Monday, July 20, 2026

प्रश्नोत्तर

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वकील:
हे वासुदेव! एक शंका आज भी मेरे मन को उद्वेलित करती है। आपने धर्म की स्थापना के लिए महाभारत का युद्ध कराया। युद्ध के उपरान्त कर्णपुत्र वृषकेतु पाण्डवों के साथ रहा। वह आयु में परीक्षित से बड़ा था और संबंध में उसका चाचा भी था। फिर जब महाराज युधिष्ठिर ने राज्य त्यागकर महाप्रस्थान किया, तब हस्तिनापुर का सिंहासन वृषकेतु को न देकर परीक्षित को क्यों सौंपा? क्या धर्म यह नहीं कहता कि ज्येष्ठ को अधिकार मिलना चाहिए?

श्रीकृष्ण:
वत्स, तुमने दो बातों को एक मान लिया है—रक्त-संबंध और राज्य का वैधानिक उत्तराधिकार। धर्म में दोनों सदैव एक जैसे नहीं होते।

वकील:
किन्तु कर्ण तो कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र था। जब यह सत्य सबके सामने आ गया, तब उसके पुत्र वृषकेतु का अधिकार पहले क्यों नहीं माना गया?

श्रीकृष्ण:
यदि केवल जन्म का सत्य जान लेने से राज्य का उत्तराधिकार बदल जाता, तो सबसे पहले युधिष्ठिर को अपना राज्य छोड़ देना चाहिए था। किन्तु ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि राजधर्म जन्म के गुप्त सत्य पर नहीं, स्थापित राज्य-व्यवस्था पर चलता है।

कर्ण जन्म से कुन्तीपुत्र अवश्य था, परन्तु उसने सम्पूर्ण जीवन स्वयं को सूतपुत्र और अंगराज के रूप में स्वीकार किया। वह हस्तिनापुर का युवराज कभी नहीं बना, न उसका राज्याभिषेक हुआ और न ही उसने कभी सिंहासन का दावा किया।

इसलिए उसके पुत्र वृषकेतु को भी हस्तिनापुर पर वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हुआ।

वकील:
तो क्या ज्येष्ठता का कोई मूल्य नहीं?

श्रीकृष्ण:
ज्येष्ठता का मूल्य है, किन्तु जहाँ उत्तराधिकार की वैधानिक परम्परा विद्यमान हो, वहाँ केवल आयु या रक्त-संबंध से अधिकार नहीं बदल जाता।

हस्तिनापुर की उत्तराधिकार-रेखा थी—

शांतनु → विचित्रवीर्य → पाण्डु → अर्जुन → अभिमन्यु → परीक्षित।

इसी परम्परा का अंतिम जीवित उत्तराधिकारी परीक्षित था।

कर्ण उसी कुल में जन्मे अवश्य थे, किन्तु वे उस उत्तराधिकार-श्रृंखला में कभी स्थापित नहीं हुए। अतः वृषकेतु उस वैधानिक श्रृंखला का उत्तराधिकारी नहीं बन सकता था।

वकील:
परन्तु धर्म तो न्याय भी चाहता है। क्या वृषकेतु के साथ न्याय हुआ?

श्रीकृष्ण:
न्याय का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक योग्य व्यक्ति को सिंहासन ही मिले।

युधिष्ठिर ने वृषकेतु का तिरस्कार नहीं किया। अर्जुन ने उसे पुत्रवत् अपनाया, अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी और उसे सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठित किया। उसके साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं हुआ।

किन्तु यदि हस्तिनापुर का सिंहासन वृषकेतु को दे दिया जाता, तो भविष्य में प्रत्येक राज्य में गुप्त जन्म, रक्त-संबंध और नए दावों के आधार पर गृहयुद्ध आरम्भ हो जाते। तब राजधर्म नष्ट हो जाता।

वकील:
अर्थात् युधिष्ठिर ने व्यक्ति नहीं, व्यवस्था को बचाया?

श्रीकृष्ण:
यही सत्य है।

धर्म का उद्देश्य केवल किसी एक योग्य व्यक्ति को सम्मान देना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है जिससे आने वाली पीढ़ियों में अराजकता न फैले।

यदि भावनाओं के कारण उत्तराधिकार बदल दिया जाता, तो धर्म की रक्षा नहीं होती, बल्कि धर्म संकट में पड़ जाता।

वकील:
तो क्या यह कहा जा सकता है कि वृषकेतु सम्मान का अधिकारी था, किन्तु सिंहासन का नहीं?

श्रीकृष्ण:
हाँ वत्स।

वृषकेतु को पाण्डवों ने स्नेह, सम्मान और संरक्षण दिया, क्योंकि वह कर्ण का पुत्र था और वीर था।

किन्तु हस्तिनापुर का सिंहासन परीक्षित को मिला, क्योंकि वह कुरुराज्य की वैधानिक उत्तराधिकार-परम्परा का अंतिम अधिकारी था।

वकील:
अब मैं समझ गया, प्रभु। धर्म केवल यह नहीं देखता कि कौन बड़ा है; वह यह भी देखता है कि किसे अधिकार देना समस्त राज्य और समाज के लिए हितकारी होगा।

श्रीकृष्ण (मुस्कराकर):
वत्स, यही राजधर्म का सार है—

"जहाँ केवल संबंध देखकर निर्णय लिया जाए, वहाँ पक्षपात जन्म लेता है; जहाँ केवल व्यवस्था देखकर निर्णय लिया जाए, वहाँ कठोरता जन्म लेती है; पर जहाँ व्यवस्था और लोककल्याण दोनों का संतुलन हो, वहीं धर्म प्रकट होता है।"

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प्रश्नकर्ता: हे श्रीकृष्ण! एक बात मेरी समझ में नहीं आती। भीम और जरासंध का युद्ध अठारह दिनों तक चला। आपको तो पहले दिन से ही ज्ञात था कि जरासंध का वध कैसे होगा, फिर आपने भीम को वह उपाय पहले ही क्यों नहीं बताया?

श्रीकृष्ण: हे प्रिय! यदि मेरा उद्देश्य केवल जरासंध का वध कराना होता, तो वह प्रथम दिन ही हो जाता। परंतु मेरा उद्देश्य केवल एक व्यक्ति का अंत करना नहीं था, बल्कि संसार के सामने दो महायोद्धाओं का वास्तविक सामर्थ्य प्रकट करना भी था।

प्रश्नकर्ता: लेकिन प्रभु, यदि परिणाम पहले से निश्चित था, तो अठारह दिन तक युद्ध कराने की आवश्यकता ही क्या थी?

श्रीकृष्ण: क्योंकि जरासंध कोई साधारण राजा नहीं था। वह अपने समय का महान पराक्रमी, अद्वितीय गदायुद्ध का महारथी और असाधारण बल का स्वामी था। अनेक राजाओं को उसने अपने पराक्रम से पराजित किया था। यदि मैं पहले ही दिन उसका रहस्य बता देता, तो लोग कहते—"जरासंध अपनी शक्ति से नहीं हारा, वह तो केवल उसके जन्म के रहस्य के कारण मारा गया।" इससे उसके पराक्रम का सम्मान नहीं होता।

प्रश्नकर्ता: तो क्या उन अठारह दिनों का युद्ध जरासंध के सम्मान के लिए भी था?

श्रीकृष्ण: केवल उसके सम्मान के लिए ही नहीं, भीम के यश के लिए भी। संसार को यह देखना आवश्यक था कि भीम और जरासंध बल, साहस और धैर्य में एक-दूसरे के समकक्ष हैं। जब अठारह दिनों तक कोई किसी को परास्त न कर सका, तब यह सिद्ध हो गया कि सामान्य युद्ध से निर्णय संभव नहीं था।

प्रश्नकर्ता: तब आपने संकेत क्यों दिया?

श्रीकृष्ण: क्योंकि तब समय आ चुका था। जब पुरुषार्थ अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया और यह स्पष्ट हो गया कि बल से नहीं, केवल उसके जन्म के रहस्य को समझकर ही युद्ध समाप्त हो सकता है, तभी मैंने संकेत दिया। तब विजय केवल मेरी युक्ति की नहीं, भीम के अद्वितीय पराक्रम, धैर्य और अठारह दिनों के पुरुषार्थ की भी थी।

प्रश्नकर्ता: प्रभु, क्या यही शिक्षा हमारे जीवन पर भी लागू होती है?

श्रीकृष्ण: निश्चय ही। मैं जीवन में भी तुम्हें समाधान तुरंत नहीं देता। पहले तुम्हें अपनी पूरी शक्ति, धैर्य और पुरुषार्थ का प्रयोग करने देता हूँ। जब तुम्हारा प्रयास पूर्ण हो जाता है, तब मैं वह संकेत देता हूँ जो तुम्हें विजय तक पहुँचा देता है। स्मरण रखो—बिना पुरुषार्थ के मिला उपाय केवल सुविधा देता है, पर पुरुषार्थ के बाद मिला उपाय स्थायी विजय और यश देता है।
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Monday, June 22, 2026

हास्य


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20   .विनम्र 

शिष्य : मैं बहुत विनम्र हूँ।

गुरु  :नहीं , तुम्हे विनम्र होने का घमंड है .

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19   .मुक्ति 

शिष्य : मुक्ति क्या है?

गुरु  : जब पड़ोसी की कार देखकर आसानी से नींद आ जाये .

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18  .कठिन 

शिष्य : जीवन इतना कठिन क्यों है?"

गुरु  :इसे आसन बनाने का प्रयास छोड़ दो .

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17   .व्यस्त 

शिष्य : मैं सत्य का खोजी हूँ।

गुरु  :बस बिजली बिल आते हीं छुप जाते हो .

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15  .भटकन 

शिष्य :मेरा मन बहुत भटकता है। क्या करूँ ?

गुरु  :अपने घर का रास्ता हमेशा याद रखना .

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14  .डिस्काउंट 

शिष्य : मुझे मोक्ष चाहिए .

गुरु  : पहले दान दो , स्वर्ग में डिस्काउंट नहीं मिलता .

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13  .जीत 

शिष्य :मैं हार गया।

गुरु  :तुम्हारा अहंकार हारा है , तुम तो जीत गए .

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12  .बदलाव 

शिष्य :मैं दुनिया बदलना चाहता हूँ .

गुरु  :पहले इस सोच को बदलो .

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11 .कौन 

शिष्य :मैं कौन हूँ?

गुरु  :पहले ये जान लो तुम क्या नहीं हो .

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10 .भविष्य 

शिष्य : मैं भविष्य जानना चाहता हूँ .

गुरु  :पहले वर्तमान में रहना तो जान लो .

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9.माया 

शिष्य : माया क्या है?

गुरु  :सेल में गैर-ज़रूरी चीज़ खरीद लेना।

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8.सत्यान्वेषण 

शिष्य : मैं सत्य की रह पर निकलना चाहता हूँ .

गुरु  : अच्छा है . पहले मोबाइल साइलेंट मोड पर कर लो .

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7. उलझन 

शिष्य :मेरा मन उलझन में हैं .

गुरु  :बधाई हो , तुम सोचने लगे . 

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6.बेरोजगार 

शिष्य : मेरी बेरोजगारी मुझे चिंतित करती है .

गुरु  : स्वयं को पूर्ण समझो और कल की चिंता स्वयं बेरोजगार हो जाएगी .

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5.शार्ट कट 

शिष्य : ज्ञान प्राप्त करने का सबसे छोटा मार्ग क्या है .

गुरु  :इस छोटे मार्ग को त्यागना .

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4.शांति 

शिष्य :आज के ज़माने में कैसे शांत रह सकते हैं ?

गुरु  :वाई फाई से लड़ना बंद कर दो .

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3.महानता  

शिष्य :मुर्खता क्या है ?

गुरु  :कोई अपनी महानता सिद्ध करने के लिए पहाड़ पर चढ़ जाता है और पहाड़ को इसका पता भी नहीं चलता .

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2.खोज 

शिष्य : कोई स्वयं को जान क्यों नहीं पाता ?

गुरु  :क्योंकि स्वयं को जानने को खोज आईने से नहीं होती.

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2.सत्य 

शिष्य:"गुरुदेव, आपने महल छोड़कर कठोर तपस्या की। आखिर आपको क्या मिला?"

बुद्ध : "मुझे उस सत्य का बोध हुआ, जो हर जीव और हर स्थान में सदैव विद्यमान है।"

शिष्य: "यदि वही सत्य महल में भी था, तो उसे पाने के लिए आपने महल छोड़ा क्यों , क्या ये आवश्यक था?"

बुद्ध:सत्य को पाने के लिए महल छोड़ना आवश्यक नहीं था, आवश्यक था मेरे मन के भीतर बैठे हुए महल को छोड़ना।  जिसने मन का महल छोड़ दिया, उसके लिए महल भी तपोवन है; और जिसने मन का महल नहीं छोड़ा, उसके लिए तपोवन भी एक महल हीं है।" मेरे द्वारा महल का त्याग स्थान का त्याग  नहीं बल्कि मन का था जो कि सत्य की प्राप्ति हेतु आवश्यक था।

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 1. समाधि 

शिष्य  : समाधि कब घटित होती है ?

गुरु  :जब तुम चश्मा पहनकर चश्मा ढूँढना बंद कर देते हो तब .

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Friday, June 19, 2026

पुश अप Vs पेंच

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Lawfer No.3 मुर्दा Vs जिंदा

वकील: जज साहब मुझसे एक डेडली मिस्टेक हो गई।
जज: उसी ने आपके केस को डेड कर दिया और मुर्दे को जिंदा कैसे करूं?
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Lawfer No 2. झूठ Vs लीगली करेक्ट

वकील 1: वकील कभी इलीगल चीजें नहीं छुपाता।
वकील 2: बस उसे लीगली करेक्ट कर देता है।
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Lawfer No 1.  डेट Vs केस

"वकील 1:नो पेन नो गेन ये है मेरा असली फिटनेस मंत्र और आपका?”

वकील 2: नो डेट, नो केस!”
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जज अंधा नहीं होता—
वो बस वही देखता है जो फ़ाइल में है।

 वकील बहस करता है—
ताकि सच थककर बैठ जाए।


जज का धैर्य बहुत बड़ा होता है—
तभी तो सबको बोलने देता है, सुनता किसी को नहीं।


वकील कहता है “My Lord”—
ताकि क्लाइंट भूल जाए, भगवान कोई और है।


6. जज की चुप्पी बहुत भारी होती है—
अक्सर फैसले से ज़्यादा।


7. वकील कानून पढ़ता है—
जज मन।


8. कोर्ट में वकील बोलता है—
जज सोचता है… “अगली तारीख़ दे देते हैं।”


9. वकील सच को घुमाता है—
जज तारीख़।


10. जज का हथौड़ा बजता है—
ताकि तर्क मर जाए।


11. वकील कहता है “precedent है”—
जज कहता है “मूड नहीं है।”


12. कोर्ट में वकील तेज़ होता है—
इंसाफ़ नहीं।


13. जज फैसला लिखता है—
वकील अगली अपील।


24. जीत Vs जिंदा

क्लर्क 1:वकील जीतता नहीं है।
क्लर्क 2:वो केस को ज़िंदा रखता है।

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23. सवाल Vs जवाब

वकील1: जज और वकील में फर्क बस इतना है।
वकील 2: कि जज सवाल पूछता है, वकील टालने के तरीके जानता है।
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22. साफ Vs धुंधला

क्लाइंट1: कानून किताब में साफ़ है।
क्लाइंट: पर वकीलों की मेहरबानी से धुंधला पड़ जाता है।
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21.सच Vs सहारा

वकील: केस मजबूत है।
मुवक्किल: तभी तो इसे कानून का सहारा चाहिए।
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20.महंगा Vs सस्ता

वकील:कोर्ट में झूठ महँगा पड़ता है।
क्लाइंट:सच उससे भी ज़्यादा।

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19.देरी Vs आदत 

जज: आप देर से क्यों आए?
वकील: जजमेंट आने के रफ्तार की आदत डाल रहा हूँ।
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18.अंधा Vs पहचान

क्लाइंट:कानून अंधा है।
वकील:पर झूठ पहचानने में गलती नहीं करता।
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17. फीस Vs जीत

क्लाइंट 1: क्या हम जीत रहे हैं?
क्लाइंट 2: फीस देखकर तो ऐसा हीं लग रहा है।

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16.सच Vs सबूत 

वकील: सच मेरे साथ है।
जज: सबूत भी बुला लेते तो अच्छा होता।
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15.केस Vs फिट

जज: क्या कहना चाहते हैं?
वकील: वही जो केस में फिट हो जाए।
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14.उम्मीद Vs फैसला

मुवक्किल: केस कब खत्म होगा?
वकील: तब तक नहीं जबतक आपकी उम्मीदें जिंदा हैं।
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13. अंधा Vs सबूत

क्लाइंट: कानून अंधा होता है।
वकील: तभी तो सबूत बोलते हैं।
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12.सच Vs फीस

क्लाइंट: सच जीत जाएगा न?
वकील: अगर फीस समय पर आ गई।
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11.मजबूत Vs कमजोर

वकील: मेरा केस बहुत मजबूत है।
जज: तभी तो आप इतनी मजबूती से हिल रहे हैं।
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10.सच Vs झूठ

वकील 1: मुझे एक भी ऐसा केस नहीं दिखा जहाँ सच और झूठ साफ़ दिखे।

वकील 2: तभी तो आप वकील हैं, जज होते तो परेशानी हो जाती।

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9. संदेह Vs विश्वास

 जज: आप कैसे कह सकते हैं कि ये असंभव चीज संभव है ?
वकील: क्योंकि मैं संदेह में विश्वास नहीं रखता.
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8. गिल्टी Vs इनोसेंट 

जज: आप कैसे कह सकते हैं कि आपका क्लाइंट इनोसेंट है ?
वकील: इसके खिलाफ 25 क्रिमिनल केस में से एक भी साबित नहीं हुए .
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7. बॉडी मसल्स Vs ब्रेन मसल्स 

"1. वकील 1:मैं तो तब रिटायर होऊंगा जब मेरे बॉडी मसल्स काम करना बंद कर देंगे। और आप?

2. वकील 2: जब मेरे ब्रेन मसल्स काम नहीं करेंगे तब।"

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6.जंक फूड Vs जंक केस

वकील 1: “मेरा सबसे बड़ा दुश्मन है जंक फूड! और आपका? 

वकील 2: “जंक केस!”

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5.फाइट Vs कॉम्प्रोमाइज

वकील 1: मैं बॉडी पर इतना मेहनत करता हूँ ताकि लोग फाइट से बचें।

वकील 2: “और मै इतना कि ऑपोजिट पार्टी कॉम्प्रोमाइज कर ले।

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बॉडी Vs केस

वकील 1: सालों लगता है तभी जाकर बॉडी बनती है।

वकील 2: “सेम टू सेम हेयर अलसो!” सालों लगते हैं तभी जाकर केस बनते हैं।

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प्रोटीन Vs प्रोविजंस ऑफ लॉ 

वकील 1: मै डाइट में प्रोटीन लेता हूँ और आप? क्या लेते हैं, मिस्टर बॉडी बिल्डर?”

वकील 2: “प्रोविजंस ऑफ लॉ !”

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सच Vs झूठ

वकील 1: मुझे एक भी ऐसा केस नहीं दिखा जहाँ सच और झूठ साफ़ दिखे।
वकील 2: तभी तो आप वकील हैं, जज होते तो परेशानी हो जाती।
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पुश अप Vs पेंच

कोर्ट के कैंपस में दो वकील चलते हुए बात कर रहे थे।

1.वकील 1: “मिस्टर शर्मा, आप तो वकील होकर भी बॉडी बिल्डर लगते हैं… कितना पुश-अप लगा लेते हैं?”

2.वकील 2:“बस उतना ही जितना आप अपने क्लाइंट के केस में कानूनी पेंच लगा लेते हैं।”

3.वकील 1: “क्या मतलब है आपका ,मेरे कानूनी पेंच लगाने से आपको क्या फर्क पड़ता है?”

4.वकील 2: आप जैसे वकीलों की  तैयारी से मुझपे जोर लगता है उतना हीं मेहनत करता हूं।”

5.वकील 1:“अच्छा! तो आपकी  ताकत का राज़ जिम है?”

6.वकील 2:“नहीं भाई, राज तो रोज़ कोर्ट में रोज दौड़ने का है,रोज भागने का है रोज घंटों बहस करने का है।”

7.वकील 1:“ लेकिन कोर्ट में रोज दौड़ने ,भागने और बहस करने से कोई इतना ताकतवर कैसे बन सकता है?”

8.वकील 2 :“क्योंकि हर दिन 5 घंटे आप जैसे ज्ञानी वकीलों की दलीलों को उठाना पड़ता है… वो भी बिना वार्म-अप के!” 

9.वकील 1:“अच्छा तो आपकी  असली बॉडी बिल्डिंग तो कोर्ट में हो रही है?”

10.वकील 2:“हाँ भाई  यहाँ डंबल नहीं, यहां पर भारी भरकम  दलीलें उठानी पड़ती हैं।” 
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Monday, May 4, 2026

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परदा-ए-फ़सूँ 

दुनिया ये तेरी-मेरी, फ़रक फ़क़त के यूँ है,
ना आरज़ू हुनूज़ है, ना कोई जुस्तजू है।

किसे इल्ज़ाम दें हम,तू बाँटता रहा तक़दीर,
किसी के हाथों गुल है, किसी के हाथों ख़ूँ है।

तेरी  रहनुमाई कैसी  ये कैसा इम्तिहाँ है,
तेरी दुनिया में या रब कहीं दिल बे-सुकूँ है।

तेरे दस्तूर-ओ-फ़नूँ को समझ पाएँ तो कैसे,
यहाँ हर सच के पीछे कोई परदा-ए-फ़सूँ है।

तेरे होने पे यक़ीं भी है, शिकायत भी मगर ये,
कहीं मंदिर में ख़ामोशी, कहीं मस्जिद में जुनूँ है।
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अब चलो चले पूरी करें अपने-अपने शौक,
तू पैदा कर नस्लें आदम, मैं मुकर्रर अपनी मौत।
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रेत पर बैठकर क्या लिखते हो
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पहचान

रिश्तों की उम्र अक्सर लफ़्ज़ों से कम रही,
मुश्किल बहुत है दिल का निगेहबान होना।

सोने के तख़्त वाले भी तन्हा मिले यहाँ,
आसान कब रहा है बहुत धनवान होना।

जो प्यार बाँटता है वही अस्ल में बड़ा,
बेकार है  फ़क़त यूँ ही सुल्तान होना।

हर शख़्स भागता है उजालों की चाह में,
लेकिन  कहाँ मयस्सर है चरागाँ होना।

लोग पूछते हैं मुझसे मजहब का नाम,
नाकाफी है शायद मेरा इंसान होना।

अजय अमिताभ सुमन 

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5.इल्जाम नहीं है

ये घर है मेरा दुकान नहीं है,
गैर ज़रूरी कोई समान नहीं है।
ना कोई हसरत कि इतना भी कम क्या,
कि मुझपे किसी का एहसान नहीं है।
उतना ही कहता हूँ जितना ज़रूरी,
हर लफ़्ज़ यूँ ही कोई बयान नहीं है।
ज़मीं से उठा हूँ, ज़मीं ही है दौलत,
मेरी चाहतों में कोई आसमान नहीं।
अमीरी का मौसम भले कम रहा हो,
मगर सर पे कोई इल्ज़ाम नहीं है।
जो मिलते हैं मुझसे, अदब से ही मिलते, 
कि इतना भी मिलना आसान नहीं है।

अजय अमिताभ सुमन

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4.नजर 

जो तेरी नजर में ऊंचा वो सबकी नजर में महान हो,
जरूरी नहीं भूखे के लिए ,सबसे ऊँचा भगवान हो।

अपनी अपनी जरूरतें सबकी अपनी अपनी मजबूरियाँ,
जुल्म पे चुप रहने वाला हर कोई जरूरी नहीं शैतान हो।

मंदिरों में सच का हीं हो बोल बाला ये कोई जरूरी नहीं।
मुमकिन है सड़कों पर ही ,छुपा हुआ कोई राम हो।

सच कभी झुकता,टूटता ,रूठता तो कभी उठता भी है , 
सलीब हीं कोई जरूरी नहीं हर बार इसका ईनाम हो।

किसी को टूटी चप्पल  छालों से ना आंकना ना दोस्त, 
हो सकता है वही शख़्स किसी दुनिया का पूरा अरमान हो।

अजय अमिताभ सुमन 


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3.निशानी लहरों की

हवाओं पर कोई कहानी लिखूँ,
अपनी मैं क्यों ज़िंदगानी लिखूँ?
जो दिखता है वो ही तो सच है मेरा,
और क्या मैं दास्ताँ बयानी लिखूँ?
साहिल-ए-रेत निशानी का क्या,
सब मौजें मिटाएँ नादानी लिखूँ?
पल में बदलती है सूरत-ए-जहाँ,
हर एक लम्हा बस रवानी लिखूँ?
हवाओं पर कोई कहानी लिखूँ,
अपनी मैं क्यों ज़िंदगानी लिखूँ?

अजय अमिताभ सुमन

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2.पितृ-व्याख्यान

क्या रखा है कल्प बिताना औरों के गुणगान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में।

पूर्व अतीत की चर्चा कर क्या रखा गर्वित होने में,
पुरखों के रण-घात सुना क्या रखा हर्षित होने में।
भुजा क्षीण हो तेरा फिर क्या रखा स्वाभिमान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में।

कुछ पूर्वज के सुरमा होने से कुछ क्षण को बल मिलता,
निज हाथों से उद्यम रचने पर अभिलाषित फल मिलता।
निज कर्म करो, क्यों कल्प बिताते पितृ-व्याख्यान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में।

अजय अमिताभ सुमन

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1.सौदा-ए-बुलंदी

वो जो छू लेता है बुलंदी, कोई इनाम नहीं होता,
ये रूह का इम्तिहान है, कोई वरदान नहीं होता।

बुलंदी मिलते ही बढ़ने लगती है रूह-ए-तन्हाई,
बिना गुरूर-ए-जुनूँ के नामो-निशान नहीं होता।

आसमाँ छू भी ले इंसाँ, तो मुकम्मल कहाँ होता,
बड़ा आदमी होने से कोई गुणगान नहीं होता।

ऊँचे ख़्वाबों की है कीमत तेरी नींद, तेरे उसूल,
सौदा-ए-बुलंदी यूँ ही किसी के नाम नहीं होता।

अजय अमिताभ सुम

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अंधेरों की कोशिश थी बड़ी रात करने की,
पर हमने ठानी थी सूरज से बात करने की।

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बाजार में ऐसे हीं मैं टिका नहीं,
अपने किरदार से बस डिगा नहीं।

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जाने कैसे कैसे मिले हैं खिताब,
माथे पे शराफत और नीयत में दाग।

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लफ़्ज़ों में अपनापन पर सीने में तेजाब,
आसान नहीं समझना आदमी का सुराग

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इंसान की ये फ़िरतत,है अच्छी खराब भी,
दिल भी है ,दर्द भी है, दांत भी दिमाग़ भी 

===
हवाओं पर कोई सवाल हूँ मैं
खुद ही एक मिसाल हूँ मैं?
हाल,खयाल,कमाल,हाल,जंजाल

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सुराग


तेरी कोशिशें नाकाम मुझमें ढूँढ क्या लोगे तुम,
अब तक तो मैं हीं ना रहा मुझमें क्या लोगे तुम।
वक़्त के आईने में इक टूटा हुआ हूँ लम्हा ,
बिखरे हुए अक्स का वजूद क्या लोगे तुम।
ख़ुद से ही जुदा होकर जो शख़्स दूर गया हो,
इस फ़ासले का कोई उसूल क्या लोगे तुम।
कई-कई जन्मों का बिखरा हुआ एक सुराग़ हूँ,
इस धुँध में सच का भी रुख़ क्या लोगे तुम।
मैं ख़ुद ही अपने होने का हासिल नहीं समझा,
मेरे वजूद का मुझसे सबूत क्या लोगे तुम।

अजय अमिताभ सुमन

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मज़दूर

मेहनत जिसकी धूप में जलती रही भरपूर,
पसीने की हर बूँद से लिखता रहा जो नूर।
भूख, ग़रीबी, रोग ने कर डाला है मजबूर,
छाँव मिली न उम्र भर, किस्मत से है दूर।
रोटी की इक आस में जो झुकता बे-दस्तूर,
राहों पे ताउम्र फकत जलता रहा मज़दूर।

अजय अमिताभ सुमन

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कफ़न

स्वतंत्रता का नवल पौधा, रक्त से निज सींचकर,
था उगाया वीर ने, कफ़न स्वयं शीश पर।
अमर ज्वाला-सा जला, अन्याय की दीवार में,
जयघोष गूँज उठा, रणभूमि की पुकार में।

लहू की धार बह चली, धरती हुई गुलाल-सी,
गगन थर्राने लगा, रण-ध्वनि हुई धमाल-सी।
वीर सपूत हँस पड़ा, तीरों के उस घाव पर,
वतन की जीत हो चाहे प्राण ले जाए हर।"

अजय अमिताभ सुमन

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दवा नहीं मिलतीहर शख़्स यहाँ अपनी ही कहानी में गुम,
किसी और के दर्द की दवा नहीं मिलती।

रिश्तों की धूप में साये तो बहुत देखे,
छाँव में भी मगर वो हवा नहीं मिलती।

हम ढूँढ़ते फिरते हैं शहरों में सुकूँ की झलक,
इस भीड़ भरे जहाँ में वो फ़ज़ा नहीं मिलती।

जबतक न जले ‘मैं’ की शमा दिल के दरीचे में,
उस नूर की राहों में मगर वफ़ा नहीं मिलती।

जो फ़ना की राह पे उतरे, वही पा ले बक़ा,
वरना इस सफ़र में कोई अता नहीं मिलती।

अजय अमिताभ सुमन

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चिराग़ और आफ़ताब

उतना ही फ़र्क़ है चिराग़ और आफ़ताबों में,
जितना कि एक कलम और हज़ारों किताबों में।
चिराग़ बस एक कोने की तन्हाई मिटा पाता,
आफ़ताब रौशनी भर देता है तमाम हिसाबों में।
कलम से इंक़लाब की तहरीर जन्म लेती है,
किताबें उम्र गुज़ार देती हैं उन्हीं जवाबों में।
जो जल के ख़ुद को ख़त्म करे, वही सूरज कहलाए,
वरना लोग उलझे रहते हैं बस नक़ाबों में।
असर का फ़ैसला वक़्त करता है ऐ दोस्त,
फ़र्क़ दिख ही जाता है चेहरों और ख़्वाबों में।

अजय अमिताभ सुमन

 

जाने कितने अरमानों को खंगाला मैंने,

 

बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला मैंने।

 

 

 

 

 

रौशनी में भी उजाला ठहरता नहीं,

 

अंधियारा अजीब है, पिघलता नहीं।

 

 

 

मन के सन्नाटे को खोल कभी,

 

दिल के दरवाज़े से बोल कभी।

 

 

 

तोड़ के जोड़ के मन्नत के धागे को,

 

दे भी दोगे क्या तुम नसीब में अभागे को।

 

 

 

जो दौड़े ही नहीं किसी भीड़ में यकीनन,

 

वो क्या जाने हार कि खुमारी क्या चीज है।

 

 

 

बेहतर ही था जो वो दाग दे गया,

 

ठंडा था दिल मेरा आग दे गया।

 

 

 

अदालत जाने से संभल जाते जो लोग,

 

मयखाने में फिर क्यों जल जाते हैं लोग।

 

 

 

इस शहर के इंसान जाने कैसे हज़ार में,

 

प्लास्टिक के फूल बिके इत्र के बाजार में।

 

 

 

शहद से मीठा समंदर से गहरा,

 

तेरी इन नागिन सी जुल्फों का पहरा।

 

 

 

मेरे गाँव से कहीं, बदतर ये शहर है,

 

कि पेट में है दाँत, दाँतों में जहर है।

 

 

 

ख़्वाहिशों और चादरों में कुछ इस तरह अमन रखा,

 

ना चादरें लम्बी रखी ना ख़्वाहिशों को दफ़न रखा।

 

 

 

न पूछ हमसे हमने क्या इस दिल में पाले हैं,

 

कि सर से पाँव तलक छालें ही छालें हैं।

 

 

 

समंदर का होकर हवा की बातें करना क्या,

 

जो करते नहीं याद उन्हें दिल मे रखना क्या।

 

 

 

कुछ दिखता नहीं, कुछ दिखाई न पड़ता,

 

कुछ तन का अंधेरा, कुछ मन का अंधेरा।

 

 

 

तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,

 

काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।

 

 

 

जबसे मेरा मुझ में घटने लगा है,

 

तबसे तू मुझ में बढ़ने लगा है।

 

 

 

लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,

 

मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।

 

 

 

चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,

 

पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।

 

 

 

मुश्किल से उसको पगार मिला आज,

 

दो दिन का जीवन बेज़ार मिला आज।

 

 

 

धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,

 

ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।

 

 

 

नीर नहीं भावों की सरिता,

 

अद्भुत है कवि तेरी कविता।

 

 

 

आँखों ही से आँखों में करते जो बातें,

 

दिल से फिर होती ना क्यों मुलाकातें।

 

 

 

कई सालों जंग-ए-आजादी मिली है,

 

फ़ादासी, जेहादी, बर्बादी मिली है।

 

 

 

कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,

 

तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।

 

 

 

चाँद को छू लेने को, मुल्क तो बेताब है,

 

मुश्किल कि कर्ज में डूबा हुआ फैयाज़ है.

 

 

 

अजीब है ख़ुदा तू , तेरी ख़ुदाई भी,

 

तू भी साथ में और मेरी तन्हाई भी।

 

 

 

ना मय के लिए ना मयखाने के लिए,

 

जुनून-ए-जिगर है मर जाने के लिए।

 

 

 

प्रेम मधुर रस तुम बरसाओ ,

 

यूँ बैठे न आग लगाओ।

 

 

 

ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,

 

मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।

 

 

 

जमाने की बात भुलाने से उठा,

 

सोचता हूँ क्यों मैखाने से उठा?

 

 

 

रागी से बेहतर, विरागी से बेहतर,

 

न धन से अकड़ता न धन को पकड़ता।

 

 

 

ये झूठ की बीमारी तुझे हो मुबारक,

 

मैं सच का पुजारी, अनाड़ी सही।

 

 

 

जब भावना पे संभावना का प्रभाव होता है,

 

तब रिश्तों में संवेदना का अभाव होता है।

 

 

 

सूरज तो निकलता है रोज़ ही मगर,

 

तूने आँखें खोली और दीदार हो गया।

 


4. बिना बीड़ी बिना गुटका बिना बात की लड़ाई के

 

कभी बितते नहीं दिन ऐसे मेरी बड़की माई के।

 

 

 

5. कुछ अपना नसीबन कुछ सरकार की भलाई से,

 

कमबख्त जाते नहीं जाती ये ठंडी रजाई से।

 

 

 

6. महीने की रोटी और चुटकी कमाई से,

 

उठाओगे कैसे तुम नखरे भौजाई के ?

 

 

 

7. खुदा जाने कैसी अजब तेरी प्यास थी,

 

तुझसे तो बेहतर, तेरी तलाश थी।

 

 

 

8. क्या खूब अख्तियार है, पीने पे जनाब,

 

कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

 

 

 

9. काश खुदा बरसा दे, बारिश ईमान की,

 

लोगों के जमीर पे बैठी है धूल बहुत।

 

 

 

10. डरा नहीं जो कभी शेर से, आज वो डर गया,

 

बिना लिए बीबी की चुड़ी, जब वो घर गया।

 

 

 

11. जीवन सुख-दुख का सैलाब, आओ मिल के देखे ख्वाब,

 

तू मेरे दुख का रखे हिसाब, मैं तेरे सुख की बनूँ किताब।

 

 

 

12. गरीबों को मलाल, अमीरी ना मिली,

 

अमीरों को मलाल , गरीबी ना मिली,

 

मखमली पलंग को तरसे गरीब और

 

अमीर को नींद-ए-फकीरी ना मिली।

 

 

 

13. रूह की आवाज को कुछ यूँ सजा रखता है,

 

जज्बात अमिताभ अल्फ़ाज़ आसां रखता है।

 

 

 

14. ढूढ़ता रहा सबक जो जाने कितने सवालों में,

 

जा के मुझे मिला वो जिंदगी की किताबों में।

 

 

 

15. ज़िंदगी को आप अगर वो देते हैं

 

जो जिंदगी आपसे चाहती है,

 

तो जिंदगी आपको वो देती है

 

जो आप जिंदगी से चाहते हैं।

 

 

 

16. जो खोजता है, मिलता नहीं,

 

जो मिलता है, खोजता नहीं,

 

आदमी इसीलिए फलता नहीं, फूलता नहीं।

 

 

 

17. मंदिर की घंटी, गुरुवाणी और मस्जिद का अजान,

 

और चर्च के प्रेयर से बनता ये हिंदुस्तान।

 

 

 

18. ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,

 

लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-एमंजिल का।

 

 

 

19. उसने करके खबरदार , मारा अमिताभ को,

 

बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं।

 

 

 

20. "अमिताभ" के प्यास की, बात ही कुछ खास है,

 

समंदर से कुछ भी न , कम की तलाश है।

 

 

 

21. .इस दुनिया में आने की हो गयी ऐसी खता,

 

बदस्तूर अभी तक जारी है वो सिलसिला।

 

 

 

22. .कुछ सपनों की उम्मीद ले के

निकला था घर से,

उम्मीदें पूरी हो गयी

और घर सपना हो गया।

 

 

 

23.अजीब से ख्यालों के अमिताभ है,

 

जो पास है उसका शौक नहीं,

 

जिसका शौक है वो पास नहीं।

 

 

 

24. इज्जत की रोटी और सुकूँ भरे रैन,

 

ए ख़ुदा तूने नींद की रख भी दी क्या कीमत।

 

 

 

25. पिए बिना चला नहीं जाता,

 

चिकन बिना रहा नहीं जाता,

 

जश्न-ए-गुलामी का ये आलम है,

 

तो आजादी का क्या होगा।

 

 

 

26. हो गया इश्क दफ़न, सुलगने से पहले ही,

 

ना मैंने इजहार किया, ना उसने इकरार।

 

 

 

27. और भी तरीके हैं जुल्मो-सितम के,

 

इस जहाँ में ख़ुदा भेजने के सिवा।

 

 

 

28. रोटी की जद्दोजहद में , "अमिताभ " तू बदला कहाँ,

 

पहले खा नहीं सकते थे, अब खा नहीं पाते।

 

 

 

29. ज़माने ने किया नहीं कोई अत्याचार है,

 

"अमिताभ " तो खुद की गलतियों का शिकार है।

 

 

 

30. .तेरा होना ही काफी है "अमिताभ "

 

इस महफ़िल में लाख बुराइयां हैं साथ, पर आदमी बुरे नहीं।

 

 

 

31. मेरे रोने पे हँसता है, मेरे हँसने पे रोता है,

 

मेरा अक्श मेरा होके भी मेरा अपना नहीं।

 

 

 

32. .ना ऐब तुझ में ना ऐब मुझ में,

 

"अमिताभ " कसक बस ये थी,

 

ख्वाहिशें तेरी कुछ ज्यादा,

 

व हैसियत मेरी कुछ कम थी।

 

 

 

33. तेरा ऐब है कि खासियत,"अमिताभ "का फितूर है,

 

तुझे चाहे न चाहे ख्वाबों में, होता तू जरूर है।

 

 

 

34.

 

 

 

35. आप तो नाहक ही हम पे

 

इल्जाम लगा देते हैं,

 

लक्षण हैं बदतर और हम

 

अंजाम बता देते हैं।

 

 

 

36. ये क्या किया "अमिताभ", कि शख्सियत ही खुल गयी,

 

तेरी जुबाँ से बेहतर , तेरी ख़ामोशी थी।

 

 

 

37. चख के भी भला स्वाद भला

 

बताऊँ क्या ज़माने को,जहर नहीं होता

 

पिलाने के लिए।

 

 

 

38. कौन कहता है

 

ख़ुदा इंसाफ नहीं करता,

 

पलंग गरीबों को नसीब नहीं,

 

और अमीरों को नींद।

 

 

 

39. यूँ ही नहीं करता

 

ज़माने को रोशन "अमिताभ "

 

सीने में कोई आग दफ़न तो होगी।

 

 

 

40. साथ देती हो

 

कभी तनहा छोड़ जाती हो,ऐ जिंदगी

 

तुझे सीखने को आदमी से

 

बस यही एक मिला था।

 

 

 

41. न अता होता है, न खता होता है,

 

जो कुछ किया है, मुझे पता होता है।

 

 

 

42. जितने भी घाव दिए उसने,

 

मेरी छाती पे ही दिये,

 

वो आदमी था बुरा जरूर,

 

पर इतना बुरा भी नहीं।

 

 

 

43. सजा सुनाई तूने,

 

क्या खूब इस गुनाह की,

 

कि हाथ उठाई भी नहीं,

 

और वो नजरों से उतर गया।।

 

 

हवाओं पे कोई कहानी लिखूँ,
क्यों अपनी मैं जिंदगानी लिखूँ?

चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,
पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।

धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,
ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।

रेत के समंदर सी दुनिया में हम हैं,
पता भी चले कैसे ये कैसा भरम है?

ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,
मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।

गाँव में घर नहीं और शहरों पे जिंदा है,
उड़ता बिन पर के ये कैसा परिंदा है?

मन हीं मन मे युद्ध छिड़ा है,

 

मैं मेरे विरुद्ध खड़ा है।

 

2.अँधेरा में फैला सबेरा जहाँ पे,

 

खुदा होता तेरा बसेरा वहां पे।

 

4.नफरतों के दामन में,

 

जल रहे जो सभी है,

 

कौन सा है मजहब इनका ,

 

कौन इनके नबी हैं?

 

 

 

5.ख़ुदा क्या हवा हो दिखते भी नहीं

 

मिलते भी नहीं हो मिटते भी नहीं।

 

प्रभु तेरा दीपक जलाऊँ मैं कैसे,

 

दिल मे गुनाहों का पानी बहुत है।

 

 

 

6.हाथ झुके दिल झुका नहीं,

 

प्रेम पुष्प निज फला नही।

 

ना संशय तूने त्याग किया,

 

ना मिथ्या का परित्याग किया।

 

फिर तुझे कैसे प्रभु मिलेंगे,

 

विष गमलों में फूल खिलेंगे?

 

 

 

7.बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,

 

अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।

 

8.ख़ुदा तेरे सफर में जब एक हो जाता हूँ,

 

अजीब सा असर हैं अनेक हो जाता हूँ।

 

 

 

9.कैसे करूँ मैं अपनी पहचान तू बता,

 

मैं हीं नहीं हूँ मुझमें पूरा शहर है शामिल।

 

 

 

10.तूने ही तो अपने शैतान को पुकारा है,

 

दोष सितारों का नहीं, दोष तुम्हारा है।

 

 

 

11.आसाँ था खरीदना पर बिकना था मुश्किल,

 

या तो तेरा वादा था , या तो ये मेरा दिल।

 

 

 

12.मेरे हीं हाथों मूझको कायनात दे दिया,

 

ख़ुदा ने ख़ुद से मूझको निजात दे दिया।

 

 

 

13.ख़ुदा के नेक बंदों का,

 

शुक्रिया भी कर दो,

 

गज़ल का काम केवल,शिकायत नहीं।

 

 

 

14.दिल में है अंधियारा,

 

आग़ जला लेता हूँ,थोड़ा जाग लेता हूँ ,

 

थोड़ा भाग लेता हूँ।

 

15.काश कि तू बिकता.

 

दुनिया के बाज़ार में ,ख़ुदा तुझको लाता,

 

थोड़ा मैं भी उधार में

 

16.हवाओं पे कोई कहानी लिखूँ,

 

क्यों अपनी मैं जिंदगानी लिखूँ?

 

 

 

17.हिजाब-ए-दहर भी रहने दो,अच्छा है,

 

भरम जो बचा है, रहने दो अच्छा है

 

 

 

18.सबक तो है छोटी क्यों याद नहीं होती,

 

सच्चाई के मार की आवाज नहीं होती।

 

 

 

19.यथार्थ है या भ्रम है?

 

जीवन क्या स्वप्न है?

 

 

 

20.शैतानों का खौफ़ नहीं होता यकीनन,

 

ख़ुदाओं से मूझको बचा लो तो अच्छा।

 

 

 

21.जो तेरा है सच सच्चाई है वो,

 

जरूरी नहीं कि अच्छाई है वो।

 

 

 

22.भोग पिपासु जन के मन मे,

 

योग कदाचित हीं फलते,

 

जिन्हें प्रियकर नृत्य गोपियाँ,

 

कृष्ण कदाचित हीं मिलते।

 

 

 

23.जिंदगी का लहजा,

 

अजीब जरा सख्त है,

 

सपनों की दौड़ है, ना अपनों पे वक्त है।

 

 

 

24.रिश्तों के समंदर में गला नहीं,

 

मंजिल करीब थी तू चला नहीं।

 

 

 35.कह गए अनगिनत सन्तन है,

 

चित संलिप्त नित चिंतन है।

 

स्थितप्रज्ञ उपरत अविकल जो,

 

अरिहत चिरंतन है।

 

 

 

अजी सुनते हैं,

 

मेरे खिसियाने से काहे आप इतना डरते हैं?

 

 

 

ये दिल पे अपने कौन सा साबुन लगा मचलते हो,

 

कि चलते तो थोड़ा कम हो ,ज्यादा फिसलते हो?

 

 

 

किस किस की नज़र को हम देखें,

 

हम सबकी नज़र में रहते हैं,

 

किस्मत ही ऐसी पाई है,

 

हर वक़्त सफर में रहते हैं।

 

 

 

ख्वाहिशों की ख़ाक में जल जाते है,

 

दोस्त मेरे दिल में जो आज आते है।

 

कुछ इस तरह से रिश्ते बदलने लगे,

 

मिलते तो हैं अब भी, संभल जाते हैं।

 

 

 

गाँव में घर नहीं और शहरों पे जिंदा है,

 

उड़ता बिन पर के ये कैसा परिंदा है?

 

 

 

लड़ के जाने मरते क्यों मजहबों के दूत हैं,

 

ये हिन्दू , मुसलमाँ इन्सां के ही तो रूप हैं।

 

परछाइयाँ कुछ और नहीं बदलती हुई धूप हैं,

 

जानते तो सब हैं फिर न जाने क्यों चुप हैं?

 

 

 

पता नहीं किस शहर का,

 

अजीब वो बाशिंदा है,

 

कि हकीक़त से घायल,

 

ख्वाबों पे जिंदा है।

 

 

 

धीर हूँ पथिक चल हूँ तू गाई,

 

मंज़िल मिलत ना कबहूँ अगुताई।

 

 

 

अदा भी सनम के क्या खूब है, खुद मेरे,

 

लेके दिल पूछते हैं, क्या दिल से चाहता हूँ,

 

जो दिल ही दे दिया है, तो दिल की इस बात को,

 

दिल से जताऊँ कैसे कि दिल से चाहता हूँ।

 

 

 

अपनों पूत कवि करत बड़ाई,

 

पबजी खेलत कबहुँ ना अगुताई।

 

 

 

किस बात से रोते हो, किस बात का ग़म है?

 

शर्माजी खिसियाते बोले, ग़म मेरी बेगम है.

 

 

 

सखी तुम क्या जानो पीर पराई,

 

खुशी मिले ना बिन पति धमकाई।

 

 

 

आदमी तो ठीक था, खराबी फ़क़त इतनी थी,

 

ना सिखाई किसी ने कारिगरी, न हमें सीखनी थी।

 

 

 

मेरी सांसें, मेरी धड़कन, मेरी रूह तक उधार है,

 

ख़ुदा तेरा आभार है, ख़ुदा तेरा आभार है।

 

 

 

माँ के बिना जीवन संभव नहीं,

 

और बीबी के बिना असंभव।

 

 

 

ना तो कोई आग ना तो तेरा कोई ख़्वाब हूँ,

 

आँधी में जलता हुआ मगर एक चिराग हूँ।

 

 

 

ज़ुबानों के थोड़े फ़सादी हुए क्या,

 

कहने लगे लोग जेहादी हुए क्या ?

जाने कितने अरमानों को खंगाला मैंने,

 

बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला मैंने।

 

 

 

अगर मस्जिद में तू है, मंदिर में तू है,

 

मंदिर में मस्जिद में नफरत फिर क्यूँ है?

 

 

 

रौशनी में भी उजाला ठहरता नहीं,

 

अंधियारा अजीब है, पिघलता नहीं।

 

 

 

मन के सन्नाटे को खोल कभी,

 

दिल के दरवाज़े से बोल कभी।

 

 

 

तोड़ के जोड़ के मन्नत के धागे को,

 

दे भी दोगे क्या तुम नसीब में अभागे को।

 

 

 

जो दौड़े ही नहीं किसी भीड़ में यकीनन,

 

वो क्या जाने हार कि खुमारी क्या चीज है।

 

 

 

बेहतर ही था जो वो दाग दे गया,

 

ठंडा था दिल मेरा आग दे गया।

 

 

 

अदालत जाने से संभल जाते जो लोग,

 

मयखाने में फिर क्यों जल जाते हैं लोग।

 

 

 

इस शहर के इंसान जाने कैसे हज़ार में,

 

प्लास्टिक के फूल बिके इत्र के बाजार में।

 

 

 

शहद से मीठा समंदर से गहरा,

 

तेरी इन नागिन सी जुल्फों का पहरा।

 

 

 

मेरे गाँव से कहीं, बदतर ये शहर है,

 

कि पेट में है दाँत, दाँतों में जहर है।

 

 

 

ख़्वाहिशों और चादरों में कुछ इस तरह अमन रखा,

 

ना चादरें लम्बी रखी ना ख़्वाहिशों को दफ़न रखा।

 

 

 

न पूछ हमसे हमने क्या इस दिल में पाले हैं,

 

कि सर से पाँव तलक छालें ही छालें हैं।

 

 

 

समंदर का होकर हवा की बातें करना क्या,

 

जो करते नहीं याद उन्हें दिल मे रखना क्या।

 

 

 

कुछ दिखता नहीं, कुछ दिखाई न पड़ता,

 

कुछ तन का अंधेरा, कुछ मन का अंधेरा।

 

 

 

तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,

 

काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।

 

 

 

जबसे मेरा मुझ में घटने लगा है,

 

तबसे तू मुझ में बढ़ने लगा है।

 

 

 

लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,

 

मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।

 

 

 

चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,

 

पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।

 

 

 

मुश्किल से उसको पगार मिला आज,

 

दो दिन का जीवन बेज़ार मिला आज।

 

 

 

धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,

 

ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।

 

 

 

नीर नहीं भावों की सरिता,

 

अद्भुत है कवि तेरी कविता।

 

 

 

आँखों ही से आँखों में करते जो बातें,

 

दिल से फिर होती ना क्यों मुलाकातें।

 

 चाँद को छू लेने को, मुल्क तो बेताब है,

 

मुश्किल कि कर्ज में डूबा हुआ फैयाज़ है.

 

 

 

अजीब है ख़ुदा तू , तेरी ख़ुदाई भी,

 

तू भी साथ में और मेरी तन्हाई भी।

 

 

 

ना मय के लिए ना मयखाने के लिए,

 

जुनून--जिगर है मर जाने के लिए।

 

 

 

प्रेम मधुर रस तुम बरसाओ ,

 

यूँ बैठे न आग लगाओ।

 

 

 

ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,

 

मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।

 

 

 

जमाने की बात भुलाने से उठा,

 

सोचता हूँ क्यों मैखाने से उठा?

 

 

 

रागी से बेहतर, विरागी से बेहतर,

 

न धन से अकड़ता न धन को पकड़ता।

 

 

 

ये झूठ की बीमारी तुझे हो मुबारक,

 

मैं सच का पुजारी, अनाड़ी सही।

 

 

 

जब भावना पे संभावना का प्रभाव होता है,

 

तब रिश्तों में संवेदना का अभाव होता है।

 

 

 

सूरज तो निकलता है रोज़ ही मगर,

 

तूने आँखें खोली और दीदार हो गया।

 

 

 

मन हीं मन मे युद्ध छिड़ा है,

 

मैं मेरे विरुद्ध खड़ा है।

 

2.अँधेरा में फैला सबेरा जहाँ पे,

 

खुदा होता तेरा बसेरा वहां पे।

 

 

 

3.रेत के समंदर सी दुनिया में हम हैं,

 

पता भी चले कैसे ये कैसा भरम है?

 

 

 

4.नफरतों के दामन में,

 

जल रहे जो सभी है,

 

कौन सा है मजहब इनका ,

 

कौन इनके नबी हैं?

 

 

 

5.ख़ुदा क्या हवा हो दिखते भी नहीं

 

मिलते भी नहीं हो मिटते भी नहीं।

 

प्रभु तेरा दीपक जलाऊँ मैं कैसे,

 

दिल मे गुनाहों का पानी बहुत है।

 

 

 

6.हाथ झुके दिल झुका नहीं,

 

प्रेम पुष्प निज फला नही।

 

ना संशय तूने त्याग किया,

 

ना मिथ्या का परित्याग किया।

 

फिर तुझे कैसे प्रभु मिलेंगे,

 

विष गमलों में फूल खिलेंगे?

 

 

 

7.बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,

 

अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।

 

8.ख़ुदा तेरे सफर में जब एक हो जाता हूँ,

 

अजीब सा असर हैं अनेक हो जाता हूँ।

 

 

 

9.कैसे करूँ मैं अपनी पहचान तू बता,

 

मैं हीं नहीं हूँ मुझमें पूरा शहर है शामिल।

 

 

 

10.तूने ही तो अपने शैतान को पुकारा है,

 

दोष सितारों का नहीं, दोष तुम्हारा है।

 

 

 

11.आसाँ था खरीदना पर बिकना था मुश्किल,

 

या तो तेरा वादा था , या तो ये मेरा दिल।

 

 

 

12.मेरे हीं हाथों मूझको कायनात दे दिया,

 

ख़ुदा ने ख़ुद से मूझको निजात दे दिया।

 

 

 

13.ख़ुदा के नेक बंदों का,

 

शुक्रिया भी कर दो,

 

गज़ल का काम केवल,शिकायत नहीं।

 

 

 

14.दिल में है अंधियारा,

 

आग़ जला लेता हूँ,थोड़ा जाग लेता हूँ ,

 

थोड़ा भाग लेता हूँ।

 

15.काश कि तू बिकता.

 

दुनिया के बाज़ार में ,ख़ुदा तुझको लाता,

 

थोड़ा मैं भी उधार में

 

16.हवाओं पे कोई कहानी लिखूँ,

 

क्यों अपनी मैं जिंदगानी लिखूँ?

 

 

 

17.हिजाब--दहर भी रहने दो,अच्छा है,

 

भरम जो बचा है, रहने दो अच्छा है

 

 

 

18.सबक तो है छोटी क्यों याद नहीं होती,

 

सच्चाई के मार की आवाज नहीं होती।

 

 

 

19.यथार्थ है या भ्रम है?

 

जीवन क्या स्वप्न है?

 

 

 

20.शैतानों का खौफ़ नहीं होता यकीनन,

 

ख़ुदाओं से मूझको बचा लो तो अच्छा।

 

 

 

21.जो तेरा है सच सच्चाई है वो,

 

जरूरी नहीं कि अच्छाई है वो।

 

 

 

22.भोग पिपासु जन के मन मे,

 

योग कदाचित हीं फलते,

 

जिन्हें प्रियकर नृत्य गोपियाँ,

 

कृष्ण कदाचित हीं मिलते।

 

 

 

23.जिंदगी का लहजा,

 

अजीब जरा सख्त है,

 

सपनों की दौड़ है, ना अपनों पे वक्त है।

 

 

 

24.रिश्तों के समंदर में गला नहीं,

 

मंजिल करीब थी तू चला नहीं।

 

 

 

25.दिन रात चाहे बदले ,

 

एक बात ना बदलती।

 

ये आदमी क्या चीज है ,

 

कि जात ना बदलती।

 

 

 

26.अन्धकार के राही ओ,

 

सपनों पे ना आघात करो।

 

तिमिर घनेरा भागेगा तुम,

 

लक्ष्यसिद्ध संघात करो।

 

 

 

27.ढूंढ़ता हूँ शहर में कोई तो बाशिंदा हो,

 

जो जगा हुआ भी हो और जिन्दा हो।

 

 

 

28.जुबान का फिसलना भी चर्चा सरेआम है,

 

और बेचते रहे वो ईमान कहाँ कहाँ तक।

 

 

 

29.भावों के धुंधीयारे बादल ,

 

घन तम के उस सागर पार।

 

स्वप्नदृष्ट मय मिथ्या जग से.

 

छिपे हुए जगतारणहार ।

 

 

 

30.बातें ख़ुदा की यूँ करने से क्या,

 

लड़ने से क्या , झगड़ने से क्या?

 

जो चलते नही तू ख़ुदा की डगर,

 

यूँ चलकर गिरने संभलने से क्या?

 

 

 

31.मृगतृष्णा के आँगरों से,

 

व्याकुल मन अकुलित हो जाऊँ।

 

बुद्धि शुद्धि के तम घन ओझल.

 

दग्ध मन है मैं ललचाऊँ।

 

 

 

32.हक़ीक़ते जीवन की हिजाब कर गई।

 

बचपन में जो उम्मीदे थी,

 

ख्वाब कर गई।

 

 

 

33.करके गुनाह धुल जाता हूँ,

 

मंदिर जाके भूल जाता हूँ।

 

 

 

34.क्यों बांधे बुत में तू उसको

 

जो फैला है यहीं कहीं,

 

क्या तेरे मंदिर  से पहले,

 

ये ईश्वर था कहीं नहीं?

 

 

 

35.कह गए अनगिनत सन्तन है,

 

चित संलिप्त नित चिंतन है।

 

स्थितप्रज्ञ उपरत अविकल जो,

 

अरिहत चिरंतन है।

काल बुरा कल जीवन आए,कल की कुछ तो राह बताए ,

विगत काल जो भी था गुजरा, जग  में नूतन चाह जगाए।  

 शहद से मीठा समंदर से गहरा,

 

तेरी इन नागिन सी जुल्फों का पहरा।

 

 

 

मेरे गाँव से कहीं, बदतर ये शहर है,

 

कि पेट में है दाँत, दाँतों में जहर है।

 

 

 

ख़्वाहिशों और चादरों में कुछ इस तरह अमन रखा,

 

ना चादरें लम्बी रखी ना ख़्वाहिशों को दफ़न रखा।

 

 

 

न पूछ हमसे हमने क्या इस दिल में पाले हैं,

 

कि सर से पाँव तलक छालें ही छालें हैं।

 

 

 

समंदर का होकर हवा की बातें करना क्या,

 

जो करते नहीं याद उन्हें दिल मे रखना क्या।

 

 

 

कुछ दिखता नहीं, कुछ दिखाई न पड़ता,

 

कुछ तन का अंधेरा, कुछ मन का अंधेरा।

 

 

 

तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,

 

काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।

 

 

 

जबसे मेरा मुझ में घटने लगा है,

 

तबसे तू मुझ में बढ़ने लगा है।

 

 

 

लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,

 

मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।

 

 

 

चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,

 

पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।

 

 

 

मुश्किल से उसको पगार मिला आज,

 

दो दिन का जीवन बेज़ार मिला आज।

 

 

 

धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,

 

ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।

 

 

 

नीर नहीं भावों की सरिता,

 

अद्भुत है कवि तेरी कविता।

 

 

 

आँखों ही से आँखों में करते जो बातें,

 

दिल से फिर होती ना क्यों मुलाकातें।

 

 

 

कई सालों जंग-ए-आजादी मिली है,

 

फ़ादासी, जेहादी, बर्बादी मिली है।

 

 

 

कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,

 

तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।

 

 

 

चाँद को छू लेने को, मुल्क तो बेताब है,

 

मुश्किल कि कर्ज में डूबा हुआ फैयाज़ है.

 

 

 

अजीब है ख़ुदा तू , तेरी ख़ुदाई भी,

 

तू भी साथ में और मेरी तन्हाई भी।

 

 

 

ना मय के लिए ना मयखाने के लिए,

 

जुनून-ए-जिगर है मर जाने के लिए।

 

 

 

प्रेम मधुर रस तुम बरसाओ ,

 

यूँ बैठे न आग लगाओ।

 

 

 

ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,

 

मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।

 

 

 

जमाने की बात भुलाने से उठा,

 

सोचता हूँ क्यों मैखाने से उठा?

 

 

 

रागी से बेहतर, विरागी से बेहतर,

 

न धन से अकड़ता न धन को पकड़ता।

 

 

 

ये झूठ की बीमारी तुझे हो मुबारक,

 

मैं सच का पुजारी, अनाड़ी सही।

 

 

 

जब भावना पे संभावना का प्रभाव होता है,

 

तब रिश्तों में संवेदना का अभाव होता है।

 

 

 

सूरज तो निकलता है रोज़ ही मगर,

 

तूने आँखें खोली और दीदार हो गया।

 

 

मन हीं मन मे युद्ध छिड़ा है,

 

मैं मेरे विरुद्ध खड़ा है।

 

2.अँधेरा में फैला सबेरा जहाँ पे,

 

खुदा होता तेरा बसेरा वहां पे।

 

 

 

3.रेत के समंदर सी दुनिया में हम हैं,

 

पता भी चले कैसे ये कैसा भरम है?

 

 

 

4.नफरतों के दामन में,

 

जल रहे जो सभी है,

 

कौन सा है मजहब इनका ,

 

कौन इनके नबी हैं?

 

 

 

5.ख़ुदा क्या हवा हो दिखते भी नहीं

 

मिलते भी नहीं हो मिटते भी नहीं।

 

प्रभु तेरा दीपक जलाऊँ मैं कैसे,

 

दिल मे गुनाहों का पानी बहुत है।

 

 

 

6.हाथ झुके दिल झुका नहीं,

 

प्रेम पुष्प निज फला नही।

 

ना संशय तूने त्याग किया,

 

ना मिथ्या का परित्याग किया।

 

फिर तुझे कैसे प्रभु मिलेंगे,

 

विष गमलों में फूल खिलेंगे?

 

 

 

7.बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,

 

अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।

 

8.ख़ुदा तेरे सफर में जब एक हो जाता हूँ,

 

अजीब सा असर हैं अनेक हो जाता हूँ।

 

 

 

9.कैसे करूँ मैं अपनी पहचान तू बता,

 

मैं हीं नहीं हूँ मुझमें पूरा शहर है शामिल।

 

 

 

10.तूने ही तो अपने शैतान को पुकारा है,

 

दोष सितारों का नहीं, दोष तुम्हारा है।

 

 

 

11.आसाँ था खरीदना पर बिकना था मुश्किल,

 

या तो तेरा वादा था , या तो ये मेरा दिल।

 

 

 

12.मेरे हीं हाथों मूझको कायनात दे दिया,

 

ख़ुदा ने ख़ुद से मूझको निजात दे दिया।

 

 

 

13.ख़ुदा के नेक बंदों का,

 

शुक्रिया भी कर दो,

 

गज़ल का काम केवल,शिकायत नहीं।

 

 

 

14.दिल में है अंधियारा,

 

आग़ जला लेता हूँ,थोड़ा जाग लेता हूँ ,

 

थोड़ा भाग लेता हूँ।

 

15.काश कि तू बिकता.

 

दुनिया के बाज़ार में ,ख़ुदा तुझको लाता,

 

थोड़ा मैं भी उधार में

 

16.हवाओं पे कोई कहानी लिखूँ,

 

क्यों अपनी मैं जिंदगानी लिखूँ?

 

 

 

17.हिजाब-ए-दहर भी रहने दो,अच्छा है,

 

भरम जो बचा है, रहने दो अच्छा है

 

 

 

18.सबक तो है छोटी क्यों याद नहीं होती,

 

सच्चाई के मार की आवाज नहीं होती।

 

 

 

19.यथार्थ है या भ्रम है?

 

जीवन क्या स्वप्न है?

 

 

 

20.शैतानों का खौफ़ नहीं होता यकीनन,

 

ख़ुदाओं से मूझको बचा लो तो अच्छा।

 

 

 

21.जो तेरा है सच सच्चाई है वो,

 

जरूरी नहीं कि अच्छाई है वो।

 

 

 

22.भोग पिपासु जन के मन मे,

 

योग कदाचित हीं फलते,

 

जिन्हें प्रियकर नृत्य गोपियाँ,

 

कृष्ण कदाचित हीं मिलते।

 

 

 

23.जिंदगी का लहजा,

 

अजीब जरा सख्त है,

 

सपनों की दौड़ है, ना अपनों पे वक्त है।

 

 

 

24.रिश्तों के समंदर में गला नहीं,

 

मंजिल करीब थी तू चला नहीं।

 

 

 

25.दिन रात चाहे बदले ,

 

एक बात ना बदलती।

 

ये आदमी क्या चीज है ,

 

कि जात ना बदलती।

 

 

 

26.अन्धकार के राही ओ,

 

सपनों पे ना आघात करो।

 

तिमिर घनेरा भागेगा तुम,

 

लक्ष्यसिद्ध संघात करो।

 

 

 

27.ढूंढ़ता हूँ शहर में कोई तो बाशिंदा हो,

 

जो जगा हुआ भी हो और जिन्दा हो।

 

 

 

28.जुबान का फिसलना भी चर्चा सरेआम है,

 

और बेचते रहे वो ईमान कहाँ कहाँ तक।

 

 

 

29.भावों के धुंधीयारे बादल ,

 

घन तम के उस सागर पार।

 

स्वप्नदृष्ट मय मिथ्या जग से.

 

छिपे हुए जगतारणहार ।

 

 

 

30.बातें ख़ुदा की यूँ करने से क्या,

 

लड़ने से क्या , झगड़ने से क्या?

 

जो चलते नही तू ख़ुदा की डगर,

 

यूँ चलकर गिरने संभलने से क्या?

 

 

 

31.मृगतृष्णा के आँगरों से,

 

व्याकुल मन अकुलित हो जाऊँ।

 

बुद्धि शुद्धि के तम घन ओझल.

 

दग्ध मन है मैं ललचाऊँ।

 

 

 

32.हक़ीक़ते जीवन की हिजाब कर गई।

 

बचपन में जो उम्मीदे थी,

 

ख्वाब कर गई।

 

 

 

33.करके गुनाह धुल जाता हूँ,

 

मंदिर जाके भूल जाता हूँ।

 

 

 

34.क्यों बांधे बुत में तू उसको

 

जो फैला है यहीं कहीं,

 

क्या तेरे मस्जिद से पहले,

 

ये ईश्वर था कहीं नहीं?

 

 

 

 

25.दिन रात चाहे बदले ,

 

एक बात ना बदलती।

 

ये आदमी क्या चीज है ,

कि जात ना बदलती।


26.अन्धकार के राही ओ,

 

सपनों पे ना आघात करो।

 

तिमिर घनेरा भागेगा तुम,

 

लक्ष्यसिद्ध संघात करो।

 

 

 

27.ढूंढ़ता हूँ शहर में कोई तो बाशिंदा हो,

 

जो जगा हुआ भी हो और जिन्दा हो।

 

 

 

28.जुबान का फिसलना भी चर्चा सरेआम है,

 

और बेचते रहे वो ईमान कहाँ कहाँ तक।

 

 

 

29.भावों के धुंधीयारे बादल ,

 

घन तम के उस सागर पार।

 

स्वप्नदृष्ट मय मिथ्या जग से.

 

छिपे हुए जगतारणहार ।

 

 

 

30.बातें ख़ुदा की यूँ करने से क्या,

 

लड़ने से क्या , झगड़ने से क्या?

 

जो चलते नही तू ख़ुदा की डगर,

 

यूँ चलकर गिरने संभलने से क्या?

 

 

 

31.मृगतृष्णा के आँगरों से,

 

व्याकुल मन अकुलित हो जाऊँ।

 

बुद्धि शुद्धि के तम घन ओझल.

 

दग्ध मन है मैं ललचाऊँ।

 

 

 

32.हक़ीक़ते जीवन की हिजाब कर गई।

 

बचपन में जो उम्मीदे थी,

 

ख्वाब कर गई।

 

 

 

33.करके गुनाह धुल जाता हूँ,

 

मंदिर जाके भूल जाता हूँ।

 

 

 

34.क्यों बांधे बुत में तू उसको

 

जो फैला है यहीं कहीं,

 

क्या तेरे मस्जिद से पहले,

 

ये ईश्वर था कहीं नहीं?

 

जाने कितने अरमानों को खंगाला मैंने,

 

बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला मैंने।

 

 

 

अगर मस्जिद में तू है, मंदिर में तू है,

 

मंदिर में मस्जिद में नफरत फिर क्यूँ है?

 

 

 

रौशनी में भी उजाला ठहरता नहीं,

 

अंधियारा अजीब है, पिघलता नहीं।

 

 

 

मन के सन्नाटे को खोल कभी,

 

दिल के दरवाज़े से बोल कभी।

 

 

 

तोड़ के जोड़ के मन्नत के धागे को,

 

दे भी दोगे क्या तुम नसीब में अभागे को।

 

 

 

जो दौड़े ही नहीं किसी भीड़ में यकीनन,

 

वो क्या जाने हार कि खुमारी क्या चीज है।

 

 

 

बेहतर ही था जो वो दाग दे गया,

 

ठंडा था दिल मेरा आग दे गया।

 

 

 

अदालत जाने से संभल जाते जो लोग,

 

मयखाने में फिर क्यों जल जाते हैं लोग।

 

 

 

इस शहर के इंसान जाने कैसे हज़ार में,

 

प्लास्टिक के फूल बिके इत्र के बाजार में।

 

 

 

शहद से मीठा समंदर से गहरा,

 

तेरी इन नागिन सी जुल्फों का पहरा।

 

 

 

मेरे गाँव से कहीं, बदतर ये शहर है,

 

कि पेट में है दाँत, दाँतों में जहर है।

 

 

 

ख़्वाहिशों और चादरों में कुछ इस तरह अमन रखा,

 

ना चादरें लम्बी रखी ना ख़्वाहिशों को दफ़न रखा।

 

 

 

न पूछ हमसे हमने क्या इस दिल में पाले हैं,

 

कि सर से पाँव तलक छालें ही छालें हैं।

 

 

 

समंदर का होकर हवा की बातें करना क्या,

 

जो करते नहीं याद उन्हें दिल मे रखना क्या।

 

 

 

कुछ दिखता नहीं, कुछ दिखाई न पड़ता,

 

कुछ तन का अंधेरा, कुछ मन का अंधेरा।

 

 

 

तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,

 

काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।

 

 

 

जबसे मेरा मुझ में घटने लगा है,

 

तबसे तू मुझ में बढ़ने लगा है।

 

 

 

लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,

 

मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।

 

 

 

चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,

 

पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।

 

 

 

मुश्किल से उसको पगार मिला आज,

 

दो दिन का जीवन बेज़ार मिला आज।

 

 

 

धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,

 

ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।

 

 

 

नीर नहीं भावों की सरिता,

 

अद्भुत है कवि तेरी कविता।

 

 

 

आँखों ही से आँखों में करते जो बातें,

 

दिल से फिर होती ना क्यों मुलाकातें।

 

 

 

कई सालों जंग-ए-आजादी मिली है,

 

फ़ादासी, जेहादी, बर्बादी मिली है।

 

 

 

कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,

 

तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।

 

 

 

चाँद को छू लेने को, मुल्क तो बेताब है,

 

मुश्किल कि कर्ज में डूबा हुआ फैयाज़ है.

 

 

 

अजीब है ख़ुदा तू , तेरी ख़ुदाई भी,

 

तू भी साथ में और मेरी तन्हाई भी।

 

 

 

ना मय के लिए ना मयखाने के लिए,

 

जुनून-ए-जिगर है मर जाने के लिए।

 

 

 

प्रेम मधुर रस तुम बरसाओ ,

 

यूँ बैठे न आग लगाओ।

 

 

 

ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,

 

मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।

 

 

 

जमाने की बात भुलाने से उठा,

 

सोचता हूँ क्यों मैखाने से उठा?

 

 

 

रागी से बेहतर, विरागी से बेहतर,

 

न धन से अकड़ता न धन को पकड़ता।

 

 

 

ये झूठ की बीमारी तुझे हो मुबारक,

 

मैं सच का पुजारी, अनाड़ी सही।

 

 

 

जब भावना पे संभावना का प्रभाव होता है,

 

तब रिश्तों में संवेदना का अभाव होता है।

 

 

 

सूरज तो निकलता है रोज़ ही मगर,

 

तूने आँखें खोली और दीदार हो गया।

 

 

1. सुखी अँतड़ी सूखे पेट क्षुधा व्यथित कंगाल,

तुम्हीं कहो सजाये कैसे वो पूजा की थाल ?

 

 

 

2. उगता हुआ सूरज , बना सबब अंधियारे का,

 

ये देश उल्लुओं का है तो दोष सूरज का क्या ?

 

 

 

3. काश ये टेक्नोलॉजी भी तूने टेस्ट कर लिया होता,

 

खुशियों को कहीं से कॉपी पेस्ट कर लिया होता।

 

कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,
तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।

परछाइयाँ कुछ और नहीं बदलती हुई धूप हैं,
जानते तो सब हैं फिर न जाने क्यों चुप हैं?

पता नहीं किस शहर का,अजीब वो बाशिंदा है,
कि हकीक़त से घायल,ख्वाबों पे जिंदा है।

अगर मस्जिद में तू है, मंदिर में तू है,
मंदिर में मस्जिद में नफरत फिर क्यूँ है?

समंदर का होकर हवा की बातें करना क्या,
जो करते नहीं याद उन्हें दिल मे रखना क्या।

तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,
काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।

जो तेरा है सच सच्चाई है वो,
जरूरी नहीं कि अच्छाई है वो।

क्या खूब अख्तियार है, पीने पे जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

रूह की आवाज को कुछ यूँ सजा रखता है,
जज्बात अमिताभ अल्फ़ाज़ आसां रखता है।

ढूढ़ता रहा सबक जो जाने कितने सवालों में,
जा के मुझे मिला वो जिंदगी की किताबों में।

उसने करके खबरदार , मारा अमिताभ को,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं।

"
अमिताभ" के प्यास की, बात ही कुछ खास है,
समंदर से कुछ भी न , कम की तलाश है।

इस दुनिया में आने की हो गयी ऐसी खता,
बदस्तूर अभी तक जारी है वो सिलसिला।

आप तो नाहक ही हम पे इल्जाम लगा देते हैं,
लक्षण हैं बदतर और हम अंजाम बता देते हैं।

न अता होता है, न खता होता है,
जो कुछ किया है, मुझे पता होता है।

जितने भी घाव दिए उसने, मेरी छाती पे ही दिये,
वो आदमी था बुरा जरूर,पर इतना बुरा भी नहीं।

सजा सुनाई तूने,क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं,और वो नजरों से उतर गया।

जग जब भी दिखता है तुमको,
जग सच हीं दिखता है तुमको।

ढूंढ़ता हूँ शहर में कोई तो बाशिंदा हो,
जो जगा हुआ भी हो और जिन्दा हो।

जब मन डोला, उड़न खटोला।

नफरतों के दामन में,जल रहे जो सभी है,
कौन सा है मजहब इनका ,कौन इनके नबी हैं?

बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,
अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।

काल बुरा कल जीवन आए,कल की कुछ तो राह बताए ,
विगत काल जो भी था गुजरा, जग में नूतन चाह जगाए।

लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,
मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।

ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,
मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।

जमाने की बात भुलाने से उठा,
सोचता हूँ क्यों मैखाने से उठा?

बेहतर ही था जो वो दाग दे गया,
ठंडा था दिल मेरा आग दे गया।

ख़्वाहिशों और चादरों में कुछ इस तरह अमन रखा,
ना चादरें लम्बी रखी ना ख़्वाहिशों को दफ़न रखा।

न पूछ हमसे हमने क्या इस दिल में पाले हैं,
कि सर से पाँव तलक छालें ही छालें हैं।

ना मय के लिए ना मयखाने के लिए,
जुनून-ए-जिगर है मर जाने के लिए

सम्मान

भाड़ में गया ईगो विगो,
और भाड़ सम्मान,
बंधु जेब में होने चाहिए,
भर के नोट तमाम,
भर के नोट तमाम।

@
अजय अमिताभ सुमन

अभागी

जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन


चाय

बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई

@
अजय अमिताभ सुमन

वक्त और काम

कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।

जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।

@
अजय अमिताभ सुमन

पहचान

लोग पूछते हैं मुझसे,
मेरे मजहब का नाम,
नाकाफी है शायद,
मेरा इंसान होना।

@
अजय अमिताभ सुमन

हादसा

अखबार में आ जाए,
ये तय नहीं है,
हादसा तो है,
पर समय नहीं है।

@
अजय अमिताभ सुमन

ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-एमंजिल का।

बार

वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन


चाय

बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई

@
अजय अमिताभ सुमन

कॉर्पोरेट

या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।

@
अजय अमिताभ सुमन

प्रश्न विकट है मेरे मन में,
आए बारंबार,
क्या सच में होते हैं लड़के,
भैरव के अवतार।

ना कोई व्यापार

लड़के तो होते हैं भैया
शिव जी के अवतार,

10
रंग के लाल लिपिस्टिक
भस्म विभूति, ना कोई श्रृंगार

मीट भात सब चटल रहे
दांत आंत पर डटल रहे

पटल, अटल,सकल, सफल,
तरल, तलल, गरल

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अगर दिवस हो छत्तीस घंटे


काला ज्यादा , कम सफेद है,
बस इसी बात का तो खेद है।

हैरान बस इस बात का ,
हैरान नहीं हूँ मैं ,
खुद से हीं अपरिचित ,
अंजान हूँ मैं.
=====
रात के अंधेरों में तू भी क्या चीज है,
जुगनूओं की रोशनी हीं तुझको अजीज है।
रेत के समंदर में कारवां बिखर गया,
और तू कि फरेब हीं, मरीचिका उम्मीद है ।
=====
ना नास्तिक ना आस्तिक
वास्तविक , स्वास्तिक
=====

पुरुषोत्तम श्रीराम

गद्दी त्यागे, राज्य भी त्यागे,
त्यागे सब सुख धाम,
तब जाके हीं बन पाए वो,
पुरुषोत्तम श्रीराम,

हे ईश्वर संसार तुम्हारा

अद्भुत है आकार तुम्हारा,
हे ईश्वर संसार तुम्हारा

अजय अमिताभ सुमन

तेरे हीं नामों को लिखकर
कितने हीं महाग्रंथ लिखे हैं,
योग ,जोग, नियोग अधिज्ञाता,
तंत्र मंत्र आदि ग्रंथ फले हैं।

माघ की रात

फिर छाने लगी रूह में
सर्द माघ की रात,
सन सन करती दिन रात दिन,
रूह कांपती रात।

अजय अमिताभ सुमन

आजाद है

आजाद कौन था,
आजाद कौन है,
इस प्रश्न पर धरा ये,
क्यों आज मौन है,

इस देश पर मिटा जो,
आजाद नहीं था,
मिट्टी पर था टिका जो,
आजाद वो ही था।

 

अभागी

जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन

 

वक्त और काम

कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।

@
अजय अमिताभ सुमन

 

फूल और कांटे

जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।

@
अजय अमिताभ सुमन

ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-एमंजिल का।

बार

वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन

चाय

बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई

@
अजय अमिताभ सुमन

कॉर्पोरेट

या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।

@
अजय अमिताभ सुमन

 

आसमान की तरह

ना समन्दर के माफ़िक़ गहरे,
ना खाली आसमान की तरह,
ये जीना भी कोई जीना है
कि महज इंसान की तरह।

अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा और हवा

दिखते तो हो हर जगह ,दिखते पर नहीं,
रहते तो हो इस दिल में, छिपते पर नहीं,
हो नजर के सामने और नजरों से ओझल,
हवा हो क्या खुदा तुम, मिलते पर नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
हाथ की लकीरें

हाथ में रहकर भी नहीं आदमी के हाथ में,
हाथ की लकीरें भी चीज क्या है वाइज।

अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा हो गया है

तेरे हीं शहर में तुझी को ढूंढता हूँ,
अब बता भी दे अपना पता ,
क्या तू भी खुदा हो गया है?

अजय अमिताभ सुमन

अहम का था बना वो, वहम में हिल गया,
मिट्टी से न जुड़ा था , मिट्टी में मिल गया।
=====
ये वकील का पेशा है या कि पत्थरों की दास्तां,
क़ि जीत पे जश्न नहीं, हार का गम नहीं।
====
होते कुछ और हो, दिखाते कुछ और हो,
बेनामखुद को अख़बार समझ रखा है क्या।
====
अमीरों को मलाल , गरीबी ना मिली,
गरीबों को मलाल,अमीरी ना मिली।
पलंग पे सोते अमीर को तरसे गरीब,
और अमीर कि सुकून-ए-फकीरी ना मिली।
====
कैसे करूँ इंकार , काँटों का तेरे भगवन,
फूलों में तू उतना ही है, जितना की काँटों में।
====

पोंगा पंडित काम ना आए,
ना पोथी ना पतरा,
एक बात है सुन ले भाई,
लोक तंत्र है खतरा।

आवाज रूह की,

आवाज रूह की,

ना तख्त के लिए,
ना ताज के लिए,
ना नाम की भी ख्वाहिश,
ना नाज के लिए,
दफ़न ना रह जाएं कहीं,
लफ्ज़ कोई सीने में,
मैं लिखता हूं रूह की,
आवाज के लिए।

 

=====
उस सत में ना चिंता पीड़ा,
ये जग उसकी है बस क्रीड़ा,
नर का पर ये जीवन कैसा,
व्यर्थ विफलता दुख संपीड़ा,
प्रभु राह की अंतिम बाधा ,
तृष्णा काम मिटाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में,
ये पहचान कराएं कैसे?
=====
खुद को खोने से डरता है,
जीवन सोने से भरता है,
तिनका तिनका महल सजाकर,
जीवन में उठता गिरता है।
प्रभु प्रेम में खोकर मिलता,
उसको जग जतलाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में
ये पहचान कराएं कैसे?
======
सम्मान

भाड़ में गया ईगो विगो,
और भाड़ सम्मान,
बंधु जेब में होने चाहिए,
भर के नोट तमाम,
भर के नोट तमाम।

@
अजय अमिताभ सुमन

चाय

बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई

@
अजय अमिताभ सुमन

पहचान

लोग पूछते हैं मुझसे,
मेरे मजहब का नाम,
नाकाफी है शायद,
मेरा इंसान होना।

@
अजय अमिताभ सुमन

हादसा

अखबार में आ जाए,
ये तय नहीं है,
हादसा तो है,
पर समय नहीं है।

@
अजय अमिताभ सुमन से तेरी,पहचान चाहता हूं।

हो खुद की निगाहों में,नेक जरा सोच लो,
तराजू पर तेरा, ईमान चाहता हूं,
ये पूछ ना मैं कैसा,इम्तिहान चाहता हूं।

अजय अमिताभ सुमन

आवाज रूह की,

ना तख्त के लिए,
ना ताज के लिए,
ना नाम की भी ख्वाहिश,
ना नाज के लिए,
दफ़न ना रह जाएं कहीं,
लफ्ज़ कोई सीने में,
मैं लिखता हूं रूह की,
आवाज के लिए।

@
अजय अमिताभ सुमन

भूख

बड़ी मुश्किल थी राह , गुजर चूका हूँ मैं ,
ये भी क्या कम है कि , सुधर चूका हूँ मैं।
मिला नहीं इरम तो फिकर नहीं है मुझको ,
हूँ भूख से मैं हैरान , बिफर चूका हूँ मैं।
ले जाओ तुम ये राहें वो जन्नत के नक्शे,
कई बार हीं चला पर उजड़ चुका हूँ मैं।
सह ना सकेंगी आँखे, चिरागों की रोशन,
अंधा हुआ था कब का उबर चूका हूँ मैं।

अजय अमिताभ सुमन

आदमियत

जाके कोई क्या पूछे भी ,
आदमियत के रास्ते ।
क्या पता किन किन हालातों
से गुजरता आदमी ।
चुने किसको हसरतों ,
जरूरतों के दरमियाँ ।
एक को कसता है तो ,
दूजे से पिसता आदमी ।

अजय अमिताभ सुमन
======
राख

गलतियाँ करना है फितरत ,
करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना ,
कि दोहराता है आदमी ।
आदमी की हसरतों का ,
क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर ,
राख मांगे आदमी ।

अजय अमिताभ सुमन
=====
जरूरी नहीं

हर जीत का मतलब,
हार हो जरूरी नहीं।
नफे के वास्ते,
करार हो जरूरी नहीं।
जीत हार नफा हानि,
बेशक मजबूरी मगर,
हर रिश्ते का मतलब,
व्यापार हो जरूरी नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
जहां आंखों में आग

जब तन बदन में फकत,
जिस्म की नुमाईस हो,
फिर क्या हुस्न के चर्चे,
मोहब्बत की पैमाइश हो।
ये खेल नहीं जिस्म का,
है रूह की ये दौलत,
जहां आंखों में आग कहां,
इश्के आजमाइस हो।

अजय अमिताभ सुमन
====

ना पूछो मैं क्या कहता हूँ ,
क्या करता हूँ क्या सुनता हूँ .
हूँ दुनिया को देखा जैसे ,
चलते वैसे ही मैं चलता हूँ .
सूरज का उगना है मुश्किल ,
फिर भी खुशफहमियों से सजता हूँ .
कभी तो होगी सुबह सुहानी ,
शाम हूँ यारो मैं ढलता हूँ
=====
मेरे नाम में अचानक,
ये क्या सूझी है तुझको ,
बदनाम मैं बड़ा हूँ ,
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
मेरे जीवन पे मुझको
कोई नहीं भरोसा .
मेरी मौत पे हुकूमत
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
=====
यहाँ कत्ल नही देखते ,
देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के ,
अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।
बेखौफ घुमती है ,
कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी ,
बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।
======
हम आह भी भरते है ,
तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के ,
खैरात ही कुछ ऐसे है।
फरियाद अपनी लेके ,
बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है ,
सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।
=====
लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,
बेनामशराफत जताने की भी हद है .
वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,
=====
इंतजाम

तेरी खिदमत के चर्चे मैं कैसे सरेआम करूं,
कहां से शुरू हो कहां को तमाम करूं।
कि मेरी हीं मिट्टी और मेरा हीं पसीना,
और नाम फकत तेरा हो इतना इंतजाम करूं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ सोचना तो था

क्या बोलना था तुझको ना कहने से पहले,
कुछ सोचना तो था कुछ भी कहने से पहले,
नुकसान हीं हो हरदम जरुरी नहीं,
ना कहने से बाद , सम्भलने से पहले।

अजय अमिताभ सुमन
========
तुझे बुन भी लूँ

तू पूछे और मैं सुन भी लूँ जरुरी नहीं,
गर सुन लूँ तो चुन भी लूँ जरुरी नहीं।
कुछ कहने का तुझपे तासीर भी तो हो,
कुछ कह भी दूं तुझे बुन भी लूं जरुरी नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
======
क्यूँ संभलता नहीं

इन आँखों से ईश्वर तुम जानोगे कैसे?
है पानी बरफ का तुम छानोगे कैसे?
है नदिया के पानी सा हर पल बदलता,
खुद रहता बिन बदला पहचानोगे कैसे?

अजय अमिताभ सुमन
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पुरुषोत्तम

पुरुषों में हैं श्रेष्ठ राम ये लोग नहीं यूँ हीं कहते,
उत्तम नर कई सारे हैं सब,राम नहीं बना करते।
जिस रावण ने प्रभु राम को,वन वन में भटकाया था,
धोखे से हर ली थी उनकी ,सीता को तड़पाया था।
उस रावण को मृत होने पर,जो भ्राता कह पाते है,
ऐसे हीं मर्यादा अनुगामी,पुरुषोत्तम कहलाते हैं।

अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में

कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
========
अंधेरे में जब डर लगता

अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?

कैसे पेड़ पर पत्ते आते?पतझड़ में कैसे झड़ जाते?
कैसे कोयल कूक सुनाती,खेतों में हरियाली छाती?

चमगादड़ को दिशा दिखाता,बिना आंख बतलाता कौन,
और रात में उल्लू के, नयनों को ज्योति देता कौन?

अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?

अजय अमिताभ सुमन

सर्वाधिकार सुरक्षित
======
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई

बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी दीमक सारी, ओहदेदार की बीमारी।

कि कुर्सी के कच्चे चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।

घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।

दफ्तर के जो थे मारे , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई,

अजय अमिताभ सुमन
=====
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा

धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?
सी.एन.जी. का नाम बढ़ेगा,
कबतक आखिर कबतक?
जनता की पीड़ा तो हर लो,
कीमत आटे की कम कर लो।
भूख मिटी तो सब नाचेंगे ,
बेस्ट देश है सब गाएंगे।
रोटी के अन्धे क्या गाए ,
बेहतर भारत कब तक?
======
देश में नए विधान की

आन पड़ी है आज जरूरत,
देश में नए विधान की,

नए समय में नई समस्या ,
मांगे नए निदान की।

आज सभी को साथ मिलाकर ,
रचने नए प्रतिमान की,

यही वक्त है गाथा लिखने,
भारत देश महान की।

अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,
तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।
======
लोग पूछते हैं मुझसे , मेरे मजहब का नाम ,
नाकाफी है शायद मेरा इन्सान होना .
======
उसने करके ख़बरदार , मारा बेनाम को ,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं .
=======
दुनिया ये चीज ठीक है सच से चलती नहीं,
झूठ है मुकम्मल पर थोड़ा ईमान भी रखो।
=======
जाति , धर्म, मजहब की पहचान भी रखो,
अल्लाह जेहन में ठीक ,भगवान भी रखो।
======
सजा सुनाई तूने, क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं, और वो नजरों से गिर गया।
======
ना समन्दर की तरह गहरे , ना खाली ईन्सान की तरह ,
"
अमिताभ" तुम जिए भी तो क्या जिए , महज एक इन्सान की तरह.
=====
रोटी की जद्दोजहद में , “अमिताभ तू बदला कहाँ,
पहले खा नहीं सकते थे, अब खा नहीं पाते।
=====
जो खरीदी नहीं जा सकती
उसी के खरीदार है बाजार में ,
हाथ की लकीरें देखी जाती है
बेनामबदली नहीं जाती .
=====
अजीब है अंदाज
आदमी के प्यास की भी,
कभी समंदर कम पड़ जाता है
कभी आंसू भारी पड़ जाते
=====
हाथ में होते हुए भी
नहीं है आदमी के हाथ में,
अजीब है ये लकीरें
आदमी के हाथ की ।
=====
क्या खूब अख्तियार है, पीने पे जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
=====
जो खोजता है, मिलता नहीं,
जो मिलता है, खोजता नहीं,
आदमी इसीलिए फलता नहीं, फूलता नहीं।
=====
उसने करके खबरदार , मारा अमिताभ को,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं।
======
"
अमिताभ" के प्यास की, बात ही कुछ खास है,
समंदर से कुछ भी न , कम की तलाश है।
=====
इस दुनिया में आने की हो गयी ऐसी खता,
बदस्तूर अभी तक जारी है वो सिलसिला।
=====
ज़माने ने किया नहीं कोई अत्याचार है,
"
अमिताभ " तो खुद की गलतियों का शिकार है।
=====
ये क्या किया "अमिताभ", कि शख्सियत ही खुल गयी,
तेरी जुबाँ से बेहतर , तेरी ख़ामोशी थी।
=====
जितने भी घाव दिए उसने,
मेरी छाती पे ही दिये,
वो आदमी था बुरा जरूर,
पर इतना बुरा भी नहीं।
=====
सजा सुनाई तूने,
क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं,
और वो नजरों से उतर गया।।
=====
जग जब भी दिखता है तुमको,
जग सच हीं दिखता है तुमको।
=====
जब मन डोला,
उड़न खटोला।
=====
नफरतों के दामन में,
जल रहे जो सभी है,
कौन सा है मजहब इनका ,
कौन इनके नबी हैं?
=====
बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,
अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।
=====
गर दुष्कृत्य रचाकर कोई खुद को कह पाता हो वीर ,
न्याय विवेचन में निश्चित हीं बाधा पड़ी हुई गंभीर।
=====
भिन्नता का भाव ना हो, मोह का स्वभाव ना हो,
अर्थ आदि की विवशता , खिन्नता आभाव ना हो।
=====
हवाओं पे कोई कहानी लिखूँ,
क्यों अपनी मैं जिंदगानी लिखूँ?
=====
पोंगा पंडित काम ना आए,
ना पोथी ना पतरा,
एक बात है सुन ले भाई,
लोक तंत्र है खतरा।
=====
पता नहीं किस शहर का,
अजीब वो बाशिंदा है,
कि हकीक़त से घायल,
ख्वाबों पे जिंदा है।
=====
ज़ुबानों के थोड़े फ़सादी हुए क्या,
कहने लगे लोग जेहादी हुए क्या ?
=====
अगर मस्जिद में तू है, मंदिर में तू है,
मंदिर पे मस्जिद पे नफरत फिर क्यूँ है?
====
धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,
ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।
=====
अजीब है ख़ुदा तू , तेरी ख़ुदाई भी,
तू भी साथ में और मेरी तन्हाई भी।
=====
रेत के समंदर सी दुनिया में हम हैं,
पता भी चले कैसे ये कैसा भरम है?
=====
जो तेरा है सच सच्चाई है वो,
जरूरी नहीं कि अच्छाई है वो।
=====
ढूंढ़ता हूँ शहर में कोई तो बाशिंदा हो,
जो जगा हुआ भी हो और जिन्दा हो।
====
क्यों बांधे बुत में तू उसको
जो फैला है यहीं कहीं,
क्या तेरे मंदिर से पहले,
ये ईश्वर था कहीं नहीं?
=====
तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,
काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।
=====
लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,
मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।
=====
चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,
पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।
=====
चलो कि सब ओढ़ के
बिस्तर हो जाएं,
दफ्तर हो आएं
=====
हे ईश्वर संसार तुम्हारा

अद्भुत है आकार तुम्हारा,
हे ईश्वर संसार तुम्हारा

अजय अमिताभ सुमन

तेरे हीं नामों को लिखकर
कितने हीं महाग्रंथ लिखे हैं,
योग ,जोग, नियोग अधिज्ञाता,
तंत्र मंत्र आदि ग्रंथ फले हैं।
====
लड़के तो होते हैं भैया
शिव जी के अवतार,

10
रंग के लाल लिपिस्टिक
भस्म विभूति, ना कोई श्रृंगार

मीट भात सब चटल रहे
दांत आंत पर डटल रहे

पटल, अटल,सकल, सफल,
तरल, तलल, गरल

अतीत क्या व्यतीत है , ये काल क्या व्यतीत है,
भूतकाल की काया में, वर्तमान भयभीत है।
========
किस किस की नजर को हम देखें,हम सबकी नजर में रहते हैं,
किस्मत हीं ऐसी पाई है, हर वक्त सफर में रहते है।
=======
लेना हो तुझको जो गर्मी का माज,
मई दुपहरी में दिल्ली को आजा।

ताजा, सजा, आधा, सीधा सादा, राजा, ज्यादा
=====

बिन बोले सुन पाता कौन?

न्याय उन्हीं का जो लड़ रहते, उनका ना जो रहते मौन,
उनका क्या जो चुप रह जाते, उनकी बातें सुनता कौन?
जो प्यासा पानी को कहता ,अक्सर उसकी प्यास मिटी है,
जो निज हालत रोता रहता, कब उसकी हां सांस टिकी है?
पौधे जो चुप रह जाते है, हौले हौले छंट जाते है,
पशुओं की वाणी ना होती, इसीलिए तो कट जाते हैं।
जो कहता सब उनकी सुनते, गूंगे तो रह जाते गौण।
न्याय मिले क्या कुछ तो बोलो, बिन बोले सुन पाता कौन?
अजय अमिताभ सुमन
====
मृतशेष

विकट विघ्न जब भी आता है ,या तो भय छा जाता है ,
या जो सुप्त रहा मानव में , ओज प्रबल आ जाता है।
या तो भय संतप्त धूमिल , होने लगते शोकाकुल नर,
या तो थर्र थर्र कम्पित होने , लगते हैं अरिदल के स्वर।
या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय,
शत्रु शिविर को जो चलता हो हार फले कि या हो जय।
ऐसे हीं नर अरिसिंधु में मृत होकर भी शेष रहे,
हां ये शूर हीं विशेष रहे मृत होकर भी मृतशेष रहे।

अजय अमिताभ सुमन
==========
क्या रखा लड़ने में


नर क्या यत्न करे उस क्षण जब युक्ति समझ ना आती हो,
विकराल काल हो और बुद्धि ना मुक्ति मार्ग दिखाती हो।
जटिल राह है कठिन लक्ष्य और मार्ग अति दू:साध्य कहीं,
चंड काल को हरना दुश्कर कार्य जटिल पर साध्य कहीं।
अतिशय साहस संबल संचय करके जो नर लक्ष्य करे,
प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निज बल को हवभक्ष्य करे।
अति वेदना में होती बेशक तन मन से पथ अड़ने में ,
पर निज प्रण अपूर्णित करके भी क्या रखा लड़ने में?

अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में


कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
पर ना ज्ञानी मैं वैरागी , मेरा चित्त बस जय का रागी,
मुझको तो अच्छा लगता बस, जीत हर्ष के होने में।

अजय अमिताभ सुमन
=====

बिन बोले सुन पाता कौन?


न्याय उन्हीं का जो लड़ रहते, उनका ना जो रहते मौन,

उनका क्या जो चुप रह जाते, उनकी बातें सुनता कौन?

जो प्यासा पानी को कहता ,अक्सर उसकी प्यास मिटी है,

जो निज हालत रोता रहता, कब उसकी हां सांस टिकी है?

पौधे जो चुप रह जाते है, हौले हौले छंट जाते है,

पशुओं की वाणी ना होती, इसीलिए तो कट जाते हैं।

जो कहता सब उनकी सुनते, गूंगे तो रह जाते गौण।

न्याय मिले क्या कुछ तो बोलो, बिन बोले सुन पाता कौन?

अजय अमिताभ सुमन 

====

 

मृतशेष



विकट विघ्न जब भी आता है ,या तो भय छा जाता है ,

या जो सुप्त रहा मानव में , ओज प्रबल जाता है।

या तो भय संतप्त धूमिल , होने लगते  शोकाकुल नर,

या तो थर्र थर्र कम्पित होने , लगते हैं अरिदल के स्वर।

या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय,

शत्रु शिविर को जो चलता हो हार फले कि या हो जय।

ऐसे हीं नर अरिसिंधु में मृत होकर भी शेष रहे

हां ये शूर हीं विशेष रहे मृत होकर भी मृतशेष रहे।



अजय अमिताभ सुमन 

==========

क्या रखा लड़ने में



नर क्या यत्न करे उस क्षण जब युक्ति समझ ना आती हो,

विकराल काल हो और बुद्धि ना  मुक्ति  मार्ग दिखाती हो। 

जटिल राह है कठिन लक्ष्य और मार्ग अति दू:साध्य कहीं,

चंड काल को हरना दुश्कर कार्य जटिल पर  साध्य कहीं।

अतिशय साहस संबल संचय करके जो नर लक्ष्य करे,

प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निज बल को हवभक्ष्य करे।

अति वेदना में होती बेशक  तन मन से पथ अड़ने में ,

पर निज प्रण अपूर्णित करके भी क्या रखा लड़ने में?



अजय अमिताभ सुमन

========

क्या रखा है जीत हार में



कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,

जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।

हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,

और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।

कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,

जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।

पर ना ज्ञानी मैं वैरागी , मेरा चित्त बस जय का रागी,

मुझको तो अच्छा लगता बस, जीत हर्ष के होने में।



अजय अमिताभ सुमन

==========



जो उद्भट निज प्रण का किंचित ना जीवन में मान रखे,

उस योद्धा का जीवन रण में कोई क्या सम्मान रखे?

या अहन्त्य को हरना था या शिव के हाथों मरना था,

या शिशार्पण यज्ञअग्नि को मृत्यु आलिंगन करना था?

========

जीवन पथ की राहों पर घनघोर तूफ़ां जब भी आते हैं,

गहन हताशा के अंधियारे मानस पट पर छा जाते हैं।

इतिवृत के मुख्य पृष्ठ पर वो अध्याय बना पाते हैं ,

कंटक राहों से होकर जो निज व्यवसाय चला पाते हैं।

========

अभी धरा पर घायल हो पर लक्ष्य प्रबल अनजान नहीं,

विजयअग्नि की शिखाशांत है पर तुम हो नाकाम नहीं।

दृष्टि के मात्र आवर्तन से सूक्ष्म विघ्न भी बढ़ जाती है,

स्वविवेक अभिज्ञान करो कैसी भी बाधा हो जाती है।

========

जिस नदिया की नौका जाके नदिया के ना धार बहे ,

उस नौका का बचना मुश्किल कोई भी पतवार रहे?

जिन्हें चाह है इस जीवन में ईक्छित एक उजाले की,

उन राहों पे स्वागत करते शूल जनित पग छाले भी।

========

पैरों की पीड़ा छालों का संज्ञान अति आवश्यक है,

साहस श्रेयकर बिना ज्ञान के पर अभ्यास निरर्थक है।

व्यवधान आते रहते हैं पर परित्राण जरूरी है,

द्वंद्व कष्ट से मुक्ति कैसे मन का त्राण जरूरी है?

========

लड़कर वांछित प्राप्त नहीं तो अभिप्राय इतना हीं है ,

अन्य मार्ग संधान आवश्यक तुच्छप्राय कितना हीं है।

सोचो देखो क्या मिलता है नाहक शिव से लड़ने में ,

किंचित अब उपाय बचा है मैं तजकर शिव हरने में।

चिंगारी से जला नहीं जो

चिंगारी से जला नहीं जो,
उसने कब प्रकाश रचा है,
अंधेरों में चला नहीं जो,
उसने कब इतिहास रचा है।
आड़ी तिरछी सी गलियों से,
जो लड़ते गाथा रचते,
जिसको सीधी राह मिली हो,
उसने कब मधुमास रचा है,
चिंगारी से जला नहीं जो,
उसने कब प्रकाश रचा है।

@
अजय अमिताभ सुमन

=====
उस सत में ना चिंता पीड़ा,
ये जग उसकी है बस क्रीड़ा,
नर का पर ये जीवन कैसा,
व्यर्थ विफलता दुख संपीड़ा,
प्रभु राह की अंतिम बाधा ,
तृष्णा काम मिटाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में,
ये पहचान कराएं कैसे?
=====
खुद को खोने से डरता है,
जीवन सोने से भरता है,
तिनका तिनका महल सजाकर,
जीवन में उठता गिरता है।
प्रभु प्रेम में खोकर मिलता,
उसको जग जतलाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में
ये पहचान कराएं कैसे?
======

सम्मान

भाड़ में गया ईगो विगो,
और भाड़ सम्मान,
बंधु जेब में होने चाहिए,
भर के नोट तमाम,
भर के नोट तमाम।

@
अजय अमिताभ सुमन

अभागी

जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन


चाय

बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई

@
अजय अमिताभ सुमन

वक्त और काम

कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।

जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।

@
अजय अमिताभ सुमन

पहचान

लोग पूछते हैं मुझसे,
मेरे मजहब का नाम,
नाकाफी है शायद,
मेरा इंसान होना।

@
अजय अमिताभ सुमन

हादसा

अखबार में आ जाए,
ये तय नहीं है,
हादसा तो है,
पर समय नहीं है।

@
अजय अमिताभ सुमन

ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-एमंजिल का।

बार

वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन


चाय

बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई

@
अजय अमिताभ सुमन

कॉर्पोरेट

या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।

@
अजय अमिताभ सुमन

प्रश्न विकट है मेरे मन में,
आए बारंबार,
क्या सच में होते हैं लड़के,
भैरव के अवतार।

ना कोई व्यापार

लड़के तो होते हैं भैया
शिव जी के अवतार,

10
रंग के लाल लिपिस्टिक
भस्म विभूति, ना कोई श्रृंगार

मीट भात सब चटल रहे
दांत आंत पर डटल रहे

पटल, अटल,सकल, सफल,
तरल, तलल, गरल

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अगर दिवस हो छत्तीस घंटे


काला ज्यादा , कम सफेद है,
बस इसी बात का तो खेद है।

हैरान बस इस बात का ,
हैरान नहीं हूँ मैं ,
खुद से हीं अपरिचित ,
अंजान हूँ मैं.
=====
रात के अंधेरों में तू भी क्या चीज है,
जुगनूओं की रोशनी हीं तुझको अजीज है।
रेत के समंदर में कारवां बिखर गया,
और तू कि फरेब हीं, मरीचिका उम्मीद है ।
=====
ना नास्तिक ना आस्तिक
वास्तविक , स्वास्तिक
=====
पुरुषोत्तम श्रीराम

गद्दी त्यागे, राज्य भी त्यागे,
त्यागे सब सुख धाम,
तब जाके हीं बन पाए वो,
पुरुषोत्तम श्रीराम,

हे ईश्वर संसार तुम्हारा

अद्भुत है आकार तुम्हारा,
हे ईश्वर संसार तुम्हारा

अजय अमिताभ सुमन

तेरे हीं नामों को लिखकर
कितने हीं महाग्रंथ लिखे हैं,
योग ,जोग, नियोग अधिज्ञाता,
तंत्र मंत्र आदि ग्रंथ फले हैं।

माघ की रात

फिर छाने लगी रूह में
सर्द माघ की रात,
सन सन करती दिन रात दिन,
रूह कांपती रात।

अजय अमिताभ सुमन

आजाद है

आजाद कौन था,
आजाद कौन है,
इस प्रश्न पर धरा ये,
क्यों आज मौन है,

इस देश पर मिटा जो,
आजाद नहीं था,
मिट्टी पर था टिका जो,
आजाद वो ही था।

अभागी

जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन

वक्त और काम

कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।

@
अजय अमिताभ सुमन

फूल और कांटे

जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।

@
अजय अमिताभ सुमन
ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-एमंजिल का।

बार

वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन

चाय

बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई

@
अजय अमिताभ सुमन

कॉर्पोरेट

या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।

@
अजय अमिताभ सुमन

आसमान की तरह

ना समन्दर के माफ़िक़ गहरे,
ना खाली आसमान की तरह,
ये जीना भी कोई जीना है
कि महज इंसान की तरह।

अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा और हवा

दिखते तो हो हर जगह ,दिखते पर नहीं,
रहते तो हो इस दिल में, छिपते पर नहीं,
हो नजर के सामने और नजरों से ओझल,
हवा हो क्या खुदा तुम, मिलते पर नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
हाथ की लकीरें

हाथ में रहकर भी नहीं आदमी के हाथ में,
हाथ की लकीरें भी चीज क्या है वाइज।

अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा हो गया है

तेरे हीं शहर में तुझी को ढूंढता हूँ,
अब बता भी दे अपना पता ,
क्या तू भी खुदा हो गया है?

अजय अमिताभ सुमन
अहम का था बना वो, वहम में हिल गया,
मिट्टी से न जुड़ा था , मिट्टी में मिल गया।
=====
ये वकील का पेशा है या कि पत्थरों की दास्तां,
क़ि जीत पे जश्न नहीं, हार का गम नहीं।
====
होते कुछ और हो, दिखाते कुछ और हो,
बेनामखुद को अख़बार समझ रखा है क्या।
====
अमीरों को मलाल , गरीबी ना मिली,
गरीबों को मलाल,अमीरी ना मिली।
पलंग पे सोते अमीर को तरसे गरीब,
और अमीर कि सुकून-ए-फकीरी ना मिली।
====
कैसे करूँ इंकार , काँटों का तेरे भगवन,
फूलों में तू उतना ही है, जितना की काँटों में।
====
पोंगा पंडित काम ना आए,
ना पोथी ना पतरा,
एक बात है सुन ले भाई,
लोक तंत्र है खतरा।

आवाज रूह की,

आवाज रूह की,

ना तख्त के लिए,
ना ताज के लिए,
ना नाम की भी ख्वाहिश,
ना नाज के लिए,
दफ़न ना रह जाएं कहीं,
लफ्ज़ कोई सीने में,
मैं लिखता हूं रूह की,
आवाज के लिए।
=====
बिना डाँट के जीवन कैसा,
फल बिना किसी तरुवर जैसा।
अति शराफत भी आफत है।

===========

क्यों दूँ खुद को मैं विश्राम

अथक परिश्रम नहीं आराम।
ना कर्मों को अल्प विराम।
कोर्ट केस के झगड़े सारे।
सुलझाने कई ल फड़े सारे।
मन में जो भी भाव हैं फलते।
गीत, कहानी, कविता गढ़ते।
और बढ़ानी भी निज आय।
संपन्नता का बनूँ पर्याय।
कई अधूरे नाम गिना दूँ।
सोने पर विश्राम लगा दूँ।
समय है कम और ज्यादा काम।
क्यों दूँ खुद को मैं विश्राम।

अजय अमिताभ सुमन
======
जुन से भी आफत

जुन से भी आफत जुलाई महीना।
पानी से राहत अब मिलता कहीं ना।
बादल इस मौसम में आए हुए हैं।
कीचड़ हीं सड़कों पर छाए हुए हैं।
सब्जी दुकानों पर आफत है छाई।
चावल भी लेने को शामत है भाई।
कपड़े सुखाने को जाएं कहाँ पर।
टपटपटप बूँदें आ जाती है छत पर।
भींगा है मौसम ना सुखता पसीना।
जुन से भी आफत जुलाई महीना।

अजय अमिताभ सुमन

====

 जंजीर


पुराना सा कोई मंजर, सीने में खल गया,
ये उठा दर्द और जी मचल गया।
बेफिक्री के आलम में यादों का खंजर,
चला तो क्या बुरा था, कि तू संभल गया,

अजय अमिताभ सुमन

#
जंजीर #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
=====
जिद

जो चाहा था मुझको मिला हीं नहीं,
पर किस्मत से कोई गिला हीं नहीं।
वक्त भी था महफ़िल भी जाम भी था ,
जिद मेरी थी दो घूँट मिला हीं नहीं।

अजय अमिताभ सुमन

#
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=====
ईमान

ये पूछ ना मैं कैसा,इम्तिहान चाहता हूं,
तेरी नज़रों से तेरी,पहचान चाहता हूं।
हो खुद की निगाहों में,नेक जरा सोच लो,
तराजू पर तेरा, ईमान चाहता हूं,
ये पूछ ना मैं कैसा,इम्तिहान चाहता हूं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
दलील

वकीलों ,दलीलों,
मुवक्किल के रार में,
पूछते हो रखा क्या,
कोर्ट के करार में?
यही एक धंधा ऐसा .
कि जीत पे है पैसा,
और हारने पर सीख है,
क़ानून के बाजार में।
और पूछते हो रखा क्या,
कोर्ट के करार में?

अजय अमिताभ सुमन
=====
मैं हूं बालक एक नादान

मैं हूं बालक एक नादान,
विनती सुन ले हे भगवान,
छोटा हूं छोटी सी अर्जी,
छोटा सा हीं मेरा काम।
गर मैं तेरा हूं विश्वासी,
मैडम को तू दे दे खांसी,
छुट्टी कर दे एक वीक की,
इतने से चल जाए काम।

अजय अमिताभ सुमन
=====

सच गटक गई

यूं हीं न था कि ऐसा,
गलत अटक गई,
ये चाय भी थी कैसी,
हलक झटक गई।
कि अर्से से आदत तो,
और हीं थी साहब,
थी प्याली वो झूठ की,
सच गटक गई ।

अजय अमिताभ सुमन
=====
दो हाथ आदमी के

अच्छे है बुरे हैं हालत आदमी के,
दिन रात पड़े पीछे हालात आदमी के।
लहरें बड़ी है ऊंची साहिल पे जा अड़ा ये,
ले रेत की ये मुठ्ठी क्या बात आदमी के।
मिट्टी से जो बना है मिट्टी में मिल जायेगा,
हवा में फिर उड़ेंगे जर्रात आदमी के।
रुखसत हुए तो जाना सब काम थे अधूरे,
क्या क्या करे जहां में दो हाथ आदमी के।

अजय अमिताभ सुमन
=====
हिन्दुस्तान दिखता है

तेरी हीं नजरों का हुनर ,
ये हिंदू वो मुसलमां ,
मैं अनाड़ी हूं सब में,
इंसान दिखता है।
ना उत्तर ना दक्षिण,
ना पूरब का कोई,
मैं अंधा हूँ मुझको,
हिन्दुतान दिखता है।

अजय अमिताभ सुमन
=====
हवा हो क्या तुम

ना आँखों से ओझल
पर दिखते नहीं,
है पास भी तो मेरे ,
पर मिलते नहीं।
छिपते भी ऐसे कि
मौजूं हो हरपल,
हवा हीं हो क्या तुम ,
मिलते नहीं ?

अजय अमिताभ सुमन
=====

आदमियत

जाके कोई क्या पूछे भी ,
आदमियत के रास्ते ।
क्या पता किन किन हालातों
से गुजरता आदमी ।
चुने किसको हसरतों ,
जरूरतों के दरमियाँ ।
एक को कसता है तो ,
दूजे से पिसता आदमी ।

अजय अमिताभ सुमन
======
राख

गलतियाँ करना है फितरत ,
करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना ,
कि दोहराता है आदमी ।
आदमी की हसरतों का ,
क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर ,
राख मांगे आदमी ।

अजय अमिताभ सुमन
=====
जरूरी नहीं

हर जीत का मतलब,
हार हो जरूरी नहीं।
नफे के वास्ते,
करार हो जरूरी नहीं।
जीत हार नफा हानि,
बेशक मजबूरी मगर,
हर रिश्ते का मतलब,
व्यापार हो जरूरी नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
जहां आंखों में आग

जब तन बदन में फकत,
जिस्म की नुमाईस हो,
फिर क्या हुस्न के चर्चे,
मोहब्बत की पैमाइश हो।
ये खेल नहीं जिस्म का,
है रूह की ये दौलत,
जहां आंखों में आग कहां,
इश्के आजमाइस हो।

अजय अमिताभ सुमन
====

ना पूछो मैं क्या कहता हूँ ,
क्या करता हूँ क्या सुनता हूँ .
हूँ दुनिया को देखा जैसे ,
चलते वैसे ही मैं चलता हूँ .
सूरज का उगना है मुश्किल ,
फिर भी खुशफहमियों से सजता हूँ .
कभी तो होगी सुबह सुहानी ,
शाम हूँ यारो मैं ढलता हूँ

=====

मेरे नाम में अचानक,
ये क्या सूझी है तुझको ,
बदनाम मैं बड़ा हूँ ,
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
मेरे जीवन पे मुझको
कोई नहीं भरोसा .
मेरी मौत पे हुकूमत
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
=====
यहाँ कत्ल नही देखते ,
देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के ,
अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।
बेखौफ घुमती है ,
कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी ,
बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।
======
हम आह भी भरते है ,
तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के ,
खैरात ही कुछ ऐसे है।
फरियाद अपनी लेके ,
बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है ,
सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।
=====
लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,
बेनामशराफत जताने की भी हद है .
वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,
=====
इंतजाम

तेरी खिदमत के चर्चे मैं कैसे सरेआम करूं,
कहां से शुरू हो कहां को तमाम करूं।
कि मेरी हीं मिट्टी और मेरा हीं पसीना,
और नाम फकत तेरा हो इतना इंतजाम करूं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ सोचना तो था

क्या बोलना था तुझको ना कहने से पहले,
कुछ सोचना तो था कुछ भी कहने से पहले,
नुकसान हीं हो हरदम जरुरी नहीं,
ना कहने से बाद , सम्भलने से पहले।

अजय अमिताभ सुमन
========
तुझे बुन भी लूँ

तू पूछे और मैं सुन भी लूँ जरुरी नहीं,
गर सुन लूँ तो चुन भी लूँ जरुरी नहीं।
कुछ कहने का तुझपे तासीर भी तो हो,
कुछ कह भी दूं तुझे बुन भी लूं जरुरी नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
======
क्यूँ संभलता नहीं

इन आँखों से ईश्वर तुम जानोगे कैसे?
है पानी बरफ का तुम छानोगे कैसे?
है नदिया के पानी सा हर पल बदलता,
खुद रहता बिन बदला पहचानोगे कैसे?

अजय अमिताभ सुमन
====
पुरुषोत्तम

पुरुषों में हैं श्रेष्ठ राम ये लोग नहीं यूँ हीं कहते,
उत्तम नर कई सारे हैं सब,राम नहीं बना करते।
जिस रावण ने प्रभु राम को,वन वन में भटकाया था,
धोखे से हर ली थी उनकी ,सीता को तड़पाया था।
उस रावण को मृत होने पर,जो भ्राता कह पाते है,
ऐसे हीं मर्यादा अनुगामी,पुरुषोत्तम कहलाते हैं।

अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में

कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
=====
अंधेरे में जब डर लगता

अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?

कैसे पेड़ पर पत्ते आते?पतझड़ में कैसे झड़ जाते?
कैसे कोयल कूक सुनाती,खेतों में हरियाली छाती?

चमगादड़ को दिशा दिखाता,बिना आंख बतलाता कौन,
और रात में उल्लू के, नयनों को ज्योति देता कौन?

अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?

अजय अमिताभ सुमन

सर्वाधिकार सुरक्षित
======
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई

बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी दीमक सारी, ओहदेदार की बीमारी।

कि कुर्सी के कच्चे चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।

घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।

दफ्तर के जो थे मारे , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई,

अजय अमिताभ सुमन
=====
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा

धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?
सी.एन.जी. का नाम बढ़ेगा,
कबतक आखिर कबतक?
जनता की पीड़ा तो हर लो,
कीमत आटे की कम कर लो।
भूख मिटी तो सब नाचेंगे ,
बेस्ट देश है सब गाएंगे।
रोटी के अन्धे क्या गाए ,
बेहतर भारत कब तक?
======
देश में नए विधान की

आन पड़ी है आज जरूरत,
देश में नए विधान की,

नए समय में नई समस्या ,
मांगे नए निदान की।

आज सभी को साथ मिलाकर ,
रचने नए प्रतिमान की,

यही वक्त है गाथा लिखने,
भारत देश महान की।

अजय अमिताभ सुमन
=====
आहट

गर्मी की लहरें क्या आफत बड़ी थी,
तपती दुपहरी की शामत पड़ी थी।
खिड़की से आती थी लू की वो लपटें,
जी को बस ठंडक की चाहत बड़ी थी।
जरूरी नहीं कि लू लहरी कुछ कम हो,
इतना हीं काफी कि अग्नि कुछ नम हों।
बारिश ना आई पर ठंडक तो पहुंची,
कि मेघों की आहट से राहत बड़ी थी।

अजय अमिताभ सुमन

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भूख

बड़ी मुश्किल थी राह , गुजर चूका हूँ मैं ,
ये भी क्या कम है कि , सुधर चूका हूँ मैं।
मिला नहीं इरम तो फिकर नहीं है मुझको ,
हूँ भूख से मैं हैरान , बिफर चूका हूँ मैं।
ले जाओ तुम ये राहें वो जन्नत के नक्शे,
कई बार हीं चला पर उजड़ चुका हूँ मैं।
सह ना सकेंगी आँखे, चिरागों की रोशन,
अंधा हुआ था कब का उबर चूका हूँ मैं।

अजय अमिताभ सुमन

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कंक्रीट

तपती धूप की मारी जनता, पशु पंछी व गाय,
बदन जले है अगन चले है, कहाँ से लाये राय।
चला चक्र ये अजब काल का, भूले मठ्ठा सत्तू,
फिर कैसे लू गर्मी से बच पाए जीव व जंतु।
पेड़ काट के ए. सी. कूलर. फ्रिज. तो रहे चलाय,
पर कैसे तुम ले आगे ,ठंडक पी कर चाय।
वन नदिया को चलो जिलाओ यही मात्र उपाय,
धरती की हरियाली का ना कंक्रीट पर्याय।

अजय अमिताभ सुमन

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सिंहासन

जा जाके सब टी. वी. खोलो, सिंहासन का भाषण तोलो।
क्या कुछ दिखता है कुछ अंतर, इस मुखड़े से कुछ तो बोलो।
मोदी मोदी बात चली थी , मोदी की सरकार चली थी।
एन.डी.ए.सरकार बनी क्यों, सोचो तो कुछ परदे खोलो।

अजय अमिताभ सुमन

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जंजीर

पुराना सा कोई मंजर, सीने में खल गया,
ये उठा दर्द और जी मचल गया।
बेफिक्री के आलम में यादों का खंजर,
चला तो क्या बुरा था, कि तू संभल गया,

अजय अमिताभ सुमन

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हवा हो क्या तुम

ना आँखों से ओझल
पर दिखते नहीं,
है पास भी तो मेरे ,
पर मिलते नहीं।
छिपते भी ऐसे कि
मौजूं हो हरपल,
हवा हीं हो क्या तुम ,
मिलते नहीं ?

अजय अमिताभ सुमन
====
राख

गलतियाँ करना है फितरत ,
करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना ,
कि दोहराता है आदमी ।
आदमी की हसरतों का ,
क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर ,
राख मांगे आदमी ।

अजय अमिताभ सुमन
=====
जरूरी नहीं

हर जीत का मतलब,
हार हो जरूरी नहीं।
नफे के वास्ते,
करार हो जरूरी नहीं।
जीत हार नफा हानि,
बेशक मजबूरी मगर,
हर रिश्ते का मतलब,
व्यापार हो जरूरी नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
जहां आंखों में आग

जब तन बदन में फकत,
जिस्म की नुमाईस हो,
फिर क्या हुस्न के चर्चे,
मोहब्बत की पैमाइश हो।
ये खेल नहीं जिस्म का,
है रूह की ये दौलत,
जहां आंखों में आग कहां,
इश्के आजमाइस हो।

अजय अमिताभ सुमन
====

ना पूछो मैं क्या कहता हूँ ,
क्या करता हूँ क्या सुनता हूँ .
हूँ दुनिया को देखा जैसे ,
चलते वैसे ही मैं चलता हूँ .
सूरज का उगना है मुश्किल ,
फिर भी खुशफहमियों से सजता हूँ .
कभी तो होगी सुबह सुहानी ,
शाम हूँ यारो मैं ढलता हूँ
=====
मेरे नाम में अचानक,
ये क्या सूझी है तुझको ,
बदनाम मैं बड़ा हूँ ,
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
मेरे जीवन पे मुझको
कोई नहीं भरोसा .
मेरी मौत पे हुकूमत
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
=====
यहाँ कत्ल नही देखते ,
देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के ,
अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।
बेखौफ घुमती है ,
कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी ,
बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।
======
हम आह भी भरते है ,
तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के ,
खैरात ही कुछ ऐसे है।
फरियाद अपनी लेके ,
बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है ,
सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।
=====
लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,
बेनामशराफत जताने की भी हद है .
वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,
=====
इंतजाम

तेरी खिदमत के चर्चे मैं कैसे सरेआम करूं,
कहां से शुरू हो कहां को तमाम करूं।
कि मेरी हीं मिट्टी और मेरा हीं पसीना,
और नाम फकत तेरा हो इतना इंतजाम करूं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ सोचना तो था

क्या बोलना था तुझको ना कहने से पहले,
कुछ सोचना तो था कुछ भी कहने से पहले,
नुकसान हीं हो हरदम जरुरी नहीं,
ना कहने से बाद , सम्भलने से पहले।

अजय अमिताभ सुमन
========
तुझे बुन भी लूँ

तू पूछे और मैं सुन भी लूँ जरुरी नहीं,
गर सुन लूँ तो चुन भी लूँ जरुरी नहीं।
कुछ कहने का तुझपे तासीर भी तो हो,
कुछ कह भी दूं तुझे बुन भी लूं जरुरी नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
======
क्यूँ संभलता नहीं

इन आँखों से ईश्वर तुम जानोगे कैसे?
है पानी बरफ का तुम छानोगे कैसे?
है नदिया के पानी सा हर पल बदलता,
खुद रहता बिन बदला पहचानोगे कैसे?

अजय अमिताभ सुमन
====
पुरुषोत्तम

पुरुषों में हैं श्रेष्ठ राम ये लोग नहीं यूँ हीं कहते,
उत्तम नर कई सारे हैं सब,राम नहीं बना करते।
जिस रावण ने प्रभु राम को,वन वन में भटकाया था,
धोखे से हर ली थी उनकी ,सीता को तड़पाया था।
उस रावण को मृत होने पर,जो भ्राता कह पाते है,
ऐसे हीं मर्यादा अनुगामी,पुरुषोत्तम कहलाते हैं।

अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में

कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
========
अंधेरे में जब डर लगता

अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?

कैसे पेड़ पर पत्ते आते?पतझड़ में कैसे झड़ जाते?
कैसे कोयल कूक सुनाती,खेतों में हरियाली छाती?

चमगादड़ को दिशा दिखाता,बिना आंख बतलाता कौन,
और रात में उल्लू के, नयनों को ज्योति देता कौन?

अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?

अजय अमिताभ सुमन

सर्वाधिकार सुरक्षित
======
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई

बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी दीमक सारी, ओहदेदार की बीमारी।

कि कुर्सी के कच्चे चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।

घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।

दफ्तर के जो थे मारे , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई,

अजय अमिताभ सुमन
=====
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा

धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?
सी.एन.जी. का नाम बढ़ेगा,
कबतक आखिर कबतक?
जनता की पीड़ा तो हर लो,
कीमत आटे की कम कर लो।
भूख मिटी तो सब नाचेंगे ,
बेस्ट देश है सब गाएंगे।
रोटी के अन्धे क्या गाए ,
बेहतर भारत कब तक?
======
देश में नए विधान की

आन पड़ी है आज जरूरत,
देश में नए विधान की,

नए समय में नई समस्या ,
मांगे नए निदान की।

आज सभी को साथ मिलाकर ,
रचने नए प्रतिमान की,

यही वक्त है गाथा लिखने,
भारत देश महान की।

अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,
तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।
======
लोग पूछते हैं मुझसे , मेरे मजहब का नाम ,
नाकाफी है शायद मेरा इन्सान होना .
======
उसने करके ख़बरदार , मारा बेनाम को ,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं .
=======
दुनिया ये चीज ठीक है सच से चलती नहीं,
झूठ है मुकम्मल पर थोड़ा ईमान भी रखो।
=======
जाति , धर्म, मजहब की पहचान भी रखो,
अल्लाह जेहन में ठीक ,भगवान भी रखो।
======
सजा सुनाई तूने, क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं, और वो नजरों से गिर गया।
======
ना समन्दर की तरह गहरे , ना खाली ईन्सान की तरह ,
"
अमिताभ" तुम जिए भी तो क्या जिए , महज एक इन्सान की तरह.
=====
रोटी की जद्दोजहद में , “अमिताभ तू बदला कहाँ,
पहले खा नहीं सकते थे, अब खा नहीं पाते।
=====
जो खरीदी नहीं जा सकती
उसी के खरीदार है बाजार में ,
हाथ की लकीरें देखी जाती है
बेनामबदली नहीं जाती .
=====
अजीब है अंदाज
आदमी के प्यास की भी,
कभी समंदर कम पड़ जाता है
कभी आंसू भारी पड़ जाते
=====

दलील

वकीलों ,दलीलों,
मुवक्किल के रार में,
पूछते हो रखा क्या,
कोर्ट के करार में?
यही एक धंधा ऐसा .
कि जीत पे है पैसा,
और हारने पर सीख है,
क़ानून के बाजार में।
और पूछते हो रखा क्या,
कोर्ट के करार में?

अजय अमिताभ सुमन
=====
मैं हूं बालक एक नादान

मैं हूं बालक एक नादान,
विनती सुन ले हे भगवान,
छोटा हूं छोटी सी अर्जी,
छोटा सा हीं मेरा काम।
गर मैं तेरा हूं विश्वासी,
मैडम को तू दे दे खांसी,
छुट्टी कर दे एक वीक की,
इतने से चल जाए काम।

अजय अमिताभ सुमन
=====

सच गटक गई

यूं हीं न था कि ऐसा,
गलत अटक गई,
ये चाय भी थी कैसी,
हलक झटक गई।
कि अर्से से आदत तो,
और हीं थी साहब,
थी प्याली वो झूठ की,
सच गटक गई ।

अजय अमिताभ सुमन
=====
दो हाथ आदमी के

अच्छे है बुरे हैं हालत आदमी के,
दिन रात पड़े पीछे हालात आदमी के।
लहरें बड़ी है ऊंची साहिल पे जा अड़ा ये,
ले रेत की ये मुठ्ठी क्या बात आदमी के।
मिट्टी से जो बना है मिट्टी में मिल जायेगा,
हवा में फिर उड़ेंगे जर्रात आदमी के।
रुखसत हुए तो जाना सब काम थे अधूरे,
क्या क्या करे जहां में दो हाथ आदमी के।

अजय अमिताभ सुमन
=====
हिन्दुस्तान दिखता है

तेरी हीं नजरों का हुनर ,
ये हिंदू वो मुसलमां ,
मैं अनाड़ी हूं सब में,
इंसान दिखता है।
ना उत्तर ना दक्षिण,
ना पूरब का कोई,
मैं अंधा हूँ मुझको,
हिन्दुतान दिखता है।

अजय अमिताभ सुमन
=====
हवा हो क्या तुम

ना आँखों से ओझल
पर दिखते नहीं,
है पास भी तो मेरे ,
पर मिलते नहीं।
छिपते भी ऐसे कि
मौजूं हो हरपल,
हवा हीं हो क्या तुम ,
मिलते नहीं ?

अजय अमिताभ सुमन
=====

आदमियत

जाके कोई क्या पूछे भी ,
आदमियत के रास्ते ।
क्या पता किन किन हालातों
से गुजरता आदमी ।
चुने किसको हसरतों ,
जरूरतों के दरमियाँ ।
एक को कसता है तो ,
दूजे से पिसता आदमी ।

अजय अमिताभ सुमन
======
राख

गलतियाँ करना है फितरत ,
करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना ,
कि दोहराता है आदमी ।
आदमी की हसरतों का ,
क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर ,
राख मांगे आदमी ।

अजय अमिताभ सुमन
=====
जरूरी नहीं

हर जीत का मतलब,
हार हो जरूरी नहीं।
नफे के वास्ते,
करार हो जरूरी नहीं।
जीत हार नफा हानि,
बेशक मजबूरी मगर,
हर रिश्ते का मतलब,
व्यापार हो जरूरी नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
जहां आंखों में आग

जब तन बदन में फकत,
जिस्म की नुमाईस हो,
फिर क्या हुस्न के चर्चे,
मोहब्बत की पैमाइश हो।
ये खेल नहीं जिस्म का,
है रूह की ये दौलत,
जहां आंखों में आग कहां,
इश्के आजमाइस हो।

अजय अमिताभ सुमन
====

ना पूछो मैं क्या कहता हूँ ,
क्या करता हूँ क्या सुनता हूँ .
हूँ दुनिया को देखा जैसे ,
चलते वैसे ही मैं चलता हूँ .
सूरज का उगना है मुश्किल ,
फिर भी खुशफहमियों से सजता हूँ .
कभी तो होगी सुबह सुहानी ,
शाम हूँ यारो मैं ढलता हूँ
=====
मेरे नाम में अचानक,
ये क्या सूझी है तुझको ,
बदनाम मैं बड़ा हूँ ,
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
मेरे जीवन पे मुझको
कोई नहीं भरोसा .
मेरी मौत पे हुकूमत
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
=====
यहाँ कत्ल नही देखते ,
देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के ,
अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।
बेखौफ घुमती है ,
कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी ,
बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।
======
हम आह भी भरते है ,
तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के ,
खैरात ही कुछ ऐसे है।
फरियाद अपनी लेके ,
बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है ,
सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।
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लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,
बेनामशराफत जताने की भी हद है .
वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,
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इंतजाम

तेरी खिदमत के चर्चे मैं कैसे सरेआम करूं,
कहां से शुरू हो कहां को तमाम करूं।
कि मेरी हीं मिट्टी और मेरा हीं पसीना,
और नाम फकत तेरा हो इतना इंतजाम करूं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ सोचना तो था

क्या बोलना था तुझको ना कहने से पहले,
कुछ सोचना तो था कुछ भी कहने से पहले,
नुकसान हीं हो हरदम जरुरी नहीं,
ना कहने से बाद , सम्भलने से पहले।

अजय अमिताभ सुमन
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तुझे बुन भी लूँ

तू पूछे और मैं सुन भी लूँ जरुरी नहीं,
गर सुन लूँ तो चुन भी लूँ जरुरी नहीं।
कुछ कहने का तुझपे तासीर भी तो हो,
कुछ कह भी दूं तुझे बुन भी लूं जरुरी नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
======
क्यूँ संभलता नहीं

इन आँखों से ईश्वर तुम जानोगे कैसे?
है पानी बरफ का तुम छानोगे कैसे?
है नदिया के पानी सा हर पल बदलता,
खुद रहता बिन बदला पहचानोगे कैसे?

अजय अमिताभ सुमन
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पुरुषोत्तम

पुरुषों में हैं श्रेष्ठ राम ये लोग नहीं यूँ हीं कहते,
उत्तम नर कई सारे हैं सब,राम नहीं बना करते।
जिस रावण ने प्रभु राम को,वन वन में भटकाया था,
धोखे से हर ली थी उनकी ,सीता को तड़पाया था।
उस रावण को मृत होने पर,जो भ्राता कह पाते है,
ऐसे हीं मर्यादा अनुगामी,पुरुषोत्तम कहलाते हैं।

अजय अमिताभ सुमन
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क्या रखा है जीत हार में

कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
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अंधेरे में जब डर लगता

अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?

कैसे पेड़ पर पत्ते आते?पतझड़ में कैसे झड़ जाते?
कैसे कोयल कूक सुनाती,खेतों में हरियाली छाती?

चमगादड़ को दिशा दिखाता,बिना आंख बतलाता कौन,
और रात में उल्लू के, नयनों को ज्योति देता कौन?

अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?

अजय अमिताभ सुमन

सर्वाधिकार सुरक्षित
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जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई

बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी दीमक सारी, ओहदेदार की बीमारी।

कि कुर्सी के कच्चे चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।

घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।

दफ्तर के जो थे मारे , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई,

अजय अमिताभ सुमन
=====
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा

धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?
सी.एन.जी. का नाम बढ़ेगा,
कबतक आखिर कबतक?
जनता की पीड़ा तो हर लो,
कीमत आटे की कम कर लो।
भूख मिटी तो सब नाचेंगे ,
बेस्ट देश है सब गाएंगे।
रोटी के अन्धे क्या गाए ,
बेहतर भारत कब तक?
======
देश में नए विधान की

आन पड़ी है आज जरूरत,
देश में नए विधान की,

नए समय में नई समस्या ,
मांगे नए निदान की।

आज सभी को साथ मिलाकर ,
रचने नए प्रतिमान की,

यही वक्त है गाथा लिखने,
भारत देश महान की।

अजय अमिताभ सुमन
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आहट

गर्मी की लहरें क्या आफत बड़ी थी,
तपती दुपहरी की शामत पड़ी थी।
खिड़की से आती थी लू की वो लपटें,
जी को बस ठंडक की चाहत बड़ी थी।
जरूरी नहीं कि लू लहरी कुछ कम हो,
इतना हीं काफी कि अग्नि कुछ नम हों।
बारिश ना आई पर ठंडक तो पहुंची,
कि मेघों की आहट से राहत बड़ी थी।

अजय अमिताभ सुमन

#
आहट #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
====
भूख

बड़ी मुश्किल थी राह , गुजर चूका हूँ मैं ,
ये भी क्या कम है कि , सुधर चूका हूँ मैं।
मिला नहीं इरम तो फिकर नहीं है मुझको ,
हूँ भूख से मैं हैरान , बिफर चूका हूँ मैं।
ले जाओ तुम ये राहें वो जन्नत के नक्शे,
कई बार हीं चला पर उजड़ चुका हूँ मैं।
सह ना सकेंगी आँखे, चिरागों की रोशन,
अंधा हुआ था कब का उबर चूका हूँ मैं।

अजय अमिताभ सुमन

#
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कंक्रीट

तपती धूप की मारी जनता, पशु पंछी व गाय,
बदन जले है अगन चले है, कहाँ से लाये राय।
चला चक्र ये अजब काल का, भूले मठ्ठा सत्तू,
फिर कैसे लू गर्मी से बच पाए जीव व जंतु।
पेड़ काट के ए. सी. कूलर. फ्रिज. तो रहे चलाय,
पर कैसे तुम ले आगे ,ठंडक पी कर चाय।
वन नदिया को चलो जिलाओ यही मात्र उपाय,
धरती की हरियाली का ना कंक्रीट पर्याय।

अजय अमिताभ सुमन

#
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सिंहासन

जा जाके सब टी. वी. खोलो, सिंहासन का भाषण तोलो।
क्या कुछ दिखता है कुछ अंतर, इस मुखड़े से कुछ तो बोलो।
मोदी मोदी बात चली थी , मोदी की सरकार चली थी।
एन.डी.ए.सरकार बनी क्यों, सोचो तो कुछ परदे खोलो।

अजय अमिताभ सुमन

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जंजीर

पुराना सा कोई मंजर, सीने में खल गया,
ये उठा दर्द और जी मचल गया।
बेफिक्री के आलम में यादों का खंजर,
चला तो क्या बुरा था, कि तू संभल गया,

अजय अमिताभ सुमन

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जंजीर #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
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हवा हो क्या तुम

ना आँखों से ओझल
पर दिखते नहीं,
है पास भी तो मेरे ,
पर मिलते नहीं।
छिपते भी ऐसे कि
मौजूं हो हरपल,
हवा हीं हो क्या तुम ,
मिलते नहीं ?

अजय अमिताभ सुमन
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राख

गलतियाँ करना है फितरत ,
करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना ,
कि दोहराता है आदमी ।
आदमी की हसरतों का ,
क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर ,
राख मांगे आदमी ।

अजय अमिताभ सुमन
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जरूरी नहीं

हर जीत का मतलब,
हार हो जरूरी नहीं।
नफे के वास्ते,
करार हो जरूरी नहीं।
जीत हार नफा हानि,
बेशक मजबूरी मगर,
हर रिश्ते का मतलब,
व्यापार हो जरूरी नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
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जहां आंखों में आग

जब तन बदन में फकत,
जिस्म की नुमाईस हो,
फिर क्या हुस्न के चर्चे,
मोहब्बत की पैमाइश हो।
ये खेल नहीं जिस्म का,
है रूह की ये दौलत,
जहां आंखों में आग कहां,
इश्के आजमाइस हो।

अजय अमिताभ सुमन
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ना पूछो मैं क्या कहता हूँ ,
क्या करता हूँ क्या सुनता हूँ .
हूँ दुनिया को देखा जैसे ,
चलते वैसे ही मैं चलता हूँ .
सूरज का उगना है मुश्किल ,
फिर भी खुशफहमियों से सजता हूँ .
कभी तो होगी सुबह सुहानी ,
शाम हूँ यारो मैं ढलता हूँ
=====
मेरे नाम में अचानक,
ये क्या सूझी है तुझको ,
बदनाम मैं बड़ा हूँ ,
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
मेरे जीवन पे मुझको
कोई नहीं भरोसा .
मेरी मौत पे हुकूमत
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
=====
यहाँ कत्ल नही देखते ,
देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के ,
अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।
बेखौफ घुमती है ,
कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी ,
बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।
======
हम आह भी भरते है ,
तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के ,
खैरात ही कुछ ऐसे है।
फरियाद अपनी लेके ,
बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है ,
सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।
=====
लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,
बेनामशराफत जताने की भी हद है .
वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,
=====
इंतजाम

तेरी खिदमत के चर्चे मैं कैसे सरेआम करूं,
कहां से शुरू हो कहां को तमाम करूं।
कि मेरी हीं मिट्टी और मेरा हीं पसीना,
और नाम फकत तेरा हो इतना इंतजाम करूं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ सोचना तो था

क्या बोलना था तुझको ना कहने से पहले,
कुछ सोचना तो था कुछ भी कहने से पहले,
नुकसान हीं हो हरदम जरुरी नहीं,
ना कहने से बाद , सम्भलने से पहले।

अजय अमिताभ सुमन
========
तुझे बुन भी लूँ

तू पूछे और मैं सुन भी लूँ जरुरी नहीं,
गर सुन लूँ तो चुन भी लूँ जरुरी नहीं।
कुछ कहने का तुझपे तासीर भी तो हो,
कुछ कह भी दूं तुझे बुन भी लूं जरुरी नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
======
क्यूँ संभलता नहीं

इन आँखों से ईश्वर तुम जानोगे कैसे?
है पानी बरफ का तुम छानोगे कैसे?
है नदिया के पानी सा हर पल बदलता,
खुद रहता बिन बदला पहचानोगे कैसे?

अजय अमिताभ सुमन
====
पुरुषोत्तम

पुरुषों में हैं श्रेष्ठ राम ये लोग नहीं यूँ हीं कहते,
उत्तम नर कई सारे हैं सब,राम नहीं बना करते।
जिस रावण ने प्रभु राम को,वन वन में भटकाया था,
धोखे से हर ली थी उनकी ,सीता को तड़पाया था।
उस रावण को मृत होने पर,जो भ्राता कह पाते है,
ऐसे हीं मर्यादा अनुगामी,पुरुषोत्तम कहलाते हैं।

अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में

कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
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अंधेरे में जब डर लगता

अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?

कैसे पेड़ पर पत्ते आते?पतझड़ में कैसे झड़ जाते?
कैसे कोयल कूक सुनाती,खेतों में हरियाली छाती?

चमगादड़ को दिशा दिखाता,बिना आंख बतलाता कौन,
और रात में उल्लू के, नयनों को ज्योति देता कौन?

अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?

अजय अमिताभ सुमन

सर्वाधिकार सुरक्षित
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जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई

बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी दीमक सारी, ओहदेदार की बीमारी।

कि कुर्सी के कच्चे चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।

घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।

दफ्तर के जो थे मारे , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई,

अजय अमिताभ सुमन
=====
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा

धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?
सी.एन.जी. का नाम बढ़ेगा,
कबतक आखिर कबतक?
जनता की पीड़ा तो हर लो,
कीमत आटे की कम कर लो।
भूख मिटी तो सब नाचेंगे ,
बेस्ट देश है सब गाएंगे।
रोटी के अन्धे क्या गाए ,
बेहतर भारत कब तक?
======
देश में नए विधान की

आन पड़ी है आज जरूरत,
देश में नए विधान की,

नए समय में नई समस्या ,
मांगे नए निदान की।

आज सभी को साथ मिलाकर ,
रचने नए प्रतिमान की,

यही वक्त है गाथा लिखने,
भारत देश महान की।

अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,
तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।
======
लोग पूछते हैं मुझसे , मेरे मजहब का नाम ,
नाकाफी है शायद मेरा इन्सान होना .
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उसने करके ख़बरदार , मारा बेनाम को ,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं .
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दुनिया ये चीज ठीक है सच से चलती नहीं,
झूठ है मुकम्मल पर थोड़ा ईमान भी रखो।
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जाति , धर्म, मजहब की पहचान भी रखो,
अल्लाह जेहन में ठीक ,भगवान भी रखो।
======
सजा सुनाई तूने, क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं, और वो नजरों से गिर गया।
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ना समन्दर की तरह गहरे , ना खाली ईन्सान की तरह ,
"
अमिताभ" तुम जिए भी तो क्या जिए , महज एक इन्सान की तरह.
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रोटी की जद्दोजहद में , “अमिताभ तू बदला कहाँ,
पहले खा नहीं सकते थे, अब खा नहीं पाते।
=====
जो खरीदी नहीं जा सकती
उसी के खरीदार है बाजार में ,
हाथ की लकीरें देखी जाती है
बेनामबदली नहीं जाती .
=====
अजीब है अंदाज
आदमी के प्यास की भी,
कभी समंदर कम पड़ जाता है
कभी आंसू भारी पड़ जाते
=====
हाथ में होते हुए भी
नहीं है आदमी के हाथ में,
अजीब है ये लकीरें
आदमी के हाथ की ।
=====
क्या खूब अख्तियार है, पीने पे जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
=====
जो खोजता है, मिलता नहीं,
जो मिलता है, खोजता नहीं,
आदमी इसीलिए फलता नहीं, फूलता नहीं।
=====
उसने करके खबरदार , मारा अमिताभ को,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं।
======
"
अमिताभ" के प्यास की, बात ही कुछ खास है,
समंदर से कुछ भी न , कम की तलाश है।
=====
इस दुनिया में आने की हो गयी ऐसी खता,
बदस्तूर अभी तक जारी है वो सिलसिला।
=====
ज़माने ने किया नहीं कोई अत्याचार है,
"
अमिताभ " तो खुद की गलतियों का शिकार है।
=====
ये क्या किया "अमिताभ", कि शख्सियत ही खुल गयी,
तेरी जुबाँ से बेहतर , तेरी ख़ामोशी थी।
=====
जितने भी घाव दिए उसने,
मेरी छाती पे ही दिये,
वो आदमी था बुरा जरूर,
पर इतना बुरा भी नहीं।
=====
सजा सुनाई तूने,
क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं,
और वो नजरों से उतर गया।।
=====
जग जब भी दिखता है तुमको,
जग सच हीं दिखता है तुमको।
=====
जब मन डोला,
उड़न खटोला।
=====
नफरतों के दामन में,
जल रहे जो सभी है,
कौन सा है मजहब इनका ,
कौन इनके नबी हैं?
=====
बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,
अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।
=====
गर दुष्कृत्य रचाकर कोई खुद को कह पाता हो वीर ,
न्याय विवेचन में निश्चित हीं बाधा पड़ी हुई गंभीर।
=====

चिंगारी से जला नहीं जो

चिंगारी से जला नहीं जो,
उसने कब प्रकाश रचा है,
अंधेरों में चला नहीं जो,
उसने कब इतिहास रचा है।
आड़ी तिरछी सी गलियों से,
जो लड़ते गाथा रचते,
जिसको सीधी राह मिली हो,
उसने कब मधुमास रचा है,
चिंगारी से जला नहीं जो,
उसने कब प्रकाश रचा है।

@
अजय अमिताभ सुमन

=====
उस सत में ना चिंता पीड़ा,
ये जग उसकी है बस क्रीड़ा,
नर का पर ये जीवन कैसा,
व्यर्थ विफलता दुख संपीड़ा,
प्रभु राह की अंतिम बाधा ,
तृष्णा काम मिटाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में,
ये पहचान कराएं कैसे?
=====
खुद को खोने से डरता है,
जीवन सोने से भरता है,
तिनका तिनका महल सजाकर,
जीवन में उठता गिरता है।
प्रभु प्रेम में खोकर मिलता,
उसको जग जतलाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में
ये पहचान कराएं कैसे?
======

सम्मान

भाड़ में गया ईगो विगो,
और भाड़ सम्मान,
बंधु जेब में होने चाहिए,
भर के नोट तमाम,
भर के नोट तमाम।

@
अजय अमिताभ सुमन

अभागी

जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन


चाय

बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई

@
अजय अमिताभ सुमन

वक्त और काम

कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।

जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।

@
अजय अमिताभ सुमन

पहचान

लोग पूछते हैं मुझसे,
मेरे मजहब का नाम,
नाकाफी है शायद,
मेरा इंसान होना।

@
अजय अमिताभ सुमन

हादसा

अखबार में आ जाए,
ये तय नहीं है,
हादसा तो है,
पर समय नहीं है।

@
अजय अमिताभ सुमन

ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-एमंजिल का।

बार

वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन


चाय

बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई

@
अजय अमिताभ सुमन

कॉर्पोरेट

या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।

@
अजय अमिताभ सुमन

प्रश्न विकट है मेरे मन में,
आए बारंबार,
क्या सच में होते हैं लड़के,
भैरव के अवतार।

ना कोई व्यापार

लड़के तो होते हैं भैया
शिव जी के अवतार,

10
रंग के लाल लिपिस्टिक
भस्म विभूति, ना कोई श्रृंगार

मीट भात सब चटल रहे
दांत आंत पर डटल रहे

पटल, अटल,सकल, सफल,
तरल, तलल, गरल

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अगर दिवस हो छत्तीस घंटे


काला ज्यादा , कम सफेद है,
बस इसी बात का तो खेद है।

हैरान बस इस बात का ,
हैरान नहीं हूँ मैं ,
खुद से हीं अपरिचित ,
अंजान हूँ मैं.
=====
रात के अंधेरों में तू भी क्या चीज है,
जुगनूओं की रोशनी हीं तुझको अजीज है।
रेत के समंदर में कारवां बिखर गया,
और तू कि फरेब हीं, मरीचिका उम्मीद है ।
=====
ना नास्तिक ना आस्तिक
वास्तविक , स्वास्तिक
=====
पुरुषोत्तम श्रीराम

गद्दी त्यागे, राज्य भी त्यागे,
त्यागे सब सुख धाम,
तब जाके हीं बन पाए वो,
पुरुषोत्तम श्रीराम,

हे ईश्वर संसार तुम्हारा

अद्भुत है आकार तुम्हारा,
हे ईश्वर संसार तुम्हारा

अजय अमिताभ सुमन

तेरे हीं नामों को लिखकर
कितने हीं महाग्रंथ लिखे हैं,
योग ,जोग, नियोग अधिज्ञाता,
तंत्र मंत्र आदि ग्रंथ फले हैं।

माघ की रात

फिर छाने लगी रूह में
सर्द माघ की रात,
सन सन करती दिन रात दिन,
रूह कांपती रात।

अजय अमिताभ सुमन

आजाद है

आजाद कौन था,
आजाद कौन है,
इस प्रश्न पर धरा ये,
क्यों आज मौन है,

इस देश पर मिटा जो,
आजाद नहीं था,
मिट्टी पर था टिका जो,
आजाद वो ही था।

अभागी

जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन

वक्त और काम

कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।

@
अजय अमिताभ सुमन

फूल और कांटे

जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।

@
अजय अमिताभ सुमन
ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-एमंजिल का।

बार

वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में

@
अजय अमिताभ सुमन

आप्त

तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।

@
अजय अमिताभ सुमन

चाय

बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई

@
अजय अमिताभ सुमन

कॉर्पोरेट

या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।

@
अजय अमिताभ सुमन

आसमान की तरह

ना समन्दर के माफ़िक़ गहरे,
ना खाली आसमान की तरह,
ये जीना भी कोई जीना है
कि महज इंसान की तरह।

अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा और हवा

दिखते तो हो हर जगह ,दिखते पर नहीं,
रहते तो हो इस दिल में, छिपते पर नहीं,
हो नजर के सामने और नजरों से ओझल,
हवा हो क्या खुदा तुम, मिलते पर नहीं।

अजय अमिताभ सुमन
=====
हाथ की लकीरें

हाथ में रहकर भी नहीं आदमी के हाथ में,
हाथ की लकीरें भी चीज क्या है वाइज।

अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा हो गया है

तेरे हीं शहर में तुझी को ढूंढता हूँ,
अब बता भी दे अपना पता ,
क्या तू भी खुदा हो गया है?

अजय अमिताभ सुमन
अहम का था बना वो, वहम में हिल गया,
मिट्टी से न जुड़ा था , मिट्टी में मिल गया।
=====
ये वकील का पेशा है या कि पत्थरों की दास्तां,
क़ि जीत पे जश्न नहीं, हार का गम नहीं।
====
होते कुछ और हो, दिखाते कुछ और हो,
बेनामखुद को अख़बार समझ रखा है क्या।
====
अमीरों को मलाल , गरीबी ना मिली,
गरीबों को मलाल,अमीरी ना मिली।
पलंग पे सोते अमीर को तरसे गरीब,
और अमीर कि सुकून-ए-फकीरी ना मिली।
====
कैसे करूँ इंकार , काँटों का तेरे भगवन,
फूलों में तू उतना ही है, जितना की काँटों में।
====
पोंगा पंडित काम ना आए,
ना पोथी ना पतरा,
एक बात है सुन ले भाई,
लोक तंत्र है खतरा।

आवाज रूह की,

आवाज रूह की,

ना तख्त के लिए,
ना ताज के लिए,
ना नाम की भी ख्वाहिश,
ना नाज के लिए,
दफ़न ना रह जाएं कहीं,
लफ्ज़ कोई सीने में,
मैं लिखता हूं रूह की,
आवाज के लिए।
=====

हाथ में होते हुए भी
नहीं है आदमी के हाथ में,
अजीब है ये लकीरें
आदमी के हाथ की ।
=====
क्या खूब अख्तियार है, पीने पे जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
=====
जो खोजता है, मिलता नहीं,
जो मिलता है, खोजता नहीं,
आदमी इसीलिए फलता नहीं, फूलता नहीं।
=====
उसने करके खबरदार , मारा अमिताभ को,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं।
======
"
अमिताभ" के प्यास की, बात ही कुछ खास है,
समंदर से कुछ भी न , कम की तलाश है।
=====
इस दुनिया में आने की हो गयी ऐसी खता,
बदस्तूर अभी तक जारी है वो सिलसिला।
=====
ज़माने ने किया नहीं कोई अत्याचार है,
"
अमिताभ " तो खुद की गलतियों का शिकार है।
=====
ये क्या किया "अमिताभ", कि शख्सियत ही खुल गयी,
तेरी जुबाँ से बेहतर , तेरी ख़ामोशी थी।
=====
जितने भी घाव दिए उसने,
मेरी छाती पे ही दिये,
वो आदमी था बुरा जरूर,
पर इतना बुरा भी नहीं।
=====
सजा सुनाई तूने,
क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं,
और वो नजरों से उतर गया।।
=====
जग जब भी दिखता है तुमको,
जग सच हीं दिखता है तुमको।
=====
जब मन डोला,
उड़न खटोला।
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नफरतों के दामन में,
जल रहे जो सभी है,
कौन सा है मजहब इनका ,
कौन इनके नबी हैं?
=====
बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,
अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।
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गर दुष्कृत्य रचाकर कोई खुद को कह पाता हो वीर ,
न्याय विवेचन में निश्चित हीं बाधा पड़ी हुई गंभीर।
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