Thursday, October 22, 2026

जीवन की आपा धापी में

 

जीवन के थपेड़ो और झंझावातों से लड़ते और बिखरते आदमी के लिए बचपन की सुनहली यादें किसी स्वप्नवत मीठी दवाई के जैसी होती है , जो मिल तो नहीं सकती परन्तु इसकी यादगारी हीं चित्त को ठंडक पहुँचाने के लिए काफी होती हैं ।

  

थकने लगा रातों को सोते

जाग-जाग कर मैं।

 

जीवन की आपा धापी में

भाग भाग कर मैं।

 

वो तितली का पंख पकड़ना

आने लगा है याद,

 

वो चॉकलेट के लिए मैं

कैसे करता था फरियाद।

 

वो हृदय को कम्पित

करते थे कैसे गुब्बारे,

 

वैसा विस्मय कहाँ है

संभव कैसे भी हो नजारे।

 

वो चंदा मामा की रातें,

दादी की परियों की बातें ,

 

इंद्रधनुष पे विस्मित होना,

जब भी होती थी बरसातें।

 

काश कोई लेके चलता

मुझको बचपन की छाँव,

 

वो आम गुठली की सीटी

और कागज की नाव।

 

कि जामुन के पेड़ बैठ फिर

मन भर जामुन लाता,

 

माता के हाथों से चावल

भाग-भाग फिर खाता।

सत तप का आचार बढा कर

 

कवि के मन में उन पुरुषार्थी व्यक्तियों के प्रति असीम श्रद्धा है जो आजीवन सत्यानुसंधान  में प्रयासरत रहते हैं। ऐसे व्यक्ति , जिनकी संगति से सुवास प्रतिफलित होता है । ऐसे व्यक्ति जो दुनिया के तमाम झंझावातों को झेलकर अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहते हैं । इस तरह के व्यक्तियों से कवि की आत्मा प्रेरित होती है ।  कवि के लिए ऐसे तपस्वी जन श्रद्धेय हैं । इस कविता के द्वारा , कवि अपनी श्रद्धा सुमन इन तपस्वियों, ईश पथगामियों के चरण को समर्पित करता है ।

 

सत तप का आचार बढा कर,

मन  संचित विकार घटा  कर,

 

ज्ञान  लाभ  जन  सत्वर करते ,

शोध परम  रत तत्तपर  रहते।

 

नाम  न  लेते क्रोध काम का  ,

वासी  है जो  साक्षी  ग्राम  का ,

 

जग जाए  चित्त अहं भाव ना ,

चित्तवन में बस यही कामना।

 

ध्यान योग की जली ज्योत है ,

चिरानंद  की   विपुल श्रोत हैं ,

 

फलते  शुभ   भावों    के माला  ,

ईशानंद के पीकर प्याला।

 

क्षमा दया करुणा हित गामी , 

शक्ति पुंज अतुलित हैं ज्ञानी,

 

करते  नित   जो   नए उपाए,

परहित हीं जिन जन को भाए।

 

कर्म करे फल जलते जिनके,

संचित ना जिनके हो तिनके ,

 

सत्य  शोध   के   नित   अनुरागी , 

बिना  बैर  रहते   वैरागी।

 

ज्ञान दीप ले हर घर घर पर,

जग से घन तम को हर हर कर,

 

दुःख पीड़ा इस जग के सह कर,

जाने जग माया में बह कर।

 

माया सत का व्यव्हार नहीं है ,

जग का किंचित सार नहीं   है ,


पग   पग  में   निस्सार  महीं  है,

ईश्वर   का   विस्तार   नहीं  है।

 

इनके डग डग जग में यूँ रहते,

जग का हो जग  के   ना  होते,

जैसे जल के ऊपर तल पर ,

पंक तल से निकल निकल कर।

 

कमल निखर कर जो सुख  देता,

वैसे हीं  जिनका  मुख  होता,

 

मुख से जिनके  विणा बहती ,

ज्ञान सुधा जग मग जग करती।

 

जो सच का बस मंथन  करते ,

जो  नश्वर  जग  से ईश्वर वरते,

 

उनके  पग  कविता  धरता  हूँ ,

उनके हित  कविता रचता  हूँ ।

वैसा हीं निदान रहे

 किस राह के हो अनुरागी ,

देहासक्त हो या कि त्यागी?


जीवन का क्या हेतु परंतु ,

चित्त में इसका भान रहे ,


किंचित कोई परिणाम रहे,

किंचित कोई परिणाम रहे।

है प्रयास में अणुता तो क्या,

ना राह में ऋजुता तो क्या?


प्रभु की अभिलाषा में किंतु ,

ना हो लघुता ध्यान रहे ,


किंचित कोई परिणाम रहे,

किंचित कोई परिणाम रहे।

कितनी प्रज्ञा धूमिल हुई है ?

अंतस्यंज्ञा घूर्मिल हुई है ?


अंतर पथ अवरोध पड़ा ,

कैसा किंतु अनुमान रहे ,


किंचित कोई परिणाम रहे,

किंचित कोई परिणाम रहे।

बुद्धि शुद्धि या तय कर लो ,

वाक्शुद्धि चित्त लय कर लो ,


दिशा भ्रांत हो बैठो ना मन,

संशुद्धि संधान रहे ,


किंचित कोई परिणाम रहे,

किंचित कोई परिणाम रहे।



कर्मयोग कहीं राह सही है ,

भक्ति की कहीं चाह बड़ी है,


जिसकी जैसी रही प्रकृत्ति ,

वैसा हीं निदान रहे।


किंचित कोई परिणाम रहे,

किंचित कोई परिणाम रहे।

आनंद हीं बाधा है

 

तूने रूप छोड़ा,

रंग छोड़ा।

स्वाद छोड़ा ,

गंध छोड़ा।

 

राग भी ,

विराग भी,

प्यार भी,

और त्याग भी।

 

मिथ्या,

संसार छोड़ा,

झूठा,

आचार छोड़ा।

 

अब झूठ से

विरक्त हो,

न सत्य से

आसक्त हो।

 

ये सत्य है,

अनासक्त हो,

फिर भी आनंद से,

विरक्त हो ?

पर ध्यान भी तो,

नाव है,

क्यों रत इनमे

पाव है ?

 

कि तप छोड़ो,

त्याग भी,

ये राग भी,

वैराग भी।

 

आनंद हीं बाधा है,

आनंद की चाह में।

तेरा ईश्वर रोड़ा बना है,

ईश्वर की राह में।

एक प्रतिबिंबित दर्पण

क्या है एक आदमी । दिन  भर प्रेम , नफरत , आशा , निराशा , इर्ष्या , उत्साह इत्यादि अनेक भावनाओं के समंदर में गोते रहने के अलावा करता हीं क्या है ? और ये भावनाएं आती कहाँ से , ये भावनाएं होती है ? ये सारी आशाएं , भावनाएं आदमी पर आरोपित किये गए विचारों के प्रतिफलन मात्र हीं तो है और आदमी क्या है  एक दर्पण की भांति यंत्रवत प्रतिफलन और प्रतिक्षेपित करता मात्र एक यंत्र ।

  

प्यार करोगे,

तो एक प्रेमी

गर दुलार,

तो हूँ मैं स्नेही।

 

नफरत, तिरस्कार का ,

इबादत, उपकार का ।

हताश हूँ, फटकार पे ,

निराश हूँ, दुत्कार पे ।

 

उपहास से हूँ, क्लेशग्रस्त ,

और परिहास से, द्वेषत्रस्त ।

अनादर पे, रोष हूँ मैं ,

प्रसंशा पे, मदहोश हूँ मैं ।

 

हार का, संताप हूँ ,

जीत का, उल्लास हूँ ।

सम्मान हूँ, जहाँ आदर है ,

अभिमान हूँ, जहाँ सादर है ।

 

भरोसे का विश्वास हूँ मैं ,

उत्साही की आस हूँ मैं ।


भावों के संसार निरंतर,

और इनके संप्रेषण ।

कर रहा परिलक्षित हूँ मैं,

एक प्रतिबिंबित दर्पण ।

खुद से तेरा युद्ध पड़ा है

 

दृढ़ निश्चयी अनिरुद्ध अड़ा है

ना कोई विरुद्ध खड़ा है।


जग की नज़रों में काबिल पर

चेतन अंतर रूद्ध डरा है।

 

घन तम गहन नियुद्ध पड़ा है

चित्त किंचित अवरुद्ध बड़ा है।


अभिलाषा के श्यामल बादल

काटे क्या अनुरुद्ध पड़ा है।


स्वयं जाल ही निर्मित करता

और स्वयं ही क्रुद्ध खड़ा है।


अजब द्वंद्व है दुविधा तेरी

मन चितवन निरुद्ध बड़ा है।


तबतक जगतक दौड़ लगाते

जबतक मन सन्निरुद्ध पड़ा है।


किस कीमत पे जग हासिल है

चेतन मन अबुद्ध अधरा है।


अरि दल होता किंचित हरते

निज निज से उपरुद्ध अड़ा है।


किस शिकार का भक्षण श्रेयकर

तू तूझसे प्रतिरुद्ध पड़ा है।


निज निश्चय पर संशय अतिशय

मन से मन संरुद्ध लड़ा है।


मन चेतन संयोजन क्या जब

खुद से तेरा युद्ध पड़ा है।

My Blog List

Followers

Total Pageviews