हिंदी कोष:हिंदी कविताओं और कहानियों की पत्रिका
इस ब्लॉग पे प्रस्तुत सारी रचनाओं (लेख/हास्य व्ययंग/ कहानी/कविता) का लेखक मैं हूँ तथा ये मेरे द्वारा लिखी गयी है। मेरी ये रचना मूल है । मेरे बिना लिखित स्वीकीर्ति के कोई भी इस रचना का, या इसके किसी भी हिस्से का इस्तेमाल किसी भी तरीके से नही कर सकता। यदि कोई इस तरह का काम मेरे बिना लिखित स्वीकीर्ति के करता है तो ये मेरे अधिकारों का उल्लंघन माना जायेगा जो की मुझे कानूनन प्राप्त है। (अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित :Ajay Amitabh Suman:All Rights Reserved)
Wednesday, October 14, 2026
भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता?
हा हा ही ही, हू हू हू!
Tuesday, October 13, 2026
खर्र-खर्र, खर्र-खर्र,खर्र... खर्राटा!
छींक तू बड़ा सताती
Friday, October 2, 2026
ओ खुजली
गांडीव की टंकार
वन में तपकर लौह हुई जो, वो ज्वाला फिर आई है।
जिसे समझकर मौन तपस्वी तुमने किया उपहास,
वही धनंजय खड़ा सामने, लिये प्रलय का पाश!
भूख मिली तो धैर्य मिला, संकट से भीषण बल आया।
धर्मराज का अनुज धनंजय, धर्म मर्म रखवाला हूँ।
अब तक धूल सही है वन की, अब रण-धूल उड़ाऊँगा,
संख्या का अभिमान न करना, बाण हमारे बोलेंगे,
आज प्रत्यंचा की ध्वनि से रणभूमि ये दहकेगी।
नक़ाफी है शायद मेरा इंसान होना
Thursday, October 1, 2026
पापा की यादें
नींद कहाँ अब आती हमको, ख़ुद को रोज़ सुलाने में।।
आँगन में तब अनुशासन था, पापा का तब क्रोध रहा,
उनकी डाँट में प्यार छिपा था, मुझको राह दिखाने में।
आज वही आँगन सूना है , आँगन जैसे मौन हुआ है ,
मन उनको अब ढूँढ़ रहा है, सूने घर को बगियाने में।।
पाँव थकें तो यादें आतीं, उनकी राह बताने में।।
क्या-क्या खोया मैंने आखिर, आगे बढ़ते जाने में।।
कैसे मन की बात बताऊँ, दिल की पीड़ जताने में।।
हर धड़कन में नाम रहेगा, सुख-दुख के अफ़साने में।।
क्या खूब अख़्तियार है
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
नशा चढ़ता है और दिखने लगता उसपे असर।
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
नशा बढ़ता है तो बढ़ती है अदब की रौशनी,
हर अजनबी में देखे फिर इंसान की ज़िंदगी।
वो सुनता है ख़ामोशी को, बड़े गौर से जनाब,
ना काटे किसी की ना करे किसी की ख़राब।
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
मयख़ाने में पूछो तो हर शख़्स का अफ़साना है,
किसी के हाथ में जाम है, तो दिल में पैमाना है,
कोई पीकर खोए ख़ुद को कोई चुकाए अपना हिसाब,
कोई जाम से बिगड़ जाए, पर ये सीखता आदाब।”
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
न आँखों में गुरूर आए, न लहजे में कोई ख़राबी,
न होंठों पर शोर कोई, न बातों में कोई बेताबी।
जाम हाथ में आए तो उसके दिल हो जाए साफ़ ,
कि वो दूर था खुद से आज आ गया ख़ुद के पास
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
ओ मृगतृष्णा की रेखा
अरी मन की प्रथम तरंग, तू कौन अनाम कहानी,
क्षण में सावन बरसा दे, क्षण में नयन में पानी।
ओ स्मृति-वन की मृगनयनी, री बीते क्षण की छाया,
जिसको पाया, उसको खोया, खोया तो फिर माया।
अरी अभिलाषा की चपला, ओ मृगतृष्णा की रेखा,
दूर क्षितिज तक दौड़ लगाती, पास न आए लेखा।
कभी गगन में उड़ती जाती, कभी धूल में गिर जाती,
एक कण में विश्व समेटे, विश्व मिले तो भरमाती।
तू ही स्वप्न सजाती मन में, तू ही स्वप्न मिटाती,
तू ही दीप जलाती भीतर, तू ही आँधी बन जाती।
हे इच्छा की अनगिन शाखा, तृष्णा तेरा विस्तार,
एक मिले तो दूजा माँगे, कब थमे यह व्यापार?
रे मन! तेरा कौन किनारा, कौन तेरा विस्तार,
कहाँ रुके तेरी गति कभी, कहाँ रुके विचार?
तर्क-शिखर पर चढ़ता मन, भाव-सलिल में बहता,
एक पुरानी स्मृति की चिनगी, अंतर-वन में दहता।
जितना बाँधूँ, उतना छूटे, जितना रोकूँ भागे,
दमन-जाल में फँसा मन ही, प्रतिरोध की ज्वाला जागे।
अरी विस्मृति! तू क्या मिटाए इस चंचल मन की गति?
जिसे दबाया, वही उभरा; जिसे समझा, वहीं मुक्ति।
न मन को जीत, न मन को बाँध, उसकी गति पहचान,
जिस क्षण मन को समझ लिया, खुल गया निज विधान।
तब जाना—मन शत्रु नहीं, यह मन ही मन का साथी,
जिसे समझा, वह शांत हुआ, मिटने लगी व्यथा सारी।
Wednesday, September 30, 2026
मरने को बेताब भी
आदमी को समझना आसान नहीं है।वह जैसा दिखाई देता है, हमेशा वैसा होता नहीं।कभी वह अपने भीतर की आवाज़ सुनता है,और कभी उसी आवाज़ से बचता रहता है।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
खुद को पहचानने की फुर्सत नहीं मगर,
दुनिया समझने की रखता है ख्वाब भी।
इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।
शायद इसी उलझन का नाम ज़िंदगी है।इंसान बाहर बहुत कुछ खोजता रहता है,जबकि कुछ सवाल उसके भीतर ही बैठे होते हैं।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
[अंतरा — शहर और भटकाव]
शहर को भटकता, तन्हाई ना मिटती,
रात के सन्नाटों में रखता है आग भी।
पढ़ के हीं सीख ले ये चीज़ नहीं आदमी,
ठोकर के जिम्मे नसीहतें किताब भी।
वक़्त को गंवाता है कल के भरोसे पर,
वक़्त से माँगता बीता हुआ हिसाब भी।
वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता।हम अक्सर यह बात तब समझते हैं,जब लौटकर देखने के लिए बहुत कुछ पीछे छूट चुका होता है।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
[अंतरा — भावनाएँ और दूरी]
दिल की जज़्बातों को रखना ना मुमकिन,
लफ़्ज़ों में भर के पहुँचाता आवाज़ भी।
जो पास है उसकी कदर नहीं है इसको,
जो दूर है उसे देखता जैसे आफ़ताब भी।
अँधेरों में छुपता है आदमी ये जान कर,
चाँदनी है अच्छी पर दिखते हैं दाग भी।
जिसे हम अपने सबसे करीब समझते हैं,कई बार उसी को सबसे कम समझ पाते हैं।दूरी हमेशा जगह की नहीं होती।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
[अंतरा — स्वयं से संघर्ष]
खुद से अकड़ता है, खुद से ही लड़ता,
जाने ज़िद कैसी है, कैसा रुआब भी।
इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।
आदमी दुनिया से जीतने की कोशिश करता है।लेकिन सबसे लंबी लड़ाई अक्सर अपने आप से होती है।और उसका कोई दर्शक नहीं होता।
शौक भी तो पाले हैं, दारू शराब क्या,
जीने की ज़िद पे मरने को बेताब भी।
कभी-कभी इंसान जीवन को समझते-समझते उसे जीना ही भूल जाता है।फिर अचानक उसे एहसास होता है कि समय कितना आगे निकल चुका है।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
[समापन — धीमा, लगभग बातचीत की तरह]
जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।
शायद आदमी ऐसा ही है।वह विरोधाभासों से बना हुआ है।उसके भीतर प्रेम भी है, क्रोध भी;उम्मीद भी है और निराशा भी।वह खुद को ढूँढ़ता रहता है,और उसी तलाश में पूरी उम्र गुज़ार देता है।
इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।
सवाल शायद खत्म नहीं होंगे।जवाब भी हमेशा पूरे नहीं मिलेंगे।लेकिन शायद इंसान होने का अर्थ ही यही है—चलते रहना, पूछते रहना,और अपने भीतर झाँकते रहना।
जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
खुद को समझने की फुर्सत नहीं मगर,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
शहरों में भटकन तन्हाई की आग है,
पढ़ के हीं सीख ले ये चीज नहीं आदमी,
ठोकर पर गिरकर हीं सीख लेता आदमी।
ज़ख़्मों से पूछता है दवा और इलाज भी।
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
लफ्जों में भर के रखता है कई राज।
जो पास है उसकी कदर नहीं है इसको ,
जो दूर है आफ़ताब समझता है उसको।
खुद से अकड़ता है खुद से हीं लड़ता,
Monday, September 28, 2026
मैं मिट्टी और बीज
मैं कौन?
ये मिट्टी?
मिट्टी से बीज,
बीज से तना,
तने से शाखें,
शाखों से पत्ती,
पत्ती से कली,
कली से फूल,
फूल से फल,
फल से अन्न,
अन्न से रक्त,
रक्त से कोशिका,
कोशिका से ऊतक,
ऊतक से मांस,
मांस से पेशी,
पेशी से मज्जा,
मज्जा से अस्थि,
अस्थि से देह,
देह से श्वांस,
श्वांस से प्राण,
प्राण से कौन,
मैं कौन।
यक्ष प्रश्न
गूढ़ गहन
मै कौन
देह से इंद्रियाँ,
इंद्रियों से अनुभूति,
अनुभूति से संवेदना,
संवेदना से भावना,
भावना से इच्छा,
इच्छा से संकल्प,
संकल्प से कर्म,
कर्म से अनुभव,
अनुभव से स्मृति,
स्मृति से विचार,
विचार से बुद्धि,
बुद्धि से विवेक,
विवेक से प्रश्न,
प्रश्न से जिज्ञासा,
जिज्ञासा से खोज,
खोज से ज्ञान,
ज्ञान से बोध,
बोध से दृष्टि,
दृष्टि से सत्य,
सत्य से मौन,
मौन से कौन
मैं कौन।
यक्ष प्रश्न
गूढ़ गहन
मै कौन
विचार से अहंकार,
अहंकार से ‘मैं’,
‘मैं’ से मेरा,
मेरा से मोह,
मोह से ममता,
ममता से भय,
भय से इच्छा,
इच्छा से संघर्ष,
संघर्ष से पीड़ा,
पीड़ा से प्रश्न,
प्रश्न से विरक्ति,
विरक्ति से शून्य,
शून्य से कौन
मैं कौन।
यक्ष प्रश्न
गूढ़ गहन
मै कौन
स्मृति से अतीत,
अतीत से कथा,
कथा से पहचान,
पहचान से नाम,
नाम से संबंध,
संबंध से संसार,
संसार से भूमिका,
भूमिका से चेहरा,
चेहरे से व्यक्तित्व,
व्यक्तित्व से चरित्र,
चरित्र से कर्म,
कर्म से परिणाम,
परिणाम से भाग्य,
भाग्य से प्रश्न
प्रश्न से कौन
मैं कौन।
यक्ष प्रश्न
गूढ़ गहन
मै कौन
शब्द से अर्थ,
अर्थ से भाषा,
भाषा से विचार,
विचार से संवाद,
संवाद से संबंध,
संबंध से प्रेम,
प्रेम से समर्पण,
समर्पण से भक्ति,
भक्ति से प्रार्थना,
प्रार्थना से मौन,
मौन से पुकार,
पुकार से उत्तर,
उत्तर पर मौन
मैं कौन।
यक्ष प्रश्न
गूढ़ गहन
मै कौन
श्वांस से जीवन,
जीवन से समय,
समय से क्षण,
क्षण से दिन,
दिन से रात,
रात से स्वप्न,
स्वप्न से जागरण,
जागरण से चेतना,
चेतना से साक्षी,
साक्षी से दृष्टा,
दृष्टा पर मौन
मैं कौन।
यक्ष प्रश्न
गूढ़ गहन
मै कौन
=====
वो हूँ मैं
जो
जो परे है
क्या से
कहाँ से
जहां से
कब से
जब से
तब से
कौन से
मौन से
रूप से
रंग से
गंध से
स्पर्श से
शब्द से
निःशब्द से
विचार से
अविचार से
आकार से
निराकार से
विकार से
निर्विकार से
नाम से
अनाम से
रूप से
अरूप से
दृश्य से
अदृश्य से
ज्ञात से
अज्ञात से
सत्य से
असत्य से
होने से
न होने से
पूर्णता से
अपूर्णता से
शून्यता से
पूर्णता से
सीमा से
असीमा से
बंध से
निर्बंध से
जन्म से
अजन्म से
जीवन से
निर्जीव से
मृत्यु से
अमृत से
अंधकार से
प्रकाश से
रात से
दिन से
धरती से
आकाश से
श्वास से
निःश्वास से
ध्वनि से
प्रतिध्वनि से
एक से
अनेक से
अनेक से
एक से
मैं से
तू से
तू से
मैं से
पास से
दूर से
दूरी से
निकटता से
प्रेम से
विरह से
मिलन से
बिछोह से
प्रश्न से
उत्तर से
उत्तर से
अनुत्तर से
चलने से
ठहरने से
समय से
कालातीत से
आरंभ से
अंत से
अंतहीन से
क्षण से
अनंत से
स्मृति से
विस्मृति से
मौन से
महामौन से
जो दिखता है
जो छिपा है
जो कहा है
जो अनकहा है
जो जाना है
जो अनजाना है
जो बना है
जो बिगड़ा है
जो मिटा है
जो बचा है
जो है
बस है
कुछ भी नहीं होते हुए भी
सब कुछ है
जो मैं नहीं हूं
उसके पार
जो मैं हूं
उसके भी पार
जो है
और जो नहीं है
उसके बीच
उसके भी पार
न मैं हूं
न मेरा है
न तेरा है
फिर भी
जो कुछ है
वही है
वो हूं मैं
===
कौन हूँ मैं?
ये मिट्टी?
मिट्टी से बीज,
बीज से तना,
तने से शाखें,
शाखों से पत्ती,
पत्ती से कली,
कली से फूल,
फूल से फल,
फल से अन्न,
अन्न से रक्त,
रक्त से कोशिका,
कोशिका से ऊतक,
ऊतक से मांस,
मांस से पेशी,
पेशी से मज्जा,
मज्जा से अस्थि,
अस्थि से देह,
देह से श्वांस,
श्वांस से प्राण,
प्राण से—
मैं कौन।
यक्ष प्रश्न
गूढ़ गहन
मै कौन
देह से इंद्रियाँ,
इंद्रियों से अनुभूति,
अनुभूति से संवेदना,
संवेदना से भावना,
भावना से इच्छा,
इच्छा से संकल्प,
संकल्प से कर्म,
कर्म से अनुभव,
अनुभव से स्मृति,
स्मृति से विचार,
विचार से बुद्धि,
बुद्धि से विवेक।
प्रशंसा पर
खुश
डाँट पर
दुःख ।
प्रेम में
प्रसन्नता।
ईर्ष्या पर
क्रोध।
भाव से
विचार
भावनाओं का
प्रतिकार ।
फिर कौन
मात्र एक
दर्पण
मैं कौन।
यक्ष प्रश्न
गूढ़ गहन
मै कौन
या कि समय
एक क्षण,
क्षण सेकंड में
सेकंड मिनट में
मिनट घंटा में
घंटा दिन में
दिन सप्ताह में
सप्ताह महीना में
महीना वर्ष में
वर्ष दशक में
दशक सदी में
सदी शताब्दी में
शताब्दी सहस्राब्दी में
सहस्राब्दी अनंत समय में
और
हर सेकंड में
अनगिनत घटनाएँ
अनगिनत लोगों की
राज्यों की
राजाओं की
महाराजाओं की
सभ्यताओं की।
हर एक घटना
एक कहानी।
हर कहानी
एक जीवन।
हर जीवन
एक क्षण।
और उस क्षण में
मैं कौन।
मैं कौन।
यक्ष प्रश्न
गूढ़ गहन
मै कौन
लेकिन
देह बदलती है,
तो तन नहीं
मन बदलता है,
तो मन नहीं
भाव बदलते हैं,
तो भाव नहीं
विचार बदलते हैं,
तो विचार नहीं
स्मृतियाँ बदलती हैं,
तो स्मृति नहीं
नाम बदलता है,
तो नाम नहीं
तो फिर
जो बदलता है
वह मैं नहीं।
जो आता है
वह मैं नहीं।
जो जाता है
वह मैं नहीं।
जो जन्मता है
वह मैं नहीं।
जो मिटता है
वह मैं नहीं।
और जो यह सब
देखता है
वही?
श्वांस आती है।
श्वांस जाती है।
विचार आता है।
विचार जाता है।
खुशी आती है।
दुःख आता है।
प्रेम आता है।
क्रोध आता है।
बचपन आता है।
यौवन आता है।
वृद्धावस्था आती है।
समय आता नहीं—
बस बहता है।
कहानियाँ बनती हैं।
कहानियाँ मिटती हैं।
और—
मैं देखता हूँ।
सबको।
लगातार।
मौन।
अचल।
साक्षी।
कौन
मैं कौन।
यक्ष प्रश्न
गूढ़ गहन
मै कौन
फिर
साक्षी भी एक नाम है।
तो नाम भी गया।
रूप गया।
सीमा गई।
दूरी गई।
स्थान गया।
समय गया।
कहानी गई।
“मेरा” गया।
“मैं” भी—
क्षण भर को
मौन हो गया।
और जब “मैं” भी
मौन हो गया—
तब क्या बचा?
न देह।
न मन।
न भाव।
न विचार।
न स्मृति।
न नाम।
न घर।
न गाँव।
न शहर।
न राज्य।
न देश।
न धरती।
न समय।
न क्षण।
न कहानी।
न सीमा।
न दूरी।
न बाहर।
न भीतर।
न आरंभ।
न अंत।
बस
मौन।
वो कौन
यक्ष प्रश्न
गूढ़ गहन
मै कौन
गहनतम मौन
और
एक बोध।
बिना नाम का।
बिना रूप का।
बिना सीमा का।
कि
जो कुछ था,
जो कुछ है,
जो कुछ होगा—
उससे अलग
मैं कुछ नहीं।
और शायद—
यही खोज थी।
मिट्टी से चला था
“मैं” खोजने।
देह मिली।
मन मिला।
भाव मिले।
स्मृतियाँ मिलीं।
और अंत में
जहाँ पहुँचा—
वहीं से यात्रा शुरू हुई थी।
अपने भीतर।
मिट्टी हूँ मैं।
मिट्टी से आया हूँ।
समय में एक क्षण हूँ।
ब्रह्मांड में एक कण हूँ।
अनंत का एक अंश हूँ।
और वो पूर्ण अनंत भी
जो देखता है सबकुछ
जिसमें घटता है सब कुछ
जो परे है
क्या से
कहाँ से
जहां से
कब से
जब से
तब से
कौन से
मौन से
रूप से
रंग से
विचार से
आकार से
विकार से
नाम से
अनाम से
पूर्णता से
अपूर्णता से
सीमा से
असीमा से
प्रकाश से
आकाश से
जो है
बस है
कुछ भी नहीं होते हुए भी
सब कुछ है
वो हूं मैं
Saturday, September 26, 2026
शिकार हो चले थे
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।
मसरूफ़ थी ये दुनिया, जीना भी मयस्सर,
ये मानकर कि बेफ़िक्र, हज़ार हो चले थे।
छोटी छोटी हारों से दुखता था मेरा मन ।
छोटी छोटी बातों से टूटता था मेरा मन ।
अजीब थी फितरत कि पाकर दो लफ्ज।
प्यार का दिल से शुक्र गुजार हो चले थे।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।
ये जनता था नाम में , रखा कुछ भी नही ।
ये मानता था मान में , रखा कुछ भी नही ।
फिर भी ये ज़िंदगी कि नाम-ओ-निशाँ ख़ातिर।
कभी खुद हीं से खुश नागवार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।
मालूम न था गम के साये मुझपे भी छाएंगे ।
दुःख के बादल के छाये , मुझपे भी आएँगे ।
औरों के दुःख से डर खोली आँख थोड़ी ।
फिर रोते लोगों से , दरकिनार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।
ये बीबी ये बच्चे , ये घर बार ये सपना ।
जाने किस किस को , समझा था मैं अपना ।
पर मौत के बिछावन से हुआ जब रु ब रु ।
ख़ुद ही ख़ुद से हम लाचार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।
जिस ज़िंदगी को समझे थे अपनी अमानत,
सब कुछ तो पास था, पर पास था कहाँ मैं,
दुनिया के हो के आख़िर फ़रार हो चले थे।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।
साँसें थीं, फिर भी जैसे अंदर नहीं था कोई।
जिस्म ने आख़िरी दम जब साथ छोड़ डाला,
अपनी इस हक़ीक़त से दो-चार हो चले थे।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।
जो भी वक़्त मिला था समझना ना आया ।
हम सोच के बड़ा ये खुशगवार हो चले थे ।
दोस्तों के वास्ते
पा पा पे पे टे पे चे टे कीच
चे टे कीच मीच मीच मीच
टा टा टी टी, पा टी चे ची, खीच
ची टी खीच, पीच पीच पीच!
[Bridge]
कभी भी बेहिचक खखार सकते हैं,
बिन वजह यार की टाँग उखाड़ सकते हैं!
लताड़ें, गरियाएँ, करें बेइज़्ज़ती हज़ार,
फिर पूछें—“भाई, नाराज़ तो नहीं मेरे यार?”
किसी को कहें गोलगप्पा, किसी को कहें खोपड़ी,
गंजे को चाँद बोलकर, हँसी उड़ाएँ चौपड़ी!
खी-खी में न शर्म, न आँसू में लिहाज़,
दोस्तों के आगे खुली रहती है हर राज़ की किताब!
जेब में पैसा हो तो रुतबा नवाबी,
बिल आते ही सबकी हालत खराबी!
कोई बोले, “UPI डाउन है यार!”
कोई कहे, “फोन घर पे है इस बार!”
जो सबसे पहले बिल मँगवाता है,
उसी का पर्स अचानक गुम हो जाता है!
[Bridge]
चे चे चा चा, पे चे टे टा, खीच
टे चे खीच, मीच मीच मीच!
धा धा धे धे, टे धे चे थे, कीच
थे चे कीच, ढीच ढीच ढीच!
[Bridge]
उधार लेकर यार जो ग़ायब हो जाए,
फोन उठाते ही आवाज़ बदल जाए!
“भाई, कौन बोल रहा? गलत नंबर है!”
ऐसी दोस्ती का भी अलग ही हुनर है!
लड़ते हैं ऐसे जैसे खानदानी बैरी,
गाली-गलौज में चलती पूरी फेरी!
पर बाहर वाला आँख दिखा दे अगर,
सारे बन जाते हैं बाहुबली उसी पहर!
खुद कांड करके यार को फँसाते हैं,
पूछो तो सब अनजान बन जाते हैं!
डाँट पड़े तो नज़रें मिलाकर मुस्काएँ,
जैसे थाने में पिकनिक मनाने आएँ!
[Bridge]
पा पे पी पो, चे टे ची टो, खीच
ची टो खीच, मीच मीच मीच
टे टे टा टा, चे टा पे पा, कीच
पे चे कीच, खीच खीच खीच!
[Bridge]
रात के दो बजे फोन बजाएँ,
“भाई, जाग रहा है?” प्यार जताएँ।
कहो, “मर रहा हूँ, सोने दे यार!”
बोलें, “अच्छा, सुन… बस एक छोटा-सा काम है इस बार!”
दुख में कंधा, सुख में पार्टी,
शादी में दूल्हे की जेब पर मारें आरी!
खुद खाएँ, पिएँ, उड़ाएँ माल,
फिर कहें—“भाई, दोस्ती में कैसा हिसाब-किताब!”
कमरे में घुसते ही तूफ़ान मचाते हैं,
फ्रिज का माल सफ़ाचट कर जाते हैं!
जाते-जाते ज्ञान दे जाते हैं—
“घर अपना ही है, फिर आएँगे!” कह जाते हैं!
[Bridge]
ची ची चे चे, पा चे टे टे, मीच
टे पा मीच, कीच कीच कीच!
पा पा टे टे, चे पे कीच कीच
मीच मीच मीच, खीच खीच खीच!
[Bridge]
न कोई फॉर्मैलिटी, न कोई लिहाज़,
गाली में प्यार और बेइज़्ज़ती बेहिसाब!
दुनिया कहे हमें बेशर्मों की टोली,
हमारी यारी सबसे निराली, सबसे अलबेली!
न दौलत चाहिए, न शोहरत का सवाल,
बस यार साथ हों तो हर दिन धमाल!
मुसीबत में सबसे पहले यही आते हैं,
बाकी दुनिया को बाद में फोन लगाते हैं!
दोस्त वही जो इज़्ज़त का कचरा कर जाए,
फिर कंधे पर हाथ रखकर मुस्काए—
“भाई, बुरा मत मानना…
अपना ही तो है रे!
[Bridge]
पा पा पे पे, चा ची चू चाच, टे पे चे टे,
कीचम कीचम कीच! मीच मीच माच,
पीच पीच पाच, चे टे कीच, खीच खीच खीच!
क से काली नहीं
क से काली नहीं—
कौआ लिखो!
ग से गणेश नहीं—
गिद्ध लिखो!
भ से भोले नहीं—
भैंस लिखो!
प से पैगम्बर नहीं—
पाड़ा लिखो!
क से कौआ—
सामान्य!
क से काली—
सावधान!
ग से गिद्ध—
प्राकृतिक!
ग से गणेश—
धार्मिक!
भ से भैंस—
प्राणी!
भ से भोलेनाथ—
आस्था की कहानी
प से पाड़ा—
शब्द!
प से पैगम्बर—
मजहब!
अक्षर वही—
ध्वनि वही—
व्याकरण वही—
फिर यह अंतर क्यों?
क्यों भाई?
अक्षर तो वही था,
वाणी भी वही थी—
फिर नाम बदलते ही
नियम क्यों बदल गया?
कहानी क्यों बदल गई
क्यों
कौआ—धर्मनिरपेक्ष,
गिद्ध—धर्मनिरपेक्ष,
भैंस—धर्मनिरपेक्ष,
गधा—धर्मनिरपेक्ष!
और काली से धर्म ,
गणेश से आस्था मर्म
भोले आए—भक्ति तब
पैगम्बर आए—मजहब!
शायद
कौआ आया—सबका निकला,
गिद्ध आया—प्रकृति महान;
गधा आया—सर्वधर्मनिरपेक्ष,
क्योंकि उसका कोई धर्म नहीं—
या शायद कोई पहचान नहीं!
क्योंकि जात पूछकर
गिद्ध नोचते नहीं
झपटते वक्त किसी का क्या मजहब है
सोचते नहीं
और गधा ,भैंस
कुछ भी समझते नहीं
उनके लिए सारे धर्म
सारे मजहब
सारी जाति
होती है एक बराबर
प्रश्न न काली का है,
न गणेश का,
न पैगम्बर का,
न भोलेनाथ का।
प्रश्न तो कौवों का है
प्रश्न भैसों का है
प्रश्न गधों का है
प्रश्न गिद्धों का है
क्योंकि
ये पाए जाते हैं हर धर्म में
कौआ न हिन्दू, न मुसलमान,
गिद्ध न मंदिर, न मस्जिद जान;
गधा न पूछे जात-पंथ
“कौआ धर्म से ऊपर,
गिद्ध मजहब से पार,
गधा सबसे निष्पक्ष
इसलिए ये सारे होते हैं निष्पक्ष!
धर्म निरपेक्ष।
इसीलिए धर्म निरपेक्षता महान
क्योंकि कौआ,गिद्ध और गधा
रचते इसका विधान।
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