कवि के मन में उन पुरुषार्थी व्यक्तियों के प्रति
असीम श्रद्धा है जो आजीवन सत्यानुसंधान
में प्रयासरत रहते हैं। ऐसे व्यक्ति , जिनकी
संगति से सुवास प्रतिफलित होता है । ऐसे व्यक्ति जो दुनिया के तमाम झंझावातों को
झेलकर अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहते हैं । इस तरह के व्यक्तियों से कवि की
आत्मा प्रेरित होती है । कवि के लिए ऐसे
तपस्वी जन श्रद्धेय हैं । इस कविता के द्वारा , कवि
अपनी श्रद्धा सुमन इन तपस्वियों, ईश पथगामियों के चरण को
समर्पित करता है ।
सत तप का आचार बढा कर,
मन संचित
विकार घटा कर,
ज्ञान
लाभ जन सत्वर करते ,
शोध परम रत
तत्तपर रहते।
नाम न लेते क्रोध काम का ,
वासी है
जो साक्षी ग्राम
का ,
जग जाए
चित्त अहं भाव ना ,
चित्तवन में बस यही कामना।
ध्यान योग की जली ज्योत है ,
चिरानंद
की विपुल श्रोत हैं ,
फलते
शुभ भावों के माला
,
ईशानंद के पीकर प्याला।
क्षमा दया करुणा हित गामी ,
शक्ति पुंज अतुलित हैं ज्ञानी,
करते
नित जो नए उपाए,
परहित हीं जिन जन को भाए।
कर्म करे फल जलते जिनके,
संचित ना जिनके हो तिनके ,
सत्य
शोध के नित
अनुरागी ,
बिना
बैर रहते वैरागी।
ज्ञान दीप ले हर घर घर पर,
जग से घन तम को हर हर कर,
दुःख पीड़ा इस जग के सह कर,
जाने जग माया में बह कर।
माया सत का व्यव्हार नहीं है ,
जग का किंचित सार नहीं है ,
पग
पग में निस्सार
महीं है,
ईश्वर
का विस्तार नहीं
है।
इनके डग डग जग में यूँ रहते,
जग का हो जग
के ना होते,
जैसे जल के ऊपर तल पर ,
पंक तल से निकल निकल कर।
कमल निखर कर जो सुख देता,
वैसे हीं
जिनका मुख होता,
मुख से जिनके
विणा बहती ,
ज्ञान सुधा जग मग जग करती।
जो सच का बस मंथन
करते ,
जो
नश्वर जग से ईश्वर वरते,
उनके
पग कविता धरता
हूँ ,
उनके हित
कविता रचता हूँ ।