रावण का श्राप
सीता की मृत्युपरांत
आज वाल्मीकि ऋषि का मन ज्ञान की उन अथाह गहराइयों में गोते नहीं लगा पा रहा था, जहाँ वे हमेशा डूबकर परम शांति प्राप्त कर लिया करते थे। सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में उन्होंने गंगा-स्नान किया, पवित्र जल से शरीर और मन दोनों को शुद्ध किया, फिर भी उनके हृदय में एक अजीब-सी बेचैनी थी। अभी-अभी वे उस पवित्र स्थल से लौटकर अपनी कुटी में पहुँचे थे, जहाँ कुछ दिन पहले माता सीता धरती माता की गोद में समा गई थीं। वहाँ अब केवल एक विशाल, गहरा गढ़ा ही शेष रह गया था—जैसे धरती स्वयं अपनी पुत्री के वियोग को सह न सकी हो और उसकी याद में एक चिरस्थायी चिह्न छोड़ गई हो।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपने दोनों पुत्रों—लव और कुश—को साथ लेकर अयोध्या लौट चुके थे। उनके साथ लौटा था पत्नी-वियोग का वह अथाह विषाद, जो उनके राजसी मुखमंडल पर भी छिप नहीं पा रहा था। अयोध्या का राजमहल अब शान्त था, पर वाल्मीकि की कुटी में तो जैसे मृत्यु का सन्नाटा छा गया था। कुछ दिन पहले तक यही कुटी लव-कुश की मधुर खिलखिलाहट, उनकी बाल-लीलाओं और रामायण के पाठ से गुंजायमान रहती थी। अब केवल दिल को दहला देने वाली, भयावह शांति थी। हवा भी जैसे रुक गई थी, पक्षी चुप थे, और वृक्षों की पत्तियाँ तक हिलने से कतराती थीं।
वाल्मीकि का मन स्वयं भी खिन्न था—जैसे कोई पुराना घाव फिर से हरा हो गया हो। उनकी इस खिन्नता को उनके प्रिय शिष्य ने और गहरा कर दिया। शिष्य ने नम्रता से, किंतु जिज्ञासा भरे स्वर में पूछा था—
सीता के साथ इतना अन्याय क्यों?
“गुरुदेव, क्या कोई स्त्री अपने पति से सीता माता जितना असीम, अटूट, निस्वार्थ प्रेम कर सकती है? रावण के कैद में रहते हुए भी वे हर पल श्रीराम की यादों में खोई रहीं। फिर भी प्रभु राम ने उनकी अग्नि-परीक्षा ली। और अग्नि-परीक्षा में खरा उतरने के बाद भी वह पर्याप्त नहीं पड़ा। मात्र एक धोबी के एक आक्षेप पर, गर्भावस्था में, उन्होंने उन्हें त्याग दिया। घने वनों में अकेली छोड़ दिया—किसी जंगली पशु का शिकार बनने के लिए। और अंत में... धरती माता में समा गईं। इस असीम प्रेम की ऐसी करुण परिणति क्यों? सीता माता की ऐसी दुर्गति क्यों हुई, गुरुदेव?”
प्रश्न सुनते ही वाल्मीकि का अंतःकरण जैसे हिल गया। उनका सम्पूर्ण शरीर काँप उठा। उत्तर वे जानते थे—गहराई तक जानते थे। पर क्या इस उत्तर को वाल्मीकि रामायण के पन्नों में अंकित करें या नहीं—यही उधेड़-बुन उनके मन में चल रही थी। उन्होंने आँखें मूँद लीं। धीरे-धीरे उनके मानस-पटल पर सारी घटनाएँ एक-एक कर जीवंत होकर उतरने लगीं। जैसे कोई पुराना चित्रपट खुल गया हो।
सीता स्वयंवर
सबसे पहले याद आया अयोध्या में आयोजित सीता का स्वयंवर। जनकपुरी का राजमहल उस दिन दिव्य आभा से चमक रहा था। सीता की सुंदरता की चर्चा चहुँदिशाओं में फैली हुई थी—दुग्ध-शुभ्र कांति, कमल-सी कोमलता, और आँखों में वह दिव्य तेज जो केवल देवियों में होता है। रावण पूरे आत्मविश्वास के साथ स्वयंवर में पहुँचा था। लंका का सम्राट, दशानन, दस सिरों वाला राक्षस-राजा—पर उस दिन वह केवल एक प्रेमी था। सीता को देखते ही उसकी दृष्टि जैसे जड़ हो गई। काला, विशालकाय शरीर और दुग्ध-रंग की नाजुक सीता—स्वर्ग और नरक का मिलन। रावण मन-ही-मन सोच रहा था—“भला इस धरा पर सीता के योग्य दूसरा कोई वर हो सकता है क्या? और स्वयंवर की शर्त तो मेरे आराध्य देव भगवान शिव का धनुष उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ानी है। शिव का धनुष मेरी राह में बाधा कैसे बन सकता है?”
वह विजय के नशे में सीता के सपनों में खोया बैठा था।
तभी अचानक द्वार पर हलचल हुई। विश्वामित्र मुनि के साथ राम और लक्ष्मण ने प्रवेश किया। वाल्मीकि ने अपने मानस में रावण के मन में उठते आशंका के काले बादलों को साफ देखा। राम ने शिव-धनुष तोड़ दिया। सीता ने माल्यार्पण कर दिया—और देखते-ही-देखते सीता राम की हो गई। रावण का हृदय जैसे टूट गया। वह हताश, निराश, अपमानित लंका लौट गया। पर सीता को खोने का मलाल उसके मस्तिष्क पर छाया रहा। दिन-रात वह सीता की यादों में खोया रहता। उसकी माता कैकसी ने पुत्र का यह वियोग देखा न सहा। उसने रावण का विवाह मंदोदरी नामक अत्यंत सुंदर, गुणवती कन्या से करा दिया। समय के साथ मेघनाद, अक्षयकुमार जैसे पुत्रों का जन्म हुआ। पर सीता की याद रावण के मन से कभी गई नहीं।
प्रेमी की हार
प्रेम में हारा हुआ रावण क्रूर से क्रूरतम होता गया। सारी पृथ्वी को जीतकर वह स्वयंवर में मिली हार को मिटाना चाहता था, पर नियति ने उसे कभी वह अवसर नहीं दिया।
जब भी वह मंदोदरी को अपनी भुजाओं में भरता, उसे सीता की कोमल देह की याद सताती। जब मंदोदरी के अधरों का चुम्बन लेता, तो बंद आँखों के सामने सीता का मुखड़ा आ जाता। पूरा विश्व भी उसके हृदय के उस खालीपन को नहीं भर सका। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था।
फिर मौका आया—सूर्यनखा का अपमान। जब लक्ष्मण ने रावण की बहन सूर्यनखा की नाक काट दी और वह रोती-बिलखती रावण के पास पहुँची, तो रावण को प्रतिशोध का बहाना मिल गया। मंदोदरी ने भी सीता-अपहरण का विरोध नहीं किया—क्योंकि वह जानती थी कि रावण का मन अभी भी सीता में अटका है। रावण जानता था कि राम बलशाली हैं। वह यह भी जानता था कि सीता अपने पति की चरण-शरण में समर्पित हैं। इसलिए वह धोखे से, माया से, मारीच का रूप धरकर सीता का अपहरण कर लाया। मामा मारीच के मरने का दुख उसे कम था, सीता को प्राप्त करने की खुशी अधिक थी।
अशोक वाटिका
लंका के स्वर्णमय महलों के बीच एक स्थान था—अशोक वृक्षों से भरा, शीतल छाया से ढका, पर भीतर से अत्यंत दुखमय। वही थी अशोक वाटिका, जहाँ जनकनंदिनी सीता को रखा गया था।
रावण के लिए वह वाटिका केवल एक कैदखाना नहीं थी। वह उसके मन की सबसे बड़ी बेचैनी का स्थान बन चुकी थी।
दिन बीतते थे, रातें गुजरती थीं—पर रावण का मन बार-बार उसी दिशा में खिंच जाता। कभी भोर के समय, जब आकाश में हल्की लालिमा फैलती और अशोक के पत्तों पर ओस की बूँदें चमकतीं, तो कभी संध्या के समय, जब लंका के महलों की दीवारों पर दीपों की पंक्तियाँ जल उठतीं—रावण अकेले ही अशोक वाटिका की ओर चला जाता।
उसके कदमों में सम्राट का गर्व था, पर मन में एक अनकही बेचैनी।
वह सीता के सामने खड़ा होता और अपने स्वर को जितना संभव हो उतना कोमल बनाकर कहता—
“देवि, तुम क्यों अपने आप को इस कष्ट में डाल रही हो? मैं लंका का स्वामी हूँ। मेरे चरणों में देवता तक काँपते हैं। तुम चाहो तो आज ही इस स्वर्णपुरी की महारानी बन सकती हो।
मैं तुम्हें ऐसा वैभव दूँगा, जो किसी स्त्री को कभी नहीं मिला।
सोचो—जब तुम मेरे साथ सिंहासन पर बैठोगी, तब देवता भी तुम्हारे चरणों में झुकेंगे। तुम्हारे एक संकेत पर समुद्र मार्ग बदल देगा, पर्वत सिर झुका देंगे।
और वह राम… वह तो केवल एक वनवासी हैं। उनके पास न सेना है, न राज्य, न संपत्ति। तुम क्यों एक ऐसे व्यक्ति के लिए अपने जीवन को नष्ट कर रही हो?”
उसके शब्दों में तर्क था, वैभव का आकर्षण था, और कहीं न कहीं अपने प्रेम का निवेदन भी।
पर हर बार उसे जो उत्तर मिलता, वह उसके हृदय को चीर देता।
सीता का अटल विश्वास
सीता का चेहरा शांत रहता, पर आँखों में आग होती।वह रावण की ओर देखतीं—जैसे किसी तुच्छ वस्तु की ओर देखा जाता है।“लंकेश,” वह कहतीं, “तुम्हारे शब्द सुनकर मुझे दया आती है।
तुम सम्राट हो, विद्वान हो, शिव के उपासक हो—पर तुम्हारे भीतर विवेक नहीं है। तुमने मुझे छल से हर लिया, और अब मुझे अपने वैभव का प्रलोभन दे रहे हो?
क्या तुम्हें लगता है कि जनक की पुत्री, रघुकुल की वधू, अपने पति को छोड़कर किसी और का वैभव स्वीकार कर लेगी?
तुम्हारे पास स्वर्ण है, सेना है, महल हैं—पर जो राम के पास है, वह तुम्हारे पास कभी नहीं हो सकता।”
जब भी वह राम का नाम लेतीं—राम—उनके स्वर में ऐसा विश्वास होता कि रावण के मन में जैसे किसी ने तेज़ तलवार घोंप दी हो।
वह क्रोध से काँप उठता।कभी-कभी वह धमकी देता—
“सीते! मेरी सहनशीलता को कमजोरी मत समझो। मैं तुम्हें समय दे रहा हूँ। यदि तुमने मेरी बात नहीं मानी, तो तुम्हें कठोर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।”
पर उस धमकी में भी एक अजीब-सी हताशा होती थी।सीता हँस देतीं।“रावण, तुम मुझे मार सकते हो। पर मुझे झुका नहीं सकते।”
और यह सुनकर रावण का चेहरा कठोर हो जाता, पर वह फिर भी मर्यादा की सीमा पार नहीं करता।
यहाँ वाल्मीकि के मन में बार-बार यह प्रश्न उठता था—रावण, जो देवताओं तक को चुनौती देता था, वह सीता के सामने इतना संयमित क्यों था?
रावण के मन का पुराना घाव
वाल्मीकि की दृष्टि उस घटना की ओर चली गई, जहाँ से यह कहानी वास्तव में शुरू हुई थी—मिथिला का स्वयंवर।
वहाँ जब शिव का महान धनुष रखा गया था, तब दुनिया भर के राजा वहाँ आए थे। उनमें रावण भी था।पर वह धनुष उठा नहीं पाया।फिर वहाँ एक युवक आया—साधारण वस्त्रों में, शांत चेहरे वाला।वह था राम।उसने सहजता से धनुष उठा लिया, और उसी क्षण वह टूट गया।मंडप में जयघोष गूँज उठा। सीता ने राम के गले में वरमाला डाल दी।उस दिन रावण के मन में जो घाव लगा था, वह कभी भरा नहीं।उसने उस क्षण महसूस किया था—कि कोई है, जो उससे श्रेष्ठ है।और वही भावना बाद में उसके जीवन का सबसे बड़ा जुनून बन गई।वह सीता को पाना चाहता था—सिर्फ इसलिए नहीं कि वह सुंदर थीं।वह यह सिद्ध करना चाहता था कि वह राम से हर तरह से श्रेष्ठ है।
हनुमान का आगमन और लंका का दरबार
वाल्मीकि के ध्यान में वह दृश्य धीरे-धीरे आकार लेने लगा—मानो समय की नदी उलटी बहने लगी हो और लंका का स्वर्णिम नगर फिर से जीवित हो उठा हो।
समुद्र के मध्य खड़ी वह नगरी, जिसके महलों की दीवारें सोने से चमकती थीं, जिनके स्तंभों पर रत्न जड़े थे, और जहाँ रात के समय भी दीपों की ऐसी पंक्तियाँ जलती थीं कि लगता था मानो आकाश के तारे पृथ्वी पर उतर आए हों।
उसी समय उस स्वर्णिम लंका के भीतर एक तूफान उठ चुका था।
वानरवीर हनुमान अशोक वाटिका में पहुँच चुके थे। उन्होंने सीता को राम का संदेश दिया, उनकी आँखों में आशा का दीप जलाया, और फिर लंका की सेना को चुनौती दी।
राक्षसों की टुकड़ियाँ एक-एक करके उनसे भिड़ती रहीं—और एक-एक करके धराशायी होती गईं।
रावण के पुत्र अक्षय कुमार की हनुमान द्वारा वध
अंततः युद्ध में रावण का युवा पुत्र अक्षयकुमार भी आया।
युवक था, पर वीर था। उसके रथ की गति बिजली की तरह तेज थी, और उसके तीर आकाश में आग की लकीरों की तरह दौड़ते थे।परंतु हनुमान के सामने वह अधिक देर टिक न सका।एक भयंकर प्रहार हुआ—और लंका का राजकुमार धरती पर गिर पड़ा।उसकी मृत्यु का समाचार जब महल तक पहुँचा, तो मानो स्वर्ण नगरी की दीवारें हिल उठीं।राजमहल के गलियारों में भय और क्रोध की लहर दौड़ गई।राक्षस सैनिक भागते हुए दरबार की ओर पहुँचे।
“महाराज! अशोक वाटिका नष्ट हो चुकी है… असंख्य राक्षस मारे गए… और राजकुमार अक्षयकुमार…!”
वाक्य पूरा होने से पहले ही दरबार में सन्नाटा छा गया।सिंहासन पर बैठा रावण धीरे-धीरे उठ खड़ा हुआ।उसकी दसों आँखों में अग्नि जल उठी।वह केवल एक सम्राट नहीं था—वह एक पिता भी था।और उसके प्रिय पुत्र का रक्त अभी-अभी धरती पर गिरा था।क्षण भर को ऐसा लगा कि उसका क्रोध पूरी लंका को भस्म कर देगा।पर उसी समय एक और घटना घट चुकी थी।रावण का सबसे शक्तिशाली पुत्र—मेघनाद—युद्धभूमि में पहुँचा था।मेघनाद, जिसे देवताओं ने इंद्रजीत कहा था।उसने दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया। ब्रह्मास्त्र की शक्ति से हनुमान को बाँध लिया।वानरवीर ने स्वयं को बंदी होने दिया—क्योंकि वह जानता था कि उसका उद्देश्य केवल युद्ध नहीं, संदेश देना है।और इस प्रकार कुछ ही देर बाद लंका के भव्य दरबार के द्वार खुले।मेघनाद भीतर आया।उसके पीछे बंधा हुआ था वह वानर—जो पूरी लंका को चुनौती दे चुका था।दरबार में बैठे राक्षस सरदारों ने पहली बार उस वानर को देखा।परंतु जिस चीज़ ने उन्हें सबसे अधिक चौंकाया, वह था उसका चेहरा।
न उसमें भय था।
न पश्चाताप।
न ही विनम्रता।
वह ऐसे खड़ा था मानो बंदी नहीं, बल्कि दूत हो।उसकी दृष्टि सीधे रावण की ओर उठी हुई थी।रावण सिंहासन पर बैठा था—स्वर्ण सिंहासन, जिसके पीछे विशाल नागों की आकृतियाँ उकेरी गई थीं।उसका चेहरा क्रोध से लाल था।उसके मन में तूफान चल रहा था।उसका पुत्र मारा गया था।उसकी वाटिका उजाड़ दी गई थी।उसकी सेना का अपमान हुआ था।सामान्यतः ऐसा रावण तुरंत आदेश देता—“इस वानर का वध कर दो!”
उसका इतिहास यही कहता था।वह वही रावण था जिसने देवताओं को परास्त किया था, जिसने इंद्र को हराया था, जिसने यम, वरुण और कुबेर तक को चुनौती दी थी।वह किसी से सलाह नहीं लेता था।सीता का अपहरण करते समय भी उसने किसी मंत्री की राय नहीं ली थी।उसने केवल अपने अहंकार की सुनी थी।परंतु उस दिन दरबार में कुछ अलग हुआ।रावण ने हनुमान को कुछ क्षण तक ध्यान से देखा।उसकी आँखों में एक विचित्र जिज्ञासा थी।यह वानर कौन है?यह इतनी निर्भीकता कहाँ से लाया है?यह जानता है कि वह लंका के सम्राट के सामने खड़ा है—फिर भी इसमें भय क्यों नहीं?और तभी हनुमान ने स्वयं ही उत्तर दे दिया।उसने निर्भीक स्वर में कहा—“मैं अयोध्या के राजा राम का दूत हूँ।”दरबार में हलचल मच गई।राम।वही नाम, जो पिछले कुछ समय से रावण के जीवन में बार-बार आ रहा था।वही राम, जिसकी पत्नी सीता अब लंका में थीं।वही राम, जिसे दुनिया मर्यादा पुरुषोत्तम कहती थी।वही राम, जिसकी चर्चा सीता दिन-रात करती थीं।रावण के भीतर कुछ काँप गया।वह जानता था कि यह युद्ध केवल शस्त्रों का नहीं है।
यह दो आदर्शों का युद्ध है।एक ओर था राम का धर्म, संयम, मर्यादा।और दूसरी ओर था रावण का बल, वैभव, और अहंकार।सीता का हृदय राम के साथ था।और रावण… वह उस हृदय को जीतना चाहता था।
पर कैसे?
बल से?
कैद से?
धमकी से?
पुत्र अक्षय कुमार के हत्यारे हनुमान की सजा के लिए दरबार में सलाह विमर्श क्यों?
इन सबका परिणाम वह देख चुका था।सीता की आँखों में उसके लिए केवल तिरस्कार था।तभी उसके मन में एक नई योजना जन्म लेने लगी।यदि राम मर्यादा के प्रतीक हैं…तो क्या मैं मर्यादा में उनसे मुकाबला नहीं कर सकता?यदि राम धर्म के मार्ग पर चलते हैं…तो क्या मैं भी उसी मार्ग पर चलकर सीता को यह नहीं दिखा सकता कि मैं भी उतना ही महान हूँ?यह विचार रावण के भीतर पहली बार स्पष्ट रूप से उठा।और इसी कारण उस दिन उसने वह किया जो उसके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत था।उसने अपने मंत्रियों की ओर देखा।उसकी आवाज़ भारी थी, पर संयमित।“बताओ… इस वानर को क्या दंड दिया जाए?”
दरबार में सन्नाटा छा गया।मंत्री एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।यह वही रावण था जो अपने निर्णय स्वयं लेता था।जो अपने क्रोध में तुरंत आदेश देता था।फिर आज वह परामर्श क्यों माँग रहा है?क्योंकि अब उसके जीवन में सीता थीं।अब उसका हर निर्णय केवल राजनीति नहीं था—प्रेम से भी जुड़ा हुआ था।वह जानता था कि सीता सब सुनेंगी।लंका में होने वाली हर घटना अंततः अशोक वाटिका तक पहुँचती थी।यदि वह एक दूत की हत्या कर देगा…तो सीता उसे कभी क्षमा नहीं करेंगी।क्योंकि राम की मर्यादा कहती है—दूत का वध नहीं किया जाता।और यदि वह राम से प्रतिस्पर्धा करना चाहता है…तो उसे राम की मर्यादा से भी आगे जाना होगा।रावण अब केवल युद्ध नहीं लड़ रहा था।वह एक अदृश्य प्रतियोगिता में उतर चुका था।
राम से।
धर्म से।
मर्यादा से।
और उस दिन लंका के दरबार में बैठे सभी लोग यह समझ नहीं पा रहे थे—कि यह वही रावण है…या उसके भीतर कोई नया रावण जन्म ले रहा है।एक ऐसा रावण जो पहली बार अपने अहंकार से नहीं—बल्कि राम की छाया से प्रभावित होकर निर्णय लेने जा रहा था।
विभीषण की सलाह
दरबार में रावण का छोटा भाई विभीषण भी बैठा था।उसने शांत स्वर में कहा—“महाराज, दूत का वध नीति के विरुद्ध है। यह वानर चाहे शत्रु का दूत हो, पर इसे मारना उचित नहीं होगा।”
रावण ने कुछ क्षण सोचा।फिर बोला—“ठीक है। इसका वध नहीं होगा। इसकी पूँछ में आग लगा दो, ताकि यह वापस जाकर अपने स्वामी को हमारी शक्ति का संदेश दे सके।”
लंका की अग्नि
पर जो हुआ, वह रावण की कल्पना से भी परे था।हनुमान की पूँछ में आग लगाई गई—पर वही आग लंका की विनाशक ज्वाला बन गई।कुछ ही क्षणों में स्वर्णपुरी लंका धधक उठी।महल, बाज़ार, उद्यान—सब आग की लपटों में घिर गए।स्वर्ण से चमकने वाली लंका उस रात लाल आग के समुद्र में बदल गई।
रावण की विचित्र मुस्कान
कुछ समय बाद रावण के नाना माली घबराते हुए दरबार में आए।उन्होंने कहा—“महाराज! वह वानर पूरी लंका जला गया। चारों ओर आग लगी है… महल, अट्टालिकाएँ, भवन—सब जल रहे हैं।”
रावण का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा।पर अगले ही क्षण माली ने कहा—“पर आश्चर्य की बात यह है कि विभीषण की कुटिया और अशोक वाटिका सुरक्षित हैं।”
कुछ पल के लिए रावण चुप रहा।फिर उसके चेहरे पर धीरे-धीरे एक हल्की मुस्कान फैल गई।क्योंकि उस एक क्षण में उसे केवल एक बात याद आई—अशोक वाटिका सुरक्षित है।और वहाँ…उसकी सीता सुरक्षित हैं।
युद्ध में एक-एक करके उसने अपना अनुज कुम्भकर्ण, पुत्र मेघनाद खो दिया। फिर भी उसने सीता की हत्या नहीं की। उसके हृदय में छिपा प्रेमी, एक पिता और भाई से भारी पड़ गया।
ऋषि वाल्मीकि के अंतर्मन में उस समय जो दृश्य उठ रहा था, वह केवल युद्ध का दृश्य नहीं था—वह मानो मानव-हृदय के दो चरमों का संघर्ष था।
एक ओर थे राम —धर्म, मर्यादा, त्याग और करुणा के मूर्त रूप।दूसरी ओर थे रावण —असीम विद्वता, अपार शक्ति, और एक ऐसे प्रेम से भरे हुए, जो पाने की जिद में सब कुछ भस्म कर देने को तैयार था।
और इन दोनों के मध्य थीं सीता —पवित्रता की प्रतिमा, नारी की गरिमा का शिखर, और उस प्रेम की धुरी जिसके इर्द-गिर्द पूरी कथा घूम रही थी।
युद्ध का अंतिम क्षण
लंका की भूमि उस समय रक्त से भीगी हुई थी।आकाश में सूर्य अस्त होने को झुक रहा था, पर उसका प्रकाश मानो ठहर गया था—जैसे प्रकृति स्वयं उस अंतिम क्षण की साक्षी बनना चाहती हो।
रथ टूट चुके थे।ध्वज झुलस चुके थे।राक्षस और वानर सेना के योद्धा थककर भूमि पर पड़े थे।
युद्धभूमि के बीचोंबीच दो महान योद्धा खड़े थे—श्रीराम और रावण।
रावण का शरीर घायल था। उसके दसों मुखों से रक्त बह रहा था, पर उसकी आँखों में अब भी वही अग्नि थी—अहंकार की, और कहीं बहुत भीतर दबे हुए प्रेम की।
श्रीराम के हाथ में धनुष था।उनके नेत्रों में क्रोध नहीं था—केवल धर्म का संकल्प था।तभी उन्होंने वह अमोघ बाण उठाया, जो ब्रह्मास्त्र की शक्ति से युक्त था।
क्षण भर के लिए समय रुक गया।राम ने मन ही मन प्रणाम किया—अपने गुरुजनों को, अपने पिता को, और उस धर्म को जिसके लिए यह युद्ध लड़ा जा रहा था।फिर धनुष की प्रत्यंचा खिंची।एक तीव्र ध्वनि हुई—
ट्वांग!
बाण बिजली की तरह आकाश को चीरता हुआ निकला और सीधे रावण के मर्मस्थल में जा धँसा।क्षण भर के लिए रावण का विशाल शरीर स्थिर हो गया।फिर वह धीरे-धीरे डगमगाया।धरती कांप उठी।और वह महान योद्धा, जिसने देवताओं को भी कंपा दिया था—लंका का स्वामी, त्रिलोक विजेता—भूमि पर गिर पड़ा।
मृत्यु के निकट रावण
रावण की श्वास भारी हो चुकी थी।उसके दसों मुखों से निकलती साँसें मानो अलग-अलग दिशाओं में बिखर रही थीं।पर उसकी आँखें अब भी तेजस्वी थीं।युद्धभूमि में एक अजीब-सी निस्तब्धता छा गई।तभी श्रीराम ने धीरे से लक्ष्मण की ओर देखा।
“भ्रातृ,” उन्होंने शांत स्वर में कहा,“यह रावण केवल एक शत्रु नहीं है। यह महान विद्वान भी है। इसके पास अपार ज्ञान है। मृत्यु के निकट मनुष्य सबसे सत्य ज्ञान देता है। जाओ—इससे कुछ सीख लो।”
लक्ष्मण पहले चकित हुए।जिस राक्षस ने इतना अनर्थ किया, उससे ज्ञान लेना?पर राम की आज्ञा थी।लक्ष्मण रावण के सिर के पास जाकर खड़े हो गए और बोले—“राक्षसराज, यदि तुम्हारे पास कोई अंतिम ज्ञान हो, तो मुझे बताओ।”
रावण ने अपनी आँखें धीरे से खोलीं।उसने लक्ष्मण की ओर देखा—और फिर हल्की-सी मुस्कान उसके होंठों पर आ गई।
“लक्ष्मण,” उसने टूटी हुई आवाज में कहा,“ज्ञान लेने आए हो… पर ज्ञान लेने की भी मर्यादा होती है। गुरु के पास सिर के पास नहीं, चरणों के पास खड़े होकर ज्ञान लिया जाता है।”
लक्ष्मण चुप हो गए।
उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ।वे तुरंत जाकर रावण के चरणों के पास खड़े हो गए।
तब रावण बोला—“जीवन का एक बड़ा रहस्य सुनो—अच्छे कार्यों को करने में कभी विलंब मत करो।और बुरे कार्यों को करने में जितना संभव हो, उतना विलंब करो।”
उसकी आवाज धीमी होती जा रही थी। वह स्वयं में बुदबुदा रहा था -“मैंने सोचा था कि मैं सीता को जीत लूँगा…मैंने सोचा था कि मैं राम को परास्त कर दूँगा…पर मैं एक बात भूल गया—धर्म के सामने शक्ति भी हार जाती है।”उसने गहरी साँस ली।
पर प्रेम अभी जीवित था।
रावण का श्राप
परंतु उस क्षण भी, जब रावण का शरीर मृत्यु के निकट था—उसका अहंकार और उसका प्रेम अभी जीवित था।उसकी आँखों में अचानक एक अजीब-सी चमक आ गई।जैसे उसके हृदय के सबसे गहरे कोने से कोई पीड़ा उठी हो।वह दर्द युद्ध का नहीं था।वह दर्द प्रेम का था।वाल्मीकि की ध्यानावस्था में वह क्षण मानो स्पष्ट सुनाई दे रहा था—रावण की अंतिम आह।
रावण की दृष्टि कहीं दूर चली गई—जैसे वह अशोक वाटिका को देख रहा हो।जैसे उसके सामने सीता खड़ी हों।उसके होंठ काँपे।और उसके हृदय से एक करुण स्वर निकला—“सीता…तू मेरी नहीं हो सकी…”उसकी साँस और धीमी हो गई।फिर उसके शब्द मानो श्राप बनकर निकले—“तो तू राम की भी नहीं होगी…”उसके बाद उसकी गर्दन ढीली पड़ गई।लंका का सम्राट शांत हो गया।
श्राप का परिणाम
वाल्मीकि की चेतना में समय आगे बढ़ गई ।उन्होंने देखा—वर्षों बाद, अयोध्या में, राजसभा में।लोगों के मन में संदेह उठ रहा था।सीता की पवित्रता पर प्रश्नचिह्न लग रहे थे।और तब मर्यादा के प्रतीक राम ने, अपने ही हृदय को चीरते हुए, सीता को वन में भेज दिया।वह दृश्य इतना पीड़ादायक था कि स्वयं धरती भी कांप उठी थी।
फिर एक और दृश्य उभरा—ऋषि वाल्मीकि का आश्रम।सीता वहाँ अपने पुत्रों—लव और कुश—को जन्म देती हैं।वर्षों बाद जब सब सत्य सामने आता है, और राम उन्हें वापस अयोध्या ले जाना चाहते हैं—तब सीता धरती माता से प्रार्थना करती हैं।धरती फटती है।और सीता उसमें समा जाती हैं।राम की होकर भी…राम को न मिल सकीं।वाल्मीकि की चेतना में उस समय एक भयानक प्रश्न गूँज उठा—क्या यह रावण का श्राप था?
वाल्मीकि का द्वंद्व
ऋषि वाल्मीकि उस समय अपने आश्रम में शांत मुद्रा में बैठे थे। आश्रम के चारों ओर वन की गहन निस्तब्धता पसरी हुई थी। दूर कहीं सरयू की धारा की मद्धिम ध्वनि सुनाई दे रही थी, और हवा में शाल और साल के वृक्षों की पत्तियाँ हल्की-हल्की सरसराहट कर रही थीं। उनके सामने ताड़पत्रों का एक बड़ा ढेर रखा था, जिन पर वे एक महान कथा को आकार दे रहे थे—मानव इतिहास की सबसे गहरी और जटिल कथा—रामकथा।
उनकी लेखनी चल रही थी। शब्द एक के बाद एक उतरते जा रहे थे।
राम।
सीता।
वनवास।
धर्म।
मर्यादा।
पर अचानक उनकी लेखनी रुक गई।
उनकी उँगलियाँ कांपने लगीं। उनकी दृष्टि ताड़पत्रों पर टिक गई, पर मन कहीं और चला गया। उनकी आँखों से धीरे-धीरे आँसू बहने लगे।
क्योंकि उनके सामने केवल एक कथा नहीं थी—एक द्वंद्व था।
एक ओर थे राम—धर्म के आदर्श, मर्यादा के प्रतिमान, वह पुरुष जिनकी छवि आने वाली सदियों के लिए मनुष्य के आदर्श का रूप बनने वाली थी।
और दूसरी ओर था रावण—जिसे इतिहास ने राक्षस कहा, अहंकार और अधर्म का प्रतीक कहा।
पर वाल्मीकि के भीतर का कवि जानता था कि सत्य हमेशा इतना सरल नहीं होता।क्योंकि रावण केवल राक्षस नहीं था।वह एक विद्वान था। एक महायोगी था। एक महाशक्तिशाली सम्राट था। और उसके भीतर भी एक भावना थी—एक प्रेम।पर वह प्रेम वैसा नहीं था जैसा राम का था।रावण का प्रेम अधीर था।वह प्रेम पाना चाहता था।वह प्रेम स्वामित्व चाहता था।
उसका मन कहता था—“यदि तू मेरी नहीं, तो किसी की नहीं।”
वह प्रेम ज्वाला की तरह था—प्रचंड, तीखा, और स्वयं को भी भस्म कर देने वाला।
और दूसरी ओर राम का प्रेम था।राम का प्रेम शांत नदी की तरह था—गहरा, संयमित, और आत्मसंयम से भरा हुआ।राम का प्रेम कहता था—“यदि मेरे कारण तुम्हारी मर्यादा पर आंच आती है, तो मैं तुम्हें भी छोड़ दूँगा।”वह प्रेम पाने से अधिक त्याग करना जानता था।
वाल्मीकि का मन कांप उठा।
उनके सामने प्रश्न था—क्या इस कथा में रावण के उस श्राप का उल्लेख होना चाहिए?यदि वे उसे लिख देंगे, तो लोग कहेंगे कि राम और सीता का वियोग किसी उच्च धर्म का परिणाम नहीं था—वह तो रावण के श्राप की छाया थी।
लोग यह भी कह सकते थे कि रावण अपनी हार के बाद भी एक प्रकार से जीत गया था।और यदि वे उसे न लिखें—तो क्या वे सत्य को छिपा देंगे?
क्या एक ऋषि, एक कवि, एक इतिहासकार को ऐसा करना चाहिए?उनका हृदय भारी हो गया।उनकी लेखनी ताड़पत्र पर स्थिर रह गई।
समाधि और निर्णय
धीरे-धीरे वाल्मीकि ने अपनी आँखें बंद कर लीं।उन्होंने अपने भीतर उतरना शुरू किया।उनकी श्वास धीमी हो गई।मन की लहरें शांत होने लगीं।विचार धीरे-धीरे विलीन होने लगे।समय बीतता गया।घंटे बीत गए।
वन में सूर्य पश्चिम की ओर झुक गया। आकाश के रंग बदलने लगे। पर वाल्मीकि उसी ध्यान में डूबे रहे।
और फिर—समाधि की गहराई में—उनके सामने एक दृश्य प्रकट हुआ।उन्होंने देखा कि इस संसार में प्रेम एक ही नहीं होता।प्रेम के भी स्तर होते हैं।एक प्रेम वह है जो स्वामित्व चाहता है।वह प्रेम अपने प्रिय को बाँधना चाहता है। उसे अपना बनाकर रखना चाहता है।
और एक प्रेम वह है जो मुक्ति देता है।वह प्रेम कहता है—“तुम स्वतंत्र हो। तुम्हारी मर्यादा मेरी इच्छा से बड़ी है।”उस क्षण उन्हें समझ आया—रावण का प्रेम अधूरा था।क्योंकि उसमें आग्रह था।उसमें अधिकार की आकांक्षा थी।पर राम और सीता का प्रेम पूर्ण था।क्योंकि उसमें त्याग था।उसमें मर्यादा थी।उसमें आत्मा की पवित्रता थी।
जब वाल्मीकि की समाधि टूटी, तो उनका मुखमंडल एक दिव्य शांति से चमक रहा था।उनका संशय समाप्त हो चुका था।उन्होंने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।उनकी दृष्टि फिर ताड़पत्रों पर गई।उन्होंने अपनी लेखनी उठाई।
और मन ही मन कहा—
“इतिहास केवल घटनाओं का वर्णन नहीं है। इतिहास वह भी है जो मानवता को दिशा देता है।”
“रावण का श्राप इतिहास का सत्य हो सकता है।पर राम और सीता का प्रेम—मानवता का सत्य है।”और उन्होंने निश्चय किया—रामायण में रावण के उस श्राप का कोई उल्लेख नहीं होगा।
एक श्राप को छुपाने के लिए दूसरे श्राप की रचना
फिर वाल्मीकि की लेखनी चलने लगी।पर अब शब्द केवल घटनाओं को नहीं लिख रहे थे—वे एक नई संरचना गढ़ रहे थे।
उन्होंने एक नई कथा रची।रंभा के श्राप की कथा।
उन्होंने लिखा कि एक समय रावण ने अपने छोटे भाई कुबेर की पत्नी रंभा के साथ दुर्व्यवहार किया। यह देखकर क्रोधित कुबेर ने उसे श्राप दिया—
“यदि तुम किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध छूने का प्रयास करोगे, तो तुम्हारा शरीर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा।”
और फिर वाल्मीकि ने लिखा—अशोक वाटिका में रावण ने इसी श्राप के कारण सीता को स्पर्श नहीं किया।
इस प्रकार एक कथा ने दूसरी कथा को ढक लिया।
और धीरे-धीरे रावण का वह मौन प्रेम—जो शायद किसी मर्यादा के कारण स्वयं को रोकता रहा—कथा के भीतर छिप गया।
क्योंकि रावण केवल सीता को पाना नहीं चाहता था।वह उसके हृदय को जीतना चाहता था।वह चाहता था कि सीता स्वयं उसकी ओर देखे।इसीलिए उसने उसे बंदी बनाने के बाद भी कभी स्पर्श नहीं किया।
पर यह बात कथा के भीतर धीरे-धीरे धुँधली हो गई।
और ताड़पत्रों पर शब्द उतरते गए—
राम।
सीता।
त्याग।
धर्म।
प्रेम।
और उसी क्षण हवा में रावण का श्राप धीरे-धीरे विलीन हो गया—जैसे कोई छाया सूर्य के प्रकाश में खो जाती है।
पर राम और सीता का प्रेम—अमर हो गया।वह शाश्वत हो गया।और सदियों तक मानवता के हृदय में प्रकाश बनकर जलता रहा।
सच्चाई ओझल हो गई, पर विलीन नहीं
किन्तु वाल्मीकि की लेखनी से सत्य पूरी तरह छिप नहीं सका।क्योंकि कथा के भीतर एक सूक्ष्म प्रश्न अब भी जीवित था।
यदि रंभा का श्राप सच था—तो रावण सीता का अपहरण उसकी इच्छा के विरुद्ध कैसे कर सका? यदि रावण सीता को प्रेम नहीं कर रहा था तो अपने पुत्र मेघनाद ,भाई कुम्भकरण और सगे संबंधियों की मृत्यु के बाद भी सीता का वध क्यों नहीं किया ?
यह प्रश्न कथा के भीतर एक मौन छाया की तरह रह गया।
शायद यह वाल्मीकि की भूल थी।और शायद यह जानबूझकर की गई भूल थी।
क्योंकि कभी-कभी एक महान कवि सत्य को पूरी तरह छिपाता नहीं—वह उसे इतना ही ढकता है कि जो सच को खोजने की दृष्टि रखते हैं, वे उसे फिर भी देख सकें।
इस प्रकार रावण का अधूरा प्रेम और उसका श्राप कथा की सतह से ओझल तो हो गया—पर पूरी तरह विलीन नहीं हुआ।
वह इतिहास की गहराइयों में कहीं छिपा रहा।
और शायद इसी कारण रामायण केवल एक कथा नहीं बनी—
वह एक प्रश्न भी बन गई।
एक ऐसा प्रश्न, जिसका उत्तर हर युग को अपने भीतर खोजने की आवश्यकता है।