Tuesday, October 27, 2026

कितना छोटा हूँ मैं

मैं ,मेरा घर ,
मेरा छोटा सा घर
एक छोटे से गाँव में।

और गाँव,
मेरा गाँव,
एक शहर के पास।

और शहर,
मेरा शहर,
वो छोटा सा शहर,
जहाँ हजारों चेहरे,
लाखों कहानियाँ,
अनगिनत सपने,
मिलते हैं,
बिछड़ते हैं,
एक राज्य में।

और राज्य,
मेरा राज्य,
मेरा छोटा सा राज्य,
जिसके भीतर
नदियाँ बहती हैं,
पर्वत खड़े हैं,
मैदान फैले हैं,
वन साँस लेते हैं,
करोड़ों मनुष्य
मेरे इस देश में।

और देश,
मेरा देश,
मेरा प्यारा देश,
जिसकी मिट्टी में
किसी का बचपन है,
किसी की जवानी है,
किसी का बुढ़ापा है,
किसी के सपने हैं।

ऐसे सैंकड़ों देश,
ऐसे अनेक देश,
ऐसे अनगिनत देश,
इस धरती पर।

और धरती,
ये धरती,
मेरी प्यारी धरती,
मेरी छोटी सी धरती,
घूमती है गोल-गोल,
सूरज के चारों ओर,
अन्य ग्रहों के साथ।

और सूरज,
मेरा सूरज,
मेरा प्यारा सूरज,
वह घूमता है,
चलता है,
अपनी गति में,
अपने ग्रहों के साथ,
एक विशाल आकाशगंगा में।

और आकाशगंगा,
मेरी आकाशगंगा,
वो विशाल आकाशगंगा,
जहाँ ब्लैक होल्स,
हजारों ब्लैक होल्स,
करोड़ों ब्लैक होल्स,
अनगिनत ब्लैक होल्स,
जहाँ हजारों तारे,
करोड़ों तारे,
अरबों तारे,
अनगिनत तारे।

जिसमें तारे
जन्म लेते हैं,
बड़े होते हैं,
जलते हैं,
बुझते हैं,
मिटते हैं

और ऐसी आकाशगंगा,
हजारों आकाशगंगा,
करोड़ों आकाशगंगा,
अरबों आकाशगंगा,
खरबों आकाशगंगा
अनगिनत आकाशगंगा।

कोई बन रही है,
कोई बिगड़ रही है,
कोई घूम रही है,
कोई टकरा रही है,
कोई जन्म ले रही है,

और इनके बीच
मेरा सूरज
एक छोटा सा तारा

और उसके भीतर
मेरी धरती
एक छोटा सा ग्रह।

और उस धरती पर
मेरा देश
एक छोटा भूभाग

और उस देश में
मेरा राज्य।

राज्य में
मेरा शहर।

शहर के पास
मेरा गाँव।

उस गाँव में
मेरा घर।

और उस घर में
मैं।

कितना छोटा हूँ 
मैं

Monday, October 26, 2026

मोबाइल में बसते प्राण

मैं ना बालक एक शैतान, 

इतनी सी विनती भगवान, 

एक वीक की छुट्टी मिल जाए, 

जो मुझको हो जाए जुकाम।


स्कूल की बस जब आए, 

मेरा दिल तब खूब घबराए, 

जूता एक मिले बिस्तर पर, 

दूजा जाने कहाँ छुपाए!


बैग मेरा इतना है भारी, 

जैसे ईंटें भर दी सारी, 

किताबों के नीचे दबकर, 

रोती रहती पीठ बेचारी!


होमवर्क का नाम जो आए, 

नींद मुझे झटपट आ जाए, 

पेंसिल ढूँढ़ूँ आधे घंटे, 

फिर कॉपी ही मिल ना पाए!


गणित की जब घंटी बजती, 

मेरी धड़कन तेज़ है चलती, 

मैडम पूछें, “दो दूनी कितने?” 

अक्ल मेरी छुट्टी पर रहती!


मम्मी बोले, “पढ़ ले बेटा,” 

मैं कहता पढ़ता हूँ गणित!” 

मोबाइल लेकर बैठूँ मैं, 

जैसे दुनिया का हूँ पंडित!


पापा पूछें, “नंबर कितने?” 

मैं कह दूँ, “बस पास हो जितने!” 

मार्कशीट जब सामने आए, 

पापा पूछें, “ये तो ईतने?”


रील बनाऊँ, गेम चलाऊँ, 

खुद को हीरो खूब बताऊँ, 

पढ़ने का जब समय हो जाए, 

वाई-फाई को दोष लगाऊँ!


दूध देख के उल्टी आती, 

भिंडी भी है बहुत सताती, 

खाने की भी चीज़ है कोई, 

बैंगन, कटहल, लौकी-भाजी।


मैगी, बर्गर, गरम समोसे, 

छोले-कुलचे, इडली-डोसे, 

दूध-मलाई, मक्खन, हलवा, 

दादी भर-भर नरम पड़ोसे।


मम्मी-पापा खुश हो जाएँ, 

मेरे नंबर सब बढ़ जाएँ, 

बिना पढ़े टॉपर बन जाऊँ, 

टीचर ताली खूब बजाएँ!


पर भगवन ने आँख दिखाई, 

बोल अक्ल है कहाँ गँवाई? 

छुट्टी, मैगी  ठीक ठाक पर 

करनी होगी खूब पढ़ाई!”


मैं बोला, “प्रभु, बात है सच्ची, 

मेरी नीयत थोड़ी है कच्ची, 

पढ़ भी लूँगा, खेल भी लूँगा, 

बस छुट्टी हो थोड़ी अच्छी!”


मैं ना बालक एक शैतान, 

नटखटपन मेरी पहचान, 

पढ़ाई हो पर थोड़ी सी

मोबाइल में बसते प्राण

Sunday, October 25, 2026

ना जाने किस घाट घुमाया


[INTRO — Funny Female Duo, Finger Snapping, Light Dholak, Mischievous Laughter, Spoken-Singing]

[VOICE 1 — SAAS, Old Indian Lady Dramatic and Curious Vocal]

पंडित जी ने क्या समझाया

[VOICE 2 — BAHURANI, Young Indian Naughtly Vocal ]

ना जाने क्या पाठ पढ़ाया 

[DUAL VOCALS — Playful Echo]

कौन ज्ञान था कैसी घुटी

सासूजी का दिल भर आया

[COMIC ECHO]

दिल भर आया... आया... आया!

[VERSE 1 — SAAS Old Lday VOCAL, Sweet and Suspicious, Hand Snaps on Every Second Beat]

[Bridge]

दिल भर आया बोली रानी

तुझको है एक बात बतानी

क्यों सहमी सी डरती रहती

बात है ऐसी क्यों बहुरानी

[VOICE 2 — SAAS Old Lady Vocal]

ससुराल भी नईहर जैसा

फिर तेरे मन ये डर कैसा

मेरा तो कुछ दिन का डेरा

ये घर तो बस तेरा तेरा

[PRE-CHORUS — SAAS, Old Lady Vocal , Emotional Overacting, Harmonium Rising]

पंडित जी सच ही कहते हैं

जो बहू को बेटी कहते हैं

वहीं स्वर्ग है इस धरती पे

वहीं स्वर्ग से सुख मिलते हैं

[CHORUS — BOTH FEMALE VOCALS, Catchy Folk Melody, Dholak and Claps, Finger Snaps, Call and Response]

[Bridge]

[VOICE 1 — SAAS, Old Lady Vocal, Proudly]

बस मुझको इतना ही कहना

[VOICE 2 — SAAS, Old Lady Vocal]

तू ही तो मेरे दिल का गहना

जो इच्छा हो मुझे बताओ

बहुरानी बेटी बन जाओ

[DUAL VOCALS — BIG COMIC HOOK, Rhythmic Snapping]

बेटी बन जाओ! — [ECHO: बन जाओ!]

बेटी बन जाओ! — [ECHO: बन जाओ!]

[COMIC PAUSE]

अरे, आगे सुनो... असली कहानी अब शुरू!

[VERSE 2 — BAHURANI, Sweet Storytelling, Playful Tabla and Snaps]

[Bridge]

सासू मां की बात जान के

उनके मन के राज जान के

बहुरानी समझी घर अपना

बोली उनको मां मान के

[VOICE 2 — BAHURANI, Innocent Request Eco]

[Bridge]

बहु बोली ओ सासू अम्मा

ये सब करती मेरी मम्मा

अम्माजी ना मुझे जगाएँ

सुबहो सुबहो ना उठाएँ

नींद घोर सुबहो आती है

रोज रोज यूँ ना चिल्लाएँ

[VOICE 1 — SAAS, Confused Reaction]

सासू बोली अच्छा जी... [ECHO: अच्छा जी?]

बेटी बनी कि बच्चा जी

[COMIC SOUND: RECORD SCRATCH]

[VERSE 3 — BAHURANI, Extra Sweet and Dramatic]

[Bridge]

बहु बोली मेरी माँ करती थी 

जो जो भी कुछ मैं कहती थी

मैं जब नैहर में रहती थी

मम्मी से सब कह देती थी

उठकर मम्मी चाय पिलाती

पैर दर्द तब पैर दबाती

[VOICE 2 — BAHURANI, Demanding Like a Princess, Hand Snaps]

बोली अम्मा चाय बनाओ

रोज उठकर मुझे पिलाओ

जब सर थोड़ा भारी लगता

हौले हौले उसे दबाओ

[COMIC ECHO]

चाय बनाओ! — [ECHO: बनाओ!]

पैर दबाओ! — [ECHO: दबाओ!]

[VERSE 4 — BAHURANI, Secretive Whisper Turning into Comedy]

[Bridge]

पैसा रखा बचा बचा के

पापाजी से छुपा छुपा के

बनवा दो मुझको तुम गहना

अम्माजी बस इतना कहना

[VOICE 1 — SAAS, Nervous Laugh, Throat Clearing]

अम्माजी थोड़ी सकपकाईं

थोड़ी मुस्काईं, गला खँखाराईं

बोली बेटी पंडित बोले

पर तेरी कोई राज न खोले

[BRIDGE]

बेटी तुम हो, ये सब माना

पर घर ना कोई होटलखाना

थोड़ी बहू, थोड़ी बेटी

थोड़ा काम करके सो जाना

[VOICE 1 — SAAS, Building Confidence]

नैहर जैसा अधिकार मिलेगा

पर परि श्रम से प्यार मिलेगा

काम बाँट लो मेरे संग तुम

फिर हर दिन त्योहार लगेगा

[DUAL VOCALS — HARMONY, OPTIMISTIC BUILD]

काम भी होगा! — [ECHO: होगा!]

प्यार भी होगा! — [ECHO: होगा!]

फिर घर में त्योहार हीं होगा

[COMIC PAUSE — BAHURANI CLEARS THROAT]

[Bridge]

[VERSE 5 — BAHURANI, Suddenly Bossy, Fast Comic Delivery, Dholak Accelerates]

बहू बोली — ठीक है अम्मा

पहले कपड़े धो दो अम्मा

खीर बनाऊँगी मैं पर पहले

मोतीचूर लड्डू खाऊँ अम्मा

[VOICE 1 — SAAS, SHOCKED WHISPER]

हे भगवान! [ECHO: हे भगवान! हे भगवान!]

मेरी बहु बड़ी शैतान

[FINAL CHORUS ]

[VOICE 2 — BAHURANI, Proudly]

बहु बोली अम्मा मैं नादान

इन बातों का रखती ध्यान

आधा आधा काम बांट लूँ 

तेरी सारी बात मान लूँ 

बहु निकली बड़ी सायानी

फिर की उसने खूब शैतानी

[VOICE 2 — BAHURANI, Smiling and Firm]

मेरा काम हो काम बताना

तुमको अम्मा सब कर जाना

[DUAL VOCALS — BIG FUNNY HOOK, Rhythmic Finger Snaps and Group Claps]

मेरा काम है काम बताना

[VOICE 1 — SAAS, ECHO]

काम बताना... काम बताना...

[VOICE 2 — BAHURANI]

अम्माजी तुमको कर जाना

[VOICE 1 — ECHO]

सब करना... सब करना...

[OUTRO — Dholak Stops, Finger Snaps Only, Both Women Speak-Sing]

[VOICE 1 — SAAS]

सासू बोली कब समझाया

पंडित जी ने ये कब बताया

[VOICE 2 — BAHURANI, Innocently]

बहु बोली जो समझ में आया

अम्मा वो ही है बतलाया

[DUAL VOCALS — LAUGHING, FINAL SNAP]

सास-बहू का ये बँटवारा

सबसे बड़ा हुआ घोटाला

[COMIC LAUGHTER — ECHO FADES OUT]

Thursday, October 22, 2026

जीवन की आपा धापी में

 

जीवन के थपेड़ो और झंझावातों से लड़ते और बिखरते आदमी के लिए बचपन की सुनहली यादें किसी स्वप्नवत मीठी दवाई के जैसी होती है , जो मिल तो नहीं सकती परन्तु इसकी यादगारी हीं चित्त को ठंडक पहुँचाने के लिए काफी होती हैं ।

  

थकने लगा रातों को सोते

जाग-जाग कर मैं।

 

जीवन की आपा धापी में

भाग भाग कर मैं।

 

वो तितली का पंख पकड़ना

आने लगा है याद,

 

वो चॉकलेट के लिए मैं

कैसे करता था फरियाद।

 

वो हृदय को कम्पित

करते थे कैसे गुब्बारे,

 

वैसा विस्मय कहाँ है

संभव कैसे भी हो नजारे।

 

वो चंदा मामा की रातें,

दादी की परियों की बातें ,

 

इंद्रधनुष पे विस्मित होना,

जब भी होती थी बरसातें।

 

काश कोई लेके चलता

मुझको बचपन की छाँव,

 

वो आम गुठली की सीटी

और कागज की नाव।

 

कि जामुन के पेड़ बैठ फिर

मन भर जामुन लाता,

 

माता के हाथों से चावल

भाग-भाग फिर खाता।

सत तप का आचार बढा कर

 

कवि के मन में उन पुरुषार्थी व्यक्तियों के प्रति असीम श्रद्धा है जो आजीवन सत्यानुसंधान  में प्रयासरत रहते हैं। ऐसे व्यक्ति , जिनकी संगति से सुवास प्रतिफलित होता है । ऐसे व्यक्ति जो दुनिया के तमाम झंझावातों को झेलकर अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहते हैं । इस तरह के व्यक्तियों से कवि की आत्मा प्रेरित होती है ।  कवि के लिए ऐसे तपस्वी जन श्रद्धेय हैं । इस कविता के द्वारा , कवि अपनी श्रद्धा सुमन इन तपस्वियों, ईश पथगामियों के चरण को समर्पित करता है ।


सत तप का आचार बढा कर,मन  संचित विकार घटा  कर,

ज्ञान  लाभ जन  सत्वर करते ,शोध परम  रत तत्तपर  रहते।

उनको हीं नमन  हम करते, उनको हीं इस जग में वरते।


क्रोध-काम के पार जो रहते,साक्षी बन संसार को लखते, ,

चित्त में अहंकार न पलता, समता का है दीपक जलता।

शुभ भावों की माला धारे, पीते प्रभु  के अमृत प्याले,

क्षमा दया करुणा हित गामी , शक्ति पुंज अतुलित हैं ज्ञानी,

जग की पीड़ा स्वयं सहें जो,दुखियों के आँसू हर लें जो।

संचित ना करते जो तिनके ,मोह-मुक्त जीवन पथ चलते।

उनको हीं नमन हम करते, उनको हीं इस जग में वरते।


ज्ञान दीप ले हर घर घर पर,जग से घन तम को हर हर कर,

दुःख पीड़ा इस जग के सह कर,जाने जग माया में बह कर।

माया सत का व्यव्हार नहीं है ,जग का किंचित सार नहीं है ,

पग   पग  में  निस्सार  महीं  है, ईश्वर का विस्तार नहीं  है।

जैसे जल के ऊपर तल पर ,पंक तल से निकल निकल कर।

इनके डग डग जग में यूँ रहते,जग का हो जग  के  ना  होते,

उनको हीं नमन  हम करते, उनको हीं इस जग में वरते।


ध्यान योग की जली ज्योत है ,चिरानंद की विपुल श्रोत हैं ,

सत्य-शोध के नित्य अनुरागी,द्वेष-रहित, निष्काम वैरागी।

प्रेम की  जिनसे  विणा बहती ,ज्ञान सुधा जग मग जग करती।

सत्य-सार का मंथन करते,नश्वर में अनश्वर चखते,

क्षणभंगुर संसार के भीतर,शाश्वत सत्ता का पथ वरते ।

उनके हीं पग कविता  धरते  ,उनके ही डग  कविता रचते ।

उनको हीं नमन  हम करते, अमिताभ उनको हीं हम वरते।

वैसा हीं निदान रहे

किस राह के अनुरागी हो ,

देहासक्त या कि त्यागी हो?

जीवन का क्या परंतु हो

मरण का क्या हेतु हो। 

चित्त में पर इसका भान हो ,

ना कोई अभिमान हो।

किंचित कोई परिणाम हो किंचित कोई परिणाम।

जीवन में रहे ध्यान हाँ जीवन में रहे ध्यान।


है प्रयास में अणुता तो क्या,

ना राह में ऋजुता तो क्या?

प्रभु की अभिलाषा में किंतु ,

ना हो लघुता ध्यान ,जीवन में रहे ध्यान हाँ जीवन में रहे ध्यान।चाहे कोई परिणाम हो चाहे कोई परिणाम।


कितनी प्रज्ञा धूमिल हुई है ?

अंतर्संज्ञा घूर्मिल हुई है ?

अंतर पथ अवरोध पड़ा ,

क्या हो किंतु अनुमान ,जीवन में रहे ध्यान हाँ जीवन में रहे ध्यान।

चाहे कोई परिणाम हो चाहे कोई परिणाम।


बुद्धि शुद्धि या तय कर लो ,

वाक्शुद्धि चित्त लय कर लो ,

दिशा भ्रांत हो बैठो ना मन,

संशुद्धि संधान  ,जीवन में रहे ध्यान हाँ जीवन में रहे ध्यान।

चाहे कोई परिणाम हो चाहे कोई परिणाम।


कर्मयोग कहीं राह सही है ,

भक्ति की कहीं चाह बड़ी है,

जिसकी जैसी रही प्रकृत्ति ,

मुक्ति वैसा निदान।

जीवन में रहे ध्यान हाँ जीवन में रहे ध्यान।

चाहे कोई परिणाम हो चाहे कोई परिणाम।

आनंद हीं बाधा है

 

तूने रूप छोड़ा,

रंग छोड़ा।

स्वाद छोड़ा ,

गंध छोड़ा।

 

राग भी ,

विराग भी,

प्यार भी,

और त्याग भी।

 

मिथ्या,

संसार छोड़ा,

झूठा,

आचार छोड़ा।

 

अब झूठ से

विरक्त हो,

न सत्य से

आसक्त हो।

 

ये सत्य है,

अनासक्त हो,

फिर भी आनंद से,

विरक्त हो ?

पर ध्यान भी तो,

नाव है,

क्यों रत इनमे

पाव है ?

 

कि तप छोड़ो,

त्याग भी,

ये राग भी,

वैराग भी।

 

आनंद हीं बाधा है,

आनंद की चाह में।

तेरा ईश्वर रोड़ा बना है,

ईश्वर की राह में।

एक प्रतिबिंबित दर्पण

क्या है एक आदमी । दिन  भर प्रेम , नफरत , आशा , निराशा , इर्ष्या , उत्साह इत्यादि अनेक भावनाओं के समंदर में गोते रहने के अलावा करता हीं क्या है ? और ये भावनाएं आती कहाँ से , ये भावनाएं होती है ? ये सारी आशाएं , भावनाएं आदमी पर आरोपित किये गए विचारों के प्रतिफलन मात्र हीं तो है और आदमी क्या है  एक दर्पण की भांति यंत्रवत प्रतिफलन और प्रतिक्षेपित करता मात्र एक यंत्र ।

  

प्यार करोगे,

तो एक प्रेमी

गर दुलार,

तो हूँ मैं स्नेही।

 

नफरत, तिरस्कार का ,

इबादत, उपकार का ।

हताश हूँ, फटकार पे ,

निराश हूँ, दुत्कार पे ।

 

उपहास से हूँ, क्लेशग्रस्त ,

और परिहास से, द्वेषत्रस्त ।

अनादर पे, रोष हूँ मैं ,

प्रसंशा पे, मदहोश हूँ मैं ।

 

हार का, संताप हूँ ,

जीत का, उल्लास हूँ ।

सम्मान हूँ, जहाँ आदर है ,

अभिमान हूँ, जहाँ सादर है ।

 

भरोसे का विश्वास हूँ मैं ,

उत्साही की आस हूँ मैं ।


भावों के संसार निरंतर,

और इनके संप्रेषण ।

कर रहा परिलक्षित हूँ मैं,

एक प्रतिबिंबित दर्पण ।

खुद से तेरा युद्ध पड़ा है

 

दृढ़ निश्चयी अनिरुद्ध अड़ा है

ना कोई विरुद्ध खड़ा है।


जग की नज़रों में काबिल पर

चेतन अंतर रूद्ध डरा है।

 

घन तम गहन नियुद्ध पड़ा है

चित्त किंचित अवरुद्ध बड़ा है।


अभिलाषा के श्यामल बादल

काटे क्या अनुरुद्ध पड़ा है।


स्वयं जाल ही निर्मित करता

और स्वयं ही क्रुद्ध खड़ा है।


अजब द्वंद्व है दुविधा तेरी

मन चितवन निरुद्ध बड़ा है।


तबतक जगतक दौड़ लगाते

जबतक मन सन्निरुद्ध पड़ा है।


किस कीमत पे जग हासिल है

चेतन मन अबुद्ध अधरा है।


अरि दल होता किंचित हरते

निज निज से उपरुद्ध अड़ा है।


किस शिकार का भक्षण श्रेयकर

तू तूझसे प्रतिरुद्ध पड़ा है।


निज निश्चय पर संशय अतिशय

मन से मन संरुद्ध लड़ा है।


मन चेतन संयोजन क्या जब

खुद से तेरा युद्ध पड़ा है।

आदमी का आदमी होना बड़ा दुश्वार है

 

रोज उठकर सबेरे

पेट के जुगाड़ में,


क्या न क्या करता रहा है

आदमी बाजार में।


सच का दमन पकड़ के

घर से निकलता है जो,


झूठ की परिभाषाओं से

गश खा जाता है वो।

 

औरों की बातें है झूठी

औरों की बातों में खोट,


और मिलने पे सड़क पे

छोड़े ना दस का भी नोट।


तो डोलते हुए जगत में

डोलता इंसान है,


डिग रहा है आदमी कि

डिग रहा ईमान हैं।

 

झूठ के बाज़ार में हैं

खुद हीं ललचाए हुए,


रूह में चाहत बड़ी है

आग लहकाए हुए।


तो तन बदन में आग लेके

चल रहा है आदमी,

 


आरजू की ख़ाक में भी

जल रहा है आदमी।

 

टूटती हैं हसरतें जब

रुठतें जब ख्वाब हैं,


आदमी में कुछ बचा जो

लुटती अज़ाब हैं।


इन दिक्कतों मुसीबतों में

आदमी बन चाख हैं,


तिस पे ऐसी वैसी कैसी

आदतें गुस्ताख़ है।

 

उलझनों में खुद उलझती

ऐसी वैसी आदतें,


आदतों पे खुद हैं रोती

कैसी कैसी आदतें।


जाने कैसी आदतों से

अक्सर हीं लाचार है,


आदमी का आदमी

होना बड़ा दुश्वार है।

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