Thursday, November 5, 2026

बदल रहा संसार निरंतर

बदल रहा संसार निरंतर,
मैं अबदला रहा अनंतर।
माता गर्भाशय अभ्यन्तर,
भ्रूण स्थापित रहा निरंतर।

अंधकार के उस आवरण में,
मौन पड़ा था मैं जीवन में।
नयन नहीं थे, दृष्टि समाहित,
श्वास नहीं थी, चेतन स्थापित।

झूले में मैं ही खिलता था,
कदम बढ़ाते गिर पड़ता था।
माँ की उँगली थामे चलता,
पिता के कंधों पर था पलता।

मुझमें ही थी हँसी ठिठोली,
बाल्यकाल के वो हमजोली।
माटी के घर, कागज की नावें,
कितनी प्यारी थीं वो यादें।

गुड़िया, कंचे, खेल निराले,
मित्रों संग दिन बीतने वाले।
कल तक जो संसार हमारा,
आज नहीं है कहीं दुबारा।

मैं ही तो था तरुणाई में,
यौवन की उस अंगड़ाई में।
नव उमंग की लहरें उठतीं,
आँखों में संभावनाएँ बसतीं।

दिवास्वप्न मन को आते थे,
उड़नखटोले तन को भाते थे।
आकाशों को छूने की चाहत,
नित नवीन कुछ करने की राहत।

प्रेम, प्रणय, अनुराग के क्षण,
मन में उठते कितने स्पंदन।
कभी विरह की पीड़ा सहता,
कभी मिलन के सपने गढ़ता।

प्रौढ़ उम्र में तन के ताने,
जीवन के उत्तरदायित्व पुराने।
सपनों का संसार सँभाला,
अपनेपन का दीप जला डाला।

कर्मक्षेत्र में दिन ढलते थे,
कर्तव्यों के पथ चलते थे।
अपनों की मुस्कान के खातिर,
भूल गया निज सुख का सागर।

संतति के सपनों में जीता,
उनकी खुशियों में मन रीता।
कल तक जो उँगली थामे थे,
आज वही संबल बन जाते।

बुढ़ापे में शक्ल ठिकाने,
तन पर उम्र लिखे अफसाने।
केश हुए श्वेत, त्वचा सिकुड़ी,
चाल हुई कुछ धीमी-सी मुड़ी।

दाँत गिरे, दृष्टि भी धुँधली,
स्मृतियों की गठरी है खुलती।
कभी अतीत पुकारे आकर,
कभी समय ले जाए बहाकर।

बचपन से पचपन तक अबतक,
बदल रहा तन मेरा अबतक।
कल जो था, वह आज नहीं है,
आज का कल में राज नहीं है।

भ्रूण, वृद्ध मन का सपना है,
रूप-रंग तन का गहना है।
शैशव, यौवन, प्रौढ़ अवस्था,
कालचक्र की सहज व्यवस्था।

बचपन बीता, यौवन बीता,
जीवन का हर सावन बीता।
ऋतुएँ बदलीं, वर्ष बदलते,
तन के सारे रूप बदलते।

मैंने देखा तन को बदलते,
अपने ही आकार में ढलते।
कल का चेहरा आज नहीं है,
पर मैं बदला, यह बात नहीं है।

ये तन-मन ही मात्र नहीं हूँ,
बदल रहा जो गात्र नहीं हूँ।
नाम, रूप, पहचान परे मैं,
सुख-दुःख के व्यवधान परे मैं।

मन में चिंतन आता-जाता,
स्वप्न नया आकार बनाता।
बुद्धि बदलती, मत बदलता,
समय के संग जग बदलता।

साक्षी बन सब देख रहा हूँ,
अपने भीतर लेख रहा हूँ।
हँसते-रोते जीवन भर में,
अचल रहा हूँ परिवर्तन में।

तन की सीमा, मन की माया,
इनसे मेरा नहीं सरोकार।
जन्म-मरण के इस पथ पर भी,
मैं हूँ इन सबसे निराकार।

न मैं शैशव, न तरुणाई,
न वृद्धावस्था की परछाई।
न मैं देह, न देह का बंधन,
न मैं मन का क्षणिक स्पंदन।

नित्य, निरंतर, चिर-अविकारी,
चेतन सत्ता सबसे न्यारी।
न आदि मेरा, न अंत कहीं है,
परिवर्तन का मुझमें भय नहीं है।

तन मिट्टी में मिल जाएगा,
मन भी मौन हो जाएगा।
नाम, रूप, संबंध सभी कुछ,
कालचक्र में खो जाएगा।

फिर भी जो सब देख रहा है,
जो हर पल को लेख रहा है।
उसका कोई क्षय नहीं है,
उसका कोई लय नहीं है।

तन-मन के इस पार कहीं पर,
मौन खड़ा हूँ साक्षी बनकर।
बदल रहा संसार निरंतर,
मैं अबदला रहा अनंतर।

ऐसे नरपशु आप के जैसी

 साँप की हँसी होती कैसी,

शोक मुदित पिशाच के जैसी।

जब देश पे दाग लगा हो,

रक्त पिपासु काग लगा हो।


जब अपने हीं भाग रहे हो,

नर अंतर यम जाग रहे हो।

नारी के तन करते टुकड़े,

बच्चे भय से रहते अकड़े।


जब अपने घर छोड़ के भागे,

बंजारे बन फिरे अभागे।

और इनकी बात चली तब,

बंजारों की बात चली जब।


तब कोई जो हँस सकता हो,

विषदंतों से डंस सकता हो।

जिनके उर में दया नहीं हो,

ममता करुणा हया नहीं हो।


जो नफरत की समझे भाषा,

पीड़ा में वोटों की आशा।

चंड प्रचंड अभिशाप के जैसी,

ऐसे नरपशु आप के जैसी।

अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई

पंथों में ना सख़्त हूँ भाई,
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।
अपनी राह स्वयं चुनता हूँ,
अपने मन की बात सुनता हूँ।
किसी लकीर का दास नहीं हूँ,
किसी सोच का उपहास नहीं हूँ।
प्रश्नों से मेरा नाता गहरा,
तर्कों से ही जीवन है मेरा।
जो सच लगे उसे अपनाऊँ,
जो झूठ लगे उसे ठुकराऊँ।
अपनी बुद्धि का अभ्यस्त हूँ भाई,
नहीं किसी पंथ का भक्त हूँ भाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।

मैं करता हूँ खुद की पूजा,
मेरा ईश्वर मैं ना दूजा।
अपने भीतर दीप जलाता,
खुद से खुद का मार्ग बनाता।
जन्म से खुद को हिन्दू पाऊँ,
पड़े ज़रूरत सिख बन जाऊँ।
कभी ज़रूरत मुस्लिम हो लूँ,
कभी बौद्ध, ईसाई हो लूँ।
कर्म जहाँ जिस रूप में माँगे,
वैसा ही व्यवहार निभाऊँ।
मानवता का धर्म निभाऊँ,
प्रेम के बीज जहाँ उगाऊँ।
मजहब की दीवारों से परे,
सबके दुख में साथ निभाऊँ।
किसी एक रंग का अभ्यस्त नहीं हूँ ,
किसी एक रूप में व्यक्त नहीं हूँ।
इसलिए अनासक्त हूँ भाई,
नहीं किसी पंथ का भक्त हूँ भाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।

मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे,
सब लगते हैं मुझे प्यारे।
गिरजाघर की घंटी सुनता,
बुद्ध-विहार में शांति चुनता।
कहीं अजान की स्वर-लहरी,
कहीं गुरुवाणी लगती प्यारी।
कहीं वेद की ऋचाएँ गूँजें,
कहीं कबीर के दोहे सूझें।
नानक की वाणी पढ़ लेता,
बुद्ध के पथ पर चल लेता।
कबीर की उलटबाँसियों में,
जीवन के अर्थ समझ लेता।
पर स्थानों से बँधता नहीं,
प्रतीकों में अटकता नहीं।
सबका आदर करता हूँ भाई,
पर अंधश्रद्धा ना अपनाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।

पंथ ज्ञान के रस्ते सारे,
तो सबके सब हुए हमारे।
गणित कभी, बायो पढ़ता हूँ,
पुस्तक से खुद को गढ़ता हूँ।
कभी इतिहास खँगालता हूँ,
कभी विज्ञान संभालता हूँ।
कभी दर्शन में डूबा रहता,
कभी प्रकृति से संवाद करता।
पर इनकी ना करता पूजा,
पड़े ज़रूरत पढ़ता दूजा।
एक किताब अंतिम सच नहीं,
एक विचार ही पूर्ण नहीं।
ज्ञान नदी है, बहते रहना,
सीखते रहना, कहते रहना।
प्रश्नों से परहेज़ नहीं है,
उत्तर का भी क्रेज नहीं है।
जिज्ञासा का अनुरक्त हूँ भाई,
ज्ञानासक्त हर वक्त हूँ भाई।
नहीं किसी का भक्त हूँ भाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।

वेद पढ़ूँ या कुरान पढ़ूँ,
गुरुग्रंथ या बाइबल पढ़ूँ।
त्रिपिटक में कुछ खोज करूँ,
गीता का भी बोध करूँ।
जो जीवन को बेहतर कर दे,
जो मन के अंधेरे हर दे।
जो मानव को मानव समझे,
जो पीड़ा को अपनी समझे।
वही विचार मेरा अपना,
वही ज्ञान मेरा सपना।
किसने कहा, यह कम ज़रूरी,
क्या है कहा, बात है पूरी।
नाम नहीं, गुण देखता हूँ,
कथन नहीं, संदर्भ देखता हूँ।
सार ग्रहण करने का अभ्यस्त हूँ भाई,
नहीं किसी पंथ का भक्त हूँ भाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।

मेरा तन ही मेरा धन है,
मेरा श्रम ही मेरा चंदन है।
तन-मन अर्पित अपने जीवन को,
अपने कर्म और अपनेपन को।
मैं हूँ तो ये पंथ हैं सारे,
मुझसे इनके अर्थ हैं न्यारे।
मनुष्य नहीं तो कौन पुकारे,
कौन बनाए मंदिर-द्वारे?
किसके मन में श्रद्धा जागे,
किसके होंठों पर मंत्र विराजें?
इंसानियत से धर्म बने हैं,
मानव से ही कर्म बने हैं।
मुझसे ही ये सब फलते हैं,
मेरे होने से चलते हैं।
इसलिए खुद से अनुरक्त हूँ भाई,
नहीं किसी पंथ का भक्त हूँ भाई।
अंधा कोई भक्त नहीं हूँ भाई।

एक दो तीन चार पाँच छ सात गिनती ये मेरी प्रभु सुनो जगन्नाथ

 एक दो तीन चार पाँच छ सात,

गिनती ये मेरी प्रभु सुनो जगन्नाथ।
आठ नौ दस ग्यारह बारह तेरह,
तेरा हो हाथ छूटे जन्मों का घेरा।
चौदह पंद्रह सोलह सत्रह अठारह उन्नीस,
हार भी ना मेरी प्रभु ना ही मेरी जीत।
बीस इक्कीस बाइस तेईस चौबीस पच्चीस,
हरो दुख सारे प्रभु तू ही मन मीत।
छब्बीस सताईस अठाइस उनतीस तीस इकतीस,
मिल न पाऊँ तुझसे मैं मन में है टीस।
बत्तीस तैतीस चौतीस पैंतीस छत्तीस सैंतीस,
शुष्क हृदय है प्रभु तु ही इसे सींच।
अड़तीस उनचालीस चालीस इकतालीस बयालीस तैतालिस,
मन मे बसों तू ही बस इतनी सी ख़्वाहिश।
चौवालीस, पैतालीस, छियालीस, सैतालिस, अड़तालीस ,उन्नचास,
एक से शुरू है प्रभु तू ही है पचास।

छद्म प्रशंसा सुनते रहने में है कोई सम्मान नहीं

बिना ज्ञान के लड़ते रहना मरना है बलिदान नहीं,

छद्म प्रशंसा सुनते रहने में है कोई सम्मान नहीं।


मन है उत्साह ठीक पर,मन पे रोध जरूरी है,

अंधेरो में ना चलना कि,कुछ संबोध जरूरी है।

गर लोहे पे कुछ लिखने को,जब तुम जोर लगाते हो,

लोहा, पत्थर, छेनी, आदि,तब तब तुम ले आते हो।

अंध शक्ति के अंधकार में तत्व कभी विद्यमान नहीं, ,

बिना ज्ञान के लड़ते रहना मरना है बलिदान नहीं,

छद्म प्रशंसा सुनते रहने में है कोई सम्मान नहीं।


पुरुषत्व की सही परीक्षा,अरिदल में हीं होती है,

अग्नि राह की बारिश में और,प्रखरत्व में होती है।

जो आश्रित हैं तुमपे जितना,उतना हीं गुणगान करेंगे,

अगर हारकर छुप जाते हो,उसका भी अभिमान करेंगे।

मात्र  मुकुट पहन लेने से कोई बनता महान नहीं ।

बिना ज्ञान के लड़ते रहना मरना है बलिदान नहीं,

छद्म प्रशंसा सुनते रहने में है कोई सम्मान नहीं।


आगे बढ़ने की सीने में,छिपी हुई जो चाह है,

मरुस्थल में पानी भर दे,ये वो जीने की राह है।

पर मरु में पानी करने को,गगरी क्या नीर चढातें हैं ?

प्यास आप्त हो आवश्यक , ना बादल घर ले आते हैं ?

अविवेक से जोश दिखाना, बुद्धि की पहचान नहीं,

बिना ज्ञान के लड़ते रहना मरना है बलिदान नहीं,

छद्म प्रशंसा सुनते रहने में है कोई सम्मान नहीं।


जीवन पथ की राहों में,घन घोर तूफ़ां जब आते हैं,

तब गहन निराशा के बादल,मानस पट पे छा जाते हैं।

पर इतिहास के पन्नों पे,वो ही अध्याय बनाते हैं,

जो पंथ पराजय पे चलकर,विजयी व्यवसाय चलाते हैं।

चोटिल हो गिर जाए बेशक,ना बिखरे इंसान वहीं,

बिना ज्ञान के लड़ते रहना मरना है बलिदान नहीं,

छद्म प्रशंसा सुनते रहने में है कोई सम्मान नहीं।


बिना ज्ञान के लड़ते रहना मरना है बलिदान नहीं,

छद्म प्रशंसा सुनते रहने में है कोई सम्मान नहीं।

Wednesday, November 4, 2026

बड़ा आदमी

प्रॉब्लम इस बात में नही है
कि वो बड़ा आदमी है।

प्रॉब्लम इस बात में नहीं है
कि वो दूसरों को छोटा समझता है

प्रॉब्लम इस बात में है
कि वो दूसरों को खुद से छोटा समझाता है
 
प्रॉब्लम इस बात में नही है 
कि वो अपने आप को बड़ा आदमी समझता है।

प्रॉब्लम इस बात में है 
कि वो बड़ा आदमी है दूसरों को ये समझाता है

प्रॉब्लम इस बात में नही है
कि वो बड़ा आदमी है दूसरों को ये समझाता है

प्रॉब्लम इस बात में है
कि वो जितना बड़ा आदमी है ,
अपने आपको उससे बड़ा आदमी समझता है।

प्रॉब्लम इस बात में भी नही है
कि वो जितना बड़ा आदमी है ,
अपने आपको वो उससे बड़ा समझता है .

प्रॉब्लम इस बात में है
कि अपने आपको जितना बड़ा आदमी समझता है
उससे अपने आपको ज्यादा बड़ा आदमी दिखाता है।

प्रॉब्लम इस बात में भी नही है
कि वो अपने आपको ज्यादा बड़ा दिखाता है ,
प्रॉब्लम दरअसल इस बात में है
कि वो जो कुछ भी दिखाता है ,
मुझे सब कुछ दीखता है।

प्रॉब्लम इस बात में भी नही है
कि वो जो कुछ भी दिखाता है
मुझे सब कुछ दिखाता है ,

वो अपने आपको बड़ा समझता है,
तो समझता रहे।

वो अपने आपको बड़ा दिखाता है,
तो दिखाता रहे।

वो अपनी तारीफ़ करता है,
तो करता रहे।

वो अपनी दुनिया में सबसे बड़ा है,
तो रहने दे।

प्रॉब्लम इस बात में नहीं है
कि वो ऐसा क्यों है,
प्रॉब्लम इस बात में भी नहीं है
कि वो ऐसा क्यों दिखता है,
प्रॉब्लम इस बात में भी नहीं है
कि वो ऐसा क्यों दिखाना चाहता है।

प्रॉब्लम दरअसल इस बात में है
कि वो जो कुछ भी दिखता है , दिखाता है 
वो सब मुझे खलता है।

Tuesday, November 3, 2026

चिराग़ और आफ़ताब

कभी कभी हजारों सर कलम हो जाने पर भी इतिहास नहीं बदलता,कभी एक कलम के सामने भी सल्तनतें टिक नहीं पाती।

ऐसे तो कुछ भी ना अंतर कलम और किताबों में,
पर वैसे हीं फर्क छिपा जैसे चिराग आफ़ताबों में,
किताबों में तो मिल जाते हैं हर सवाल के जवाब,
पर किताब ना लिख सकती है दिल के कोई सवाल।
एक कलम भर सकती है जन के  मन में इंकलाब,
और किताबों की उम्र गुजरती देते बस जवाबों में।
ऐसे तो कुछ भी ना अंतर कलम और किताबों में,
पर वैसे हीं फर्क छिपा जैसे चिराग आफ़ताबों में,

चिराग़ एक कोने की हीं मिटा पाता है तन्हाई ,
और आफ़ताब भरता रोशनी तमाम चनाबों में।
सूरज करता रहता रोशन गुलशन को एक बराबर
मगर फ़र्क़ तो होता हीं है दरख्तों के हिसाबों में ।
ऐसे तो कुछ भी ना अंतर कलम और किताबों में,
पर वैसे हीं फर्क छिपा जैसे चिराग आफ़ताबों में।

कोई लफ़्ज़ बनकर हीं रह जाता है जुबानों में
कोई सोच बनकर उतर जाता है जन सैलाबों में।
किसी की हस्ती सिमटती है महज़ एक दायरे में,
कोई ज़िंदा रहता है सदियों तक खुले हिसाबों में।
ऐसे तो कुछ भी ना अंतर कलम और किताबों में,
पर वैसे हीं फर्क छिपा जैसे चिराग आफ़ताबों में।

किताबें बताती है कि दुनिया कैसी है और कलम पूछती है कि दुनिया अगर ऐसी है तो क्यों है ?  किताबें गुजरे हुए वक्त की आवाज सुनाती हैं तो कलम आने वाले कल की आवाज बताती हैं।

Monday, November 2, 2026

मसला रोटी का है

वो झुक गया है आज फिर, देख मसला रोटी का है,

वो चूक गया है आज फिर, देख मसला रोटी का है।

[Bridge]

सर  को हिलाना सीख लिया, होठों को सिल लिया,

भाई कुर्सी के आगे बोले कौन कुर्सी से मिल लिया

कल तक जो बातें  मंजूर ना थी  उसके जमीर को ,

कहता आज  सब ठीक है ,देख मसला रोटी का है।

वो चूक गया है आज फिर, देख मसला रोटी का है।

[Bridge]

दावा था उसका बिक नहीं सकता कभी बाजार में,

आज भाव पूछता वोही अपना कितना खरीददार में

किससे लड़े, किसके लिए लड़े, किससे सवाल करे,

नजर उसकी  घर के चूल्हे पर ,देख मसला रोटी का है।

वो चूक गया है आज फिर, देख मसला रोटी का है।

[Bridge]

आब  आवाज़ उठाने से पहले हिसाब करता है ,

कितनी तनख़्वाह रहेगी नफा नुक़सान देखता है।

गुनाह में शामिल नहीं पर पेट की मज़बूरी है।

वो गलत नहीं पर  चुप है आज मसला रोटी का है

वो झुक गया है आज फिर, देख मसला रोटी का है

वो रुक गया है आज फिर देख मसला रोटी का है

[Bridge]

ज़मीर मर गया है या कि ज़िंदा दफन हो गया,

देख तो लिबास है या कि जिंदा कफ़न हो गया

[Conversational sentence]

मसला सिर्फ़ रोटी के लिए झुक जाने का नहीं ,

मसला ज़मीर के ज़िंदा रहते हुए मर जाने का है।

ख्वाब के खाक बन जाने का है,

जीते जी राख बन जाने का है


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वो झुक गया है आज फिर, मसला रोटी का है,
वो चूक गया है आज फिर, मसला रोटी का है।

सिर को हिलाना सीख लिया, होठों को सिल लिया,
भाई कुर्सी के आगे बोले कौन कुर्सी से मिल लिया
कल तक जो बात ज़मीर को मंज़ूर न थी उसको,
आज कहता सब ठीक है ,मसला रोटी का है।
वो चूक गया है आज फिर, मसला रोटी का है।

दावा था उसका बिक नहीं सकता कभी बाजार में,
आज भाव पूछता  अपना कितना है खरीददार में
किससे लड़े, किसके लिए, किससे सवाल करे,
चूल्हा जल रहा है आज फिर ,मसला रोटी का है।
वो चूक गया है आज फिर, मसला रोटी का है।

आज आवाज़ उठाने से पहले हिसाब करता,
कितनी तनख़्वाह बचेगी, नफा नुक़सान करता।
गुनाह में शामिल नहीं पर पेट की मज़बूरी है।
वो गलत नहीं पर  चुप है मसला रोटी का है 
वो झुक गया है आज फिर, मसला रोटी का है
वो रुक गया है आज फिर मसला रोटी का है

ज़मीर मर गया है या कि ज़िंदा दफन हो गया,
देख तो लिबास है या कि जिंदा कफ़न हो गया
मसला सिर्फ़ रोटी के लिए झुक जाने का नहीं,
मसला ज़मीर के ज़िंदा रहते हुए मर जाने का है।
ख्वाब के खाक बन जाने का है, जीते जी राख हो जाने का है

Friday, October 30, 2026

अभी ना समय है

ना माथे पर शिकन कोई,
ना रूह में कोई भय है,
ना दहशत ही फैली,
ना हिंसा ना क्षय है।

हादसा हुआ तो है,
लहू भी बहा मगर,
खबर भी बन जाए,
अभी ना तय है।

माहौल भी नरम है,
अफवाह ना गरम है,
आवाम में अमन है,
कोई रोष ना भरम है।

बिखरा नहीं चमन है,
अभी आँख तो नरम है,
थोड़ी बात तो बढ़ जाए,
थोड़ी आग तो लग जाए,
रहने दो खबर बाकी,
अभी है कसर बाकी।

लोहा जो कुछ गरम हो,
असर तभी चरम हो,
ठहरो कि कुछ पतन हो,
राख राख राख वतन हो।

अभी खाक क्या मिलेगा,
खबर में कुछ भी दम हो,
अखबार में आ जाए,
अभी ना समय है,
सही ना समय है।

जो मर गए, सो मर गए,
जो बच गए, वो चुप रहें,
जो पूछते हैं कारण,
उन्हें कहो सब छुप रहे।

अभी बयान आनी है,
अभी जांच बैठानी है,
अभी कमेटी बननी है,
अभी रिपोर्ट बनानी है।

अभी दोषियों के नाम पर,
कुछ नाम और आएंगे,
अभी कुछ मोहरे चलेंगे,
कुछ मोहरे बचाएंगे।

ना कैमरे में दर्द दिखे,
ना स्क्रीन पर सवाल हो,
बस चीख रहा है रात से,
तो क्या कि वो बेहाल हो?

अभी बहस का मुद्दा नहीं,
अभी चर्चा का दौर है,
किसकी गलती कितनी थी,
इस पर भी विचार और है।

अभी धर्म का चश्मा बाकी,
अभी जाति का रंग बाकी,
अभी आने मुद्दे कई पुराने,
नए विवादों का संग बाकी।

जो भूख की बात करेगा,
उसे आंकड़े दिखाएंगे,
जो रोजगार पूछ बैठेगा,
उसे सपने समझाएंगे।

जो शिक्षा पर सवाल करे,
उसे इतिहास पढ़ाएंगे,
जो अस्पताल की बात करे,
उसे आस दिखाएंगे।

अभी मशाल नहीं जलती

अभी रात और गहरी है,
अभी राख के नीचे,
कुछ चिंगारी ठहरी है।

अभी राख ना कुरेदो,
अभी धुआँ उठने दो,
जो सो रहे हैं चैन से,
उन्हें चैन से सोने दो।

अभी खाक ना मिलेगा,
अभी राख और चिंगारी,
करवट ले रही जनता
और नींद भी है जारी।

खबर बन जाने में,

अभी बहुत लाचारी

करवट ले रही जनता

और नींद भी है जारी।

खबर बन जाने में,

अभी बहुत लाचारी

क्योंकि जनता की अभी

नींद है जारी

Wednesday, October 28, 2026

मांग लिए हो प्राण

भाई साहब बहन जी बच्चों और माता जी सुनिये एक कहानी और वो भी मेरी जुबानी। ये कहानी है नेताजी की नेत्र दान और फेंकन की जिस घटना की अंतिम पंक्ति है "जैसे नेत्र नहीं फेकन ने मांग लिए हो प्राण" । तो शुरुआत कैसे हुई और कहाँ हुई आइये देखते है 

नेत्रदान के पक्ष में नेता बाँट रहे थे ज्ञान
बता रहे थे लोगों को है कर्म ये पुण्य महान ।
ये कर्म पुण्य महान कि होता खुश अंधा बेचारा।
तेरे कर्म से दुखियों के जीवन का मिटता अंधियारा।

तब फेकन ने घबड़ाकर अपना पक्ष सुनाया,
डर से कंपित अंतर्मन का छद्म सत्य बताया,
नेताजी एक बात बताएँ, इस पुण्य व्यापार में,
पाप पुण्य का लेखा जोखा होता किस दरबार में?

नेता बोले अरे भाई ये कैसी बात सुनाते हो,
पुण्य कमाने का है अवसर तुम कुतर्क रचाते हो?
अंधे को संसार दिखेगा, जीवन में खुशहाली होगी,
देख सकेगा चाँद सितारे, बगिया में हरियाली होगी!”

फेकन ने तब डर के बोला  होगा कर्म महान  ।
होगा कर्म महान पर हमको क्षमा करें श्रीमान
क्षमा करें श्रीमान कि लगाकर आँख हमारी ।
अगर किसी लंगड़े ने किसी युवती पे मारी ।

आँखें तो हैं साधन, इस नीयत का क्या होगा?
जिसने की हो गड़बड़, या दोष मेरा लगेगा?
तुम्ही कहो नेताजी उस लंगड़े का क्या बिगरेगा ।
है तो आँख हमारी ही , पाप मुझे हीं लगेगा ।

कल को मेरी आँखों से गर कोई चोरी करता ।
किसके मत्थे पाप चढ़ेगा इसका लेखा जोखा।
मान लीजिए स्वर्ग गया मै और ठाठ से बैठा,
चित्रगुप्त ने गर खोला, पापा पुण्य का ठेका ।

दान किया था नेक काम, नीयत थी भरपूर!
मेरे कहने पर क्या होगा, क्या मेरा कसूर?
नेता बोले कर्म करो, मत सोचो तुम परिणाम,
नेत्रदान को दुनिया देती जय-जयकार प्रणाम!

हमने कहा सहमत हैं, इसमें भी क्या हो विवाद,
आप रखें अपनी आँखें इस टेबल पर आज!”
इस टेबल पर आज कि देखें कैसे पुण्य कमाते हैं ,
वचन आपके पाप पुण्य आपपे हीं आजमाते हैं  

सुनकर बात फेकन की नेता  खाँसे बारंबार,
बोले इस विषय पर चर्चा होगी अगली बार!”
फिर मंच से उठकर नेता भाग चले श्रीमान,
जैसे नेत्र नहीं फेकन ने मांग लिए हो प्राण 
जैसे नेत्र नहीं फेकन ने मांग लिए हो प्राण 

Tuesday, October 27, 2026

कितना छोटा हूँ मैं

मैं ,मेरा घर ,
मेरा छोटा सा घर
एक छोटे से गाँव में।

और गाँव,
मेरा गाँव,
एक शहर के पास।

और शहर,
मेरा शहर,
वो छोटा सा शहर,
जहाँ हजारों चेहरे,
लाखों कहानियाँ,
अनगिनत सपने,
मिलते हैं,
बिछड़ते हैं,
एक राज्य में।

और राज्य,
मेरा राज्य,
मेरा छोटा सा राज्य,
जिसके भीतर
नदियाँ बहती हैं,
पर्वत खड़े हैं,
मैदान फैले हैं,
वन साँस लेते हैं,
करोड़ों मनुष्य
मेरे इस देश में।

और देश,
मेरा देश,
मेरा प्यारा देश,
जिसकी मिट्टी में
किसी का बचपन है,
किसी की जवानी है,
किसी का बुढ़ापा है,
किसी के सपने हैं।

ऐसे सैंकड़ों देश,
ऐसे अनेक देश,
ऐसे अनगिनत देश,
इस धरती पर।

और धरती,
ये धरती,
मेरी प्यारी धरती,
मेरी छोटी सी धरती,
घूमती है गोल-गोल,
सूरज के चारों ओर,
अन्य ग्रहों के साथ।

और सूरज,
मेरा सूरज,
मेरा प्यारा सूरज,
वह घूमता है,
चलता है,
अपनी गति में,
अपने ग्रहों के साथ,
एक विशाल आकाशगंगा में।

और आकाशगंगा,
मेरी आकाशगंगा,
वो विशाल आकाशगंगा,
जहाँ ब्लैक होल्स,
हजारों ब्लैक होल्स,
करोड़ों ब्लैक होल्स,
अनगिनत ब्लैक होल्स,
जहाँ हजारों तारे,
करोड़ों तारे,
अरबों तारे,
अनगिनत तारे।

जिसमें तारे
जन्म लेते हैं,
बड़े होते हैं,
जलते हैं,
बुझते हैं,
मिटते हैं

और ऐसी आकाशगंगा,
हजारों आकाशगंगा,
करोड़ों आकाशगंगा,
अरबों आकाशगंगा,
खरबों आकाशगंगा
अनगिनत आकाशगंगा।

कोई बन रही है,
कोई बिगड़ रही है,
कोई घूम रही है,
कोई टकरा रही है,
कोई जन्म ले रही है,

और इनके बीच
मेरा सूरज
एक छोटा सा तारा

और उसके भीतर
मेरी धरती
एक छोटा सा ग्रह।

और उस धरती पर
मेरा देश
एक छोटा भूभाग

और उस देश में
मेरा राज्य।

राज्य में
मेरा शहर।

शहर के पास
मेरा गाँव।

उस गाँव में
मेरा घर।

और उस घर में
मैं।

कितना छोटा हूँ 
मैं

Monday, October 26, 2026

मोबाइल में बसते प्राण

मैं ना बालक एक शैतान, 

इतनी सी विनती भगवान, 

एक वीक की छुट्टी मिल जाए, 

जो मुझको हो जाए जुकाम।


स्कूल की बस जब आए, 

मेरा दिल तब खूब घबराए, 

जूता एक मिले बिस्तर पर, 

दूजा जाने कहाँ छुपाए!


बैग मेरा इतना है भारी, 

जैसे ईंटें भर दी सारी, 

किताबों के नीचे दबकर, 

रोती रहती पीठ बेचारी!


होमवर्क का नाम जो आए, 

नींद मुझे झटपट आ जाए, 

पेंसिल ढूँढ़ूँ आधे घंटे, 

फिर कॉपी ही मिल ना पाए!


गणित की जब घंटी बजती, 

मेरी धड़कन तेज़ है चलती, 

मैडम पूछें, “दो दूनी कितने?” 

अक्ल मेरी छुट्टी पर रहती!


मम्मी बोले, “पढ़ ले बेटा,” 

मैं कहता पढ़ता हूँ गणित!” 

मोबाइल लेकर बैठूँ मैं, 

जैसे दुनिया का हूँ पंडित!


पापा पूछें, “नंबर कितने?” 

मैं कह दूँ, “बस पास हो जितने!” 

मार्कशीट जब सामने आए, 

पापा पूछें, “ये तो ईतने?”


रील बनाऊँ, गेम चलाऊँ, 

खुद को हीरो खूब बताऊँ, 

पढ़ने का जब समय हो जाए, 

वाई-फाई को दोष लगाऊँ!


दूध देख के उल्टी आती, 

भिंडी भी है बहुत सताती, 

खाने की भी चीज़ है कोई, 

बैंगन, कटहल, लौकी-भाजी।


मैगी, बर्गर, गरम समोसे, 

छोले-कुलचे, इडली-डोसे, 

दूध-मलाई, मक्खन, हलवा, 

दादी भर-भर नरम पड़ोसे।


मम्मी-पापा खुश हो जाएँ, 

मेरे नंबर सब बढ़ जाएँ, 

बिना पढ़े टॉपर बन जाऊँ, 

टीचर ताली खूब बजाएँ!


पर भगवन ने आँख दिखाई, 

बोल अक्ल है कहाँ गँवाई? 

छुट्टी, मैगी  ठीक ठाक पर 

करनी होगी खूब पढ़ाई!”


मैं बोला, “प्रभु, बात है सच्ची, 

मेरी नीयत थोड़ी है कच्ची, 

पढ़ भी लूँगा, खेल भी लूँगा, 

बस छुट्टी हो थोड़ी अच्छी!”


मैं ना बालक एक शैतान, 

नटखटपन मेरी पहचान, 

पढ़ाई हो पर थोड़ी सी

मोबाइल में बसते प्राण

Sunday, October 25, 2026

ना जाने किस घाट घुमाया


[INTRO — Funny Female Duo, Finger Snapping, Light Dholak, Mischievous Laughter, Spoken-Singing]

[VOICE 1 — SAAS, Old Indian Lady Dramatic and Curious Vocal]

पंडित जी ने क्या समझाया

[VOICE 2 — BAHURANI, Young Indian Naughtly Vocal ]

ना जाने क्या पाठ पढ़ाया 

[DUAL VOCALS — Playful Echo]

कौन ज्ञान था कैसी घुटी

सासूजी का दिल भर आया

[COMIC ECHO]

दिल भर आया... आया... आया!

[VERSE 1 — SAAS Old Lday VOCAL, Sweet and Suspicious, Hand Snaps on Every Second Beat]

[Bridge]

दिल भर आया बोली रानी

तुझको है एक बात बतानी

क्यों सहमी सी डरती रहती

बात है ऐसी क्यों बहुरानी

[VOICE 2 — SAAS Old Lady Vocal]

ससुराल भी नईहर जैसा

फिर तेरे मन ये डर कैसा

मेरा तो कुछ दिन का डेरा

ये घर तो बस तेरा तेरा

[PRE-CHORUS — SAAS, Old Lady Vocal , Emotional Overacting, Harmonium Rising]

पंडित जी सच ही कहते हैं

जो बहू को बेटी कहते हैं

वहीं स्वर्ग है इस धरती पे

वहीं स्वर्ग से सुख मिलते हैं

[CHORUS — BOTH FEMALE VOCALS, Catchy Folk Melody, Dholak and Claps, Finger Snaps, Call and Response]

[Bridge]

[VOICE 1 — SAAS, Old Lady Vocal, Proudly]

बस मुझको इतना ही कहना

[VOICE 2 — SAAS, Old Lady Vocal]

तू ही तो मेरे दिल का गहना

जो इच्छा हो मुझे बताओ

बहुरानी बेटी बन जाओ

[DUAL VOCALS — BIG COMIC HOOK, Rhythmic Snapping]

बेटी बन जाओ! — [ECHO: बन जाओ!]

बेटी बन जाओ! — [ECHO: बन जाओ!]

[COMIC PAUSE]

अरे, आगे सुनो... असली कहानी अब शुरू!

[VERSE 2 — BAHURANI, Sweet Storytelling, Playful Tabla and Snaps]

[Bridge]

सासू मां की बात जान के

उनके मन के राज जान के

बहुरानी समझी घर अपना

बोली उनको मां मान के

[VOICE 2 — BAHURANI, Innocent Request Eco]

[Bridge]

बहु बोली ओ सासू अम्मा

ये सब करती मेरी मम्मा

अम्माजी ना मुझे जगाएँ

सुबहो सुबहो ना उठाएँ

नींद घोर सुबहो आती है

रोज रोज यूँ ना चिल्लाएँ

[VOICE 1 — SAAS, Confused Reaction]

सासू बोली अच्छा जी... [ECHO: अच्छा जी?]

बेटी बनी कि बच्चा जी

[COMIC SOUND: RECORD SCRATCH]

[VERSE 3 — BAHURANI, Extra Sweet and Dramatic]

[Bridge]

बहु बोली मेरी माँ करती थी 

जो जो भी कुछ मैं कहती थी

मैं जब नैहर में रहती थी

मम्मी से सब कह देती थी

उठकर मम्मी चाय पिलाती

पैर दर्द तब पैर दबाती

[VOICE 2 — BAHURANI, Demanding Like a Princess, Hand Snaps]

बोली अम्मा चाय बनाओ

रोज उठकर मुझे पिलाओ

जब सर थोड़ा भारी लगता

हौले हौले उसे दबाओ

[COMIC ECHO]

चाय बनाओ! — [ECHO: बनाओ!]

पैर दबाओ! — [ECHO: दबाओ!]

[VERSE 4 — BAHURANI, Secretive Whisper Turning into Comedy]

[Bridge]

पैसा रखा बचा बचा के

पापाजी से छुपा छुपा के

बनवा दो मुझको तुम गहना

अम्माजी बस इतना कहना

[VOICE 1 — SAAS, Nervous Laugh, Throat Clearing]

अम्माजी थोड़ी सकपकाईं

थोड़ी मुस्काईं, गला खँखाराईं

बोली बेटी पंडित बोले

पर तेरी कोई राज न खोले

[BRIDGE]

बेटी तुम हो, ये सब माना

पर घर ना कोई होटलखाना

थोड़ी बहू, थोड़ी बेटी

थोड़ा काम करके सो जाना

[VOICE 1 — SAAS, Building Confidence]

नैहर जैसा अधिकार मिलेगा

पर परि श्रम से प्यार मिलेगा

काम बाँट लो मेरे संग तुम

फिर हर दिन त्योहार लगेगा

[DUAL VOCALS — HARMONY, OPTIMISTIC BUILD]

काम भी होगा! — [ECHO: होगा!]

प्यार भी होगा! — [ECHO: होगा!]

फिर घर में त्योहार हीं होगा

[COMIC PAUSE — BAHURANI CLEARS THROAT]

[Bridge]

[VERSE 5 — BAHURANI, Suddenly Bossy, Fast Comic Delivery, Dholak Accelerates]

बहू बोली — ठीक है अम्मा

पहले कपड़े धो दो अम्मा

खीर बनाऊँगी मैं पर पहले

मोतीचूर लड्डू खाऊँ अम्मा

[VOICE 1 — SAAS, SHOCKED WHISPER]

हे भगवान! [ECHO: हे भगवान! हे भगवान!]

मेरी बहु बड़ी शैतान

[FINAL CHORUS ]

[VOICE 2 — BAHURANI, Proudly]

बहु बोली अम्मा मैं नादान

इन बातों का रखती ध्यान

आधा आधा काम बांट लूँ 

तेरी सारी बात मान लूँ 

बहु निकली बड़ी सायानी

फिर की उसने खूब शैतानी

[VOICE 2 — BAHURANI, Smiling and Firm]

मेरा काम हो काम बताना

तुमको अम्मा सब कर जाना

[DUAL VOCALS — BIG FUNNY HOOK, Rhythmic Finger Snaps and Group Claps]

मेरा काम है काम बताना

[VOICE 1 — SAAS, ECHO]

काम बताना... काम बताना...

[VOICE 2 — BAHURANI]

अम्माजी तुमको कर जाना

[VOICE 1 — ECHO]

सब करना... सब करना...

[OUTRO — Dholak Stops, Finger Snaps Only, Both Women Speak-Sing]

[VOICE 1 — SAAS]

सासू बोली कब समझाया

पंडित जी ने ये कब बताया

[VOICE 2 — BAHURANI, Innocently]

बहु बोली जो समझ में आया

अम्मा वो ही है बतलाया

[DUAL VOCALS — LAUGHING, FINAL SNAP]

सास-बहू का ये बँटवारा

सबसे बड़ा हुआ घोटाला

[COMIC LAUGHTER — ECHO FADES OUT]

Thursday, October 22, 2026

जीवन की आपा धापी में

 

जीवन के थपेड़ो और झंझावातों से लड़ते और बिखरते आदमी के लिए बचपन की सुनहली यादें किसी स्वप्नवत मीठी दवाई के जैसी होती है , जो मिल तो नहीं सकती परन्तु इसकी यादगारी हीं चित्त को ठंडक पहुँचाने के लिए काफी होती हैं ।

  

थकने लगा रातों को सोते

जाग-जाग कर मैं।

 

जीवन की आपा धापी में

भाग भाग कर मैं।

 

वो तितली का पंख पकड़ना

आने लगा है याद,

 

वो चॉकलेट के लिए मैं

कैसे करता था फरियाद।

 

वो हृदय को कम्पित

करते थे कैसे गुब्बारे,

 

वैसा विस्मय कहाँ है

संभव कैसे भी हो नजारे।

 

वो चंदा मामा की रातें,

दादी की परियों की बातें ,

 

इंद्रधनुष पे विस्मित होना,

जब भी होती थी बरसातें।

 

काश कोई लेके चलता

मुझको बचपन की छाँव,

 

वो आम गुठली की सीटी

और कागज की नाव।

 

कि जामुन के पेड़ बैठ फिर

मन भर जामुन लाता,

 

माता के हाथों से चावल

भाग-भाग फिर खाता।

सत तप का आचार बढा कर

ऐसे पुण्यात्माएं जो जीवन के तमाम झंझावातों के बीच भी ईश्वर के प्रति समर्पित रहती हैं और जिनके सानिध्य में हृदय प्रभु प्रेम से हर्षोल्लादित रहता है,  उन तपस्वियों एवं ईश्वर-पथगामियों के चरणों में यह गीत सादर समर्पित है।

सत तप का आचार बढा कर,मन संचित विकार घटा कर,

ज्ञान-सुधा का पान करें जो, प्रभु-शोध में प्राण धरें जो।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।


अहंकार ना लेश है फलता,समता का दीपक है जलता।

शुभ भावों के पुष्प चढ़ाते प्रभु का रस पी तृप्त हो जाते।,

क्रोध-काम के पार जो रहते, साक्षी बन संसार जो लखते, 

संचित ना करते तिनके तिनके ,मोह-मुक्त जीवन पथ चलते।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।


ज्ञान दीप ले हर घर घर पर,जग से घन तम को हर हर कर,

दुःख पीड़ा इस जग के सह कर,जाने जग माया में बह कर।

माया सत का व्यव्हार नहीं है ,जग का किंचित सार नहीं है ,

इनके डग जग यूँ  होते ,जग का हो जग ना रहते,

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।


ध्यान योग की जली ज्योत है ,चिरानंद के विपुल श्रोत हैं ,

सत्य-शोध के नित्य अनुरागी,द्वेष-रहित, निष्काम वैरागी।

सत्य-सार का मंथन करते,नश्वर में अनश्वर चखते,

क्षणभंगुर संसार के भीतर,शाश्वत सत्ता का पथ वरते ।

उनके पग हम कविता धरते उनके डग हम कविता रचते

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।

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क्षमा दया करुणा हित गामी , शक्ति पुंज अतुलित हैं ज्ञानी,

जग की पीड़ा स्वयं सहें जो,दुखियों के आँसू हर लें जो।

पग पग में निस्सार महीं है, ईश्वर का विस्तार नहीं है।

जैसे जल के ऊपर तल पर ,पंक तल से निकल निकल कर।

प्रेम की जिनसे विणा बहती ,ज्ञान सुधा जग मग जग करती।


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