इला और बृहन्नला: पुरुष जो स्त्री भी थे
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि महाभारत के सबसे महान योद्धा—पांडव और कौरव—एक ऐसे राजा के वंशज हैं, जिसने पुरुष और स्त्री दोनों रूपों में सांस ली? एक राजा जो सुबह शिकार का सिंहनाद करता था, दोपहर तक एक सुंदर स्त्री बनकर प्रेम की आग में जलने लगा, और उसी प्रेम से चंद्रवंश की नींव पड़ी?
यह कथा नहीं, एक रहस्यमयी यात्रा है—लिंग भेद के मिटने की, दैवी शाप, अंधे प्रेम और भाग्य के चक्र की।
महाभारत (विशेष रूप से आदि पर्व) की विशाल वंशावलियों में महान राजवंशों की उत्पत्ति मानव जाति के पूर्वजों से जोड़ी गई है। इनमें राजा इला – जिन्हें इला (स्त्री रूप) और सुद्युम्न (पुरुष रूप) के नाम से जाना जाता है – एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं। उनका असाधारण जीवन, जिसमें लिंग परिवर्तन हुआ, सूर्यवंश और चंद्रवंश के बीच सेतु का कार्य करता है। इला को चंद्रवंशी (लूनर) वंश के मुख्य पूर्वज के रूप में सम्मान दिया जाता है, जिससे पांडव और कौरव अंततः निकलते हैं।
महाभारत में यह कथा संक्षेप में वर्णित है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इला पुरूरवा के माता-पिता दोनों थे। लेकिन पूरी कथा, पुराणों (जैसे भागवत पुराण, लिंग पुराण, विष्णु पुराण) और रामायण आदि से ली गई है, जो दिव्य इच्छा, शाप, प्रेम और भाग्य की गहरी कहानी प्रस्तुत करती है।
जन्म और पहला रूपांतरण
प्राचीन काल में, जब सृष्टि के बाद मानव जाति का पुनर्निर्माण हो रहा था, तब वैवस्वत मनु – सातवें मनु और महाप्रलय के उत्तरजीवी – इस पृथ्वी के जनक बने। उनकी पत्नी श्रद्धा के साथ उन्होंने पुत्र प्राप्ति की कामना की। मनु ने मित्र और वरुण देवताओं के लिए एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। किंतु श्रद्धा गुप्त रूप से पुत्री चाहती थीं। उन्होंने यज्ञ के पुरोहित से मंत्रों में सूक्ष्म परिवर्तन करवा दिया। यज्ञ समाप्त हुआ तो एक अत्यंत सुंदर कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम इला रखा गया।
मनु बहुत निराश हुए। उन्होंने अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ (कुछ कथाओं में सीधे भगवान विष्णु/नारायण से प्रार्थना की) से सहायता मांगी। मनु की भक्ति और वशिष्ठ की तपस्या से प्रभावित होकर दिव्य वरदान मिला: कन्या इला को एक सुंदर युवा राजकुमार सुद्युम्न में बदल दिया गया। इस प्रकार, जो बच्चा पुत्री के रूप में जन्मा था, वह पुत्र बन गया। सुद्युम्न एक गुणवान, वीर और धर्मनिष्ठ राजा के रूप में बड़े हुए – वे बह्लिक (या बहली) क्षेत्र के राजा कहे जाते हैं – जिनकी बुद्धिमत्ता, पराक्रम और धर्म के प्रति समर्पण की ख्याति थी।
भाग्यशाली शिकार और पवित्र वन का शाप
एक दिन राजा सुद्युम्न अपने मंत्रियों और अनुचरों के साथ शिकार के लिए निकले। वे सिंधु क्षेत्र के एक अच्छे घोड़े पर सवार होकर उत्तरी जंगलों में गहरी सैर पर निकले। अनजाने में वे भगवान शिव और पार्वती के निजी पवित्र शरवन (या सुकुमार) वन में प्रवेश कर गए।
उस समय शिव और पार्वती वन में घनिष्ठता से रह रहे थे। अपनी एकांतता की रक्षा के लिए (पहले कुछ ऋषियों द्वारा व्यवधान के बाद) शिव ने शाप दिया था कि कोई भी पुरुष इस वन में प्रवेश करेगा तो वह तुरंत स्त्री में बदल जाएगा। शाप तुरंत लागू हो गया। सुद्युम्न और उनके सभी पुरुष साथी स्त्रियों में बदल गए। एक शक्तिशाली राजा अब एक अत्यंत सुंदर स्त्री के रूप में थे, जिन्हें उन्होंने इला नाम दिया। इस रूप में राज्य में लौटना असंभव था, इसलिए इला अपने अनुचरों (जो अब स्त्रियाँ थीं) के साथ वन में भटकती रहीं।
बुध के साथ दिव्य प्रेम और पुरूरवा का जन्म
वन में भटकते हुए इला को बुध (ग्रह बुध) मिले, जो चंद्रमा (सोम) और उनकी पत्नी तारा के पुत्र थे। बुध तपस्या कर रहे थे और एक योग्य जीवनसाथी की खोज में थे। इला की दिव्य सुंदरता और गरिमा देखकर वे मुग्ध हो गए। उन्होंने सौम्यता से इला से संपर्क किया और इला ने भी (कुछ संस्करणों में अपना पूर्व पुरुष रूप भूलकर या त्यागकर) उनका प्रेम स्वीकार कर लिया। उनका विवाह हुआ और समयानुसार इला ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम पुरूरवा रखा गया।
पुरूरवा बड़े होते-होते अत्यंत तेजस्वी, दानशील, यजमान, ब्रह्मवादी, सत्यवादी और पराक्रमी राजा बन गए। उनके शासन में तीनों लोकों में कीर्ति फैली। इंद्र की सभा में नारद मुनि अक्सर पुरूरवा के रूप, गुण, उदारता, शील, धन और वीरता का गान करते थे।
एक दिन नारद मुनि के मुख से पुरूरवा की प्रशंसा सुनकर स्वर्ग की सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी कामातुर हो गई। वह पृथ्वी पर आई और पुरूरवा से मिली। पुरूरवा उर्वशी की दिव्य सुंदरता देखकर मुग्ध हो गए। उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा। उर्वशी ने स्वीकार किया, किंतु तीन कठोर शर्तें रखीं:
- मेरी दो प्रिय भेड़ों (या मेमनों) की हमेशा रक्षा करनी होगी। इनके बिना मैं एक क्षण भी नहीं रह सकती।
- मेरा आहार केवल घी (घृत) होगा।
- तुम कभी भी मेरे सामने निर्वस्त्र (नग्न) नहीं दिखोगे (सहवास के समय को छोड़कर)।
पुरूरवा ने सभी शर्तें मान लीं। दोनों घनों, पर्वतों, नदियों और रमणीय स्थानों पर विहार करते रहे। उर्वशी ने स्वर्ग का सुख भुला दिया। वे कई वर्ष (कुछ कथाओं में चार वर्ष या अधिक) सुखपूर्वक साथ रहे।
किंतु देवराज इंद्र को यह प्रेम पसंद नहीं था। कुछ कथाओं में गंधर्वों ने रात्रि में उर्वशी की भेड़ों को चुरा लिया। भेड़ों की चीख सुनकर पुरूरवा तुरंत बाहर दौड़े। वे निर्वस्त्र थे। बिजली चमकी (या गंधर्वों की माया से) और उर्वशी ने उन्हें नग्न देख लिया। शर्त टूटते ही उर्वशी स्वर्ग लौट गईं।
पुरूरवा उन्मत्त होकर पृथ्वी पर भटकने लगे। विरह की पीड़ा में वे रोते-चिल्लाते, “तुम मेरी प्राणवायु हो, शरीर में आत्मा और मुख में वाणी की तरह मेरे साथ रहो” – जैसा ऋग्वेद (१०.९५) के प्रसिद्ध संवाद सूक्त में वर्णित है। वे पागलों की तरह उर्वशी की खोज में घूमते रहे।
अंततः पुरूरवा ने तपस्या, यज्ञ और व्रत किए। वे कुरुक्षेत्र के सरस्वती नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ उर्वशी उनसे मिलीं। दोनों में ऋग्वेद का अमर संवाद हुआ। उर्वशी ने कहा, “स्त्रियाँ निष्ठुर होती हैं, मृत्यु से जुड़ी हैं, किंतु तुम्हारे प्रेम पर दया करके मैं आ गई हूँ। अब हम वर्ष में केवल एक रात ही साथ रहेंगे।”
इस मिलन से पुरूरवा को छह पुत्र हुए – आयु (आयुष), श्रुतायु, अमावसु, विश्वायु, शतायु और नरायु। आयु सबसे प्रसिद्ध हुए। पुरूरवा ने उर्वशी के विरह में तीन प्रकार की अग्नियाँ (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि) प्राप्त कीं। इन्हीं से अक्षिहोत्र यज्ञ की परंपरा चली। उन्होंने धर्म का पालन किया, यद्यपि कुछ समय मोहवश अनाचार भी हुआ, पर अंत में वैराग्य प्राप्त कर स्वर्ग सिधारे।
पुरूरवा के वंशज
आयु → नहुष → ययाति → पुरु (पुरु वंश) → भरत (भारतवर्ष के नामदाता) → कुरु (कुरुक्षेत्र के नामदाता) → शांतनु → पांडु → पांडव।
शाप का समाधान और वैकल्पिक जीवन
अपने पुरुष रूप को स्थायी रूप से खो देने से व्यथित इला (वशिष्ठ की सहायता से) भगवान शिव से प्रार्थना करने लगीं। पार्वती ने करुणा दिखाते हुए मध्यस्थता की। शिव ने शाप को संशोधित कर दिया: सुद्युम्न/इला अब पुरुष और स्त्री रूप में बारी-बारी से रहेंगे – सामान्यतः एक माह पुरुष (सुद्युम्न) और एक माह स्त्री (इला)। कुछ कथाओं में यह चक्र एक निश्चित समय तक चला।
जब सुद्युम्न पुरुष रूप में होते, वे राज्य लौटकर बुद्धिमत्ता से शासन करते और तीन अतिरिक्त पुत्रों को जन्म देते: उत्कल, गया और विनताश्व (कुछ ग्रंथों में हरिताश्व)। इन पुत्रों को राज्य के विभिन्न हिस्से दिए गए। इला के रूप में वे बुध के साथ अपना जीवन बिताती रहीं। यह द्वैत अस्तित्व पहचान की तरलता और विपरीत तत्वों के सामंजस्य का प्रतीक था। अंततः पृथ्वी के कर्तव्यों को पूरा करने के बाद सुद्युम्न/इला ने राज्य त्याग दिया या स्वर्गारोहण किया, और पुरूरवा ने चंद्रवंश को आगे बढ़ाया।
इस प्रकार राजा इला (सुद्युम्न) की यह कथा चंद्रवंशी वंश की नींव बनी। इला ने पुरूरवा को जन्म देकर और पुरूरवा ने अपने वंशजों के माध्यम से महाभारत के महान युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। यह कथा लिंग की तरलता, प्रेम की तीव्रता, शर्तों की महत्ता, विरह की पीड़ा, दैवी नियमों और भाग्य के समर्पण का अनुपम उदाहरण है।
महाभारत (आदि पर्व, वंशावली भाग) में इस कथा को राजकीय वंशावलियों में संक्षिप्त रूप से शामिल किया गया है, जिसमें इला की अनोखी भूमिका को रेखांकित किया गया है कि वे पुरूरवा के माता-पिता दोनों थे। इससे सूर्यवंश (इला के भाई इक्ष्वाकु के माध्यम से) और चंद्रवंश की परस्पर जुड़ी उत्पत्ति स्पष्ट होती है। यह कथा धर्म, दिव्य हस्तक्षेप, वरदान-शाप की शक्ति और भाग्य को स्वीकार करने जैसे विषयों को दर्शाती है – जो पूरे महाकाव्य में प्रतिध्वनित होते हैं।
हिंदू परंपरा में इला को वाणी और समृद्धि की देवी के रूप में भी पूजा जाता है (वैदिक देवता इडा से संबंधित)। इला/सुद्युम्न की कहानी विश्व की पौराणिक कथाओं में लिंग तरलता की प्राचीनतम दर्ज कहानियों में से एक है। यह अनुकूलनशीलता, मनुष्य की सीमाओं और विपरीत तत्वों के सामंजस्य से महान वंश उत्पन्न होने का संदेश देती है।
पुरूरवा और पुरु वंश के माध्यम से इला का रक्त पांडवों की नसों में बहता है – जिससे यह लिंग-परिवर्तन करने वाले राजा महाकाव्य के नायकों के लिए मंच तैयार करने वाले प्राचीन पूर्वज बन जाते हैं।
राजा इला और पुरूरवा की इस प्राचीन कथा का असर पांडवों के जीवन पर न केवल वंशानुगत (biological) रूप से पड़ा, बल्कि सांकेतिक और कर्माश्रित (karmic) रूप से भी इसके गहरे अर्थ निकलते हैं।
इला के पुत्र पुरूरवा और अप्सरा उर्वशी का प्रेम संबंध इस वंश की नींव था। सदियों बाद, जब अर्जुन स्वर्ग गए, तो उर्वशी उन पर मोहित हो गई।
अर्जुन ने उर्वशी को 'माता' कहकर संबोधित किया क्योंकि वह उनके वंश की पूर्वज (पुरूरवा की पत्नी) थीं। इससे क्रोधित होकर उर्वशी ने अर्जुन को नपुंसक होने का शाप दिया।
यहीं इला की कहानी का प्रभाव दिखता है। जिस प्रकार उनके पूर्वज इला को स्त्री बनना पड़ा था, उसी शाप के कारण अर्जुन को एक वर्ष के अज्ञातवास में 'बृहन्नला' (एक नपुंसक/नर्तकी) बनकर रहना पड़ा। यह उनके रक्त में छिपी 'लिंग की तरलता' का एक पुनरावृत्ति जैसा था।
राजा इला की तरह, जिन्होंने स्त्री और पुरुष दोनों भावों को जिया, अर्जुन ने भी यह सीखा कि सृजन (Art) उतना ही महत्वपूर्ण है जितना संहार (War)। एक 'पूर्ण पुरुष' वही है जिसके भीतर कोमलता और कठोरता का सही संतुलन हो।
जैसे राजा इला ने 'माता' और 'पिता' दोनों का अनुभव किया, अर्जुन ने भी राजप्रासाद के अंतःपुर (Queens' quarters) में रहकर वह दुनिया देखी जो एक पुरुष योद्धा कभी नहीं देख पाता। इसने उन्हें भविष्य के धर्मराज (युधिष्ठिर) का सबसे संवेदनशील सहायक बनाया।
उर्वशी, जिसने अर्जुन को शाप दिया था, वह स्वयं इला के पुत्र पुरूरवा की पत्नी थी। यह शाप वास्तव में एक 'वंशानुगत चक्र' (Cyclic Pattern) था। प्रकृति शायद अर्जुन को यह याद दिलाना चाहती थी कि जिस वंश का उदय ही लिंग की सीमाओं को लांघकर हुआ है, उसका सर्वश्रेष्ठ नायक भी उन सीमाओं से परे होना चाहिए।
तकनीकी रूप से वह उर्वशी का 'शाप' था, लेकिन आध्यात्मिक रूप से वह अर्जुन का 'दीक्षा काल' था। बृहन्नला बनकर अर्जुन ने वह सीखा जो द्रोणाचार्य के आश्रम में नहीं सीखा जा सकता था—विनम्रता, कला, और स्वयं को शून्य कर लेने की शक्ति।
बिना बृहन्नला बने, शायद अर्जुन कभी वह 'नारायण' के सखा नहीं बन पाते जो 'विश्वरूप दर्शन' को झेलने का साहस रख सके, क्योंकि विश्वरूप में भी तो पुरुष और स्त्री दोनों ही समाहित हैं।