पर लेटने के लिए कहा जाता है, जहाँ वे गहरी नींद में सो जाती हैं।  

- आध्यात्मिक उपचार (Healing): वहाँ विश्राम कर रही आत्माओं को विशेष किरणें (rays) दी जाती हैं।  

- स्वस्थ होकर बाहर आना: आत्माएँ तब तक वहाँ रहती हैं जब तक वे शांत नहीं हो जातीं। ‘हॉल ऑफ रेस्ट’ से बाहर आने के बाद ही वे अपने उन प्रियजनों और मित्रों से मिल पाती हैं जो आत्मा जगत में पहले से मौजूद होते हैं और उनके बाहर आने का इंतज़ार कर रहे होते हैं। यह स्थान मुख्य रूप से आत्मा को पृथ्वी पर हुई उसकी मृत्यु के मानसिक आघात से उबरने और आत्मा जगत के जीवन के लिए तैयार करने का कार्य करता है।  

**हॉल ऑफ रेस्ट से बाहर निकलने के बाद:**  

आत्मा सबसे पहले अपने उन मित्रों और रिश्तेदारों से मिलती है जो आत्मा जगत में पहले से मौजूद होते हैं और वहाँ उसका इंतज़ार कर रहे होते हैं। उदाहरण के लिए, विस्पी और राटू जब इस हॉल से बाहर आए, तो उन्होंने अपने दादा (पप्पा), दोस्तों और रिश्तेदारों को अपना स्वागत करने के लिए बाहर खड़ा पाया।  

इस शुरुआती मिलन के बाद, आत्मा की अगली यात्रा निम्नलिखित रूप में आगे बढ़ती है:  

- **लोक (Realm) का निर्धारण:** आत्मा का अपना अवचेतन मन (Subconscious Mind) उसे स्वचालित रूप से उस लोक या स्तर में ले जाता है जिसका वह पात्र होती है। यह गंतव्य पूरी तरह से व्यक्ति के पृथ्वी पर किए गए कर्मों और उसके वास्तविक स्वभाव (मंशा) पर आधारित होता है।  

- **स्वर्ग या नरक में प्रवेश:** यदि आत्मा शुद्ध और परोपकारी रही है, तो वह उच्च लोकों (5, 6, या 7) में जाती है, जहाँ वह अत्यंत सुंदरता, प्रेम और सद्भाव के बीच रहती है। यदि आत्मा दुष्ट, स्वार्थी या हिंसक रही है, तो वह निचले लोकों (1, 2, या 3) में चली जाती है, जो अंधकारमय और कष्टकारी स्थान हैं।  

- **आत्मा जगत में जीवन:** एक बार अपने निर्धारित लोक में पहुँचने के बाद, आत्माएँ ‘शाश्वत शांति’ (eternal peace) में सोती नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी की तुलना में अधिक जीवित और सक्रिय हो जाती हैं। वे अपनी इच्छा के अनुसार काम करने, अध्ययन करने, प्रार्थना करने या दोस्तों से मिलने के लिए स्वतंत्र होती हैं।  

- **मार्गदर्शन का कार्य:** उच्च लोकों की कई आत्माएं पृथ्वी पर अपने प्रियजनों का मार्गदर्शन करने और उन्हें आध्यात्मिक रूप से गिरने से बचाने का कार्य भी करती हैं। वे ‘प्रोजेक्टेड थॉट्स’ (projected thoughts) के माध्यम से मनुष्य के मन में अच्छे विचार डालने का प्रयास करती हैं।  

- **आध्यात्मिक प्रगति:** आत्मा का अंतिम लक्ष्य लोक 7 के चरण 9 तक पहुँचना और ईश्वर के साथ एकाकार होना है। इसलिए, अपने लोक में पहुँचने के बाद भी आत्मा निरंतर सीखने और खुद को और अधिक शुद्ध करने का प्रयास जारी रखती है।

**पुनर्जन्म का चुनाव**  

आत्मा जगत में आत्माओं को यह चुनने की स्वतंत्रता होती है कि वे पुनर्जन्म कहाँ और किसके यहाँ लेंगी। पुनर्जन्म के चुनाव से जुड़ी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:  

- **माता का चुनाव:** आत्माएँ हमेशा अपनी माँ का चुनाव स्वयं करती हैं। कोई भी शक्ति किसी आत्मा को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी विशेष माँ के पास जन्म लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।  

- **पिता का चुनाव:** पिता का चुनाव अक्सर स्वचालित रूप से होता है क्योंकि कई बार आत्मा को यह पता नहीं होता कि उसकी चुनी हुई माँ किससे शादी करेगी। हालांकि, कुछ स्थितियों में आत्माएँ अपने पिता को भी चुन सकती हैं।  

- **चुनाव का आधार (प्रेम या अनुभव):** ज्यादातर आत्माएँ ऐसी माँ को चुनती हैं जो उन्हें प्यार करे और उनकी देखभाल करे। लेकिन कभी-कभी, तेजी से आध्यात्मिक उन्नति करने, अपने कर्मों का भुगतान करने या कठिन अनुभव प्राप्त करने के लिए, आत्माएँ जानबूझकर किसी बुरी या दुष्ट आत्मा को अपनी माँ के रूप में चुनती हैं। ऐसी स्थितियों में आत्मा एक बड़ा जोखिम उठाती है क्योंकि बुरी माँ का प्रभाव उसे और अधिक नीचे गिरा सकता है।  

- **पुनर्जन्म न लेने का विकल्प:** उच्च लोकों की आत्माएं यह विकल्प भी चुन सकती हैं कि वे पृथ्वी पर दोबारा जन्म ही न लें और आत्मा जगत में ही अपनी आध्यात्मिक प्रगति जारी रखें, हालांकि वहाँ प्रगति की यह प्रक्रिया अत्यंत धीमी होती है।  

- **उद्देश्य के आधार पर चुनाव:** आत्माएं पुनर्जन्म का निर्णय और समय अपनी आध्यात्मिक आवश्यकताओं के अनुसार लेती हैं, जैसे अनुभव प्राप्त करना, पिछले कर्मों का भुगतान करना (Karma) या अपने आध्यात्मिक मिशन को पूरा करना।  

- **स्वतंत्र इच्छा (Free Will):** आत्मा जगत में आत्माओं को वह करने की पूरी आजादी होती है जो वे करना चाहती हैं। विस्पी और राटू ने भी अपनी माँ का चुनाव स्वयं किया था क्योंकि वे उनसे सबसे अधिक प्रेम करते थे।

**मृत्यु का समय**  

मनुष्य अपनी मृत्यु का सटीक समय स्वयं नहीं चुन सकता है, क्योंकि यह अंततः ईश्वर की इच्छा और व्यक्ति के कर्मों पर निर्भर करता है।  

- **ईश्वर का निर्णय:** स्रोतों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि केवल ईश्वर को ही यह तय करना चाहिए कि आपको आत्मा जगत में कब वापस आना है। मृत्यु का समय मनुष्य द्वारा निर्धारित नहीं किया जाना चाहिए।  

- **स्वतंत्र इच्छा और अनिश्चित भविष्य:** आत्मा जगत में भी भविष्य की हर घटना का सटीक ज्ञान नहीं होता है क्योंकि यह मनुष्य की ‘स्वतंत्र इच्छा’ (free will) और उसके द्वारा किए गए चुनावों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, किसी आत्मा को यह बताया जा सकता है कि उसकी आयु 90 वर्ष होगी, लेकिन वह अगले ही दिन किसी दुर्घटना या हत्या का शिकार हो सकती है।  

- **आत्महत्या एक पाप है:** अपनी मृत्यु का समय स्वयं तय करने के उद्देश्य से की गई आत्महत्या को एक बड़ा पाप माना गया है। यह ईश्वर की योजना के विरुद्ध जाना है और इससे आत्मा को स्थायी नुकसान पहुँचता है, जिससे वह निचले लोकों में गिर सकती है।  

- **अवचेतन मन की प्रार्थना:** कभी-कभी अच्छी आत्माएं, जो पृथ्वी पर व्याप्त बुराई और नकारात्मकता को सहन नहीं कर पातीं, उनका अवचेतन मन (Subconscious mind) अनजाने में ईश्वर से उन्हें वापस बुलाने की प्रार्थना करता है। यही कारण है कि कई बार अच्छी आत्माएं कम उम्र में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती हैं, जिन्हें “ईश्वर का प्रिय” कहा जाता है।  

- **समय से पूर्व कुछ नहीं होता:** स्रोतों के अनुसार, “कोई भी चीज़ अपने समय से पहले नहीं होती”। व्यक्ति को अपना निर्धारित कार्य और प्रशिक्षण पृथ्वी पर पूरा करना चाहिए। यदि कोई समय से पहले भागने की कोशिश करता है या अपना काम अधूरा छोड़ता है, तो उसे उसी उद्देश्य के लिए दोबारा जन्म लेना पड़ सकता है।  

- **सलाह:** व्यक्ति को सलाह दी गई है कि वह मृत्यु के डर से बचने के लिए एक सरल, ईमानदार और निस्वार्थ जीवन जिए।

**उच्च लोकों (लोक 6 और 7) की आत्माओं की सुरक्षा**  

लोक 6 और 7 की उच्च आत्माओं के नीचे (विशेषकर निचले लोकों या नरक में) न गिरने के पीछे कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक कारण और सुरक्षा तंत्र हैं:  

- **जागरूक अवचेतन मन (Alert Subconscious Mind):** लोक 6 और 7 में जन्मी आत्माओं का अवचेतन मन (जिसे अंतरात्मा भी कहा जाता है) पृथ्वी पर भी अत्यंत जागरूक और सक्रिय रहता है। यह मन उन्हें पृथ्वी पर ऐसे गंभीर पाप करने से रोकता है जो उन्हें लोक 4 से नीचे ले जा सकें।  

- **ईश्वर का हस्तक्षेप और वापसी:** यदि ये उच्च आत्माएं पृथ्वी पर अपनी सीमाओं से परे जाने लगती हैं या गलतियाँ करने लगती हैं, तो उनका अवचेतन मन उन्हें और अधिक गिरने से बचाने के लिए ईश्वर से उन्हें तुरंत वापस आत्मा जगत (घर) बुलाने की प्रार्थना करता है। इस कारण वे और अधिक पाप करने से पहले ही शरीर त्याग देती हैं।  

- **गिरावट की निश्चित सीमाएं:** स्रोतों में स्पष्ट किया गया है कि इन आत्माओं के लिए गिरावट की एक निश्चित सीमा तय है। लोक 6 से आई आत्मा पृथ्वी पर पाप करने पर अधिकतम लोक 4 तक ही गिर सकती है, जबकि लोक 7 की आत्मा अधिकतम लोक 5 तक ही गिर सकती है। वे कभी भी लोक 1, 2 या 3 जैसे अंधकारमय लोकों में नहीं गिरतीं।  

- **नकारात्मक भावनाओं का अभाव:** उच्च लोकों (5, 6 और 7) में आत्माएं ईर्ष्या, नफरत और प्रतिशोध जैसी उन नकारात्मक भावनाओं से मुक्त होती हैं जो आत्मा के पतन का मुख्य कारण बनती हैं। वहाँ वे पूर्ण सद्भाव और प्रेम में रहती हैं, जिससे उनके पतन की कोई संभावना नहीं रहती।  

- **आत्मा जगत में सुरक्षित प्रगति:** स्रोतों के अनुसार, एक बार जब आत्मा इन उच्च लोकों में पहुँच जाती है, तो आत्मा जगत में उसकी प्रगति धीमी जरूर हो सकती है, लेकिन यह गारंटीकृत (Guaranteed) है कि वे वहाँ से नीचे नहीं गिर सकते। गिरावट का जोखिम मुख्य रूप से पृथ्वी पर पुनर्जन्म लेने के दौरान ही होता है।

**उपसंहार**  

आत्मा जगत की यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि हमारा यह पृथ्वी का जीवन मात्र एक अस्थायी प्रशिक्षण है। हर कर्म, हर विचार और हर चुनाव हमारी आत्मा को सात लोकों में ऊपर या नीचे ले जाता है। सिल्वर कॉर्ड हमें शरीर से जोड़ता है, हॉल ऑफ रेस्ट हमें शांति देता है और पुनर्जन्म हमें तेज़ प्रगति का अवसर प्रदान करता है। अंत में, चाहे हम निचले लोक में हों या उच्च लोक में, हमारी आत्मा का लक्ष्य एक ही है — पूर्ण शुद्धि और ईश्वर में विलीन होना।  

इस ज्ञान को अपनाकर आज से ही अपने कर्मों को शुद्ध करें, प्रेम बढ़ाएं और निस्वार्थ जीवन जिएँ। क्योंकि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। आपकी आत्मा की यात्रा आपके हाथ में है — आज ही सही दिशा चुन लें।

लक्ष्मण रेखा

 आम बोल चाल की भाषा में जब वाद विवाद के दौरान कोई अपनी मर्यादा को लांघने लगता है, अपनी हदें पार करने लगता है तब प्रायः उसे लक्ष्मण रेखा नहीं पार करने की चेतावनी दी जाती है।

आखिर ये लक्ष्मण रेखा है क्या जिसके बारे में बार बार चर्चा की जाती है? आम बोल चाल की भाषा में जिस लक्ष्मण रेखा का इस्तेमाल बड़े धड़ल्ले से किया जाता है, आखिर में उसकी सच्चाई क्या है? इस कहानी की उत्पत्ति कहां से होती है? ये कहानी सच है भी या नहीं, आइए देखते हैं?

किदवंती के अनुसार जब प्रभु श्रीराम अपनी माता कैकयी की इक्छानुसार अपनी पत्नी सीता और अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वनवास को गए तब रावण की बहन सुर्पनखा श्रीराम जी पर कामासक्त हो उनसे प्रणय निवेदन करने लगी।

जब श्रीराम जी ने उसका प्रणय निवेदन ये कहकर ठुकरा दिया कि वो अपनी पत्नी सीताजी के साथ रहते है तब वो लक्ष्मण जी के पास प्रणय निवेदन लेकर जा पहुंची। जब लक्ष्मण जी ने भी उसका प्रणय निवेदन ठुकरा दिया तब क्रुद्ध हो सुर्पनखा ने सीताजी को मारने का प्रयास किया । सीताजी की जान बचाने के लिए मजबूरन लक्ष्मण को सूर्पनखा के नाक काटने पड़े।

लक्ष्मण जी द्वारा घायल लिए जाने के बाद सूर्पनखा सर्वप्रथम राक्षस खर के पास पहुँचती है और अपने साथ हुई सारी घटनाओं का वर्णन करती है ।

सूर्पनखा के साथ हुए दुर्व्यवहार को जानने के बाद राक्षस खर अपने भाई दूषण के साथ मिलकर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण जी पर आक्रमण कर देता है ।

लेकिन सूर्पनखा की आशा के विपरीत राक्षस खर अपने भाई दूषण के साथ श्रीराम और लक्ष्मण जी के साथ युद्ध करते हुए मारा जाता है । अब सूर्पनखा के पास और कोई चारा नहीं बचता है सिवाए इसके कि वो अपने भाई रावण से सहायता मांगे ।

इसके बाद घायल सुर्पनखा रावण के पहुंच कर प्रतिशोध लेने को कहती है। रावण अपने मामा मरीच के साथ षडयंत्र रचता है। रावण का मामा मारीच सोने के मृग का वेश बनाकर वन में रह रहे श्रीराम , सीताजी और लक्ष्मण जी के पास पहुंचता है।

सीताजी उस सोने के जैसे दिखने वाले मृग पर मोहित हो श्रीराम जी से उसे पकड़ने को कहती है। सीताजी के जिद करने पर श्रीराम उस सोने के बने मारीच का पीछा करते करते जंगल में बहुत दूर निकल जाते हैं।

जब श्रीराम उस सोने के मृग बने रावण के मामा मारीच को वाण मारते हैं तो मरने से पहले मारीच जोर जोर से हे लक्ष्मण और हे सीते चिल्लाता हैं। ये आवाज सुनकर सीता लक्ष्मण जी को श्रीराम जी की सहायता हेतु जाने को कहती है।

लक्ष्मण जी शुरुआत में तो जाने को तैयार नहीं होते हैं, परंतु सीताजी के बार बार जिद करने पर वो जाने को मजबूर हो जाते हैं। लेकिन जाने से पहले वो कुटिया के चारो तरफ अपने मंत्र सिद्ध वाण से एक रेखा खींच देते हैं।

वो सीताजी को ये भी कहते हैं कि श्रीराम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में ये रेखा उनकी रक्षा करेगा। अगर वो उस रेखा से बाहर नहीं निकलती हैं तो वो बिल्कुल सुरक्षित रहेगी।

जब लक्ष्मण जी बाहर चले जाते हैं तो योजनानुसार रावण सीताजी के पास सन्यासी का वेश बनाकर भिक्षा मांगने पहुंचता है। सीताजी भिक्षा लेकर आती तो हैं लेकिन लक्ष्मण जी द्वारा खींची गई उस रेखा से बाहर नहीं निकलती।

ये देखकर सन्यासी बना रावण भिक्षा लेने से इंकार कर देता हैं। अंत में सीताजी लक्ष्मणजी द्वारा खींची गई उस लकीर के बाहर आ जाती है और उनका रावण द्वारा अपहरण कर लिया जाता है।

लक्ष्मण जी द्वारा सीताजी की रक्षा के लिए खींची गई उसी तथाकथित लकीर को आम बोल चाल की भाषा में लक्ष्मण रेखा के नाम से जाना जाता है। इस कथा के अनुसार लक्ष्मण जी ने सीताजी की रक्षा के लिए जो लकीर खींच दी थी, अगर वो उसका उल्लंघन नहीं करती तो वो रावण द्वारा अपहृत नहीं की जाती।

महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित रामायण को तथ्यात्मक प्रस्तुतिकरण के संबंध में सबसे अधिक प्रमाणिक ग्रन्थ माना जाता हैं। आइए देखते हैं महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित वाल्मिकी रामायण में इस तथ्य को कैसे उल्लेखित किया गया है। वाल्मिकी रामायण के आरण्यक कांड के पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ( अर्थात 45 वें भाग) में इस घटना का विस्तार से वर्णन किया गया है।

इस घटना की शुरुआत मारीच के श्रीराम जी द्वारा वाण से घायल करने और मरने से पहले मारीच द्वारा सीता और लक्ष्मण को पुकारने और सीता द्वारा इस पुकार को सुनकर घबड़ाने से शुरू होती है। इसका वर्णन कुछ इस प्रकार से शुरू होता है।

जब जानकी जी ने उस वन में पति के कण्ठस्वर के सदृश स्वर में आर्त्तनाद सुना, तब वे लक्ष्मण से बोलीं कि, जा कर तुम श्रीराम चन्द्र जी को देखो तो ॥ १ ॥

न हि से हृदयं स्थाने जीवावतिष्ठते ।
क्रोशतः परमार्तस्य श्रुतः शब्दो मया भृशम् ॥ २ ॥

इस समय मेरा जी ठिकाने नहीं, चित्त न जाने कैसा हो रहा है , क्योंकि मैंने परम पीड़ित और अत्यन्त चिल्लाते हुए श्रीराम चन्द्र जी का शब्द सुना है ॥ २ ॥

आक्रन्दमानं तु वने भ्रातरं त्रातुमर्हसि ।
तं क्षिप्रमभिधाव त्वं भ्रातरं शरणैषिणम् ॥३॥

अतः तुम वन में जा कर इस प्रकार आर्त्तनाद करने वाले
अपने भाई की रक्षा करो और दौड़ कर शीघ्र जाओ क्योंकि उनको इस समय रक्षण की आवश्यकता है ॥ ३॥

रक्षसां वशमापनं सिंहानामिव गोषम् ।
न जगाम तथोक्तस्तुभ्रातुराज्ञाय शासनम् ॥४॥

जान पड़ता है, वे राक्षसों के वश में जा पड़े हैं, इसी से वे सिंहों के बीच में पड़े हुए बैल की तरह विकल हैं। सीता जी के इस कहने पर भी लक्ष्मण जी न गये, क्योंकि उनको उनके भाई श्रीरामचन्द्र जाते समय आश्रम में रह कर, सीता की रखवाली करने की आज्ञा दे गये थे ॥४॥

तमुवाच ततस्तत्र कुपिता जनकात्मजा ,
सौमित्र मित्ररूपेण भ्रातुस्त्वमसि त्वमसि शत्रुवत् ॥५॥

इस प्रकार हम देखते हैं कि जब घबड़ाकर सीताजी लक्ष्मण जी से श्रीराम चंद्र जी की रक्षा करने को कहती है, तब भी लक्ष्मण जी नहीं जाते हैं। इसका कारण ये था कि श्रीराम जी ने लक्ष्मण जी को सीता जी की रक्षा करने की आज्ञा दे गए थे।

अपनी बात को न मानते देख सीताजी क्रोध में आ जाती हैं वो लक्ष्मण जी को अनगिनत आरोप लगाने लगती हैं ताकि लक्ष्मण जी उनकी बात मानने को बाध्य हो जाएं। आगे देखते है क्या हुआ।

तब तो सीता जी ने क्रोध कर लक्ष्मण से कहा- हे लक्ष्मण , तुम अपने भाई के मित्ररूपी शत्रु हो ॥ ५ ॥ ( यदि ऐसा न होता तो ) तुम क्या उस महा तेजस्वी श्रीराम चन्द्र जी के दिन इसी प्रकार निश्चिन्त और स्थिर बैठे रहते ।

देखो जिन श्रीरामचन्द्र जी के अधीन में हो कर, तुम वन में आए हो, उन्हीं श्रीरामचन्द्र जी के प्राण जब संकट में पड़े हैं, तब मैं यहाँ रह कर ही क्या करूँगी (अर्थात यदि तुम न जायोगे तो मैं जाऊँगी)।

अब्रवीलक्ष्मणस्वस्तां सीतां मृगवधूमिव । पन्नगासुरगन्धर्वदेवमानुषराक्षसः ॥१०॥

अशक्यस्तव वैदेहि भर्ता जेतुं न संशयः ।
दानवेषु च घोरेषु न स विद्येत शोभने ॥१२॥

देव देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु पतत्रिषु ॥११॥
राक्षसेषु पिशाचेषु किन्नरेषु मृगेषु च ।

यो रामं प्रति युध्येत समरे वासवोपमम् ।
अवध्यः समरे राम्रो नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥१३॥

जब जानकी जी ने प्राँखों में आंसू भर कर, यह कहा ।।८।। तब लगी के समान डरी हुई सीता जी से लक्ष्मण जी बोले कि, पन्नग, तुर, गन्धर्व, देवता, मनुष्य, राक्षस , कोई भी तुम्हारे पति (श्रीरामचन्द्र जी) को नहीं जीत सकता । इसमें कुछ भी सन्देह मत करना ।।१०।।

हे सीते ! हे शोभने ! देवताओं, मनुष्यों, गन्ध, पक्षियों, राक्षसों, पिशाचों किन्नरों, मृगों, भयङ्कर वानरों में कोई भी ऐसा नहीं. जो इन्द्र के समान पराक्रमी श्रीराम चन्द्र के समाने रण क्षेत्र में खड़ा रह सके । युद्धक्षेत्र में श्री रामचन्द्र जी अजेय हैं। अतः तुमको ऐसा कहना उचित नहीं ||११|| १२||१३||

श्रीरामचन्द्र की अनुपस्थिति में, मैं तुम्हें इस वन में अकेली छोड़ कर नहीं जा सकता। बड़े बड़े बलवानों की भी यह शक्ति नहीं कि, वे श्रीराम चन्द्र।जी के बल को रोक सकें ॥१४॥

त्रिभिर्लेोकैः समुद्युक्तः सेश्वरैरपि सामरैः ।
हृदयं निर्वृतं तेऽस्तु सन्तापस्त्यज्यतामयम् ||१५||

अगर तीनों लोक और समस्त देवताओं सहित इन्द्र इकट्ठे हो जाएँ , तो भी श्रीराम चन्द्र जी का सामना नहीं कर सकते । यतः तुम सन्ताप को दूर कर, आनन्दित हो ॥ १५ ॥

न च तस्य स्वरो व्यक्तं मायया केनचित्कृतः ॥१६॥
आगमिष्यति ते भर्ता शीघ्रं हत्वा मृगोत्तमम् ॥

उस उत्तम मृग को मार तुम्हारे पति शीघ्र आ जायगे । जो शब्द तुमने सुना है, वह श्रीरामचन्द्र जी का नहीं है, यह तो किसी का बनावटी शब्द है ॥१६॥

खरस्य निधनादेव जनस्थानवधं प्रति
राक्षसा विविधा वाचो विसृजन्ति महावने ॥१९॥

बल्कि गंधर्व नगर की तरह यह उस राक्षस की माया है। हे सीते ! महात्मा श्रीरामचन्द्र जी मुझको, तुम्हें धरोहर की तरह सौंप गये हैं । अतः हे वरारोहे ! मैं तुम्हें अकेला छोड़ कर जाना नहीं चाहता |

हे वैदेही ! एक बात और है जनस्थान निवासी खर आदि राक्षसों का वध करने से राक्षसों से हमारा वैर हो गया है । इस महावन में राक्षस लोग हम लोगों को धोखा देने के लिये भाँति भाँति की बोलियां बोला करते हैं ॥१७॥१८॥१६॥

सहारा वैदेहि न चिन्तयितुमर्हसि ।
लक्ष्मणेनैवमुक्ता सा क्रुद्धा संरक्तलोचना ।।२०।।

और साधुओं को पीड़ित करना राक्षसों का एक प्रकार का खेल है । अतः तुम किसी बात की चिन्ता मत करो। जब लक्ष्मण ने इस प्रकार कहा, तब सीता जी के नेत्र क्रोध के मारे लाल हो गये ॥२०॥

लक्ष्मण जी सीताजी जी इन बातों को सुनकर भी विचलित नहीं होते। उन्हें अपने अग्रज श्रीराम जी की शक्ति पर अपार आस्था है। उल्टे वो सीताजी को समझाने की कोशिश करने लगते हैं। लक्ष्मण जी की कोशिश होती है कि जिस प्रकार उनकी आस्था श्रीराम जी में हैं उसी तरह का विश्वास सीताजी में भी स्थापित हो जाए।

लक्ष्मण जी सीताजी ये भी समझाते हैं कि खर इत्यादि राक्षसों का वध करने से सारे राक्षस उनके विरुद्ध हो गए हैं। इस कारण तरह तरह की ध्वनि निकाल कर ऊनलोगों को परेशान करने की कोशिश कर रहे हैं। परंतु सीताजी पर इसका ठीक विपरीत असर होता है।

इन बातों को सुनकर सीताजी क्रोध में आ जाती हैं और उग्र होकर लक्ष्मण जी को अनगिनत बातें कहती हैं जिस कारण लक्ष्मण जी को मजबूरन सीताजी को अकेला छोड़कर जाना पड़ता है। वो आगे इस प्रकार कहते हैं।

मैं तो श्रीरामचन्द्र जी की आज्ञा मान, तुम्हें अकेली छोड़ कर, नहीं जाता था किन्तु हे बरानने , तुम्हारा मङ्गल हो , लो मैं श्रीरामचन्द्र के पास जाता हूँ ॥ ३३ ॥

रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवताः।
निमित्तानि हि घोराणि यानि प्रादुर्भवन्ति मे ॥३४॥

अपि त्वां सह रामेण पश्येयं पुनरागतः ॥३५॥

लक्ष्मणेनैवमुक्ता सा रुदन्ती जनकात्मजा ।
प्रत्युवाच ततो वाक्यं तीव्रं बाष्पपरिप्लुता ॥३६॥

हे विशालाचि ! समस्त वनदेवता तुम्हारी रक्षा करें। इस समय बड़े बुरे बुरे शकुन मेरे सामने प्रकट हो रहे हैं ॥ ३४ ॥ क्या मैं श्रीरामचन्द्र सहित लौट, फिर तुम्हें ( यहाँ ) देख सकूँगा ॥३५॥

विशालनयना जनकनन्दिनी को ऐसे व्यार्त्तभाव से, उदास हो रोते हुए देख, लक्ष्मण ने उनको समझाया बुझाया, किन्तु जानकी जे अपने देवर से फिर कुछ भी न कहा (अर्थात रूठ गयीं )॥ ४०॥

ततस्तु सीतामभिवाद्य लक्ष्मणः
कृताञ्जलिः किञ्चिदभिप्रणम्य च।

अन्वीक्षमाणो बहुशश्च मैथिलीं जगाम रामस्य समीपमात्मवान् ॥४१॥

तदनन्तर जितेन्द्रिय लक्ष्मण जी हाथ जोड़ और बहुत झुक कर सीता जी को प्रणाम कर और बार बार सीता को देखते हुए श्रीरामचन्द्र के पास चल दिये ॥४१॥

तथा परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः
स विकाङ्क्षन्भृशं रामं प्रतस्थे न चिरादिव ॥१॥

इस प्रकार जानकी की कटूक्तियों से कुपित हो, लक्ष्मण जी वहां से जाने की बिलकुल इच्छा न रहते भी, श्रीराम चन्द्र जी के पास तुरन्त चल दिये ॥१॥

जब लक्ष्मण जी के बार बार समझाने पर भी सीता जी नहीं मानती, उल्टे लक्ष्मण जी को बुरा भला कहने लगती हैं तब लक्ष्मण जी के बार और कोई उपाय नहीं रह जाता हैं सिवाए इसके कि सीताजी की आज्ञानुसार वो प्रभु श्रीराम के पास पहुंचकर उनकी रक्षा करें । हालांकि उनके मन में शंका के अनगिनत बादल मंडराने लगते हैं फिर भी लक्ष्मण जी सीताजी को अकेले छोड़कर जाने को बाध्य हो जाते हैं । इसके बाद क्या होता है, आइए देखते हैं।

इतने में एकान्त अवसर पा, रावण ने सन्यासी का भेष बनाया और वह तुरन्त सीता के सामने जा पहुँचा ॥२॥

काषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही ।
वामे चांसेऽवसज्ज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू ॥३॥

उस समय रावण स्वच्छ रुमा रङ्ग के कपड़े पहिने हुए था, उसके सिर पर चोटी थी, सिर पर छत्ता लगाये और पैरों में खड़ाऊ पहिने हुए था । उसके वाम कंधे पर त्रिदण्ड था और हाथ में कमण्डलु लिये हुए था ॥३॥

तदासाद्य दशग्रीवः क्षिमनन्तरमास्थितः ।
अभिचक्राम देहीं परिव्राजकरूपवृत् || २||

जब इस प्रकार रावण ने सीता जी की प्रशंसा की तब उस संन्यास वेषधारी रावण को आया हुआ देख, सीता जी ने उसका यथा विधि प्रातिथ्य किया ॥ ३२॥

सर्वैरतिथिसत्कारैः पूजयामास मैथिली
उपनीयासनं पूर्वं पाद्येनाभिनिमन्त्र्य च।

अब्रवीत्सिद्धमित्येव तदा तं सौम्यदर्शनम् ।। ३३ ।।

सीता ने पहले उसे बैठने को आसन दिया,।फिर पैर धोने का जल दिया, फिर फल आदि भोज्य पदार्थ देते हुए कहा, यह सिद्ध किये हुए पदार्थ हैं ( अर्थात् भूंजे हुए अथवा पकाये हुए ) ॥ ३३ ॥

द्विजाति वेषेण समीक्ष्य मैथिली समागतं पात्र कुसुम्भ भ्धारिणम् ।
अशक्य मुद्वेष्टुमपायदर्शनं यद्ब्राह्मणवत्तदाऽङ्गना ॥ ३४ ॥

सीताजी को अकेले पाकर रावण सन्यासी का वेश बनाए हुए वहां पहुंचता है । रावण के सन्यासी वेश में स्वयं की प्रशंसा करते हुए देख सीताजी सर्वप्रथम उसका आदर करती हैं और खाने के लिए फल आदि भी प्रदान करती हैं। फिर सीताजी रावण से उसका परिचय जानना चाहती है। जब उत्तर में रावण अपना अभिमान भरा परिचय देता है। सीताजी जी प्रतिउत्तर में रावण को अपने पति श्रीराम चंद्र जी के अद्भुत पराक्रम का वर्णन करने लगती हैं।

अब आप अपना नाम, गोत्र और कुल ठीक ठीक बतलाइये और यह भी बतलाइये कि, आप अकेले इस दण्डकवन में क्यों फिरते हैं ॥ २४ ॥

एवं ब्रुवन्त्यां सीतायां रामपत्न्यां महाबलः ।
प्रत्युवाचोत्तरं तीव्रं रावणो राक्षसाधिपः ।। २५।।

जब सीता जी ने ऐसे वचन कहे, तब महावली राक्षस नाथ रावण ने ये कठोर वचन कहे ॥ २५ ॥

येन वित्रासिता लोकाः सदेवासुरपन्नगाः ।
अहं स रावणो नाम सीते रक्षोगणेश्वरः || २६ ॥

हे सीते ! जिसके डर से देवताओं, असुरों और मनुष्यों सहित तीनों लोक थरथराते हैं, मैं वही राक्षसों का राजा रावण हूँ ॥ २६ ॥

सीता जी अपना परिचय देते हुए कहती जो सब शुभ लक्षणों से युक्त और वटवृक्ष की तरह सबको सदैव सुखदायी हैं, उन सत्यप्रतिज्ञ और महाभाग श्रीरामचन्द्र की मैं अनुगामिनी हूँ ३४ ॥

“कूपोदकं वटच्या युवतीनां स्तनद्वयम् । शीतकाले भवेत्युष्णमुष्णकाले च शीतलम् ॥” ]

महावाहुं महोरस्कं सिंहविक्रान्तगामिनम् नृसिंहं सिंहसङ्काशमहं राममनुव्रता ।। ३५ ।।

महावाहु, चौड़ी छाती वाले, सिंह जैसी चाल चलने वाले, पुरुष सिंह, और सिंह से समान पराक्रमी श्रीरामचन्द्र की मैं अनुगामिनी हूँ || ३५ ॥

पूर्णचन्द्राननं रामं राजवत्सं जितेन्द्रियम्
पृथुकीर्त्ति महात्मानमहं राममनुव्रता ॥ ३६ ॥

मैं उन राजकुमार एवं जितेन्द्रिय श्रीराम की अनुगामिनी हूँ, जिनका मुख पूर्णमासी के चन्द्रमा के तुल्य है, जिनकी कीर्ति दिग दिगन्त व्यापिनी है और जो महात्मा हैं ॥ ३६॥

त्वं पुनर्जम्बुकः सिंहीं मामिच्छसि सुदुर्लभाम्
नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टुमादित्यस्य प्रथा यथा ॥ ३७ ॥

सो तू शृगाल के समान हो कर, सिंहनी के तुल्य मुझे चाहता है । किन्तु तू मुझे उसी प्रकार नहीं छू सकता, जिस प्रकार सूर्य की प्रभा को कोई नहीं छू सकता ॥ ३७॥

सीताजी रावण के अभिमान भरे शब्दों से डरती नहीं अपितु राम जी पराक्रम से उसे परिचय करवाते हुए उसे धमकाती भी है। स्वयं के लिए अपमान जनक शब्दों का प्रयोग होते देखा रावण क्रोध में आकर अपना रौद्र रूप प्रकट करता है और फिर सीताजी का बलपूर्वक अपहरण कर लेता है।

हे भीरु ! यदि तू मेरा तिरस्कार करेगी, तो पीछे तुझको वैसे ही पछताना पड़ेगा, जैसे उर्वशी अप्सरा राजा पुरूरवा के लात मार कर, पछतायी थी ॥१८॥

अङ्गुल्या न समो रामो मम युद्धे स मानुषः ।

तव भाग्येन सम्प्राप्तं भजस्व वरवर्णिनि ।।१९॥

राम मनुष्य है, वह युद्ध में मेरी एक अंगुली के वल के समान भी ( वलवान् ) नहीं है । (अर्थात् उसमें इतना भी बल नहीं, जितना मेरी एक अंगुली में है) अतः वह युद्ध में मेरा सामना कैसे कर सकता है। हे वरवर्णिनी ! इसे तू अपना सौभाग्य समझ कि, मैं यहाँ आया हूँ । अतः तू मुझे अङ्गीकार कर ॥ १६ ॥

एवमुक्ता तु वैदेही क्रुद्धा संरक्तलोचना ।
अब्रवीत्परुषं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपम् ॥२०॥

रावण के ऐसे वचन सुन, सीता कुपित हो और लाल लाल नेत्र कर, उस निर्जन वन में रावण से कठोर वचन बोली ॥ २० ॥

कथं वैश्रवणं देवं सर्वभूतनमस्कृतम्
भ्रातरं व्यपदिश्य त्वमशुभं कर्तुमिच्छसि ॥२१॥

हे रावण ! तू सर्वदेवताओं के पूज्य कुवेर को अपना भाई बतला कर भी, ऐसा बुरा काम करने को ( क्यों ) उतारु हुआ है ? ॥२१॥

मैं प्रकाश में बैठा बैठा अपनी भुजाओं से इस पृथिवी को उठा सकता हूँ, और समुद्र को पी सकता हूँ और काल को संग्राम में मार सकता हूँ ॥३॥

अर्क रुन्ध्यां शरैस्तीक्ष्णैर्निर्भिन्द्यां हि महीतलम् । कामरूपिणमुन्मत्ते पश्य मां कामदं पतिम् ॥४॥

मैं अपने पैने बाणों से सूर्य की गति को रोक सकता हूँ और पृथिवी को विदीर्ण कर सकता हूँ । हे उन्मत्ते ! मुझ इच्छारूपधारी और मनोरथ पूर्ण करने वाले पति को देख । ( अर्थात् मुझे अपना पति बना ) ॥४॥

एवमुक्तवतस्तस्य सूर्यकल्पे शिखिप्रभे । क्रुद्धस्य ‘हरिपर्यन्ते रक्ते नेत्र बभूवतुः ॥५॥

ऐसा कहते हुए रावण की पीली आँखे मारे क्रोध के प्रज्वलित भाग की तरह लाल हो गयीं ॥५॥
सद्यः सौम्यं परित्यज्य भिक्षुरूपं स रावणः । स्वं रूपं कालरूपार्थं भेजे वैश्रवणानुजः ॥६॥

उसी क्षण कुबेर के छोटे भाई रावण ने अपने उस संन्यासी भेष को त्याग, काल के समान भयङ्कर रूप धारण किया ॥६॥

इस प्रकार हम देखते हैं कि वाल्मिकी रामायण के आरण्यक कांड के पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ( अर्थात 45 वें भाग) में इस घटनाक्रम में लक्ष्मण द्वारा सीताजी की रक्षा करने के लिए किसी भी प्रकार की लकीर या रेखा को खींचने का वर्णन नहीं आता है।

जब सीताजी रावण से उसका परिचय पूछती हैं तो वो सन्यासी वेश में हीं अपना सम्पूर्ण परिचय देता है। रावण यहां पर सीता जी के किसी लकीर से बाहर आने का इंतजार नहीं करता, बल्कि सीताजी के पूछने पर सन्यासी वेश में हीं अपना परिचय दे देता है।

रावण द्वारा स्वयं को राक्षस राज बताए जाने का सीता जी पर कोई असर नहीं होता। सीताजी का यहां साहसी व्यक्तित्व रूप प्रकाशित होता है। वो रावण से डरती नहीं अपितु उसे धमकाती भी हैं। ऐसी साहसी स्त्री के लिए भला किसी रेखा की जरूरत हो भी क्या सकती थी।

लक्ष्मण रेखा के खींचे जाने की कहानी कब , कहाँ , कैसे और क्यों प्रचलित हो गई इसके बांरे में ना तो ठीक ठीक जानकारी हीं प्राप्त है और ना हीं कोई ठीक ठीक से अनुमान हीं लगा सकता है।

अब कारण जो भी रहा हो लेकिन ये बात तो तय हीं हैं कि किसी ने इसके बारे में तथ्यों को खंगाला नहीं । सुनी सुनी बातों को मानने से बेहतर तो ये है कि प्रमाणिक ग्रंथों में इसकी तहकीकात की जाय , और जहाँ तक तथ्यों के प्रमाणिकता का सवाल है , वाल्मीकि रामायण से बेहतर ग्रन्थ भला कौन सा हो सकता है ?

और जब हम लक्ष्मण रेखा के सन्दर्भ में वाल्मीकि रामायण की जाँच पड़ताल करते हैं तो ये तथ्य निर्विवादित रूप से सामने निकल कर आता है कि लक्ष्मण रेखा कभी अस्तित्व में आई हीं नहीं थी।

वाल्मिकी रामायण के अरण्यक कांड इस तरह की लक्ष्मण रेखा खींचने का कोई जिक्र हीं नहीं आता है। लक्ष्मण रेखा की घटना जो कि आम बोल चाल की भाषा में सर्वव्याप्त है दरअसल कभी अस्तित्व में था हीं नहीं। लक्ष्मण रेखा की वास्तविक सच्चाई ये है कि लक्ष्मण रेखा कभी खींची हीं नहीं गई।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

सीता स्वयंवर

 सीताजी की स्वयंवर में अनगिनत राजाओं , महाराजाओ की उपस्थिती के बारे में अनगिनत कहानियाँ प्रचलित है । ऐसा माना जाता है , शिवजी का भक्त होते के नाते रावण भी सीताजी की स्वयंवर में आया था।

ये बात भी प्रचलित है कि शिवजी के धनुष के टूटने के बाद भगवान श्री परशुराम सीताजी के स्वयंवर स्थल पर आये थे तथा उनका लक्ष्मण जी के साथ वाद विवाद हुआ था। इन बातों में कहाँ तक सच्चाई है , आइये देखते हैं।

राजा जनक के मन में अपनी पुत्री सीताजी के प्रति पड़ा स्नेह था। सीताजी का जन्म राजा जनक के पत्नी के गर्भ से नहीं हुआ था । ऐसा कहा जाता है , एक बार जब उनके राज्य में भूखमरी की समस्या उत्पन्न हो गई थी तब ऋषियों के सलाहानुसार उन्होंने खेत में हल जोता था । और इसी प्रक्रिया में हल के नोंक से जोते जाने पर उनको खेत से सीता के रूप में एक पुत्री की प्राप्ति हुई थी । इस घटना के बाद उनके राज्य में जो दुर्भिक्ष पड़ा हुआ था वो ख़त्म हो गया । इसी कारण वो अपनी पुत्री सीता को विशेष रूप से स्नेह करते थे ।

जब सीताजी विवाह के योग्य हुई तो राजा जनक ने अपनी पुत्री के लिए स्वयंवर रचा और इसके लिए ये शर्त रखी कि जो कोई भी शिव जी के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा उसी के साथ सीताजी की शादी होगी। सीताजी के स्वयंवर में अनगिनत राजकुमार, राजे और महाराजे आये थे। एक एक कर सबने कोशिश की , परन्तु कोई शिवजी का धनुष हिला तक नहीं पाया।

ऐसा कहते हैं कि रावण भगवान शिवजी का अनन्य भक्त था। चूँकि सीताजी के स्वयंवर में शिव जी के धनुष पर प्रत्यंचा चढाने की शर्त्त थी इसकारण रावण भी सीताजी के स्वयंवर स्थल पर आया था। उसने भी शिवजी के धनुष पर प्रत्यंचा चढाने की कोशिश की थी, परन्तु अपने लाख कोशिश करने के बावजूद वो ऐसा करने में असफल रहा। अंततोगत्वा खीजकर वो वापस अपने राज्य श्रीलंका नगरी को लौट गया।

सबके असफल हो जाने के बाद भगवान श्रीराम अपने गुरु की आज्ञा लेकर शिव जी के धनुष के पास पहुँचे और बड़ी हीं आसानी से धनुष को अपने हाथों में उठा लिया। फिर भगवान श्रीराम जैसे हीं शिव जी के धनुष पर प्रत्यंचा लगाने की कोशिश की , शिव जी का धनुष टूट गया।

शिवजी के धनुष के टूट जाने के बाद भगवान परशुराम सीताजी के स्वयंवर स्थल पर आते हैं और धनुष को टुटा हुआ देखकर अत्यंत क्रुद्ध होते हैं । उनके क्रोध के प्रतिउत्तर में लक्ष्मण जी भी क्रुद्ध हो जाते हैं और उनका परशुराम जी के साथ वाद विवाद होता है । अंत में जब परशुराम जी भगवान श्रीराम जी को पहचान जाते हैं तब अपना धनुष श्रीराम जी हाथों सौपकर लौट जाते हैं ।

तो ये है कहानी रावण और भगवान परशुराम जी के सीताजी के स्वयंवर स्थल पर आने की, जो कि आम जनमानस की स्मृति पटल पर व्याप्त है। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के स्कन्द संख्या 66 -67 में सीता स्वयंवर की पूरी घटना का वर्णन किया है । देखते हैं कि वाल्मीकि रामायण में रावण और भगवान परशुराम जी के सीताजी के स्वयंवर स्थल पर आने की घटना का जिक्र आता है कि नहीं ? आइये शुरुआत वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के षट्षष्टितमः सर्गः अर्थात सर्ग 66 के श्लोक संख्या 1 से करते हैं।

1.

[वाल्मीकि रामायण] [बालकाण्ड]
[षट्षष्टितमः सर्गः] [ अर्थात 66 सर्ग ]

ततः प्रभाते विमले कृतकर्मा नराधिपः ।
विश्वामित्रं महात्मानमाजुहाव सराघवम् ॥ १॥

प्रात:काल होते ही राजा जनक ने आन्हिक कर्मानुष्ठान से निश्चिन्त हो, दोनों राजकुमारों सहित विश्वामित्र जो को बुला भेजा ॥१॥

तमर्चयित्वा धर्मात्मा शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ।
राघवौ च महात्मानौ तदा वाक्यमुवाच ह ॥२॥

शास्त्रविधि के अनुसार अर्घ्यपाद्यादि से विश्वामित्र व राम लक्ष्मण की पूजा कर, धर्मात्मा राजा जनक बोले, ॥ २॥

भगवन्स्वागतं तेऽस्तु किं करोमि तवानघ ।।
भवानाज्ञापयतु मामाज्ञाप्यो भवता ह्यहम् ।।३।।

हे भगवन, आपका मैं स्वागत करता हूँ, कुछ सेवा करने के लिये आज्ञा दीजिये । क्योंकि मैं आपकी आज्ञा का पात्र हूँ।

2.

एवमुक्तः स धर्मात्मा जनकेन महात्मना ।
प्रत्युवाच मुनिर्वीरं वाक्यं वाक्यविशारदः॥४॥

जब महात्मा जनक जी ने ऐसा कहा तब बातचीत करने में अत्यन्त चतुर विश्वामित्र जी राजा से बोले ॥४॥

पट्पष्टितमः सर्गः पुत्रौ दशरथस्येमौ क्षत्रियो लोकविश्रुतौ । |
द्रष्टुकामा धनुःश्रेष्ठं यदेतत्त्वयि तिष्ठति ॥५॥

ये दोनों कुमार महाराज दशरथ के पुत्र, क्षत्रियों में श्रेष्ठ, और लोक में विख्यात श्रीरामचन्द्र एवं लक्ष्मण, वह धनुष देखना चाहते हैं, जो आपके यहाँ रखा है ॥ ५ ॥
.
एतद्दर्शय भद्रं ते कृतकामा नृपात्मजौ । .
दर्शनादस्य धनुपो यथेष्ट प्रतियास्यतः ॥ ६॥

आपका मंगल हो; अतः आप उसे इन्हें दिखलवा दीजिये। उसे देखने ही से इनका प्रयोजन हो जायगा और ये चले जायगे ॥६॥

3.

एवमुक्तस्तु जनकः प्रत्युवाच महामुनिम् ।
श्रूयतामस्य धनुषो यदर्थमिह तिष्ठति ॥७॥

यह सुन राजा जनक, विश्वामित्र जी से वाले कि, जिस प्रयोजन के लिये यह धनुप यहाँ रखा है, उसे सुनिये ॥७॥

देवरात इति ख्यातो निमः षष्ठो महीपतिः।
न्यासोऽयं तस्य भगवन्हस्ते दत्तो महात्मना ॥८॥

हे भगवन् ! राजा निमि की छठवीं पीढ़ी में देवरात नाम के एक राजा हो गये हैं । उनको यह धनुष धरोहर के रूप में मिला।

दक्षयज्ञवधे पूर्व धनुरायम्य वीर्यवान् ।
रुद्रस्तु त्रिदशाबोपात्सलीलमिदमब्रवीत् ॥९॥

4.

पूर्वकाल में जव महादेव जी ने दत्त प्रजापति का विध्वंस कर डाला (क्योंकि उसमें महादेव जो को यक्षमाग नहीं मिला था) तब लीलाक्रम से शिव जी ने क्रोध में भर यही धनुष ले देवताओं से कहा था ॥६॥

यस्माद्भागार्थिनेा भागानाकल्पयत मे सुराः ।
वराङ्गाणि महार्हाणि धनुपा शातयामि वः ॥ १०॥

हे देवो! यतः (चूँकि ) तुम लोगों ने मुझ भागार्थी को यक्षमाग नहीं दिया, अतः मैं इस धनुष से तुम सब के सिरों को काटे डालता हूँ॥ १०॥

ततो विमनसः सर्वे देवा वै मुनिपुङ्गव ।
प्रसादयन्ति देवेशं तेषां प्रीतोऽभवद्भवः ॥ ११ ॥

हे मुनिप्रवर! शिव जी का यह वचन सुन देवता लोग बहुत उदास हो गये और किसी न किसी तरह शिव जी को मना कर प्रसन्न किया ॥ ११॥

प्रीतियुक्तः स सर्वेषां ददौ तेषां महात्मनाम् ।
तदेतदेवदेवस्य धनूरनं महात्मनः ।। १२॥

5.

तब प्रसन्न हो कर महादेव जी ने यह धनुष देवताओ को दे दिया और देवताओं ने उस धनुष को धरोहर की तरह देवताओ को दे दिया । सो यह वही धनुष है ॥ १२॥

न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्वके विभो ।
अथ मे कृषतः क्षेत्र लाङ्गलादुत्थिता ततः ॥ १३ ॥

एक समय यज्ञ करने के लिये मैं हल से खेत जोत रहा था। उस समय हल की नोंक से एक कन्या भूमि से निकली॥ १३ ॥

क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा ॥ १४ ॥

अपने जन्म के कारण सीता के नाम से प्रसिद्ध है और मेरी लड़की कहलाती है। पृथिवी से निकली हुई वह कन्या दिनों दिन मेरे यहां बड़ी होने लगी ॥ १४ ॥

6.

वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा।
भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम् ॥ १५॥

उस प्रयोनिजा कन्या के विवाह के लिये मैंने पराक्रम ही शुल्क रखा है। पृथिवी से निकली हुई मेरो यह कन्या जब धीरे धीरे बड़ी होने लगी ॥ १५॥

“वरयामासुरागम्य राजानो मुनिपुङ्गव ।
तेषां वरयतां कन्यां सर्वेषां पृथिवीक्षिताम् ॥ १६ ॥

वीर्यशुल्केति भगवन्न ददामि सुतामहम् ।
ततः सर्वे नृपतयः समेत्य मुनिपुङ्गव ।। १७ ॥

तब , हे मुनिश्रेष्ठ ! मेरी उस कन्या के साथ अपना विवाह करने के लिये अनेक देशों के राजा आये । सीता के साथ विवाह करने की इच्छा रखने वाले उन सब राजाओं से कहा गया कि, यह कन्या “वीर्यशुल्का” है। अतः मैं वर के पराक्रम की परीक्षा लिए बिना अपनी कन्या किसी को नहीं दूंगा॥ १६ ॥ १७ ॥

7.

मिथिलामभ्युपागम्य वीर्यजिज्ञासवस्तदा।
तेषां जिज्ञासमानानां वीर्यं धनुरुपाहृतम् ॥ १८ ॥

तव तो हे मुनिश्रेष्ठ! सब राजा लोग एक हो अपने पराक्रम की परीक्षा देने को मिथिलापुरी में पाये। उनके बल की परीक्षा के लिये मैंने यह धनुष उनके सामने (रोदा चढ़ाने के लिये) रखा ॥१८॥

न शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेऽपि वा।
तेषां वीर्यवतां वीर्यमल्पं ज्ञात्वा महामुने ॥ १९ ॥

उनमें से कोई भी राजा उस धनुष को उठा कर उस पर रोदा न चढ़ा सका, तव उन राजाओं को अल्पवीर्य समझ॥ १९॥

प्रत्याख्याता नृपतयस्तन्निवोध तपोधन।
ततः परमकोपेण राजाना मुनिपुङ्गव ॥ २० ॥

8.

अरुन्धन्मिथिलां सर्वे वीर्यसन्देहमागताः।
आत्मान मवधृतं ते विज्ञाय नृपपुङ्गवाः ॥ २१॥

मैंने उनमें से किसी को अपनी कन्या नहीं दी। हे मुनिराज, यह बात श्राप भी जान लें। [जब मैंने अपनी कन्या का विवाह उनमें से किसी के साथ नहीं किया] तब उन लोगों ने क्रुद्ध हो मिथिला पुरी घेर ली। क्योंकि धनुष द्वारा बल की परीक्षा देने में उन्होंने अपना तिरस्कार समझा ॥ २० ॥ २१ ॥

पट्पष्टितमः सर्गः रोपेण महताऽविष्टाः पीडयन्मिथिलां पुरीम् ।।
ततः संवत्सरे पूर्णे क्षयं यातानि सर्वशः ।। २२ ।।

9.

साधनानि मुनिश्रेष्ठ ततोऽहं भृशदुःखितः ।
ततो देवगणान्सर्वान्स्तपसाहं प्रसादयम् ॥ २३ ॥

उन लोगों ने अत्यन्त क्रुद्ध हो मिथिला वासियों को बड़े बड़े कष्ट दिये । एक वर्ष तक लड़ाई होने से मेरा धन भी बहुत नष्ट हुआ । इसका मुझे बड़ा दुःख हुआ । तब मैंने तप द्वारा देवताओं को प्रसन्न किया ॥ २२ ॥ २३ ॥

ददुश्च परममीताश्चतुरङ्गवलं सुराः ।।
ततो भग्ना नृपतयो हन्यमाना दिशा ययुः ॥ २४॥

देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्न हो कर मुझे चतुरङ्गिणी सेना दी। तब हतोत्साह राजा पराजित हो भाग गये ॥ २४ ॥

अवीर्या वीर्यसन्दिग्धाः सामात्या. पापकारिणः ।
तदेतन्मुनिशार्दूल धनुः परममावरम् ।
रामलक्ष्मणयोश्चापि दर्शयिष्यामि सुव्रत ॥ २५ ॥

10.

भीरु और वीरता की झूठी डींगे मारने वाले वे राजा अपने मंत्रियों सहित भाग गये। हे मुनिश्रेष्ठ, यह वही दिव्य धनुष है। हे सुव्रत, मैं इसे श्रीरामचन्द्र लक्ष्मण को भी दिखलाऊँगा ॥ २५ ॥

यद्यस्य धनुपो रामः कुर्यादारोपणं मुने ।
सुतामयोनिजां सीतां दद्यां दाशरथेरहम् ॥ २६ ॥

और यदि श्रीरामचन्द्र जी ने धनुष पर रोदा चढ़ा दिया, तो मैं अपनी अयोनिजा सीता उनको व्याह दूंगा ॥ २६॥

इति पट्पष्टितमः सर्गः॥
[बालकाण्ड का छियासठवा सर्ग समाप्त हुआ]

इस प्रकार हम सर्ग 66 में जो वर्णन देखते हैं वो ये है कि राजा जनक जी के कहने पर विश्वामित्र ही श्रीराम जी और लक्ष्मण जी को साथ लेकर सीताजी के स्वयंवर स्थल पर पहुँचते है और धनुष को दिखलाने को कहते हैं ।

इस बात के प्रतिउत्तर में जनक जी उस शिव जी के धनुष के बारे में बताते हैं कि वो उनके पास आया। राजा जनक जी आगे बताते हैं कि कि सीता उनकी अपनी पुत्री नहीं है अपितु हल से खेत जोतने के कारण प्राप्त हुई है। सीताजी के विवाह के लिए इस धनुष पर प्रत्यंचा चढाने को हीं इस स्वयंवर की शर्त बना दिया गया ।

वीर्यशुल्क का अर्थ है जिसे वीरत्व द्वारा प्राप्त किया जा सके। जनक जी आगे बताते है कि अनेक राजे और महाराजे आकर उस धनुष पर प्रत्यंचा चढाने की कोशिश करते हैं परन्तु कोई भी सफल नहीं हो पाता है । अंत में वो सब मिलकर जनक जी पर एक साल तक आक्रमण करते रहते हैं ।

जब राजा जनक की तपस्या कर देवताओं से चतुरंगिनी सेना प्राप्त करते हैं जब जाकर वो राजा भाग जाते हैं । इस प्रकार हम देखते हैं कि सीता स्वयंवर में एक साथ सारे राजा आकर प्रयास नहीं करते हैं , जैसा कि आम जन मानस में प्रचलित है ।

जनक जी विश्वामित्र मुनि को आगे बताते हैं कि अगर श्रीराम जी इस शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देते हैं तो वो अपनी पुत्री का विवाह श्रीराम चन्द्र जी से कर देंगे। इस प्रकार हम देखते है कि वाल्मीकि रामायण के सर्ग 66 में अनेक राजाओ के आने का जिक्र है , अनेक राजाओ द्वारा जनक जी पर एक साल तक आक्रमण करने का जिक्र आता है परन्तु कहीं भी रावण के आने का जिक्र नहीं आता है । सीताजी के स्वयंवर में रावण के आने की घटना मात्र कपोल कल्पित है। सीताजी के स्वयंवर में रावण कभी आया हीं नहीं था । अब आगे देखते हैं कि सर्ग संख्या 67 में क्या वर्णन किया गया है ।

11.

[वाल्मीकि रामायण] [बालकाण्ड]
[सप्तषष्टितमः सर्गः] [67 सर्ग]

जनकस्य वचः श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनिः ।
धनुर्दर्शय रामाय इति होवाच पार्थिवम् ॥ १॥

राजा जनक की बातें सुन महर्षि विश्वामित्र ने राजा जनक से कहा-हे राजन् ! वह धनुष श्रीरामचन्द्र को दिखलाइये ॥१॥

ततः स राजा जनकः सचिवान्व्यादिदेश ह ।
धनुरानीयतां दिव्यं गन्धमाल्यविभूषितम् ॥ २॥

तब राजा जनक ने अपने मंत्रियों को आज्ञा दी कि, जो दिव्य धनुष चन्दन और पुष्पमालाओं से भूषित है, उसे ले आओ ॥२॥

जनकेन समादिष्टाः सचिवाः प्राविशन्पुरीम् ।
तद्धनुः पुरतः कृत्वा निर्जग्मुः पार्थिवाज्ञया ॥३॥

राजा जनक को आज्ञा पा कर मंत्री लोग मिथिलापुरी में गये (यज्ञशाला नगरी के वाहर बनी थी ) और उस धनुष को आगे कर चले ॥ ३ ॥

12.

नृणां शतानि पञ्चाशद्वयायतानां महात्मनाम् ।
मञ्जूषामष्टचक्रां तां समूहुस्ते कथञ्चन ॥ ४ ॥

पांच हज़ार मज़बूत मनुष्य, धनुष को आठ पहिये को पेटी को, कठिनता से खींच और ढकेल कर वहाँ ला सके ॥४॥ .

तामादाय तु मञ्जूपामायसी यत्र तदनुः । ‘
सुरोपमं ते जनकमूचुर्नृपतिमन्त्रिणः ॥ ५॥

जिस पेटी में धनुष रखा था वह लोहे की थी उसे लाकर, मंत्रियों ने सुरोपम महाराज जनक को इस बात को सूचना दी ।। ५ ।।

इदं धनुर्वरं राजपूजितं सर्वराजभिः ।
मिथिलाधिप राजेन्द्र दर्शयनं यदीच्छसि ॥ ६॥

13.

मंत्री बोले-हे राजन् ! यह वही धनुप है, जिसकी पूजा सब राजा कर चुके हैं। हे मिथिला के अधीश्वर, हे राजेन्द्र ! अब आप जिसको चाहिये इसे दिखलाइये ॥ ६ ॥

तेषां नृपो वचः श्रुत्वा कृताञ्जलिरभापत।
विश्वामित्रं महात्मानं तो चोभौ रामलक्ष्मणौ ।। ७ ।।

मंत्रियों की बात सुन, राजा ने हाथ जोड़ कर, महात्मा विश्वामित्र और राम लक्ष्मण से कहा ॥ ७ ॥

इदं धनुर्वरं ब्रह्मञ्जनकैरभिपूजितम् ।
राजभिश्च महावीरशक्तैः पूरितुं पुरा ॥ ८॥

हे ब्रह्मन् ! यह श्रेष्ठ धनुप वही है, जिसका पूजन सव निमिवंशीय जा करते चले आते हैं और यह वही धनुष है जिस पर बड़े बड़े पराक्रमी राजा लोग रोदा नहीं चढ़ा सके ॥८॥

14.

नैतत्सुरगणाः सर्वे नासुरा न च राक्षसाः ।
गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहारगाः ॥९॥

क गतिर्मानुपाणां च धनुपोऽस्य प्रपूरणे ।
आरोपणे समायोगे वेपने तोलनेऽपि वा ॥१०॥

समस्त देवता, असुर, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर और नाग भी जब इस धनुष को उठा और सुता कर इस पर रोदा नहीं चढ़ा सके, तब पुरे मनुष्य की तो बात ही क्या है जो इस धतुप पर रोदा चढ़ा सके । ॥ ९ ॥ १०॥

तदेतद्धनुपा श्रेष्ठमानीतं मुनिपुङ्गव ।
दर्शयैतन्महाभाग अनयो राजपुत्रयोः ॥ ११ ॥

हे ऋषिश्रेष्ठ ! वह श्रेष्ठ धनुष आ गया है। हे महाभाग ! उसे इन राजकुमारों को दिखलाइये ॥११॥

15.

विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा श्रुत्वा जनकभापितम् ।
वत्स राम धनुः पश्य इति राघवमब्रवीत् ॥ १२ ॥

धर्मात्मा विश्वामित्र जी ने जब राजा जनक के ये वचन सुने, तब उन्होंने श्रीरामचन्द्र जी से कहा-हे वत्स! इस धनुष को देखो ॥ १२॥

ब्रह्मवंचनाद्रामा यत्र तिष्ठति तद्धनुः ।
मञ्जूषां तामपावत्य दृष्ट्वा धनुरथाब्रवीत् ॥ १३॥ .

महर्षि के ये पचन हुन, श्रीरामचन्द्र जी वहां गये जहां धनुष था और उस पेटी को, जिसमें वह धनुष था, खोल कर, धनुष देखा और बोले ॥ १३ ॥

16.

इदं धनुर्वरं ब्रह्मन्संस्पृशामीह पाणिना ।
यनवांश्च भविष्यामि तोलने पूरणेपि वा ॥ १४ ॥

हे ब्राह्मण अब इस धनुष को मैं हाथ लगाता हूँ और इसे उठा कर इस पर रोदा चढ़ाने का प्रयत्न करता हूँ॥ १४ ॥

बाहमित्येव तं राजा मुनिश्च समभापत |
लीलया स धनुमध्ये जग्राह वचनान्मुनेः ॥ १५ ॥

राजा जनक और विश्वामित्र ने उनकी बात अंगीकार करते हुए कहा “बहुत अच्छा”। मुनि के वचन सुन, श्रीरामचन्द्र जी ने बिना प्रयास धनुष को बीच से पकड़ उसे उठा लिया ॥ १५ ॥

पश्यतां नृसहस्राणां वहूनां रघुनन्दनः ।
आरोपयत्स धर्मात्मा सलीलमिव तद्धनुः ॥१६॥

और हजारों मनुष्यों के सामने धारिमा श्रीरामचन्द्र जी ने विना प्रयास उस पर रोदा चढ़ा दिया ॥ १६ ॥

17.

आरोपयित्वा धर्मात्मा पूरयामास वीर्यवान् ।
तद्वभञ्ज धनुर्मध्ये नरश्रेष्ठो महायशाः ॥ १७॥

महायशस्वी पुरुषोत्तम पर्व वलवान् श्रीराम ने रोदा चढ़ाने के वाद ज्यों ही रोदे को खींचा, त्यों ही वह धनुष वीच से टूट गया। अर्थात् उस धनुष के दो टुकड़े हो गये ॥ १७ ॥

तस्य शब्दो महानासीनिर्यातसमनिःस्वनः ।।
भूमिकम्पश्च सुमहान्पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ १८ ॥

उसके टूटने का शब्द बज्रपात के समान हुआ । बड़े जोर से भूमि हिल गयी और बड़े बड़े पहाड़ फट गये ॥ १८ ॥

निपेतुश्च नराः सर्वे तेन शब्देन मोहिताः ।।
वर्जयित्वा मुनिवरं राजानं तौ च राघचौ ॥ १९ ।

18.

धनुष के टूटने के विकराल शब्द के होने पर, विश्वामित्र, राजा जनक और दोनों राजकुमारों को छोड़, सब लोग मूर्छित हो गिर पड़े ॥ १६ ॥

प्रत्याश्वस्ते जने तस्मिन्राजा विगतसाध्वसः ।
उवाच प्राञ्जलिक्यिं वाक्यज्ञो मुनिपुङ्गवम् ।। २० ॥

सब लोगों की मूर्छा भङ्ग हुई और सचेत हुए तथा राजा जनक के सब सन्देह दूर हो गये, तब राजा जनक हाथ जोड़, चतुर विश्वामित्र से कहने लगे ॥ २० ॥

भगवन्दृष्टवीर्यो मे रामो दशरथात्मजः ।
अत्यद्भुतमचिन्त्यं च न तर्कितमिदं मया ॥ २१॥

हे भगवन् ! महाराज दशरथ जो के पुत्र श्रीरामचन्द्र जी का यह अत्यन्त विस्मयोत्पादक अचिन्त्य और अतर्षित [जिसमें सन्देह करने की गुञ्जायश न हो ] पराक्रम मैंने देखा ॥ २१ ॥

जनकानां कुले कीर्तिमाहरिष्यति मे सुता।
सीता भतारमासाच रामं दशरथात्मजम् ॥ २२ ॥

19.

मेरी बेटी सीता, महाराज दशरथ जी के पुत्र श्रीरामचन्द्र जी को अपना पति बना कर मेरे वंश की कीर्ति फैलायेगी ॥ २२॥

मम सत्या प्रतिज्ञा च वीर्यशुल्केति कौशिक ।
सीता पाणवहुरता देया रामाय मे सुता ।। २३ ॥

हे कौशिक ! मैंने सीता के विवाह के लिये “वीर्यशुल्क ” की जो प्रतिज्ञा की थी वह आज पूरी हो गयो । श्रम में अपनी प्राणों से भी पढ़ कर प्यारी सीता श्रीराम को दूंगा ॥ २३ ॥

भवतोऽनुमते ब्रह्मशीघ्रं गच्छन्तु मन्त्रिणः ।
मम कौशिक भद्रं ते अयोध्यां त्वरिता रथैः ॥२४॥

हे ब्रह्मन् ! हे कौशिक ! यदि श्रापकी सम्मति हो तो मेरे मंत्री रथ पर सवार हो शीघ्र अयोध्या को जाय ॥ २४ ॥

राजानं प्रश्रितैर्वाक्यैरानयन्तु पुर मम ।
प्रदानं वीर्यशुल्कायाः कथयन्तु च सर्वशः ।। २५ ॥

20.

और महाराज दशरथ को नम्रतापूर्वक यहां का सारा हाल सुना कर, यहाँ लिवा लावें ॥ २५ ॥

मुनिगुप्तौ च काकुत्स्थो कथयन्तु नृपाय वै ।
प्रीयमाणं तु राजानमानयन्तु सुशीघ्रगाः ।। २६ ॥

और महाराज को, आपसे रक्षित, दोनों राजकुमारों का कुशल समाचार भी सुनावें और इस प्रकार महाराज को प्रसन्न कर, उन्हें प्रति शीत्र यहाँ बुला लावे ॥ २६ ॥

कौशिकश्च तथेत्याह राजा चाभाष्य मन्त्रिणः।
अयोध्यां प्रेषयामास धर्मात्मा कृतशासनान् ॥ २७॥

इस पर जब विश्वामित्र ने कह दिया कि, बहुत अच्छी बात है, तव राजा ने मंत्रियों को समझा कर और महाराज दशरथ के नाम का कुशलपत्र उन्हें दे, अयोध्या को रवाना किया ॥ २७ ॥

इति सप्तषष्टितमः सर्गः[सरसठवां सर्ग समाप्त हुआ]

21.

[वाल्मीकि रामायण] [बालकाण्ड]
[अष्टषष्टितमः सर्गः] [ अर्थात 68 सर्ग ]

जनकेन समादिष्टा दूतास्ते क्लान्तवाहनाः ।
त्रिरात्रमुषिता मार्गे तेऽयोध्यां प्राविशन्पुरीम् ॥ १ ॥

राजा जनक की आज्ञा पा दूत शीघ्रगामी रथों पर सवार हो और रास्ते में तीन रात्रि व्यतीत कर, अयोध्या में पहुँचे। उस समय उनके रथ के घोड़े थक गये थे॥१॥

राज्ञो भवनमासाद्य द्वारस्थानिदमब्रुवन् ।
शीघ्र निवेद्यतां राज्ञे दूतान्नो जनकस्य च ॥ २॥

और राजभवन की ड्योढ़ी पर जा कर द्वारपालों से यह बोले कि, जा कर तुरन्त महाराज से निवेदन करो कि, हम राजा जनक के दूत (आपके दर्शन करना चाहते ) हैं ॥२॥

वाल्मीकि रामायण के 67 सर्ग में ये दर्शाया गया है कि राजा जनक जी द्वारा सीताजी के स्वयंवर के लिए शिव जी के धनुष पर प्रत्यंचा चढाने की शर्त्त बनाये जाने पर वो जनक जी से निवेदन करते हैं कि शिव जी के उस धनुष की दिखलाया जाये।

शिव जी धनुष उस महल में नहीं रखा हुआ था । शिव जी धनुष महल से कहीं दूर मिथिला नगरी के एक यज्ञ शाला में रखा हुआ था । वो धनुष कितना विशाल और भारी होगा , इस बात का अंदाजा सर्ग 67 के श्लोक संख्या 3 और 4 से लगाया जा सकता है।

शिव जी का वो धनुष इतना भारी था कि उसे पांच हजार लोग 8 पेटी की सहायता से खींच रहे थे । जाहिर सी बात है वो साधारण धनुष कतई नहीं था । आगे की घटना क्रम में ये दर्शया गया है कि गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से शिव जी धनुष , जो कि एक पेटी में रखा हुआ था , श्रीराम जी बड़ी आसानी से हाथों में उठा लेते हैं। श्रीराम जी जैसे हीं प्रत्यंचा लगाने की कोशिश करते हैं , वो धनुष टूट जाता है ।

धनुष के टूट जाने के बाद जनक जी अति प्रसन्न हो जाते है और श्रीराम जी से अपनी पुत्री सीताजी से विवाह करने के लिए राजा दशरथ जी के पास अपना दूत भेज देते हैं। इसी के साथ 67 वां सर्ग समाप्त हो जाता है और सर्ग संख्या 68 की शुरुआत हो जाती है । फिर सर्ग संख्या 68 में जनक जी के दूत का दशरथ जी के पास जाने और फिर जनक जी के निमंत्रण पर दशरथ जी के मिथिला आने तथा श्रीराम जी और सीताजी के विवाह का वर्णन किया गया है।

जब श्रीराम जी और उनके भाइयों की शादी सीताजी और उनके बहनों के साथ हो जाती है और जब वो लोग अयोध्या की तरफ प्रस्थान कर जाते हैं तब रास्ते में लौटने के दौरान रामजी और दशरथजी का सामना परशुराम जी होता है , ना कि सीताजी के स्वयंवर स्थल पर। जिस तरह से लक्ष्मण और परशुराम जी के बीच में वार्तालाप दिखाया जाता है, उसका वर्णन भी वाल्मिकी रामायण में नहीं मिलता है। भगवान श्री परशुराम और लक्ष्मण जी के बीच वाद और विवाद का उल्लेख किसी कोरी कल्पना से कम नहीं।

इस घटना का वर्णन वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के सर्ग संख्या 75 से सर्ग संख्या 77 में किया गया है। आईये देखते हैं कि इस घटनाक्रम का वर्णन किस तरह से किया गया है ? पहले तो परशुराम जी श्रीराम जी द्वारा शिव जी के धनुष को तोड़े जाने पर प्रशंसा करते हैं फिर द्वंद्व युद्ध के लिए श्रीराम को ललकारते हैं तो स्वाभाविक रूप से दशरथ जी घबड़ाकर उनसे विनती करने लगते हैं। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के पञ्चसप्ततितमः सर्गः अर्थात 75 सर्ग के श्लोक संख्या 1 की शुरुआत परशुराम जी के इस प्रकार कहने से होती है।

22.

[वाल्मीकि रामायण] [बालकाण्ड]
[पञ्चसप्ततितमः सर्गः ] [ अर्थात 75 सर्ग ]

राम दाशरथे राम वीर्यं ते श्रूयतेऽद्भुतम् ।
धनुषो भेदनं चैव निखिलेन मया श्रुतम् ॥१॥

हे वीर राम! तुम्हारा पराक्रम अदभुत सुनाई पड़ता है। जनकपुर में तुमने जो धनुष तोड़ा है उसका सारा वृत्तान्त भी मैंने सुना है।

तदद्भुतमचिन्त्यं च भेदनं धनुपस्त्वया ।
तच्छु, त्वाऽहमनुप्राप्तो धनुर्गृह्यपरं शुभम् ॥ २ ॥

उस धनुप का तोड़ना विस्मयोत्पादक और ध्यान में न पाने योग्य बात है। उसीका वृत्तान्त सुन हम यहां पाये हैं और एक दूसरा उत्तम धनुष लेते आये हैं ॥२॥

तदिदं घोरसङ्काशं जामदग्न्यं महद्धनुः ।
पूरयस्व शरेणैव खवलं दर्शयस्य च ।। ३ ।।

यह भयङ्कर बड़ा धनुष जमदग्नि ऋषि जी का है (अथवा इस धनुष का नाम जामदग्न्य है ) इस पर रोदा चढ़ा कर और वाण चढ़ा कर, आप अपना बल मुझे दिखलाइये ॥३॥

23.

तदहं ते बालम दृष्ट्वा धनुपोऽस्य प्रपूरणे ।
द्वन्द्वयुद्धं प्रदास्यामि वीयर्याश्लाध्यमहं तव ॥ ४ ॥

इस धनुष के चढ़ाने से तुम्हारे बल को हम जान लेंगे और उसकी प्रशंसा कर हम तुम्हारे साथ द्वन्द्व युद्ध करेंगे ॥४॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राजा दशरथस्तदा।
विषण्णवदना दीनः प्राञ्जलिवाक्यमब्रवीत् ॥ ५ ॥

परशुराम जी की ये बातें सुन, महाराज दशरथ उदास हो गये और दीनतापूर्वक ( अर्थात् परशुराम की खुशामद कर के) और हाथ जोड़ कर कहने लगे ॥ ५ ॥

क्षत्ररोषात्पशान्तस्त्वं ब्राह्मणश्च महायशाः ।
बालानां मम पुत्राणामभयं दातुमर्हसि ॥६॥

हे परशुराम जी! आपका क्षत्रियों पर जो कोप था वह शान्त हो चुका, क्योंकि आप तो बड़े यशस्वी ब्राह्मण हैं। (अथवा श्राप ब्राह्मण हैं अतः क्षत्रियों जैसी गुस्सा को शान्त कीजिये, क्योंकि ब्राह्मणों को कोप करना शोभा नहीं देता) श्राप मेरे इन बालक पुत्रों को अभयदान दीजिये ॥६॥

24.

भार्गवाणां कुले जातः खाध्यायव्रतशालिनाम् ।
सहस्राक्षे प्रतिज्ञाय शस्त्रं निक्षिप्तवानसि ॥७॥

वेदपाठ में निरत रहने वाले भार्गववंश में उत्पन्न श्राप तो इन्द्र के सामने प्रतिज्ञा कर सब हथियार त्याग चुके हैं ॥ ७॥

स त्वं धर्मपरो भूत्वा कश्यपाय वसुन्धराम् । .
दत्वा वनमुपागम्य महेन्द्रकृतकेतनः ॥ ८॥

और सारी पृथिवी का राज्य कश्यप को दे, आप तो महेन्द्राचल के वन में तप करने चले गये थे ॥ ८ ॥

मम सर्वविनाशाय संप्राप्तस्त्वं महामुने। ,
न चैकस्मिन्दते रामे सर्वे जीवामहे वयम् ॥ ९ ॥

(पर हम देखते हैं कि,) आप हमारा सर्वस्व नष्ट करने के लिये (पुनः) आये हैं। (आप यह जान रखें कि, ) यदि कहीं हमारे अकेले राम ही मारे गये तो हममें से कोई भी जीता न बचेगा॥६॥

25.

सत्यवानों में श्रेष्ठ (ब्रह्मा जी ने ) उन दोनों में (अर्थात भगवान विष्णु जी और भगवान शिव जी में ) बड़ा विरोध उत्पन्न कर दिया । इस विरोध का परिणाम यह हुआ कि, उन दोनों में रोमाञ्चकारी घोर युद्ध हुआ ॥ १६ ॥

शितिकण्ठस्य विष्णाश्च परस्परजयैषिणोः।
तदा तु जृम्भितं शैवं धनुर्मीमपराक्रमम् ॥ १७ ॥ महादेव और विष्णु एक दूसरे को जीतने की इच्छा करने लगे। महादेव जी का बड़ा मज़बूत धनुष ढीला पड़ गया ॥ १७ ॥

हुकारेण महादेवस्तम्भितोऽथ त्रिलोचनः ।
देवैस्तदा समागम्य सर्पिसङ्घः सचारणैः ।। १८ ॥

तीन नेत्र वाले महादेव जी विष्णु जी के हुँकार करने ही से स्तम्भित हो गये। (अर्थात् विष्णु ने शिव को हरा दिया ) तव ऋषियों और चारणों सहित सब देवताओं ने वहाँ पहुँच कर दोनों की प्रार्थना की और युद्ध बंद करवाया ॥१८॥

26.

अधिक मेनिरे विष्णु देवाः सपिंगणास्तदा ।
धनू रुद्रस्तु संक्रुद्धो विदेहेषु महायशाः ॥ २० ॥

विष्णु के पराक्रम से शिव के धनुष को ढीला देख, ऋषियों सहित देवताओं ने विष्णु को (अथवा विष्णु के धनुष को अधिक पराक्रमी (अथवा दूढ़) समझा । महादेव जी ने इस पर कुद्ध हो, अपना धनुष विदेह देश के महायशस्वी ॥ २० ॥

देवरातस्य राजददी हस्ते ससायकम् ।
इदं च वैष्णवं राम धनुः परपुरञ्जयम् ॥२१॥

राजर्षि देवरात के हाथ में वाण सहित दे दिया । हे राम! मेरे हाथ में यह जो धनुष है, यह विष्णु का है और यह भी शत्रुओ के पुर का नाश करने वाला है ॥ २१ ॥

ऋचीके भार्गवे पदाद्विष्णुः सन्न्यासमुत्तमम् ।
ऋचीकस्तु महातेजाः पुत्रस्याप्रतिकर्मणः ॥ २२ ॥ .

27.

[वाल्मीकि रामायण] [बालकाण्ड]
[पट्सप्ततितमः सर्गः ] [ अर्थात 76 सर्ग ]

परशुराम जी के वचन सुन श्रीरामचन्द्र जी अपने पिता महाराज दशरथ के गौरव से अर्थात् अपने पिता का अदब कर के, मन्दस्वर (धीरे ) से बोले ॥१॥

श्रुतवानस्मि यत्कर्म कृतवानसि भार्गव ।
अनुरुध्यामहे ब्रह्मन्पितुरानृण्यमास्थितः ॥ २॥

हे परशुराम जी! आपने जो जो काम किये हैं, वे सब मैं सुन चुका हूँ। आपने जिस प्रकार अपने पिता के मारने वाले से बदला लिया-वह भी मुझे विदित है ॥ २॥

वीर्यहीनमिवाशक्त क्षत्रधर्मेण भार्गव ।
अवजानासि मे तेजः पश्य मेध पराक्रमम् ॥ ३॥

किन्तु आप जो यह समझते हैं कि, हम वीर्यहीन हैं, हममें क्षात्रधर्म का अभाव है, अतः आप जो हमारे तेज का निरादर करते हैं अब आप हमारा पराक्रम देखिये ॥ ३ ॥

28.

इत्युक्त्वा राघवः क्रुद्धो भार्गवस्य शरासनम् ।
शरं च प्रतिजग्राह हस्ताल्लघुपराक्रमः ॥४॥

यह कह कर और क्रोध में भर श्रीरामचन्द्र जी ने परशुराम . के हाथ से धनुष और वाण झट ले लिया ॥४॥

आरोप्य स धनू रामः शरं सज्यं चकार ह ।
जामदग्न्यं ततो रामं रामः क्रुद्धोऽब्रवीदिदम् ॥ ५॥

और धनुष पर रोदा चढ़ा कर उस पर वाण चढ़ा, जमदग्नि के पुत्र परशुराम से श्रीरामचन्द्र जी क्रुद्ध होकर यह बोले ॥५॥

ब्राह्मणोऽसीति मे पूज्यो विश्वामित्रकृतेन च ।
तस्माच्छतो न ते राम मोक्तुं प्राणहरं शरम् ॥ ६॥

परशुराम जी ! एक तो ब्राह्मण होने के कारण प्राप मेरे पूज्य है, दूसरे आप विश्वामित्र जी के नातेदार (विश्वामित्र जो की बहिन के पौत्र) है । अतः इस वाण को आपके ऊपर छोड़कर, आपके प्राण लेना मैं नहीं चाहता ॥६॥

29.

हे राम! अब आप इस अद्वितीय बाण को छोड़िये। वाण के छूटते ही मैं पर्वतोत्तम महेन्द्राचल को चला जाऊँगा ॥ २० ॥

तथा ब्रुवति रामे तु जामदग्न्ये प्रतापवान् ।
रामो दाशरथिः श्रीमांश्चिक्षेप शरमुत्तमम् ॥ २१॥ .

जब प्रतापी परशुराम ने श्रीरामचन्द्र से इस प्रकार कहा, तब दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्र ने उस उत्तम बाण को छोड़ दिया ॥२१॥

स हतान्दृश्य रामेण, स्वाँल्लोकांस्तपसाऽऽर्जितान् ।
जामदग्न्यो जगामाशु महेन्द्र पर्वतोत्तमम् ॥ २२ ॥

वाण से तप द्वारा इकट्ठे किये हुए लोकों को नष्ट हुश्रा देख, परशुराम जी तुरन्त महन्द्राचल को चले गये ॥ २२ ॥

ततो वितिमिराः सर्वा दिशश्चोपदिशस्तथा।
सुराः सर्पिगणा रामं प्रशशंसुरुदायुधम् ॥ २३॥

सब दिशाएँ और विदिशाएँ पूर्ववत् प्रकाशमान हो गयीं अर्थात् अन्धकार जो छाया हुआ था, वह दूर हो गया। ऋषि और देवता धनुष-बाण-धारो श्रीरामचन्द्र जी की प्रशंसा करने लगे ॥ २३ ॥

30.
[वाल्मीकि रामायण] [बालकाण्ड]
[सप्तसप्ततितमः सर्गः ] [ अर्थात 77 सर्ग ]

गते रामे प्रशान्तात्मा’ रामो दाशरथिर्धनुः ।
वरुणायाप्रमेयाय ददौ हस्ते ससायकम् ॥१॥

विगत क्रोध परशुराम जी के चले जाने के बाद, दशरथनन्दन श्रीराम जी ने अपने हाथ का वाण सहित वह धनुष वरुण जी को धरोहर की तरह सौंप दिया ॥१॥

अभिवाद्य ततो रामो वसिष्ठप्रमुखानृपीन् ।
पितरं विह्वलं दृष्ट्वा प्रोवाच रघुनन्दनः ।। २ ॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्र जी ने वशिष्ठ श्रादि ऋषियों को प्रणाम : किया और महाराज दशरथ को घबड़ाया हुश्रा देख उनसे बोले ॥२॥

जामदग्न्यों गतो रामः प्रयातु चतुरङ्गिणी ।
अयोध्याभिमुखी सेना त्वया नाथेन पालिता ॥ ३ ॥

परशुराम जी चले गये, अव आप अपनी चतुरहिणी सेना को अयोध्यापुरी की ओर चलने की प्राज्ञा दीजिये ॥३॥

सर्ग संख्या 75-77 में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार परशुराम जी की बात सुनकर दशरथ जी परशुराम जी याद दिलाते हैं कि किस तरह से उन्होंने इंद्र के सामने उन्होंने अस्त्र और शस्त्र का समर्पण कर हिमालय में तप करने के लिए प्रस्थान किया था। परंतु इसके प्रतिउत्तर में परशुराम स्वयं के हाथ में लिए हुए विष्णु जी के धनुष को दिखाते हुए राम जी को चुनौती देते हैं कि श्रीराम जी शिवजी के धनुष को तो तोड़ दिया, अब जरा इस विष्णु जी के धनुष पर प्रत्यंचा लगा कर दिखलाएं। अगर श्रीराम जी ऐसा करने में सक्षम हो जाते हैं तो परशुराम जी श्रीराम जी से द्वंद्व युद्ध करेंगे।

परशुराम जी आगे बताते है कि एक बार ब्रह्मा जी की माया से शिवजी और विष्णु जी के बीच अपने अपने धनुष को श्रेष्ठ साबित करने के लिए युद्ध हुआ था जिसमे शिवजी हार गए थे। इस बात पर शिवजी ने खिन्न होकर अपने धनुष का त्याग कर दिया था। ये वो ही शिव जी का धनुष था जी जनक जी के पास था और जिसे राम जी ने तोड़ दिया था।

परशुराम जी के हाथ में विष्णु जी का वो हीं विष्णु जी का धनुष था। विष्णु जी के धनुष को दिखला कर वो राम जी को उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने और द्वंद्व युद्ध को ललकारने लगे। परशुराम जी से डरकर और राम जी के प्रति अपने पुत्र प्रेम के कारण दशरथ जी परशुराम जी शांत करने के अनगिनत प्रयास करते हैं। जब दशरथ जी के लाख समझाने बुझाने के बाद भी परशुराम जी नहीं मानते तब श्रीराम प्रभु अति क्रुद्ध हो जाते हैं।

वाल्मिकी रामायण में आगे वर्णन है कि परशुराम जी के शांत नहीं होने पर भगवान श्रीराम अत्यंत क्रुद्ध हो जाते हैं और परशुराम जी के ललकारने पर उनके द्वारा लाए गए भगवान विष्णु के धनुष को अपने हाथ में लेकर परशुराम जी द्वारा स्वयं के तपोबल से अर्पित किए गए लोकों को नष्ट कर देते हैं। श्रीराम जी का पराक्रम देख कर सारे लोग श्रीराम जी प्रशंसा करने लगते है। अंत में परशुराम जी के पास भगवान श्रीराम जी के हाथों पराजित होकर उनको पहचान जाते हैं और उनकी प्रशंसा करते हुए हिमालय की ओर लौट जाने का वर्णन आता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि सीताजी के स्वयंवर स्थल पर ना तो कभी रावण हीं आया था और ना हीं कभी भगवान श्री परशुराम जी और ना हीं कभी भगवान परशुराम जी और लक्ष्मण जी के बीच कोई वाद या विवाद हुआ था। इन तीनो घटनाओं का वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में कोई भी जिक्र नहीं है ।

अगर संवाद हुआ भी था तो भगवान परशुराम और राजा दशरथ के बीच।अगर विवाद हुआ भी था तो भगवान श्रीराम और भगवान परशुराम जी के बीच और वो भी शादी संपन्न हो जाने के बाद , जब श्रीराम जी मिथिला से अपनी नगरी अयोध्या को लौट रहे थे। बाकी सारी घटनाएं किसी कवि के मन की कोरी कल्पना की उपज मात्र नहीं तो और क्या है?

My Blog List

Followers

Total Pageviews