तेरह वर्ष अँधियारे बीते, फिर अरुणोदय आया है, वन की ज्वाला में तपकर अब, पार्थ प्रखर हो आया है। जिसको तुमने मौन समझकर, दुर्बलता का नाम दिया, उसने अपने धैर्य-वज्र से, काल-चक्र को थाम लिया!
वन की धूल नहीं यह समझो, यह रण का शृंगार बनी, तप की प्रत्येक अग्नि आज, प्रतिशोध नहीं, हुंकार बनी। जिस भुजा ने देवों के सम्मुख, मृत्यु-द्वार ललकारा था, आज उसी के सम्मुख देखो, कुरुकुल का अँधियारा था!
दुर्योधन! मत समझो मुझको, वन ने शिथिल बनाया है, जिसको विपदा ने तपाया हो, वह वज्र बनकर आया है! भूख मिली तो क्षुधा सहा, अपमान मिला तो मौन रहा, भाग्य प्रहारों से टकराकर, मैं अपने पथ पर अडिग रहा!
मुझको न स्वर्ण-मुकुट की इच्छा, न साम्राज्य का मोह मुझे, न जयमालाओं की लालसा, न यश का आकर्षण मुझे। मैं तो उस अधिकार हेतु आया, जिसका हरण किया तुमने, धर्मराज के सत्य-राज्य को, छल से छीन लिया तुमने!
कहाँ गया वह दर्प तुम्हारा, कहाँ सभा की वाणी है? कहाँ गई वह हँसी तुम्हारी, कहाँ दुष्ट अभिमानी है? कहाँ गया वह गर्व, बताओ, जो नारी पर भारी था? कहाँ गया वह न्याय, तुम्हारा, जो केवल दरबारी था?
याद करो उस सभा-भवन को, जहाँ धर्म लज्जित था, जहाँ द्रौपदी का प्रश्न खड़ा था, और मौन प्रतिष्ठित था। केश खिंचे, आँसू बरसे थे, काँपा था सम्मान वहाँ, किन्तु तुम्हारे गर्वित मन में, जागा नहीं विधान वहाँ!
वह अपमान अभी जीवित है, वह प्रतिज्ञा भी शेष यहाँ, न्याय प्रतीक्षा करता अब तक, कुरुवंश के इस देश यहाँ। मैं उस पीड़ा का प्रतिशोधी बनकर मात्र नहीं आया, धर्म-तुला पर कर्म तुम्हारे रखने आज चला आया!
आज परीक्षा पार्थ की नहीं, कौरव-कुल की होगी, आज तुम्हारे शौर्य-गर्व की अंतिम कसौटी होगी! देखें किसकी भुजा प्रचंड है, किसका साहस सच्चा है, किसके भीतर धर्म जागता, किसका मन बस कच्चा है!
मत पूछो कि संख्या कितनी है, मत गिनना रथ, घोड़े, मत देखो कितने धनुर्धर हैं, कितने भाले, कितने कोड़े। जब संकल्प हिमालय बनता, सेना गौण हो जाती है, एक अकेली सत्य-प्रतिज्ञा, युग पर भारी पड़ जाती है!
आज न वाणी युद्ध करेगी, न छल का व्यापार चलेगा, आज न कुटिल नीतियों का कोई अत्याचार चलेगा। आज धनुष की टंकारों में, उत्तर सारे मिल जाएँगे, आज कर्म के लेख स्वयं ही, भाग्य-विधान लिख जाएँगे!
मैं प्रतिशोध-ज्वाला का दास नहीं, धर्माग्नि का रक्षक हूँ, अन्यायों के घोर तिमिर में, सत्य-सूर्य का वाहक हूँ। कुन्ती-सुत हूँ, पार्थ नाम है, गांडीव मेरी पहचान, कर्मभूमि में सत्य निभाना, मेरा धर्म, मेरा प्राण!
तेरह वर्षों की तप-साधना, आज मुखर होने आई, मौन हृदय की ज्वाला अब, रण में प्रखर होने आई। वन-वन भटका, कष्ट सहे, पर धैर्य नहीं खोने पाया, काल स्वयं भी रोक न पाया, जो संकल्प हृदय में आया!
अब तक वन की धूल सही है, अब रण-धूल उड़ाऊँगा, अब तक मौन रहा गांडीव, अब उसका नाद सुनाऊँगा! अब तक रोका था वेग बाण का, अब वह वेग बहेगा, जिसने धर्म-वृक्ष काटा है, उसका फल भी ढहेगा!
संख्या का अभिमान न करना, शस्त्रों पर मत इतराना, वीर वही जो धर्म हेतु, संकट में भी शीश उठाना। रथ पर रथ हों, सैन्य अपार हो, नभ तक उठते ध्वज हों, सत्य अकेला खड़ा रहे तो, उसके आगे सब नगण्य हों!
आज न क्षमा-विनय की बेला, आज न मिथ्या मान, आज कर्म की कसौटी पर, तौला जाएगा अभिमान। कौन धनुर्धर, कौन महाबल, कौन प्रतिज्ञा का धनी, आज धरा पर लिखेगी गाथा, किसकी कीर्ति अमिट बनी!
आज दिशाओं के हृदयों में, कम्पन भरने वाला हूँ, गिरि-शिखरों की निद्रा तोड़ूँ, ऐसा स्वर करने वाला हूँ। प्रत्यंचा की एक टंकार से, नभ का मौन टूट जाएगा, सोया हुआ समय भी सुनकर, युग-परिवर्तन गाएगा!
आज न मेघों की गर्जन से, धरती भयभीत होगी, न बिजली की चपला से ही, रात प्रकाशित होगी। आज धनंजय के धनुषों से, अग्नि-स्वर फूटेंगे, आज बाण के वेग देखकर, पर्वत भी सिर झुकाएँगे!
प्राची पर अरुणिम आभा है, तम का अंत निकट आया, धर्म-सूर्य का रथ लेकर, पार्थ पुनः रण में आया। उठो कुरुवंश! सुनो ध्यान से, काल-द्वार पर चोट पड़ी, गाण्डीव की गर्जना उठी है, अधर्म-रात्रि की साँस अड़ी!
एक-एक अपमान हृदय में, अंगारों-सा पलता था, एक-एक अन्याय समय की, शिला पर अंकित चलता था। मैंने पीड़ा को पीकर भी, धैर्य-दीप जलने दिया, मैंने अपने क्रोध-विष को, धर्म-अमृत बनने दिया!
सुनो! धनुष की ध्वनि केवल, शस्त्रों का उद्घोष नहीं, यह पीड़ित जन के अधिकारों का, कोई साधारण घोष नहीं। ये बाण नहीं केवल लोहे के, ये प्रतिज्ञा के दूत बने, ये उन सबके प्रश्न हैं, जो अन्यायों से मौन सने!
पर याद रहे, हे कुरुवंशियो, रण केवल संहार नहीं, धर्म-विजय का अर्थ किसी का, अंधा अहंकार नहीं। जो न्याय बचाने हेतु उठता, वही शस्त्र पवित्र बने, जो लोभ हेतु रक्त बहाता, उसके यश भी धूल बनें!
आज पार्थ के बाण लिखेंगे, रणभूमि का इतिहास, आज परखे जाएँगे सारे, नीति, शौर्य और विश्वास। धर्म खिलेगा, सत्य फलेगा, टूटेंगे अन्याय-पाश, काल स्वयं साक्षी होगा, किसने निभाया धर्म-व्रत-विशेष!
आज न केवल पार्थ जगेगा, आज युगों का मान जगे, आज पराजित छल होगा, आज सत्य का गान जगे। देखो! नभ के वक्षस्थल पर, अग्नि-लिपि उभरने दो, गाण्डीव की टंकारों से, सोया इतिहास जगने दो!
मैं अर्जुन हूँ—वचन निभाने रणभूमि में आया हूँ, धर्म बचाने, सत्य जगाने, गांडीव उठाकर आया हूँ! आज बाण ही बोलेंगे, आज कर्म ही प्रमाण, आज धरा पर गूँजेगा—धर्मधनंजय का जयगान!
जिस नारी के केश खिंचे थे, उस सभा में शपथ शेष है,
उस अबला के अपमानों का ऋण अभी तक अवशेष है।
आज परीक्षा मेरी नहीं कौरव आज तुम्हारी बारी,
देखें किसमें लहु शेष है, देखें किसकी साँसें भारी!
एक-एक अपमान हृदय में, अग्नि बनकर जलता था,
एक-एक अन्याय समय में, अंकित होकर फलता था!
सुनो! यह केवल धनुष नहीं यह धर्म का घोष है,
ये बाण नहीं हैं मात्र हमारे ये काल आक्रोश है।
धन! धन! धन! धनंजय!
जय! जय! जय! अभय!
हुं! हुं! हुं! नभ काँपे! हे!
हे! हे! गिरि डोले!
हुम्! हुम्! हुम्! रण जागे!
धन! धन! धन! धनुष बोले!
आज पार्थ के बाण लिखेंगे, रणभूमि इतिहास,
न्याय फलेगा धर्म फलेगा मिटे अधर्मी पाश।
आज पार्थ का नाद दिवस है अम्बर में अंगार ,
देख आज इतिहास सुनेगा गाण्डीव की टंकार !
न राज्य-लालसा मुझे यहाँ, न यश का मोह बुलाता है,
जिसके छीने मान तुम्हीं ने वही अर्जित करने आता है।
कहाँ गया वो दर्प तुम्हारा, कहाँ गई वो कुत्सित वाणी?
कहाँ गया वो हास्य सभा का,कहाँ गई वो कुटिल कहानी?
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हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे! हे! हे! हे! हुं! हुं! हुं!
हे! हे! हे!हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे
[Bridge]
तेरह वर्ष की रजनी बीती, अब प्राची मुस्काई है,
वन में तपकर लौह हुई जो, वो ज्वाला फिर आई है।
जिसे समझकर मौन तपस्वी तुमने किया उपहास,
वही धनंजय खड़ा सामने, लिये प्रलय का पाश!
दुर्योधन मत समझो वन ने मुझको दुर्बल कर डाला,
भूख मिली तो धैर्य मिला, संकट से भीषण बल आया।
[Bridge]
धन! धन! धन! धनंजय!
जय! जय! जय! अभय!
हुं! हुं! हुं! नभ काँपे! हे!
हे! हे! गिरि डोले!
हुम्! हुम्! हुम्! रण जागे!
धन! धन! धन! धनुष बोले!
[Bridge]
प्रतिशोध का ताप नहीं दग्ध अग्नि सम ज्वाला हूँ,
धर्मराज का अनुज धनंजय, धर्म मर्म रखवाला हूँ।
आज न पूछो कौन अकेला, किसकी ओर है काल,
आज बाण लिखेंगे रण में रक्तिम विजय-विशाल।
आज नहीं तो कब जागेगा सत्य-शौर्य का मान?
आओ! देखूँ कौन बचाता निज मिथ्या अभिमान!
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जय! जय! जय! धर्म!
हर! हर! हर! कर्म!
हे! हे! हे! कौन तीर
हुं! हुं! हुं! कौन वीर?
हे! हे! हे! कौन धीर?
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अब तक धूल सही है वन की, अब रण-धूल उड़ाऊँगा,
अब तक मौन रहा जो गाण्डीव, उसकी नाद सुनाऊँगा।
संख्या का अभिमान न करना, बाण हमारे बोलेंगे,
कुरु वंश के योद्धा सारे अपने शौर्य को तोलेंगे!
आज न कोई क्षमा-विनय, न कोई मिथ्या अभिमान,
रण में केवल कर्म बोलेंगे, कौन धनुर्धर, कौन महान!
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हुंऽऽऽ! हुंऽऽऽ! हुंऽऽऽ!
हरऽऽऽ! हरऽऽऽ! हरऽऽऽ!
हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे! हे! हे! हे! हुं! हुं! हुं!
हे! हे! हे!हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हुं! हे! हे! हे
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आज न बादल गरजेंगे, न बिजली ही चमकेगी,
आज प्रत्यंचा की ध्वनि से रणभूमि ये दहकेगी।
घोड़ों की टापों से धरती थर्रा-थर्रा जाएगी,
रथ के पहियों से रणभूमि जर्रा जर्रा कांपेगी।
आज पार्थ का नाद दिवस है अम्बर में अंगार ,
देख आज इतिहास सुनेगा गाण्डीव की टंकार !
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धन! धन! धन! धनंजय!
जय! जय! जय! अभय!
हुं! हुं! हुं! नभ काँपे! हे!
हे! हे! गिरि डोले!
हुम्! हुम्! हुम्! रण जागे!
धन! धन! धन! धनुष बोले!