Wednesday, October 14, 2026

भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता?

भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता?

भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता,
रात-रात भर शोर मचाता?
दिन में रहता मौन समाधि,
रात बने संगीत का गांधी!
टर्र-टर्र की ऐसी तान,
सो न सके पूरा मकान!
मच्छर बोला—“गायक जी,
काहे करते रियाज़ जी?”
मेंढक बोला—“मूर्ख मच्छर!
मैं हूँ जंगल का सुपरस्टार!
मेरी आवाज़ सुनकर ही तो,
बरसता है मेघों का प्यार!”
बगुला बोला—“वाह उस्ताद!
खूब बजाते अपना नाद!
एक ज़रा-सी तान सुनाओ,
पास में आकर सुर बतलाओ!”
मेंढक बोला—“दूर रहो जी,
मेरे सुर से जलते हो जी!
मेरी आवाज़ में है दम,
तुम क्या जानो संगीत का गम!”
तभी वहाँ पर आया हाथी,
बोला—“बंद करो बरसाती!
टर्र-टर्र से फटा है माथा,
किसने तुझको गायक बनाया?”
मेंढक बोला—“सुन गजराज,
कला नहीं है कोई मोहताज!
मेरी आवाज़ का है जलवा,
दुनिया भर में मेरा जलसा!”
हाथी बोला—“ठीक है भाई,
एक प्रतियोगिता रखवाई!
जो सबसे ऊँचा गाना गाए,
वही जंगल का रत्न कहलाए!”
मेंढक ने फिर गला फुलाया,
पेट गुब्बारे-सा फैलाया,
टर्र-टर्र की ऐसी मारी,
काँप उठी तालाब की क्यारी!
तभी अचानक आया साँप,
मेंढक जी के उड़ गए भाप!
टर्र-टर्र सब भूल गए,
सीधे पानी में कूद गए!
हाथी बोला—“कहाँ गए गायक?
कहाँ गया संगीत का नायक?
अभी तलक थे बड़े सितारे,
अब क्यों छिपते हो बेचारे?”
मेंढक बोला—“बात है न्यारी,
जान है सबसे अधिक प्यारी!
गाना-वाना बाद में होगा,
पहले साँप का नाशा होगा!”
साँप ने पूछा—“क्यों महाराज,
बंद हुआ क्या सुर का साज़?”
मेंढक बोला—“अरे जनाब,
डर के आगे बंद किताब!”
तभी मच्छर ने बात सुनाई,
हँसते-हँसते शाम बिताई—
“भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता,
जब ख़तरा देख छिप जाता?
शेर बने तो शेर ही रहना,
वरना चुपचाप पानी में रहना!”
ढक बोला—“सुनो भाई,
बात तुम्हारी समझ में आई!
टर्राना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार,
पर ख़तरे में भागना भी व्यवहार!”
हा हा ही ही, हू हू हू,
भई मेंढक, अब मत टर्राना यूँ!
हा हा ही ही, हू हू हू,
टर्राना कम, अक्ल लगाना—
वरना साँप करेगा कुकड़ू-कूँ

हा हा ही ही, हू हू हू!


एक मुर्गा सोचा सीना तान,
अब न कभी होगा बिहान,
जो मैं ना बोलूँगा कुकड़ू-कूँ,
हा हा ही ही, हू हू हू!
बोला—“मेरे दम पर दुनिया,
मेरे दम पर चाँद-सितार,
मेरी बाँग से सूरज जागे,
मैं ही हूँ दिनकर सरकार!”
मुर्गी बोली—“बड़े मियाँ,
किस खेत की मूली हो मियाँ?
कल जो तुमको खाँसी आई,
सूरज ने छुट्टी न मनाई!”
मुर्गा बोला—“चुप बदज़ात!
तुझको क्या ब्रह्मांड की बात?
आज न बाँग लगाऊँगा,
सूरज को भूखा सुलाऊँगा!”
रात गई, फिर भोर हुई,
सूरज की पेशी और हुई!
बिना बुलाए हाज़िर होकर,
चमका ऐसे आँखें खोलकर!
मुर्गा देख हुआ हैरान,
लुट गया उसका स्वाभिमान!
बोला—“यह कैसा अन्याय?
बिना बुलाए सूरज आय!”
तभी किसान ने दरवाज़ा खोला,
मुर्गे को देखकर यूँ बोला—
“आज न बाँग? बड़े नवाब!
क्या सरकार ने किया ख़िताब?”
र्गा बोला—“सुन किसान,
मैं हूँ कलाकार महान!
मेरी बाँग की कीमत आँको,
पहले मेरी तनख़्वाह बाँटो!”
किसान बोला—“वाह उस्ताद!
काम न धेला, माँगे प्रसाद!
तेरी बाँग के बिना बिहान,
फिर भी चलता मेरा मकान!”
हा हा ही ही, हू हू हू,
मुर्गे का निकला कुकड़ू-कूँ!

Tuesday, October 13, 2026

खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,खर्र... खर्राटा!

[Sound of Snoring in a Musical Manner]

खर्र-खर्र, खर्र-खर्र, खर्र... खर्राटा
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र, खर्र... खर्राटा
[Eco]

कमरे में था घोर सन्नाटा,
फिर कैसा ये हुआ धमाका?
जैसे बारिश झर्र झर्राटा

[Bridge]

खर्र-खर्र, खर्र-खर्र, खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र, खर्र... खर्राटा

[Eco]

बिस्तर पर श्रीमान विराजे,
तकियों पर अधिकार जमाए,
दिन भर रहे काम से घायल,
रात हुए इंजन के पायल!
नाक जैसे कोई बादल फाटा 

[Bridge]
[Sound of Snoring in a Musical Manner]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!

[Eco]

पत्नी बोली—“सुनते हो जी,
बंद करो ये तोपें जी!
घर है या कोई रेलवे स्टेशन,
कहाँ गया वो साइलेंस नोशन?”
पति ने करवट ली तत्काल,
नाक बढ़ा दी सुर की चाल,
सोए बोले टाटा टाटा

[Bridge]
[Sound of Snoring in a Musical Manner]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!

[Eco]

पड़ोसी ने डोर बजाया,
“भाई भूकंप ये कैसे आया?
दीवारें तक हिलती जातीं,
मेरी नींद उड़ी है साथी!”
एक बोला—“ये बादल गरजे!”
दूजा बोला—“बम हैं बरसे!”
तीजा बोला—“चले पटाखा

[Bridge]
[Sound of Snoring in a Musical Manner]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!

[Eco]

सुबह हुई तो पत्नी बोली,
“रात तुम्हारी पोल है खोली!
तुम सोए, हम रहे जागते,
दाँत पीसकर रहे भागते!”
पति ने मूँछों पर फेरा,
दीप तले यूँ घोर अंधेरा
तुझे जगाकर सुबह उठाकर 
रोज करवाए सैर सर्राटा 

[Bridge]
[Sound of Snoring in a Musical Manner]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!

[Eco]

अमिताभ कहें सुन हे नर-नारी,
खर्राटा बड़ी चीज़ करारी!
जिसके खर्राटे में दम-खम,
उसका घर चलता है हरदम!
खर्राटे का यही नज़ारा 
सबको सही समय उठाता 
और दौड़ाए फर फर्राटा

[Bridge]

[Sound of Snoring in a Musical Manner]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!

[Bridge]

हां कमरे में हुआ धमाका
ज्यों कानों में लगा झन्नाटा 
च च च च चम चम चांटा 
[Eco]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा
[Eco]
[Sound of Snoring in a Musical Manner]

छींक तू बड़ा सताती

[Loud Nose Sneezing Loud Sound]

[Eco]

आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती

[Bridge]

रात हुई, हम बिस्तर पर थे, ओढ़ चादर महारानी,
नींद खड़ी थी द्वार पे लेकर सपनों की कहानी ।
ज्यों ही आँख लगी हमारी, तूने बिगुल बजाया,
तकिया बोला “हे भगवान! फिर किसको जगवाया?”
नींद गई ससुराल हमारे, सपने हुए पराए,
पड़ोसी बोले “कौन पटाखे आधी रात चलाए?”

[Loud Nose Sneezing Loud Sound]

[Eco]

सबको यूं क्यों जगाती
छ छ छींक, तू बड़ा सताती!
आ आ आ आक आक्छी आती


[ECO]
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती

[Bridge]

एक दिवस हमने नाक पकड़कर तुझसे प्रश्न उठाया
किस विभाग में नौकरी करती, किसने तुझे बनाया
जब हम खाली बैठे होते, तब हीं मुँह लटकाती,
बॉस के आगे, इश्क़ के भीतर, चक्कर  चलाती?”
अरे ओ छींक तेरा टाइम क्यों  नहीं है फिक्स,
जहाँ मिले गंभीर माहौल, वहीं लगाती सिक्स!”

[Loud Nose Sneezing Loud Sound]

[Eco]

अपनी हीं हुक्म चलाती 
छ छ छींक, तू बड़ा सताती!
आ आ आ आक आक्छी आती


[ECO]
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती

[Bridge]

अब तो तुझसे हाथ जोड़कर इतनी विनती करते,
आने से पहले एक संदेशा भेज दिया कर, डरते!
मीटिंग में तू छुट्टी ले ले, इश्क़ में तू मौन धरे,
परीक्षा में अवकाश मना ले, मंदिर में भी ना उतरे!
घर में जब हम मूँगफली के दाने छील रहे हों,
तब आना जी, पंद्रह की खेप खुशी से दे जाओ!

[Loud Nose Sneezing Loud Sound]

[Eco]

सबको क्यों है डराती 
छ छ छींक, तू बड़ा सताती!
आ आ आ आक आक्छी आती


[ECO]

आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती

[Bridge]

नाक हमारी, राज तुम्हारा, कैसी यह मनमानी,
हम मालिक कहलाते फिर भी, तू निकली महारानी!
रुमालों का खर्च बढ़ा दिया, इज़्ज़त की निकली हवा,
तेरे आगे नाक कटाकर, घूम रहे हम बेवजह!
फिर भी तुझसे बैर न ठानें, आखिर तू है अपनी,
बस इतना कर समय देखकर बजा  बीन अपनी!

[Loud Nose Sneezing Loud Sound]

[Eco]

बात ना क्यों पतियाति 
छ छ छींक, तू बड़ा सताती!
आ आ आ आक आक्छी आती


[ECO]
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती

Friday, October 2, 2026

ओ खुजली


एक योगी, उसकी साधना और खुजली महारानी की हास्यपूर्ण महागाथा!

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर 

[Bridge]

ख ख खुजली! बहुत सताती,
बार-बार क्यों लौट के आती?
कभी यहाँ तो कभी वहाँ,
जाने है तू कहाँ कहाँ!
जब भी बैठूँ ध्यान लगाने,
तू आ जाती मुझे सताने!
प्रभु नाम जपूँ जब माला,
कर देती तू गड़बड़झाला!
हुं हुं! हे हे! हाय रे दाता!
ख ख खु क्यों दिया विधाता!
आँखें मूँद जब ध्यान लगाऊँ
मन में प्रभु गान गुन गुनाऊं 
जभी शांति की लहर है आती,
तभी पीठ खुजली आ जाती
कभी कंधे पर ढोल बजाए,
कभी कमर को गोल नचाये,
कभी नाक पर नृत्य दिखाए,
कभी कान कु कृत्य रचाए!
मैं समझूँ जब ब्रह्म मिलेगा,
ये कहती है नाखून हिलेगा!
हुम् हुम्! हुड़दंग मचाती!
ध्यान की खिचड़ी रोज जलाती!

[Bridge]

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर
ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर

[Bridge]

ख ख  खुजली! शर्म तो कर,
योगी हूँ, थोड़ा तो रहम कर!
जटा बढ़ाई, भभूत रमाई,
तब जाकर ये शांति पाई!
बड़ी मुश्किल से संत बनाया,
ध्यान तप से खुद को तपाया। 
तूने मुझको बंदर बनाया!
कभी उछलता, कभी मटकता,
कभी हवा में हाथ पटकता!
मैं क्या अपना दुखड़ा रोऊँ,
पहले अपनी पीठ तो धोऊँ!
हे हे! हो हो! सुनो कहानी!
ख ख खुजली बड़ी सयानी!
कौन शत्रुता तू है निभाती,
जो हर पल मुझको तड़पाती?
माथे पर जब ध्यान लगाऊँ,
तब तू ठुड्डी पर चढ़ आऊँ!
ठुड्डी खुजलाऊँ, पीठ मचलती,
पीठ खुजलाऊँ, नाक उछलती!
नाक खुजलाऊँ, कान बुलाए,
कान खुजलाऊँ, पैर मचल जाए!
पैर खुजलाऊँ, पेट पुकारे,
लगता तन में भूत हैं सारे!
सोचा मैंने, धैर्य धरूँगा,
तन की इच्छा से न डरूँगा,
दाँत भींचकर बैठा आसन,
जैसे सहूँ हिमालय-शासन!
पाँच मिनट तक वीर बना मैं,
छठे मिनट अधीर बना मैं!
सातवें मिनट हाथ उठाया,
आठवें में आसन डगमगाया!
नौवें मिनट हुआ धमाका,
पीठ खुजलाने का मन जागा!
दसवें मिनट हार के बोला—
“प्रभु! कैसा चक्र तन डोला?”

[Bridge]

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर
ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर

[Bridge]

हुं हुं! हे हे! हाय रे दाता!
खुजली ने फिर ध्यान छुड़ाया!
ओ खुजली! तू बहुत सताती,
बार-बार क्यों लौट के आती?
जग ताज प्रभु को ध्यान लगाऊँ 
तुझसे कैसे मुक्ति पाऊँ?
तू तन की छोटी-सी रानी,
तेरी महिमा बड़ी सयानी!
तेरे आगे योगी हारे,
रोते रोते संत पुकारे—
“प्रभु! मोक्ष मिले तो मिल जाए,
पहले ख ख खुजली दूर भगाए!”
हा हा! हुं हुं! ओम नमः शिवाय!
ख ख खुजली जय हो भाई ।
प्रभु मिले कब जय हो साईं 
पहले जय हो खुजली भाई  

[Bridge]

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर
ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर

====

ओ खुजली! तू बहुत सताती,
बार-बार क्यों तू आ जाती?
जब भी बैठूँ ध्यान लगाने,
तू आ जाती मुझे सताने!
आँखें मूँद, लगाऊँ ध्यान,
मन में गूँजे प्रभु का गान,
अभी शांति की लहर है आती,
तू पीठ पर डमरू बजाती!
ओ खुजली! कुछ तो शर्म कर,
योगी हूँ, थोड़ा तो रहम कर!
कौन शत्रुता तू है निभाती,
जो हर पल मुझको तड़पाती?
माथे पर जब ध्यान लगाऊँ,
तब तू ठुड्डी पर चढ़ आऊँ!
ठुड्डी खुजलाऊँ, पीठ मचलती,
पीठ खुजलाऊँ, नाक उछलती!
खुजली बोली, “सुन ओ बाबा,
मत समझो मुझको कोई अजूबा!
जब तक तन से मोह न जाएगा,
मेरा आना-जाना चलता जाएगा!”
योगी बोला, “वाह रे ज्ञानी!
तूने भी दी बात सयानी!
मोह छोड़ने बैठा था मैं,
तुझमें ही उलझा रहता हूँ मैं!”
फिर दोनों में हुई सुलह,
योगी ने ली गहरी साँस,
जैसे ही वह ध्यान में बैठा,
खुजली बोली— “मैं हूँ पास!” 
ओ खुजली! तू बहुत सताती,
बार-बार क्यों तू आ जाती?
जग को छोड़ प्रभु को ध्याऊँ,
तुझसे कैसे मुक्ति पाऊँ?

गांडीव की टंकार

तेरह वर्ष अँधियारे बीते, फिर अरुणोदय आया है, वन की ज्वाला में तपकर अब, पार्थ प्रखर हो आया है। जिसको तुमने मौन समझकर, दुर्बलता का नाम दिया, उसने अपने धैर्य-वज्र से, काल-चक्र को थाम लिया!

वन की धूल नहीं यह समझो, यह रण का शृंगार बनी, तप की प्रत्येक अग्नि आज, प्रतिशोध नहीं, हुंकार बनी। जिस भुजा ने देवों के सम्मुख, मृत्यु-द्वार ललकारा था, आज उसी के सम्मुख देखो, कुरुकुल का अँधियारा था!

दुर्योधन! मत समझो मुझको, वन ने शिथिल बनाया है, जिसको विपदा ने तपाया हो, वह वज्र बनकर आया है! भूख मिली तो क्षुधा सहा, अपमान मिला तो मौन रहा, भाग्य प्रहारों से टकराकर, मैं अपने पथ पर अडिग रहा!

मुझको न स्वर्ण-मुकुट की इच्छा, न साम्राज्य का मोह मुझे, न जयमालाओं की लालसा, न यश का आकर्षण मुझे। मैं तो उस अधिकार हेतु आया, जिसका हरण किया तुमने, धर्मराज के सत्य-राज्य को, छल से छीन लिया तुमने!

कहाँ गया वह दर्प तुम्हारा, कहाँ सभा की वाणी है? कहाँ गई वह हँसी तुम्हारी, कहाँ दुष्ट अभिमानी है? कहाँ गया वह गर्व, बताओ, जो नारी पर भारी था? कहाँ गया वह न्याय, तुम्हारा, जो केवल दरबारी था?

याद करो उस सभा-भवन को, जहाँ धर्म लज्जित था, जहाँ द्रौपदी का प्रश्न खड़ा था, और मौन प्रतिष्ठित था। केश खिंचे, आँसू बरसे थे, काँपा था सम्मान वहाँ, किन्तु तुम्हारे गर्वित मन में, जागा नहीं विधान वहाँ!

वह अपमान अभी जीवित है, वह प्रतिज्ञा भी शेष यहाँ, न्याय प्रतीक्षा करता अब तक, कुरुवंश के इस देश यहाँ। मैं उस पीड़ा का प्रतिशोधी बनकर मात्र नहीं आया, धर्म-तुला पर कर्म तुम्हारे रखने आज चला आया!

आज परीक्षा पार्थ की नहीं, कौरव-कुल की होगी, आज तुम्हारे शौर्य-गर्व की अंतिम कसौटी होगी! देखें किसकी भुजा प्रचंड है, किसका साहस सच्चा है, किसके भीतर धर्म जागता, किसका मन बस कच्चा है!

मत पूछो कि संख्या कितनी है, मत गिनना रथ, घोड़े, मत देखो कितने धनुर्धर हैं, कितने भाले, कितने कोड़े। जब संकल्प हिमालय बनता, सेना गौण हो जाती है, एक अकेली सत्य-प्रतिज्ञा, युग पर भारी पड़ जाती है!

आज न वाणी युद्ध करेगी, न छल का व्यापार चलेगा, आज न कुटिल नीतियों का कोई अत्याचार चलेगा। आज धनुष की टंकारों में, उत्तर सारे मिल जाएँगे, आज कर्म के लेख स्वयं ही, भाग्य-विधान लिख जाएँगे!

मैं प्रतिशोध-ज्वाला का दास नहीं, धर्माग्नि का रक्षक हूँ, अन्यायों के घोर तिमिर में, सत्य-सूर्य का वाहक हूँ। कुन्ती-सुत हूँ, पार्थ नाम है, गांडीव मेरी पहचान, कर्मभूमि में सत्य निभाना, मेरा धर्म, मेरा प्राण!

तेरह वर्षों की तप-साधना, आज मुखर होने आई, मौन हृदय की ज्वाला अब, रण में प्रखर होने आई। वन-वन भटका, कष्ट सहे, पर धैर्य नहीं खोने पाया, काल स्वयं भी रोक न पाया, जो संकल्प हृदय में आया!

अब तक वन की धूल सही है, अब रण-धूल उड़ाऊँगा, अब तक मौन रहा गांडीव, अब उसका नाद सुनाऊँगा! अब तक रोका था वेग बाण का, अब वह वेग बहेगा, जिसने धर्म-वृक्ष काटा है, उसका फल भी ढहेगा!

संख्या का अभिमान न करना, शस्त्रों पर मत इतराना, वीर वही जो धर्म हेतु, संकट में भी शीश उठाना। रथ पर रथ हों, सैन्य अपार हो, नभ तक उठते ध्वज हों, सत्य अकेला खड़ा रहे तो, उसके आगे सब नगण्य हों!

आज न क्षमा-विनय की बेला, आज न मिथ्या मान, आज कर्म की कसौटी पर, तौला जाएगा अभिमान। कौन धनुर्धर, कौन महाबल, कौन प्रतिज्ञा का धनी, आज धरा पर लिखेगी गाथा, किसकी कीर्ति अमिट बनी!

आज दिशाओं के हृदयों में, कम्पन भरने वाला हूँ, गिरि-शिखरों की निद्रा तोड़ूँ, ऐसा स्वर करने वाला हूँ। प्रत्यंचा की एक टंकार से, नभ का मौन टूट जाएगा, सोया हुआ समय भी सुनकर, युग-परिवर्तन गाएगा!

आज न मेघों की गर्जन से, धरती भयभीत होगी, न बिजली की चपला से ही, रात प्रकाशित होगी। आज धनंजय के धनुषों से, अग्नि-स्वर फूटेंगे, आज बाण के वेग देखकर, पर्वत भी सिर झुकाएँगे!

प्राची पर अरुणिम आभा है, तम का अंत निकट आया, धर्म-सूर्य का रथ लेकर, पार्थ पुनः रण में आया। उठो कुरुवंश! सुनो ध्यान से, काल-द्वार पर चोट पड़ी, गाण्डीव की गर्जना उठी है, अधर्म-रात्रि की साँस अड़ी!

एक-एक अपमान हृदय में, अंगारों-सा पलता था, एक-एक अन्याय समय की, शिला पर अंकित चलता था। मैंने पीड़ा को पीकर भी, धैर्य-दीप जलने दिया, मैंने अपने क्रोध-विष को, धर्म-अमृत बनने दिया!

सुनो! धनुष की ध्वनि केवल, शस्त्रों का उद्घोष नहीं, यह पीड़ित जन के अधिकारों का, कोई साधारण घोष नहीं। ये बाण नहीं केवल लोहे के, ये प्रतिज्ञा के दूत बने, ये उन सबके प्रश्न हैं, जो अन्यायों से मौन सने!

पर याद रहे, हे कुरुवंशियो, रण केवल संहार नहीं, धर्म-विजय का अर्थ किसी का, अंधा अहंकार नहीं। जो न्याय बचाने हेतु उठता, वही शस्त्र पवित्र बने, जो लोभ हेतु रक्त बहाता, उसके यश भी धूल बनें!

आज पार्थ के बाण लिखेंगे, रणभूमि का इतिहास, आज परखे जाएँगे सारे, नीति, शौर्य और विश्वास। धर्म खिलेगा, सत्य फलेगा, टूटेंगे अन्याय-पाश, काल स्वयं साक्षी होगा, किसने निभाया धर्म-व्रत-विशेष!

आज न केवल पार्थ जगेगा, आज युगों का मान जगे, आज पराजित छल होगा, आज सत्य का गान जगे। देखो! नभ के वक्षस्थल पर, अग्नि-लिपि उभरने दो, गाण्डीव की टंकारों से, सोया इतिहास जगने दो!

मैं अर्जुन हूँ—वचन निभाने रणभूमि में आया हूँ, धर्म बचाने, सत्य जगाने, गांडीव उठाकर आया हूँ! आज बाण ही बोलेंगे, आज कर्म ही प्रमाण, आज धरा पर गूँजेगा—धर्मधनंजय का जयगान!

जिस नारी के केश खिंचे थे, उस सभा में शपथ शेष है,
उस अबला के अपमानों का ऋण अभी तक अवशेष है।
आज परीक्षा मेरी नहीं कौरव आज तुम्हारी बारी,
देखें किसमें लहु शेष है, देखें किसकी साँसें भारी!

एक-एक अपमान हृदय में, अग्नि बनकर जलता था,
एक-एक अन्याय समय में, अंकित होकर फलता था!
सुनो! यह केवल धनुष नहीं यह धर्म का घोष है,
ये बाण नहीं हैं मात्र हमारे ये काल आक्रोश है।

धन! धन! धन! धनंजय!
 जय! जय! जय! अभय! 
हुं! हुं! हुं! नभ काँपे! हे! 
हे! हे! गिरि डोले! 
हुम्! हुम्! हुम्! रण जागे!
 धन! धन! धन! धनुष बोले! 

आज पार्थ के बाण लिखेंगे, रणभूमि इतिहास,
न्याय फलेगा धर्म फलेगा मिटे अधर्मी पाश।  
आज पार्थ का नाद दिवस है अम्बर में अंगार ,
देख आज इतिहास सुनेगा गाण्डीव की टंकार !

न राज्य-लालसा मुझे यहाँ, न यश का मोह बुलाता है,
जिसके छीने मान तुम्हीं ने वही अर्जित करने आता है।
कहाँ गया वो दर्प तुम्हारा, कहाँ गई वो कुत्सित वाणी?
कहाँ गया वो हास्य सभा का,कहाँ गई वो कुटिल कहानी?
====
हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे! हे! हे! हे!  हुं! हुं! हुं!
हे! हे! हे!हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे

[Bridge]

तेरह वर्ष की रजनी बीती, अब प्राची मुस्काई है,
वन में तपकर लौह हुई जो, वो ज्वाला फिर आई है।
जिसे समझकर मौन तपस्वी तुमने किया उपहास,
वही धनंजय खड़ा सामने, लिये प्रलय का पाश!
दुर्योधन मत समझो वन ने मुझको दुर्बल कर डाला,
भूख मिली तो धैर्य मिला, संकट से भीषण बल आया।

[Bridge]

धन! धन! धन! धनंजय!
जय! जय! जय! अभय! 
हुं! हुं! हुं! नभ काँपे! हे! 
हे! हे! गिरि डोले! 
हुम्! हुम्! हुम्! रण जागे!
धन! धन! धन! धनुष बोले! 

[Bridge]

प्रतिशोध का ताप नहीं दग्ध अग्नि सम ज्वाला हूँ,
धर्मराज का अनुज धनंजय, धर्म मर्म रखवाला हूँ।
आज न पूछो कौन अकेला, किसकी ओर है काल,
आज बाण लिखेंगे रण में रक्तिम विजय-विशाल।
आज नहीं तो कब जागेगा सत्य-शौर्य का मान?
आओ! देखूँ कौन बचाता निज मिथ्या अभिमान!

[Bridge]

जय! जय! जय! धर्म!
हर! हर! हर! कर्म!
हे! हे! हे! कौन तीर
हुं! हुं! हुं! कौन वीर? 
हे! हे! हे! कौन धीर? 

[Bridge]

अब तक धूल सही है वन की, अब रण-धूल उड़ाऊँगा,
अब तक मौन रहा जो गाण्डीव, उसकी नाद सुनाऊँगा।
संख्या का अभिमान न करना, बाण हमारे बोलेंगे,
कुरु वंश के योद्धा सारे अपने शौर्य को तोलेंगे!
आज न कोई क्षमा-विनय, न कोई मिथ्या अभिमान,
रण में केवल कर्म बोलेंगे, कौन धनुर्धर, कौन महान!

[Bridge]

हुंऽऽऽ! हुंऽऽऽ! हुंऽऽऽ!
हरऽऽऽ! हरऽऽऽ! हरऽऽऽ! 
हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे! हे! हे! हे!  हुं! हुं! हुं!
हे! हे! हे!हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे

[Bridge]

आज न बादल गरजेंगे, न बिजली ही चमकेगी,
आज प्रत्यंचा की ध्वनि से रणभूमि ये दहकेगी।
घोड़ों की टापों से धरती  थर्रा-थर्रा जाएगी,
रथ के पहियों से रणभूमि जर्रा जर्रा कांपेगी।
आज पार्थ का नाद दिवस है अम्बर में अंगार ,
देख आज इतिहास सुनेगा गाण्डीव की टंकार !

[Bridge]

धन! धन! धन! धनंजय!
 जय! जय! जय! अभय! 
हुं! हुं! हुं! नभ काँपे! हे! 
हे! हे! गिरि डोले! 
हुम्! हुम्! हुम्! रण जागे!
 धन! धन! धन! धनुष बोले! 
 

नक़ाफी है शायद मेरा इंसान होना

लोग पूछते हैं मुझसे मेरे मज़हब का नाम,
नक़ाफी है शायद , मेरा इंसान होना।

आँख का अंधा भी कहलाता है नयनसुख यहाँ,
फिर क्यों ज़रूरी है नाम-ओ-निशान होना।

जात पूछी, कभी पूछा मेरा कुल कभी देश,
मेरी समझ ना आये होता क्या इंसान होना।

रंग अलग, रूप अलग, भाषा अलग हो तो क्या,
ख़ून सबका एक  फिर क्यों अनजान होना।

मैंने इंसान को इंसान की नज़र से देखा,
मेरी पूजा भी यही, मेरा यही ईमान होना।

कौन ऊँचा है, कौन नीचा—ये सवालों के सिवा,
काश दुनिया में बचे बस इतना इंसान होना।

किस किताब में लिखा है कि बँटे आदमी,
किस ज़ुबाँ ने सिखाया है यहाँ हैवान होना।

मज़लूम की आहों को जो सुन ले दिल से,
शायद उससे बड़ा कोई नहीं इंसान होना।

मुझे पहचानना हो तो मजहब ना पूछो,
मेरी ख्वाहिश यही ना बेईमान होना।

लोग पूछते रहें मुझसे मेरे मज़हब का नाम,
मैं कहूंगा  मज़हब मेरा बस  इंसान होना।

Thursday, October 1, 2026

पापा की यादें

तब पापा उठ डांट लगाते , देर तलक  सो जाने में।।
नींद कहाँ अब आती हमको, ख़ुद को रोज़ सुलाने में।।

वो मिट्टी की खुशबू आती है, बरसातों के मौसम में,
मन फिर से बच्चा हो जाता है, बीते पल दोहराने में।।

दरवाज़े की आहट सुनकर, पल भर को चुप हो जाता,
फिर खुशियों से हँस पड़ता , पापा के घर में आने में।।

आँगन में तब  अनुशासन था, पापा का तब  क्रोध रहा,
उनकी डाँट में प्यार छिपा था, मुझको  राह दिखाने में।

आज वही आँगन सूना है , आँगन जैसे मौन हुआ है ,
मन उनको अब ढूँढ़ रहा है, सूने घर को बगियाने में।।

फिर भी अंतस के अंतर में, पापा  वैसे ही रहते हैं,
जैसे कल ही साथ खड़े थे , हँसने और रुलाने में।।

जिन राहों पर साथ चले थे, आज अकेला चलता हूँ,
पाँव थकें तो यादें आतीं, उनकी  राह बताने  में।।

एक दिया अब भी जलता पापा दिल  के कोने में,
जैसे अब भी पास खड़े हो मुझको गले लगाने में।।

आज भरा घर सामानों से, देखो पापा दिल  खाली,
क्या-क्या खोया मैंने आखिर, आगे बढ़ते जाने में।।

अब चौखट से पूछ रहा हूँ, पापा कहाँ हैं कैसे हैं ,,
कैसे मन की बात बताऊँ, दिल की पीड़ जताने में।।

जब तक साँसें होंगी मेरी, पापा दिल में याद रहेंगे,
हर धड़कन में नाम रहेगा, सुख-दुख के अफ़साने में।।

जब तक ये जीवन है मेरा, नेक विरासत अपनाऊंगा ,
पापा कोई  कसर ना होगी सारी   सीख निभाने में ।। 

क्या खूब अख़्तियार है

क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

नशा चढ़ता है और दिखने लगता उसपे असर।
कि जाम उठाते हीं झुकने लगता है इस कदर।
आने लगती है लबों पर हर बेबस के लिए आवाज
जो भी दिल में दबा था कहने लगता है बे-हिसाब।
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी  जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

नशा बढ़ता है तो बढ़ती है अदब की रौशनी,
हर अजनबी में देखे फिर इंसान की ज़िंदगी।
वो सुनता है ख़ामोशी को, बड़े गौर से जनाब,
ना काटे किसी की ना करे  किसी की  ख़राब।
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

मयख़ाने में पूछो तो हर शख़्स का अफ़साना है,
किसी के हाथ में जाम है, तो  दिल में पैमाना है,
कोई पीकर खोए ख़ुद को कोई चुकाए अपना हिसाब,
कोई जाम से बिगड़ जाए, पर ये सीखता आदाब।”
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

न आँखों में गुरूर आए, न लहजे में कोई ख़राबी,
न होंठों पर शोर कोई, न बातों में कोई बेताबी।
जाम हाथ में आए तो उसके दिल हो जाए साफ़ ,
कि वो दूर था खुद से आज आ गया  ख़ुद के पास
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी  जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

ओ मृगतृष्णा की रेखा

अरी मन की प्रथम तरंग, तू कौन अनाम कहानी,
क्षण में सावन बरसा दे, क्षण में नयन में पानी।

ओ स्मृति-वन की मृगनयनी, री बीते क्षण की छाया,
जिसको पाया, उसको खोया, खोया तो फिर माया।

अरी अभिलाषा की चपला, ओ मृगतृष्णा की रेखा,
दूर क्षितिज तक दौड़ लगाती, पास न आए लेखा।

कभी गगन में उड़ती जाती, कभी धूल में गिर जाती,
एक कण में विश्व समेटे, विश्व मिले तो भरमाती।

तू ही स्वप्न सजाती मन में, तू ही स्वप्न मिटाती,
तू ही दीप जलाती भीतर, तू ही आँधी बन जाती।

हे इच्छा की अनगिन शाखा, तृष्णा तेरा विस्तार,
एक मिले तो दूजा माँगे, कब थमे यह व्यापार?

रे मन! तेरा कौन किनारा, कौन तेरा विस्तार,
कहाँ रुके तेरी गति कभी, कहाँ रुके विचार?

तर्क-शिखर पर चढ़ता मन, भाव-सलिल में बहता,
एक पुरानी स्मृति की चिनगी, अंतर-वन में दहता।

जितना बाँधूँ, उतना छूटे, जितना रोकूँ भागे,
दमन-जाल में फँसा मन ही, प्रतिरोध की ज्वाला जागे।

अरी विस्मृति! तू क्या मिटाए इस चंचल मन की गति?
जिसे दबाया, वही उभरा; जिसे समझा, वहीं मुक्ति।

न मन को जीत, न मन को बाँध, उसकी गति पहचान,
जिस क्षण मन को समझ लिया, खुल गया निज विधान।

तब जाना—मन शत्रु नहीं, यह मन ही मन का साथी,
जिसे समझा, वह शांत हुआ, मिटने लगी व्यथा सारी।

Wednesday, September 30, 2026

मरने को बेताब भी

[प्रस्तावना — धीमे स्वर में]

आदमी को समझना आसान नहीं है।वह जैसा दिखाई देता है, हमेशा वैसा होता नहीं।कभी वह अपने भीतर की आवाज़ सुनता है,और कभी उसी आवाज़ से बचता रहता है।

इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
खुद को पहचानने की फुर्सत नहीं मगर,
दुनिया समझने की रखता है ख्वाब भी।
इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।

शायद इसी उलझन का नाम ज़िंदगी है।इंसान बाहर बहुत कुछ खोजता रहता है,जबकि कुछ सवाल उसके भीतर ही बैठे होते हैं।

इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।


[अंतरा — शहर और भटकाव]


शहर को भटकता, तन्हाई ना मिटती,
रात के सन्नाटों में रखता है आग भी।
पढ़ के हीं सीख ले ये चीज़ नहीं आदमी,
ठोकर के जिम्मे नसीहतें किताब भी।
वक़्त को गंवाता है कल के भरोसे पर,
वक़्त से माँगता बीता हुआ हिसाब भी।

वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता।हम अक्सर यह बात तब समझते हैं,जब लौटकर देखने के लिए बहुत कुछ पीछे छूट चुका होता है।

इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।

[अंतरा — भावनाएँ और दूरी]

दिल की जज़्बातों को रखना ना मुमकिन,
लफ़्ज़ों में भर के पहुँचाता आवाज़ भी।
जो पास है उसकी कदर नहीं है इसको,
जो दूर है उसे देखता जैसे आफ़ताब भी।
अँधेरों में छुपता है आदमी ये जान कर,
चाँदनी है अच्छी पर दिखते हैं दाग भी।

जिसे हम अपने सबसे करीब समझते हैं,कई बार उसी को सबसे कम समझ पाते हैं।दूरी हमेशा जगह की नहीं होती।

इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।

[अंतरा — स्वयं से संघर्ष]


खुद से अकड़ता है, खुद से ही लड़ता,
जाने ज़िद कैसी है, कैसा रुआब भी।
इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।

आदमी दुनिया से जीतने की कोशिश करता है।लेकिन सबसे लंबी लड़ाई अक्सर अपने आप से होती है।और उसका कोई दर्शक नहीं होता।

शौक भी तो पाले हैं, दारू शराब क्या,
जीने की ज़िद पे मरने को बेताब भी।

कभी-कभी इंसान जीवन को समझते-समझते उसे जीना ही भूल जाता है।फिर अचानक उसे एहसास होता है कि समय कितना आगे निकल चुका है।

इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।

[समापन — धीमा, लगभग बातचीत की तरह]

जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।

शायद आदमी ऐसा ही है।वह विरोधाभासों से बना हुआ है।उसके भीतर प्रेम भी है, क्रोध भी;उम्मीद भी है और निराशा भी।वह खुद को ढूँढ़ता रहता है,और उसी तलाश में पूरी उम्र गुज़ार देता है।

इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।

सवाल शायद खत्म नहीं होंगे।जवाब भी हमेशा पूरे नहीं मिलेंगे।लेकिन शायद इंसान होने का अर्थ ही यही है—चलते रहना, पूछते रहना,और अपने भीतर झाँकते रहना।

जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।

====
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
 
खुद को समझने की फुर्सत नहीं मगर,
दुनिया समझने का दावा है हर पहर।
इंसान की फ़ितरत क्या कितने नकाब,
सवालों में होते अक्सर  जीने के  राज़ ।  
है सच की तलाश ओढ़े झूठे लिबास भी
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।

शहरों में भटकन तन्हाई की आग है,
रातों के सन्नाटों में लिए कई ख्वाब है।
पढ़ के हीं सीख ले ये चीज नहीं आदमी,
ठोकर पर गिरकर हीं सीख लेता आदमी।
ज़ख़्मों से पूछता है दवा और इलाज भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।

दिल में जज्बातें सजाता बेहिसाब,
लफ्जों में भर के रखता है कई राज।
जो पास है उसकी कदर नहीं है इसको ,
जो दूर है आफ़ताब समझता है उसको।
चाँदनी में खुद के ही दागों से डरता और
आईना दिख जात तो होता नाराज़ भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।  

खुद से अकड़ता है खुद से हीं लड़ता,
उठने की चाह में गिरता संभालता।     
शौक भी तो पाले क्या दारू शराब है,
फूंकता है धुंआ और पीता तेजाब है। 
कि जीने की जिद पर मरने को बेताब भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
कि जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।

Monday, September 28, 2026

मैं मिट्टी और बीज


 मैं कौन?

ये मिट्टी?

मिट्टी से बीज,
बीज से तना,
तने से शाखें,
शाखों से पत्ती,
पत्ती से कली,
कली से फूल,
फूल से फल,
फल से अन्न,
अन्न से रक्त,
रक्त से कोशिका,
कोशिका से ऊतक,
ऊतक से मांस,
मांस से पेशी,
पेशी से मज्जा,
मज्जा से अस्थि,
अस्थि से देह,
देह से श्वांस,
श्वांस से प्राण,
प्राण से कौन,

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

देह से इंद्रियाँ,
इंद्रियों से अनुभूति,
अनुभूति से संवेदना,
संवेदना से भावना,
भावना से इच्छा,
इच्छा से संकल्प,
संकल्प से कर्म,
कर्म से अनुभव,
अनुभव से स्मृति,
स्मृति से विचार,
विचार से बुद्धि,
बुद्धि से विवेक,
विवेक से प्रश्न,
प्रश्न से जिज्ञासा,
जिज्ञासा से खोज,
खोज से ज्ञान,
ज्ञान से बोध,
बोध से दृष्टि,
दृष्टि से सत्य,
सत्य से मौन,
मौन से कौन

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

विचार से अहंकार,
अहंकार से ‘मैं’,
‘मैं’ से मेरा,
मेरा से मोह,
मोह से ममता,
ममता से भय,
भय से इच्छा,
इच्छा से संघर्ष,
संघर्ष से पीड़ा,
पीड़ा से प्रश्न,
प्रश्न से विरक्ति,
विरक्ति से शून्य,
शून्य से कौन

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

स्मृति से अतीत,
अतीत से कथा,
कथा से पहचान,
पहचान से नाम,
नाम से संबंध,
संबंध से संसार,
संसार से भूमिका,
भूमिका से चेहरा,
चेहरे से व्यक्तित्व,
व्यक्तित्व से चरित्र,
चरित्र से कर्म,
कर्म से परिणाम,
परिणाम से भाग्य,
भाग्य से प्रश्न

प्रश्न से कौन

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

शब्द से अर्थ,
अर्थ से भाषा,
भाषा से विचार,
विचार से संवाद,
संवाद से संबंध,
संबंध से प्रेम,
प्रेम से समर्पण,
समर्पण से भक्ति,
भक्ति से प्रार्थना,
प्रार्थना से मौन,
मौन से पुकार,
पुकार से उत्तर,
उत्तर पर मौन 

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

श्वांस से जीवन,
जीवन से समय,
समय से क्षण,
क्षण से दिन,
दिन से रात,
रात से स्वप्न,
स्वप्न से जागरण,
जागरण से चेतना,
चेतना से साक्षी,
साक्षी से दृष्टा,
दृष्टा पर मौन 

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

=====

वो हूँ मैं 

जो 

जो परे है

क्या से

कहाँ से

जहां से

कब से

जब से

तब से

कौन से

मौन से

रूप से

रंग से

गंध से

स्पर्श से

शब्द से

निःशब्द से

विचार से

अविचार से

आकार से

निराकार से

विकार से

निर्विकार से

नाम से

अनाम से

रूप से

अरूप से

दृश्य से

अदृश्य से

ज्ञात से

अज्ञात से

सत्य से

असत्य से

होने से

न होने से

पूर्णता से

अपूर्णता से

शून्यता से

पूर्णता से

सीमा से

असीमा से

बंध से

निर्बंध से

जन्म से

अजन्म से

जीवन से

निर्जीव से

मृत्यु से

अमृत से

अंधकार से

प्रकाश से

रात से

दिन से

धरती से

आकाश से

श्वास से

निःश्वास से

ध्वनि से

प्रतिध्वनि से

एक से

अनेक से

अनेक से

एक से

मैं से

तू से

तू से

मैं से

पास से

दूर से

दूरी से

निकटता से

प्रेम से

विरह से

मिलन से

बिछोह से

प्रश्न से

उत्तर से

उत्तर से

अनुत्तर से

चलने से

ठहरने से

समय से

कालातीत से

आरंभ से

अंत से

अंतहीन से

क्षण से

अनंत से

स्मृति से

विस्मृति से

मौन से

महामौन से

जो दिखता है

जो छिपा है

जो कहा है

जो अनकहा है

जो जाना है

जो अनजाना है

जो बना है

जो बिगड़ा है

जो मिटा है

जो बचा है

जो है

बस है

कुछ भी नहीं होते हुए भी

सब कुछ है

जो मैं नहीं हूं

उसके पार

जो मैं हूं

उसके भी पार

जो है

और जो नहीं है

उसके बीच

उसके भी पार

न मैं हूं

न मेरा है

न तेरा है

फिर भी

जो कुछ है

वही है

वो हूं मैं

===

कौन हूँ मैं?

ये मिट्टी?

मिट्टी से बीज,
बीज से तना,
तने से शाखें,
शाखों से पत्ती,
पत्ती से कली,
कली से फूल,
फूल से फल,
फल से अन्न,
अन्न से रक्त,
रक्त से कोशिका,
कोशिका से ऊतक,
ऊतक से मांस,
मांस से पेशी,
पेशी से मज्जा,
मज्जा से अस्थि,
अस्थि से देह,
देह से श्वांस,
श्वांस से प्राण,
प्राण से—

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

देह से इंद्रियाँ,
इंद्रियों से अनुभूति,
अनुभूति से संवेदना,
संवेदना से भावना,
भावना से इच्छा,
इच्छा से संकल्प,
संकल्प से कर्म,
कर्म से अनुभव,
अनुभव से स्मृति,
स्मृति से विचार,
विचार से बुद्धि,
बुद्धि से विवेक।

प्रशंसा पर

खुश


डाँट पर 

दुःख ।


प्रेम में 

प्रसन्नता।


ईर्ष्या पर

क्रोध।

भाव से

विचार

भावनाओं का

प्रतिकार ।

फिर कौन

मात्र एक

दर्पण

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

या कि समय

एक क्षण,
क्षण सेकंड में 
सेकंड मिनट में 
मिनट घंटा में 
घंटा दिन में 
दिन सप्ताह में
सप्ताह महीना में 
महीना वर्ष में 
वर्ष दशक में 
दशक सदी में 
सदी शताब्दी में 
शताब्दी सहस्राब्दी में

सहस्राब्दी अनंत समय में 

और 

हर सेकंड में 
अनगिनत घटनाएँ

अनगिनत लोगों की

राज्यों की

राजाओं की

महाराजाओं की

सभ्यताओं की।

हर एक घटना
एक कहानी।

हर कहानी
एक जीवन।

हर जीवन
एक क्षण।

और उस क्षण में

मैं कौन।

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

लेकिन

देह बदलती है,

तो तन नहीं
मन बदलता है,

तो मन नहीं


भाव बदलते हैं,

तो भाव नहीं 
विचार बदलते हैं,

तो विचार नहीं 


स्मृतियाँ बदलती हैं,

तो स्मृति नहीं 


नाम बदलता है,

तो नाम नहीं 

तो फिर

जो बदलता है
वह मैं नहीं।

जो आता है
वह मैं नहीं।

जो जाता है
वह मैं नहीं।

जो जन्मता है
वह मैं नहीं।

जो मिटता है
वह मैं नहीं।

और जो यह सब
देखता है

वही?

श्वांस आती है।

श्वांस जाती है।

विचार आता है।

विचार जाता है।

खुशी आती है।

दुःख आता है।

प्रेम आता है।

क्रोध आता है।

बचपन आता है।

यौवन आता है।

वृद्धावस्था आती है।

समय आता नहीं—

बस बहता है।

कहानियाँ बनती हैं।

कहानियाँ मिटती हैं।

और—

मैं देखता हूँ।

सबको।

लगातार।

मौन।

अचल।

साक्षी।

कौन

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

फिर

साक्षी भी एक नाम है।

तो नाम भी गया।

रूप गया।

सीमा गई।

दूरी गई।

स्थान गया।

समय गया।

कहानी गई।

“मेरा” गया।

“मैं” भी—

क्षण भर को
मौन हो गया।

और जब “मैं” भी
मौन हो गया—

तब क्या बचा?

न देह।

न मन।

न भाव।

न विचार।

न स्मृति।

न नाम।

न घर।

न गाँव।

न शहर।

न राज्य।

न देश।

न धरती।

न समय।

न क्षण।

न कहानी।

न सीमा।

न दूरी।

न बाहर।

न भीतर।

न आरंभ।

न अंत।

बस

मौन।

वो कौन

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन


गहनतम मौन 

और

एक बोध।

बिना नाम का।

बिना रूप का।

बिना सीमा का।

कि

जो कुछ था,

जो कुछ है,

जो कुछ होगा—

उससे अलग
मैं कुछ नहीं।

और शायद—

यही खोज थी।

मिट्टी से चला था
“मैं” खोजने।

देह मिली।

मन मिला।

भाव मिले।

स्मृतियाँ मिलीं।

और अंत में
जहाँ पहुँचा—

वहीं से यात्रा शुरू हुई थी।

अपने भीतर।

मिट्टी हूँ मैं।

मिट्टी से आया हूँ।

समय में एक क्षण हूँ।

ब्रह्मांड में एक कण हूँ।

अनंत का एक अंश हूँ।

और वो पूर्ण अनंत भी

जो देखता है सबकुछ

जिसमें घटता है सब कुछ

जो परे है

क्या से

कहाँ से

जहां से

कब से

जब से

तब से

कौन से

मौन से

रूप से

रंग से

विचार से

आकार से

विकार से

नाम से 

अनाम से

पूर्णता से

अपूर्णता से

सीमा से

असीमा से

प्रकाश से

आकाश से

जो है

बस है

कुछ भी नहीं होते हुए भी

सब कुछ है

वो हूं मैं



Saturday, September 26, 2026

शिकार हो चले थे

हम सोच के बड़ा ये खुशगवार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।
मसरूफ़ थी ये दुनिया, जीना भी मयस्सर,
ये मानकर कि बेफ़िक्र, हज़ार हो चले थे।

छोटी छोटी हारों से दुखता था मेरा मन ।
छोटी छोटी बातों से टूटता था मेरा मन ।
अजीब थी  फितरत कि पाकर दो लफ्ज।
प्यार  का दिल से शुक्र गुजार हो चले थे।
हम सोच के बड़ा ये खुशगवार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।

ये जनता था नाम में , रखा कुछ भी नही ।
ये मानता था मान में , रखा कुछ भी नही ।
फिर भी ये ज़िंदगी कि नाम-ओ-निशाँ ख़ातिर।
कभी खुद हीं से खुश नागवार हो चले थे  ।
हम सोच के बड़ा ये खुशगवार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।

मालूम न था गम के साये मुझपे भी छाएंगे ।
दुःख के बादल के छाये , मुझपे भी आएँगे ।
औरों के दुःख से डर खोली  आँख थोड़ी ।
फिर रोते लोगों से , दरकिनार हो चले थे ।
हम सोच के बड़ा ये खुशगवार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।

ये बीबी ये बच्चे , ये घर बार ये सपना ।
जाने किस किस को , समझा था मैं अपना ।
पर मौत के बिछावन से हुआ जब रु ब रु ।
ख़ुद ही ख़ुद से हम लाचार हो चले थे ।
हम सोच के बड़ा ये खुशगवार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।

जिस ज़िंदगी को समझे थे अपनी अमानत,
वो रेत की तरह थी न ठहरी न थी इजाज़त।
सब कुछ तो पास था, पर  पास था कहाँ मैं,
दुनिया के हो के आख़िर  फ़रार हो चले थे।
हम सोच के बड़ा ये खुशगवार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।

आँखें थीं, फिर भी जैसे मंज़र नहीं था कोई,
साँसें थीं, फिर भी जैसे अंदर नहीं था कोई।
जिस्म ने आख़िरी दम जब साथ छोड़ डाला,
अपनी इस  हक़ीक़त से दो-चार हो चले थे।
हम सोच के बड़ा ये खुशगवार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।

जब ज़िंदा थे हमको इसे  जीना न आया।
जो भी वक़्त मिला था समझना ना आया ।
अब  मौत से नहीं शिकवा करूं भी तू कैसे।
फकत वक्त के आखिर में लाचार हो चले थे।
हम सोच के बड़ा ये खुशगवार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।

दोस्तों के वास्ते

पा पा पे पे टे पे चे टे कीच

चे टे कीच मीच मीच मीच  

टा टा टी टी, पा टी चे ची, खीच 

ची टी खीच, पीच पीच पीच!

[Bridge]

कभी भी बेहिचक खखार सकते हैं,
बिन वजह यार की टाँग उखाड़ सकते हैं!
लताड़ें, गरियाएँ, करें बेइज़्ज़ती हज़ार,
फिर पूछें—“भाई, नाराज़ तो नहीं मेरे यार?”

किसी को कहें गोलगप्पा, किसी को कहें खोपड़ी,
गंजे को चाँद बोलकर, हँसी उड़ाएँ चौपड़ी!
खी-खी में न शर्म, न आँसू में लिहाज़,
दोस्तों के आगे खुली रहती है हर राज़ की किताब!

जेब में पैसा हो तो रुतबा नवाबी,
बिल आते ही सबकी हालत खराबी!
कोई बोले, “UPI डाउन है यार!”
कोई कहे, “फोन घर पे है इस बार!”
जो सबसे पहले बिल मँगवाता है,
उसी का पर्स अचानक गुम हो जाता है!

[Bridge]

चे चे चा चा, पे चे टे टा, खीच 

टे चे खीच, मीच मीच मीच!

धा धा धे धे, टे धे चे थे, कीच 

थे चे कीच, ढीच ढीच ढीच!

[Bridge]

उधार लेकर यार जो ग़ायब हो जाए,
फोन उठाते ही आवाज़ बदल जाए!
“भाई, कौन बोल रहा? गलत नंबर है!”
ऐसी दोस्ती का भी अलग ही हुनर है!

लड़ते हैं ऐसे जैसे खानदानी बैरी,
गाली-गलौज में चलती पूरी फेरी!
पर बाहर वाला आँख दिखा दे अगर,
सारे बन जाते हैं बाहुबली उसी पहर!

खुद कांड करके यार को फँसाते हैं,
पूछो तो सब अनजान बन जाते हैं!
डाँट पड़े तो नज़रें मिलाकर मुस्काएँ,
जैसे थाने में पिकनिक मनाने आएँ!

[Bridge]

पा पे पी पो, चे टे ची टो, खीच 

ची टो खीच, मीच मीच मीच

टे टे टा टा, चे टा पे पा, कीच 

पे चे कीच, खीच खीच खीच!

[Bridge]

रात के दो बजे फोन बजाएँ,
“भाई, जाग रहा है?” प्यार जताएँ।
कहो, “मर रहा हूँ, सोने दे यार!”
बोलें, “अच्छा, सुन… बस एक छोटा-सा काम है इस बार!”

दुख में कंधा, सुख में पार्टी,
शादी में दूल्हे की जेब पर मारें आरी!
खुद खाएँ, पिएँ, उड़ाएँ माल,
फिर कहें—“भाई, दोस्ती में कैसा हिसाब-किताब!”

कमरे में घुसते ही तूफ़ान मचाते हैं,
फ्रिज का माल सफ़ाचट कर जाते हैं!
जाते-जाते ज्ञान दे जाते हैं—
“घर अपना ही है, फिर आएँगे!” कह जाते हैं!

[Bridge]

ची ची चे चे, पा चे टे टे, मीच 

टे पा मीच, कीच कीच कीच!

पा पा टे टे, चे पे कीच कीच 

मीच मीच मीच, खीच खीच खीच!

[Bridge]

न कोई फॉर्मैलिटी, न कोई लिहाज़,
गाली में प्यार और बेइज़्ज़ती बेहिसाब!
दुनिया कहे हमें बेशर्मों की टोली,
हमारी यारी सबसे निराली, सबसे अलबेली!

न दौलत चाहिए, न शोहरत का सवाल,
बस यार साथ हों तो हर दिन धमाल!
मुसीबत में सबसे पहले यही आते हैं,
बाकी दुनिया को बाद में फोन लगाते हैं!

दोस्त वही जो इज़्ज़त का कचरा कर जाए,
फिर कंधे पर हाथ रखकर मुस्काए—
“भाई, बुरा मत मानना…
अपना ही तो है रे!

[Bridge]

पा पा पे पे, चा ची चू चाच, टे पे चे टे, 

कीचम कीचम कीच! मीच मीच माच, 

पीच पीच पाच, चे टे कीच, खीच खीच खीच!

क से काली नहीं

क से काली नहीं—
कौआ लिखो!
ग से गणेश नहीं—
गिद्ध लिखो!
भ से भोले नहीं—
भैंस लिखो!
प से पैगम्बर नहीं—
पाड़ा लिखो!

क से कौआ—

सामान्य!

क से काली—

सावधान!

ग से गिद्ध—

प्राकृतिक!

ग से गणेश—

धार्मिक!

भ से भैंस—

प्राणी!

भ से भोलेनाथ—

आस्था की कहानी

प से पाड़ा—

शब्द!

प से पैगम्बर—

मजहब!

अक्षर वही—

ध्वनि वही—

व्याकरण वही—

फिर यह अंतर क्यों?

क्यों भाई?
अक्षर तो वही था,
वाणी भी वही थी—
फिर नाम बदलते ही
नियम क्यों बदल गया?

कहानी क्यों बदल गई

क्यों

कौआ—धर्मनिरपेक्ष,
गिद्ध—धर्मनिरपेक्ष,
भैंस—धर्मनिरपेक्ष,
गधा—धर्मनिरपेक्ष!

और काली से धर्म ,
गणेश से आस्था मर्म
भोले आए—भक्ति तब
पैगम्बर आए—मजहब!

शायद

कौआ आया—सबका निकला,

गिद्ध आया—प्रकृति महान;

गधा आया—सर्वधर्मनिरपेक्ष,

क्योंकि उसका कोई धर्म नहीं—

या शायद कोई पहचान नहीं!

क्योंकि जात पूछकर 

गिद्ध नोचते नहीं

झपटते वक्त किसी का क्या मजहब है

सोचते नहीं 

और गधा ,भैंस

कुछ भी समझते नहीं 

उनके लिए सारे धर्म

सारे मजहब

सारी जाति 

होती है एक बराबर

प्रश्न न काली का है,

न गणेश का,

न पैगम्बर का,

न भोलेनाथ का।

प्रश्न तो  कौवों का है

प्रश्न भैसों का है

प्रश्न गधों का है

प्रश्न गिद्धों का है

क्योंकि

ये पाए जाते हैं हर धर्म में

कौआ न हिन्दू, न मुसलमान,

गिद्ध न मंदिर, न मस्जिद जान;

गधा न पूछे जात-पंथ

“कौआ धर्म से ऊपर,

गिद्ध मजहब से पार,

गधा सबसे निष्पक्ष

इसलिए ये सारे होते हैं निष्पक्ष!

धर्म निरपेक्ष।

इसीलिए धर्म निरपेक्षता महान

क्योंकि कौआ,गिद्ध और गधा

रचते इसका विधान।

My Blog List

Followers

Total Pageviews