Wednesday, October 14, 2026

मेरी छत चमक चमक के कह रही है

[Intro: 1960s Bollywood flute opening, vintage Hindi film comedy, loud and clear Indian male Vocal, dramatic violins, harmonium, tabla, dholak]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज छुपा मेरी लाज बचा 

[Eco]

[Spoken Word: theatrical male voice, comic seriousness]

इश्क़ में दिल टूटे तो भरोसा टूट  जाता है,
मगर बाल टूट जाएँ तो आदमी लुट जाता है!

[Verse 1: classic 1950s Hindi playback singing, clear diction, expressive vibrato]

मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।
जो तू नहीं तो कंघी-कंघा सब बेकार है,
छत पर ठंडी लगती है, मुझको बुखार है।

[Pre-Chorus: rising violins, playful tabla rolls, increasing vocal intensity]

रे मुझको बुखार है, गई सब बहार है!

[Build Up: accelerating dholak, dramatic orchestral flourish, male voice rising]

बची हुई जो भी है वो श्रृंगार तो बचा ,बहार तो बचा  !

रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ!

[Chorus: loud and clear male vocals, grand vintage Bollywood orchestra, catchy melody]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज तो छुपा मेरी लाज तो बचा 

[Eco]

[Hook: catchy, emphatic, repeated comic phrase]

छत चमके, माथा दमके,
बाल कहाँ हैं, कोई तो बतलाए!

[Echo: vintage theatrical vocal echo, repeat the final words]

गंजा ना बना… ना बना… ना बना…
ओ राजा आजा आज  नाजा नाजा…

[Interlude: 1950s Hindi film flute ,tabla and dholak, no vocals]

[Verse 2: expressive male playback voice, comic melancholy, clear Hindi pronunciation]

तेल शीशी रोती मालिश को तरस रही,
कंघी मेरे हाथ में सवाल कर रही।
बोली तेरे सिर पे अब तो मेरा क्या काम है,
चार बालों की हिफाज़त सुबह-शाम है।

[Pre-Chorus: mock-tragic delivery, violin tremolo, tabla build-up]

सुबह-ओ-शाम है कि ये जीवन बेज़ार है!

[Breakdown: sudden soft harmonium and solo voice, exaggerated sorrow]

अरे तेल भी उदास है,
कंघी भी निराश है,
चार बाल बचे हैं,
बस उन्हीं की आस है!

[Build Up: rising strings, rolling tabla, dramatic orchestral crescendo]

चार बालों की इज़्ज़त का सवाल है,
ये नहीं कोई मामूली बाल-बवाल है!

[Chorus: full vintage, loud male lead, group backing vocals]

बचे हुए जो भी हैं उनको ना खा भी जा

रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ!

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज तो  छुपा मेरी लाज तो बचा 

[Eco]

[Refrain: repeat with a comic group response]

रे मुझको गंजा ना बना!
अरे उस्तरा मत चला!
रे मुझको गंजा ना बना!
मेरी इज़्ज़त तो बचा!

[Verse 3: theatrical comic singing, jaunty rhythm, clarinet and dholak]

नाई की दुकान पर मैं जब भी जाता हूँ,
बाल कटाने से पहले ही घबराता हूँ।
नाई बोले, बैठ जा, आज नया स्टाइल दूँ,
जो बचे हैं चार बाल, उनको भी विदा कर दूँ!

[Bridge: spoken dialogue, comic pauses, orchestra stops between lines]

मैं बोला—नाई जी, ज़रा हाथ सँभाल के!
वो बोला—बैठिए हुज़ूर, निकलेंगे कमाल के!

मैं बोला—चार बाल हैं, इनको रहने दीजिए!
वो बोला—फिक्र न कीजिए, बस आँखें मूँद लीजिए!

[Breakdown: soft piano, suspenseful strings, whispered comic tension]

रे नाई बड़ा चालाक है,
हाथों में उस्तरा नापाक है!

[Drop: sudden full orchestral hit, emphatic male singing, comic drum accent]

उस्तरा पाक है कि ये ये छत लाचार है!

बन रहा है चाँद मेरा छत  इसे बचा

रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ!

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज तो छुपा मेरी लाज तो बचा 

[Bridge]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज छुपा मेरी लाज बचा 

[Chorus: grand 1950s Bollywood finale, loud clear male vocals, full strings, brass, tabla and dholak]

मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ!

[Post-Chorus: exuberant group vocals, playful call and response]

लीजिए कंघी! — बेकार है!
लीजिए तेल! — बेकार है!
नाई से बचना! — दुश्वार है!
चार बालों पर ही संसार है!

[Hook: loud, catchy, repeated male chorus]

चार बाल हैं, चार बाल हैं,
यही तो मेरे जीवन का कमाल है!
चार बाल हैं, चार बाल हैं,
इनसे ही मेरी शान बरकरार है!

[Refrain: full orchestra, repeat the main melody]

बची हुई है शान उसे ना लुटा भी जा

रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ,

[Outro: slowing orchestra, dramatic spoken punchline, final piano and violin flourish]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज छुपा मेरी लाज बचा 

[Spoken Word: deadpan comic delivery]
डॉक्टर ने कहा—बालों की चिंता छोड़ दीजिए!
मैंने कहा—डॉक्टर साहब, बाल रहने तो दीजिए!

[Echo: fading male voice]
राजा आजा आजा आजा

ना जा ना जा ना जा

[End: final flute hit, short comic pause, vintage film ending]

===



[Intro – Temple Bells + Harmonium + Soft Flute]
[Instrumental: 8 bars, vintage violins gradually enter]
[Male Vocal – Soft Alaap, Dramatic Devotional Style]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 
ना ना ना  नाजा ना ना ना नाजा 
बाल आजा बाल आजा 
राजा नाजा राजा आजा

[Eco]

ह ह ह हा नाजा हा... हा...आजा 
हे प्रभु... मेरे बाल बचा... ओ मेरे दाता... मेरी लाज बचा...

[Verse 1 – Solo Male Vocal, Gentle Dholak]

मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा, 
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 
जो तू नहीं तो कंघी-कंघा सब बेकार है, 
छत पर ठंडी लगती है, मुझको बुखार है।

[Pre-Chorus – Rising Violins, Increasing Vocal Emotion]
रे मुझको बुखार है, गई सब बहार है...
[Echo – Male Chorus, Temple Bell Accents]
बहार है... (बहार है...) बेज़ार है... (बेज़ार है...)
[Hook – Catchy, Repetitive, Strong Melody]

बची हुई जो भी है वो श्रृंगार तो बचा ,बहार तो बचा  
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा, 
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।

[Chorus – Full Orchestra, Dholak, Manjira, Group Singing]

मेरी छत! (चमक चमक!) कह रही! (आ भी जा!) 
मुझको गंजा! (ना बना!) तुझे कसम है! (मेरी आ!)

[Bridge]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 
ना ना ना  नाजा ना ना ना नाजा 
बाल आजा बाल आजा 
राजा नाजा राजा आजा

[Eco]

[Post-Chorus – Playful Echo]

मेरी आ... (मेरी आ...) बाल बचा... (बाल बचा...)

[Interlude 1 – Flute, Sitar, Tabla Rolls, Vintage Violins]
[Verse 2 – Comic Pathos, Solo Male Vocal]

तेल शीशी रोती मालिश को तरस रही, 
कंघी मेरे हाथ में सवाल कर रही। 
बोली तेरे सिर पे अब तो मेरा क्या काम है, 
चार बालों की हिफाज़त सुबह-शाम है।

[Pre-Chorus – Melodramatic Build-Up]

सुबह-शाम है... जीवन बेकार है...
[Echo – Soft Male Chorus]
बेकार है... (बेज़ार है...) लाचार है... (लाचार है...)

[Hook – Full Voice, Vintage Film Song Style]

लाचार है जीवन कि अब अब छोड़ के ना जा 
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा, 
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।

[Bridge – Music Drops to Harmonium and Soft Tabla]
[Spoken Male Vocal – Dramatic Prayer]

[Bridge]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 
ना ना ना  नाजा ना ना ना नाजा 
बाल आजा बाल आजा 
राजा नाजा राजा आजा

[Eco]

हे प्रभु! ये कैसी विपदा आई? 
सर पे धरती, बालों में जुदाई! 
तेल भी रोए, कंघी भी हारे, 
चार बाल बचे हैं, वो भी बेचारे!

[Bridge Build-Up – Violins Rise, Temple Bells Ring]
[Male Vocal – High Emotional Pitch]

अब तो दया करो भगवान, बालों की रख लेना शान!
[Call and Response – Lead Singer and Male Chorus]
[Lead] मेरे बाल कहाँ हैं?
[Chorus] गायब हैं! गायब हैं!
[Lead] मेरी शान कहाँ है?
[Chorus] गायब है! गायब है!
[Lead] नाई से कौन बचाए?
[Chorus] भगवान बचाए! भगवान बचाए!
[Instrumental Interlude – Comic Shehnai, Dholak, Sitar and Flute]
[Verse 3 – Rhythmic Storytelling, Playful Vocal Delivery]

नाई की दुकान पर मैं जब भी जाता हूँ, 
बाल कटाने से पहले ही घबराता हूँ। 
नाई बोले, बैठ जा, आज नया स्टाइल दूँ, 
जो बचे हैं चार बाल, उनको भी विदा कर दूँ!

[Music Stop – Sudden Silence]
[Spoken Dialogue – Nervous Male Voice]

अरे नाई भैया! रहम करो! जो बचे हैं, उन पर तो तरस करो!
[Comic Chorus – Energetic Dholak and Manjira]

रे नाई बड़ा चालाक है, हाथों में उस्तरा नापाक है! 
उस्तरा नापाक है कि ये छत लाचार है, 
बचे हुए जो भी हैं उनको ना कहा भी जा 
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।

[Hook – Grand Reprise, Full Male Chorus]
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा, 

[Final Chorus – Grand 1950s Bollywood Orchestra]

मेरी छत! (चमक चमक!) कह रही! (आ भी जा!) 
मुझको गंजा! (ना बना!) तुझे कसम है! (मेरी आ!)
[Echo – Gradually Fading Male Chorus]
मेरी आ... (मेरी आ...) बाल बचा... (बाल बचा...) 
गंजा ना बना... (ना बना...) हे प्रभु... (हे प्रभु...)

[Bridge]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 
ना ना ना  नाजा ना ना ना नाजा 
बाल आजा बाल आजा 
राजा नाजा राजा आजा

[Eco]

[Outro – Slow Harmonium, Soft Flute, Temple Bells]
हे प्रभु... मेरे बाल बचा... आज बचा , मेरी लाज ... बचा...

[Final Comic Pause – One Temple Bell, Tiny Dholak Hit]
[Vintage Gramophone Crackle – Fade Out]

मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।
जो तू नहीं तो कंघी-कंघा सब बेकार है,
छत पर ठंडी लगती है, मुझको बुखार है।
रे मुझको बुखार है, गई सब बहार है,
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 

तेल शीशी रोती मालिश को तरस रही,
कंघी मेरे हाथ में सवाल कर रही।
बोली  तेरे सिर पे अब तो मेरा क्या काम है,
चार बालों की हिफाज़त सुबह-शाम है।
सुबहो शाम है कि ये जीवन बेज़ार है।
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 

नाई की दुकान पर मैं जब भी जाता हूँ,
बाल कटाने से पहले ही घबराता हूँ।
नाई बोले, बैठ जा, आज नया स्टाइल दूँ,
जो बचे हैं चार बाल, उनको भी विदा कर दूँ!
रे नाई बड़ा चालाक है, हाथों में उस्तरा पाक है,
उस्तरा पाक है कि ये ये छत लाचार है।
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 

बीवी मेरी देखकर मुझको मुस्कुराने लगी,
मेरे चमकते माथे पर चाँद बनाने लगी।
बोली, रात में बिजली का बिल बच जाएगा,
तेरे सिर का रिफ्लेक्शन घर चमकाएगा!
घर चमकाएगा कि ना कोई श्रृंगार है
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 

मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।
जो तू नहीं तो कंघी-कंघा सब बेकार है,
छत पर ठंडी लगती है, मुझको बुखार है।
रे मुझको बुखार है, गई सब बहार है,
बालों से खाली सही, दिल में प्यार अपार है!
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 

चा चा चा चांडाल आ गया


चे चे चे चे चाएं चाएं चाएं
टे टे टे टे टाएं टाएं टाएं
मुँह से बोले आएं भाएं ठाएं
कौए जैसा काएं काएं काएं

[Eco]

आफिस में भुचाल आ गया ,
चा चा चा चांडाल आ गया।

[Bridge]

आते हीं आलाप करेगा,
अनर्गल प्रलाप करेगा,
हृदय रुग्ण विलाप करेगा,
शांति पड़ी क्रांति सन्मुख,
जी का एक जंजाल आ गया,
चा चा चा चांडाल आ गया।

[Bridge]

चे चे चे चे चाएं चाएं चाएं
टे टे टे टे टाएं टाएं टाएं
मुँह से बोले आएं भाएं ठाएं
कौए जैसा काएं काएं काएं

[Eco]

अब कोई संवाद न होगा,
होगा जो बकवाद हीं होगा,
अकारण विवाद भी होगा,
हरे शांति और हरता है सुख,
सच में एक बवाल आ गया,
चा चा चा चांडाल आ गया।

[Bridge]

चे चे चे चे चाएं चाएं चाएं
टे टे टे टे टाएं टाएं टाएं
मुँह से बोले आएं भाएं ठाएं
कौए जैसा काएं काएं काएं

[Eco]

कार्य न कोई फलित हुआ है,
जो भी है, निष्फलित हुआ है,
साधन भी अब चकित हुआ है,
साध्य हो रहा, हार को उन्मुख,
ऑफिस में फिलहाल आ गया,
चा चा चा चांडाल आ गया।

[Bridge]

चे चे चे चे चाएं चाएं चाएं
टे टे टे टे टाएं टाएं टाएं
मुँह से बोले आएं भाएं ठाएं
कौए जैसा काएं काएं काएं

[Eco]

धन धान्य करे संचय ऐसे,
मीन प्रेम बगुले के जैसे,
तुम्हीं बताओ कह दूं कैसे,
कर्म बुरा है मुख भी दुर्मुख,
शतुरमुर्ग विशाल आ गया,
चा चा चा चांडाल आ गया।

[Bridge]

चे चे चे चे चाएं चाएं चाएं
टे टे टे टे टाएं टाएं टाएं
मुँह से बोले आएं भाएं ठाएं
कौए जैसा काएं काएं काएं

[Eco]

कष्ट क्लेश होता है अक्षय,
हरे प्रेम बढ़े घृणा अतिशय,
शैतानों की करता है जय,
प्रेम ह्रदय से रहता विमुख,
कुकुर वाणी शृंगाल आ गया,
चा चा चा चांडाल आ गया।

[Bridge]

चे चे चे चे चाएं चाएं चाएं
टे टे टे टे टाएं टाएं टाएं
मुँह से बोले आएं भाएं ठाएं
कौए जैसा काएं काएं काएं

[Eco]

कोई विधायक कार्य न आये,
मुख से विष के वाण चलाये,
ऐसे नित दिन करे उपाय,
बढ़े वैमनस्य, पीड़ा और दुख,
ख़ुशियों का हड़ताल आ गया,
चा चा चा चांडाल आ गया।

[Bridge]

चे चे चे चे चाएं चाएं चाएं
टे टे टे टे टाएं टाएं टाएं
मुँह से बोले आएं भाएं ठाएं
कौए जैसा काएं काएं काएं

[Eco]


दिखलाये अपने को ज्ञानी,
पर महाचंड वो है अज्ञानी,
मूर्खों में नहीं कोई सानी,
सरल कार्य में धरता है चुक,
धम धम बम बैताल आ गया,
चा चा चा चांडाल आ गया


[Bridge]

चे चे चे चे चाएं चाएं चाएं
टे टे टे टे टाएं टाएं टाएं
मुँह से बोले आएं भाएं ठाएं
कौए जैसा काएं काएं काएं

[Eco]

आफिस में भुचाल आ गया ,
अमिताभ देख चांडाल आ गया।

[Bridge]

चे चे चे चे चाएं चाएं चाएं
टे टे टे टे टाएं टाएं टाएं
मुँह से बोले आएं भाएं ठाएं
कौए जैसा काएं काएं काएं
ठाएं ठाएं ठाएं ठाएं ठाएं ठाएं
काएं काएं काएं काएं काएं काएं

[Eco]

चोटी वाली दीदी

[INTRO: LOUD DONKEY BRAY — HEE-HAW! HEE-HAW! HEE-HAW!]


[STRANGE CARTOON SOUND: BOING! PHEWOOO! ZING-ZING!]


[CHILDREN'S CHORUS — LOUD, CLEAR, EXCITED]


हे दीदी दीदी दीदीदी मुझको मूर्ख बना दी,

दीदी दीदी दीदी दीदी सर पर पूँछ उगा दी !

हे दीदी दीदी दीदीदी मुझको मूर्ख बना दी, 


[ECHO: पूँछ उगा ली... उगा ली... उगा ली!]


[DONKEY BRAY: HEE-HAW! HEE-HAW!]


[VERSE 1 — CHEEKY CHILD VOICE]


देख के बेबी गधा बोला, चोटी वाली दीदी,

हे ईश्वर! ये ऐसा कैसा, सर में पूँछ उगा दी!


[STRANGE SOUND: TING-TONG! BOING!]


चोटी में जब रिबन बाँधा, चमकी लाल-गुलाबी,

देख के मुर्गा बांग भूल गया, देख चाल नवाबी!


[COMIC SOUND: COCK-A-DOODLE-DOO... GLITCH!]


आगे लटके, पीछे झटके, हवा में करे सवारी,

बोला चोटी देख के तेरी , हँसती दुनिया सारी!


[DONKEY LAUGH: HEE-HAW-HAW-HAW!]


दीदी बोलीं, चुप रे गधे, फैशन की है रानी,

तेरी अक्ल घास चर गई, बातें करे सयानी!


शूकर कर कि तुझको मैंने फैशन रुख समझा दी!


[COMIC RECORD SCRATCH!]


[HOOK — FULL CHILDREN'S CHORUS, VERY CATCHY]


हे दीदी दीदी दीदीदी मुझको मूर्ख बना दी,

दीदी दीदी दीदी दीदी सर पर पूँछ उगा दी !

हे दीदी दीदी दीदीदी मुझको मूर्ख बना दी,


[ECHO: दीदी... दीदी... दीदीदी!]


[DONKEY BRAY — HEE-HAW! HEE-HAW!]


[INTERVAL BREAK — 3 SECONDS OF SILENCE, THEN A HUGE DONKEY BRAY]


[STRANGE SOUND EFFECTS: BOING! ZOOP! PLOP! WHEEE-OOO!]


[VERSE 2 — DONKEY CHILD VOICE, MOCK-SERIOUS]


गधा बोला, सुनो दीदी जी, बात समझ न आई,

मैं तो मक्खी दूर भगाऊँ, तू क्या करती ताई?


[COMIC SOUND: BUZZZZ... SPLAT!]


सर पे चोटी, दुम तो पीछे, मेरी समझ ना आया,

तुमने उल्टा सिस्टम क्यों ये, अपने सर अपनाया?


[CHILDREN'S WHISPER ECHO: उल्टा सिस्टम... सिस्टम... सिस्टम!]


इतनी मेहनत, इतना खर्चा, इतना टाइम लगाती,

तेल लगाती, कंघी करती, रोज़  चमकाती,

चोटी लंबी करके आखिर, क्या हासिल कर पाती?

अकल तेरी ए दीदी क्या थोड़ी बढ़ जाती?


[DONKEY BRAY: HEE-HAW!]


दीदी बोलीं, बेबी गधे, तर्क तेरा है पूरा कच्चा,

तेरी दुम से मक्खी भागे, मेरा स्टाइल अच्छा!


तू क्या गधे जाने तेरे माथे पड़ा धुंध बतला दी!


[STRANGE SOUND: WOBBLE-WOBBLE! PING!]


[HOOK — CHILDREN'S CHORUS WITH FUNNY ECHO]


हे दीदी दीदी दीदीदी मुझको मूर्ख बना दी,

दीदी दीदी दीदी दीदी सर पर पूँछ उगा दी !

हे दीदी दीदी दीदीदी मुझको मूर्ख बना दी,


[ECHO: उगा ली... उगा ली... उगा ली!]


[DONKEY BRAY: HEE-HAW! HEE-HAW! HEE-HAW!]


[BRIDGE — CALL AND RESPONSE, ALTERNATING CHILD VOICES]


[CHILDREN'S GROUP]

चोटी! चोटी!


[DONKEY CHILD]

दुम है! दुम है!


[CHILDREN'S GROUP]

फैशन! फैशन!


[DONKEY CHILD]

किस काम है?!


[STRANGE SOUND: PHEWOOO! BOING!]


[DI DI'S VOICE]

मेरा स्टाइल!


[DONKEY'S VOICE]

मेरी पूँछ!


[BOTH, SHOUTING]

कौन है सबसे अक्ल का...?


[LONG COMIC PAUSE]


[DONKEY BRAY: HEE-HAW!]


[VERSE 3 — PLAYFUL BOLLYWOOD STORYTELLING]


चोटी देखकर लोग ये सारे इसकी बातें करते,

मेरे फैशन के चर्चे तो, गली-गली में चलते!


ये दिखना मेरा हक़ है, समझे ओ नादान!

बस सवाल फैशन का ही है ना कोई विज्ञान।


[COMIC SOUND: SCIENTIFIC ZAP! TING-TING-TING!]


गधा बोला: बिल्कुल दीदी, इसमें नहीं प्रतिवाद,

बस फैशन को काम बताकर, करना मत विवाद!


दुम मेरी है काम की, अपनी चोटी तेरी शान,

शायद छोटी आप सही और पूँछ मेरी पहचान!


[DONKEY BRAY — SOFT, THEN LOUD: HEE-HAW... HEE-HAW-HAW!]


बुद्धि और अकल थी मेरी ठूंठ, सही समझा दी!


[FINAL HOOK — HUGE CHILDREN'S CHORUS, LOUD AND CLEAR]


हे दीदी दीदी दीदीदी मुझको मूर्ख बना दी,

दीदी दीदी दीदी दीदी सर पर पूँछ उगा दी !

हे दीदी दीदी दीदीदी मुझको मूर्ख बना दी,


[CHILDREN'S ECHO]

पूँछ उगा ली!

उगा ली!

उगा ली!


[EVERYONE SHOUTS]

दीदीईईईई!


[FINAL DONKEY BRAY — EXTRA LOUD: HEEEE- HAAAAAWWWW!]


[STRANGE ENDING: BOING! PLOP! CARTOON FALLING WHISTLE!]


[FINAL TINY DONKEY BRAY: HEE-HAW!]


[END — SUDDEN SILENCE]

भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता?

भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता?

भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता,
रात-रात भर शोर मचाता?
दिन में रहता मौन समाधि,
रात बने संगीत का गांधी!
टर्र-टर्र की ऐसी तान,
सो न सके पूरा मकान!
मच्छर बोला—“गायक जी,
काहे करते रियाज़ जी?”
मेंढक बोला—“मूर्ख मच्छर!
मैं हूँ जंगल का सुपरस्टार!
मेरी आवाज़ सुनकर ही तो,
बरसता है मेघों का प्यार!”
बगुला बोला—“वाह उस्ताद!
खूब बजाते अपना नाद!
एक ज़रा-सी तान सुनाओ,
पास में आकर सुर बतलाओ!”
मेंढक बोला—“दूर रहो जी,
मेरे सुर से जलते हो जी!
मेरी आवाज़ में है दम,
तुम क्या जानो संगीत का गम!”
तभी वहाँ पर आया हाथी,
बोला—“बंद करो बरसाती!
टर्र-टर्र से फटा है माथा,
किसने तुझको गायक बनाया?”
मेंढक बोला—“सुन गजराज,
कला नहीं है कोई मोहताज!
मेरी आवाज़ का है जलवा,
दुनिया भर में मेरा जलसा!”
हाथी बोला—“ठीक है भाई,
एक प्रतियोगिता रखवाई!
जो सबसे ऊँचा गाना गाए,
वही जंगल का रत्न कहलाए!”
मेंढक ने फिर गला फुलाया,
पेट गुब्बारे-सा फैलाया,
टर्र-टर्र की ऐसी मारी,
काँप उठी तालाब की क्यारी!
तभी अचानक आया साँप,
मेंढक जी के उड़ गए भाप!
टर्र-टर्र सब भूल गए,
सीधे पानी में कूद गए!
हाथी बोला—“कहाँ गए गायक?
कहाँ गया संगीत का नायक?
अभी तलक थे बड़े सितारे,
अब क्यों छिपते हो बेचारे?”
मेंढक बोला—“बात है न्यारी,
जान है सबसे अधिक प्यारी!
गाना-वाना बाद में होगा,
पहले साँप का नाशा होगा!”
साँप ने पूछा—“क्यों महाराज,
बंद हुआ क्या सुर का साज़?”
मेंढक बोला—“अरे जनाब,
डर के आगे बंद किताब!”
तभी मच्छर ने बात सुनाई,
हँसते-हँसते शाम बिताई—
“भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता,
जब ख़तरा देख छिप जाता?
शेर बने तो शेर ही रहना,
वरना चुपचाप पानी में रहना!”
ढक बोला—“सुनो भाई,
बात तुम्हारी समझ में आई!
टर्राना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार,
पर ख़तरे में भागना भी व्यवहार!”
हा हा ही ही, हू हू हू,
भई मेंढक, अब मत टर्राना यूँ!
हा हा ही ही, हू हू हू,
टर्राना कम, अक्ल लगाना—
वरना साँप करेगा कुकड़ू-कूँ

हा हा ही ही, हू हू हू!


एक मुर्गा सोचा सीना तान,
अब न कभी होगा बिहान,
जो मैं ना बोलूँगा कुकड़ू-कूँ,
हा हा ही ही, हू हू हू!
बोला—“मेरे दम पर दुनिया,
मेरे दम पर चाँद-सितार,
मेरी बाँग से सूरज जागे,
मैं ही हूँ दिनकर सरकार!”
मुर्गी बोली—“बड़े मियाँ,
किस खेत की मूली हो मियाँ?
कल जो तुमको खाँसी आई,
सूरज ने छुट्टी न मनाई!”
मुर्गा बोला—“चुप बदज़ात!
तुझको क्या ब्रह्मांड की बात?
आज न बाँग लगाऊँगा,
सूरज को भूखा सुलाऊँगा!”
रात गई, फिर भोर हुई,
सूरज की पेशी और हुई!
बिना बुलाए हाज़िर होकर,
चमका ऐसे आँखें खोलकर!
मुर्गा देख हुआ हैरान,
लुट गया उसका स्वाभिमान!
बोला—“यह कैसा अन्याय?
बिना बुलाए सूरज आय!”
तभी किसान ने दरवाज़ा खोला,
मुर्गे को देखकर यूँ बोला—
“आज न बाँग? बड़े नवाब!
क्या सरकार ने किया ख़िताब?”
र्गा बोला—“सुन किसान,
मैं हूँ कलाकार महान!
मेरी बाँग की कीमत आँको,
पहले मेरी तनख़्वाह बाँटो!”
किसान बोला—“वाह उस्ताद!
काम न धेला, माँगे प्रसाद!
तेरी बाँग के बिना बिहान,
फिर भी चलता मेरा मकान!”
हा हा ही ही, हू हू हू,
मुर्गे का निकला कुकड़ू-कूँ!

Tuesday, October 13, 2026

खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,खर्र... खर्राटा!

[Sound of Snoring in a Musical Manner]

खर्र-खर्र, खर्र-खर्र, खर्र... खर्राटा
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र, खर्र... खर्राटा
[Eco]

कमरे में था घोर सन्नाटा,
फिर कैसा ये हुआ धमाका?
जैसे बारिश झर्र झर्राटा

[Bridge]

खर्र-खर्र, खर्र-खर्र, खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र, खर्र... खर्राटा

[Eco]

बिस्तर पर श्रीमान विराजे,
तकियों पर अधिकार जमाए,
दिन भर रहे काम से घायल,
रात हुए इंजन के पायल!
नाक जैसे कोई बादल फाटा 

[Bridge]
[Sound of Snoring in a Musical Manner]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!

[Eco]

पत्नी बोली—“सुनते हो जी,
बंद करो ये तोपें जी!
घर है या कोई रेलवे स्टेशन,
कहाँ गया वो साइलेंस नोशन?”
पति ने करवट ली तत्काल,
नाक बढ़ा दी सुर की चाल,
सोए बोले टाटा टाटा

[Bridge]
[Sound of Snoring in a Musical Manner]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!

[Eco]

पड़ोसी ने डोर बजाया,
“भाई भूकंप ये कैसे आया?
दीवारें तक हिलती जातीं,
मेरी नींद उड़ी है साथी!”
एक बोला—“ये बादल गरजे!”
दूजा बोला—“बम हैं बरसे!”
तीजा बोला—“चले पटाखा

[Bridge]
[Sound of Snoring in a Musical Manner]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!

[Eco]

सुबह हुई तो पत्नी बोली,
“रात तुम्हारी पोल है खोली!
तुम सोए, हम रहे जागते,
दाँत पीसकर रहे भागते!”
पति ने मूँछों पर फेरा,
दीप तले यूँ घोर अंधेरा
तुझे जगाकर सुबह उठाकर 
रोज करवाए सैर सर्राटा 

[Bridge]
[Sound of Snoring in a Musical Manner]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!

[Eco]

अमिताभ कहें सुन हे नर-नारी,
खर्राटा बड़ी चीज़ करारी!
जिसके खर्राटे में दम-खम,
उसका घर चलता है हरदम!
खर्राटे का यही नज़ारा 
सबको सही समय उठाता 
और दौड़ाए फर फर्राटा

[Bridge]

[Sound of Snoring in a Musical Manner]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा!

[Bridge]

हां कमरे में हुआ धमाका
ज्यों कानों में लगा झन्नाटा 
च च च च चम चम चांटा 
[Eco]
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,
खर्र... खर्राटा
[Eco]
[Sound of Snoring in a Musical Manner]

छींक तू बड़ा सताती

[Loud Nose Sneezing Loud Sound]

[Eco]

आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती

[Bridge]

रात हुई, हम बिस्तर पर थे, ओढ़ चादर महारानी,
नींद खड़ी थी द्वार पे लेकर सपनों की कहानी ।
ज्यों ही आँख लगी हमारी, तूने बिगुल बजाया,
तकिया बोला “हे भगवान! फिर किसको जगवाया?”
नींद गई ससुराल हमारे, सपने हुए पराए,
पड़ोसी बोले “कौन पटाखे आधी रात चलाए?”

[Loud Nose Sneezing Loud Sound]

[Eco]

सबको यूं क्यों जगाती
छ छ छींक, तू बड़ा सताती!
आ आ आ आक आक्छी आती


[ECO]
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती

[Bridge]

एक दिवस हमने नाक पकड़कर तुझसे प्रश्न उठाया
किस विभाग में नौकरी करती, किसने तुझे बनाया
जब हम खाली बैठे होते, तब हीं मुँह लटकाती,
बॉस के आगे, इश्क़ के भीतर, चक्कर  चलाती?”
अरे ओ छींक तेरा टाइम क्यों  नहीं है फिक्स,
जहाँ मिले गंभीर माहौल, वहीं लगाती सिक्स!”

[Loud Nose Sneezing Loud Sound]

[Eco]

अपनी हीं हुक्म चलाती 
छ छ छींक, तू बड़ा सताती!
आ आ आ आक आक्छी आती


[ECO]
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती

[Bridge]

अब तो तुझसे हाथ जोड़कर इतनी विनती करते,
आने से पहले एक संदेशा भेज दिया कर, डरते!
मीटिंग में तू छुट्टी ले ले, इश्क़ में तू मौन धरे,
परीक्षा में अवकाश मना ले, मंदिर में भी ना उतरे!
घर में जब हम मूँगफली के दाने छील रहे हों,
तब आना जी, पंद्रह की खेप खुशी से दे जाओ!

[Loud Nose Sneezing Loud Sound]

[Eco]

सबको क्यों है डराती 
छ छ छींक, तू बड़ा सताती!
आ आ आ आक आक्छी आती


[ECO]

आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती

[Bridge]

नाक हमारी, राज तुम्हारा, कैसी यह मनमानी,
हम मालिक कहलाते फिर भी, तू निकली महारानी!
रुमालों का खर्च बढ़ा दिया, इज़्ज़त की निकली हवा,
तेरे आगे नाक कटाकर, घूम रहे हम बेवजह!
फिर भी तुझसे बैर न ठानें, आखिर तू है अपनी,
बस इतना कर समय देखकर बजा  बीन अपनी!

[Loud Nose Sneezing Loud Sound]

[Eco]

बात ना क्यों पतियाति 
छ छ छींक, तू बड़ा सताती!
आ आ आ आक आक्छी आती


[ECO]
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती
आ आ आ आ आ आक आक्छी आती

Friday, October 2, 2026

ओ खुजली


एक योगी, उसकी साधना और खुजली महारानी की हास्यपूर्ण महागाथा!

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर 
[Eco]

ख ख खुजली! बहुत सताती,
बार-बार क्यों लौट के आती?
कभी यहाँ तो कभी वहाँ है,
ना जाने तू कहाँ कहाँ है!
जब भी बैठूँ ध्यान लगाने,
तू आ जाती मुझे सताने!
प्रभु नाम जपूँ जब माला,
करती तन में गड़बड़झाला!
जभी शांति की लहर है आती,
तभी पीठ आके खुजलाती
कभी कंधे पर ढोल बजाए,
कभी कमर को गोल नचाये,
कभी नाक पर नृत्य दिखाए,
कभी कान कु कृत्य रचाए!
मैं समझूँ जब ब्रह्म मिलेगा,
ये कहती है नाखून हिलेगा!
कर देती सब अतर, बतर
ख ख खुजली खचर खचर

[Eco]

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर
ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर

[Bridge]

ख ख  खुजली! शर्म तो कर,
योगी हूँ, थोड़ा रहम तो कर!
जटा बढ़ाई, भभूत रमाई,
तब जाकर ये शांति पाई!
बड़ी मुश्किल से संत बनाया,
ध्यान तप से खुद को तपाया। 
तूने मुझको बंदर बनाया!
कभी उछलता, कभी मटकता,
कभी हवा में हाथ पटकता!
मैं क्या अपना दुखड़ा रोऊँ,
पहले अपनी पीठ तो धोऊँ!
माथे पर जब ध्यान लगाऊँ,
तब तू ठुड्डी पर चढ़ आऊँ!
ठुड्डी खुजलाऊँ, पीठ मचलती,
पीठ खुजलाऊँ, नाक उछलती!
नाक खुजलाऊँ, कान बुलाए,
कान खुजलाऊँ, पैर हिलाए!
पैर खुजलाऊँ, पेट पुकारे,
लगता तन में भूत हैं सारे!
करते सारे गतर, घतर
ख ख खुजली खचर खचर

[Eco]

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर
ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कच

[Bridge]

हुं हुं! हे हे! हाय रे विदाता!
खुजली ने फिर ध्यान छुड़ाया!
तू तन की छोटी-सी रानी,
तेरी महिमा बड़ी सयानी!
तेरे आगे योगी हारे,
रोते रोते संत पुकारे—
“प्रभु! मिले तो मिल भी जाए, 
पहले तुझसे मुक्ति पाएं!”
कर पाए तब नमः शिवाय!
बोलो जय खुजली हीं भाय ।
हरो कष्ट सब कतर कतर
सर्व श्रेष्ठ जंतर मंतर
ख ख खुजली खचर खचर 

[Eco]

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर
ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर
====

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर 

[Bridge]

ख ख खुजली! बहुत सताती,
बार-बार क्यों लौट के आती?
कभी यहाँ तो कभी वहाँ,
जाने है तू कहाँ कहाँ!
जब भी बैठूँ ध्यान लगाने,
तू आ जाती मुझे सताने!
प्रभु नाम जपूँ जब माला,
कर देती तू गड़बड़झाला!
हुं हुं! हे हे! हाय रे दाता!
ख ख खु क्यों दिया विधाता!
आँखें मूँद जब ध्यान लगाऊँ
मन में प्रभु गान गुन गुनाऊं 
जभी शांति की लहर है आती,
तभी पीठ खुजली आ जाती
कभी कंधे पर ढोल बजाए,
कभी कमर को गोल नचाये,
कभी नाक पर नृत्य दिखाए,
कभी कान कु कृत्य रचाए!
मैं समझूँ जब ब्रह्म मिलेगा,
ये कहती है नाखून हिलेगा!
हुम् हुम्! हुड़दंग मचाती!
ध्यान की खिचड़ी रोज जलाती!

[Bridge]

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर
ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर

[Bridge]

ख ख  खुजली! शर्म तो कर,
योगी हूँ, थोड़ा तो रहम कर!
जटा बढ़ाई, भभूत रमाई,
तब जाकर ये शांति पाई!
बड़ी मुश्किल से संत बनाया,
ध्यान तप से खुद को तपाया। 
तूने मुझको बंदर बनाया!
कभी उछलता, कभी मटकता,
कभी हवा में हाथ पटकता!
मैं क्या अपना दुखड़ा रोऊँ,
पहले अपनी पीठ तो धोऊँ!
हे हे! हो हो! सुनो कहानी!
ख ख खुजली बड़ी सयानी!
कौन शत्रुता तू है निभाती,
जो हर पल मुझको तड़पाती?
माथे पर जब ध्यान लगाऊँ,
तब तू ठुड्डी पर चढ़ आऊँ!
ठुड्डी खुजलाऊँ, पीठ मचलती,
पीठ खुजलाऊँ, नाक उछलती!
नाक खुजलाऊँ, कान बुलाए,
कान खुजलाऊँ, पैर मचल जाए!
पैर खुजलाऊँ, पेट पुकारे,
लगता तन में भूत हैं सारे!
सोचा मैंने, धैर्य धरूँगा,
तन की इच्छा से न डरूँगा,
दाँत भींचकर बैठा आसन,
जैसे सहूँ हिमालय-शासन!
पाँच मिनट तक वीर बना मैं,
छठे मिनट अधीर बना मैं!
सातवें मिनट हाथ उठाया,
आठवें में आसन डगमगाया!
नौवें मिनट हुआ धमाका,
पीठ खुजलाने का मन जागा!
दसवें मिनट हार के बोला—
“प्रभु! कैसा चक्र तन डोला?”

[Bridge]

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर
ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर

[Bridge]

हुं हुं! हे हे! हाय रे दाता!
खुजली ने फिर ध्यान छुड़ाया!
ओ खुजली! तू बहुत सताती,
बार-बार क्यों लौट के आती?
जग ताज प्रभु को ध्यान लगाऊँ 
तुझसे कैसे मुक्ति पाऊँ?
तू तन की छोटी-सी रानी,
तेरी महिमा बड़ी सयानी!
तेरे आगे योगी हारे,
रोते रोते संत पुकारे—
“प्रभु! मोक्ष मिले तो मिल जाए,
पहले ख ख खुजली दूर भगाए!”
हा हा! हुं हुं! ओम नमः शिवाय!
ख ख खुजली जय हो भाई ।
प्रभु मिले कब जय हो साईं 
पहले जय हो खुजली भाई  

[Bridge]

ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर
ख ख खुजली खचर खचर 
क क क क क कचर कचर

====

ओ खुजली! तू बहुत सताती,
बार-बार क्यों तू आ जाती?
जब भी बैठूँ ध्यान लगाने,
तू आ जाती मुझे सताने!
आँखें मूँद, लगाऊँ ध्यान,
मन में गूँजे प्रभु का गान,
अभी शांति की लहर है आती,
तू पीठ पर डमरू बजाती!
ओ खुजली! कुछ तो शर्म कर,
योगी हूँ, थोड़ा तो रहम कर!
कौन शत्रुता तू है निभाती,
जो हर पल मुझको तड़पाती?
माथे पर जब ध्यान लगाऊँ,
तब तू ठुड्डी पर चढ़ आऊँ!
ठुड्डी खुजलाऊँ, पीठ मचलती,
पीठ खुजलाऊँ, नाक उछलती!
खुजली बोली, “सुन ओ बाबा,
मत समझो मुझको कोई अजूबा!
जब तक तन से मोह न जाएगा,
मेरा आना-जाना चलता जाएगा!”
योगी बोला, “वाह रे ज्ञानी!
तूने भी दी बात सयानी!
मोह छोड़ने बैठा था मैं,
तुझमें ही उलझा रहता हूँ मैं!”
फिर दोनों में हुई सुलह,
योगी ने ली गहरी साँस,
जैसे ही वह ध्यान में बैठा,
खुजली बोली— “मैं हूँ पास!” 
ओ खुजली! तू बहुत सताती,
बार-बार क्यों तू आ जाती?
जग को छोड़ प्रभु को ध्याऊँ,
तुझसे कैसे मुक्ति पाऊँ?

गांडीव की टंकार

तेरह वर्ष अँधियारे बीते, फिर अरुणोदय आया है, वन की ज्वाला में तपकर अब, पार्थ प्रखर हो आया है। जिसको तुमने मौन समझकर, दुर्बलता का नाम दिया, उसने अपने धैर्य-वज्र से, काल-चक्र को थाम लिया!

वन की धूल नहीं यह समझो, यह रण का शृंगार बनी, तप की प्रत्येक अग्नि आज, प्रतिशोध नहीं, हुंकार बनी। जिस भुजा ने देवों के सम्मुख, मृत्यु-द्वार ललकारा था, आज उसी के सम्मुख देखो, कुरुकुल का अँधियारा था!

दुर्योधन! मत समझो मुझको, वन ने शिथिल बनाया है, जिसको विपदा ने तपाया हो, वह वज्र बनकर आया है! भूख मिली तो क्षुधा सहा, अपमान मिला तो मौन रहा, भाग्य प्रहारों से टकराकर, मैं अपने पथ पर अडिग रहा!

मुझको न स्वर्ण-मुकुट की इच्छा, न साम्राज्य का मोह मुझे, न जयमालाओं की लालसा, न यश का आकर्षण मुझे। मैं तो उस अधिकार हेतु आया, जिसका हरण किया तुमने, धर्मराज के सत्य-राज्य को, छल से छीन लिया तुमने!

कहाँ गया वह दर्प तुम्हारा, कहाँ सभा की वाणी है? कहाँ गई वह हँसी तुम्हारी, कहाँ दुष्ट अभिमानी है? कहाँ गया वह गर्व, बताओ, जो नारी पर भारी था? कहाँ गया वह न्याय, तुम्हारा, जो केवल दरबारी था?

याद करो उस सभा-भवन को, जहाँ धर्म लज्जित था, जहाँ द्रौपदी का प्रश्न खड़ा था, और मौन प्रतिष्ठित था। केश खिंचे, आँसू बरसे थे, काँपा था सम्मान वहाँ, किन्तु तुम्हारे गर्वित मन में, जागा नहीं विधान वहाँ!

वह अपमान अभी जीवित है, वह प्रतिज्ञा भी शेष यहाँ, न्याय प्रतीक्षा करता अब तक, कुरुवंश के इस देश यहाँ। मैं उस पीड़ा का प्रतिशोधी बनकर मात्र नहीं आया, धर्म-तुला पर कर्म तुम्हारे रखने आज चला आया!

आज परीक्षा पार्थ की नहीं, कौरव-कुल की होगी, आज तुम्हारे शौर्य-गर्व की अंतिम कसौटी होगी! देखें किसकी भुजा प्रचंड है, किसका साहस सच्चा है, किसके भीतर धर्म जागता, किसका मन बस कच्चा है!

मत पूछो कि संख्या कितनी है, मत गिनना रथ, घोड़े, मत देखो कितने धनुर्धर हैं, कितने भाले, कितने कोड़े। जब संकल्प हिमालय बनता, सेना गौण हो जाती है, एक अकेली सत्य-प्रतिज्ञा, युग पर भारी पड़ जाती है!

आज न वाणी युद्ध करेगी, न छल का व्यापार चलेगा, आज न कुटिल नीतियों का कोई अत्याचार चलेगा। आज धनुष की टंकारों में, उत्तर सारे मिल जाएँगे, आज कर्म के लेख स्वयं ही, भाग्य-विधान लिख जाएँगे!

मैं प्रतिशोध-ज्वाला का दास नहीं, धर्माग्नि का रक्षक हूँ, अन्यायों के घोर तिमिर में, सत्य-सूर्य का वाहक हूँ। कुन्ती-सुत हूँ, पार्थ नाम है, गांडीव मेरी पहचान, कर्मभूमि में सत्य निभाना, मेरा धर्म, मेरा प्राण!

तेरह वर्षों की तप-साधना, आज मुखर होने आई, मौन हृदय की ज्वाला अब, रण में प्रखर होने आई। वन-वन भटका, कष्ट सहे, पर धैर्य नहीं खोने पाया, काल स्वयं भी रोक न पाया, जो संकल्प हृदय में आया!

अब तक वन की धूल सही है, अब रण-धूल उड़ाऊँगा, अब तक मौन रहा गांडीव, अब उसका नाद सुनाऊँगा! अब तक रोका था वेग बाण का, अब वह वेग बहेगा, जिसने धर्म-वृक्ष काटा है, उसका फल भी ढहेगा!

संख्या का अभिमान न करना, शस्त्रों पर मत इतराना, वीर वही जो धर्म हेतु, संकट में भी शीश उठाना। रथ पर रथ हों, सैन्य अपार हो, नभ तक उठते ध्वज हों, सत्य अकेला खड़ा रहे तो, उसके आगे सब नगण्य हों!

आज न क्षमा-विनय की बेला, आज न मिथ्या मान, आज कर्म की कसौटी पर, तौला जाएगा अभिमान। कौन धनुर्धर, कौन महाबल, कौन प्रतिज्ञा का धनी, आज धरा पर लिखेगी गाथा, किसकी कीर्ति अमिट बनी!

आज दिशाओं के हृदयों में, कम्पन भरने वाला हूँ, गिरि-शिखरों की निद्रा तोड़ूँ, ऐसा स्वर करने वाला हूँ। प्रत्यंचा की एक टंकार से, नभ का मौन टूट जाएगा, सोया हुआ समय भी सुनकर, युग-परिवर्तन गाएगा!

आज न मेघों की गर्जन से, धरती भयभीत होगी, न बिजली की चपला से ही, रात प्रकाशित होगी। आज धनंजय के धनुषों से, अग्नि-स्वर फूटेंगे, आज बाण के वेग देखकर, पर्वत भी सिर झुकाएँगे!

प्राची पर अरुणिम आभा है, तम का अंत निकट आया, धर्म-सूर्य का रथ लेकर, पार्थ पुनः रण में आया। उठो कुरुवंश! सुनो ध्यान से, काल-द्वार पर चोट पड़ी, गाण्डीव की गर्जना उठी है, अधर्म-रात्रि की साँस अड़ी!

एक-एक अपमान हृदय में, अंगारों-सा पलता था, एक-एक अन्याय समय की, शिला पर अंकित चलता था। मैंने पीड़ा को पीकर भी, धैर्य-दीप जलने दिया, मैंने अपने क्रोध-विष को, धर्म-अमृत बनने दिया!

सुनो! धनुष की ध्वनि केवल, शस्त्रों का उद्घोष नहीं, यह पीड़ित जन के अधिकारों का, कोई साधारण घोष नहीं। ये बाण नहीं केवल लोहे के, ये प्रतिज्ञा के दूत बने, ये उन सबके प्रश्न हैं, जो अन्यायों से मौन सने!

पर याद रहे, हे कुरुवंशियो, रण केवल संहार नहीं, धर्म-विजय का अर्थ किसी का, अंधा अहंकार नहीं। जो न्याय बचाने हेतु उठता, वही शस्त्र पवित्र बने, जो लोभ हेतु रक्त बहाता, उसके यश भी धूल बनें!

आज पार्थ के बाण लिखेंगे, रणभूमि का इतिहास, आज परखे जाएँगे सारे, नीति, शौर्य और विश्वास। धर्म खिलेगा, सत्य फलेगा, टूटेंगे अन्याय-पाश, काल स्वयं साक्षी होगा, किसने निभाया धर्म-व्रत-विशेष!

आज न केवल पार्थ जगेगा, आज युगों का मान जगे, आज पराजित छल होगा, आज सत्य का गान जगे। देखो! नभ के वक्षस्थल पर, अग्नि-लिपि उभरने दो, गाण्डीव की टंकारों से, सोया इतिहास जगने दो!

मैं अर्जुन हूँ—वचन निभाने रणभूमि में आया हूँ, धर्म बचाने, सत्य जगाने, गांडीव उठाकर आया हूँ! आज बाण ही बोलेंगे, आज कर्म ही प्रमाण, आज धरा पर गूँजेगा—धर्मधनंजय का जयगान!

जिस नारी के केश खिंचे थे, उस सभा में शपथ शेष है,
उस अबला के अपमानों का ऋण अभी तक अवशेष है।
आज परीक्षा मेरी नहीं कौरव आज तुम्हारी बारी,
देखें किसमें लहु शेष है, देखें किसकी साँसें भारी!

एक-एक अपमान हृदय में, अग्नि बनकर जलता था,
एक-एक अन्याय समय में, अंकित होकर फलता था!
सुनो! यह केवल धनुष नहीं यह धर्म का घोष है,
ये बाण नहीं हैं मात्र हमारे ये काल आक्रोश है।

धन! धन! धन! धनंजय!
 जय! जय! जय! अभय! 
हुं! हुं! हुं! नभ काँपे! हे! 
हे! हे! गिरि डोले! 
हुम्! हुम्! हुम्! रण जागे!
 धन! धन! धन! धनुष बोले! 

आज पार्थ के बाण लिखेंगे, रणभूमि इतिहास,
न्याय फलेगा धर्म फलेगा मिटे अधर्मी पाश।  
आज पार्थ का नाद दिवस है अम्बर में अंगार ,
देख आज इतिहास सुनेगा गाण्डीव की टंकार !

न राज्य-लालसा मुझे यहाँ, न यश का मोह बुलाता है,
जिसके छीने मान तुम्हीं ने वही अर्जित करने आता है।
कहाँ गया वो दर्प तुम्हारा, कहाँ गई वो कुत्सित वाणी?
कहाँ गया वो हास्य सभा का,कहाँ गई वो कुटिल कहानी?
====
हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे! हे! हे! हे!  हुं! हुं! हुं!
हे! हे! हे!हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे

[Bridge]

तेरह वर्ष की रजनी बीती, अब प्राची मुस्काई है,
वन में तपकर लौह हुई जो, वो ज्वाला फिर आई है।
जिसे समझकर मौन तपस्वी तुमने किया उपहास,
वही धनंजय खड़ा सामने, लिये प्रलय का पाश!
दुर्योधन मत समझो वन ने मुझको दुर्बल कर डाला,
भूख मिली तो धैर्य मिला, संकट से भीषण बल आया।

[Bridge]

धन! धन! धन! धनंजय!
जय! जय! जय! अभय! 
हुं! हुं! हुं! नभ काँपे! हे! 
हे! हे! गिरि डोले! 
हुम्! हुम्! हुम्! रण जागे!
धन! धन! धन! धनुष बोले! 

[Bridge]

प्रतिशोध का ताप नहीं दग्ध अग्नि सम ज्वाला हूँ,
धर्मराज का अनुज धनंजय, धर्म मर्म रखवाला हूँ।
आज न पूछो कौन अकेला, किसकी ओर है काल,
आज बाण लिखेंगे रण में रक्तिम विजय-विशाल।
आज नहीं तो कब जागेगा सत्य-शौर्य का मान?
आओ! देखूँ कौन बचाता निज मिथ्या अभिमान!

[Bridge]

जय! जय! जय! धर्म!
हर! हर! हर! कर्म!
हे! हे! हे! कौन तीर
हुं! हुं! हुं! कौन वीर? 
हे! हे! हे! कौन धीर? 

[Bridge]

अब तक धूल सही है वन की, अब रण-धूल उड़ाऊँगा,
अब तक मौन रहा जो गाण्डीव, उसकी नाद सुनाऊँगा।
संख्या का अभिमान न करना, बाण हमारे बोलेंगे,
कुरु वंश के योद्धा सारे अपने शौर्य को तोलेंगे!
आज न कोई क्षमा-विनय, न कोई मिथ्या अभिमान,
रण में केवल कर्म बोलेंगे, कौन धनुर्धर, कौन महान!

[Bridge]

हुंऽऽऽ! हुंऽऽऽ! हुंऽऽऽ!
हरऽऽऽ! हरऽऽऽ! हरऽऽऽ! 
हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे! हे! हे! हे!  हुं! हुं! हुं!
हे! हे! हे!हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे

[Bridge]

आज न बादल गरजेंगे, न बिजली ही चमकेगी,
आज प्रत्यंचा की ध्वनि से रणभूमि ये दहकेगी।
घोड़ों की टापों से धरती  थर्रा-थर्रा जाएगी,
रथ के पहियों से रणभूमि जर्रा जर्रा कांपेगी।
आज पार्थ का नाद दिवस है अम्बर में अंगार ,
देख आज इतिहास सुनेगा गाण्डीव की टंकार !

[Bridge]

धन! धन! धन! धनंजय!
 जय! जय! जय! अभय! 
हुं! हुं! हुं! नभ काँपे! हे! 
हे! हे! गिरि डोले! 
हुम्! हुम्! हुम्! रण जागे!
 धन! धन! धन! धनुष बोले! 
 

नक़ाफी है शायद मेरा इंसान होना

लोग पूछते हैं मुझसे मेरे मज़हब का नाम,
नक़ाफी है शायद , मेरा इंसान होना।

आँख का अंधा भी कहलाता है नयनसुख यहाँ,
फिर क्यों ज़रूरी है नाम-ओ-निशान होना।

जात पूछी, कभी पूछा मेरा कुल कभी देश,
मेरी समझ ना आये होता क्या इंसान होना।

रंग अलग, रूप अलग, भाषा अलग हो तो क्या,
ख़ून सबका एक  फिर क्यों अनजान होना।

मैंने इंसान को इंसान की नज़र से देखा,
मेरी पूजा भी यही, मेरा यही ईमान होना।

कौन ऊँचा है, कौन नीचा—ये सवालों के सिवा,
काश दुनिया में बचे बस इतना इंसान होना।

किस किताब में लिखा है कि बँटे आदमी,
किस ज़ुबाँ ने सिखाया है यहाँ हैवान होना।

मज़लूम की आहों को जो सुन ले दिल से,
शायद उससे बड़ा कोई नहीं इंसान होना।

मुझे पहचानना हो तो मजहब ना पूछो,
मेरी ख्वाहिश यही ना बेईमान होना।

लोग पूछते रहें मुझसे मेरे मज़हब का नाम,
मैं कहूंगा  मज़हब मेरा बस  इंसान होना।

Thursday, October 1, 2026

पापा की यादें

तब पापा उठ डांट लगाते , देर तलक  सो जाने में।।
नींद कहाँ अब आती हमको, ख़ुद को रोज़ सुलाने में।।

वो मिट्टी की खुशबू आती है, बरसातों के मौसम में,
मन फिर से बच्चा हो जाता है, बीते पल दोहराने में।।

दरवाज़े की आहट सुनकर, पल भर को चुप हो जाता,
फिर खुशियों से हँस पड़ता , पापा के घर में आने में।।

आँगन में तब  अनुशासन था, पापा का तब  क्रोध रहा,
उनकी डाँट में प्यार छिपा था, मुझको  राह दिखाने में।

आज वही आँगन सूना है , आँगन जैसे मौन हुआ है ,
मन उनको अब ढूँढ़ रहा है, सूने घर को बगियाने में।।

फिर भी अंतस के अंतर में, पापा  वैसे ही रहते हैं,
जैसे कल ही साथ खड़े थे , हँसने और रुलाने में।।

जिन राहों पर साथ चले थे, आज अकेला चलता हूँ,
पाँव थकें तो यादें आतीं, उनकी  राह बताने  में।।

एक दिया अब भी जलता पापा दिल  के कोने में,
जैसे अब भी पास खड़े हो मुझको गले लगाने में।।

आज भरा घर सामानों से, देखो पापा दिल  खाली,
क्या-क्या खोया मैंने आखिर, आगे बढ़ते जाने में।।

अब चौखट से पूछ रहा हूँ, पापा कहाँ हैं कैसे हैं ,,
कैसे मन की बात बताऊँ, दिल की पीड़ जताने में।।

जब तक साँसें होंगी मेरी, पापा दिल में याद रहेंगे,
हर धड़कन में नाम रहेगा, सुख-दुख के अफ़साने में।।

जब तक ये जीवन है मेरा, नेक विरासत अपनाऊंगा ,
पापा कोई  कसर ना होगी सारी   सीख निभाने में ।। 

क्या खूब अख़्तियार है

क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

नशा चढ़ता है और दिखने लगता उसपे असर।
कि जाम उठाते हीं झुकने लगता है इस कदर।
आने लगती है लबों पर हर बेबस के लिए आवाज
जो भी दिल में दबा था कहने लगता है बे-हिसाब।
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी  जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

नशा बढ़ता है तो बढ़ती है अदब की रौशनी,
हर अजनबी में देखे फिर इंसान की ज़िंदगी।
वो सुनता है ख़ामोशी को, बड़े गौर से जनाब,
ना काटे किसी की ना करे  किसी की  ख़राब।
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

मयख़ाने में पूछो तो हर शख़्स का अफ़साना है,
किसी के हाथ में जाम है, तो  दिल में पैमाना है,
कोई पीकर खोए ख़ुद को कोई चुकाए अपना हिसाब,
कोई जाम से बिगड़ जाए, पर ये सीखता आदाब।”
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

न आँखों में गुरूर आए, न लहजे में कोई ख़राबी,
न होंठों पर शोर कोई, न बातों में कोई बेताबी।
जाम हाथ में आए तो उसके दिल हो जाए साफ़ ,
कि वो दूर था खुद से आज आ गया  ख़ुद के पास
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी  जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

ओ मृगतृष्णा की रेखा

अरी मन की प्रथम तरंग, तू कौन अनाम कहानी,
क्षण में सावन बरसा दे, क्षण में नयन में पानी।

ओ स्मृति-वन की मृगनयनी, री बीते क्षण की छाया,
जिसको पाया, उसको खोया, खोया तो फिर माया।

अरी अभिलाषा की चपला, ओ मृगतृष्णा की रेखा,
दूर क्षितिज तक दौड़ लगाती, पास न आए लेखा।

कभी गगन में उड़ती जाती, कभी धूल में गिर जाती,
एक कण में विश्व समेटे, विश्व मिले तो भरमाती।

तू ही स्वप्न सजाती मन में, तू ही स्वप्न मिटाती,
तू ही दीप जलाती भीतर, तू ही आँधी बन जाती।

हे इच्छा की अनगिन शाखा, तृष्णा तेरा विस्तार,
एक मिले तो दूजा माँगे, कब थमे यह व्यापार?

रे मन! तेरा कौन किनारा, कौन तेरा विस्तार,
कहाँ रुके तेरी गति कभी, कहाँ रुके विचार?

तर्क-शिखर पर चढ़ता मन, भाव-सलिल में बहता,
एक पुरानी स्मृति की चिनगी, अंतर-वन में दहता।

जितना बाँधूँ, उतना छूटे, जितना रोकूँ भागे,
दमन-जाल में फँसा मन ही, प्रतिरोध की ज्वाला जागे।

अरी विस्मृति! तू क्या मिटाए इस चंचल मन की गति?
जिसे दबाया, वही उभरा; जिसे समझा, वहीं मुक्ति।

न मन को जीत, न मन को बाँध, उसकी गति पहचान,
जिस क्षण मन को समझ लिया, खुल गया निज विधान।

तब जाना—मन शत्रु नहीं, यह मन ही मन का साथी,
जिसे समझा, वह शांत हुआ, मिटने लगी व्यथा सारी।

Wednesday, September 30, 2026

मरने को बेताब भी

[प्रस्तावना — धीमे स्वर में]

आदमी को समझना आसान नहीं है।वह जैसा दिखाई देता है, हमेशा वैसा होता नहीं।कभी वह अपने भीतर की आवाज़ सुनता है,और कभी उसी आवाज़ से बचता रहता है।

इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
खुद को पहचानने की फुर्सत नहीं मगर,
दुनिया समझने की रखता है ख्वाब भी।
इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।

शायद इसी उलझन का नाम ज़िंदगी है।इंसान बाहर बहुत कुछ खोजता रहता है,जबकि कुछ सवाल उसके भीतर ही बैठे होते हैं।

इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।


[अंतरा — शहर और भटकाव]


शहर को भटकता, तन्हाई ना मिटती,
रात के सन्नाटों में रखता है आग भी।
पढ़ के हीं सीख ले ये चीज़ नहीं आदमी,
ठोकर के जिम्मे नसीहतें किताब भी।
वक़्त को गंवाता है कल के भरोसे पर,
वक़्त से माँगता बीता हुआ हिसाब भी।

वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता।हम अक्सर यह बात तब समझते हैं,जब लौटकर देखने के लिए बहुत कुछ पीछे छूट चुका होता है।

इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।

[अंतरा — भावनाएँ और दूरी]

दिल की जज़्बातों को रखना ना मुमकिन,
लफ़्ज़ों में भर के पहुँचाता आवाज़ भी।
जो पास है उसकी कदर नहीं है इसको,
जो दूर है उसे देखता जैसे आफ़ताब भी।
अँधेरों में छुपता है आदमी ये जान कर,
चाँदनी है अच्छी पर दिखते हैं दाग भी।

जिसे हम अपने सबसे करीब समझते हैं,कई बार उसी को सबसे कम समझ पाते हैं।दूरी हमेशा जगह की नहीं होती।

इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।

[अंतरा — स्वयं से संघर्ष]


खुद से अकड़ता है, खुद से ही लड़ता,
जाने ज़िद कैसी है, कैसा रुआब भी।
इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।

आदमी दुनिया से जीतने की कोशिश करता है।लेकिन सबसे लंबी लड़ाई अक्सर अपने आप से होती है।और उसका कोई दर्शक नहीं होता।

शौक भी तो पाले हैं, दारू शराब क्या,
जीने की ज़िद पे मरने को बेताब भी।

कभी-कभी इंसान जीवन को समझते-समझते उसे जीना ही भूल जाता है।फिर अचानक उसे एहसास होता है कि समय कितना आगे निकल चुका है।

इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।

[समापन — धीमा, लगभग बातचीत की तरह]

जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।

शायद आदमी ऐसा ही है।वह विरोधाभासों से बना हुआ है।उसके भीतर प्रेम भी है, क्रोध भी;उम्मीद भी है और निराशा भी।वह खुद को ढूँढ़ता रहता है,और उसी तलाश में पूरी उम्र गुज़ार देता है।

इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।

सवाल शायद खत्म नहीं होंगे।जवाब भी हमेशा पूरे नहीं मिलेंगे।लेकिन शायद इंसान होने का अर्थ ही यही है—चलते रहना, पूछते रहना,और अपने भीतर झाँकते रहना।

जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।

====
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
 
खुद को समझने की फुर्सत नहीं मगर,
दुनिया समझने का दावा है हर पहर।
इंसान की फ़ितरत क्या कितने नकाब,
सवालों में होते अक्सर  जीने के  राज़ ।  
है सच की तलाश ओढ़े झूठे लिबास भी
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।

शहरों में भटकन तन्हाई की आग है,
रातों के सन्नाटों में लिए कई ख्वाब है।
पढ़ के हीं सीख ले ये चीज नहीं आदमी,
ठोकर पर गिरकर हीं सीख लेता आदमी।
ज़ख़्मों से पूछता है दवा और इलाज भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।

दिल में जज्बातें सजाता बेहिसाब,
लफ्जों में भर के रखता है कई राज।
जो पास है उसकी कदर नहीं है इसको ,
जो दूर है आफ़ताब समझता है उसको।
चाँदनी में खुद के ही दागों से डरता और
आईना दिख जात तो होता नाराज़ भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।  

खुद से अकड़ता है खुद से हीं लड़ता,
उठने की चाह में गिरता संभालता।     
शौक भी तो पाले क्या दारू शराब है,
फूंकता है धुंआ और पीता तेजाब है। 
कि जीने की जिद पर मरने को बेताब भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
कि जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।

Monday, September 28, 2026

मैं मिट्टी और बीज


 मैं कौन?

ये मिट्टी?

मिट्टी से बीज,
बीज से तना,
तने से शाखें,
शाखों से पत्ती,
पत्ती से कली,
कली से फूल,
फूल से फल,
फल से अन्न,
अन्न से रक्त,
रक्त से कोशिका,
कोशिका से ऊतक,
ऊतक से मांस,
मांस से पेशी,
पेशी से मज्जा,
मज्जा से अस्थि,
अस्थि से देह,
देह से श्वांस,
श्वांस से प्राण,
प्राण से कौन,

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

देह से इंद्रियाँ,
इंद्रियों से अनुभूति,
अनुभूति से संवेदना,
संवेदना से भावना,
भावना से इच्छा,
इच्छा से संकल्प,
संकल्प से कर्म,
कर्म से अनुभव,
अनुभव से स्मृति,
स्मृति से विचार,
विचार से बुद्धि,
बुद्धि से विवेक,
विवेक से प्रश्न,
प्रश्न से जिज्ञासा,
जिज्ञासा से खोज,
खोज से ज्ञान,
ज्ञान से बोध,
बोध से दृष्टि,
दृष्टि से सत्य,
सत्य से मौन,
मौन से कौन

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

विचार से अहंकार,
अहंकार से ‘मैं’,
‘मैं’ से मेरा,
मेरा से मोह,
मोह से ममता,
ममता से भय,
भय से इच्छा,
इच्छा से संघर्ष,
संघर्ष से पीड़ा,
पीड़ा से प्रश्न,
प्रश्न से विरक्ति,
विरक्ति से शून्य,
शून्य से कौन

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

स्मृति से अतीत,
अतीत से कथा,
कथा से पहचान,
पहचान से नाम,
नाम से संबंध,
संबंध से संसार,
संसार से भूमिका,
भूमिका से चेहरा,
चेहरे से व्यक्तित्व,
व्यक्तित्व से चरित्र,
चरित्र से कर्म,
कर्म से परिणाम,
परिणाम से भाग्य,
भाग्य से प्रश्न

प्रश्न से कौन

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

शब्द से अर्थ,
अर्थ से भाषा,
भाषा से विचार,
विचार से संवाद,
संवाद से संबंध,
संबंध से प्रेम,
प्रेम से समर्पण,
समर्पण से भक्ति,
भक्ति से प्रार्थना,
प्रार्थना से मौन,
मौन से पुकार,
पुकार से उत्तर,
उत्तर पर मौन 

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

श्वांस से जीवन,
जीवन से समय,
समय से क्षण,
क्षण से दिन,
दिन से रात,
रात से स्वप्न,
स्वप्न से जागरण,
जागरण से चेतना,
चेतना से साक्षी,
साक्षी से दृष्टा,
दृष्टा पर मौन 

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

=====

वो हूँ मैं 

जो 

जो परे है

क्या से

कहाँ से

जहां से

कब से

जब से

तब से

कौन से

मौन से

रूप से

रंग से

गंध से

स्पर्श से

शब्द से

निःशब्द से

विचार से

अविचार से

आकार से

निराकार से

विकार से

निर्विकार से

नाम से

अनाम से

रूप से

अरूप से

दृश्य से

अदृश्य से

ज्ञात से

अज्ञात से

सत्य से

असत्य से

होने से

न होने से

पूर्णता से

अपूर्णता से

शून्यता से

पूर्णता से

सीमा से

असीमा से

बंध से

निर्बंध से

जन्म से

अजन्म से

जीवन से

निर्जीव से

मृत्यु से

अमृत से

अंधकार से

प्रकाश से

रात से

दिन से

धरती से

आकाश से

श्वास से

निःश्वास से

ध्वनि से

प्रतिध्वनि से

एक से

अनेक से

अनेक से

एक से

मैं से

तू से

तू से

मैं से

पास से

दूर से

दूरी से

निकटता से

प्रेम से

विरह से

मिलन से

बिछोह से

प्रश्न से

उत्तर से

उत्तर से

अनुत्तर से

चलने से

ठहरने से

समय से

कालातीत से

आरंभ से

अंत से

अंतहीन से

क्षण से

अनंत से

स्मृति से

विस्मृति से

मौन से

महामौन से

जो दिखता है

जो छिपा है

जो कहा है

जो अनकहा है

जो जाना है

जो अनजाना है

जो बना है

जो बिगड़ा है

जो मिटा है

जो बचा है

जो है

बस है

कुछ भी नहीं होते हुए भी

सब कुछ है

जो मैं नहीं हूं

उसके पार

जो मैं हूं

उसके भी पार

जो है

और जो नहीं है

उसके बीच

उसके भी पार

न मैं हूं

न मेरा है

न तेरा है

फिर भी

जो कुछ है

वही है

वो हूं मैं

===

कौन हूँ मैं?

ये मिट्टी?

मिट्टी से बीज,
बीज से तना,
तने से शाखें,
शाखों से पत्ती,
पत्ती से कली,
कली से फूल,
फूल से फल,
फल से अन्न,
अन्न से रक्त,
रक्त से कोशिका,
कोशिका से ऊतक,
ऊतक से मांस,
मांस से पेशी,
पेशी से मज्जा,
मज्जा से अस्थि,
अस्थि से देह,
देह से श्वांस,
श्वांस से प्राण,
प्राण से—

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

देह से इंद्रियाँ,
इंद्रियों से अनुभूति,
अनुभूति से संवेदना,
संवेदना से भावना,
भावना से इच्छा,
इच्छा से संकल्प,
संकल्प से कर्म,
कर्म से अनुभव,
अनुभव से स्मृति,
स्मृति से विचार,
विचार से बुद्धि,
बुद्धि से विवेक।

प्रशंसा पर

खुश


डाँट पर 

दुःख ।


प्रेम में 

प्रसन्नता।


ईर्ष्या पर

क्रोध।

भाव से

विचार

भावनाओं का

प्रतिकार ।

फिर कौन

मात्र एक

दर्पण

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

या कि समय

एक क्षण,
क्षण सेकंड में 
सेकंड मिनट में 
मिनट घंटा में 
घंटा दिन में 
दिन सप्ताह में
सप्ताह महीना में 
महीना वर्ष में 
वर्ष दशक में 
दशक सदी में 
सदी शताब्दी में 
शताब्दी सहस्राब्दी में

सहस्राब्दी अनंत समय में 

और 

हर सेकंड में 
अनगिनत घटनाएँ

अनगिनत लोगों की

राज्यों की

राजाओं की

महाराजाओं की

सभ्यताओं की।

हर एक घटना
एक कहानी।

हर कहानी
एक जीवन।

हर जीवन
एक क्षण।

और उस क्षण में

मैं कौन।

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

लेकिन

देह बदलती है,

तो तन नहीं
मन बदलता है,

तो मन नहीं


भाव बदलते हैं,

तो भाव नहीं 
विचार बदलते हैं,

तो विचार नहीं 


स्मृतियाँ बदलती हैं,

तो स्मृति नहीं 


नाम बदलता है,

तो नाम नहीं 

तो फिर

जो बदलता है
वह मैं नहीं।

जो आता है
वह मैं नहीं।

जो जाता है
वह मैं नहीं।

जो जन्मता है
वह मैं नहीं।

जो मिटता है
वह मैं नहीं।

और जो यह सब
देखता है

वही?

श्वांस आती है।

श्वांस जाती है।

विचार आता है।

विचार जाता है।

खुशी आती है।

दुःख आता है।

प्रेम आता है।

क्रोध आता है।

बचपन आता है।

यौवन आता है।

वृद्धावस्था आती है।

समय आता नहीं—

बस बहता है।

कहानियाँ बनती हैं।

कहानियाँ मिटती हैं।

और—

मैं देखता हूँ।

सबको।

लगातार।

मौन।

अचल।

साक्षी।

कौन

मैं कौन।

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन

फिर

साक्षी भी एक नाम है।

तो नाम भी गया।

रूप गया।

सीमा गई।

दूरी गई।

स्थान गया।

समय गया।

कहानी गई।

“मेरा” गया।

“मैं” भी—

क्षण भर को
मौन हो गया।

और जब “मैं” भी
मौन हो गया—

तब क्या बचा?

न देह।

न मन।

न भाव।

न विचार।

न स्मृति।

न नाम।

न घर।

न गाँव।

न शहर।

न राज्य।

न देश।

न धरती।

न समय।

न क्षण।

न कहानी।

न सीमा।

न दूरी।

न बाहर।

न भीतर।

न आरंभ।

न अंत।

बस

मौन।

वो कौन

यक्ष प्रश्न

गूढ़ गहन

मै कौन


गहनतम मौन 

और

एक बोध।

बिना नाम का।

बिना रूप का।

बिना सीमा का।

कि

जो कुछ था,

जो कुछ है,

जो कुछ होगा—

उससे अलग
मैं कुछ नहीं।

और शायद—

यही खोज थी।

मिट्टी से चला था
“मैं” खोजने।

देह मिली।

मन मिला।

भाव मिले।

स्मृतियाँ मिलीं।

और अंत में
जहाँ पहुँचा—

वहीं से यात्रा शुरू हुई थी।

अपने भीतर।

मिट्टी हूँ मैं।

मिट्टी से आया हूँ।

समय में एक क्षण हूँ।

ब्रह्मांड में एक कण हूँ।

अनंत का एक अंश हूँ।

और वो पूर्ण अनंत भी

जो देखता है सबकुछ

जिसमें घटता है सब कुछ

जो परे है

क्या से

कहाँ से

जहां से

कब से

जब से

तब से

कौन से

मौन से

रूप से

रंग से

विचार से

आकार से

विकार से

नाम से 

अनाम से

पूर्णता से

अपूर्णता से

सीमा से

असीमा से

प्रकाश से

आकाश से

जो है

बस है

कुछ भी नहीं होते हुए भी

सब कुछ है

वो हूं मैं



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