हिंदी कोष:हिंदी कविताओं और कहानियों की पत्रिका
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Saturday, March 21, 2026
संजीवनी लक्ष्मण के लिये ,वानर सेना के लिए क्यों नहीं ?
Friday, March 20, 2026
परशुराम का रहस्य: भीष्म को दिव्यास्त्र, कर्ण को श्राप – क्यों?
परशुराम का रहस्य: भीष्म को दिव्यास्त्र, कर्ण को श्राप – क्यों? यह सवाल महाभारत के हर पाठक के मन में उठता है… और उठते ही रोंगटे खड़े कर देता है!
कल्पना कीजिए – एक तरफ भगवान परशुराम, जिनकी कुठार ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों के रक्त से लाल कर दिया। जिन्होंने समुद्र को रक्त-सागर बना दिया, पर्वतों को लाशों का ढेर बना दिया। दूसरी तरफ वही परशुराम, जो स्वयं क्षत्रिय भीष्म (देवव्रत) को ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र, वैष्णवास्त्र, आग्नेय, वारुण, वायव्य… हर दिव्य हथियार की शिक्षा दे रहे हैं, जैसे कोई पिता अपने बेटे को धनुष सौंप रहा हो। और फिर वही परशुराम, जो कर्ण को एक झूठ के लिए घोर श्राप दे देते हैं – “तुम क्षत्रिय हो, झूठ बोला! ब्रह्मास्त्र कभी तुम्हारी याद में नहीं आएगा!”
यह कोई विरोधाभास नहीं… यह समय, परिस्थिति और प्रतिज्ञा का सबसे गहरा, सबसे रहस्यमय खेल है।
आइए, रोमांच, भावना और महाभारत के जादू के साथ मूल संस्कृत श्लोकों का सहारा लेकर इस अनकहे सत्य को खोलते हैं।
भगवान परशुराम विष्णु के छठे अवतार हैं। महाभारत, विष्णु पुराण और ब्रह्मांड पुराण उन्हें “क्षत्रिय-संहारक” कहते हैं। कारण था – पिता ऋषि जमदग्नि की हत्या। हैहयवंशी राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने जमदग्नि का वध किया। माता रेणुका ने २१ बार छाती पीट-पीटकर विलाप किया। उस विलाप ने परशुराम के हृदय में आग लगा दी। उन्होंने माता के सामने घुटने टेककर प्रतिज्ञा ली –
“मैं पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से मुक्त करूँगा!”
ब्रह्मांड पुराण (माहेंद्र पर्व) और विष्णु पुराण (अंश ४) में लिखा है कि उन्होंने समवर्त पंचक के पाँच सरोवरों को क्षत्रिय रक्त से भर दिया। क्षत्रिय स्त्रियाँ ब्राह्मणों से पुत्र प्राप्त करतीं, नए क्षत्रिय जन्म लेते और फिर परशुराम कुठार लेकर आ जाते। यह चक्र २१ बार चला। अंत में वे महेंद्र पर्वत पर अमर तपस्वी बनकर रह गए।
संहार के बाद उन्होंने ब्राह्मण-धर्म अपनाया। और उसी समय एक नई प्रतिज्ञा ली – “अब मैं किसी क्षत्रिय को शस्त्र-विद्या नहीं सिखाऊँगा। केवल ब्राह्मणों को ही।”
तो फिर सवाल उठता है – भीष्म पितामह (देवव्रत) को, जो शांतनु (क्षत्रिय) और गंगा के पुत्र थे, पूर्ण दिव्यास्त्र क्यों सिखाए? और कर्ण को झूठ पर श्राप क्यों दिया?
रहस्य आदि पर्व, उद्योग पर्व (अंबोपाख्यान) और शांति पर्व के मूल श्लोकों में छिपा है।
1. भीष्म को शिक्षा – प्रतिज्ञा से पहले की घटना
आदि पर्व (संभव पर्व) में स्पष्ट लिखा है कि देवव्रत गंगा-पुत्र तथा अष्ट वसुओं के अवतार थे। उस समय परशुराम का क्षत्रिय-वैर अभी पूरा नहीं हुआ था, लेकिन मुख्य बात यह कि प्रतिज्ञा का जन्म अभी नहीं हुआ था।
मूल श्लोक में कहा गया है:“जमदग्निपुत्रस्य रामस्य ज्ञाताः सर्वे महाबाहोः अस्त्रशस्त्राः”
(अर्थात् जमदग्नि-पुत्र राम के ज्ञात सभी अस्त्र-शस्त्र इस महाबाहु (देवव्रत) को ज्ञात हैं।)
कारण? भीष्म विशेष थे – वसु-अवतार, धर्मनिष्ठ, ब्रह्मचारी। परशुराम ने उनकी योग्यता देखकर अपवाद स्वरूप शिक्षा दी। यह घटना अंबा-प्रसंग से बहुत पहले की थी।
2. अंबा प्रसंग: प्रतिज्ञा का जन्म – उद्योग पर्व अध्याय 178
अंबा (काशिराज की पुत्री) को भीष्म ने स्वयंवर से लौटा दिया था। अपमानित अंबा परशुराम के पास पहुँची और रो-रोकर बोली – “प्रभो! भीष्म को मार डालिए!”
परशुराम का उत्तर (मूल संस्कृत से सटीक अनुवाद): “सुन्दरी! काशिराजकुमारी! मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार किसी वेदवेत्ता ब्राह्मण को आवश्यकता हो तो उसी के लिये शस्त्र उठाता हूँ। वैसा कारण हुए बिना इच्छानुसार हथियार नहीं उठाता। अतः इस प्रतिज्ञा की रक्षा करते हुए मैं तेरा दूसरा कौन-सा कार्य करूँ?”
अंबा फिर भी जिद करती रही। तब परम धर्मात्मा ऋषि अकृतव्रण ने कहा: “महाबाहो! यह कन्या शरण में आयी है; अतः आपको इसका त्याग नहीं करना चाहिये… यदि युद्ध में आपके बुलाने पर भीष्म सामने आकर अपनी पराजय स्वीकार करे अथवा आपकी बात मान ले तो इस कन्या का कार्य सिद्ध हो जाएगा।”
परशुराम ने फैसला लिया – “मैं सामनीति से काम बनाऊँगा। यदि भीष्म नहीं मानेगा तो युद्ध करूँगा।”
3. भीष्म-परशुराम का 23 दिन का घोर युद्ध – उद्योग पर्व अध्याय 180
युद्ध प्रातः से रात तक चला। दोनों ने वायव्यास्त्र, आग्नेयास्त्र, वारुणास्त्र, ब्रह्मास्त्र… सब चलाए। परशुराम ने भीष्म के वक्ष को बाण से बींध दिया। भीष्म घायल हुए, फिर लौटे।
मूल श्लोक: “ततः परशुरामोऽपि दिव्यान्यस्त्राणि चिक्षिपे। तानि सर्वाणि भीष्मेण दिव्यैरस्त्रैर्निवारितानि॥”
रात में भीष्म प्रस्वापनास्त्र चलाने वाले थे, लेकिन आकाशवाणी और नारद जी ने रोका: “भीष्म! प्रस्वापनास्त्र का प्रयोग न करो! परशुराम तुम्हारे गुरु हैं, ब्राह्मणभक्त हैं। उनका अपमान मत करो!”
4. देवता, पूर्वजों का हस्तक्षेप – उद्योग पर्व अध्याय 185
अंत में जमदग्नि, ऋचिक आदि पूर्वज प्रकट हुए। उन्होंने परशुराम से कहा: “हे भृगुवंशी! अब यह युद्ध छोड़ दो। यह तुम्हारा अंतिम युद्ध है। क्षत्रियों से लड़ना क्षत्रिय का धर्म है, ब्राह्मण का नहीं। अब हथियार मत उठाओ, तपस्या करो। यह भविष्य में अर्जुन भीष्म को मारेगा।”
परशुराम ने कहा – “मैं युद्ध नहीं छोड़ सकता, लेकिन पूर्वजों की आज्ञा…”देवताओं, नारद और ब्रह्म-ऋषियों ने मिलकर उन्हें समझाया।
युद्ध 23 दिनों तक चला। अंत में परशुराम प्रसन्न हुए। उन्होंने भीष्म को गले लगाया और बोले: “पृथ्वी पर कोई क्षत्रिय तुम्हारे बराबर नहीं। तुमने मुझे प्रसन्न किया।”
5. प्रतिज्ञा का जन्म – इस युद्ध के ठीक बाद परशुराम ने सख्त महाप्रतिज्ञा ली:
“अब मैं किसी क्षत्रिय को शस्त्र-विद्या नहीं सिखाऊँगा। केवल ब्राह्मणों को ही।” पूर्वजों ने स्पष्ट आदेश दिया – “यह तुम्हारा अंतिम युद्ध है… अब धनुष मत उठाओ।”
इसी प्रतिज्ञा के बाद उन्होंने द्रोणाचार्य (ब्राह्मण) को सभी दिव्यास्त्र सौंपे।
6. कर्ण प्रसंग: प्रतिज्ञा के बाद का श्राप – शांति पर्व अध्याय 3
नारद युधिष्ठिर को सुनाते हैं: कर्ण ने परशुराम की गोद में सिर रखकर सोने का बहाना किया। जाँघ पर अलर्क कीड़ा काटने लगा। कर्ण ने दर्द सहन किया, रक्त बहने लगा। परशुराम जागे और बोले – “अरे! मैं अशुद्ध हो गया!”
कर्ण ने सत्य बताया कि वह ब्राह्मण नहीं है। परशुराम क्रोधित होकर श्राप दिया: “चूँकि तूने अस्त्रों की लालच में झूठ बोला, इसलिए यह ब्रह्मास्त्र तेरी स्मृति में नहीं रहेगा। चूँकि तू ब्राह्मण नहीं, इसलिए मृत्यु के समय, समान योद्धा से युद्ध में यह अस्त्र तेरे काम नहीं आएगा।”
(शांति पर्व के मूल श्लोकों में यह स्पष्ट है।)
निष्कर्ष: महाभारत का गहन संदेश: यह कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि समय-क्रम और परिस्थिति का सत्य है। भीष्म की शिक्षा अंबा-युद्ध से पहले हुई, जब प्रतिज्ञा का जन्म ही नहीं हुआ था।
अंबा प्रसंग (उद्योग पर्व 178-185) ने प्रतिज्ञा को जन्म दिया, जो कर्ण (शांति पर्व 3) पर लागू हुई।
महाभारत सिखाता है – धर्म सर्वोपरि है। भीष्म ने गुरु से लड़कर भी गुरु-भक्ति नहीं छोड़ी। परशुराम ने शिष्य की वीरता देखकर प्रसन्न हुए। पुराण कहते हैं – अंत में परशुराम महेंद्र पर्वत पर अमर तपस्वी बने।
यह प्रसंग योग्यता, समय, गुरु-शिष्य संबंध और धर्म का अनुपम उदाहरण है। परशुराम की प्रतिज्ञा व्यक्तिगत क्रोध नहीं, बल्कि दिव्य आदेश और परिस्थिति पर आधारित थी।
इस विस्तृत कथा से पता चलता है कि महाभारत केवल युद्ध की कहानी नहीं…यह समय के साथ बदलते नियमों, विशेष अपवादों और अंतिम सत्य की गाथा है –“धर्म ही सबसे बड़ा गुरु है।”
प्रस्तुत पाठ भगवान परशुराम, भीष्म और कर्ण के अंतर्संबंधों के माध्यम से महाभारत के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डालता है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि परशुराम द्वारा भीष्म को शिक्षा देना और कर्ण को श्राप देना कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि उनकी प्रतिज्ञा के समय और परिस्थितियों का परिणाम था। भीष्म को शस्त्र विद्या उस काल में मिली जब परशुराम ने क्षत्रियों को न सिखाने का संकल्प नहीं लिया था, जबकि कर्ण ने उस भीष्म-परशुराम युद्ध के बाद झूठ बोलकर शिक्षा ली जिसने परशुराम को कठोर नियम लेने पर विवश किया था। यह विश्लेषण दर्शाता है कि कैसे अंबा प्रसंग ने परशुराम के जीवन की दिशा बदली और उनके सिद्धांतों को पुनर्गठित किया। अंततः, यह लेख धर्म, गुरु-शिष्य परंपरा और समय के साथ बदलते नैतिक नियमों की एक तार्किक और भावपूर्ण व्याख्या प्रस्तुत करता है।
Saturday, March 14, 2026
मुल्क की हिफ़ाज़त
हुक्मरान चलते है चाल जब सियासत में,
जंग में थकती ना आँखें कौम की ईबादत में।
बारूद से लिखी जाती है सरहदों की दास्ताँ,
कौन जीता कौन हारा जंग में बग़ावत में।
काग़ज़ों पे अमन की मुहर लग जाए तो क्या,
बदलते नहीं हालात बस एक ही हिदायत में।
नाम इंसानियत का रहता ज़ुबाँ पे बेशक,
इंसान जलते रहते पर हर नई रिवायत में।
दुश्मनी क्या दोस्ती क्या तख़्त बड़ा सख़्त है,
मुद्दा तो तख्त को क्या मिल रहा इनायत में।
इतिहास फिर लिखेगा किसकी थी ये ग़लती,
कौन था जो खो गया मुल्क की हिफ़ाज़त में।
बोधिसत्व और मृत मूषक
बहुत-बहुत प्राचीन काल की बात है। उस युग में संसार में अभी भगवान गौतम बुद्ध का अवतार नहीं हुआ था। किंतु उनके पूर्वजन्मों में वे बार-बार इस धरती पर जन्म लेते रहे। उन जन्मों में उन्हें “बोधिसत्त्व” के नाम से जाना जाता था। हर जन्म में बोधिसत्त्व बुद्धत्व की ओर निरंतर अग्रसर होते हुए लोककल्याण के महान कार्य करते थे। वे अपने आचरण, बुद्धिमत्ता, धैर्य और सदाचार से लोगों को मार्गदर्शन देते थे। कभी वे राजा बनकर, कभी व्यापारी बनकर, कभी साधारण नागरिक बनकर लोगों को यह सिखाते कि जीवन में सच्ची समृद्धि केवल बुद्धि, परिश्रम और सही अवसर की पहचान से ही प्राप्त होती है।
यह कथा उन्हीं पूर्वजन्मों में से एक की है। उस समय काशी का महान नगर बनारस अपनी समृद्धि, विद्या और व्यापार के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध था। गंगा नदी के तट पर बसा यह नगर सोने-चाँदी के आभूषणों, रेशमी वस्त्रों, सुगंधित फूलों और मिट्टी के बर्तनों का प्रमुख केंद्र था। सड़कें चौड़ी और स्वच्छ थीं। बाजारों में दिन-रात व्यापारियों की भीड़ लगी रहती थी। नगर के शासक थे राजा ब्रह्मदत्त, जो न्यायप्रिय और प्रजावत्सल थे।
इसी बनारस में स्वर्णकारों (सुनारों) का एक अत्यंत प्रतिष्ठित संघ था। इस संघ का प्रधान एक सम्मानित परिवार था। उसी कुल में बोधिसत्त्व का जन्म हुआ। बचपन से ही वे अत्यंत बुद्धिमान, दूरदर्शी और संकेतों को तुरंत समझने वाले थे। बड़े होते-होते वे संघ के प्रधान बन गए। लोग उन्हें प्यार से “छोटे गिल्डमास्टर” कहते थे। वे न केवल सोने-चाँदी का काम देखते थे, बल्कि आकाश के नक्षत्रों की गति, चंद्रमा-सूर्य की स्थिति और हवा की दिशा से शुभ-अशुभ का अनुमान लगा लेते थे। वे कहते थे, “प्रकृति हर क्षण संकेत देती है, बस समझने वाली आँख चाहिए।”
एक दिन छोटे गिल्डमास्टर राजा ब्रह्मदत्त से मिलने के लिए राजमार्ग से जा रहे थे। दोपहर का समय था। सूरज चमक रहा था। सड़क के किनारे धूल उड़ रही थी। अचानक उनकी नजर सड़क पर पड़े एक मरे हुए चूहे पर पड़ी। चूहा ताज़ा मरा हुआ लग रहा था – उसका शरीर अभी भी कोमल था। बोधिसत्त्व ने तुरंत आकाश की ओर देखा। नक्षत्रों की स्थिति को ध्यान से परखा। उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान आ गई। उन्होंने धीरे से कहा –
“यदि कोई समझदार, परिश्रमी और अवसर को पहचानने वाला युवक इस मृत चूहे को उठा ले, तो वह इससे एक बड़ा व्यापार शुरू कर सकता है। कुछ ही वर्षों में वह अपना परिवार पाल सकता है, धन कमा सकता है और एक दिन नगर का प्रतिष्ठित नागरिक बन सकता है।”
यह बात सड़क के किनारे खड़ा एक युवक सुन रहा था। उसका नाम था वसुदेव (कथा में नाम नहीं था, इसलिए हम उसे वसुदेव कहते हैं)। वह एक अच्छे कुल का था, लेकिन पिता की मृत्यु के बाद परिवार की आर्थिक दशा अत्यंत दयनीय हो गई थी। माँ बीमार थी। बहन का विवाह बाकी था। घर में रोटी की कमी थी। वह रोज़ मजदूरी की तलाश में घूमता था। बोधिसत्त्व की बात सुनकर उसके मन में एक चिंगारी सी जल उठी। उसने सोचा –
“यह व्यक्ति छोटे गिल्डमास्टर हैं। वे बिना कारण कुछ नहीं कहते। नक्षत्रों का ज्ञान रखते हैं। अवश्य ही इसमें कुछ राज है।”
बिना देर किए उसने मृत चूहे को साफ कपड़े में लपेट लिया और सराय की ओर चल पड़ा। सराय में एक बिल्ली थी जो चूहों का शिकार करती थी। उसने चूहे को बिल्ली के मालिक को दिखाया। मालिक ने प्रसन्न होकर कहा, “यह ताज़ा चूहा है, मेरी बिल्ली को बहुत पसंद आएगा।” उसने एक छोटा-सा ताँबे का सिक्का दे दिया।
वसुदेव ने उस एक सिक्के से थोड़ा गुड़ खरीदा। फिर एक मिट्टी का घड़ा भरकर ठंडा पानी लाया। वह जंगल से फूल तोड़कर लौट रहे माली-मजदूरों के रास्ते पर एक पेड़ के नीचे बैठ गया। दोपहर का समय था। मजदूर पसीने से तर थे, प्यास से तड़प रहे थे। वसुदेव ने मुस्कराते हुए कहा, “भाइयो, थोड़ा गुड़ खाओ और ठंडा पानी पी लो। आज का श्रम तुम्हारा, कल का फल मेरा।”
मजदूरों को यह अपनापन बहुत भाया। वे बोले, “भाई, आज तुमने हमारी प्यास बुझाई।” प्रत्येक मजदूर ने कृतज्ञता में उसे एक-एक मुट्ठी ताज़े फूल दे दिए। फूलों की महक से पूरा स्थान सुगंधित हो गया।
अगले दिन वसुदेव उन फूलों को बाजार में बेचकर कुछ और सिक्के कमा लाया। उसने पहले से अधिक गुड़ और एक बड़ा घड़ा पानी लिया। फिर वही जगह पर बैठ गया। इस बार मजदूर और भी प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “तुम सच्चे मित्र हो।” और उन्होंने उसे आधे खिले हुए फूलों वाले कई पौधे दे दिए। वसुदेव ने उन पौधों को घर ले जाकर लगाया। कुछ दिन बाद फूल खिले। उन्हें बेचकर उसकी कमाई बढ़कर आठ सिक्कों तक पहुँच गई। अब घर में माँ को दवा मिलने लगी। बहन के लिए कपड़े आने लगे।
कुछ समय बाद एक दिन भीषण तूफान आया। आसमान में काले बादल घिरे। तेज़ हवा चली। बिजली चमकी। राजा ब्रह्मदत्त के विशाल उद्यान में सैकड़ों सूखी डालियाँ, टहनियाँ, पत्ते और फूलों की टहनियाँ टूट-टूटकर गिर पड़ीं। उद्यान का माली परेशान था। उसने सोचा, “इन्हें हटाने में पूरे दिन लग जाएंगे। राजा नाराज़ होंगे।”
उसी समय वसुदेव वहाँ पहुँचा। उसने माली से कहा, “महाराज, यदि आप ये सारी लकड़ियाँ और पत्ते मुझे दे दें, तो मैं उद्यान को पूरी तरह साफ कर दूँगा।” माली ने तुरंत हामी भर दी।
वसुदेव पास के मैदान में खेल रहे बच्चों के पास गया। बच्चों को दिखाकर बोला, “देखो, आज तुम्हें खेलने के साथ-साथ गुड़ भी मिलेगा। ये टहनियाँ इकट्ठी करके उद्यान के द्वार पर ढेर लगा दो। जो सबसे बड़ा ढेर लगाएगा, उसे सबसे ज्यादा गुड़।” बच्चों ने खुशी-खुशी खेल-खेल में सारी लकड़ियाँ इकट्ठी कर दीं। एक विशाल ढेर लग गया।
उसी समय राजा का कुम्हार (बर्तन बनाने वाला) ईंधन की तलाश में था। उसने ढेर देखा और बोला, “इतनी अच्छी सूखी लकड़ी! मैं इसे खरीदता हूँ।” उसने सोलह सिक्के दिए और साथ में कुछ नए मिट्टी के बर्तन भी दे दिए। अब वसुदेव के पास कुल चौबीस सिक्के हो गए। उसकी खुशी का ठिकाना न था।
एक दिन नगर के द्वार के पास वसुदेव पानी का घड़ा लेकर बैठ गया। उसी समय पाँच सौ घास काटने वाले मजदूर जंगल से लौट रहे थे। वे धूल से सने, प्यास से व्याकुल थे। वसुदेव ने एक-एक को ठंडा पानी पिलाया और थोड़ा गुड़ भी दिया। मजदूरों ने कहा, “मित्र, तुमने हमारा जीवन बचाया। हम तुम्हारे लिए क्या कर सकते हैं?”
वसुदेव मुस्कराया और बोला, “अभी कुछ नहीं। जब जरूरत पड़ेगी, मैं स्वयं तुमसे कहूँगा। आज बस मेरी कृतज्ञता स्वीकार करो।”
इसी बीच वसुदेव ने नगर के एक स्थल-व्यापारी और एक समुद्री व्यापारी से गहरी मित्रता कर ली। वे उसे अपना छोटा भाई मानने लगे।
एक दिन स्थल-व्यापारी ने रहस्य बताते हुए कहा, “कल सुबह एक घोड़े का व्यापारी पाँच सौ घोड़े लेकर नगर में आ रहा है। घोड़ों को पानी और घास की बहुत जरूरत होगी।”
वसुदेव तुरंत घास काटने वाले पाँच सौ मजदूरों के पास पहुँचा। उसने विनती की, “भाइयो, आज हर व्यक्ति मुझे एक-एक गट्ठर घास दे दो। जब तक मेरी घास बिक न जाए, तुम अपनी घास बाजार में मत बेचना।” मजदूरों ने पुराना उपकार याद किया और तुरंत मान लिया। उन्होंने पाँच सौ गट्ठर घास वसुदेव के घर पहुँचा दी।
अगले दिन घोड़े का व्यापारी आया। पूरे नगर में घास का नामोनिशान नहीं था। अंत में उसे वसुदेव के पास जाना पड़ा। व्यापारी ने कहा, “मुझे तुरंत घास चाहिए, वरना घोड़े भूखे मर जाएंगे।” वसुदेव ने शांत स्वर में कहा, “एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ दोगे तो सारी घास ले जाओ।” व्यापारी ने तुरंत एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ गिनकर दे दीं। वसुदेव की आँखों में आँसू आ गए। उसकी मेहनत रंग ला रही थी।
कुछ दिन बाद समुद्री व्यापारी मित्र ने खबर दी, “बंदरगाह पर एक विशाल जहाज आया है। उसमें नीलम, मोती, रेशम और सुगंधित द्रव्य भरे हैं। माल बहुत कीमती है।”
वसुदेव ने तुरंत योजना बनाई। उसने नगर के सबसे सुंदर रथ को किराए पर लिया। सुनहरे कपड़े पहने। चार सेवकों को साथ लिया। ठाठ-बाट से बंदरगाह पहुँचा। वहाँ उसने जहाज के मालिक से बात की और उधार पर पूरा जहाज खरीद लिया। अपनी मुहर वाली सोने की अंगूठी गिरवी रख दी। फिर पास में एक भव्य तंबू लगवाया। चारों ओर रंग-बिरंगी झंडियाँ लगवाईं। सेवकों को आदेश दिया, “जब कोई व्यापारी आए, तो उसे तीन सेवकों के साथ क्रम से मेरे पास ले आना।”
नगर में जहाज के आने का समाचार फैला। लगभग सौ बड़े-बड़े व्यापारी माल खरीदने के लिए दौड़े। लेकिन उन्हें बताया गया कि एक युवा व्यापारी ने पहले ही अग्रिम धन देकर जहाज का पूरा अधिकार ले लिया है। सभी वसुदेव के तंबू में आए। प्रत्येक व्यापारी ने जहाज में हिस्सा पाने के लिए एक-एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ अग्रिम दीं। फिर सबने मिलकर पूरा अधिकार खरीदने के लिए और उतनी ही राशि दी। इस प्रकार वसुदेव के पास दो लाख स्वर्ण मुद्राएँ जमा हो गईं।
अब वह बनारस लौटा। उसके मन में कृतज्ञता की लहर उठी। वह एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ लेकर छोटे गिल्डमास्टर (बोधिसत्त्व) के घर पहुँचा। बोधिसत्त्व ने मुस्कराते हुए पूछा, “बेटा, इतनी विशाल संपत्ति कैसे प्राप्त हुई?”
वसुदेव ने सिर झुकाकर विनम्रता से कहा, “गुरुदेव, यह सब आपकी एक ही वाक्य का फल है। मैंने केवल उसी का पालन किया।” और फिर उसने पूरी कथा विस्तार से सुनाई – मृत चूहे से शुरू करके घास, जहाज, दो लाख स्वर्ण मुद्राओं तक की पूरी यात्रा।
बोधिसत्त्व ने उसकी बुद्धिमत्ता, परिश्रम, धैर्य और अवसर की सही पहचान देखी। मन ही मन सोचा, “ऐसा योग्य युवक किसी और के हाथ नहीं जाना चाहिए।” उन्होंने अपनी एकमात्र योग्य पुत्री का विवाह वसुदेव से कर दिया और अपनी सारी संपत्ति, संघ का प्रधान पद तथा घर-बार सब उसे सौंप दिया। कुछ वर्ष बाद जब बोधिसत्त्व का देहांत हुआ, तब वसुदेव ही स्वर्णकारों के संघ का नया प्रधान बन गया। वह नगर का सम्मानित नागरिक बना। उसकी माँ, बहन सब सुखी थीं।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने अपने उस जन्म में सारे संसार को यह अमर शिक्षा दी कि –
“बुद्धि, परिश्रम और अवसर की सही पहचान से मनुष्य छोटी-से-छोटी वस्तु को भी महान संपत्ति और सफलता का कारण बना सकता है।”
Friday, March 13, 2026
साम्ब और लक्ष्मणा का हरण
महाभारत काल में राजकुमारियों के विवाह के लिए प्रायः स्वयंवर की परंपरा प्रचलित थी। स्वयंवर का अर्थ था कि योग्य राजाओं और राजकुमारों को आमंत्रित किया जाए और राजकुमारी स्वयं अपने लिए योग्य वर का चयन करे। यह केवल विवाह का संस्कार ही नहीं, बल्कि उस समय की राजनीतिक, सामाजिक और क्षत्रिय परंपराओं का भी महत्वपूर्ण अंग था।
इसी प्रकार कौरवों के राजा दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा का स्वयंवर भी अत्यंत भव्य और प्रसिद्ध था। लक्ष्मणा अपनी सुंदरता, शील और राजसी व्यक्तित्व के कारण समस्त आर्यावर्त में प्रसिद्ध थीं। जब उनके विवाह योग्य होने का समय आया, तब दुर्योधन ने हस्तिनापुर में एक विशाल स्वयंवर का आयोजन किया।
स्वयंवर की तैयारी
दुर्योधन ने अपने दूतों को विभिन्न राज्यों में भेजकर अनेक राजाओं, राजकुमारों और वीर योद्धाओं को आमंत्रित किया। हस्तिनापुर के राजमहल को अत्यंत भव्य रूप से सजाया गया। सभा मंडप को सुवर्ण स्तंभों, रत्नों और पुष्पमालाओं से अलंकृत किया गया। दूर-दूर से आए राजा और राजकुमार अपने-अपने वैभव और शक्ति का प्रदर्शन करते हुए सभा में उपस्थित हुए।
लक्ष्मणा के स्वयंवर की चर्चा पूरे आर्यावर्त में थी, इसलिए यह समारोह अत्यंत प्रतिष्ठित बन गया था।
साम्ब का आगमन
उधर द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को भी इस स्वयंवर की सूचना मिली। साम्ब पहले से ही लक्ष्मणा के सौंदर्य और गुणों के विषय में सुन चुके थे। कई कथाओं के अनुसार वे लक्ष्मणा से प्रेम करने लगे थे और मन ही मन उन्हें अपनी पत्नी बनाना चाहते थे।
किन्तु साम्ब यह भलीभाँति जानते थे कि दुर्योधन और श्रीकृष्ण के बीच विशेष मैत्री नहीं थी। दुर्योधन कभी भी स्वेच्छा से अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के पुत्र से नहीं करना चाहते थे।
फिर भी साम्ब ने साहस करके स्वयंवर में जाने का निश्चय किया।
स्वयंवर सभा
जब स्वयंवर का दिन आया, तब विशाल सभा में अनेक राजकुमार उपस्थित थे। सभा के मध्य में लक्ष्मणा को लाया गया। वे अत्यंत सुंदर और तेजस्वी प्रतीत हो रही थीं।
स्वयंवर की परंपरा के अनुसार उन्हें अपने हाथ में वरमाला लेकर उपस्थित राजाओं और राजकुमारों के बीच से अपने लिए वर का चयन करना था।
उसी समय साम्ब भी वहाँ उपस्थित थे। वे अत्यंत साहसी और उत्साही युवक थे।
लक्ष्मणा का हरण
कुछ कथाओं के अनुसार लक्ष्मणा स्वयं भी साम्ब को पसंद करती थीं, किंतु सभा की परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि दुर्योधन कभी इस विवाह के लिए सहमत नहीं होते।
इसी कारण साम्ब ने क्षत्रिय परंपरा के अनुसार एक साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने लक्ष्मणा को अपने रथ में बैठाया और उन्हें लेकर वहाँ से निकल पड़े। इसे रणहरण विवाह कहा जाता है, जो उस समय क्षत्रियों में स्वीकृत विवाह पद्धति मानी जाती थी।
कौरवों का क्रोध
जब कौरवों को यह ज्ञात हुआ कि साम्ब लक्ष्मणा को लेकर चले गए हैं, तब सभा में भारी क्रोध उत्पन्न हुआ। दुर्योधन और अन्य कौरव योद्धाओं ने इसे अपने कुल का अपमान माना।
तुरंत कर्ण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और अन्य योद्धाओं ने साम्ब का पीछा किया।
साम्ब ने अत्यंत वीरता से उनका सामना किया। उन्होंने अकेले ही अनेक महारथियों से युद्ध किया। किन्तु अंततः कौरवों की संयुक्त शक्ति के सामने वे पराजित हो गए और उन्हें बंदी बना लिया गया।
साम्ब का बंदी होना
कौरवों ने साम्ब को पकड़कर हस्तिनापुर ले आए और उन्हें कारागार में डाल दिया। यह समाचार जब द्वारका पहुँचा, तब यदुवंश के लोग अत्यंत क्रोधित हो उठे।
वे कौरवों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए तैयार हो गए।
बलराम का हस्तक्षेप
तब भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम ने स्वयं हस्तिनापुर जाने का निर्णय लिया। बलराम अत्यंत शक्तिशाली और सम्मानित योद्धा थे।
उन्होंने दुर्योधन से कहा कि साम्ब और लक्ष्मणा का विवाह कर दिया जाए और साम्ब को मुक्त कर दिया जाए।
किन्तु कौरवों ने पहले उनकी बात को महत्व नहीं दिया।
तब बलराम अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने हल से हस्तिनापुर को खींचकर गंगा में डुबो देने की धमकी दी।
विवाह की स्वीकृति
बलराम के इस भयानक क्रोध को देखकर कौरव भयभीत हो गए। अंततः दुर्योधन को झुकना पड़ा और उन्होंने साम्ब और लक्ष्मणा के विवाह को स्वीकार कर लिया।
इसके बाद विधिपूर्वक साम्ब और लक्ष्मणा का विवाह संपन्न हुआ।
एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य
इस घटना के कारण दुर्योधन और श्रीकृष्ण के परिवार आपस में संबंधी बन गए। लक्ष्मणा भगवान श्रीकृष्ण की पुत्रवधू बन गईं।
चार्वाक महाभारत का
इस कथा का आरंभ करने से पहले जानना जरूरी है कि आखिर चार्वाक कौन थे। ऐसा माना जाता है कि चार्वाक गुरु बृहस्पति के शिष्य थे। उनका दर्शन लोकायत दर्शन के रूप में भी जाना जाता है। उनके बारे में चाणक्य भी जिक्र करते हैं।
चार्वाक के अनुसार जो भी आंखों के सामने प्रत्यक्ष है वो ही सच है। ईश्वर, स्वर्ग, नरक,लोक,परलोक, पुनर्जन्म।आदि को वो इनकार करते थे। जो भी इस संसार में आंखों के सामने दृष्टिगोचित होता है , वो ही सुख और दुख का कारण हो सकता है।
चार्वाक इस शरीर को सबसे बड़ा प्रमाण मानते थे। उनके सिद्धांत को उनके द्वारा प्रदिपादित किए गए इन श्लोकों से समझा जा सकता है।
अर्थात जब तक जियो सुख से जिओ। ऋण लेकर भी घी पियो। शरीर के जल कर राख हो जाने के बाद इसे दुबारा लौटते हुए किसने देखा है?
बाद में उनकी इसी नास्तिकता वादी विचार धारा का पालन करने वाले चार्वाक कहलाने लगे। जाहिर सी बात है आस्तिक विचारधारा का पालन करने वाले इनसे प्रेम तो नहीं करते।
महाभारत युद्ध के समाप्ति के उपरांत जब युद्धिष्ठिर का राज्यारोहण होने वाला होता है तब एक चार्वाक का जिक्र आता है जो दुर्योधन का मित्र होता है। उसे चार्वाक राक्षस के रूप में भी संबोधित किया जाता है।
क्या कारण है कि दुर्योधन का एक मित्र जो कि नस्तिकतावादी दर्शन का अनुयायी था, दुर्योधन की मृत्यु के उपरांत उसके पक्ष में आ खड़ा होता है, ये जानते हुए भी कि वहां पर कृष्ण भी उपस्थित हैं।
जाहिर सी बात है , इस समय उसके सहयोग में कोई खड़ा होने वाला नहीं था। उसे पता था कि वो अपनी मृत्यु का आमरण दे रहा है। फिर भी वो दुर्योधन के पक्ष में मजबूती से आ खड़ा होता है। चार्वाक का दुर्योधन के प्रति इतना लगाव क्यों? आइए देखते हैं इस कथा में।
महाभारत की लड़ाई का एक पहलू है धर्म और अधर्म के बीच की लड़ाई तो एक दूसरा पक्ष भी है, आस्तिकता और नास्तिकता की लड़ाई। एक तरफ तो पांडव हैं जो भगवान श्रीकृष्ण को अपना कर्णधार मानते हैं। उनको अपना मार्गदर्शन मानते हैं। उन्हें ईश्वर के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण की ईश्वर के साक्षात अवतार के रूप में देखते हैं।
तो दूसरी तरफ दुर्योधन है जो श्रीकृष्ण को एक छलिया और मायावी पुरुष के रूप में देखता है। दुर्योधन अगर श्रीकृष्ण को भगवान के अवतार के रूप में कभी नहीं स्वीकार किया। शायद दुर्योधन कहीं ना कहीं नास्तिकता बड़ी विचारधारा का समर्थक था। इसी कारण तो अपनी जान की बाजी लगाकर चार्वाक उसके समर्थन में भरी सभा में युधिष्ठिर को ललकारता है।
महाभारत के राजधर्मानुशासन पर्व के अष्टात्रिंशोऽध्यायः [38 अध्याय] में इस घटना का जिक्र आता है। ये अध्याय पांडवों के नगर प्रवेश के समय पुर वासियों तथा ब्राह्मणों द्वारा राजा युधिष्ठिर का सत्कार और उन पर आक्षेप करने वाले चार्वाक का ब्राह्मणों द्वारा वध आदि घटना का वर्णन करता है।
इस अध्याय के पहले होने वाली घटना का जिक्र करना भी प्रासंगिक होगा। ये सब जानते हैं कि महाभारत युद्ध शुरू होने के ठीक पहले अर्जुन मानसिक अवसाद का शिकार हो जाते हैं और उन्हें समझाने के लिए ही श्रीकृष्ण को गीता का ज्ञान देना पड़ता है। गीता का उपदेश सुनने के बाद हीं अर्जुन युद्ध कर पाए।
कुछ इसी तरह के मानसिक अवसाद का शिकार युधिष्ठिर भी हुए थे, महाभारत युद्ध को समाप्ति के बाद। अपने।इतने सारे बंधु, बांधवों और गुरु आदि के संहार से व्यथित युधिष्ठिर राज्य का त्याग कर वन की ओर प्रस्थान करना चाहते थे। पांडवों,कृष्ण और व्यास जी के काफी समझाने के बाद वो राजी होते हैं अपने भाईयों, मित्रों और श्रीकृष्ण के साथ राज्याभिषेक के लिए नगर में प्रवेश करते हैं। आइए देखते हैं फिर क्या होता है।
इसके बाद महा यशस्वी श्रीमान् राजा युधिष्ठिर महल से बाहर निकले । वहाँ उन्हें बहुत से ब्राह्मण खड़े दिखायी दिये, जो हाथमें मङ्गलद्रव्य लिये खड़े थे ॥ १५॥ जब सब ब्राह्मण चुपचाप खड़े हो गये, तब ब्राह्मण का वेष बनाकर आया हुआ चार्वाक नामक राक्षस राजा युधिष्ठिर से कुछ कहनेको उद्यत हुआ ॥२२॥
यहां पर हम देखते हैं कि युधिष्ठिर के स्वागत के लिए सारे ब्राह्मण समाज वहां खड़ा था और उनकी अपेक्षा के अनुरूप हीं युधिष्ठिर कुल देवताओं की पूजा करते हुए अपनी आस्तिकतावादी प्रवृत्ति को परिलक्षित करते हैं।
वह दुर्योधन का मित्र था। उसने संन्यासी ब्राह्मण के वेषमें अपने असली रूपको छिपा रखा था। उसके हाथमें अक्ष माला थी और मस्तक पर शिखा उसने त्रिदण्ड धारण कर रखा था। वह बड़ा ढीठ और निर्भय था ॥२३॥
राजेन्द्र ! तपस्या और नियम में लगे रहनेवाले और आशीर्वाद देनेके इच्छुक उन समस्त ब्राह्मणोंसे, जिनकी संख्या हजार से भी अधिक थी, घिरा हुआ वह दुष्ट राक्षस महात्मा पाण्डवों का विनाश चाहता था। उसने उन सब ब्राह्मणों से अनुमति लिये बिना ही राजा युधिष्ठिर से कहा ॥ २४-२५ ॥
चार्वाक बोला-राजन् ! ये सब ब्राह्मण मुझ पर अपनी बात कहने का भार रखकर मेरे द्वारा ही तुमसे कह रहे हैं’कुन्तीनन्दन ! तुम अपने भाई-बन्धुओं का वध करनेवाले एक दुष्ट राजा हो । तुम्हें धिक्कार है ! ऐसे पुरुषके जीवनसे क्या लाभ ? इस प्रकार यह बन्धु-बान्धवों का विनाश करके गुरुजनों की हत्या करवाकर तो तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है, जीवित रहना नहीं ॥ २६-२७ ॥
यहां दुर्योधन के मित्र चार्वाक का जिक्र आता है जिसे ब्राह्मणों ने राक्षस कहा है। इसका मतलब ये निकाला जा सकता है कि अस्तिकतावादी संस्कृति पर प्रहार करने वाले पुरुष को हीं ब्राह्मण उस चार्वाक को राक्षस के नाम से पुकारते हैं।
देखने वाली बात ये है कि ना तो रावण की तरह दुर्योधन की आस्था शिव जी में है और ना हीं अर्जुन की तरह वो शिव जी तपस्य करता है। ये अलग बात है कि वो श्रीकृष्ण के पास एक बार सहायता मांगने जरूर पहुंचता है। पर वो भी सैन्य शक्ति के विवर्धन के लिए। यहां पे उसकी राजनैतिक और कूटनीतिक चपलता दिखाई पड़ती है ना कि श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति का भाव।
पूरे महाभारत में दुर्योधन श्रीकृष्ण को एक राजनैतिक और कूटनीतिज्ञ के रूप में हीं देखता। दुर्योधन को भक्ति पर नहीं अपितु स्वयं की भुजाओं पर विश्वास है। वो अभ्यास बहुत करता है। इसी कारण वो श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का प्रिय शिष्य बनता है।
भीम और दुर्योधन दोनों हीं श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम से गदा युद्ध का प्रशिक्षण लेते हैं , परन्तु अपने अभ्यास और समर्पण के कारण दुर्योधन श्री बलराम का प्रिय शिष्य बन जाता है । ये बलराम का दुर्योधन के प्रति प्रेम हीं था कि वो महाभारत के युद्ध में किसी भी पक्ष का साथ नहीं देते हैं ।
श्रीकृष्ण भी दुर्योधन के इस अभ्यासी व्यक्तित्व के प्रति भीम को बार बार सावधान करते रहते हैं । कुल मिलाकर ये खा जा सकता है कि दुर्योधन को तो अपनी भुजा और शक्ति पर हीं विश्वास था , ना कि भक्ति पर या अस्तिकता पर। दुर्योधन नास्तिक हो या ना हो , परन्तु आस्तिक तो कतई नहीं था ।
इस संसार को हीं सच मानने वाला , इस संसार के लिए हीं लड़ने वाला , स्वर्ग या नरक , ईश्वर या ईश्वर के तथाकथित प्रकोप से नहीं डरने वाला एक निर्भीक पुरुष था।
दुर्योधन की तरह हीं वो चार्वाक भी निर्भय था तभी तो भरी सभा में वो युधिष्ठिर को अपने बंधु बांधवों की हत्या का भागी ठहरा कर दुत्कार सका। यहां देखने वाली बात ये है कि महाभारत युद्ध के अंत में उस चार्वाक की सहायता करने वाला कोई नहीं था।
उसे जरूर ज्ञात होगा कि पांडव जिसे भगवान मानते हैं, वो श्रीकृष्ण भी उसी सभा में मौजूद होंगे, इसके बावजूद वो घबड़ाता नहीं है। वो बिना किसी भय के युधिष्ठिर को भरी सभा में दुत्कारता है।
तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने कहा–ब्राह्मणो ! मैं आपके चरणों में प्रणाम करके विनीत भावसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आपलोग मुझपर प्रसन्न हों । इस समय मुझपर सब ओर से बड़ी भारी विपत्ति आ गयी है; अतः आपलोग मुझे धिक्कार न दें ॥ ३०॥
ब्राह्मण बोले–धर्मात्मन् ! यह दुर्योधनका मित्र चार्वाक नामक राक्षस है, जो संन्यासी के रूपमें यहाँ आकर उसका हित करना चाहता है । हमलोग आपसे कुछ नहीं कहते हैं । आपका इस तरहका भय दूर हो जाना चाहिये। हम आशीर्वाद देते हैं कि भाइयों सहित आपको कल्याणकी प्राप्ति हो ॥३३-३४॥
वैशम्पायन जी कहते हैं–जनमेजय ! तदनन्तर क्रोध से आतुर हुए उन सभी शुद्धात्मा ब्राह्मणों ने उस पारात्मा राक्षस को बहुत फटकारा और अपने हुङ्कारों से उसे नष्ट कर दिया ॥ ३५ ॥
ब्रह्मवादी महात्माओं के तेजसे दग्ध होकर वह राक्षस गिर पड़ा, मानो इन्द्र के वज्र से जलकर कोई अङ्करयुक्त वृक्ष धराशायी हो गया हो ॥ ३६ ।।
ऊपर के श्लोक 33 से श्लोक 36 में लिखी घटनाओं से ये साफ दिखाई पड़ता है कि उस चार्वाक का आरोप इतना तीक्ष्ण था कि युधिष्ठिर घबड़ा जाते हैं। युधिष्ठिर को चार्वाक के चुभते हुए आरोपों का कोई उत्तर नहीं सूझता है और वो ब्राह्मणों से निवेदन करने लगते हैं कि जिस प्रकार यह चार्वाक मुझे धिक्कार रहा है, उस प्रकार उन्हें धिक्कारा ना जाए।
और फिर सारे ब्राह्मणों ने मिलकर उस चार्वाक को बहुत फटकारा और अपने हुंकार से उसे नष्ट कर दिया। एक तरफ इतने सारे ब्राह्मण और एक तरफ वो अकेला चार्वाक। एक तरफ विजेता राजा और एक तरफ हारे हुए मृत राजा दुर्योधन की तरफ से प्रश्न उठाता चार्वाक।
आखिर युधिष्ठिर उसके प्रश्नों का उत्तर क्यों नहीं देते? आखिर अपने आखों के सामने उस अन्याय को होने क्यों दिया जब अनगिनत ब्राह्मण एक साथ मिलकर उस अकेले चार्वाक का वध कर देते हैं? जिस धर्म की रक्षा के लिए महाभारत युद्ध लड़ा गया, उसी धर्म की तिलांजलि देकर युधिष्ठिर का राज्याभिषेक होता है।
महाभारत की लड़ाई दरअसल आस्तिकतावादी और नस्तिकतावादी भौतिक प्रवृत्ति के बीच की लड़ाई है। और आस्तिकतावादी संस्कृति अधर्म का आचरण करके भी इसे दबाना चाहती थी और वास्तव में दबाया। युधिष्ठिर के राज्यारोहण के दिन अनगिनत ब्राह्मणों द्वारा एक अकेले नास्तिक चार्वाक का अनैतिक तरीके से वध कर देना और क्या साबित करता है?
हनुमान जी की गदा
हनुमान जी का स्वरूप भारतीय संस्कृति में शक्ति, भक्ति और ज्ञान की त्रिवेणी के रूप में प्रतिष्ठित है। वह केवल प्रभु श्रीराम के परम भक्त ही नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना में उनका सबसे विश्वसनीय सहयोगी, एक अजेय योद्धा और संकटमोचन के रूप में पूजित हैं। उनके चरित्र में ऐसी विलक्षणता है कि सामान्यतः यह धारणा बन गई है कि इतने पराक्रमी और दिव्य योद्धा के पास कोई महाशक्तिशाली अस्त्र-शस्त्र अवश्य रहा होगा। इस संदर्भ में सबसे अधिक उनके साथ जो छवि जुड़ी हुई है, वह है — गदा की।
गदा भारतीय परंपरा में शक्ति, पराक्रम और विजय का प्रतीक मानी जाती है। हनुमान जी की अधिकांश मूर्तियों, चित्रों और लोककथाओं में उन्हें गदा-धारी के रूप में दिखाया जाता है। इससे यह स्वाभाविक धारणा बन गई है कि हनुमान जी ने अपने समस्त युद्धों में गदा का प्रयोग किया होगा। परंतु जब हम वाल्मीकि द्वारा रचित मूल रामायण के प्रसंगों को ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं, तो यह अत्यंत रोचक तथ्य सामने आता है कि कहीं भी हनुमान जी द्वारा गदा के प्रयोग का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता।
उदाहरण के लिए, जब लंका में हनुमान जी का सामना राक्षस अकम्पन से होता है, तो वे गदा का प्रयोग नहीं करते, बल्कि एक विशालकाय वृक्ष को उखाड़कर उसे अस्त्र बनाते हैं और उसी से उसका वध कर देते हैं। यह उनके शारीरिक बल और युद्ध कौशल का उदाहरण है, न कि किसी पारंपरिक हथियार का।
इसी तरह, जब रावण स्वयं उनके समक्ष आता है, तो हनुमान जी कोई शस्त्र नहीं उठाते, बल्कि उसे एक जोरदार थप्पड़ मारते हैं। यह घटना प्रतीक है उस आत्मबल और अपराजेय ऊर्जा का, जो किसी अस्त्र की मोहताज नहीं होती। यही नहीं, जब रावण लक्ष्मण जी को घायल करने के बाद उन्हें उठाने का प्रयास करता है, तो हनुमान जी घूंसा मारकर उसे दूर हटा देते हैं।
आगे चलकर, राक्षस निकुंभ को हनुमान जी अपने हाथों से सिर मरोड़कर मार डालते हैं, और मेघनाद के साथ युद्ध में वे शिला का प्रयोग करते हैं। इन सभी युद्धों में उन्होंने कभी गदा का प्रयोग नहीं किया।
तो क्या हनुमान जी के पास गदा थी ही नहीं?
इस प्रश्न का उत्तर उनके चरित्र में ही निहित है। यह वही वीर हैं, जिन्होंने बाल्यकाल में सूर्य को फल समझकर निगलने के लिए आकाश में 400 योजन की छलांग लगाई थी। उनकी गति, शक्ति और संकल्प किसी साधारण अस्त्र से बंधे नहीं थे। उन्हें किसी गदा की आवश्यकता ही नहीं थी।
यह संभव है कि गदा उनके पराक्रम और अपराजेय शक्ति का प्रतीक बन गई हो, न कि वास्तविक युद्धोपयोगी शस्त्र। लोक परंपराओं, पौराणिक गाथाओं और भक्ति साहित्य में यह प्रतीकात्मकता धीरे-धीरे सजीव रूप लेती गई और आज गदा उनके चरित्र का अभिन्न प्रतीक बन चुकी है। किंतु मूल ग्रंथ हमें यही सिखाता है कि हनुमान जी का सबसे बड़ा शस्त्र उनका आत्मबल, भक्ति और निर्भीकता थी।
इसलिए, जब भी हम हनुमान जी की गदा-धारी छवि देखें, तो हमें यह स्मरण रहे कि उनकी शक्ति किसी शस्त्र पर निर्भर नहीं थी। वे स्वयं में एक चलती-फिरती ऊर्जा के स्रोत थे, जिनका अस्त्र उनका मन, शरीर और धर्म के प्रति अडिग समर्पण था।
यही कारण है कि आज भी हनुमान जी सिर्फ एक योद्धा नहीं, बल्कि आत्मबल, साहस और भक्ति के सबसे ऊँचे प्रतीक के रूप में पूजित हैं।
सच्चाई लक्ष्मण रेखा की
आम बोल चाल की भाषा में जब वाद विवाद के दौरान कोई अपनी मर्यादा को लांघने लगता है, अपनी हदें पार करने लगता है तब प्रायः उसे लक्ष्मण रेखा नहीं पार करने की चेतावनी दी जाती है।
आखिर ये लक्ष्मण रेखा है क्या जिसके बारे में बार बार चर्चा की जाती है? आम बोल चाल की भाषा में जिस लक्ष्मण रेखा का इस्तेमाल बड़े धड़ल्ले से किया जाता है, आखिर में उसकी सच्चाई क्या है? इस कहानी की उत्पत्ति कहां से होती है? ये कहानी सच है भी या नहीं, आइए देखते हैं?
किदवंती के अनुसार जब प्रभु श्रीराम अपनी माता कैकयी की इक्छानुसार अपनी पत्नी सीता और अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वनवास को गए तब रावण की बहन सुर्पनखा श्रीराम जी पर कामासक्त हो उनसे प्रणय निवेदन करने लगी।
जब श्रीराम जी ने उसका प्रणय निवेदन ये कहकर ठुकरा दिया कि वो अपनी पत्नी सीताजी के साथ रहते है तब वो लक्ष्मण जी के पास प्रणय निवेदन लेकर जा पहुंची। जब लक्ष्मण जी ने भी उसका प्रणय निवेदन ठुकरा दिया तब क्रुद्ध हो सुर्पनखा ने सीताजी को मारने का प्रयास किया । सीताजी की जान बचाने के लिए मजबूरन लक्ष्मण को सूर्पनखा के नाक काटने पड़े।
लक्ष्मण जी द्वारा घायल लिए जाने के बाद सूर्पनखा सर्वप्रथम राक्षस खर के पास पहुँचती है और अपने साथ हुई सारी घटनाओं का वर्णन करती है ।
सूर्पनखा के साथ हुए दुर्व्यवहार को जानने के बाद राक्षस खर अपने भाई दूषण के साथ मिलकर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण जी पर आक्रमण कर देता है ।
लेकिन सूर्पनखा की आशा के विपरीत राक्षस खर अपने भाई दूषण के साथ श्रीराम और लक्ष्मण जी के साथ युद्ध करते हुए मारा जाता है । अब सूर्पनखा के पास और कोई चारा नहीं बचता है सिवाए इसके कि वो अपने भाई रावण से सहायता मांगे ।
इसके बाद घायल सुर्पनखा रावण के पहुंच कर प्रतिशोध लेने को कहती है। रावण अपने मामा मरीच के साथ षडयंत्र रचता है। रावण का मामा मारीच सोने के मृग का वेश बनाकर वन में रह रहे श्रीराम , सीताजी और लक्ष्मण जी के पास पहुंचता है।
सीताजी उस सोने के जैसे दिखने वाले मृग पर मोहित हो श्रीराम जी से उसे पकड़ने को कहती है। सीताजी के जिद करने पर श्रीराम उस सोने के बने मारीच का पीछा करते करते जंगल में बहुत दूर निकल जाते हैं।
जब श्रीराम उस सोने के मृग बने रावण के मामा मारीच को वाण मारते हैं तो मरने से पहले मारीच जोर जोर से हे लक्ष्मण और हे सीते चिल्लाता हैं। ये आवाज सुनकर सीता लक्ष्मण जी को श्रीराम जी की सहायता हेतु जाने को कहती है।
लक्ष्मण जी शुरुआत में तो जाने को तैयार नहीं होते हैं, परंतु सीताजी के बार बार जिद करने पर वो जाने को मजबूर हो जाते हैं। लेकिन जाने से पहले वो कुटिया के चारो तरफ अपने मंत्र सिद्ध वाण से एक रेखा खींच देते हैं।
वो सीताजी को ये भी कहते हैं कि श्रीराम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में ये रेखा उनकी रक्षा करेगा। अगर वो उस रेखा से बाहर नहीं निकलती हैं तो वो बिल्कुल सुरक्षित रहेगी।
जब लक्ष्मण जी बाहर चले जाते हैं तो योजनानुसार रावण सीताजी के पास सन्यासी का वेश बनाकर भिक्षा मांगने पहुंचता है। सीताजी भिक्षा लेकर आती तो हैं लेकिन लक्ष्मण जी द्वारा खींची गई उस रेखा से बाहर नहीं निकलती।
ये देखकर सन्यासी बना रावण भिक्षा लेने से इंकार कर देता हैं। अंत में सीताजी लक्ष्मणजी द्वारा खींची गई उस लकीर के बाहर आ जाती है और उनका रावण द्वारा अपहरण कर लिया जाता है।
लक्ष्मण जी द्वारा सीताजी की रक्षा के लिए खींची गई उसी तथाकथित लकीर को आम बोल चाल की भाषा में लक्ष्मण रेखा के नाम से जाना जाता है। इस कथा के अनुसार लक्ष्मण जी ने सीताजी की रक्षा के लिए जो लकीर खींच दी थी, अगर वो उसका उल्लंघन नहीं करती तो वो रावण द्वारा अपहृत नहीं की जाती।
महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित रामायण को तथ्यात्मक प्रस्तुतिकरण के संबंध में सबसे अधिक प्रमाणिक ग्रन्थ माना जाता हैं। आइए देखते हैं महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित वाल्मिकी रामायण में इस तथ्य को कैसे उल्लेखित किया गया है। वाल्मिकी रामायण के आरण्यक कांड के पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ( अर्थात 45 वें भाग) में इस घटना का विस्तार से वर्णन किया गया है।
इस घटना की शुरुआत मारीच के श्रीराम जी द्वारा वाण से घायल करने और मरने से पहले मारीच द्वारा सीता और लक्ष्मण को पुकारने और सीता द्वारा इस पुकार को सुनकर घबड़ाने से शुरू होती है। इसका वर्णन कुछ इस प्रकार से शुरू होता है।
जब जानकी जी ने उस वन में पति के कण्ठस्वर के सदृश स्वर में आर्त्तनाद सुना, तब वे लक्ष्मण से बोलीं कि, जा कर तुम श्रीराम चन्द्र जी को देखो तो ॥ १ ॥
इस समय मेरा जी ठिकाने नहीं, चित्त न जाने कैसा हो रहा है , क्योंकि मैंने परम पीड़ित और अत्यन्त चिल्लाते हुए श्रीराम चन्द्र जी का शब्द सुना है ॥ २ ॥
जान पड़ता है, वे राक्षसों के वश में जा पड़े हैं, इसी से वे सिंहों के बीच में पड़े हुए बैल की तरह विकल हैं। सीता जी के इस कहने पर भी लक्ष्मण जी न गये, क्योंकि उनको उनके भाई श्रीरामचन्द्र जाते समय आश्रम में रह कर, सीता की रखवाली करने की आज्ञा दे गये थे ॥४॥
इस प्रकार हम देखते हैं कि जब घबड़ाकर सीताजी लक्ष्मण जी से श्रीराम चंद्र जी की रक्षा करने को कहती है, तब भी लक्ष्मण जी नहीं जाते हैं। इसका कारण ये था कि श्रीराम जी ने लक्ष्मण जी को सीता जी की रक्षा करने की आज्ञा दे गए थे।
अपनी बात को न मानते देख सीताजी क्रोध में आ जाती हैं वो लक्ष्मण जी को अनगिनत आरोप लगाने लगती हैं ताकि लक्ष्मण जी उनकी बात मानने को बाध्य हो जाएं। आगे देखते है क्या हुआ।
तब तो सीता जी ने क्रोध कर लक्ष्मण से कहा- हे लक्ष्मण , तुम अपने भाई के मित्ररूपी शत्रु हो ॥ ५ ॥ ( यदि ऐसा न होता तो ) तुम क्या उस महा तेजस्वी श्रीराम चन्द्र जी के दिन इसी प्रकार निश्चिन्त और स्थिर बैठे रहते ।
देखो जिन श्रीरामचन्द्र जी के अधीन में हो कर, तुम वन में आए हो, उन्हीं श्रीरामचन्द्र जी के प्राण जब संकट में पड़े हैं, तब मैं यहाँ रह कर ही क्या करूँगी (अर्थात यदि तुम न जायोगे तो मैं जाऊँगी)।
अब्रवीलक्ष्मणस्वस्तां सीतां मृगवधूमिव । पन्नगासुरगन्धर्वदेवमानुषराक्षसः ॥१०॥
जब जानकी जी ने प्राँखों में आंसू भर कर, यह कहा ।।८।। तब लगी के समान डरी हुई सीता जी से लक्ष्मण जी बोले कि, पन्नग, तुर, गन्धर्व, देवता, मनुष्य, राक्षस , कोई भी तुम्हारे पति (श्रीरामचन्द्र जी) को नहीं जीत सकता । इसमें कुछ भी सन्देह मत करना ।।१०।।
हे सीते ! हे शोभने ! देवताओं, मनुष्यों, गन्ध, पक्षियों, राक्षसों, पिशाचों किन्नरों, मृगों, भयङ्कर वानरों में कोई भी ऐसा नहीं. जो इन्द्र के समान पराक्रमी श्रीराम चन्द्र के समाने रण क्षेत्र में खड़ा रह सके । युद्धक्षेत्र में श्री रामचन्द्र जी अजेय हैं। अतः तुमको ऐसा कहना उचित नहीं ||११|| १२||१३||
श्रीरामचन्द्र की अनुपस्थिति में, मैं तुम्हें इस वन में अकेली छोड़ कर नहीं जा सकता। बड़े बड़े बलवानों की भी यह शक्ति नहीं कि, वे श्रीराम चन्द्र।जी के बल को रोक सकें ॥१४॥
अगर तीनों लोक और समस्त देवताओं सहित इन्द्र इकट्ठे हो जाएँ , तो भी श्रीराम चन्द्र जी का सामना नहीं कर सकते । यतः तुम सन्ताप को दूर कर, आनन्दित हो ॥ १५ ॥
उस उत्तम मृग को मार तुम्हारे पति शीघ्र आ जायगे । जो शब्द तुमने सुना है, वह श्रीरामचन्द्र जी का नहीं है, यह तो किसी का बनावटी शब्द है ॥१६॥
बल्कि गंधर्व नगर की तरह यह उस राक्षस की माया है। हे सीते ! महात्मा श्रीरामचन्द्र जी मुझको, तुम्हें धरोहर की तरह सौंप गये हैं । अतः हे वरारोहे ! मैं तुम्हें अकेला छोड़ कर जाना नहीं चाहता |
हे वैदेही ! एक बात और है जनस्थान निवासी खर आदि राक्षसों का वध करने से राक्षसों से हमारा वैर हो गया है । इस महावन में राक्षस लोग हम लोगों को धोखा देने के लिये भाँति भाँति की बोलियां बोला करते हैं ॥१७॥१८॥१६॥
और साधुओं को पीड़ित करना राक्षसों का एक प्रकार का खेल है । अतः तुम किसी बात की चिन्ता मत करो। जब लक्ष्मण ने इस प्रकार कहा, तब सीता जी के नेत्र क्रोध के मारे लाल हो गये ॥२०॥
लक्ष्मण जी सीताजी जी इन बातों को सुनकर भी विचलित नहीं होते। उन्हें अपने अग्रज श्रीराम जी की शक्ति पर अपार आस्था है। उल्टे वो सीताजी को समझाने की कोशिश करने लगते हैं। लक्ष्मण जी की कोशिश होती है कि जिस प्रकार उनकी आस्था श्रीराम जी में हैं उसी तरह का विश्वास सीताजी में भी स्थापित हो जाए।
लक्ष्मण जी सीताजी ये भी समझाते हैं कि खर इत्यादि राक्षसों का वध करने से सारे राक्षस उनके विरुद्ध हो गए हैं। इस कारण तरह तरह की ध्वनि निकाल कर ऊनलोगों को परेशान करने की कोशिश कर रहे हैं। परंतु सीताजी पर इसका ठीक विपरीत असर होता है।
इन बातों को सुनकर सीताजी क्रोध में आ जाती हैं और उग्र होकर लक्ष्मण जी को अनगिनत बातें कहती हैं जिस कारण लक्ष्मण जी को मजबूरन सीताजी को अकेला छोड़कर जाना पड़ता है। वो आगे इस प्रकार कहते हैं।
मैं तो श्रीरामचन्द्र जी की आज्ञा मान, तुम्हें अकेली छोड़ कर, नहीं जाता था किन्तु हे बरानने , तुम्हारा मङ्गल हो , लो मैं श्रीरामचन्द्र के पास जाता हूँ ॥ ३३ ॥
अपि त्वां सह रामेण पश्येयं पुनरागतः ॥३५॥
हे विशालाचि ! समस्त वनदेवता तुम्हारी रक्षा करें। इस समय बड़े बुरे बुरे शकुन मेरे सामने प्रकट हो रहे हैं ॥ ३४ ॥ क्या मैं श्रीरामचन्द्र सहित लौट, फिर तुम्हें ( यहाँ ) देख सकूँगा ॥३५॥
विशालनयना जनकनन्दिनी को ऐसे व्यार्त्तभाव से, उदास हो रोते हुए देख, लक्ष्मण ने उनको समझाया बुझाया, किन्तु जानकी जे अपने देवर से फिर कुछ भी न कहा (अर्थात रूठ गयीं )॥ ४०॥
अन्वीक्षमाणो बहुशश्च मैथिलीं जगाम रामस्य समीपमात्मवान् ॥४१॥
तदनन्तर जितेन्द्रिय लक्ष्मण जी हाथ जोड़ और बहुत झुक कर सीता जी को प्रणाम कर और बार बार सीता को देखते हुए श्रीरामचन्द्र के पास चल दिये ॥४१॥
इस प्रकार जानकी की कटूक्तियों से कुपित हो, लक्ष्मण जी वहां से जाने की बिलकुल इच्छा न रहते भी, श्रीराम चन्द्र जी के पास तुरन्त चल दिये ॥१॥
जब लक्ष्मण जी के बार बार समझाने पर भी सीता जी नहीं मानती, उल्टे लक्ष्मण जी को बुरा भला कहने लगती हैं तब लक्ष्मण जी के बार और कोई उपाय नहीं रह जाता हैं सिवाए इसके कि सीताजी की आज्ञानुसार वो प्रभु श्रीराम के पास पहुंचकर उनकी रक्षा करें । हालांकि उनके मन में शंका के अनगिनत बादल मंडराने लगते हैं फिर भी लक्ष्मण जी सीताजी को अकेले छोड़कर जाने को बाध्य हो जाते हैं । इसके बाद क्या होता है, आइए देखते हैं।
इतने में एकान्त अवसर पा, रावण ने सन्यासी का भेष बनाया और वह तुरन्त सीता के सामने जा पहुँचा ॥२॥
उस समय रावण स्वच्छ रुमा रङ्ग के कपड़े पहिने हुए था, उसके सिर पर चोटी थी, सिर पर छत्ता लगाये और पैरों में खड़ाऊ पहिने हुए था । उसके वाम कंधे पर त्रिदण्ड था और हाथ में कमण्डलु लिये हुए था ॥३॥
जब इस प्रकार रावण ने सीता जी की प्रशंसा की तब उस संन्यास वेषधारी रावण को आया हुआ देख, सीता जी ने उसका यथा विधि प्रातिथ्य किया ॥ ३२॥
अब्रवीत्सिद्धमित्येव तदा तं सौम्यदर्शनम् ।। ३३ ।।
सीता ने पहले उसे बैठने को आसन दिया,।फिर पैर धोने का जल दिया, फिर फल आदि भोज्य पदार्थ देते हुए कहा, यह सिद्ध किये हुए पदार्थ हैं ( अर्थात् भूंजे हुए अथवा पकाये हुए ) ॥ ३३ ॥
सीताजी को अकेले पाकर रावण सन्यासी का वेश बनाए हुए वहां पहुंचता है । रावण के सन्यासी वेश में स्वयं की प्रशंसा करते हुए देख सीताजी सर्वप्रथम उसका आदर करती हैं और खाने के लिए फल आदि भी प्रदान करती हैं। फिर सीताजी रावण से उसका परिचय जानना चाहती है। जब उत्तर में रावण अपना अभिमान भरा परिचय देता है। सीताजी जी प्रतिउत्तर में रावण को अपने पति श्रीराम चंद्र जी के अद्भुत पराक्रम का वर्णन करने लगती हैं।
अब आप अपना नाम, गोत्र और कुल ठीक ठीक बतलाइये और यह भी बतलाइये कि, आप अकेले इस दण्डकवन में क्यों फिरते हैं ॥ २४ ॥
जब सीता जी ने ऐसे वचन कहे, तब महावली राक्षस नाथ रावण ने ये कठोर वचन कहे ॥ २५ ॥
हे सीते ! जिसके डर से देवताओं, असुरों और मनुष्यों सहित तीनों लोक थरथराते हैं, मैं वही राक्षसों का राजा रावण हूँ ॥ २६ ॥
सीता जी अपना परिचय देते हुए कहती जो सब शुभ लक्षणों से युक्त और वटवृक्ष की तरह सबको सदैव सुखदायी हैं, उन सत्यप्रतिज्ञ और महाभाग श्रीरामचन्द्र की मैं अनुगामिनी हूँ ३४ ॥
“कूपोदकं वटच्या युवतीनां स्तनद्वयम् । शीतकाले भवेत्युष्णमुष्णकाले च शीतलम् ॥” ]
महावाहुं महोरस्कं सिंहविक्रान्तगामिनम् नृसिंहं सिंहसङ्काशमहं राममनुव्रता ।। ३५ ।।
महावाहु, चौड़ी छाती वाले, सिंह जैसी चाल चलने वाले, पुरुष सिंह, और सिंह से समान पराक्रमी श्रीरामचन्द्र की मैं अनुगामिनी हूँ || ३५ ॥
मैं उन राजकुमार एवं जितेन्द्रिय श्रीराम की अनुगामिनी हूँ, जिनका मुख पूर्णमासी के चन्द्रमा के तुल्य है, जिनकी कीर्ति दिग दिगन्त व्यापिनी है और जो महात्मा हैं ॥ ३६॥
सो तू शृगाल के समान हो कर, सिंहनी के तुल्य मुझे चाहता है । किन्तु तू मुझे उसी प्रकार नहीं छू सकता, जिस प्रकार सूर्य की प्रभा को कोई नहीं छू सकता ॥ ३७॥
सीताजी रावण के अभिमान भरे शब्दों से डरती नहीं अपितु राम जी पराक्रम से उसे परिचय करवाते हुए उसे धमकाती भी है। स्वयं के लिए अपमान जनक शब्दों का प्रयोग होते देखा रावण क्रोध में आकर अपना रौद्र रूप प्रकट करता है और फिर सीताजी का बलपूर्वक अपहरण कर लेता है।
हे भीरु ! यदि तू मेरा तिरस्कार करेगी, तो पीछे तुझको वैसे ही पछताना पड़ेगा, जैसे उर्वशी अप्सरा राजा पुरूरवा के लात मार कर, पछतायी थी ॥१८॥
अङ्गुल्या न समो रामो मम युद्धे स मानुषः ।
तव भाग्येन सम्प्राप्तं भजस्व वरवर्णिनि ।।१९॥
राम मनुष्य है, वह युद्ध में मेरी एक अंगुली के वल के समान भी ( वलवान् ) नहीं है । (अर्थात् उसमें इतना भी बल नहीं, जितना मेरी एक अंगुली में है) अतः वह युद्ध में मेरा सामना कैसे कर सकता है। हे वरवर्णिनी ! इसे तू अपना सौभाग्य समझ कि, मैं यहाँ आया हूँ । अतः तू मुझे अङ्गीकार कर ॥ १६ ॥
रावण के ऐसे वचन सुन, सीता कुपित हो और लाल लाल नेत्र कर, उस निर्जन वन में रावण से कठोर वचन बोली ॥ २० ॥
हे रावण ! तू सर्वदेवताओं के पूज्य कुवेर को अपना भाई बतला कर भी, ऐसा बुरा काम करने को ( क्यों ) उतारु हुआ है ? ॥२१॥
मैं प्रकाश में बैठा बैठा अपनी भुजाओं से इस पृथिवी को उठा सकता हूँ, और समुद्र को पी सकता हूँ और काल को संग्राम में मार सकता हूँ ॥३॥
अर्क रुन्ध्यां शरैस्तीक्ष्णैर्निर्भिन्द्यां हि महीतलम् । कामरूपिणमुन्मत्ते पश्य मां कामदं पतिम् ॥४॥
मैं अपने पैने बाणों से सूर्य की गति को रोक सकता हूँ और पृथिवी को विदीर्ण कर सकता हूँ । हे उन्मत्ते ! मुझ इच्छारूपधारी और मनोरथ पूर्ण करने वाले पति को देख । ( अर्थात् मुझे अपना पति बना ) ॥४॥
एवमुक्तवतस्तस्य सूर्यकल्पे शिखिप्रभे । क्रुद्धस्य ‘हरिपर्यन्ते रक्ते नेत्र बभूवतुः ॥५॥
उसी क्षण कुबेर के छोटे भाई रावण ने अपने उस संन्यासी भेष को त्याग, काल के समान भयङ्कर रूप धारण किया ॥६॥
इस प्रकार हम देखते हैं कि वाल्मिकी रामायण के आरण्यक कांड के पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ( अर्थात 45 वें भाग) में इस घटनाक्रम में लक्ष्मण द्वारा सीताजी की रक्षा करने के लिए किसी भी प्रकार की लकीर या रेखा को खींचने का वर्णन नहीं आता है।
जब सीताजी रावण से उसका परिचय पूछती हैं तो वो सन्यासी वेश में हीं अपना सम्पूर्ण परिचय देता है। रावण यहां पर सीता जी के किसी लकीर से बाहर आने का इंतजार नहीं करता, बल्कि सीताजी के पूछने पर सन्यासी वेश में हीं अपना परिचय दे देता है।
रावण द्वारा स्वयं को राक्षस राज बताए जाने का सीता जी पर कोई असर नहीं होता। सीताजी का यहां साहसी व्यक्तित्व रूप प्रकाशित होता है। वो रावण से डरती नहीं अपितु उसे धमकाती भी हैं। ऐसी साहसी स्त्री के लिए भला किसी रेखा की जरूरत हो भी क्या सकती थी।
लक्ष्मण रेखा के खींचे जाने की कहानी कब , कहाँ , कैसे और क्यों प्रचलित हो गई इसके बांरे में ना तो ठीक ठीक जानकारी हीं प्राप्त है और ना हीं कोई ठीक ठीक से अनुमान हीं लगा सकता है।
अब कारण जो भी रहा हो लेकिन ये बात तो तय हीं हैं कि किसी ने इसके बारे में तथ्यों को खंगाला नहीं । सुनी सुनी बातों को मानने से बेहतर तो ये है कि प्रमाणिक ग्रंथों में इसकी तहकीकात की जाय , और जहाँ तक तथ्यों के प्रमाणिकता का सवाल है , वाल्मीकि रामायण से बेहतर ग्रन्थ भला कौन सा हो सकता है ?
और जब हम लक्ष्मण रेखा के सन्दर्भ में वाल्मीकि रामायण की जाँच पड़ताल करते हैं तो ये तथ्य निर्विवादित रूप से सामने निकल कर आता है कि लक्ष्मण रेखा कभी अस्तित्व में आई हीं नहीं थी।
वाल्मिकी रामायण के अरण्यक कांड इस तरह की लक्ष्मण रेखा खींचने का कोई जिक्र हीं नहीं आता है। लक्ष्मण रेखा की घटना जो कि आम बोल चाल की भाषा में सर्वव्याप्त है दरअसल कभी अस्तित्व में था हीं नहीं। लक्ष्मण रेखा की वास्तविक सच्चाई ये है कि लक्ष्मण रेखा कभी खींची हीं नहीं गई।
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