हिंदी कोष:हिंदी कविताओं और कहानियों की पत्रिका
इस ब्लॉग पे प्रस्तुत सारी रचनाओं (लेख/हास्य व्ययंग/ कहानी/कविता) का लेखक मैं हूँ तथा ये मेरे द्वारा लिखी गयी है। मेरी ये रचना मूल है । मेरे बिना लिखित स्वीकीर्ति के कोई भी इस रचना का, या इसके किसी भी हिस्से का इस्तेमाल किसी भी तरीके से नही कर सकता। यदि कोई इस तरह का काम मेरे बिना लिखित स्वीकीर्ति के करता है तो ये मेरे अधिकारों का उल्लंघन माना जायेगा जो की मुझे कानूनन प्राप्त है। (अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित :Ajay Amitabh Suman:All Rights Reserved)
Monday, July 20, 2026
प्रश्नोत्तर
Monday, June 22, 2026
हास्य
===
20 .विनम्र
शिष्य : मैं बहुत विनम्र हूँ।
गुरु :नहीं , तुम्हे विनम्र होने का घमंड है .
===
19 .मुक्ति
शिष्य : मुक्ति क्या है?
गुरु : जब पड़ोसी की कार देखकर आसानी से नींद आ जाये .
===
18 .कठिन
शिष्य : जीवन इतना कठिन क्यों है?"
गुरु :इसे आसन बनाने का प्रयास छोड़ दो .
===
17 .व्यस्त
शिष्य : मैं सत्य का खोजी हूँ।
गुरु :बस बिजली बिल आते हीं छुप जाते हो .
15 .भटकन
शिष्य :मेरा मन बहुत भटकता है। क्या करूँ ?
गुरु :अपने घर का रास्ता हमेशा याद रखना .
14 .डिस्काउंट
शिष्य : मुझे मोक्ष चाहिए .
गुरु : पहले दान दो , स्वर्ग में डिस्काउंट नहीं मिलता .
13 .जीत
शिष्य :मैं हार गया।
गुरु :तुम्हारा अहंकार हारा है , तुम तो जीत गए .
12 .बदलाव
शिष्य :मैं दुनिया बदलना चाहता हूँ .
गुरु :पहले इस सोच को बदलो .
11 .कौन
शिष्य :मैं कौन हूँ?
गुरु :पहले ये जान लो तुम क्या नहीं हो .
10 .भविष्य
शिष्य : मैं भविष्य जानना चाहता हूँ .
गुरु :पहले वर्तमान में रहना तो जान लो .
===
9.माया
शिष्य : माया क्या है?
गुरु :सेल में गैर-ज़रूरी चीज़ खरीद लेना।
===
8.सत्यान्वेषण
शिष्य : मैं सत्य की रह पर निकलना चाहता हूँ .
गुरु : अच्छा है . पहले मोबाइल साइलेंट मोड पर कर लो .
===
7. उलझन
शिष्य :मेरा मन उलझन में हैं .
गुरु :बधाई हो , तुम सोचने लगे .
===
6.बेरोजगार
शिष्य : मेरी बेरोजगारी मुझे चिंतित करती है .
गुरु : स्वयं को पूर्ण समझो और कल की चिंता स्वयं बेरोजगार हो जाएगी .
===
5.शार्ट कट
शिष्य : ज्ञान प्राप्त करने का सबसे छोटा मार्ग क्या है .
गुरु :इस छोटे मार्ग को त्यागना .
===
4.शांति
शिष्य :आज के ज़माने में कैसे शांत रह सकते हैं ?
गुरु :वाई फाई से लड़ना बंद कर दो .
===
3.महानता
शिष्य :मुर्खता क्या है ?
गुरु :कोई अपनी महानता सिद्ध करने के लिए पहाड़ पर चढ़ जाता है और पहाड़ को इसका पता भी नहीं चलता .
===
2.खोज
शिष्य : कोई स्वयं को जान क्यों नहीं पाता ?
गुरु :क्योंकि स्वयं को जानने को खोज आईने से नहीं होती.
===
2.सत्य
शिष्य:"गुरुदेव, आपने महल छोड़कर कठोर तपस्या की। आखिर आपको क्या मिला?"
बुद्ध : "मुझे उस सत्य का बोध हुआ, जो हर जीव और हर स्थान में सदैव विद्यमान है।"
शिष्य: "यदि वही सत्य महल में भी था, तो उसे पाने के लिए आपने महल छोड़ा क्यों , क्या ये आवश्यक था?"
बुद्ध:सत्य को पाने के लिए महल छोड़ना आवश्यक नहीं था, आवश्यक था मेरे मन के भीतर बैठे हुए महल को छोड़ना। जिसने मन का महल छोड़ दिया, उसके लिए महल भी तपोवन है; और जिसने मन का महल नहीं छोड़ा, उसके लिए तपोवन भी एक महल हीं है।" मेरे द्वारा महल का त्याग स्थान का त्याग नहीं बल्कि मन का था जो कि सत्य की प्राप्ति हेतु आवश्यक था।
===
1. समाधि
शिष्य : समाधि कब घटित होती है ?
गुरु :जब तुम चश्मा पहनकर चश्मा ढूँढना बंद कर देते हो तब .
===
Friday, June 19, 2026
पुश अप Vs पेंच
वकील 1: मुझे एक भी ऐसा केस नहीं दिखा जहाँ सच और झूठ साफ़ दिखे।
वकील 2: तभी तो आप वकील हैं, जज होते तो परेशानी हो जाती।
Monday, May 4, 2026
1
मैं,
मेरा घर,
मेरा छोटा सा घर,
एक छोटे से गाँव में।
और गाँव,
मेरा गाँव,
मेरा छोटा सा गाँव,
कुछ खेतों के बीच,
कुछ पगडंडियों के बीच,
कुछ सपनों के बीच,
एक शहर के पास।
और शहर,
मेरा शहर,
वो छोटा सा शहर,
जहाँ हजारों चेहरे,
लाखों कहानियाँ,
अनगिनत सपने,
एक-दूसरे से मिलते हैं,
बिछड़ते हैं,
फिर अपनी-अपनी दिशाओं में चले जाते हैं,
एक राज्य में।
और राज्य,
मेरा राज्य,
मेरा छोटा सा राज्य,
जिसकी सीमाओं के भीतर
नदियाँ बहती हैं,
पर्वत खड़े हैं,
मैदान फैले हैं,
वन साँस लेते हैं,
और करोड़ों मनुष्य
अपने-अपने छोटे संसारों में जीते हैं,
मेरे इस देश में।
और देश,
मेरा देश,
मेरा प्यारा देश,
जिसकी मिट्टी में
किसी का बचपन है,
किसी की जवानी है,
किसी का बुढ़ापा है,
किसी की स्मृतियाँ हैं,
किसी के सपने हैं।
ऐसे सैंकड़ों देश,
ऐसे अनेक देश,
ऐसे अनगिनत देश,
इस धरती पर।
और धरती,
ये धरती,
मेरी प्यारी धरती,
मेरी छोटी सी धरती,
जिस पर मैं चलता हूँ,
जिसे मैं अपना कहता हूँ,
जिसके एक छोटे से कोने में
मेरा घर है,
मेरा गाँव है,
मेरा शहर है,
मेरा देश है,
और मेरा पूरा संसार है।
वही धरती
घूमती है गोल-गोल,
अपने अक्ष पर,
और घूमती है गोल-गोल
सूरज के चारों ओर,
अन्य ग्रहों के साथ।
और मैं सोचता हूँ—
जिस धरती को
मैं अपना पूरा संसार समझता हूँ,
वह स्वयं
इस विराट व्यवस्था में
कितनी छोटी है!
और सूरज,
मेरा सूरज,
मेरा प्यारा सूरज,
जिसकी एक किरण
मेरे घर की देहरी तक आती है,
जिसकी गर्मी
मेरे खेतों को जीवन देती है,
जिसकी रोशनी में
मेरी धरती चमकती है—
वह सूरज भी
अकेला नहीं।
वह घूमता है,
चलता है,
अपनी गति में,
अपने ग्रहों के साथ,
अपने तारों के साथ,
एक विशाल आकाशगंगा के भीतर।
और आकाशगंगा,
मेरी आकाशगंगा,
वो विशाल आकाशगंगा,
जिसे देखकर
मुझे अपना ब्रह्मांड लगता है।
जहाँ हजारों तारे,
करोड़ों तारे,
अरबों तारे,
अनगिनत तारे।
कुछ जन्म लेते हैं,
कुछ बुझ जाते हैं,
कुछ धधकते हैं,
कुछ विस्फोटित होते हैं,
कुछ अपने भीतर
रहस्यों को समेटे
अंधकार में विलीन हो जाते हैं।
जहाँ ब्लैक होल्स,
हजारों ब्लैक होल्स,
करोड़ों ब्लैक होल्स,
अनगिनत ब्लैक होल्स,
अपने भीतर
प्रकाश तक को
समेट लेने वाली
अदृश्य गहराइयों की तरह
महाकाश के रहस्यों को
अपने भीतर छिपाए बैठे हैं।
जहाँ समय भी
अपना अर्थ खो देता है,
जहाँ दूरी भी
एक प्रश्न बन जाती है,
जहाँ प्रकाश भी
अपनी सीमाओं से जूझता है।
जहाँ तारे
जन्म लेते हैं,
बड़े होते हैं,
जलते हैं,
बुझते हैं,
मिटते हैं—
और उनके मिटने से
फिर किसी नए जन्म की
संभावना बनती है।
और ऐसी आकाशगंगा,
एक नहीं।
हजारों आकाशगंगा,
करोड़ों आकाशगंगा,
अरबों आकाशगंगा,
अनगिनत आकाशगंगा।
कोई बन रही है,
कोई बिगड़ रही है,
कोई घूम रही है,
कोई टकरा रही है,
कोई जन्म ले रही है,
कोई अपना अस्तित्व खो रही है।
कहीं तारे बन रहे हैं,
कहीं तारे टूट रहे हैं,
कहीं प्रकाश जन्म ले रहा है,
कहीं अंधकार गहरा रहा है।
और इन सबके बीच
मेरा सूरज—
एक छोटा सा तारा।
और उसके साथ
मेरी धरती—
एक छोटा सा ग्रह।
और उस धरती पर
मेरा देश—
एक छोटा सा भूभाग।
और उस देश में
मेरा राज्य।
राज्य में
मेरा शहर।
शहर के पास
मेरा गाँव।
और उस गाँव में
मेरा घर।
और उस घर में—
मैं।
मैं!
कितना छोटा हूँ मैं?
इतना छोटा
कि अपनी ऊँचाई पर
मुझे गर्व है,
लेकिन ब्रह्मांड की ऊँचाई पर
मेरी ऊँचाई का कोई अर्थ नहीं।
इतना छोटा
कि मेरी चिंताएँ
मुझे पहाड़ लगती हैं,
पर महाकाश की विशालता में
वे शायद धूल के एक कण से भी छोटी हैं।
मेरी खुशियाँ,
मेरे दुःख,
मेरी जीत,
मेरी हार,
मेरी इच्छाएँ,
मेरी महत्वाकांक्षाएँ—
सब कुछ
मेरे लिए बहुत बड़ा,
पर ब्रह्मांड के लिए
शायद एक क्षण भर की
हल्की सी हलचल।
एक आकाश में
और वो आकाश भी
अकेला कहाँ?
ऐसे हजारों आकाश,
ऐसे लाखों आकाश,
ऐसे अनगिनत आकाश।
एक समय में,
और ऐसा एक समय
हर क्षण जन्म लेता है।
एक सेकंड—
जो मेरे लिए
घड़ी की टिक-टिक है।
वही एक सेकंड
कहीं किसी तारे के जन्म का क्षण है,
कहीं किसी तारे की मृत्यु का क्षण है,
कहीं किसी ग्रह की यात्रा का क्षण है,
कहीं किसी प्रकाश-कण की
अनंत यात्रा का एक छोटा सा पड़ाव है।
जहाँ एक सेकंड,
करोड़ों सेकंड,
अरबों सेकंड,
अनगिनत सेकंड—
मिलकर बनाते हैं
महासमय।
और उस महासमय में
मेरा पूरा जीवन?
बस एक क्षण।
एक क्षण का भी
शायद एक अंश।
जहाँ वॉर्महोल्स,
एक वॉर्महोल,
अनगिनत वॉर्महोल्स,
अंतरिक्ष की कल्पित
गहराइयों को
जोड़ने की संभावना लिए,
आकाश को
तोड़ते-मरोड़ते,
दूरी को
प्रश्न बनाते,
समय को
रहस्य बनाते,
महाकाश को
एक नए अर्थ में
देखने को विवश करते हैं।
जहाँ स्थान
सिर्फ स्थान नहीं,
समय
सिर्फ समय नहीं।
जहाँ दूरी
सिर्फ दूरी नहीं,
और गति
सिर्फ गति नहीं।
सब कुछ
किसी अदृश्य नियम में बँधा है,
किसी विराट लय में चलता है,
किसी अनसुने संगीत पर
नाचता है।
जहाँ ऐसे हजारों आकाश,
करोड़ों महाकाश,
अनगिनत संभावनाएँ,
बनती हैं,
बिगड़ती हैं,
जन्म लेती हैं,
मिटती हैं,
फिर किसी और रूप में
उभरती हैं—
समय में,
इस महासमय में।
और मैं?
मैं इन सबका हिस्सा।
एक अदना सा हिस्सा।
इतना छोटा
कि मेरी कोई सीमा नहीं दिखती,
इतना छोटा
कि मेरा अस्तित्व
ब्रह्मांड की विशालता में
लगभग नगण्य है।
फिर भी—
मैं हूँ।
मैं देखता हूँ।
मैं सोचता हूँ।
मैं प्रश्न करता हूँ।
मैं आकाश को देखता हूँ
और आकाश से पूछता हूँ—
मैं कौन हूँ?
कहाँ से आया हूँ?
कहाँ जा रहा हूँ?
क्या यह विराटता
मुझे देखती है?
या मैं ही
उस विराटता की
एक छोटी सी आँख हूँ,
जिससे
ब्रह्मांड स्वयं को
देखने की कोशिश कर रहा है?
शायद—
मेरा होना
ब्रह्मांड के लिए छोटा हो,
पर मेरे लिए
पूरा ब्रह्मांड है।
मेरी एक साँस,
मेरी एक धड़कन,
मेरी एक स्मृति,
मेरा एक सपना—
मेरे लिए
अनंत है।
और शायद
यही सबसे बड़ा रहस्य है—
कि अनंत ब्रह्मांड में
एक छोटा सा मनुष्य
अनंत को सोच सकता है।
एक छोटी सी आँख
अनंत आकाश को देख सकती है।
एक छोटा सा जीवन
महासमय की कल्पना कर सकता है।
और एक छोटा सा घर
पूरे ब्रह्मांड का प्रश्न
अपने भीतर रख सकता है।
मैं,
मेरा घर,
मेरा छोटा सा घर,
एक छोटे से गाँव में।
और गाँव,
मेरा छोटा सा गाँव,
एक शहर के पास।
और शहर,
मेरा छोटा सा शहर,
एक राज्य में।
और राज्य,
मेरा छोटा सा राज्य,
मेरे इस देश में।
और देश,
मेरा प्यारा देश,
इस छोटी सी धरती पर।
और धरती,
मेरी छोटी सी धरती,
इस विशाल अंतरिक्ष में।
और अंतरिक्ष,
उस महाकाश में।
और महाकाश,
उस महासमय में।
और महासमय,
उस अनंत ब्रह्मांड में।
और उस अनंत ब्रह्मांड में—
मैं।
मेरा छोटा सा जीवन।
मेरी छोटी सी साँस।
मेरा छोटा सा सपना।
मेरा छोटा सा घर।
और फिर भी—
मेरे भीतर
एक पूरा ब्रह्मांड।
मैं,
मेरा घर,
मेरा छोटा सा घर,
इस अनंत ब्रह्मांड में।
=====
चाह नहीं धन-धान्य संपदा,
चाह नहीं अतुलित बल-ज्ञान,
तुष्ट यदि ईश्वर मुझसे तो,
इच्छित तुझसे ये वरदान।
मेरे मन में रहे न लालच,
मेरे वचन रहें निष्कलंक,
सेवा में जीवन बीते मेरा,
कर्म बने मेरा पुण्य-पथ।
स्वार्थ नहीं हो राष्ट्र से ऊपर,
निज हित हो ना राष्ट्र महान,
तुष्ट यदि ईश्वर मुझसे तो,
इच्छित तुझसे ये वरदान।
भिन्न प्रान्त के भाषा-भाषी,
इस राष्ट्र के सकल निवासी,
अलीगढ़ याकि मथुरा-काशी,
राष्ट्रहित के हों अभिलाषी।
उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम,
एक रहे भारत की शान,
कश्मीर से कन्याकुमारी,
एक रहे भारत की जान।
भिन्न वेश हों, भिन्न बोलियाँ,
भिन्न रहें आचार-विचार,
पर संकट में एक हो जाएँ,
जैसे एक हो जल की धार।
जाति-धर्म की दीवारों से,
ऊपर उठे मनुज की पहचान,
तुष्ट यदि ईश्वर मुझसे तो,
इच्छित तुझसे ये वरदान।
दया-क्षमा का यहाँ वरण हो,
प्रतिहिंसा को नहीं शरण हो,
राम नाम पे नहीं मरण हो,
ना अजान पे कोई रण हो।
मंदिर में भी शांति बसी हो,
मस्जिद में भी प्रेम महान,
गुरुद्वारे में सेवा गूँजे,
गिरजे में हो करुणा-गान।
धर्म बने निज जीवन-पथ पर,
घृणा का हथियार न बन पाए,
पूजा अपनी, मान सभी का,
कोई दूजे को न झुकाए।
आस्था अपनी-अपनी हो पर,
मानवता हो प्रथम विधान,
तुष्ट यदि ईश्वर मुझसे तो,
इच्छित तुझसे ये वरदान।
धर्म नियंत्रित न हो शासन,
मंदिर-मस्जिद ना हो भाषण,
प्रभु विनती ये तुझसे हर क्षण,
जनहित तत्पर रहे प्रशासन।
न्याय मिले निर्बल को पहले,
शक्ति न खरीदे न्याय की शान,
राजधर्म का मूल यही हो—
जनसेवा ही शासन-प्राण।
न रिश्वत हो, न छल का शासन,
न भय हो, न पक्षपात हो,
जिसके हाथों सत्ता सौंपें,
उसमें जनहित की बात हो।
कानून सभी पर एक चले और,
एक रहे उसका सम्मान,
तुष्ट यदि ईश्वर मुझसे तो,
इच्छित तुझसे ये वरदान।
भिन्न जाति, भिन्न धर्म तमाम,
बने राष्ट्र के मज्जा-प्राण,
आर्यावर्त के जन-गण-मन में,
राष्ट्रधर्म हो सर्वप्रधान।
पर राष्ट्रधर्म का अर्थ यही हो—
सबका गौरव, सबका मान,
सबके अधिकारों की रक्षा,
सबके सपनों का सम्मान।
हे ईश्वर तू वृद्धि दे,
शासक-सेवक को बुद्धि दे,
सम्मान रहे अक्षुण्ण, अक्षय,
उनको निर्मल शुद्धि दे।
लोभ-मोह से दूर रहें वे,
सत्य रहे उनका संधान,
राजमहल से गाँव तलक हो,
सेवा का पावन अभियान।
इस देश की सब संतानें,
तजें घृणा, मिथ्या-अभिमान,
करें प्रेममय सुधा का पान,
भारत का हो नव-निर्माण।
न कोई भूखा, न बेघर हो,
न कोई लाचार रहे,
श्रम का पूरा मान मिले और,
मेहनत का अधिकार रहे।
किसान खेत में हँसता जाए,
श्रमिक नगर को गढ़ता जाए,
सीमा पर प्रहरी निर्भय होकर,
मातृभूमि की लाज बचाए।
शिक्षक ज्ञान-ज्योति फैलाएँ,
वैज्ञानिक करें नव-सृजन,
कर्मठ हाथों से लिखता जाए,
भारत अपना नव-युग-गण।
नर-नारी में ना कोई भय हो,
युवती सबल हो व निर्भय हो,
हर बेटी को शिक्षा मिले और,
हर बेटी का स्वप्न अजय हो।
घर हो उसका, राह हो उसकी,
निर्णय का भी अधिकार मिले,
नारी केवल पूजित ही नहीं,
जीवन में उसको सम्मान मिले।
बेटा-बेटी एक समान हों,
दोनों राष्ट्र की शक्ति बनें,
ज्ञान, कला, विज्ञान, खेल में,
दोनों अपनी भक्ति धरें।
जिस आँगन में जन्मे कन्या,
उस आँगन में उत्सव हो,
हर बेटी के पंख खुले और,
आकाशों तक उसका पथ हो।
विपदा पड़े न पड़े अकाल,
ना बाढ़, न कोई प्रलय हो,
धरती माँ का आँचल हरा हो,
नदियों में निर्मल जल हो।
वन जीवित हों, पर्वत सुरक्षित,
जलवायु का संतुलन रहे,
विकास हो पर प्रकृति के संग,
धरती का भी मान रहे।
नदियाँ सूखी नहीं मिलें और,
न नभ धुएँ से भरता जाए,
शहर बढ़ें पर गाँव न उजड़ें,
कृषक सुखी मुस्काता जाए।
अन्नदाता के घर में दीपक,
ऋण के तम को दूर करे,
जिस मिट्टी से अन्न उगे वह,
मिट्टी फिर से चूर न हो।
ज्ञान-ज्योति घर-घर में पहुँचे,
अज्ञान का तम दूर रहे,
पुस्तक, विद्यालय, शोध-संस्थान,
हर बच्चे के पास रहे।
गुरु का गौरव, शिष्य का श्रम हो,
शिक्षा में संस्कार महान,
ज्ञान बने मानवता का प्रहरी,
विज्ञान बने कल्याण-विधान।
आत्मज्ञान में ना कोई क्षय हो,
फलित सर्वदा लभित अजय हो,
मन में साहस, कर्म में निष्ठा,
लक्ष्य हमारा सदैव विजय हो।
पर विजय अहंकार न बनकर,
बने विनय का एक प्रमाण,
शक्ति मिले तो रक्षा करने,
नहीं किसी पर करने प्रहार।
विश्व गुरु हो पुनर्स्थापित,
देश का ऐसा दृढ़ निश्चय हो,
ज्ञान हमारा दीप बने और,
विश्व-कल्याण हमारा विषय हो।
वेदों से लेकर विज्ञानों तक,
ज्ञान-परंपरा जीवित हो,
योग, आयुर्वेद, दर्शन संग,
नव-विज्ञान की गति हो।
जम्बूद्वीप की शान बढ़े,
यहाँ ज्ञान बढ़े, विज्ञान बढ़े,
चहुँ ओर हो अभिनंदन कि,
आर्यावर्त का नाम बढ़े।
शोध हमारे नभ को छू लें,
सागर में अभियान बढ़े,
अंतरिक्ष से अणु तक भारत,
नव-निर्माण में आगे बढ़े।
भाषाएँ अपनी फूलों जैसी,
हर बोली का मान रहे,
तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम,
हिंदी का भी सम्मान रहे।
बंगाली, मराठी, पंजाबी,
गुजराती, असमिया संग,
भाषा चाहे कोई हो अपनी,
भारत सबसे ऊपर अंग।
कला बचे, संगीत बचे और,
बचे हमारी लोक-विरासत,
नृत्य, नाटक, शिल्प, साहित्य में,
जीवित रहे अपनी संस्कृति।
आधुनिकता का हाथ पकड़कर,
परंपरा का मान रहे,
नवयुग में भी अपनी जड़ों का,
मन में सदा सम्मान रहे।
सीमा पर जो वीर खड़े हैं,
उनके मन में बल देना,
घर से दूर जो देश बचाएँ,
उनको अपना संबल देना।
उनके परिवारों के जीवन में,
सुख-शांति का वास रहे,
भारत की हर साँस में उनकी,
वीरता का विश्वास रहे।
जो विपदा में काम आएँ वे,
उनके मन में दया रहे,
आपदाओं में हाथ बढ़े और,
मानवता की जय रहे।
रक्त न पूछे जाति किसी की,
दर्द न पूछे धर्म यहाँ,
दुख में जो बन जाए सहारा,
वही मनुष्य महान यहाँ।
शहरों में हो स्वच्छ हवा और,
गाँवों में समृद्धि आए,
तकनीक बने सबकी साथी,
हर जन उसका लाभ उठाए।
डिजिटल हो देश मगर मन में,
मानवता का स्पर्श रहे,
प्रगति की हर एक सीढ़ी पर,
पीछे कोई न छूटे रहे।
युवा शक्ति को पथ दिखलाना,
भटके तो फिर हाथ पकड़ाना,
उनके सपनों को पंख लगाना,
कर्मभूमि का अर्थ समझाना।
नशा, निराशा, हिंसा से वे,
दूर रहें, उत्साह धरें,
अपने श्रम से अपने भारत,
का भविष्य उज्ज्वल कर दें।
वृद्धों का सम्मान रहे और,
बालक का मुस्कान रहे,
दिव्यांगों को अवसर पूरा,
हर जीवन का मान रहे।
जिस समाज में अंतिम मानव,
सम्मानित होकर जी पाए,
उस भारत के चरणों में ही,
सच्ची प्रगति स्थान बनाए।
सत्य रहे व्यापार हमारा,
श्रम में पावनता का भाव,
न्याय मिले हर सौदे में और,
न छल रहे, न कोई दाँव।
अर्थव्यवस्था ऐसी हो कि,
सबको आगे बढ़ने दे,
धन कुछ हाथों में सिमटे ना,
श्रमिक को भी फलने दे।
सीमा सुरक्षित, राष्ट्र समृद्ध हो,
लोकतंत्र का मान रहे,
मतभेदों में संवाद रहे और,
विचारों में सम्मान रहे।
वाणी तीखी हो सकती है पर,
मन में विष का वास न हो,
असहमति भी देशहित में हो,
देश कभी निराश न हो।
हम इतिहास पढ़ें पर उससे,
घृणा का पाठ न सीखें कभी,
भूलों से शिक्षा लेकर आगे,
बढ़ें निरंतर हम सभी।
वीरों का सम्मान करें पर,
शांति का भी मूल्य जानें,
युद्ध अंतिम हो, शांति प्रथम हो,
मानवता को सत्य मानें।
हे प्रभु! ऐसी बुद्धि हमें दे,
सत्ता को सेवा मानें हम,
अपने हिस्से का दीप जलाकर,
अंधियारा सब छाँटें हम।
निज गौरव में इतना न डूबें,
दूजे का अपमान करें,
भारत की धरती पर जन्मे हैं,
भारत का कल्याण करें।
एक ध्वज के नीचे हम सब,
एक हृदय, एक प्राण रहें,
भिन्न रहें पहचान हमारी,
फिर भी भारत की जान रहें।
सुख में सबके साथ हँसें हम,
दुःख में सबके साथ खड़े,
ऐसा हो भारत का जीवन,
जिसमें कोई न अकेला पड़े।
चिर मान रहे, चिर आन रहे,
ईश्वर तेरा वरदान रहे।
जन-जन के अधरों पर हँसी हो,
हर आँगन में अरमान रहे।
गंगा-यमुना निर्मल बहतीं,
हर खेतों में धान रहे,
मेहनत की जय, सत्य की विजय,
मानवता की पहचान रहे।
चिर मान रहे, चिर आन रहे,
ईश्वर तेरा वरदान रहे।
हिमगिरि जैसा धैर्य मिले और,
सागर जैसा ज्ञान रहे,
मरुभूमि में भी आशा फूटे,
हर मन में विश्वास रहे।
धरती माँ का शीश न झुके,
भारत का सम्मान रहे,
ईश्वर तेरा वरदान रहे।
राष्ट्र महान ये कल्पों से,
चिर कल्पों तक गुणगान रहे।
वीरों की गाथा अमर रहे,
ऋषियों का ज्ञान महान रहे।
कर्मभूमि यह पुण्यभूमि हो,
सत्य-धर्म का मान रहे,
जन-जन के जीवन में भारत,
भारत के मन में जन रहे।
ना कोई भूखा, ना भयभीत हो,
ना कोई बेबस, लाचार रहे,
हर श्रम को उसका फल मिलता,
हर चेहरे पर उजियार रहे।
प्रेम, शांति, समता, सद्भावना,
भारत की पहचान रहे,
चिर मान रहे, चिर आन रहे,
ईश्वर तेरा वरदान रहे।
हे ईश्वर! बस इतनी इच्छा—
भारत का कल्याण रहे,
जननी जन्मभूमि की सेवा,
जीवन का अभियान रहे।
जब तक साँस रहे इस तन में,
राष्ट्रहित का ध्यान रहे,
अंतिम क्षण तक इस धरती पर,
भारत का जयगान रहे।
चिर मान रहे, चिर आन रहे,
ईश्वर तेरा वरदान रहे।
राष्ट्र महान ये कल्पों से,
चिर कल्पों तक गुणगान रहे।
जन-जन के मन में प्रेम रहे,
जन-जन में हिंदुस्तान रहे।
चिर मान रहे, चिर आन रहे,
ईश्वर तेरा वरदान रहे।
====
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
नन्हे से उस बीज के भीतर,
फैला सारा जंगल देखा।
माटी में जो दाना बोया,
उसमें पूरा सावन देखा,
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
रोज-रोज ये सूरज कैसे,
पूरब से उग जाता है।
सुबह गुलाबी दिन में तपता,
शाम को फिर डूब जाता है।
रात को कैसे जा छिपता है,
किसने बाँधा इसका लेखा?
दिन के पीछे रात खड़ी है,
रात में फिर दिन का रेखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
चंदा घटता, चंदा बढ़ता,
फिर भी चंदा पूरा है।
अंधियारे में राह दिखाता,
जैसे कोई नूरा है।
लाखों तारे नभ में चमके,
किसने इनको गिनकर देखा?
किसने नभ की इस चादर पर,
हीरों जैसा आभूषण लेखा?
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
पानी में मछली रहती क्यों?
पर चिड़िया इसमें मरती क्यों?
सर्प सरकता रेंग-रेंग कर,
छिपकली छत पे चढ़ती क्यों?
पंछी नभ में उड़ते कैसे,
मछली जल में तैरती देखा,
एक ही धरती, एक ही जीवन,
फिर इतना अंतर क्यों देखा?
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
कोयल कूके बाग में आके,
किसको अपना गीत सुनाती?
भँवरा फूलों पर मंडराकर,
किसकी खुशबू पीकर जाती?
फूल खिले तो रंग बिखेरे,
मुरझाए तो मौन सा देखा,
जीवन ने हर रंग में अपने,
मृत्यु का भी क्षण देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
बादल कैसे नभ में आते,
बिन पग धरती पर छा जाते?
सूखी धरती की प्यास बुझाकर,
फिर आकाश में लौट जाते।
बूंद-बूंद से नदी बनी है,
नदियों में सागर देखा,
एक बूँद में छिपा हुआ फिर,
पूरा एक समंदर देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
नदियाँ पर्वत छोड़ निकलतीं,
किसने इनको राह दिखाई?
पत्थर काटे, घाट बनाए,
फिर भी अपनी चाल न खोई।
राह मिली तो बहती जातीं,
रोक मिली तो ठहर गईं,
कितनी गहरी बात प्रकृति की,
चलते-चलते समझी, देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
गर्मी आई, वर्षा आई,
फिर पतझड़ और फिर बहार।
एक ही धरती, कितने मौसम,
हर मौसम का अलग श्रृंगार।
सूखी डाली फिर से फूली,
मृत समझे में जीवन देखा,
कल जो टूटा, आज उसी में,
फिर से नया सवेरा देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
पर्वत चुपचाप खड़े हैं कब से,
सदियों का इतिहास लिए।
नदियाँ जैसे गीत सुनातीं,
अपने भीतर प्यास लिए।
रेगिस्तान की रेत में भी,
जीने का साहस देखा,
काँटों के बीच खिले गुलाब में,
जीवन का विश्वास देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
चींटी जितनी छोटी होकर,
अपना पर्वत ढोती है।
नन्ही सी इक चिड़िया फिर भी,
आकाशों को छूती है।
हाथी जैसा बलवान यहाँ पर,
एक दिन मिट्टी में देखा,
जिस मानव ने जग जीता था,
उसको भी मिटते देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
माँ के आँचल में जो बच्चा,
कल दुनिया बन जाता है।
नन्हे पाँवों से जो चलता,
दौड़ के पर्वत चढ़ जाता है।
एक कली से फूल बना फिर,
फूल से फिर फल बनते देखा,
जीवन ने जीवन को देकर,
जीवन फिर से बनते देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
श्वास कहाँ से आती-जाती,
किसने भीतर दीप जलाया?
धड़कन की इस ताल को आखिर,
किसने इतना सुंदर बनाया?
तन मिट्टी का, प्राण अनोखे,
कैसा अद्भुत मेल है देखा,
माटी में चलता-फिरता मैंने,
जीता-जागता खेल देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
इंसान बना विज्ञान का मालिक,
फिर भी खुद से दूर हुआ।
चाँद छुआ, आकाश नापा,
पर मन का सागर अधूरा हुआ।
बाहर जितना खोज रहा है,
भीतर उतना कम देखा,
दुनिया जीत रहा था लेकिन,
खुद को हारा हुआ देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
न जाने क्या मकसद देखा,
हर रचना में संदेश देखा।
पत्थर में भी धीरज देखा,
नदिया में आवेग देखा।
काँटों में भी फूल खिले हैं,
दुःख में सुख का रंग देखा,
मृत्यु के उस पार खड़े होकर,
जीवन का प्रतिरूप देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
किसने पत्तों को रंग सिखाया,
किसने पवन को गीत दिया?
किसने नभ को नील बनाया,
किसने जल को नीर दिया?
किसने मन में प्रश्न जगाया,
किसने उत्तर मौन रखा?
जितना खोजा, उतना पाया—
रहस्य और भी गहन देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
हर कण में संसार देखा।
रेत के कण में सागर देखा,
बूँद में पूरा धार देखा।
नन्ही चींटी में श्रम देखा,
पंछी में विस्तार देखा,
और उसी इक बीज के भीतर,
पूरा एक संसार देखा।
न जाने क्या मकसद देखा,
न जाने क्या राज़ है गहरा,
जितना देखा, उतना पाया—
ये जग सारा खेल सुनहरा।
आँखों ने जो देखा थोड़ा,
मन ने उससे पार देखा,
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
कण-कण में संसार देखा।
बूँद में सागर, पत्ते में वन,
श्वासों में संसार देखा।
माटी में आकाश देखा,
मृत्यु में नवजीवन देखा,
न जाने क्या मकसद देखा—
एक बीज में बरगद देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
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2.पितृ-व्याख्यान
क्या रखा है कल्प बिताना औरों के गुणगान में,
वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में।
पूर्व अतीत की चर्चा कर क्या रखा गर्वित होने में,
पुरखों के रण-घात सुना क्या रखा हर्षित होने में।
भुजा क्षीण हो तेरा फिर क्या रखा स्वाभिमान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में।
कुछ पूर्वज के सुरमा होने से कुछ क्षण को बल मिलता,
निज हाथों से उद्यम रचने पर अभिलाषित फल मिलता।
निज कर्म करो, क्यों कल्प बिताते पितृ-व्याख्यान में?
वर्तमान से वक्त बचा लो तुम निज के निर्माण में।
अजय अमिताभ सुमन
हिंदू कौन?
हिंदू
कौन, क्या ये कोई पंथ या कोई मजहबी विकृति है?
नहीं, गठजोड़ है संस्कृतियों का ,ये सबकी स्वीकृति है।
हिंदू
वो भी हैं जो भगवान को मानते हैं,
हिंदू
वो भी हैं जो भगवान को ना मानते है,
और
वो भी जो खुद को हिंदू नहीं मानते हैं।
यहां
योगी के लिए योग तो भोगी के लिए भोग है ,
भक्ति,नृत्य, ज्ञान,तंत्र, मदिरा भी ना अवरोध है।
तभी
तो इसमें हैं कृष्ण भी शिव भी ,प्रभु राम भी,
चार्वाक
भी इसी में तो खानखाना रहमान भी।
बुद्ध
, गोरख, कबीर ,नानक, इसमें रविदास भी,
महावीर, साईबाबा , तो मीरा, सूरदास भी।
आदमी
तो आदमी पत्थर का भी उपयोग है,
मतों
में है विरोध पर विरोध में सहयोग है।
जिसमें
शामिल हैं सब जो सबमें युक्त है,
हिंदुत्व
कोई बंधन नहीं ये सर्वबंधन मुक्त है।
अजय
अमिताभ सुमन
मंज़िल किसको कहते हैं हम,राह कहाँ तक जाती है?
जीत अगर मन हार गया तो,जीत कहाँ रह जाती है?
हार गया जो अहंकार तो,वह भी कैसी हार रही,
टूट गया जो मन का बंधन,वह तो नई बहार रही।
प्रीत अगर अधिकार बने तो, ये बंधन बन जाती है,
और रार गर मौन हो जाए, तो दूरी बन जाती है।
स्मृति-पटल पर भाव पुराने, कितने चित्र बनाते हैं,
धूप मिली तो छाँव खोजते,छाँव मिले तो डरते हैं।
जीवन कोई युद्ध नहीं है,जीत जहाँ पर निश्चित हो,
जीवन तो वह प्रश्न अनोखा, जहां उत्तर अंतर्निहित हो।
जीत-हार के पार कहीं पर,एक सत्य मुस्काता है,
जो खुद को ही जो जीत गया वो सच में जी पाता है।
जितना उर के हँस पड़ने या,किंचित इसके रोने में।
====
1.सौदा-ए-बुलंदी
वो जो छू लेता है बुलंदी, कोई इनाम नहीं होता,
ये रूह का इम्तिहान है, कोई वरदान नहीं होता।
बुलंदी मिलते ही बढ़ने लगती है रूह-ए-तन्हाई,
बिना गुरूर-ए-जुनूँ के नामो-निशान नहीं होता।
आसमाँ छू भी ले इंसाँ, तो मुकम्मल कहाँ होता,
बड़ा आदमी होने से कोई गुणगान नहीं होता।
ऊँचे ख़्वाबों की है कीमत तेरी नींद, तेरे उसूल,
सौदा-ए-बुलंदी यूँ ही किसी के नाम नहीं होता।
अजय अमिताभ सुम
खुद ही एक मिसाल हूँ मैं?
हाल,खयाल,कमाल,हाल,जंजाल
===
सुराग
तेरी कोशिशें नाकाम मुझमें ढूँढ क्या लोगे तुम,
अब तक तो मैं हीं ना रहा मुझमें क्या लोगे तुम।
वक़्त के आईने में इक टूटा हुआ हूँ लम्हा ,
बिखरे हुए अक्स का वजूद क्या लोगे तुम।
ख़ुद से ही जुदा होकर जो शख़्स दूर गया हो,
इस फ़ासले का कोई उसूल क्या लोगे तुम।
कई-कई जन्मों का बिखरा हुआ एक सुराग़ हूँ,
इस धुँध में सच का भी रुख़ क्या लोगे तुम।
मैं ख़ुद ही अपने होने का हासिल नहीं समझा,
मेरे वजूद का मुझसे सबूत क्या लोगे तुम।
अजय अमिताभ सुमन
====
मज़दूर
मेहनत जिसकी धूप में जलती रही भरपूर,
पसीने की हर बूँद से लिखता रहा जो नूर।
भूख, ग़रीबी, रोग ने कर डाला है मजबूर,
छाँव मिली न उम्र भर, किस्मत से है दूर।
रोटी की इक आस में जो झुकता बे-दस्तूर,
राहों पे ताउम्र फकत जलता रहा मज़दूर।
अजय अमिताभ सुमन
=======
कफ़न
स्वतंत्रता का नवल पौधा, रक्त से निज सींचकर,
था उगाया वीर ने, कफ़न स्वयं शीश पर।
अमर ज्वाला-सा जला, अन्याय की दीवार में,
जयघोष गूँज उठा, रणभूमि की पुकार में।
लहू की धार बह चली, धरती हुई गुलाल-सी,
गगन थर्राने लगा, रण-ध्वनि हुई धमाल-सी।
वीर सपूत हँस पड़ा, तीरों के उस घाव पर,
वतन की जीत हो चाहे प्राण ले जाए हर।"
अजय अमिताभ सुमन
======
दवा नहीं मिलतीहर शख़्स यहाँ अपनी ही कहानी में गुम,
किसी और के दर्द की दवा नहीं मिलती।
रिश्तों की धूप में साये तो बहुत देखे,
छाँव में भी मगर वो हवा नहीं मिलती।
हम ढूँढ़ते फिरते हैं शहरों में सुकूँ की झलक,
इस भीड़ भरे जहाँ में वो फ़ज़ा नहीं मिलती।
जबतक न जले ‘मैं’ की शमा दिल के दरीचे में,
उस नूर की राहों में मगर वफ़ा नहीं मिलती।
जो फ़ना की राह पे उतरे, वही पा ले बक़ा,
वरना इस सफ़र में कोई अता नहीं मिलती।
अजय अमिताभ सुमन
====
जाने कितने अरमानों को खंगाला मैंने,
बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला मैंने।
रौशनी में भी उजाला ठहरता नहीं,
अंधियारा अजीब है, पिघलता नहीं।
मन के सन्नाटे को खोल कभी,
दिल के दरवाज़े से बोल कभी।
तोड़ के जोड़ के मन्नत के धागे को,
दे भी दोगे क्या तुम नसीब में अभागे को।
जो दौड़े ही नहीं किसी भीड़ में यकीनन,
वो क्या जाने हार कि खुमारी क्या चीज है।
बेहतर ही था जो वो दाग दे गया,
ठंडा था दिल मेरा आग दे गया।
अदालत जाने से संभल जाते जो लोग,
मयखाने में फिर क्यों जल जाते हैं लोग।
इस शहर के इंसान जाने कैसे हज़ार में,
प्लास्टिक के फूल बिके इत्र के बाजार में।
शहद से मीठा समंदर से गहरा,
तेरी इन नागिन सी जुल्फों का पहरा।
मेरे गाँव से कहीं, बदतर ये शहर है,
कि पेट में है दाँत, दाँतों में जहर है।
ख़्वाहिशों और चादरों में कुछ इस तरह अमन रखा,
ना चादरें लम्बी रखी ना ख़्वाहिशों को दफ़न रखा।
न पूछ हमसे हमने क्या इस दिल में पाले हैं,
कि सर से पाँव तलक छालें ही छालें हैं।
समंदर का होकर हवा की बातें करना क्या,
जो करते नहीं याद उन्हें दिल मे रखना क्या।
कुछ दिखता नहीं, कुछ दिखाई न पड़ता,
कुछ तन का अंधेरा, कुछ मन का अंधेरा।
तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,
काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।
जबसे मेरा मुझ में घटने लगा है,
तबसे तू मुझ में बढ़ने लगा है।
लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,
मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।
चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,
पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।
मुश्किल से उसको पगार मिला आज,
दो दिन का जीवन बेज़ार मिला आज।
धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,
ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।
नीर नहीं भावों की सरिता,
अद्भुत है कवि तेरी कविता।
आँखों ही से आँखों में करते जो बातें,
दिल से फिर होती ना क्यों मुलाकातें।
कई सालों जंग-ए-आजादी मिली है,
फ़ादासी, जेहादी, बर्बादी मिली है।
कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,
तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।
चाँद को छू लेने को, मुल्क तो बेताब है,
मुश्किल कि कर्ज में डूबा हुआ फैयाज़ है.
अजीब है ख़ुदा तू , तेरी ख़ुदाई भी,
तू भी साथ में और मेरी तन्हाई भी।
ना मय के लिए ना मयखाने के लिए,
जुनून-ए-जिगर है मर जाने के लिए।
प्रेम मधुर रस तुम बरसाओ ,
यूँ बैठे न आग लगाओ।
ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,
मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।
जमाने की बात भुलाने से उठा,
सोचता हूँ क्यों मैखाने से उठा?
रागी से बेहतर, विरागी से बेहतर,
न धन से अकड़ता न धन को पकड़ता।
ये झूठ की बीमारी तुझे हो मुबारक,
मैं सच का पुजारी, अनाड़ी सही।
जब भावना पे संभावना का प्रभाव होता है,
तब रिश्तों में संवेदना का अभाव होता है।
सूरज तो निकलता है रोज़ ही मगर,
तूने आँखें खोली और दीदार हो गया।
4. बिना बीड़ी बिना गुटका बिना बात की लड़ाई के
कभी बितते नहीं दिन ऐसे मेरी बड़की माई के।
5. कुछ अपना नसीबन कुछ सरकार की भलाई से,
कमबख्त जाते नहीं जाती ये ठंडी रजाई से।
6. महीने की रोटी और चुटकी कमाई से,
उठाओगे कैसे तुम नखरे भौजाई के ?
7. खुदा जाने कैसी अजब तेरी प्यास थी,
तुझसे तो बेहतर, तेरी तलाश थी।
8. क्या खूब अख्तियार है, पीने पे जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
9. काश खुदा बरसा दे, बारिश ईमान की,
लोगों के जमीर पे बैठी है धूल बहुत।
10. डरा नहीं जो कभी शेर से, आज वो डर गया,
बिना लिए बीबी की चुड़ी, जब वो घर गया।
11. जीवन सुख-दुख का सैलाब, आओ मिल के देखे ख्वाब,
तू मेरे दुख का रखे हिसाब, मैं तेरे सुख की बनूँ किताब।
12. गरीबों को मलाल, अमीरी ना मिली,
अमीरों को मलाल , गरीबी ना मिली,
मखमली पलंग को तरसे गरीब और
अमीर को नींद-ए-फकीरी ना मिली।
13. रूह की आवाज को कुछ यूँ सजा रखता है,
जज्बात अमिताभ अल्फ़ाज़ आसां रखता है।
14. ढूढ़ता रहा सबक जो जाने कितने सवालों में,
जा के मुझे मिला वो जिंदगी की किताबों में।
15. ज़िंदगी को आप अगर वो देते हैं
जो जिंदगी आपसे चाहती है,
तो जिंदगी आपको वो देती है
जो आप जिंदगी से चाहते हैं।
16. जो खोजता है, मिलता नहीं,
जो मिलता है, खोजता नहीं,
आदमी इसीलिए फलता नहीं, फूलता नहीं।
17. मंदिर की घंटी, गुरुवाणी और मस्जिद का अजान,
और चर्च के प्रेयर से बनता ये हिंदुस्तान।
18. ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-ए–मंजिल का।
19. उसने करके खबरदार , मारा अमिताभ को,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं।
20. "अमिताभ" के प्यास की, बात ही कुछ खास है,
समंदर से कुछ भी न , कम की तलाश है।
21. .इस दुनिया में आने की हो गयी ऐसी खता,
बदस्तूर अभी तक जारी है वो सिलसिला।
22. .कुछ सपनों की उम्मीद ले के
निकला था घर से,
उम्मीदें पूरी हो गयी
और घर सपना हो गया।
23.अजीब से ख्यालों के अमिताभ है,
जो पास है उसका शौक नहीं,
जिसका शौक है वो पास नहीं।
24. इज्जत की रोटी और सुकूँ भरे रैन,
ए ख़ुदा तूने नींद की रख भी दी क्या कीमत।
25. पिए बिना चला नहीं जाता,
चिकन बिना रहा नहीं जाता,
जश्न-ए-गुलामी का ये आलम है,
तो आजादी का क्या होगा।
26. हो गया इश्क दफ़न, सुलगने से पहले ही,
ना मैंने इजहार किया, ना उसने इकरार।
27. और भी तरीके हैं जुल्मो-सितम के,
इस जहाँ में ख़ुदा भेजने के सिवा।
28. रोटी की जद्दोजहद में , "अमिताभ " तू बदला कहाँ,
पहले खा नहीं सकते थे, अब खा नहीं पाते।
29. ज़माने ने किया नहीं कोई अत्याचार है,
"अमिताभ " तो खुद की गलतियों का शिकार है।
30. .तेरा होना ही काफी है "अमिताभ "
इस महफ़िल में लाख बुराइयां हैं साथ, पर आदमी बुरे नहीं।
31. मेरे रोने पे हँसता है, मेरे हँसने पे रोता है,
मेरा अक्श मेरा होके भी मेरा अपना नहीं।
32. .ना ऐब तुझ में ना ऐब मुझ में,
"अमिताभ " कसक बस ये थी,
ख्वाहिशें तेरी कुछ ज्यादा,
व हैसियत मेरी कुछ कम थी।
33. तेरा ऐब है कि खासियत,"अमिताभ "का फितूर है,
तुझे चाहे न चाहे ख्वाबों में, होता तू जरूर है।
34.
35. आप तो नाहक ही हम पे
इल्जाम लगा देते हैं,
लक्षण हैं बदतर और हम
अंजाम बता देते हैं।
36. ये क्या किया "अमिताभ", कि शख्सियत ही खुल गयी,
तेरी जुबाँ से बेहतर , तेरी ख़ामोशी थी।
37. चख के भी भला स्वाद भला
बताऊँ क्या ज़माने को,जहर नहीं होता
पिलाने के लिए।
38. कौन कहता है
ख़ुदा इंसाफ नहीं करता,
पलंग गरीबों को नसीब नहीं,
और अमीरों को नींद।
39. यूँ ही नहीं करता
ज़माने को रोशन "अमिताभ "
सीने में कोई आग दफ़न तो होगी।
40. साथ देती हो
कभी तनहा छोड़ जाती हो,ऐ जिंदगी
तुझे सीखने को आदमी से
बस यही एक मिला था।
41. न अता होता है, न खता होता है,
जो कुछ किया है, मुझे पता होता है।
42. जितने भी घाव दिए उसने,
मेरी छाती पे ही दिये,
वो आदमी था बुरा जरूर,
पर इतना बुरा भी नहीं।
43. सजा सुनाई तूने,
क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं,
और वो नजरों से उतर गया।।
हवाओं पे कोई कहानी लिखूँ,
क्यों अपनी मैं जिंदगानी लिखूँ?
चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,
पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।
धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,
ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।
रेत के समंदर सी दुनिया में हम हैं,
पता भी चले कैसे ये कैसा भरम है?
ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,
मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।
गाँव में घर नहीं और शहरों पे जिंदा है,
उड़ता बिन पर के ये कैसा परिंदा है?
मन हीं मन मे युद्ध छिड़ा है,
मैं मेरे विरुद्ध खड़ा है।
2.अँधेरा में फैला सबेरा जहाँ पे,
खुदा होता तेरा बसेरा वहां पे।
4.नफरतों के दामन में,
जल रहे जो सभी है,
कौन सा है मजहब इनका ,
कौन इनके नबी हैं?
5.ख़ुदा क्या हवा हो दिखते भी नहीं
मिलते भी नहीं हो मिटते भी नहीं।
प्रभु तेरा दीपक जलाऊँ मैं कैसे,
दिल मे गुनाहों का पानी बहुत है।
6.हाथ झुके दिल झुका नहीं,
प्रेम पुष्प निज फला नही।
ना संशय तूने त्याग किया,
ना मिथ्या का परित्याग किया।
फिर तुझे कैसे प्रभु मिलेंगे,
विष गमलों में फूल खिलेंगे?
7.बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,
अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।
8.ख़ुदा तेरे सफर में जब एक हो जाता हूँ,
अजीब सा असर हैं अनेक हो जाता हूँ।
9.कैसे करूँ मैं अपनी पहचान तू बता,
मैं हीं नहीं हूँ मुझमें पूरा शहर है शामिल।
10.तूने ही तो अपने शैतान को पुकारा है,
दोष सितारों का नहीं, दोष तुम्हारा है।
11.आसाँ था खरीदना पर बिकना था मुश्किल,
या तो तेरा वादा था , या तो ये मेरा दिल।
12.मेरे हीं हाथों मूझको कायनात दे दिया,
ख़ुदा ने ख़ुद से मूझको निजात दे दिया।
13.ख़ुदा के नेक बंदों का,
शुक्रिया भी कर दो,
गज़ल का काम केवल,शिकायत नहीं।
14.दिल में है अंधियारा,
आग़ जला लेता हूँ,थोड़ा जाग लेता हूँ ,
थोड़ा भाग लेता हूँ।
15.काश कि तू बिकता.
दुनिया के बाज़ार में ,ख़ुदा तुझको लाता,
थोड़ा मैं भी उधार में
।16.हवाओं पे कोई कहानी लिखूँ,
क्यों अपनी मैं जिंदगानी लिखूँ?
17.हिजाब-ए-दहर भी रहने दो,अच्छा है,
भरम जो बचा है, रहने दो अच्छा है
18.सबक तो है छोटी क्यों याद नहीं होती,
सच्चाई के मार की आवाज नहीं होती।
19.यथार्थ है या भ्रम है?
जीवन क्या स्वप्न है?
20.शैतानों का खौफ़ नहीं होता यकीनन,
ख़ुदाओं से मूझको बचा लो तो अच्छा।
21.जो तेरा है सच सच्चाई है वो,
जरूरी नहीं कि अच्छाई है वो।
22.भोग पिपासु जन के मन मे,
योग कदाचित हीं फलते,
जिन्हें प्रियकर नृत्य गोपियाँ,
कृष्ण कदाचित हीं मिलते।
23.जिंदगी का लहजा,
अजीब जरा सख्त है,
सपनों की दौड़ है, ना अपनों पे वक्त है।
24.रिश्तों के समंदर में गला नहीं,
मंजिल करीब थी तू चला नहीं।
35.कह गए अनगिनत सन्तन है,
चित संलिप्त नित चिंतन है।
स्थितप्रज्ञ उपरत अविकल जो,
अरिहत चिरंतन है।
अजी सुनते हैं,
मेरे खिसियाने से काहे आप इतना डरते हैं?
ये दिल पे अपने कौन सा साबुन लगा मचलते हो,
कि चलते तो थोड़ा कम हो ,ज्यादा फिसलते हो?
किस किस की नज़र को हम देखें,
हम सबकी नज़र में रहते हैं,
किस्मत ही ऐसी पाई है,
हर वक़्त सफर में रहते हैं।
ख्वाहिशों की ख़ाक में जल जाते है,
दोस्त मेरे दिल में जो आज आते है।
कुछ इस तरह से रिश्ते बदलने लगे,
मिलते तो हैं अब भी, संभल जाते हैं।
गाँव में घर नहीं और शहरों पे जिंदा है,
उड़ता बिन पर के ये कैसा परिंदा है?
लड़ के जाने मरते क्यों मजहबों के दूत हैं,
ये हिन्दू , मुसलमाँ इन्सां के ही तो रूप हैं।
परछाइयाँ कुछ और नहीं बदलती हुई धूप हैं,
जानते तो सब हैं फिर न जाने क्यों चुप हैं?
पता नहीं किस शहर का,
अजीब वो बाशिंदा है,
कि हकीक़त से घायल,
ख्वाबों पे जिंदा है।
धीर हूँ पथिक चल हूँ तू गाई,
मंज़िल मिलत ना कबहूँ अगुताई।
अदा भी सनम के क्या खूब है, खुद मेरे,
लेके दिल पूछते हैं, क्या दिल से चाहता हूँ,
जो दिल ही दे दिया है, तो दिल की इस बात को,
दिल से जताऊँ कैसे कि दिल से चाहता हूँ।
अपनों पूत कवि करत बड़ाई,
पबजी खेलत कबहुँ ना अगुताई।
किस बात से रोते हो, किस बात का ग़म है?
शर्माजी खिसियाते बोले, ग़म मेरी बेगम है.
सखी तुम क्या जानो पीर पराई,
खुशी मिले ना बिन पति धमकाई।
आदमी तो ठीक था, खराबी फ़क़त इतनी थी,
ना सिखाई किसी ने कारिगरी, न हमें सीखनी थी।
मेरी सांसें, मेरी धड़कन, मेरी रूह तक उधार है,
ख़ुदा तेरा आभार है, ख़ुदा तेरा आभार है।
माँ के बिना जीवन संभव नहीं,
और बीबी के बिना असंभव।
ना तो कोई आग ना तो तेरा कोई ख़्वाब हूँ,
आँधी में जलता हुआ मगर एक चिराग हूँ।
ज़ुबानों के थोड़े फ़सादी हुए क्या,
कहने लगे लोग जेहादी हुए क्या ?
जाने कितने अरमानों को खंगाला मैंने,
बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला मैंने।
अगर मस्जिद में तू है, मंदिर में तू है,
मंदिर में मस्जिद में नफरत फिर क्यूँ है?
रौशनी में भी उजाला ठहरता नहीं,
अंधियारा अजीब है, पिघलता नहीं।
मन के सन्नाटे को खोल कभी,
दिल के दरवाज़े से बोल कभी।
तोड़ के जोड़ के मन्नत के धागे को,
दे भी दोगे क्या तुम नसीब में अभागे को।
जो दौड़े ही नहीं किसी भीड़ में यकीनन,
वो क्या जाने हार कि खुमारी क्या चीज है।
बेहतर ही था जो वो दाग दे गया,
ठंडा था दिल मेरा आग दे गया।
अदालत जाने से संभल जाते जो लोग,
मयखाने में फिर क्यों जल जाते हैं लोग।
इस शहर के इंसान जाने कैसे हज़ार में,
प्लास्टिक के फूल बिके इत्र के बाजार में।
शहद से मीठा समंदर से गहरा,
तेरी इन नागिन सी जुल्फों का पहरा।
मेरे गाँव से कहीं, बदतर ये शहर है,
कि पेट में है दाँत, दाँतों में जहर है।
ख़्वाहिशों और चादरों में कुछ इस तरह अमन रखा,
ना चादरें लम्बी रखी ना ख़्वाहिशों को दफ़न रखा।
न पूछ हमसे हमने क्या इस दिल में पाले हैं,
कि सर से पाँव तलक छालें ही छालें हैं।
समंदर का होकर हवा की बातें करना क्या,
जो करते नहीं याद उन्हें दिल मे रखना क्या।
कुछ दिखता नहीं, कुछ दिखाई न पड़ता,
कुछ तन का अंधेरा, कुछ मन का अंधेरा।
तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,
काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।
जबसे मेरा मुझ में घटने लगा है,
तबसे तू मुझ में बढ़ने लगा है।
लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,
मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।
चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,
पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।
मुश्किल से उसको पगार मिला आज,
दो दिन का जीवन बेज़ार मिला आज।
धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,
ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।
नीर नहीं भावों की सरिता,
अद्भुत है कवि तेरी कविता।
आँखों ही से आँखों में करते जो बातें,
दिल से फिर होती ना क्यों मुलाकातें।
चाँद को छू लेने को, मुल्क तो बेताब है,
मुश्किल कि कर्ज में डूबा हुआ फैयाज़ है.
अजीब है ख़ुदा तू , तेरी ख़ुदाई भी,
तू भी साथ में और मेरी तन्हाई भी।
ना मय के लिए ना मयखाने के लिए,
जुनून-ए-जिगर है मर जाने के लिए।
प्रेम मधुर रस तुम बरसाओ ,
यूँ बैठे न आग लगाओ।
ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,
मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।
जमाने की बात भुलाने से उठा,
सोचता हूँ क्यों मैखाने से उठा?
रागी से बेहतर, विरागी से बेहतर,
न धन से अकड़ता न धन को पकड़ता।
ये झूठ की बीमारी तुझे हो मुबारक,
मैं सच का पुजारी, अनाड़ी सही।
जब भावना पे संभावना का प्रभाव होता है,
तब रिश्तों में संवेदना का अभाव होता है।
सूरज तो निकलता है रोज़ ही मगर,
तूने आँखें खोली और दीदार हो गया।
मन हीं मन मे युद्ध छिड़ा है,
मैं मेरे विरुद्ध खड़ा है।
2.अँधेरा में फैला सबेरा जहाँ पे,
खुदा होता तेरा बसेरा वहां पे।
3.रेत के समंदर सी दुनिया में हम हैं,
पता भी चले कैसे ये कैसा भरम है?
4.नफरतों के दामन में,
जल रहे जो सभी है,
कौन सा है मजहब इनका ,
कौन इनके नबी हैं?
5.ख़ुदा क्या हवा हो दिखते भी नहीं
मिलते भी नहीं हो मिटते भी नहीं।
प्रभु तेरा दीपक जलाऊँ मैं कैसे,
दिल मे गुनाहों का पानी बहुत है।
6.हाथ झुके दिल झुका नहीं,
प्रेम पुष्प निज फला नही।
ना संशय तूने त्याग किया,
ना मिथ्या का परित्याग किया।
फिर तुझे कैसे प्रभु मिलेंगे,
विष गमलों में फूल खिलेंगे?
7.बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,
अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।
8.ख़ुदा तेरे सफर में जब एक हो जाता हूँ,
अजीब सा असर हैं अनेक हो जाता हूँ।
9.कैसे करूँ मैं अपनी पहचान तू बता,
मैं हीं नहीं हूँ मुझमें पूरा शहर है शामिल।
10.तूने ही तो अपने शैतान को पुकारा है,
दोष सितारों का नहीं, दोष तुम्हारा है।
11.आसाँ था खरीदना पर बिकना था मुश्किल,
या तो तेरा वादा था , या तो ये मेरा दिल।
12.मेरे हीं हाथों मूझको कायनात दे दिया,
ख़ुदा ने ख़ुद से मूझको निजात दे दिया।
13.ख़ुदा के नेक बंदों का,
शुक्रिया भी कर दो,
गज़ल का काम केवल,शिकायत नहीं।
14.दिल में है अंधियारा,
आग़ जला लेता हूँ,थोड़ा जाग लेता हूँ ,
थोड़ा भाग लेता हूँ।
15.काश कि तू बिकता.
दुनिया के बाज़ार में ,ख़ुदा तुझको लाता,
थोड़ा मैं भी उधार में
।16.हवाओं पे कोई कहानी लिखूँ,
क्यों अपनी मैं जिंदगानी लिखूँ?
17.हिजाब-ए-दहर भी रहने दो,अच्छा है,
भरम जो बचा है, रहने दो अच्छा है
18.सबक तो है छोटी क्यों याद नहीं होती,
सच्चाई के मार की आवाज नहीं होती।
19.यथार्थ है या भ्रम है?
जीवन क्या स्वप्न है?
20.शैतानों का खौफ़ नहीं होता यकीनन,
ख़ुदाओं से मूझको बचा लो तो अच्छा।
21.जो तेरा है सच सच्चाई है वो,
जरूरी नहीं कि अच्छाई है वो।
22.भोग पिपासु जन के मन मे,
योग कदाचित हीं फलते,
जिन्हें प्रियकर नृत्य गोपियाँ,
कृष्ण कदाचित हीं मिलते।
23.जिंदगी का लहजा,
अजीब जरा सख्त है,
सपनों की दौड़ है, ना अपनों पे वक्त है।
24.रिश्तों के समंदर में गला नहीं,
मंजिल करीब थी तू चला नहीं।
25.दिन रात चाहे बदले ,
एक बात ना बदलती।
ये आदमी क्या चीज है ,
कि जात ना बदलती।
26.अन्धकार के राही ओ,
सपनों पे ना आघात करो।
तिमिर घनेरा भागेगा तुम,
लक्ष्यसिद्ध संघात करो।
27.ढूंढ़ता हूँ शहर में कोई तो बाशिंदा हो,
जो जगा हुआ भी हो और जिन्दा हो।
28.जुबान का फिसलना भी चर्चा सरेआम है,
और बेचते रहे वो ईमान कहाँ कहाँ तक।
29.भावों के धुंधीयारे बादल ,
घन तम के उस सागर पार।
स्वप्नदृष्ट मय मिथ्या जग से.
छिपे हुए जगतारणहार ।
30.बातें ख़ुदा की यूँ करने से क्या,
लड़ने से क्या , झगड़ने से क्या?
जो चलते नही तू ख़ुदा की डगर,
यूँ चलकर गिरने संभलने से क्या?
31.मृगतृष्णा के आँगरों से,
व्याकुल मन अकुलित हो जाऊँ।
बुद्धि शुद्धि के तम घन ओझल.
दग्ध मन है मैं ललचाऊँ।
32.हक़ीक़ते जीवन की हिजाब कर गई।
बचपन में जो उम्मीदे थी,
ख्वाब कर गई।
33.करके गुनाह धुल जाता हूँ,
मंदिर जाके भूल जाता हूँ।
34.क्यों बांधे बुत में तू उसको
जो फैला है यहीं कहीं,
क्या तेरे मंदिर से पहले,
ये ईश्वर था कहीं नहीं?
35.कह गए अनगिनत सन्तन है,
चित संलिप्त नित चिंतन है।
स्थितप्रज्ञ उपरत अविकल जो,
अरिहत चिरंतन है।
काल बुरा कल जीवन आए,कल की कुछ तो राह बताए ,
विगत काल जो भी था गुजरा, जग में नूतन चाह जगाए।
शहद से मीठा समंदर से गहरा,
तेरी इन नागिन सी जुल्फों का पहरा।
मेरे गाँव से कहीं, बदतर ये शहर है,
कि पेट में है दाँत, दाँतों में जहर है।
ख़्वाहिशों और चादरों में कुछ इस तरह अमन रखा,
ना चादरें लम्बी रखी ना ख़्वाहिशों को दफ़न रखा।
न पूछ हमसे हमने क्या इस दिल में पाले हैं,
कि सर से पाँव तलक छालें ही छालें हैं।
समंदर का होकर हवा की बातें करना क्या,
जो करते नहीं याद उन्हें दिल मे रखना क्या।
कुछ दिखता नहीं, कुछ दिखाई न पड़ता,
कुछ तन का अंधेरा, कुछ मन का अंधेरा।
तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,
काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।
जबसे मेरा मुझ में घटने लगा है,
तबसे तू मुझ में बढ़ने लगा है।
लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,
मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।
चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,
पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।
मुश्किल से उसको पगार मिला आज,
दो दिन का जीवन बेज़ार मिला आज।
धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,
ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।
नीर नहीं भावों की सरिता,
अद्भुत है कवि तेरी कविता।
आँखों ही से आँखों में करते जो बातें,
दिल से फिर होती ना क्यों मुलाकातें।
कई सालों जंग-ए-आजादी मिली है,
फ़ादासी, जेहादी, बर्बादी मिली है।
कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,
तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।
चाँद को छू लेने को, मुल्क तो बेताब है,
मुश्किल कि कर्ज में डूबा हुआ फैयाज़ है.
अजीब है ख़ुदा तू , तेरी ख़ुदाई भी,
तू भी साथ में और मेरी तन्हाई भी।
ना मय के लिए ना मयखाने के लिए,
जुनून-ए-जिगर है मर जाने के लिए।
प्रेम मधुर रस तुम बरसाओ ,
यूँ बैठे न आग लगाओ।
ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,
मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।
जमाने की बात भुलाने से उठा,
सोचता हूँ क्यों मैखाने से उठा?
रागी से बेहतर, विरागी से बेहतर,
न धन से अकड़ता न धन को पकड़ता।
ये झूठ की बीमारी तुझे हो मुबारक,
मैं सच का पुजारी, अनाड़ी सही।
जब भावना पे संभावना का प्रभाव होता है,
तब रिश्तों में संवेदना का अभाव होता है।
सूरज तो निकलता है रोज़ ही मगर,
तूने आँखें खोली और दीदार हो गया।
मन हीं मन मे युद्ध छिड़ा है,
मैं मेरे विरुद्ध खड़ा है।
2.अँधेरा में फैला सबेरा जहाँ पे,
खुदा होता तेरा बसेरा वहां पे।
3.रेत के समंदर सी दुनिया में हम हैं,
पता भी चले कैसे ये कैसा भरम है?
4.नफरतों के दामन में,
जल रहे जो सभी है,
कौन सा है मजहब इनका ,
कौन इनके नबी हैं?
5.ख़ुदा क्या हवा हो दिखते भी नहीं
मिलते भी नहीं हो मिटते भी नहीं।
प्रभु तेरा दीपक जलाऊँ मैं कैसे,
दिल मे गुनाहों का पानी बहुत है।
6.हाथ झुके दिल झुका नहीं,
प्रेम पुष्प निज फला नही।
ना संशय तूने त्याग किया,
ना मिथ्या का परित्याग किया।
फिर तुझे कैसे प्रभु मिलेंगे,
विष गमलों में फूल खिलेंगे?
7.बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,
अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।
8.ख़ुदा तेरे सफर में जब एक हो जाता हूँ,
अजीब सा असर हैं अनेक हो जाता हूँ।
9.कैसे करूँ मैं अपनी पहचान तू बता,
मैं हीं नहीं हूँ मुझमें पूरा शहर है शामिल।
10.तूने ही तो अपने शैतान को पुकारा है,
दोष सितारों का नहीं, दोष तुम्हारा है।
11.आसाँ था खरीदना पर बिकना था मुश्किल,
या तो तेरा वादा था , या तो ये मेरा दिल।
12.मेरे हीं हाथों मूझको कायनात दे दिया,
ख़ुदा ने ख़ुद से मूझको निजात दे दिया।
13.ख़ुदा के नेक बंदों का,
शुक्रिया भी कर दो,
गज़ल का काम केवल,शिकायत नहीं।
14.दिल में है अंधियारा,
आग़ जला लेता हूँ,थोड़ा जाग लेता हूँ ,
थोड़ा भाग लेता हूँ।
15.काश कि तू बिकता.
दुनिया के बाज़ार में ,ख़ुदा तुझको लाता,
थोड़ा मैं भी उधार में
।16.हवाओं पे कोई कहानी लिखूँ,
क्यों अपनी मैं जिंदगानी लिखूँ?
17.हिजाब-ए-दहर भी रहने दो,अच्छा है,
भरम जो बचा है, रहने दो अच्छा है
18.सबक तो है छोटी क्यों याद नहीं होती,
सच्चाई के मार की आवाज नहीं होती।
19.यथार्थ है या भ्रम है?
जीवन क्या स्वप्न है?
20.शैतानों का खौफ़ नहीं होता यकीनन,
ख़ुदाओं से मूझको बचा लो तो अच्छा।
21.जो तेरा है सच सच्चाई है वो,
जरूरी नहीं कि अच्छाई है वो।
22.भोग पिपासु जन के मन मे,
योग कदाचित हीं फलते,
जिन्हें प्रियकर नृत्य गोपियाँ,
कृष्ण कदाचित हीं मिलते।
23.जिंदगी का लहजा,
अजीब जरा सख्त है,
सपनों की दौड़ है, ना अपनों पे वक्त है।
24.रिश्तों के समंदर में गला नहीं,
मंजिल करीब थी तू चला नहीं।
25.दिन रात चाहे बदले ,
एक बात ना बदलती।
ये आदमी क्या चीज है ,
कि जात ना बदलती।
26.अन्धकार के राही ओ,
सपनों पे ना आघात करो।
तिमिर घनेरा भागेगा तुम,
लक्ष्यसिद्ध संघात करो।
27.ढूंढ़ता हूँ शहर में कोई तो बाशिंदा हो,
जो जगा हुआ भी हो और जिन्दा हो।
28.जुबान का फिसलना भी चर्चा सरेआम है,
और बेचते रहे वो ईमान कहाँ कहाँ तक।
29.भावों के धुंधीयारे बादल ,
घन तम के उस सागर पार।
स्वप्नदृष्ट मय मिथ्या जग से.
छिपे हुए जगतारणहार ।
30.बातें ख़ुदा की यूँ करने से क्या,
लड़ने से क्या , झगड़ने से क्या?
जो चलते नही तू ख़ुदा की डगर,
यूँ चलकर गिरने संभलने से क्या?
31.मृगतृष्णा के आँगरों से,
व्याकुल मन अकुलित हो जाऊँ।
बुद्धि शुद्धि के तम घन ओझल.
दग्ध मन है मैं ललचाऊँ।
32.हक़ीक़ते जीवन की हिजाब कर गई।
बचपन में जो उम्मीदे थी,
ख्वाब कर गई।
33.करके गुनाह धुल जाता हूँ,
मंदिर जाके भूल जाता हूँ।
34.क्यों बांधे बुत में तू उसको
जो फैला है यहीं कहीं,
क्या तेरे मस्जिद से पहले,
ये ईश्वर था कहीं नहीं?
25.दिन रात चाहे बदले ,
एक बात ना बदलती।
ये आदमी क्या चीज है ,
कि जात ना बदलती।
26.अन्धकार के राही ओ,
सपनों पे ना आघात करो।
तिमिर घनेरा भागेगा तुम,
लक्ष्यसिद्ध संघात करो।
27.ढूंढ़ता हूँ शहर में कोई तो बाशिंदा हो,
जो जगा हुआ भी हो और जिन्दा हो।
28.जुबान का फिसलना भी चर्चा सरेआम है,
और बेचते रहे वो ईमान कहाँ कहाँ तक।
29.भावों के धुंधीयारे बादल ,
घन तम के उस सागर पार।
स्वप्नदृष्ट मय मिथ्या जग से.
छिपे हुए जगतारणहार ।
30.बातें ख़ुदा की यूँ करने से क्या,
लड़ने से क्या , झगड़ने से क्या?
जो चलते नही तू ख़ुदा की डगर,
यूँ चलकर गिरने संभलने से क्या?
31.मृगतृष्णा के आँगरों से,
व्याकुल मन अकुलित हो जाऊँ।
बुद्धि शुद्धि के तम घन ओझल.
दग्ध मन है मैं ललचाऊँ।
32.हक़ीक़ते जीवन की हिजाब कर गई।
बचपन में जो उम्मीदे थी,
ख्वाब कर गई।
33.करके गुनाह धुल जाता हूँ,
मंदिर जाके भूल जाता हूँ।
34.क्यों बांधे बुत में तू उसको
जो फैला है यहीं कहीं,
क्या तेरे मस्जिद से पहले,
ये ईश्वर था कहीं नहीं?
जाने कितने अरमानों को खंगाला मैंने,
बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला मैंने।
अगर मस्जिद में तू है, मंदिर में तू है,
मंदिर में मस्जिद में नफरत फिर क्यूँ है?
रौशनी में भी उजाला ठहरता नहीं,
अंधियारा अजीब है, पिघलता नहीं।
मन के सन्नाटे को खोल कभी,
दिल के दरवाज़े से बोल कभी।
तोड़ के जोड़ के मन्नत के धागे को,
दे भी दोगे क्या तुम नसीब में अभागे को।
जो दौड़े ही नहीं किसी भीड़ में यकीनन,
वो क्या जाने हार कि खुमारी क्या चीज है।
बेहतर ही था जो वो दाग दे गया,
ठंडा था दिल मेरा आग दे गया।
अदालत जाने से संभल जाते जो लोग,
मयखाने में फिर क्यों जल जाते हैं लोग।
इस शहर के इंसान जाने कैसे हज़ार में,
प्लास्टिक के फूल बिके इत्र के बाजार में।
शहद से मीठा समंदर से गहरा,
तेरी इन नागिन सी जुल्फों का पहरा।
मेरे गाँव से कहीं, बदतर ये शहर है,
कि पेट में है दाँत, दाँतों में जहर है।
ख़्वाहिशों और चादरों में कुछ इस तरह अमन रखा,
ना चादरें लम्बी रखी ना ख़्वाहिशों को दफ़न रखा।
न पूछ हमसे हमने क्या इस दिल में पाले हैं,
कि सर से पाँव तलक छालें ही छालें हैं।
समंदर का होकर हवा की बातें करना क्या,
जो करते नहीं याद उन्हें दिल मे रखना क्या।
कुछ दिखता नहीं, कुछ दिखाई न पड़ता,
कुछ तन का अंधेरा, कुछ मन का अंधेरा।
तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,
काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।
जबसे मेरा मुझ में घटने लगा है,
तबसे तू मुझ में बढ़ने लगा है।
लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,
मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।
चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,
पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।
मुश्किल से उसको पगार मिला आज,
दो दिन का जीवन बेज़ार मिला आज।
धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,
ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।
नीर नहीं भावों की सरिता,
अद्भुत है कवि तेरी कविता।
आँखों ही से आँखों में करते जो बातें,
दिल से फिर होती ना क्यों मुलाकातें।
कई सालों जंग-ए-आजादी मिली है,
फ़ादासी, जेहादी, बर्बादी मिली है।
कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,
तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।
चाँद को छू लेने को, मुल्क तो बेताब है,
मुश्किल कि कर्ज में डूबा हुआ फैयाज़ है.
अजीब है ख़ुदा तू , तेरी ख़ुदाई भी,
तू भी साथ में और मेरी तन्हाई भी।
ना मय के लिए ना मयखाने के लिए,
जुनून-ए-जिगर है मर जाने के लिए।
प्रेम मधुर रस तुम बरसाओ ,
यूँ बैठे न आग लगाओ।
ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,
मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।
जमाने की बात भुलाने से उठा,
सोचता हूँ क्यों मैखाने से उठा?
रागी से बेहतर, विरागी से बेहतर,
न धन से अकड़ता न धन को पकड़ता।
ये झूठ की बीमारी तुझे हो मुबारक,
मैं सच का पुजारी, अनाड़ी सही।
जब भावना पे संभावना का प्रभाव होता है,
तब रिश्तों में संवेदना का अभाव होता है।
सूरज तो निकलता है रोज़ ही मगर,
तूने आँखें खोली और दीदार हो गया।
1. सुखी अँतड़ी सूखे पेट क्षुधा व्यथित कंगाल,
तुम्हीं कहो सजाये कैसे वो पूजा की थाल ?
2. उगता हुआ सूरज , बना सबब अंधियारे का,
ये देश उल्लुओं का है तो दोष सूरज का क्या ?
3. काश ये टेक्नोलॉजी भी तूने टेस्ट कर लिया होता,
खुशियों को कहीं से कॉपी पेस्ट कर लिया होता।
कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,
तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।
परछाइयाँ कुछ और नहीं बदलती हुई धूप हैं,
जानते तो सब हैं फिर न जाने क्यों चुप हैं?
पता नहीं किस शहर का,अजीब वो बाशिंदा है,
कि हकीक़त से घायल,ख्वाबों पे जिंदा है।
अगर मस्जिद में तू है, मंदिर में तू है,
मंदिर में मस्जिद में नफरत फिर क्यूँ है?
समंदर का होकर हवा की बातें करना क्या,
जो करते नहीं याद उन्हें दिल मे रखना क्या।
तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,
काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।
जो तेरा है सच सच्चाई है वो,
जरूरी नहीं कि अच्छाई है वो।
क्या खूब अख्तियार है, पीने पे जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
रूह की आवाज को कुछ यूँ सजा रखता है,
जज्बात अमिताभ अल्फ़ाज़ आसां रखता है।
ढूढ़ता रहा सबक जो जाने कितने सवालों में,
जा के मुझे मिला वो जिंदगी की किताबों में।
उसने करके खबरदार , मारा अमिताभ को,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं।
"अमिताभ" के प्यास की, बात ही कुछ खास है,
समंदर से कुछ भी न , कम की तलाश है।
इस दुनिया में आने की हो गयी ऐसी खता,
बदस्तूर अभी तक जारी है वो सिलसिला।
आप तो नाहक ही हम पे इल्जाम लगा देते हैं,
लक्षण हैं बदतर और हम अंजाम बता देते हैं।
न अता होता है, न खता होता है,
जो कुछ किया है, मुझे पता होता है।
जितने भी घाव दिए उसने, मेरी छाती पे ही दिये,
वो आदमी था बुरा जरूर,पर इतना बुरा भी नहीं।
सजा सुनाई तूने,क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं,और वो नजरों से उतर गया।
जग जब भी दिखता है तुमको,
जग सच हीं दिखता है तुमको।
ढूंढ़ता हूँ शहर में कोई तो बाशिंदा हो,
जो जगा हुआ भी हो और जिन्दा हो।
जब मन डोला, उड़न खटोला।
नफरतों के दामन में,जल रहे जो सभी है,
कौन सा है मजहब इनका ,कौन इनके नबी हैं?
बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,
अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।
काल बुरा कल जीवन आए,कल की कुछ तो राह बताए ,
विगत काल जो भी था गुजरा, जग में नूतन चाह जगाए।
लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,
मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।
ना तख़्त के लिए, ना ताज के लिए,
मैं लिखता हूँ रूह की आवाज़ के लिए।
जमाने की बात भुलाने से उठा,
सोचता हूँ क्यों मैखाने से उठा?
बेहतर ही था जो वो दाग दे गया,
ठंडा था दिल मेरा आग दे गया।
ख़्वाहिशों और चादरों में कुछ इस तरह अमन रखा,
ना चादरें लम्बी रखी ना ख़्वाहिशों को दफ़न रखा।
न पूछ हमसे हमने क्या इस दिल में पाले हैं,
कि सर से पाँव तलक छालें ही छालें हैं।
ना मय के लिए ना मयखाने के लिए,
जुनून-ए-जिगर है मर जाने के लिए
सम्मान
भाड़ में गया ईगो विगो,
और भाड़ सम्मान,
बंधु जेब में होने चाहिए,
भर के नोट तमाम,
भर के नोट तमाम।
@अजय अमिताभ सुमन
अभागी
जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
चाय
बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई
@अजय अमिताभ सुमन
वक्त और काम
कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।
जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।
@अजय अमिताभ सुमन
पहचान
लोग पूछते हैं मुझसे,
मेरे मजहब का नाम,
नाकाफी है शायद,
मेरा इंसान होना।
@अजय अमिताभ सुमन
हादसा
अखबार में आ जाए,
ये तय नहीं है,
हादसा तो है,
पर समय नहीं है।
@अजय अमिताभ सुमन
ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-ए–मंजिल का।
बार
वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
चाय
बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई
@अजय अमिताभ सुमन
कॉर्पोरेट
या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।
@अजय अमिताभ सुमन
प्रश्न विकट है मेरे मन में,
आए बारंबार,
क्या सच में होते हैं लड़के,
भैरव के अवतार।
ना कोई व्यापार
लड़के तो होते हैं भैया
शिव जी के अवतार,
10 रंग के लाल लिपिस्टिक
भस्म विभूति, ना कोई श्रृंगार
मीट भात सब चटल रहे
दांत आंत पर डटल रहे
पटल, अटल,सकल, सफल,
तरल, तलल, गरल
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अगर दिवस हो छत्तीस घंटे
काला ज्यादा , कम सफेद है,
बस इसी बात का तो खेद है।
हैरान बस इस बात का ,
हैरान नहीं हूँ मैं ,
खुद से हीं अपरिचित ,
अंजान हूँ मैं.
=====
रात के अंधेरों में तू भी क्या चीज है,
जुगनूओं की रोशनी हीं तुझको अजीज है।
रेत के समंदर में कारवां बिखर गया,
और तू कि फरेब हीं, मरीचिका उम्मीद है ।
=====
ना नास्तिक ना आस्तिक
वास्तविक , स्वास्तिक
=====
पुरुषोत्तम श्रीराम
गद्दी त्यागे, राज्य भी त्यागे,
त्यागे सब सुख धाम,
तब जाके हीं बन पाए वो,
पुरुषोत्तम श्रीराम,
हे ईश्वर संसार तुम्हारा
अद्भुत है आकार तुम्हारा,
हे ईश्वर संसार तुम्हारा
अजय अमिताभ सुमन
तेरे हीं नामों को लिखकर
कितने हीं महाग्रंथ लिखे हैं,
योग ,जोग, नियोग अधिज्ञाता,
तंत्र मंत्र आदि ग्रंथ फले हैं।
माघ की रात
फिर छाने लगी रूह में
सर्द माघ की रात,
सन सन करती दिन रात दिन,
रूह कांपती रात।
अजय अमिताभ सुमन
आजाद है
आजाद कौन था,
आजाद कौन है,
इस प्रश्न पर धरा ये,
क्यों आज मौन है,
इस देश पर मिटा जो,
आजाद नहीं था,
मिट्टी पर था टिका जो,
आजाद वो ही था।
अभागी
जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
वक्त और काम
कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।
@अजय अमिताभ सुमन
फूल और कांटे
जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।
@अजय अमिताभ सुमन
ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-ए–मंजिल का।
बार
वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
चाय
बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई
@अजय अमिताभ सुमन
कॉर्पोरेट
या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।
@अजय अमिताभ सुमन
आसमान की तरह
ना समन्दर के माफ़िक़ गहरे,
ना खाली आसमान की तरह,
ये जीना भी कोई जीना है
कि महज इंसान की तरह।
अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा और हवा
दिखते तो हो हर जगह ,दिखते पर नहीं,
रहते तो हो इस दिल में, छिपते पर नहीं,
हो नजर के सामने और नजरों से ओझल,
हवा हो क्या खुदा तुम, मिलते पर नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
हाथ की लकीरें
हाथ में रहकर भी नहीं आदमी के हाथ में,
हाथ की लकीरें भी चीज क्या है वाइज।
अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा हो गया है
तेरे हीं शहर में तुझी को ढूंढता हूँ,
अब बता भी दे अपना पता ,
क्या तू भी खुदा हो गया है?
अजय अमिताभ सुमन
अहम का था बना वो, वहम में हिल गया,
मिट्टी से न जुड़ा था , मिट्टी में मिल गया।
=====
“ये वकील का पेशा है या कि पत्थरों की दास्तां,
क़ि जीत पे जश्न नहीं, हार का गम नहीं।”
====
होते कुछ और हो, दिखाते कुछ और हो,
“बेनाम” खुद को अख़बार समझ रखा है क्या।
====
अमीरों को मलाल , गरीबी ना मिली,
गरीबों को मलाल,अमीरी ना मिली।
पलंग पे सोते अमीर को तरसे गरीब,
और अमीर कि सुकून-ए-फकीरी ना मिली।
====
कैसे करूँ इंकार , काँटों का तेरे भगवन,
फूलों में तू उतना ही है, जितना की काँटों में।
====
पोंगा पंडित काम ना आए,
ना पोथी ना पतरा,
एक बात है सुन ले भाई,
लोक तंत्र है खतरा।
आवाज रूह की,
आवाज रूह की,
ना तख्त के लिए,
ना ताज के लिए,
ना नाम की भी ख्वाहिश,
ना नाज के लिए,
दफ़न ना रह जाएं कहीं,
लफ्ज़ कोई सीने में,
मैं लिखता हूं रूह की,
आवाज के लिए।
=====
उस सत में ना चिंता पीड़ा,
ये जग उसकी है बस क्रीड़ा,
नर का पर ये जीवन कैसा,
व्यर्थ विफलता दुख संपीड़ा,
प्रभु राह की अंतिम बाधा ,
तृष्णा काम मिटाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में,
ये पहचान कराएं कैसे?
=====
खुद को खोने से डरता है,
जीवन सोने से भरता है,
तिनका तिनका महल सजाकर,
जीवन में उठता गिरता है।
प्रभु प्रेम में खोकर मिलता,
उसको जग जतलाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में
ये पहचान कराएं कैसे?
======
सम्मान
भाड़ में गया ईगो विगो,
और भाड़ सम्मान,
बंधु जेब में होने चाहिए,
भर के नोट तमाम,
भर के नोट तमाम।
@अजय अमिताभ सुमन
चाय
बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई
@अजय अमिताभ सुमन
पहचान
लोग पूछते हैं मुझसे,
मेरे मजहब का नाम,
नाकाफी है शायद,
मेरा इंसान होना।
@अजय अमिताभ सुमन
हादसा
अखबार में आ जाए,
ये तय नहीं है,
हादसा तो है,
पर समय नहीं है।
@अजय अमिताभ सुमन से तेरी,पहचान चाहता हूं।
हो खुद की निगाहों में,नेक जरा सोच लो,
तराजू पर तेरा, ईमान चाहता हूं,
ये पूछ ना मैं कैसा,इम्तिहान चाहता हूं।
अजय अमिताभ सुमन
आवाज रूह की,
ना तख्त के लिए,
ना ताज के लिए,
ना नाम की भी ख्वाहिश,
ना नाज के लिए,
दफ़न ना रह जाएं कहीं,
लफ्ज़ कोई सीने में,
मैं लिखता हूं रूह की,
आवाज के लिए।
@अजय अमिताभ सुमन
भूख
बड़ी मुश्किल थी राह , गुजर चूका हूँ मैं ,
ये भी क्या कम है कि , सुधर चूका हूँ मैं।
मिला नहीं इरम तो फिकर नहीं है मुझको ,
हूँ भूख से मैं हैरान , बिफर चूका हूँ मैं।
ले जाओ तुम ये राहें वो जन्नत के नक्शे,
कई बार हीं चला पर उजड़ चुका हूँ मैं।
सह ना सकेंगी आँखे, चिरागों की रोशन,
अंधा हुआ था कब का उबर चूका हूँ मैं।
अजय अमिताभ सुमन
आदमियत
जाके कोई क्या पूछे भी ,
आदमियत के रास्ते ।
क्या पता किन किन हालातों
से गुजरता आदमी ।
चुने किसको हसरतों ,
जरूरतों के दरमियाँ ।
एक को कसता है तो ,
दूजे से पिसता आदमी ।
अजय अमिताभ सुमन
======
राख
गलतियाँ करना है फितरत ,
करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना ,
कि दोहराता है आदमी ।
आदमी की हसरतों का ,
क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर ,
राख मांगे आदमी ।
अजय अमिताभ सुमन
=====
जरूरी नहीं
हर जीत का मतलब,
हार हो जरूरी नहीं।
नफे के वास्ते,
करार हो जरूरी नहीं।
जीत हार नफा हानि,
बेशक मजबूरी मगर,
हर रिश्ते का मतलब,
व्यापार हो जरूरी नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
जहां आंखों में आग
जब तन बदन में फकत,
जिस्म की नुमाईस हो,
फिर क्या हुस्न के चर्चे,
मोहब्बत की पैमाइश हो।
ये खेल नहीं जिस्म का,
है रूह की ये दौलत,
जहां आंखों में आग कहां,
इश्के आजमाइस हो।
अजय अमिताभ सुमन
====
ना पूछो मैं क्या कहता हूँ ,
क्या करता हूँ क्या सुनता हूँ .
हूँ दुनिया को देखा जैसे ,
चलते वैसे ही मैं चलता हूँ .
सूरज का उगना है मुश्किल ,
फिर भी खुशफहमियों से सजता हूँ .
कभी तो होगी सुबह सुहानी ,
शाम हूँ यारो मैं ढलता हूँ
=====
मेरे नाम में अचानक,
ये क्या सूझी है तुझको ,
बदनाम मैं बड़ा हूँ ,
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
मेरे जीवन पे मुझको
कोई नहीं भरोसा .
मेरी मौत पे हुकूमत
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
=====
यहाँ कत्ल नही देखते ,
देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के ,
अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।
बेखौफ घुमती है ,
कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी ,
बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।
======
हम आह भी भरते है ,
तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के ,
खैरात ही कुछ ऐसे है।
फरियाद अपनी लेके ,
बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है ,
सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।
=====
लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,
“बेनाम” शराफत जताने की भी हद है .
वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,
=====
इंतजाम
तेरी खिदमत के चर्चे मैं कैसे सरेआम करूं,
कहां से शुरू हो कहां को तमाम करूं।
कि मेरी हीं मिट्टी और मेरा हीं पसीना,
और नाम फकत तेरा हो इतना इंतजाम करूं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ सोचना तो था
क्या बोलना था तुझको ना कहने से पहले,
कुछ सोचना तो था कुछ भी कहने से पहले,
नुकसान हीं हो हरदम जरुरी नहीं,
ना कहने से बाद , सम्भलने से पहले।
अजय अमिताभ सुमन
========
तुझे बुन भी लूँ
तू पूछे और मैं सुन भी लूँ जरुरी नहीं,
गर सुन लूँ तो चुन भी लूँ जरुरी नहीं।
कुछ कहने का तुझपे तासीर भी तो हो,
कुछ कह भी दूं तुझे बुन भी लूं जरुरी नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
======
क्यूँ संभलता नहीं
इन आँखों से ईश्वर तुम जानोगे कैसे?
है पानी बरफ का तुम छानोगे कैसे?
है नदिया के पानी सा हर पल बदलता,
खुद रहता बिन बदला पहचानोगे कैसे?
अजय अमिताभ सुमन
====
पुरुषोत्तम
पुरुषों में हैं श्रेष्ठ राम ये लोग नहीं यूँ हीं कहते,
उत्तम नर कई सारे हैं सब,राम नहीं बना करते।
जिस रावण ने प्रभु राम को,वन वन में भटकाया था,
धोखे से हर ली थी उनकी ,सीता को तड़पाया था।
उस रावण को मृत होने पर,जो भ्राता कह पाते है,
ऐसे हीं मर्यादा अनुगामी,पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में
कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
========
अंधेरे में जब डर लगता
अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?
कैसे पेड़ पर पत्ते आते?पतझड़ में कैसे झड़ जाते?
कैसे कोयल कूक सुनाती,खेतों में हरियाली छाती?
चमगादड़ को दिशा दिखाता,बिना आंख बतलाता कौन,
और रात में उल्लू के, नयनों को ज्योति देता कौन?
अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
======
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई
बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी दीमक सारी, ओहदेदार की बीमारी।
कि कुर्सी के कच्चे चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।
घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।
दफ्तर के जो थे मारे , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई,
अजय अमिताभ सुमन
=====
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?
सी.एन.जी. का नाम बढ़ेगा,
कबतक आखिर कबतक?
जनता की पीड़ा तो हर लो,
कीमत आटे की कम कर लो।
भूख मिटी तो सब नाचेंगे ,
बेस्ट देश है सब गाएंगे।
रोटी के अन्धे क्या गाए ,
बेहतर भारत कब तक?
======
देश में नए विधान की
आन पड़ी है आज जरूरत,
देश में नए विधान की,
नए समय में नई समस्या ,
मांगे नए निदान की।
आज सभी को साथ मिलाकर ,
रचने नए प्रतिमान की,
यही वक्त है गाथा लिखने,
भारत देश महान की।
अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,
तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।
======
लोग पूछते हैं मुझसे , मेरे मजहब का नाम ,
नाकाफी है शायद मेरा इन्सान होना .
======
उसने करके ख़बरदार , मारा बेनाम को ,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं .
=======
दुनिया ये चीज ठीक है सच से चलती नहीं,
झूठ है मुकम्मल पर थोड़ा ईमान भी रखो।
=======
जाति , धर्म, मजहब की पहचान भी रखो,
अल्लाह जेहन में ठीक ,भगवान भी रखो।
======
सजा सुनाई तूने, क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं, और वो नजरों से गिर गया।
======
ना समन्दर की तरह गहरे , ना खाली ईन्सान की तरह ,
"अमिताभ" तुम जिए भी तो क्या जिए , महज एक इन्सान की तरह.
=====
रोटी की जद्दोजहद में , “अमिताभ ” तू बदला कहाँ,
पहले खा नहीं सकते थे, अब खा नहीं पाते।
=====
जो खरीदी नहीं जा सकती
उसी के खरीदार है बाजार में ,
हाथ की लकीरें देखी जाती है
“बेनाम” बदली नहीं जाती .
=====
अजीब है अंदाज
आदमी के प्यास की भी,
कभी समंदर कम पड़ जाता है
कभी आंसू भारी पड़ जाते
=====
हाथ में होते हुए भी
नहीं है आदमी के हाथ में,
अजीब है ये लकीरें
आदमी के हाथ की ।
=====
क्या खूब अख्तियार है, पीने पे जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
=====
जो खोजता है, मिलता नहीं,
जो मिलता है, खोजता नहीं,
आदमी इसीलिए फलता नहीं, फूलता नहीं।
=====
उसने करके खबरदार , मारा अमिताभ को,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं।
======
"अमिताभ" के प्यास की, बात ही कुछ खास है,
समंदर से कुछ भी न , कम की तलाश है।
=====
इस दुनिया में आने की हो गयी ऐसी खता,
बदस्तूर अभी तक जारी है वो सिलसिला।
=====
ज़माने ने किया नहीं कोई अत्याचार है,
"अमिताभ " तो खुद की गलतियों का शिकार है।
=====
ये क्या किया "अमिताभ", कि शख्सियत ही खुल गयी,
तेरी जुबाँ से बेहतर , तेरी ख़ामोशी थी।
=====
जितने भी घाव दिए उसने,
मेरी छाती पे ही दिये,
वो आदमी था बुरा जरूर,
पर इतना बुरा भी नहीं।
=====
सजा सुनाई तूने,
क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं,
और वो नजरों से उतर गया।।
=====
जग जब भी दिखता है तुमको,
जग सच हीं दिखता है तुमको।
=====
जब मन डोला,
उड़न खटोला।
=====
नफरतों के दामन में,
जल रहे जो सभी है,
कौन सा है मजहब इनका ,
कौन इनके नबी हैं?
=====
बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,
अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।
=====
गर दुष्कृत्य रचाकर कोई खुद को कह पाता हो वीर ,
न्याय विवेचन में निश्चित हीं बाधा पड़ी हुई गंभीर।
=====
भिन्नता का भाव ना हो, मोह का स्वभाव ना हो,
अर्थ आदि की विवशता , खिन्नता आभाव ना हो।
=====
हवाओं पे कोई कहानी लिखूँ,
क्यों अपनी मैं जिंदगानी लिखूँ?
=====
पोंगा पंडित काम ना आए,
ना पोथी ना पतरा,
एक बात है सुन ले भाई,
लोक तंत्र है खतरा।
=====
पता नहीं किस शहर का,
अजीब वो बाशिंदा है,
कि हकीक़त से घायल,
ख्वाबों पे जिंदा है।
=====
ज़ुबानों के थोड़े फ़सादी हुए क्या,
कहने लगे लोग जेहादी हुए क्या ?
=====
अगर मस्जिद में तू है, मंदिर में तू है,
मंदिर पे मस्जिद पे नफरत फिर क्यूँ है?
====
धँसी हुई आँखें, सूखे हुए पंजर और जो तन्हाई है,
ये कुछ और नहीं बूढ़े की पूरे उम्र की कमाई है।
=====
अजीब है ख़ुदा तू , तेरी ख़ुदाई भी,
तू भी साथ में और मेरी तन्हाई भी।
=====
रेत के समंदर सी दुनिया में हम हैं,
पता भी चले कैसे ये कैसा भरम है?
=====
जो तेरा है सच सच्चाई है वो,
जरूरी नहीं कि अच्छाई है वो।
=====
ढूंढ़ता हूँ शहर में कोई तो बाशिंदा हो,
जो जगा हुआ भी हो और जिन्दा हो।
====
क्यों बांधे बुत में तू उसको
जो फैला है यहीं कहीं,
क्या तेरे मंदिर से पहले,
ये ईश्वर था कहीं नहीं?
=====
तुम भी ग़जब हो हथियार ले आते हो,
काँटे हैं दिल मे, तलवार ले आते हो ।
=====
लाख कह ले तू अशफ़ाक हूँ मैं,
मैं राख हूँ मिट्टी की ख़ाक हूँ मैं।
=====
चलते है वो अक्सर बहारों में ऐसे,
पढ़ते हैं खबर कोई अखबारों में जैसे।
=====
चलो कि सब ओढ़ के
बिस्तर हो जाएं,
दफ्तर हो आएं
=====
हे ईश्वर संसार तुम्हारा
अद्भुत है आकार तुम्हारा,
हे ईश्वर संसार तुम्हारा
अजय अमिताभ सुमन
तेरे हीं नामों को लिखकर
कितने हीं महाग्रंथ लिखे हैं,
योग ,जोग, नियोग अधिज्ञाता,
तंत्र मंत्र आदि ग्रंथ फले हैं।
====
लड़के तो होते हैं भैया
शिव जी के अवतार,
10 रंग के लाल लिपिस्टिक
भस्म विभूति, ना कोई श्रृंगार
मीट भात सब चटल रहे
दांत आंत पर डटल रहे
पटल, अटल,सकल, सफल,
तरल, तलल, गरल
अतीत क्या व्यतीत है , ये काल क्या व्यतीत है,
भूतकाल की काया में, वर्तमान भयभीत है।
========
किस किस की नजर को हम देखें,हम सबकी नजर में रहते हैं,
किस्मत हीं ऐसी पाई है, हर वक्त सफर में रहते है।
=======
लेना हो तुझको जो गर्मी का माज,
मई दुपहरी में दिल्ली को आजा।
ताजा, सजा, आधा, सीधा सादा, राजा, ज्यादा
=====
बिन बोले सुन पाता कौन?
न्याय उन्हीं का जो लड़ रहते, उनका ना जो रहते मौन,
उनका क्या जो चुप रह जाते, उनकी बातें सुनता कौन?
जो प्यासा पानी को कहता ,अक्सर उसकी प्यास मिटी है,
जो निज हालत रोता रहता, कब उसकी हां सांस टिकी है?
पौधे जो चुप रह जाते है, हौले हौले छंट जाते है,
पशुओं की वाणी ना होती, इसीलिए तो कट जाते हैं।
जो कहता सब उनकी सुनते, गूंगे तो रह जाते गौण।
न्याय मिले क्या कुछ तो बोलो, बिन बोले सुन पाता कौन?
अजय अमिताभ सुमन
====
मृतशेष
विकट विघ्न जब भी आता है ,या तो भय छा जाता है ,
या जो सुप्त रहा मानव में , ओज प्रबल आ जाता है।
या तो भय संतप्त धूमिल , होने लगते शोकाकुल नर,
या तो थर्र थर्र कम्पित होने , लगते हैं अरिदल के स्वर।
या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय,
शत्रु शिविर को जो चलता हो हार फले कि या हो जय।
ऐसे हीं नर अरिसिंधु में मृत होकर भी शेष रहे,
हां ये शूर हीं विशेष रहे मृत होकर भी मृतशेष रहे।
अजय अमिताभ सुमन
==========
क्या रखा लड़ने में
नर क्या यत्न करे उस क्षण जब युक्ति समझ ना आती हो,
विकराल काल हो और बुद्धि ना मुक्ति मार्ग दिखाती हो।
जटिल राह है कठिन लक्ष्य और मार्ग अति दू:साध्य कहीं,
चंड काल को हरना दुश्कर कार्य जटिल पर साध्य कहीं।
अतिशय साहस संबल संचय करके जो नर लक्ष्य करे,
प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निज बल को हवभक्ष्य करे।
अति वेदना में होती बेशक तन मन से पथ अड़ने में ,
पर निज प्रण अपूर्णित करके भी क्या रखा लड़ने में?
अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में
कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
पर ना ज्ञानी मैं वैरागी , मेरा चित्त बस जय का रागी,
मुझको तो अच्छा लगता बस, जीत हर्ष के होने में।
अजय अमिताभ सुमन
=====
बिन बोले सुन पाता कौन?
न्याय उन्हीं का जो लड़ रहते, उनका ना जो रहते मौन,
उनका क्या जो चुप रह जाते, उनकी बातें सुनता कौन?
जो प्यासा पानी को कहता ,अक्सर उसकी प्यास मिटी है,
जो निज हालत रोता रहता, कब उसकी हां सांस टिकी है?
पौधे जो चुप रह जाते है, हौले हौले छंट जाते है,
पशुओं की वाणी ना होती, इसीलिए तो कट जाते हैं।
जो कहता सब उनकी सुनते, गूंगे तो रह जाते गौण।
न्याय मिले क्या कुछ तो बोलो, बिन बोले सुन पाता कौन?
अजय अमिताभ सुमन
====
मृतशेष
विकट विघ्न जब भी आता है ,या तो भय छा जाता है ,
या जो सुप्त रहा मानव में , ओज प्रबल आ जाता है।
या तो भय संतप्त धूमिल , होने लगते शोकाकुल नर,
या तो थर्र थर्र कम्पित होने , लगते हैं अरिदल के स्वर।
या मर जाये या मारे चित्त में कर के ये दृढ निश्चय,
शत्रु शिविर को जो चलता हो हार फले कि या हो जय।
ऐसे हीं नर अरिसिंधु में मृत होकर भी शेष रहे,
हां ये शूर हीं विशेष रहे मृत होकर भी मृतशेष रहे।
अजय अमिताभ सुमन
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क्या रखा लड़ने में
नर क्या यत्न करे उस क्षण जब युक्ति समझ ना आती हो,
विकराल काल हो और बुद्धि ना मुक्ति मार्ग दिखाती हो।
जटिल राह है कठिन लक्ष्य और मार्ग अति दू:साध्य कहीं,
चंड काल को हरना दुश्कर कार्य जटिल पर साध्य कहीं।
अतिशय साहस संबल संचय करके जो नर लक्ष्य करे,
प्रण धरकर ये निश्चय लेकर निज बल को हवभक्ष्य करे।
अति वेदना में होती बेशक तन मन से पथ अड़ने में ,
पर निज प्रण अपूर्णित करके भी क्या रखा लड़ने में?
अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में
कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
पर ना ज्ञानी मैं वैरागी , मेरा चित्त बस जय का रागी,
मुझको तो अच्छा लगता बस, जीत हर्ष के होने में।
अजय अमिताभ सुमन
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जो उद्भट निज प्रण का किंचित ना जीवन में मान रखे,
उस योद्धा का जीवन रण में कोई क्या सम्मान रखे?
या अहन्त्य को हरना था या शिव के हाथों मरना था,
या शिशार्पण यज्ञअग्नि को मृत्यु आलिंगन करना था?
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जीवन पथ की राहों पर घनघोर तूफ़ां जब भी आते हैं,
गहन हताशा के अंधियारे मानस पट पर छा जाते हैं।
इतिवृत के मुख्य पृष्ठ पर वो अध्याय बना पाते हैं ,
कंटक राहों से होकर जो निज व्यवसाय चला पाते हैं।
========
अभी धरा पर घायल हो पर लक्ष्य प्रबल अनजान नहीं,
विजयअग्नि की शिखाशांत है पर तुम हो नाकाम नहीं।
दृष्टि के मात्र आवर्तन से सूक्ष्म विघ्न भी बढ़ जाती है,
स्वविवेक अभिज्ञान करो कैसी भी बाधा हो जाती है।
========
जिस नदिया की नौका जाके नदिया के ना धार बहे ,
उस नौका का बचना मुश्किल कोई भी पतवार रहे?
जिन्हें चाह है इस जीवन में ईक्छित एक उजाले की,
उन राहों पे स्वागत करते शूल जनित पग छाले भी।
========
पैरों की पीड़ा छालों का संज्ञान अति आवश्यक है,
साहस श्रेयकर बिना ज्ञान के पर अभ्यास निरर्थक है।
व्यवधान आते रहते हैं पर परित्राण जरूरी है,
द्वंद्व कष्ट से मुक्ति कैसे मन का त्राण जरूरी है?
========
लड़कर वांछित प्राप्त नहीं तो अभिप्राय इतना हीं है ,
अन्य मार्ग संधान आवश्यक तुच्छप्राय कितना हीं है।
सोचो देखो क्या मिलता है नाहक शिव से लड़ने में ,
किंचित अब उपाय बचा है मैं तजकर शिव हरने में।
चिंगारी से जला नहीं जो
चिंगारी से जला नहीं जो,
उसने कब प्रकाश रचा है,
अंधेरों में चला नहीं जो,
उसने कब इतिहास रचा है।
आड़ी तिरछी सी गलियों से,
जो लड़ते गाथा रचते,
जिसको सीधी राह मिली हो,
उसने कब मधुमास रचा है,
चिंगारी से जला नहीं जो,
उसने कब प्रकाश रचा है।
@अजय अमिताभ सुमन
=====
उस सत में ना चिंता पीड़ा,
ये जग उसकी है बस क्रीड़ा,
नर का पर ये जीवन कैसा,
व्यर्थ विफलता दुख संपीड़ा,
प्रभु राह की अंतिम बाधा ,
तृष्णा काम मिटाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में,
ये पहचान कराएं कैसे?
=====
खुद को खोने से डरता है,
जीवन सोने से भरता है,
तिनका तिनका महल सजाकर,
जीवन में उठता गिरता है।
प्रभु प्रेम में खोकर मिलता,
उसको जग जतलाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में
ये पहचान कराएं कैसे?
======
सम्मान
भाड़ में गया ईगो विगो,
और भाड़ सम्मान,
बंधु जेब में होने चाहिए,
भर के नोट तमाम,
भर के नोट तमाम।
@अजय अमिताभ सुमन
अभागी
जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
चाय
बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई
@अजय अमिताभ सुमन
वक्त और काम
कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।
जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।
@अजय अमिताभ सुमन
पहचान
लोग पूछते हैं मुझसे,
मेरे मजहब का नाम,
नाकाफी है शायद,
मेरा इंसान होना।
@अजय अमिताभ सुमन
हादसा
अखबार में आ जाए,
ये तय नहीं है,
हादसा तो है,
पर समय नहीं है।
@अजय अमिताभ सुमन
ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-ए–मंजिल का।
बार
वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
चाय
बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई
@अजय अमिताभ सुमन
कॉर्पोरेट
या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।
@अजय अमिताभ सुमन
प्रश्न विकट है मेरे मन में,
आए बारंबार,
क्या सच में होते हैं लड़के,
भैरव के अवतार।
ना कोई व्यापार
लड़के तो होते हैं भैया
शिव जी के अवतार,
10 रंग के लाल लिपिस्टिक
भस्म विभूति, ना कोई श्रृंगार
मीट भात सब चटल रहे
दांत आंत पर डटल रहे
पटल, अटल,सकल, सफल,
तरल, तलल, गरल
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अगर दिवस हो छत्तीस घंटे
काला ज्यादा , कम सफेद है,
बस इसी बात का तो खेद है।
हैरान बस इस बात का ,
हैरान नहीं हूँ मैं ,
खुद से हीं अपरिचित ,
अंजान हूँ मैं.
=====
रात के अंधेरों में तू भी क्या चीज है,
जुगनूओं की रोशनी हीं तुझको अजीज है।
रेत के समंदर में कारवां बिखर गया,
और तू कि फरेब हीं, मरीचिका उम्मीद है ।
=====
ना नास्तिक ना आस्तिक
वास्तविक , स्वास्तिक
=====
पुरुषोत्तम श्रीराम
गद्दी त्यागे, राज्य भी त्यागे,
त्यागे सब सुख धाम,
तब जाके हीं बन पाए वो,
पुरुषोत्तम श्रीराम,
हे ईश्वर संसार तुम्हारा
अद्भुत है आकार तुम्हारा,
हे ईश्वर संसार तुम्हारा
अजय अमिताभ सुमन
तेरे हीं नामों को लिखकर
कितने हीं महाग्रंथ लिखे हैं,
योग ,जोग, नियोग अधिज्ञाता,
तंत्र मंत्र आदि ग्रंथ फले हैं।
माघ की रात
फिर छाने लगी रूह में
सर्द माघ की रात,
सन सन करती दिन रात दिन,
रूह कांपती रात।
अजय अमिताभ सुमन
आजाद है
आजाद कौन था,
आजाद कौन है,
इस प्रश्न पर धरा ये,
क्यों आज मौन है,
इस देश पर मिटा जो,
आजाद नहीं था,
मिट्टी पर था टिका जो,
आजाद वो ही था।
अभागी
जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
वक्त और काम
कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।
@अजय अमिताभ सुमन
फूल और कांटे
जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।
@अजय अमिताभ सुमन
ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-ए–मंजिल का।
बार
वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
चाय
बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई
@अजय अमिताभ सुमन
कॉर्पोरेट
या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।
@अजय अमिताभ सुमन
आसमान की तरह
ना समन्दर के माफ़िक़ गहरे,
ना खाली आसमान की तरह,
ये जीना भी कोई जीना है
कि महज इंसान की तरह।
अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा और हवा
दिखते तो हो हर जगह ,दिखते पर नहीं,
रहते तो हो इस दिल में, छिपते पर नहीं,
हो नजर के सामने और नजरों से ओझल,
हवा हो क्या खुदा तुम, मिलते पर नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
हाथ की लकीरें
हाथ में रहकर भी नहीं आदमी के हाथ में,
हाथ की लकीरें भी चीज क्या है वाइज।
अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा हो गया है
तेरे हीं शहर में तुझी को ढूंढता हूँ,
अब बता भी दे अपना पता ,
क्या तू भी खुदा हो गया है?
अजय अमिताभ सुमन
अहम का था बना वो, वहम में हिल गया,
मिट्टी से न जुड़ा था , मिट्टी में मिल गया।
=====
“ये वकील का पेशा है या कि पत्थरों की दास्तां,
क़ि जीत पे जश्न नहीं, हार का गम नहीं।”
====
होते कुछ और हो, दिखाते कुछ और हो,
“बेनाम” खुद को अख़बार समझ रखा है क्या।
====
अमीरों को मलाल , गरीबी ना मिली,
गरीबों को मलाल,अमीरी ना मिली।
पलंग पे सोते अमीर को तरसे गरीब,
और अमीर कि सुकून-ए-फकीरी ना मिली।
====
कैसे करूँ इंकार , काँटों का तेरे भगवन,
फूलों में तू उतना ही है, जितना की काँटों में।
====
पोंगा पंडित काम ना आए,
ना पोथी ना पतरा,
एक बात है सुन ले भाई,
लोक तंत्र है खतरा।
आवाज रूह की,
आवाज रूह की,
ना तख्त के लिए,
ना ताज के लिए,
ना नाम की भी ख्वाहिश,
ना नाज के लिए,
दफ़न ना रह जाएं कहीं,
लफ्ज़ कोई सीने में,
मैं लिखता हूं रूह की,
आवाज के लिए।
=====
बिना डाँट के जीवन कैसा,
फल बिना किसी तरुवर जैसा।
अति शराफत भी आफत है।
===========
क्यों दूँ खुद को मैं विश्राम
अथक परिश्रम नहीं आराम।
ना कर्मों को अल्प विराम।
कोर्ट केस के झगड़े सारे।
सुलझाने कई ल फड़े सारे।
मन में जो भी भाव हैं फलते।
गीत, कहानी, कविता गढ़ते।
और बढ़ानी भी निज आय।
संपन्नता का बनूँ पर्याय।
कई अधूरे नाम गिना दूँ।
सोने पर विश्राम लगा दूँ।
समय है कम और ज्यादा काम।
क्यों दूँ खुद को मैं विश्राम।
अजय अमिताभ सुमन
======
जुन से भी आफत
जुन से भी आफत जुलाई महीना।
पानी से राहत अब मिलता कहीं ना।
बादल इस मौसम में आए हुए हैं।
कीचड़ हीं सड़कों पर छाए हुए हैं।
सब्जी दुकानों पर आफत है छाई।
चावल भी लेने को शामत है भाई।
कपड़े सुखाने को जाएं कहाँ पर।
टपटपटप बूँदें आ जाती है छत पर।
भींगा है मौसम ना सुखता पसीना।
जुन से भी आफत जुलाई महीना।
अजय अमिताभ सुमन
====
जंजीर
पुराना सा कोई मंजर, सीने में खल गया,
ये उठा दर्द और जी मचल गया।
बेफिक्री के आलम में यादों का खंजर,
चला तो क्या बुरा था, कि तू संभल गया,
अजय अमिताभ सुमन
#जंजीर #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
=====
जिद
जो चाहा था मुझको मिला हीं नहीं,
पर किस्मत से कोई गिला हीं नहीं।
वक्त भी था महफ़िल भी जाम भी था ,
जिद मेरी थी दो घूँट मिला हीं नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
#जिद #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
=====
ईमान
ये पूछ ना मैं कैसा,इम्तिहान चाहता हूं,
तेरी नज़रों से तेरी,पहचान चाहता हूं।
हो खुद की निगाहों में,नेक जरा सोच लो,
तराजू पर तेरा, ईमान चाहता हूं,
ये पूछ ना मैं कैसा,इम्तिहान चाहता हूं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
दलील
वकीलों ,दलीलों,
मुवक्किल के रार में,
पूछते हो रखा क्या,
कोर्ट के करार में?
यही एक धंधा ऐसा .
कि जीत पे है पैसा,
और हारने पर सीख है,
क़ानून के बाजार में।
और पूछते हो रखा क्या,
कोर्ट के करार में?
अजय अमिताभ सुमन
=====
मैं हूं बालक एक नादान
मैं हूं बालक एक नादान,
विनती सुन ले हे भगवान,
छोटा हूं छोटी सी अर्जी,
छोटा सा हीं मेरा काम।
गर मैं तेरा हूं विश्वासी,
मैडम को तू दे दे खांसी,
छुट्टी कर दे एक वीक की,
इतने से चल जाए काम।
अजय अमिताभ सुमन
=====
सच गटक गई
यूं हीं न था कि ऐसा,
गलत अटक गई,
ये चाय भी थी कैसी,
हलक झटक गई।
कि अर्से से आदत तो,
और हीं थी साहब,
थी प्याली वो झूठ की,
सच गटक गई ।
अजय अमिताभ सुमन
=====
दो हाथ आदमी के
अच्छे है बुरे हैं हालत आदमी के,
दिन रात पड़े पीछे हालात आदमी के।
लहरें बड़ी है ऊंची साहिल पे जा अड़ा ये,
ले रेत की ये मुठ्ठी क्या बात आदमी के।
मिट्टी से जो बना है मिट्टी में मिल जायेगा,
हवा में फिर उड़ेंगे जर्रात आदमी के।
रुखसत हुए तो जाना सब काम थे अधूरे,
क्या क्या करे जहां में दो हाथ आदमी के।
अजय अमिताभ सुमन
=====
हिन्दुस्तान दिखता है
तेरी हीं नजरों का हुनर ,
ये हिंदू वो मुसलमां ,
मैं अनाड़ी हूं सब में,
इंसान दिखता है।
ना उत्तर ना दक्षिण,
ना पूरब का कोई,
मैं अंधा हूँ मुझको,
हिन्दुतान दिखता है।
अजय अमिताभ सुमन
=====
हवा हो क्या तुम
ना आँखों से ओझल
पर दिखते नहीं,
है पास भी तो मेरे ,
पर मिलते नहीं।
छिपते भी ऐसे कि
मौजूं हो हरपल,
हवा हीं हो क्या तुम ,
मिलते नहीं ?
अजय अमिताभ सुमन
=====
आदमियत
जाके कोई क्या पूछे भी ,
आदमियत के रास्ते ।
क्या पता किन किन हालातों
से गुजरता आदमी ।
चुने किसको हसरतों ,
जरूरतों के दरमियाँ ।
एक को कसता है तो ,
दूजे से पिसता आदमी ।
अजय अमिताभ सुमन
======
राख
गलतियाँ करना है फितरत ,
करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना ,
कि दोहराता है आदमी ।
आदमी की हसरतों का ,
क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर ,
राख मांगे आदमी ।
अजय अमिताभ सुमन
=====
जरूरी नहीं
हर जीत का मतलब,
हार हो जरूरी नहीं।
नफे के वास्ते,
करार हो जरूरी नहीं।
जीत हार नफा हानि,
बेशक मजबूरी मगर,
हर रिश्ते का मतलब,
व्यापार हो जरूरी नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
जहां आंखों में आग
जब तन बदन में फकत,
जिस्म की नुमाईस हो,
फिर क्या हुस्न के चर्चे,
मोहब्बत की पैमाइश हो।
ये खेल नहीं जिस्म का,
है रूह की ये दौलत,
जहां आंखों में आग कहां,
इश्के आजमाइस हो।
अजय अमिताभ सुमन
====
ना पूछो मैं क्या कहता हूँ ,
क्या करता हूँ क्या सुनता हूँ .
हूँ दुनिया को देखा जैसे ,
चलते वैसे ही मैं चलता हूँ .
सूरज का उगना है मुश्किल ,
फिर भी खुशफहमियों से सजता हूँ .
कभी तो होगी सुबह सुहानी ,
शाम हूँ यारो मैं ढलता हूँ
=====
मेरे नाम में अचानक,ये क्या सूझी है तुझको ,
बदनाम मैं बड़ा हूँ ,
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
मेरे जीवन पे मुझको
कोई नहीं भरोसा .
मेरी मौत पे हुकूमत
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
=====
यहाँ कत्ल नही देखते ,
देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के ,
अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।
बेखौफ घुमती है ,
कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी ,
बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।
======
हम आह भी भरते है ,
तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के ,
खैरात ही कुछ ऐसे है।
फरियाद अपनी लेके ,
बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है ,
सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।
=====
लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,
“बेनाम” शराफत जताने की भी हद है .
वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,
=====
इंतजाम
तेरी खिदमत के चर्चे मैं कैसे सरेआम करूं,
कहां से शुरू हो कहां को तमाम करूं।
कि मेरी हीं मिट्टी और मेरा हीं पसीना,
और नाम फकत तेरा हो इतना इंतजाम करूं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ सोचना तो था
क्या बोलना था तुझको ना कहने से पहले,
कुछ सोचना तो था कुछ भी कहने से पहले,
नुकसान हीं हो हरदम जरुरी नहीं,
ना कहने से बाद , सम्भलने से पहले।
अजय अमिताभ सुमन
========
तुझे बुन भी लूँ
तू पूछे और मैं सुन भी लूँ जरुरी नहीं,
गर सुन लूँ तो चुन भी लूँ जरुरी नहीं।
कुछ कहने का तुझपे तासीर भी तो हो,
कुछ कह भी दूं तुझे बुन भी लूं जरुरी नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
======
क्यूँ संभलता नहीं
इन आँखों से ईश्वर तुम जानोगे कैसे?
है पानी बरफ का तुम छानोगे कैसे?
है नदिया के पानी सा हर पल बदलता,
खुद रहता बिन बदला पहचानोगे कैसे?
अजय अमिताभ सुमन
====
पुरुषोत्तम
पुरुषों में हैं श्रेष्ठ राम ये लोग नहीं यूँ हीं कहते,
उत्तम नर कई सारे हैं सब,राम नहीं बना करते।
जिस रावण ने प्रभु राम को,वन वन में भटकाया था,
धोखे से हर ली थी उनकी ,सीता को तड़पाया था।
उस रावण को मृत होने पर,जो भ्राता कह पाते है,
ऐसे हीं मर्यादा अनुगामी,पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में
कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
=====
अंधेरे में जब डर लगता
अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?
कैसे पेड़ पर पत्ते आते?पतझड़ में कैसे झड़ जाते?
कैसे कोयल कूक सुनाती,खेतों में हरियाली छाती?
चमगादड़ को दिशा दिखाता,बिना आंख बतलाता कौन,
और रात में उल्लू के, नयनों को ज्योति देता कौन?
अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
======
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई
बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी दीमक सारी, ओहदेदार की बीमारी।
कि कुर्सी के कच्चे चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।
घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।
दफ्तर के जो थे मारे , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई,
अजय अमिताभ सुमन
=====
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?
सी.एन.जी. का नाम बढ़ेगा,
कबतक आखिर कबतक?
जनता की पीड़ा तो हर लो,
कीमत आटे की कम कर लो।
भूख मिटी तो सब नाचेंगे ,
बेस्ट देश है सब गाएंगे।
रोटी के अन्धे क्या गाए ,
बेहतर भारत कब तक?
======
देश में नए विधान की
आन पड़ी है आज जरूरत,
देश में नए विधान की,
नए समय में नई समस्या ,
मांगे नए निदान की।
आज सभी को साथ मिलाकर ,
रचने नए प्रतिमान की,
यही वक्त है गाथा लिखने,
भारत देश महान की।
अजय अमिताभ सुमन
=====
आहट
गर्मी की लहरें क्या आफत बड़ी थी,
तपती दुपहरी की शामत पड़ी थी।
खिड़की से आती थी लू की वो लपटें,
जी को बस ठंडक की चाहत बड़ी थी।
जरूरी नहीं कि लू लहरी कुछ कम हो,
इतना हीं काफी कि अग्नि कुछ नम हों।
बारिश ना आई पर ठंडक तो पहुंची,
कि मेघों की आहट से राहत बड़ी थी।
अजय अमिताभ सुमन
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भूख
बड़ी मुश्किल थी राह , गुजर चूका हूँ मैं ,
ये भी क्या कम है कि , सुधर चूका हूँ मैं।
मिला नहीं इरम तो फिकर नहीं है मुझको ,
हूँ भूख से मैं हैरान , बिफर चूका हूँ मैं।
ले जाओ तुम ये राहें वो जन्नत के नक्शे,
कई बार हीं चला पर उजड़ चुका हूँ मैं।
सह ना सकेंगी आँखे, चिरागों की रोशन,
अंधा हुआ था कब का उबर चूका हूँ मैं।
अजय अमिताभ सुमन
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=====
कंक्रीट
तपती धूप की मारी जनता, पशु पंछी व गाय,
बदन जले है अगन चले है, कहाँ से लाये राय।
चला चक्र ये अजब काल का, भूले मठ्ठा सत्तू,
फिर कैसे लू गर्मी से बच पाए जीव व जंतु।
पेड़ काट के ए. सी. कूलर. फ्रिज. तो रहे चलाय,
पर कैसे तुम ले आगे ,ठंडक पी कर चाय।
वन नदिया को चलो जिलाओ यही मात्र उपाय,
धरती की हरियाली का ना कंक्रीट पर्याय।
अजय अमिताभ सुमन
#कंक्रीट #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
======
सिंहासन
जा जाके सब टी. वी. खोलो, सिंहासन का भाषण तोलो।
क्या कुछ दिखता है कुछ अंतर, इस मुखड़े से कुछ तो बोलो।
मोदी मोदी बात चली थी , मोदी की सरकार चली थी।
एन.डी.ए.सरकार बनी क्यों, सोचो तो कुछ परदे खोलो।
अजय अमिताभ सुमन
#सिंहासन #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
========
जंजीर
पुराना सा कोई मंजर, सीने में खल गया,
ये उठा दर्द और जी मचल गया।
बेफिक्री के आलम में यादों का खंजर,
चला तो क्या बुरा था, कि तू संभल गया,
अजय अमिताभ सुमन
#जंजीर #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
====
हवा हो क्या तुम
ना आँखों से ओझल
पर दिखते नहीं,
है पास भी तो मेरे ,
पर मिलते नहीं।
छिपते भी ऐसे कि
मौजूं हो हरपल,
हवा हीं हो क्या तुम ,
मिलते नहीं ?
अजय अमिताभ सुमन
====
राख
गलतियाँ करना है फितरत ,
करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना ,
कि दोहराता है आदमी ।
आदमी की हसरतों का ,
क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर ,
राख मांगे आदमी ।
अजय अमिताभ सुमन
=====
जरूरी नहीं
हर जीत का मतलब,
हार हो जरूरी नहीं।
नफे के वास्ते,
करार हो जरूरी नहीं।
जीत हार नफा हानि,
बेशक मजबूरी मगर,
हर रिश्ते का मतलब,
व्यापार हो जरूरी नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
जहां आंखों में आग
जब तन बदन में फकत,
जिस्म की नुमाईस हो,
फिर क्या हुस्न के चर्चे,
मोहब्बत की पैमाइश हो।
ये खेल नहीं जिस्म का,
है रूह की ये दौलत,
जहां आंखों में आग कहां,
इश्के आजमाइस हो।
अजय अमिताभ सुमन
====
ना पूछो मैं क्या कहता हूँ ,
क्या करता हूँ क्या सुनता हूँ .
हूँ दुनिया को देखा जैसे ,
चलते वैसे ही मैं चलता हूँ .
सूरज का उगना है मुश्किल ,
फिर भी खुशफहमियों से सजता हूँ .
कभी तो होगी सुबह सुहानी ,
शाम हूँ यारो मैं ढलता हूँ
=====
मेरे नाम में अचानक,
ये क्या सूझी है तुझको ,
बदनाम मैं बड़ा हूँ ,
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
मेरे जीवन पे मुझको
कोई नहीं भरोसा .
मेरी मौत पे हुकूमत
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
=====
यहाँ कत्ल नही देखते ,
देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के ,
अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।
बेखौफ घुमती है ,
कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी ,
बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।
======
हम आह भी भरते है ,
तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के ,
खैरात ही कुछ ऐसे है।
फरियाद अपनी लेके ,
बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है ,
सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।
=====
लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,
“बेनाम” शराफत जताने की भी हद है .
वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,
=====
इंतजाम
तेरी खिदमत के चर्चे मैं कैसे सरेआम करूं,
कहां से शुरू हो कहां को तमाम करूं।
कि मेरी हीं मिट्टी और मेरा हीं पसीना,
और नाम फकत तेरा हो इतना इंतजाम करूं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ सोचना तो था
क्या बोलना था तुझको ना कहने से पहले,
कुछ सोचना तो था कुछ भी कहने से पहले,
नुकसान हीं हो हरदम जरुरी नहीं,
ना कहने से बाद , सम्भलने से पहले।
अजय अमिताभ सुमन
========
तुझे बुन भी लूँ
तू पूछे और मैं सुन भी लूँ जरुरी नहीं,
गर सुन लूँ तो चुन भी लूँ जरुरी नहीं।
कुछ कहने का तुझपे तासीर भी तो हो,
कुछ कह भी दूं तुझे बुन भी लूं जरुरी नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
======
क्यूँ संभलता नहीं
इन आँखों से ईश्वर तुम जानोगे कैसे?
है पानी बरफ का तुम छानोगे कैसे?
है नदिया के पानी सा हर पल बदलता,
खुद रहता बिन बदला पहचानोगे कैसे?
अजय अमिताभ सुमन
====
पुरुषोत्तम
पुरुषों में हैं श्रेष्ठ राम ये लोग नहीं यूँ हीं कहते,
उत्तम नर कई सारे हैं सब,राम नहीं बना करते।
जिस रावण ने प्रभु राम को,वन वन में भटकाया था,
धोखे से हर ली थी उनकी ,सीता को तड़पाया था।
उस रावण को मृत होने पर,जो भ्राता कह पाते है,
ऐसे हीं मर्यादा अनुगामी,पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में
कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
========
अंधेरे में जब डर लगता
अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?
कैसे पेड़ पर पत्ते आते?पतझड़ में कैसे झड़ जाते?
कैसे कोयल कूक सुनाती,खेतों में हरियाली छाती?
चमगादड़ को दिशा दिखाता,बिना आंख बतलाता कौन,
और रात में उल्लू के, नयनों को ज्योति देता कौन?
अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
======
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई
बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी दीमक सारी, ओहदेदार की बीमारी।
कि कुर्सी के कच्चे चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।
घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।
दफ्तर के जो थे मारे , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई,
अजय अमिताभ सुमन
=====
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?
सी.एन.जी. का नाम बढ़ेगा,
कबतक आखिर कबतक?
जनता की पीड़ा तो हर लो,
कीमत आटे की कम कर लो।
भूख मिटी तो सब नाचेंगे ,
बेस्ट देश है सब गाएंगे।
रोटी के अन्धे क्या गाए ,
बेहतर भारत कब तक?
======
देश में नए विधान की
आन पड़ी है आज जरूरत,
देश में नए विधान की,
नए समय में नई समस्या ,
मांगे नए निदान की।
आज सभी को साथ मिलाकर ,
रचने नए प्रतिमान की,
यही वक्त है गाथा लिखने,
भारत देश महान की।
अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,
तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।
======
लोग पूछते हैं मुझसे , मेरे मजहब का नाम ,
नाकाफी है शायद मेरा इन्सान होना .
======
उसने करके ख़बरदार , मारा बेनाम को ,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं .
=======
दुनिया ये चीज ठीक है सच से चलती नहीं,
झूठ है मुकम्मल पर थोड़ा ईमान भी रखो।
=======
जाति , धर्म, मजहब की पहचान भी रखो,
अल्लाह जेहन में ठीक ,भगवान भी रखो।
======
सजा सुनाई तूने, क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं, और वो नजरों से गिर गया।
======
ना समन्दर की तरह गहरे , ना खाली ईन्सान की तरह ,
"अमिताभ" तुम जिए भी तो क्या जिए , महज एक इन्सान की तरह.
=====
रोटी की जद्दोजहद में , “अमिताभ ” तू बदला कहाँ,
पहले खा नहीं सकते थे, अब खा नहीं पाते।
=====
जो खरीदी नहीं जा सकती
उसी के खरीदार है बाजार में ,
हाथ की लकीरें देखी जाती है
“बेनाम” बदली नहीं जाती .
=====
अजीब है अंदाज
आदमी के प्यास की भी,
कभी समंदर कम पड़ जाता है
कभी आंसू भारी पड़ जाते
=====
दलील
वकीलों ,दलीलों,
मुवक्किल के रार में,
पूछते हो रखा क्या,
कोर्ट के करार में?
यही एक धंधा ऐसा .
कि जीत पे है पैसा,
और हारने पर सीख है,
क़ानून के बाजार में।
और पूछते हो रखा क्या,
कोर्ट के करार में?
अजय अमिताभ सुमन
=====
मैं हूं बालक एक नादान
मैं हूं बालक एक नादान,
विनती सुन ले हे भगवान,
छोटा हूं छोटी सी अर्जी,
छोटा सा हीं मेरा काम।
गर मैं तेरा हूं विश्वासी,
मैडम को तू दे दे खांसी,
छुट्टी कर दे एक वीक की,
इतने से चल जाए काम।
अजय अमिताभ सुमन
=====
सच गटक गई
यूं हीं न था कि ऐसा,
गलत अटक गई,
ये चाय भी थी कैसी,
हलक झटक गई।
कि अर्से से आदत तो,
और हीं थी साहब,
थी प्याली वो झूठ की,
सच गटक गई ।
अजय अमिताभ सुमन
=====
दो हाथ आदमी के
अच्छे है बुरे हैं हालत आदमी के,
दिन रात पड़े पीछे हालात आदमी के।
लहरें बड़ी है ऊंची साहिल पे जा अड़ा ये,
ले रेत की ये मुठ्ठी क्या बात आदमी के।
मिट्टी से जो बना है मिट्टी में मिल जायेगा,
हवा में फिर उड़ेंगे जर्रात आदमी के।
रुखसत हुए तो जाना सब काम थे अधूरे,
क्या क्या करे जहां में दो हाथ आदमी के।
अजय अमिताभ सुमन
=====
हिन्दुस्तान दिखता है
तेरी हीं नजरों का हुनर ,
ये हिंदू वो मुसलमां ,
मैं अनाड़ी हूं सब में,
इंसान दिखता है।
ना उत्तर ना दक्षिण,
ना पूरब का कोई,
मैं अंधा हूँ मुझको,
हिन्दुतान दिखता है।
अजय अमिताभ सुमन
=====
हवा हो क्या तुम
ना आँखों से ओझल
पर दिखते नहीं,
है पास भी तो मेरे ,
पर मिलते नहीं।
छिपते भी ऐसे कि
मौजूं हो हरपल,
हवा हीं हो क्या तुम ,
मिलते नहीं ?
अजय अमिताभ सुमन
=====
आदमियत
जाके कोई क्या पूछे भी ,
आदमियत के रास्ते ।
क्या पता किन किन हालातों
से गुजरता आदमी ।
चुने किसको हसरतों ,
जरूरतों के दरमियाँ ।
एक को कसता है तो ,
दूजे से पिसता आदमी ।
अजय अमिताभ सुमन
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राख
गलतियाँ करना है फितरत ,
करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना ,
कि दोहराता है आदमी ।
आदमी की हसरतों का ,
क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर ,
राख मांगे आदमी ।
अजय अमिताभ सुमन
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जरूरी नहीं
हर जीत का मतलब,
हार हो जरूरी नहीं।
नफे के वास्ते,
करार हो जरूरी नहीं।
जीत हार नफा हानि,
बेशक मजबूरी मगर,
हर रिश्ते का मतलब,
व्यापार हो जरूरी नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
जहां आंखों में आग
जब तन बदन में फकत,
जिस्म की नुमाईस हो,
फिर क्या हुस्न के चर्चे,
मोहब्बत की पैमाइश हो।
ये खेल नहीं जिस्म का,
है रूह की ये दौलत,
जहां आंखों में आग कहां,
इश्के आजमाइस हो।
अजय अमिताभ सुमन
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ना पूछो मैं क्या कहता हूँ ,
क्या करता हूँ क्या सुनता हूँ .
हूँ दुनिया को देखा जैसे ,
चलते वैसे ही मैं चलता हूँ .
सूरज का उगना है मुश्किल ,
फिर भी खुशफहमियों से सजता हूँ .
कभी तो होगी सुबह सुहानी ,
शाम हूँ यारो मैं ढलता हूँ
=====
मेरे नाम में अचानक,
ये क्या सूझी है तुझको ,
बदनाम मैं बड़ा हूँ ,
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
मेरे जीवन पे मुझको
कोई नहीं भरोसा .
मेरी मौत पे हुकूमत
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
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यहाँ कत्ल नही देखते ,
देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के ,
अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।
बेखौफ घुमती है ,
कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी ,
बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।
======
हम आह भी भरते है ,
तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के ,
खैरात ही कुछ ऐसे है।
फरियाद अपनी लेके ,
बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है ,
सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।
=====
लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,
“बेनाम” शराफत जताने की भी हद है .
वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,
=====
इंतजाम
तेरी खिदमत के चर्चे मैं कैसे सरेआम करूं,
कहां से शुरू हो कहां को तमाम करूं।
कि मेरी हीं मिट्टी और मेरा हीं पसीना,
और नाम फकत तेरा हो इतना इंतजाम करूं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ सोचना तो था
क्या बोलना था तुझको ना कहने से पहले,
कुछ सोचना तो था कुछ भी कहने से पहले,
नुकसान हीं हो हरदम जरुरी नहीं,
ना कहने से बाद , सम्भलने से पहले।
अजय अमिताभ सुमन
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तुझे बुन भी लूँ
तू पूछे और मैं सुन भी लूँ जरुरी नहीं,
गर सुन लूँ तो चुन भी लूँ जरुरी नहीं।
कुछ कहने का तुझपे तासीर भी तो हो,
कुछ कह भी दूं तुझे बुन भी लूं जरुरी नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
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क्यूँ संभलता नहीं
इन आँखों से ईश्वर तुम जानोगे कैसे?
है पानी बरफ का तुम छानोगे कैसे?
है नदिया के पानी सा हर पल बदलता,
खुद रहता बिन बदला पहचानोगे कैसे?
अजय अमिताभ सुमन
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पुरुषोत्तम
पुरुषों में हैं श्रेष्ठ राम ये लोग नहीं यूँ हीं कहते,
उत्तम नर कई सारे हैं सब,राम नहीं बना करते।
जिस रावण ने प्रभु राम को,वन वन में भटकाया था,
धोखे से हर ली थी उनकी ,सीता को तड़पाया था।
उस रावण को मृत होने पर,जो भ्राता कह पाते है,
ऐसे हीं मर्यादा अनुगामी,पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में
कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
=====
अंधेरे में जब डर लगता
अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?
कैसे पेड़ पर पत्ते आते?पतझड़ में कैसे झड़ जाते?
कैसे कोयल कूक सुनाती,खेतों में हरियाली छाती?
चमगादड़ को दिशा दिखाता,बिना आंख बतलाता कौन,
और रात में उल्लू के, नयनों को ज्योति देता कौन?
अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
======
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई
बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी दीमक सारी, ओहदेदार की बीमारी।
कि कुर्सी के कच्चे चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।
घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।
दफ्तर के जो थे मारे , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई,
अजय अमिताभ सुमन
=====
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?
सी.एन.जी. का नाम बढ़ेगा,
कबतक आखिर कबतक?
जनता की पीड़ा तो हर लो,
कीमत आटे की कम कर लो।
भूख मिटी तो सब नाचेंगे ,
बेस्ट देश है सब गाएंगे।
रोटी के अन्धे क्या गाए ,
बेहतर भारत कब तक?
======
देश में नए विधान की
आन पड़ी है आज जरूरत,
देश में नए विधान की,
नए समय में नई समस्या ,
मांगे नए निदान की।
आज सभी को साथ मिलाकर ,
रचने नए प्रतिमान की,
यही वक्त है गाथा लिखने,
भारत देश महान की।
अजय अमिताभ सुमन
=====
आहट
गर्मी की लहरें क्या आफत बड़ी थी,
तपती दुपहरी की शामत पड़ी थी।
खिड़की से आती थी लू की वो लपटें,
जी को बस ठंडक की चाहत बड़ी थी।
जरूरी नहीं कि लू लहरी कुछ कम हो,
इतना हीं काफी कि अग्नि कुछ नम हों।
बारिश ना आई पर ठंडक तो पहुंची,
कि मेघों की आहट से राहत बड़ी थी।
अजय अमिताभ सुमन
#आहट #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
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भूख
बड़ी मुश्किल थी राह , गुजर चूका हूँ मैं ,
ये भी क्या कम है कि , सुधर चूका हूँ मैं।
मिला नहीं इरम तो फिकर नहीं है मुझको ,
हूँ भूख से मैं हैरान , बिफर चूका हूँ मैं।
ले जाओ तुम ये राहें वो जन्नत के नक्शे,
कई बार हीं चला पर उजड़ चुका हूँ मैं।
सह ना सकेंगी आँखे, चिरागों की रोशन,
अंधा हुआ था कब का उबर चूका हूँ मैं।
अजय अमिताभ सुमन
#भूख #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
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कंक्रीट
तपती धूप की मारी जनता, पशु पंछी व गाय,
बदन जले है अगन चले है, कहाँ से लाये राय।
चला चक्र ये अजब काल का, भूले मठ्ठा सत्तू,
फिर कैसे लू गर्मी से बच पाए जीव व जंतु।
पेड़ काट के ए. सी. कूलर. फ्रिज. तो रहे चलाय,
पर कैसे तुम ले आगे ,ठंडक पी कर चाय।
वन नदिया को चलो जिलाओ यही मात्र उपाय,
धरती की हरियाली का ना कंक्रीट पर्याय।
अजय अमिताभ सुमन
#कंक्रीट #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
======
सिंहासन
जा जाके सब टी. वी. खोलो, सिंहासन का भाषण तोलो।
क्या कुछ दिखता है कुछ अंतर, इस मुखड़े से कुछ तो बोलो।
मोदी मोदी बात चली थी , मोदी की सरकार चली थी।
एन.डी.ए.सरकार बनी क्यों, सोचो तो कुछ परदे खोलो।
अजय अमिताभ सुमन
#सिंहासन #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
========
जंजीर
पुराना सा कोई मंजर, सीने में खल गया,
ये उठा दर्द और जी मचल गया।
बेफिक्री के आलम में यादों का खंजर,
चला तो क्या बुरा था, कि तू संभल गया,
अजय अमिताभ सुमन
#जंजीर #MicroPoetry #Poem #Poetryhub #poetrylovers #poetrygram #poetryislife #kavita #LaghuKavita #Hindipoet #Hindipoetrylovers
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हवा हो क्या तुम
ना आँखों से ओझल
पर दिखते नहीं,
है पास भी तो मेरे ,
पर मिलते नहीं।
छिपते भी ऐसे कि
मौजूं हो हरपल,
हवा हीं हो क्या तुम ,
मिलते नहीं ?
अजय अमिताभ सुमन
====
राख
गलतियाँ करना है फितरत ,
करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना ,
कि दोहराता है आदमी ।
आदमी की हसरतों का ,
क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर ,
राख मांगे आदमी ।
अजय अमिताभ सुमन
=====
जरूरी नहीं
हर जीत का मतलब,
हार हो जरूरी नहीं।
नफे के वास्ते,
करार हो जरूरी नहीं।
जीत हार नफा हानि,
बेशक मजबूरी मगर,
हर रिश्ते का मतलब,
व्यापार हो जरूरी नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
जहां आंखों में आग
जब तन बदन में फकत,
जिस्म की नुमाईस हो,
फिर क्या हुस्न के चर्चे,
मोहब्बत की पैमाइश हो।
ये खेल नहीं जिस्म का,
है रूह की ये दौलत,
जहां आंखों में आग कहां,
इश्के आजमाइस हो।
अजय अमिताभ सुमन
====
ना पूछो मैं क्या कहता हूँ ,
क्या करता हूँ क्या सुनता हूँ .
हूँ दुनिया को देखा जैसे ,
चलते वैसे ही मैं चलता हूँ .
सूरज का उगना है मुश्किल ,
फिर भी खुशफहमियों से सजता हूँ .
कभी तो होगी सुबह सुहानी ,
शाम हूँ यारो मैं ढलता हूँ
=====
मेरे नाम में अचानक,
ये क्या सूझी है तुझको ,
बदनाम मैं बड़ा हूँ ,
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
मेरे जीवन पे मुझको
कोई नहीं भरोसा .
मेरी मौत पे हुकूमत
दे दूँ तुझे मैं कैसे .
=====
यहाँ कत्ल नही देखते ,
देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के ,
अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।
बेखौफ घुमती है ,
कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी ,
बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।
======
हम आह भी भरते है ,
तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के ,
खैरात ही कुछ ऐसे है।
फरियाद अपनी लेके ,
बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है ,
सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।
=====
लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,
“बेनाम” शराफत जताने की भी हद है .
वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,
=====
इंतजाम
तेरी खिदमत के चर्चे मैं कैसे सरेआम करूं,
कहां से शुरू हो कहां को तमाम करूं।
कि मेरी हीं मिट्टी और मेरा हीं पसीना,
और नाम फकत तेरा हो इतना इंतजाम करूं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ सोचना तो था
क्या बोलना था तुझको ना कहने से पहले,
कुछ सोचना तो था कुछ भी कहने से पहले,
नुकसान हीं हो हरदम जरुरी नहीं,
ना कहने से बाद , सम्भलने से पहले।
अजय अमिताभ सुमन
========
तुझे बुन भी लूँ
तू पूछे और मैं सुन भी लूँ जरुरी नहीं,
गर सुन लूँ तो चुन भी लूँ जरुरी नहीं।
कुछ कहने का तुझपे तासीर भी तो हो,
कुछ कह भी दूं तुझे बुन भी लूं जरुरी नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
======
क्यूँ संभलता नहीं
इन आँखों से ईश्वर तुम जानोगे कैसे?
है पानी बरफ का तुम छानोगे कैसे?
है नदिया के पानी सा हर पल बदलता,
खुद रहता बिन बदला पहचानोगे कैसे?
अजय अमिताभ सुमन
====
पुरुषोत्तम
पुरुषों में हैं श्रेष्ठ राम ये लोग नहीं यूँ हीं कहते,
उत्तम नर कई सारे हैं सब,राम नहीं बना करते।
जिस रावण ने प्रभु राम को,वन वन में भटकाया था,
धोखे से हर ली थी उनकी ,सीता को तड़पाया था।
उस रावण को मृत होने पर,जो भ्राता कह पाते है,
ऐसे हीं मर्यादा अनुगामी,पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
अजय अमिताभ सुमन
========
क्या रखा है जीत हार में
कितना अंतर बचा हुआ है, जीत हार के होने में,
जितना उर के हंस पड़ने या, किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है, क्या रखा है जीत हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू , क्या रखा है प्रीत रार में।
हाथों में उग आए सोना , तो जो अंतर होता है,
और वही जो उर छा जाए, इसके फिर से खोने में।
========
अंधेरे में जब डर लगता
अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?
कैसे पेड़ पर पत्ते आते?पतझड़ में कैसे झड़ जाते?
कैसे कोयल कूक सुनाती,खेतों में हरियाली छाती?
चमगादड़ को दिशा दिखाता,बिना आंख बतलाता कौन,
और रात में उल्लू के, नयनों को ज्योति देता कौन?
अंधेरे में जब डर लगता,साहस तब भर जाता कौन ?
जुगनू सारे जला जला कर,बरगद को चमकाता कौन?
अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
======
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई
बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी दीमक सारी, ओहदेदार की बीमारी।
कि कुर्सी के कच्चे चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।
घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।
दफ्तर के जो थे मारे , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई,
अजय अमिताभ सुमन
=====
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?
सी.एन.जी. का नाम बढ़ेगा,
कबतक आखिर कबतक?
जनता की पीड़ा तो हर लो,
कीमत आटे की कम कर लो।
भूख मिटी तो सब नाचेंगे ,
बेस्ट देश है सब गाएंगे।
रोटी के अन्धे क्या गाए ,
बेहतर भारत कब तक?
======
देश में नए विधान की
आन पड़ी है आज जरूरत,
देश में नए विधान की,
नए समय में नई समस्या ,
मांगे नए निदान की।
आज सभी को साथ मिलाकर ,
रचने नए प्रतिमान की,
यही वक्त है गाथा लिखने,
भारत देश महान की।
अजय अमिताभ सुमन
=====
कुछ इस तरह से जिंदगी, कट गयी चलते हुए,
तुझे हीं ढूंढना था, तेरे घर मे रहते में रहते हुए।
======
लोग पूछते हैं मुझसे , मेरे मजहब का नाम ,
नाकाफी है शायद मेरा इन्सान होना .
======
उसने करके ख़बरदार , मारा बेनाम को ,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं .
=======
दुनिया ये चीज ठीक है सच से चलती नहीं,
झूठ है मुकम्मल पर थोड़ा ईमान भी रखो।
=======
जाति , धर्म, मजहब की पहचान भी रखो,
अल्लाह जेहन में ठीक ,भगवान भी रखो।
======
सजा सुनाई तूने, क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं, और वो नजरों से गिर गया।
======
ना समन्दर की तरह गहरे , ना खाली ईन्सान की तरह ,
"अमिताभ" तुम जिए भी तो क्या जिए , महज एक इन्सान की तरह.
=====
रोटी की जद्दोजहद में , “अमिताभ ” तू बदला कहाँ,
पहले खा नहीं सकते थे, अब खा नहीं पाते।
=====
जो खरीदी नहीं जा सकती
उसी के खरीदार है बाजार में ,
हाथ की लकीरें देखी जाती है
“बेनाम” बदली नहीं जाती .
=====
अजीब है अंदाज
आदमी के प्यास की भी,
कभी समंदर कम पड़ जाता है
कभी आंसू भारी पड़ जाते
=====
हाथ में होते हुए भी
नहीं है आदमी के हाथ में,
अजीब है ये लकीरें
आदमी के हाथ की ।
=====
क्या खूब अख्तियार है, पीने पे जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
=====
जो खोजता है, मिलता नहीं,
जो मिलता है, खोजता नहीं,
आदमी इसीलिए फलता नहीं, फूलता नहीं।
=====
उसने करके खबरदार , मारा अमिताभ को,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं।
======
"अमिताभ" के प्यास की, बात ही कुछ खास है,
समंदर से कुछ भी न , कम की तलाश है।
=====
इस दुनिया में आने की हो गयी ऐसी खता,
बदस्तूर अभी तक जारी है वो सिलसिला।
=====
ज़माने ने किया नहीं कोई अत्याचार है,
"अमिताभ " तो खुद की गलतियों का शिकार है।
=====
ये क्या किया "अमिताभ", कि शख्सियत ही खुल गयी,
तेरी जुबाँ से बेहतर , तेरी ख़ामोशी थी।
=====
जितने भी घाव दिए उसने,
मेरी छाती पे ही दिये,
वो आदमी था बुरा जरूर,
पर इतना बुरा भी नहीं।
=====
सजा सुनाई तूने,
क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं,
और वो नजरों से उतर गया।।
=====
जग जब भी दिखता है तुमको,
जग सच हीं दिखता है तुमको।
=====
जब मन डोला,
उड़न खटोला।
=====
नफरतों के दामन में,
जल रहे जो सभी है,
कौन सा है मजहब इनका ,
कौन इनके नबी हैं?
=====
बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,
अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।
=====
गर दुष्कृत्य रचाकर कोई खुद को कह पाता हो वीर ,
न्याय विवेचन में निश्चित हीं बाधा पड़ी हुई गंभीर।
=====
चिंगारी से जला नहीं जो
चिंगारी से जला नहीं जो,
उसने कब प्रकाश रचा है,
अंधेरों में चला नहीं जो,
उसने कब इतिहास रचा है।
आड़ी तिरछी सी गलियों से,
जो लड़ते गाथा रचते,
जिसको सीधी राह मिली हो,
उसने कब मधुमास रचा है,
चिंगारी से जला नहीं जो,
उसने कब प्रकाश रचा है।
@अजय अमिताभ सुमन
=====
उस सत में ना चिंता पीड़ा,
ये जग उसकी है बस क्रीड़ा,
नर का पर ये जीवन कैसा,
व्यर्थ विफलता दुख संपीड़ा,
प्रभु राह की अंतिम बाधा ,
तृष्णा काम मिटाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में,
ये पहचान कराएं कैसे?
=====
खुद को खोने से डरता है,
जीवन सोने से भरता है,
तिनका तिनका महल सजाकर,
जीवन में उठता गिरता है।
प्रभु प्रेम में खोकर मिलता,
उसको जग जतलाएं कैसे?
ईश्वर हीं बसते सब नर में
ये पहचान कराएं कैसे?
======
सम्मान
भाड़ में गया ईगो विगो,
और भाड़ सम्मान,
बंधु जेब में होने चाहिए,
भर के नोट तमाम,
भर के नोट तमाम।
@अजय अमिताभ सुमन
अभागी
जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
चाय
बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई
@अजय अमिताभ सुमन
वक्त और काम
कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।
जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।
@अजय अमिताभ सुमन
पहचान
लोग पूछते हैं मुझसे,
मेरे मजहब का नाम,
नाकाफी है शायद,
मेरा इंसान होना।
@अजय अमिताभ सुमन
हादसा
अखबार में आ जाए,
ये तय नहीं है,
हादसा तो है,
पर समय नहीं है।
@अजय अमिताभ सुमन
ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-ए–मंजिल का।
बार
वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
चाय
बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई
@अजय अमिताभ सुमन
कॉर्पोरेट
या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।
@अजय अमिताभ सुमन
प्रश्न विकट है मेरे मन में,
आए बारंबार,
क्या सच में होते हैं लड़के,
भैरव के अवतार।
ना कोई व्यापार
लड़के तो होते हैं भैया
शिव जी के अवतार,
10 रंग के लाल लिपिस्टिक
भस्म विभूति, ना कोई श्रृंगार
मीट भात सब चटल रहे
दांत आंत पर डटल रहे
पटल, अटल,सकल, सफल,
तरल, तलल, गरल
#trendigpoem #viralpost #micropoetry #Poetry #microPoem #Shortpoem #Shorts #Kavita #Laghukavita #Poetrylover #Poetrycommunity #Hindikavita #Hindipoem
अगर दिवस हो छत्तीस घंटे
काला ज्यादा , कम सफेद है,
बस इसी बात का तो खेद है।
हैरान बस इस बात का ,
हैरान नहीं हूँ मैं ,
खुद से हीं अपरिचित ,
अंजान हूँ मैं.
=====
रात के अंधेरों में तू भी क्या चीज है,
जुगनूओं की रोशनी हीं तुझको अजीज है।
रेत के समंदर में कारवां बिखर गया,
और तू कि फरेब हीं, मरीचिका उम्मीद है ।
=====
ना नास्तिक ना आस्तिक
वास्तविक , स्वास्तिक
=====
पुरुषोत्तम श्रीराम
गद्दी त्यागे, राज्य भी त्यागे,
त्यागे सब सुख धाम,
तब जाके हीं बन पाए वो,
पुरुषोत्तम श्रीराम,
हे ईश्वर संसार तुम्हारा
अद्भुत है आकार तुम्हारा,
हे ईश्वर संसार तुम्हारा
अजय अमिताभ सुमन
तेरे हीं नामों को लिखकर
कितने हीं महाग्रंथ लिखे हैं,
योग ,जोग, नियोग अधिज्ञाता,
तंत्र मंत्र आदि ग्रंथ फले हैं।
माघ की रात
फिर छाने लगी रूह में
सर्द माघ की रात,
सन सन करती दिन रात दिन,
रूह कांपती रात।
अजय अमिताभ सुमन
आजाद है
आजाद कौन था,
आजाद कौन है,
इस प्रश्न पर धरा ये,
क्यों आज मौन है,
इस देश पर मिटा जो,
आजाद नहीं था,
मिट्टी पर था टिका जो,
आजाद वो ही था।
अभागी
जो पानी से आग लगा दी,
उनको कैसे कहूं अभागी।
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
वक्त और काम
कौन न कहता काम दो,
काम दो भई काम दो,
काम दो तमाम दो,
दिन रात सुबहो शाम दो,
अर्ज फकत इतना सा है,
कि काम होते वक्त दो,
या वक्त होते काम दो।
@अजय अमिताभ सुमन
फूल और कांटे
जीवन में दुख भी है,
जीवन में सुख भी,
दुख की परछाई तो,
सुख भी है चख ले,
कांटे तो चुभते ,
चुभाते हीं जायेंगे,
हंसने को राजी गर ,
फूल भी है हंस ले।
@अजय अमिताभ सुमन
ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ "अमिताभ", मजा तो तब है,
लुत्फ़-ए सफर में असर हो, नशा-ए–मंजिल का।
बार
वकीलों का जीवन
ना जीत में , ना हार में ,
या तो लड़ते है बार में ,
या पड़ते हैं हैं बार में
@अजय अमिताभ सुमन
आप्त
तू तबतक ना आप्त है,
पर्याप्त है जो प्राप्त है।
@अजय अमिताभ सुमन
चाय
बात यूं ना थी कि चाय,
कैसे हलक में अटक गई,
बात यूं थी दरअसल ,
कि प्याली थी झूठ की,
और सच गटक गई
@अजय अमिताभ सुमन
कॉर्पोरेट
या तो समय रहते काम दो,
या काम के लिए समय दो।
@अजय अमिताभ सुमन
आसमान की तरह
ना समन्दर के माफ़िक़ गहरे,
ना खाली आसमान की तरह,
ये जीना भी कोई जीना है
कि महज इंसान की तरह।
अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा और हवा
दिखते तो हो हर जगह ,दिखते पर नहीं,
रहते तो हो इस दिल में, छिपते पर नहीं,
हो नजर के सामने और नजरों से ओझल,
हवा हो क्या खुदा तुम, मिलते पर नहीं।
अजय अमिताभ सुमन
=====
हाथ की लकीरें
हाथ में रहकर भी नहीं आदमी के हाथ में,
हाथ की लकीरें भी चीज क्या है वाइज।
अजय अमिताभ सुमन
=====
खुदा हो गया है
तेरे हीं शहर में तुझी को ढूंढता हूँ,
अब बता भी दे अपना पता ,
क्या तू भी खुदा हो गया है?
अजय अमिताभ सुमन
अहम का था बना वो, वहम में हिल गया,
मिट्टी से न जुड़ा था , मिट्टी में मिल गया।
=====
“ये वकील का पेशा है या कि पत्थरों की दास्तां,
क़ि जीत पे जश्न नहीं, हार का गम नहीं।”
====
होते कुछ और हो, दिखाते कुछ और हो,
“बेनाम” खुद को अख़बार समझ रखा है क्या।
====
अमीरों को मलाल , गरीबी ना मिली,
गरीबों को मलाल,अमीरी ना मिली।
पलंग पे सोते अमीर को तरसे गरीब,
और अमीर कि सुकून-ए-फकीरी ना मिली।
====
कैसे करूँ इंकार , काँटों का तेरे भगवन,
फूलों में तू उतना ही है, जितना की काँटों में।
====
पोंगा पंडित काम ना आए,
ना पोथी ना पतरा,
एक बात है सुन ले भाई,
लोक तंत्र है खतरा।
आवाज रूह की,
आवाज रूह की,
ना तख्त के लिए,
ना ताज के लिए,
ना नाम की भी ख्वाहिश,
ना नाज के लिए,
दफ़न ना रह जाएं कहीं,
लफ्ज़ कोई सीने में,
मैं लिखता हूं रूह की,
आवाज के लिए।
=====
नहीं है आदमी के हाथ में,
अजीब है ये लकीरें
आदमी के हाथ की ।
=====
क्या खूब अख्तियार है, पीने पे जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।
=====
जो खोजता है, मिलता नहीं,
जो मिलता है, खोजता नहीं,
आदमी इसीलिए फलता नहीं, फूलता नहीं।
=====
उसने करके खबरदार , मारा अमिताभ को,
बेईमानी में ईमान की जरुरत कुछ कम नहीं।
======
"अमिताभ" के प्यास की, बात ही कुछ खास है,
समंदर से कुछ भी न , कम की तलाश है।
=====
इस दुनिया में आने की हो गयी ऐसी खता,
बदस्तूर अभी तक जारी है वो सिलसिला।
=====
ज़माने ने किया नहीं कोई अत्याचार है,
"अमिताभ " तो खुद की गलतियों का शिकार है।
=====
ये क्या किया "अमिताभ", कि शख्सियत ही खुल गयी,
तेरी जुबाँ से बेहतर , तेरी ख़ामोशी थी।
=====
जितने भी घाव दिए उसने,
मेरी छाती पे ही दिये,
वो आदमी था बुरा जरूर,
पर इतना बुरा भी नहीं।
=====
सजा सुनाई तूने,
क्या खूब इस गुनाह की,
कि हाथ उठाई भी नहीं,
और वो नजरों से उतर गया।।
=====
जग जब भी दिखता है तुमको,
जग सच हीं दिखता है तुमको।
=====
जब मन डोला,
उड़न खटोला।
=====
नफरतों के दामन में,
जल रहे जो सभी है,
कौन सा है मजहब इनका ,
कौन इनके नबी हैं?
=====
बात तो है इतनी सी जाने क्यों खल गई,
अहम की राख थी बुझाने पे जल गई।
=====
गर दुष्कृत्य रचाकर कोई खुद को कह पाता हो वीर ,
न्याय विवेचन में निश्चित हीं बाधा पड़ी हुई गंभीर।
====
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