Saturday, March 7, 2026

टूटे फोन का जादू

 बहुत समय पहले की बात है, जब भारत के एक चमचमाते महानगर में, जहाँ रातें भी दिन की तरह उज्ज्वल लगती थीं, एक ऐसी टेक कंपनी फैली हुई थी जो आधुनिकता का प्रतीक बनी हुई थी—साइनेप्स टेक्नोलॉजीज। इसका विशाल कैंपस किसी स्वप्निल शहर से कम न था। कांच की ऊँची-ऊँची इमारतें आकाश को चीरती हुई खड़ी थीं, जिनकी सतह पर सूरज की किरणें टूट-फूटकर इंद्रधनुषी रंग बिखेरतीं। रोबोटिक सिक्योरिटी गेट्स, जो मानव की नजर से भी तेज थे, हर आने-जाने वाले को स्कैन करते, जबकि इलेक्ट्रिक कारों की चमचमाती कतारें पार्किंग लॉट में सजी हुईं, जैसे कोई भविष्य की सेना तैयार हो। हजारों कर्मचारी, जिनकी जिंदगी एक रेस की तरह तेज रफ्तार में दौड़ रही थी, कॉफी के घूँटों और स्क्रीन की चकाचौंध में डूबे हुए थे। लेकिन इस चकाचौंध के बीच, एक गहरा दर्शन छिपा था—जिंदगी की असली ताकत चीजों में नहीं, बल्कि उन चीजों को देखने वाली नजर में होती है।

इसी साम्राज्य के सबसे सम्मानित स्तंभों में से एक थे मिस्टर राजेश वर्मा—सीईओ के सीनियर एडवाइजर। उन्हें कंपनी में सिर्फ एक सलाहकार नहीं कहा जाता था, बल्कि "दूरदर्शी मेंटर" का खिताब दिया गया था। उनकी आँखें ऐसी थीं मानो भविष्य की झलक कैद कर लें। वे छोटी-छोटी घटनाओं में भी ब्रह्मांड के रहस्य पढ़ लेते थे। एक बार बोर्डरूम में, जब एक छोटी सी तकनीकी खराबी ने मीटिंग को ठप कर दिया, तो वर्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा था, "यह खराबी नहीं, एक नई क्रांति का संकेत है।" उनके शब्दों में एक दार्शनिक गहराई थी—जो सिखाती थी कि जीवन की हर टूटन में एक नया निर्माण छिपा होता है, बस उसे पहचानने की सूक्ष्म दृष्टि चाहिए।

टूटा हुआ स्मार्टफोन: किस्मत का पहला संकेत

एक धुंधली सुबह की बात है, जब हवा में अभी भी रात्रि की ठंडक बसी हुई थी। कंपनी में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की एक ऐसी महत्वपूर्ण मीटिंग होने वाली थी, जो कंपनी के भविष्य को नया आकार देने वाली थी। अरबों के निवेश, वैश्विक साझेदारियाँ—सब कुछ दांव पर था। मिस्टर वर्मा अपने दो करीबी सहयोगियों—मैनेजर विक्रम और एनालिस्ट प्रिया—के साथ पार्किंग लॉट से ऑफिस बिल्डिंग की ओर बढ़ रहे थे। उनके कदमों की गूँज कंक्रीट पर थिरक रही थी, और हवा में कॉफी मिक्सर की सुगंध घुली हुई थी। तभी, अचानक उनकी नजर पार्किंग के एक सुनसान कोने पर ठहर गई। वहाँ, धूल की परत से ढका, बारिश की बूंदों से भीगा, एक पुराना स्मार्टफोन पड़ा हुआ था। स्क्रीन फटी हुई, बॉडी पर गहरे खरोंच के निशान, और बैटरी कहीं गायब—मानो कोई भूला हुआ सपना वहीं फेंक दिया गया हो।

वर्मा जी रुक गए। उनके सहयोगी भी ठिठक गए। विक्रम ने मज़ाक में टिप्पणी की, "सर, यह तो कबाड़ का राजा लग रहा है। शायद कोई कर्मचारी ने गुस्से में फेंक दिया हो।" वर्मा जी ने फोन को कुछ पल गौर से देखा, जैसे कोई पुरानी किताब के पन्ने पलट रहे हों। फिर उनके होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान फैल गई। "कभी-कभी, विक्रम," उन्होंने धीरे से कहा, "कबाड़ ही सबसे बड़ी शुरुआत का बीज होता है। यह फोन टूटा है, लेकिन इसमें अभी भी कहानियाँ बसी हैं—कहानियाँ जो नई जिंदगियाँ जन्म दे सकती हैं।"

प्रिया ने उत्सुकता से पूछा, "सर, मतलब?" वर्मा जी ने फोन को छुआ, जैसे कोई प्राचीन अवशेष हो। "याद रखो... अगर कोई मेहनती और बुद्धिमान युवक चाहे, तो इस टूटे फोन से भी एक बिजनेस साम्राज्य खड़ा कर सकता है। सफलता चीजों से नहीं बनती, दिमाग की उस जादूगरी से बनती है जो अवसरों को कचरे में ढूँढ लेती है। जीवन एक दर्पण है—जो टूट जाए, उसमें भी अनगिनत प्रतिबिंब छिपे होते हैं।" उनके सहयोगी हँस पड़े, लेकिन वर्मा जी की आँखों में एक गहरा विश्वास झलक रहा था। वे आगे बढ़ गए, लेकिन उनके शब्द हवा में लहराते रहे, जैसे कोई मंत्र।

एक बेरोजगार युवक: आशा की पहली चिंगारी

लेकिन उन शब्दों को किसी ने बहुत गहराई से सुना था—एक ऐसा व्यक्ति जो छाया की तरह खड़ा था, अदृश्य लेकिन सतर्क। पास के फुटपाथ पर, कंधे झुके हुए, खड़ा था अर्जुन शर्मा। एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट, जिसकी डिग्री अब धूल खा रही थी। पिछले एक साल से बेरोजगार, असफल इंटरव्यूज की कड़वी यादें उसके मन को कुरेद रही थीं। जेब में सिर्फ ₹20 बचे थे—आखिरी सिक्के, जो भूख मिटाने के लिए भी नाकाफी थे। उसकी आँखें थकी हुईं थीं, लेकिन आज कुछ अलग था। वर्मा जी की बात उसके कानों में गूँज रही थी, जैसे कोई दिव्य वाणी। "अगर इतने बड़े मेंटर ने यह कहा है... तो शायद इसमें कोई गहरा सच होगा। क्या यह संयोग है, या किस्मत का इशारा?"

अर्जुन धीरे-धीरे फोन के पास पहुँचा। हृदय की धड़कन तेज हो गई। फोन को छूते हुए, उसे लगा जैसे कोई पुरानी चाबी मिल गई हो। स्क्रीन पर दरारें थीं, लेकिन अंदर की चिप अभी भी साँस ले रही थी। "यह मेरी शुरुआत है," उसने मन ही मन कहा। "टूटन से ही नई मूर्ति बनती है।" जेब में रखते हुए, उसके चेहरे पर पहली बार महीनों में एक चिंगारी जली। दार्शनिक रूप से सोचते हुए, वह याद आया—भगवद्गीता का वह श्लोक: "जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब अवसर जन्म लेते हैं।"

पहला सौदा: किस्मत का खेल शुरू

अभी वह पार्किंग से बाहर निकल ही रहा था कि पीछे से एक तेज आवाज गूँजी—"ओ भाई, जरा रुको!" अर्जुन मुड़ा। एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति अपनी पुरानी बाइक पर सवार, उसके साथ एक विशालकाय जर्मन शेफर्ड कुत्ता लटक रहा था। व्यक्ति लोकल पेट स्टोर का मालिक था, नाम था रमेश चाचा। उसकी आँखें चमकीं जब उसने अर्जुन के हाथ में फोन देखा। "यह फोन बेचोगे, बेटा? कितने में?"

अर्जुन चौंका। "चाचा, यह तो टूटा-फूटा है। कबाड़ ही समझो।" रमेश चाचा हँसे, उनकी हँसी में एक चालाकी थी। "मुझे फोन की स्क्रीन नहीं चाहिए, बेटा। मेरे इस शेर को खिलौना चाहिए। यह इससे कूद-कूदकर खुश हो जाएगा। अगर दे दो, तो ₹200 दे दूँगा।" अर्जुन के लिए यह किसी चमत्कार से कम न था। ₹20 से ₹200—एक कदम में दोगुना! सौदा पक्का हो गया। कुत्ता भौंक उठा, जैसे उत्सव मना रहा हो। अर्जुन के चेहरे पर हल्की मुस्कान लौट आई। "पहला कदम सफल," उसने सोचा। "जीवन की पहली सीढ़ी चढ़ ली।"

छोटी सी योजना: चेन रिएक्शन का जन्म

अर्जुन सीधे पास के स्ट्रीट वेंडर के पास पहुँचा। हवा में भाप की गंध थी, और चाय की केतली गरम हो रही थी। उसने खरीदे—पाँच चाय के कप, आधा दर्जन गरमागरम समोसे, और कुछ बिस्किट पैकेट्स। कुल खर्च ₹150। फिर वह शहर के एक हरे-भरे पार्क में पहुँचा, जहाँ शाम को फूड डिलीवरी बॉय थकान मिटाने आते थे। बेंच पर बैठा, वह इंतजार करने लगा। सूरज ढल रहा था, और हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू थी।

कुछ देर बाद, पहला डिलीवरी बॉय आया—एक युवक, पसीने से तरबतर, स्कूटर पर थका-हारा। "भाई, चाय मिलेगी? भूख लगी है।" अर्जुन मुस्कुराया। "मिलेगी, भाई। ताज़ा चाय, कुरकुरे समोसे—सिर्फ ₹20 में।" बात फैल गई। दस मिनटों में सारी चीजें बिक गईं। लेकिन स्मार्ट अर्जुन ने पैसे के साथ कुछ और लिया—तीन एनर्जी ड्रिंक कैन, जो बॉयज ने एक्सचेंज में दिए। शाम ढलते-ढलते, वह बाजार पहुँचा। वहाँ, व्यस्त सड़क पर, ड्रिंक्स की मांग जोरों पर थी। एक-एक करके बिक गए, ₹50 प्रॉफिट पर। दिन खत्म होते-होते उसके पास थे ₹600। आसमान की ओर देखते हुए, अर्जुन ने फुसफुसाया, "धन्यवाद, मिस्टर वर्मा। अवसर एक बीज है—सिर्फ पानी चाहिए, और वह उग आता है।"

धीरे-धीरे बढ़ता खेल: बाजार की गहराइयों में उतरना

अगले कई हफ्तों में यह चेन रिएक्शन एक लयबद्ध नृत्य बन गया। अर्जुन सुबह चाय खरीदता, पार्क में बेचता, ड्रिंक्स इकट्ठा करता, और शाम को बाजार में बेचता। हर ट्रांजेक्शन में वह सीखता—लोगों की थकान, उनकी पसंद, बाजार की लय। कमाई बढ़ती गई: ₹600 से ₹1000, फिर ₹2000, और जल्द ही ₹5000 प्रतिदिन। लेकिन अब यह सिर्फ पैसे का खेल न था; यह बाजार की आत्मा को समझने का सफर था। रातें जागकर प्लानिंग में बीततीं, और सुबह नई ऊर्जा से शुरू। दार्शनिक रूप से, अर्जुन सोचता, "जीवन एक बाजार है—हर वस्तु में मूल्य छिपा है, बस सही खरीदार ढूँढना है।"

तूफान की रात: प्रकृति का इशारा

एक रात, शहर पर भयंकर तूफान टूट पड़ा। आकाश गरजा, बिजलियाँ चमकीं, और बारिश की बौछारें सड़कों को नदियों में बदल रही थीं। पेड़ उखड़ रहे थे, टहनियाँ टूट रही थीं, मानो प्रकृति अपना गुस्सा उतार रही हो। अगली सुबह, जब धूप निकली, तो कैंपस के आसपास का नजारा युद्धभूमि जैसा था—टूटी टहनियाँ, गीली पत्तियाँ हर ओर बिखरीं। अर्जुन कैंपस के पास से गुजर रहा था, जब उसकी नजर पड़ी। हृदय में एक बिजली कौंधी। "यह कचरा नहीं, सोना है!"

वह सीधे मेंटेनेंस हेड के केबिन पहुँचा। हेड, एक आलसी अधेड़, कुर्सी पर लेटा चाय पी रहा था। "सर, अगर मैं यह सब साफ करवा दूँ... तो क्या आप मुझे ये टहनियाँ दे देंगे?" हेड ने आँखें तरेरीं। "बेटा, ले जाओ। बस जगह साफ हो जाए, वरना मैनेजमेंट सिर काट लेगा।" अर्जुन मुस्कुराया।

बच्चों की सेना: मासूमियत का जादू

अर्जुन पास के पार्क में पहुँचा, जहाँ स्कूल के बच्चे कीचड़ में खेल रहे थे। बारिश की बूंदें अभी भी टपक रही थीं। "बच्चो, सुनो!" उसने चिल्लाया। "जो टहनियाँ इकट्ठा करेगा, उसे एक-एक चॉकलेट मिलेगी। खेल की तरह!" बच्चों की आँखें चमक उठीं। यह उनके लिए साहसिक खेल था—कुछ दौड़ते, कुछ कूदते, कुछ चिल्लाते। आधे घंटे में मैदान साफ, और एक विशाल ढेर तैयार। अर्जुन ने चॉकलेट्स बाँटी, और बच्चे खुशी से उछल पड़े। "अंकल, कल फिर खेलेंगे?" अर्जुन हँसा। "हाँ, बेटा। जीवन ही एक खेल है—सबसे मजेदार वह, जहाँ सब जीतें।"

किस्मत का मोड़: ईको का स्वप्न

उसी समय, एक बुजुर्ग आर्टिसन वहाँ से गुजरा—नाम था हरि काका, जो लकड़ी से जादू रचते थे। ढेर देखते ही उनकी आँखें जगमगा उठीं। "बेटा, यह तो प्रकृति का अनमोल उपहार है! ईको-फ्रेंडली क्राफ्ट्स के लिए परफेक्ट।" उन्होंने सारी टहनियाँ खरीद लीं—₹10,000 में। बोनस में दिए हैंडमेड लकड़ी के कोस्टर, जो प्राचीन डिजाइन वाले थे। अर्जुन ने उन्हें ऑनलाइन मार्केटप्लेस पर लिस्ट किया। रातोंरात बिक गए, ₹40,000 का प्रॉफिट। अब उसके पास था ₹50,000। "प्रकृति कभी व्यर्थ नहीं करती," अर्जुन ने सोचा। "वह सिर्फ रूप बदलती है।"

पहला असली बिजनेस: चाय का साम्राज्य

इस पूंजी से अर्जुन ने एक छोटा मोबाइल चाय स्टॉल खोला—एक रंग-बिरंगी ठेली, जिस पर लिखा था "अवसर चाय हाउस"। उसकी चाय में एक जादू था—मसालेदार, गर्म, और हर घूँट में प्रेरणा। शाम को भीड़ लगने लगी। एक दिन, कुछ लैंडस्केपिंग वर्कर्स रुके—धूल से सने, थके हुए। अर्जुन ने फ्री चाय पिलाई। "भाई, यह मेरी तरफ से। मेहनत के लिए सलाम।" वे भावुक हो गए। "अगर कभी ग्रीन वेस्ट चाहिए, तो बुलाना। हम देंगे।" अर्जुन ने कहा, "ज़रूर। जीवन में कर्ज चुकाना पड़ता है—कभी चाय से, कभी मदद से।"

बड़ा मौका: हरे सपनों की उड़ान

एक हफ्ते बाद, शहर में हलचल मच गई—एक डीलर 500 इलेक्ट्रिक बाइक्स लॉन्च करने वाला था। थीम थी "ग्रीन फ्यूचर"। अर्जुन ने वर्कर्स को फोन किया। "भाई, ग्रीन वेस्ट चाहिए—घास, पत्तियाँ, टहनियाँ।" उन्होंने ट्रक भर दिया। अर्जुन ने डीलर से मिलने का समय लिया। "सर, यह ईको-डेकोरेशन—प्रकृति से, प्रकृति के लिए।" डीलर प्रभावित हुए। ₹5 लाख का सौदा पक्का। लॉन्च इवेंट में बाइक्स हरी सजावट में चमकीं, और अर्जुन का नाम फैल गया। "अवसर हवा में तैरते हैं," वह सोचता, "बस पकड़ने का हौसला चाहिए।"

सबसे बड़ा दांव: समुद्र की लहरों पर सवारी

कुछ महीनों बाद, एक इंटरनेशनल क्रूज शिप बंदरगाह पर लंगर डाला। विशालकाय जहाज, जो सात समुंदर पार आया था, पर्यटकों से भरा। अर्जुन ने पूरी रात जागकर प्लान बनाया—मैप्स देखे, रूट्स प्लान किए। सुबह, वह एक लग्जरी ज्वेलरी स्टोर गया। खरीदी एक शानदार स्मार्टवॉच—डायमंड-लाइक क्रिस्टल वाली, ₹20,000 की। फिर क्रूज के कप्तान से मिला। "कप्तान साहब, यह छोटा सा उपहार—आपके सफर की चमक के लिए। और बदले में, आपके पर्यटकों को मैं शहर की अनोखी दुनिया दिखाऊँगा।" कप्तान ने घड़ी पहनी, मुस्कुराए। "डील!" यह दांव था—एक रात का निवेश, जीवन भर का फल।

नेटवर्क का जादू: जाल बुनना

अब अर्जुन बन गया टूर गाइड और मिडलमैन का राजा। पर्यटकों को ले जाता—चमचमाते शॉपिंग मॉल्स में, जहाँ लाइट्स आँखें चौंधिया दें; स्ट्रीट फूड मार्केट में, जहाँ मसालों की महक नशा कर दे; लोकल आर्ट स्टोर्स में, जहाँ हर वस्तु एक कहानी कहे। दुकानदार कमीशन देते, और क्रूज शिप्स की कतार लगने लगी। बिजनेस एक जाल बन गया—हर धागा एक अवसर। दार्शनिक अर्जुन सोचता, "नेटवर्क नसें हैं—एक को छेड़ो, सब धड़कने लगें।"

करोड़पति अर्जुन: ऊँचाइयों की चोटी

कुछ ही वर्षों में, अर्जुन बन गया करोड़पति उद्यमी। उसने कंपनियाँ खड़ी कीं—टूरिज्म एजेंसी जो दुनिया घुमाए, ग्रीन सप्लाई चेन जो पर्यावरण बचाए, और स्टार्टअप इन्वेस्टमेंट फंड जो सपनों को पंख दे। लेकिन उसके दिल में हमेशा वह टूटा फोन बसा रहा—एक ताबीज की तरह।

कृतज्ञता: चक्र पूरा होना

एक धूप भरी सुबह, सूट-बूट में सजा अर्जुन वर्मा जी के ऑफिस पहुँचा। डेस्क पर रखा एक चेक—₹50,00,000। वर्मा जी हैरान। "यह क्या, बेटा?" अर्जुन ने मुस्कुराते हुए पूरी कहानी सुनाई—टूटे फोन से लेकर क्रूज तक। वर्मा जी की आँखें नम हो गईं। "तुम्हारा दिमाग ही असली साम्राज्य है।" फिर, उन्होंने कहा, "अगर मंजूर हो, तो मैं तुम्हें सिर्फ शिष्य नहीं, परिवार का हिस्सा बनाना चाहता हूँ।" अर्जुन का विवाह उनकी बेटी से हुआ, और वह कंपनी का रणनीतिक सलाहकार बन गया।

अंतिम मोड़: विरासत का प्रकाश

वर्षों बाद, जब वर्मा जी का देहांत हुआ, कंपनी के सीईओ ने घोषणा की: "आज से अर्जुन शर्मा नए मेंटर हैं।" लेकिन अर्जुन ने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा लौटाया समाज को—युवा स्टार्टअप्स में निवेश, गरीब छात्रों के लिए फंड, नए उद्यमियों को मेंटरशिप। क्योंकि वह जानता था—जीवन का असली दर्शन यही है: टूटन से उदय, कचरे से सोना, और एक छोटे अवसर से अनंत संभावनाएँ। कभी-कभी, एक टूटे स्मार्टफोन से न सिर्फ एक जिंदगी बदल जाती है, बल्कि पूरी दुनिया को प्रेरणा मिल जाती है। अवसर हर जगह हैं—बस नजरें खोलो, और हृदय को सुनो।

Friday, March 6, 2026

जब चीन का सम्राट झुका युधिष्ठिर के सामने

प्रस्तावना

कल्पना कीजिए, एक ऐसा ग्रंथ जो न केवल देवताओं की लीला और योद्धाओं की वीरगाथाओं से भरा पड़ा हो, बल्कि प्राचीन विश्व की नस-नस को छूता हो—भूगोल की अनंत वादियों से लेकर राजनीति की चालाकी भरी चालों तक, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की उन अनकही कहानियों तक जो आज भी इतिहासकारों को चकित कर देती हैं। हाँ, हम बात कर रहे हैं महाभारत की। यह महाकाव्य, जो अक्सर केवल एक धार्मिक या पौराणिक कथा के रूप में सीमाबद्ध कर दिया जाता है, वास्तव में प्राचीन भारत का एक जीवंत दस्तावेज है। इसमें सामाजिक जीवन की रंगीन तस्वीरें उकेरी गई हैं—राज्य व्यवस्था की जटिलताएँ, व्यापार मार्गों की धूल भरी यात्राएँ, जनजातियों की विविध संस्कृतियाँ, और दूर-दराज के देशों के साथ उन सूक्ष्म संबंधों का जिक्र जो आज के वैश्वीकरण की याद दिलाते हैं।

महाभारत के अनेक पर्वों में भारतवर्ष की सीमाओं को पार करते हुए अनेक प्रदेशों, जनजातियों और राज्यों का उल्लेख बिखरा पड़ा है। नाम सुनते ही आँखें चमक उठती हैं—कम्बोज की बर्फीली चोटियाँ, शकों की घुड़सवार सेनाएँ, यवनों की रहस्यमयी बस्तियाँ, किरातों के जंगली योद्धा, तुषारों की ठंडी वादियाँ, गांधार की संगीतमय घाटियाँ, और बाह्लिकों की रेगिस्तानी सैरगाहें। ये नाम काल्पनिक नहीं, बल्कि प्राचीन एशिया के वास्तविक भू-भागों और जातीय समूहों के जीवंत प्रतिबिंब हैं। लेकिन इन सबके बीच एक नाम ऐसा है जो आधुनिक संदर्भ में हमें चौंका देता है—चीन या चीनदेश

आज के युग में भारत और चीन दो विशालकाय राष्ट्र हैं, जिनकी सीमाएँ हिमालय की ऊँची दीवारों से घिरी हैं, राजनीतिक संरचनाएँ अलग-अलग हैं, और राष्ट्रीय पहचानें एक-दूसरे से जुदा। लेकिन महाभारत के वर्णनों में झाँकिए तो आश्चर्य होता है—हजारों वर्ष पहले भारतीय ऋषि-मुनि, राजा-महाराजा और विद्वान चीन नामक किसी प्रदेश या जाति के अस्तित्व से परिचित थे। और तो और, वन पर्व में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के उदाहरणों से पता चलता है कि युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में चीन का राजा उपस्थित हुआ था, और उसने धर्मराज की सार्वभौम सत्ता को न केवल स्वीकार किया, बल्कि श्रद्धा से सिर झुकाया भी। यह कोई साधारण उल्लेख नहीं; यह प्राचीन भारत की वैश्विक दृष्टि का प्रमाण है!

महाभारत के आदि पर्व, सभा पर्व, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, शांति पर्व और वन पर्व में चीन का जिक्र बिखरा पड़ा है—कभी योद्धाओं के रूप में, कभी राजाओं के रूप में, तो कभी भूगोलिक इकाई के रूप में। इन प्रसंगों को सावधानी से खंगालने पर एक रोचक तस्वीर उभरती है: प्राचीन भारतीय साहित्य में चीन की अवधारणा एक दूरस्थ लेकिन परिचित पड़ोसी के रूप में बसी हुई थी। यह ग्रंथ हमें बताता है कि उस समय भारत का भौगोलिक ज्ञान कितना विस्तृत था—हिमालय के पार की वादियाँ, सिल्क रोड जैसे प्राचीन व्यापार पथों की झलक, और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की अनकही कहानियाँ। आइए, इन प्रसंगों को एक-एक करके खोलें, जैसे महाभारत के पन्नों को धीरे-धीरे पलटते हुए, और देखें कि कैसे यह महाकाव्य प्राचीन विश्व को एक सूत्र में पिरो देता है।


1. आदि पर्व में चीन का उल्लेख

(विश्वामित्र–वशिष्ठ संघर्ष और नंदिनी की उत्पत्ति कथा)

महाभारत के आदि पर्व में अनेक प्राचीन कथाएँ वर्णित हैं जो भारतीय सभ्यता की पुरानी स्मृतियों को संरक्षित करती हैं। इन्हीं में से एक कथा है विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच हुए प्रसिद्ध संघर्ष की।

इस कथा का प्रसंग चैत्ररथ पर्व में आता है।

कथा के अनुसार जब पांडव वनवास के समय यात्रा कर रहे थे, तब अर्जुन का सामना एक शक्तिशाली गंधर्व चित्ररथ से हुआ। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ और अंततः अर्जुन ने चित्ररथ को पराजित कर दिया। पराजय के बाद चित्ररथ ने अर्जुन की वीरता से प्रभावित होकर उससे मित्रता कर ली।

मित्रता के उपरांत चित्ररथ ने अर्जुन को कई प्राचीन घटनाओं का वर्णन सुनाया। इन्हीं कथाओं में से एक थी महर्षि वशिष्ठ और राजा विश्वामित्र का संघर्ष

कथा के अनुसार एक समय राजा विश्वामित्र अपनी सेना के साथ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। वशिष्ठ के आश्रम में एक दिव्य गाय थी जिसका नाम था नंदिनी। वह कामधेनु की पुत्री मानी जाती थी और उसके पास ऐसी दिव्य शक्ति थी कि वह इच्छानुसार असीम भोजन और वस्तुएँ उत्पन्न कर सकती थी।

जब विश्वामित्र ने देखा कि वशिष्ठ के आश्रम में इतनी अद्भुत शक्ति वाली गाय है, तो उन्होंने उसे अपने साथ ले जाने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने कहा कि ऐसी दिव्य वस्तु राजा के पास होनी चाहिए।

किन्तु वशिष्ठ ने नंदिनी को देने से इंकार कर दिया।

तब क्रोधित होकर विश्वामित्र ने बलपूर्वक नंदिनी को ले जाने का प्रयास किया।

यह देखकर नंदिनी क्रोध से भर उठी और उसने अपनी दिव्य योगशक्ति से अनेक प्रकार की सेनाएँ उत्पन्न कर दीं।

महाभारत में वर्णित है कि नंदिनी के शरीर से विभिन्न प्रदेशों और जनजातियों के योद्धा प्रकट होने लगे।

एक प्रसिद्ध श्लोक में कहा गया है—

ततो नन्दिन्याः क्रोधात् प्रादुरासन् बहवो गणाः।
शकाः यवनकाम्बोजाः चीनाश्चैव सहस्रशः॥

अर्थ:

जब नंदिनी गाय क्रोध से भर उठी, तब उसके शरीर से असंख्य योद्धा और जातियाँ प्रकट होने लगीं।
उनमें शक, यवन, काम्बोज और हजारों की संख्या में चीन देश के लोग भी उत्पन्न हुए।

यह उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि महाभारत के रचयिताओं के लिए “चीन” कोई अज्ञात या कल्पित शब्द नहीं था, बल्कि वह एक ज्ञात जातीय या भौगोलिक इकाई थी।


2. सभा पर्व में चीन का उल्लेख

(अर्जुन का दिग्विजय अभियान)

महाभारत के सभा पर्व में वर्णित है कि जब युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ करने का निर्णय लिया, तब उसके लिए आवश्यक था कि वह समस्त दिशाओं के राजाओं को अपनी अधीनता स्वीकार करवाएँ।

इस उद्देश्य से पांडवों ने चारों दिशाओं में दिग्विजय अभियान चलाया।

उत्तर दिशा की विजय का दायित्व अर्जुन को सौंपा गया।

अर्जुन अपनी सेना के साथ हिमालय की ओर बढ़े और एक-एक करके अनेक राज्यों को जीतते हुए आगे बढ़ते गए। उन्होंने हिमालय के पार तक के क्षेत्रों में अभियान चलाया।

इस अभियान के दौरान अर्जुन का सामना हुआ प्राग्ज्योतिषपुर के शक्तिशाली राजा भागदत्त से।

भागदत्त एक महान योद्धा थे और उनका राज्य वर्तमान असम तथा उत्तर-पूर्व भारत के क्षेत्रों से जुड़ा माना जाता है।

सभा पर्व में भागदत्त के राज्य का वर्णन करते हुए महाभारत कहता है कि उस क्षेत्र के आसपास अनेक पर्वतीय और सीमावर्ती जनजातियाँ निवास करती थीं।

श्लोक में कहा गया है—

किरातैश्चीनैस्तुषारैश्च शकैः सह निवासितम्।

अर्थ:

उस प्रदेश के आसपास के क्षेत्रों में किरात, चीन, तुषार और शक जातियों के लोग निवास करते थे।

यह उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि उस समय चीन को हिमालय के उत्तर या उत्तर-पूर्व के प्रदेशों से जोड़ा जाता था


3. वन पर्व में चीन का उल्लेख

(राजसूय यज्ञ में चीन के राजा की उपस्थिति)

महाभारत के वन पर्व में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रोचक प्रसंग मिलता है।

जब पांडव जुए में पराजित होकर वनवास के लिए बाध्य हो जाते हैं, तब एक दिन भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने वन में आते हैं।

इस प्रसंग में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को सांत्वना देते हुए उनके पूर्व वैभव की स्मृति दिलाते हैं।

वे उन्हें याद दिलाते हैं कि जब उन्होंने राजसूय यज्ञ किया था, तब पृथ्वी के अनेक महान राजा वहाँ उपस्थित हुए थे और उन्होंने धर्मराज की सार्वभौम सत्ता को स्वीकार किया था।

महाभारत में वर्णित है—

शकयवनकम्बोजाः किराताश्चैव चीनकाः।
राजसूये समायाता धर्मराजस्य शासने॥

अर्थ:

शक, यवन, काम्बोज, किरात और चीन देश के राजा भी धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उपस्थित हुए थे और उन्होंने उनके शासन को स्वीकार किया था।

यह उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि चीन का राजा स्वयं युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उपस्थित हुआ था

यह केवल एक साधारण उल्लेख नहीं है। यह संकेत देता है कि महाभारत के कथाकारों की कल्पना में युधिष्ठिर का साम्राज्य इतना व्यापक था कि उसकी प्रतिष्ठा दूर-दराज़ के देशों तक पहुँची थी।


4. उद्योग पर्व में चीन का उल्लेख

(भीम द्वारा राजवंशों का उदाहरण)

महाभारत का उद्योग पर्व कौरव और पांडवों के बीच युद्ध से पहले की कूटनीतिक घटनाओं का वर्णन करता है।

जब श्रीकृष्ण पांडवों की ओर से शांति प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर जाने वाले होते हैं, तब भीम उन्हें सावधान करते हैं।

भीम कहते हैं कि इतिहास में कई ऐसे शक्तिशाली राजवंश हुए हैं जिनका अंत उनके ही अहंकार और अधर्म के कारण हुआ।

इन उदाहरणों में विभिन्न राजवंशों का उल्लेख किया गया है, जिनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनका संबंध सीमावर्ती या दूरस्थ प्रदेशों से था।

इसी संदर्भ में चीन से जुड़े एक राजवंश का भी उल्लेख मिलता है।

इससे यह संकेत मिलता है कि प्राचीन भारतीय परंपरा में दूरस्थ राजवंशों और विदेशी शासकों की स्मृति भी संरक्षित थी


5. भीष्म पर्व में चीन का उल्लेख

(संजय द्वारा भारतवर्ष का भूगोल)

महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है— भूमि पर्व

इसमें धृतराष्ट्र और संजय के बीच संवाद होता है।

धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं—

“यह पृथ्वी कितनी विशाल है? इसमें कौन-कौन से प्रदेश हैं? और भारतवर्ष का विस्तार कहाँ तक है?”

इसके उत्तर में संजय पूरे भारतवर्ष और उसके आसपास के प्रदेशों का विस्तृत वर्णन करते हैं।

इस भूगोलिक विवरण में कई जनजातियों और दूरस्थ क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है—और इन्हीं में चीन भी शामिल है।

यह संकेत देता है कि महाभारत के रचयिताओं के पास एक व्यापक भूगोलिक कल्पना थी, जिसमें हिमालय के पार के प्रदेश भी शामिल थे।


6. शांति पर्व में चीन का उल्लेख

(राजा मान्धाता और इन्द्र का संवाद)

महाभारत के सबसे विशाल भागों में से एक है शांति पर्व

कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद जब भीष्म पितामह शरशय्या पर लेटे होते हैं, तब युधिष्ठिर उनसे राजधर्म, नीति और शासन व्यवस्था के विषय में प्रश्न पूछते हैं।

इसी संदर्भ में भीष्म प्राचीन चक्रवर्ती सम्राट राजा मान्धाता का उदाहरण देते हैं।

मान्धाता को प्राचीन भारतीय परंपरा में एक ऐसे सम्राट के रूप में स्मरण किया जाता है जिसने पृथ्वी के विशाल भाग पर शासन किया था।

इन्द्र और मान्धाता के संवाद में उन प्रदेशों का उल्लेख मिलता है जिन पर मान्धाता का प्रभाव था—और इस सूची में चीन का भी उल्लेख किया गया है।


7. वनपर्व का अजगर पर्व और हिमप्रदेश

वनपर्व में एक अत्यंत रोचक कथा है— अजगर पर्व

इस कथा में पांडव हिमालय की ओर यात्रा करते हैं।

इस यात्रा के दौरान वे गंधमादन पर्वत, बदरिकाश्रम और अन्य हिमालयी प्रदेशों से गुजरते हैं।

इसी यात्रा के दौरान भीम को एक विशाल अजगर पकड़ लेता है।

वह अजगर वास्तव में उनके पूर्वज राजा नहुष होते हैं, जो श्रापवश सर्प रूप में जन्मे थे।

युधिष्ठिर के ज्ञानपूर्ण उत्तरों से नहुष का उद्धार होता है और भीम मुक्त हो जाते हैं।

यद्यपि इस प्रसंग में “चीन” शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है, परंतु कुछ विद्वान मानते हैं कि महाभारत में वर्णित ये हिमालय के पार के प्रदेश संभवतः तिब्बत, मध्य एशिया या चीन के सीमावर्ती क्षेत्रों की स्मृतियों से जुड़े हो सकते हैं।


निष्कर्ष

महाभारत के विभिन्न पर्वों का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि “चीन” का उल्लेख कम से कम छह से सात अलग-अलग प्रसंगों में मिलता है।

इन प्रसंगों से यह भी स्पष्ट होता है कि महाभारत के प्रमुख पात्र—जैसे श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम, संजय, भीष्म पितामह और युधिष्ठिर—सभी को चीन नामक किसी प्रदेश या जाति के बारे में जानकारी थी।

विशेष रूप से वनपर्व का वह प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसमें यह कहा गया है कि चीन का राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उपस्थित हुआ था और उसने उनकी सत्ता को स्वीकार किया था।

यह उल्लेख केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि यह संकेत देता है कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में भारत और उसके पड़ोसी क्षेत्रों के बारे में व्यापक भूगोलिक और सांस्कृतिक ज्ञान मौजूद था

इस प्रकार महाभारत केवल एक धार्मिक या आध्यात्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि वह प्राचीन भारत के सांस्कृतिक भूगोल, राजनीतिक संबंधों और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों का भी एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

Thursday, February 26, 2026

सुभाष

जिस वीर ने  गुंजाया था  “जय हिन्द” का  आस,

दहक रही थी उर में  क्रांति  ज्वाला-सा विश्वास?


तुम खून दो   आजादी दूंगा उनकी ऐसी भाषा ,

सुप्त पड़ी धूमिल नयनों में जो गढ़ते थे आशा।


रचने लगे थे रक्त रक्त से अभिनव भारत  गाथा,

रचयिता आजाद फौज के विजय की परिभाषा।


गुलामी की जंजीरों को काटा वो थे अभय अजय,

किंतु मात्र कुछ हीं पन्नों में  सिमटा उनका परिचय।


सत्ता के  गलियारों में है   नाम मात्र उल्हास ,

मालाएँ तो भारी भरकम पर हल्का  इतिहास।


यक्ष प्रश्न ले आज खड़ा है "अजय " वक़्त के पास,

क्या उनको सम्मान मिला जिस काबिल थे सुभाष?

Sunday, February 22, 2026

जॉन ऑफ आर्क

उस दौर में जब मुल्क की आवाज़ थम गई,

जॉन ऑफ आर्क लिख चली तक़दीर थी नई।


गाँव की छोटी सी थी बेटी पर बेशक गौर कर,

सदियों की गर्दिश में थी आवाज वो नई।


तलवार ढाल होते है साजो सामान जंग के पर,

हौसलों से  हीं गढ़ चली  तासीर  एक नई।


रोशनी ना बंध सकी थी वक्त की जंजीर से,

वो रूह की पुकार में जलती थी लौ  नई।


शोला में जल राख पर बेशक बदन मिटा नहीं,

खाक से  भी उठ खड़ी हुई तामीर एक नई।


चिनारी ऐसी आज भी रुकने का कोई नाम ना,

सदियों पुरानी आग थी लगती पर वो नई

Monday, February 9, 2026

भगत सिंह

जिसे फाँसी होनी थी कुछ लम्हों बाद, वो किताब पढ़ रहा था,
दीपक था वो कुछ अजीब,  बुझकर भी जल रहा था।

ना शिकवा, ना शिकायत, ना कोई इल्तिज़ा थी उसकी,
वो  कहानी थी बिल्कुल नई दास्ताँ बस  गढ़ रहा था।

अफ़सोस था जल्लाद को जल्दी भी क्या थी इतनी,
और वो बेफ़िक्र  जैसे  जश्न-ए-मौत  कर रहा था।

सुकून था ये कैसा उसकी इंकलाबी आँखों में 
कि फांसी तले दूसरे इंक़लाब से मिल रहा था।

सलीब-पर उसने सिर झुकाया भी तो कैसे,
फांसी-ए-तख़्त पर वो  जीत  चढ़ रहा था।

मातम मनाती दुनिया हैरान क्या था  वो  मंज़र, 
और शख़्स था वो खुद की मौत पे हँस रहा था।

सुकरात

सच को जाने अलग बात है सच वालों की  अलग जात ,

दिन को दिन कहने की कीमत पूछो उससे क्या सुकरात।


भीड़ हमेशा शोर समझती, सत्य मौन का राही किंतु,

मौन सत्य उदघाटन हेतु , जान गँवाता जो  सुकरात।


आंखों में आंख डालकर दिन को दिन और रात को रात,

अँधियारे के दरबारों में, यह कह सका जो सुकरात।


प्रश्न उठाना झूठ के आगे , जुर्म ठहरता हर दौर में,

विष प्याला ले जीवन दे जल , आग लगाता जो सुकरात।


सच जब आईना बन जाए और झूठे  नंगे हो जाएँ,

बार बार जो  तोड़ा जाता , एक आईना जो सुकरात।


जिस्म जला, पर सोच न जली,  बेफिक्री बेख़ौफ़, अडिग,

हर युग में फिर जन्म लेता है, हर युग में मरता सुकरात।

Monday, January 12, 2026

कोर्ट मसल्स

एक दिन कोर्ट की सीढ़ियों पर दो वकील टकरा गए। पहले वकील ने मुस्कराते हुए कहा—“नमस्कार मिस्टर बॉडी बिल्डर! आजकल बड़े फिट दिख रहे हैं।”

दूसरे वकील तुरंत समझ गए कि मामला व्यंग्य का है। उन्होंने नटाई ठीक की और बोले—“धन्यवाद, मिस्टर केस बिल्डर! आप भी कुछ ज़्यादा ही मजबूत केस लेकर घूम रहे हैं।”

पहला वकील हँस पड़ा—“अरे भाई, शरीर की मांसपेशियाँ तो जिम में बनती हैं, पर केस की मांसपेशियाँ… वो तो तारीखों, दलीलों और स्टे ऑर्डर से बनती हैं।”

दूसरा वकील ठहाका मारकर बोला—“बिलकुल! इंसान की बॉडी छह महीने में ढीली पड़ जाती है,पर केस? केस तो दस साल बाद भी ‘इन प्राइम कंडीशन’ में रहता है।”

पहला बोला—“जिम छोड़ दो तो बॉडी टूट जाती है, पर केस छोड़ दो… तो भी चलता रहता है!”

दूसरा बोला—“और देखो कमाल, बॉडी बिल्डर प्रोटीन पीता है,
हम केस बिल्डर— कॉफी, चाय और जज साहब की एक ‘अंतरिम टिप्पणी’ से ही ताकत पा लेते हैं।”

दोनों हँसते हुए बोले—“इसलिए भाई, दुनिया में सबसे ताकतवर चीज़ कोई बॉडी नहीं…सबसे ज़्यादा मसल वाला होता है— एक अच्छा बना हुआ केस!”

और फिर दोनों अपनी-अपनी फाइलें उठाकर बोले—
“चलो, आज फिर कोर्ट में मसल्स दिखाने हैं!”

Friday, January 9, 2026

दलील

 एक बार कोर्ट में ज़ोरदार बहस चल रही थी। एक तरफ का वकील साहब तो ऐसे चिल्ला रहे थे मानो वो कोयल नहीं, पूरा स्पीकर सिस्टम हों – "माई लॉर्ड! ये अन्याय है! ये ज़ुल्म है! ये... ये... बर्दाश्त के बाहर है!!" आवाज़ इतनी तेज़ कि कोर्ट की दीवारें भी काँप रही थीं।

दूसरी तरफ का वकील साहब चुपचाप बैठे मुस्कुरा रहे थे। जज साहब ने पहले वकील की तरफ देखा और बोले,
"वकील साहब, बार में आवाज़ ऊँची करने से केस नहीं जीता जाता। वरना कोयल आसानी से बाज़ को हरा देती।"

पहला वकील थोड़ा शांत हुआ, लेकिन अंदर से सोचा – "अरे, कोयल तो मीठा गाती है, मैं तो गरज रहा हूँ!"

अब दूसरी तरफ के वकील की बारी आई। वो उठे, गला साफ़ किया और बोले,"माई लॉर्ड, बिल्कुल सही कहा आपने। कोयल की आवाज़ भले मीठी हो, लेकिन जंगल में शिकार बाज़ ही करता है। पर एक बात है..."

वो रुके, थोड़ा ड्रामैटिक पॉज़ लिया और बोले,"अगर कोयल चालाकी से बाज़ के घोंसले के पास जाकर बार-बार 'कूहू-कूहू' करे, और बाज़ को इतना तंग कर दे कि बाज़ गुस्से में अपना शिकार छोड़कर कोयल का पीछा करने लगे... तो शिकार कोयल नहीं, पर दूसरे पक्षी उठा ले जाते हैं!"

कोर्ट रूम में ठहाका लग गया। पहला वकील साहब अब सोच में पड़ गए – "अरे, ये तो मेरे साथ ही हो रहा है! मैं चिल्ला रहा हूँ, और ये चुपचाप मेरी दलीलों की कमज़ोरियाँ निकाल रहे हैं!"

जज साहब हँसते हुए बोले, "बहुत खूब! तो साहब लोग, न कोयल बनिए जो सिर्फ़ गाए, न ऐसे बाज़ बनिए जो गुस्से में अपना शिकार गँवा दें। बस चालाक कोयल और समझदार बाज़ का कॉम्बिनेशन बनिए – मीठी आवाज़ में मज़बूत तर्क दीजिए।"

केस ख़त्म हुआ। दोनों वकील बाहर निकले। पहला वकील बोले, "यार, आज तो तुमने मुझे कोयल बना दिया।"
दूसरा वकील हँसा, "नहीं भाई, तुम खुद चिल्ला-चिल्लाकर कोयल बने थे। मैं तो बस बाज़ बना रहा – चुपचाप शिकार पर नज़र रखे हुए।"

मोरल ऑफ़ द स्टोरी: कोर्ट में न ज़्यादा कोयल बनो, न गुस्सैल बाज़। थोड़ा कोयल का मीठापन + थोड़ा बाज़ का फोकस = जीत पक्की!

सर्कस

 अपना गधा संपन्न था, पर सुखी नहीं। दर्द तो था, पर इसका कारण पता नहीं चल रहा था। मल्टी नेशनल कंपनी में कार्यरत होते हुए भी, अजीब सी बैचैनी थी। सर झुकाते झुकाते उसकी गर्दन तो टेढ़ी हो ही गई थी, आत्मा भी टेढ़ी हो गई थी। या यूँ कहें कि १० साल की नौकरी ने उसे ये सिखा दिया था कि सीधा रहे तो कोई भी खा लेगा। जीने के लिए आत्मा का भी टेढ़ा होना ज़रुरी है। गधे ने ये जान भी लिया था और मान भी लिया था। तो फिर ये शोक कैसा? शायद ये वो कॉर्पोरेट शोक था, जहाँ बोनस मिलने पर भी चेहरा उदास रहता है, क्योंकि अगला टारगेट पहले से दोगुना होता है। गधा सोचता, "मैं तो बस एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ, लेकिन लगता है मैं एक ह्यूमन रिसोर्स हूँ – हर कोई मुझे इस्तेमाल कर रहा है।"

इसी उधेड़बुन में कार ड्राइव करते हुए ऑफ़िस पहुँचता, सर झुकाता, जी हुजूरी करता, घर लौटता। पैसे तो काफी मिल गए थे, पर साथ में मिले सीने का दर्द भी। डॉक्टर के पास पहुंचा। पूरा चेक अप हुआ। कोई बीमारी नहीं निकली। डॉक्टर ने कहा, "कोई बीमारी नहीं है। टी. वी. देखो, सैर सपाटा करो, मोर्निंग वाक करो, सब ठीक हो जाएगा।" गधा सोचता रहा, "डॉक्टर साहब, आपकी फीस तो बीमारी से ज्यादा है, लेकिन इलाज टीवी? क्या मैं कोई पुराना रेडियो हूँ जो बैटरी बदलने से ठीक हो जाऊँ?"

रात भर नींद नहीं आई थी। दिन भर बैठे-बैठे उदासी सी छाई हुई थी। सोचा ज़रा सुबह सुबह मोर्निंग वाक किया जाए। गधा जम्हाई लेते हुए पार्क पहुँच गया। वहाँ जाते हीं उसकी नींद हवा हो गई। वहाँ बड़े बड़े नमूने पहुंचे हुए थे। एक मोटा भाई पेड़ के तने को ऐसे ज़ोर ज़ोर से धक्का दे रहा था, जैसे कि पेड़ को हीं उखाड़ फेकेगा। कोई कमर हिला रहा था। एक शेख चिल्ली महाशय कभी दीखते, कभी नहीं दीखते। कौतुहल बढ़ता गया। निरीक्षण करने में ज्ञात हुआ, दंड बैठक कर रहे थे। अद्भुत नज़ारा था। मोटी मोटी गधियाँ ऐसे नाज़ुक मिज़ाज से चल रही थी, मानो दुनिया पे एहसान कर रहीं हो। तो कुछ "सेल्फी" लेने में व्यस्त थी। १०-१२ गधे बिना बात के ज़ोर ज़ोर से हँस रहे थे। ये नए जमाने का हास्य आसन था। एक गधा गीता का पाठ कर रहा था तो दूजा सर नीचे और पैर उपर कर शीर्षासन लगा के बैठा हुआ था।

जब एक सियार बोलता है तो दूसरे को भी सनक चढ़ जाती है। दूसरा सियार कारण नहीं पूछता। जब किसी को छींक आती है तो दूसरी भी आती है, फिर तीसरी भी आती है। अलबत्ता दूसरों को भी आने लगती है। यदि रोकने की कोशिश की जाय तो बात छींक को बहुत बुरी लगती है। वो पूछने लगती है, "पहले तो ऐसा नहीं किया, ऐसे तो आप नहीं थे। आज क्या हुआ, ये नाइंसाफी क्यों? ये बेवफाई क्यों? पहले तो ना बुलाने पर हमे आने देते थे। कभी कभी तो नाक में लकड़ी लगा के भी हमारे आने का इन्तज़ाम करते थे। अब क्या हुआ? क्यों इस नाचीज पे ज़ुल्म ढा रहे है?" छींक की फरियाद रंग लाती है, बंद कपाट खुल जाते हैं और फिर वो नाक के सारे सुपड़ो को साफ करते हुए बाहर निकाल ले जाती है। गधों की जात सियारों और छींकों के जैसी हीं होती है। एक बोले तो दूसरा भी बोलना शुरू कर देता है। एक छींक आये तो दूसरी, फिर तीसरी। बिल्कुल "वायरल" हो जाती है। दूसरे गधे को शीर्षासन करते हुए देखकर, अपने गधे भाई को भी सनक चढ़ गई। ये भी अपना सर नीचे करने लगा। ज्यों ज्यों सर नीचे करने की कोशिश करता, त्यों त्यों दुनिया उलटने लगती और ये सीधा हो जाता। फिर सोचा, "दुनिया उल्टी हो जाए, इससे तो बेहतर है, दुनिया पे एहसान कर लिया जाए और इसको सीधा ही रहने दिया जाए।" निष्कर्ष ये निकला की गधे ने शीर्षासन की ज़िद छोड़ दी।

लेकिन सनक कहाँ रुकने वाली थी? पार्क से लौटते हुए गधे ने देखा, एक होर्डिंग पर लिखा था – "योगा क्लास जॉइन करो, आत्मा को चमकाओ!" सोचा, क्यों न योगा ट्राई किया जाए? अगले दिन योगा क्लास पहुँचा। इंस्ट्रक्टर एक दुबला-पतला गधा था, जो कहता, "ओम शांति, ओम शांति। अब सूर्य नमस्कार!" गधा ने कोशिश की, लेकिन सूर्य नमस्कार कम, सूर्य को गाली ज्यादा निकली। एक आसन में पैर ऊपर करने की कोशिश में गिर पड़ा, और बगल वाली गधी पर। गधी चिल्लाई, "ये क्या हरकत है? मीटू मूवमेंट सुना है?" गधा शर्मिंदा हो गया। इंस्ट्रक्टर ने कहा, "कोई बात नहीं, पहली बार सब गिरते हैं। लेकिन याद रखो, योगा से आत्मा सीधी होती है।" गधा सोचता रहा, "मेरी आत्मा पहले से टेढ़ी है, सीधी करने से क्या वो टूट नहीं जाएगी?"

योगा से ऊबकर गधे ने जिम ज्वाइन किया। गधों को कूदते देखा, वजन उठाते देखा। और तो और एक गधी ने 40 किलो का वजन चुटकी में उठा लिया। उसे भी जोश आ गया। उसने एक दम 60 किलो से शुरुआत की। नतीजा वो ही हुआ, जो होना था। कमर लचक गयी। गर्दन और आत्मा तो थे ही टेड़े पहले से, अब कमर भी टेड़ी हो गई। गधी के सामने बेईज्जती हुई अलग सो अलग। अब कमर में बैक सपोर्ट लगा कर लचक लचक कर चलने लगा। उसको चाल को देख कर भैंस ने कमेंट मारा, आँखों से इशारा कर गाने लगी "तौबा ये मतवाली चाल झुक जाए फूलों की डाल, चाँद और सूरज आकर माँगें, तुझसे रँग-ए-जमाल, हसीना! तेरी मिसाल कहाँ।" गधा सोचा, "भैंस जी, आपकी चाल देखकर तो ट्रैफिक जाम हो जाता है, लेकिन कमेंट आप कर रही हैं?"

जिम की असफलता के बाद गधा सोचने लगा, शायद थोड़ा शॉपिंग थेरेपी ट्राई की जाए। मॉल गया। वहाँ गधों की भीड़ थी, सब कुछ न कुछ खरीद रहे थे जैसे खुशी स्टॉक में खत्म होने वाली हो। गधे ने एक ब्रांडेड शर्ट खरीदी, जो इतनी महँगी थी कि उसकी कीमत से एक गाँव का गधा पल सकता था। घर आकर पहनी, लेकिन दर्द वही का वही। सोचा, "ये शर्ट तो खुशी नहीं दे रही, उल्टा पॉकेट में छेद कर गई।" फिर एक गैजेट खरीदा – स्मार्ट वॉच, जो हार्ट रेट बताती। लेकिन हर बार बीप करती, "आपका हार्ट रेट हाई है, रिलैक्स करो!" गधा चिल्लाया, "तू रिलैक्स कर, मैं तो पहले से तनाव में हूँ!"

घर आकर सर खुजाने लगा, पर "आईडिया" आये तो आये कहाँ से। वोडाफ़ोन वालों ने सारे आइडियाज चुरा रखे थे। कोई संत महात्मा भी दिखाई नहीं पड़ रहे थे जो जुग जुग जिओ का आशीर्वाद देते। सारे के सारे आशीर्वाद तो अम्बानी के "जिओ" के पास पहुँच गए थे। गधे की टेल भी एयर टेल वालों ने चुरा रखा था, बेचारा पुंछ हिलाए तो हिलाए भी कैसे? फिर सोचा, क्यों न सोशल मीडिया पर खुशी ढूँढी जाए? इंस्टाग्राम खोला। वहाँ गधे रील्स बना रहे थे – एक गधा दुबई में घूम रहा, दूसरा मालदीव्स में। कैप्शन: "लाइफ इज ब्यूटीफुल!" गधा ने अपनी एक सेल्फी पोस्ट की, कैप्शन: "मॉर्निंग वॉक!" लेकिन कमेंट्स आए: "भाई, तू तो उदास लग रहा, कोई फिल्टर यूज कर!" गधा डिप्रेस हो गया, सोचा, "सोशल मीडिया पर सब खुश दिखते हैं, लेकिन रियल लाइफ में सब गधे ही हैं।"

टी.वी. खोला तो सारे चैनेल पे अलग अलग तरह के गधे अपनी अपनी पार्टी के लिए प्रलाप करते दिखे। पार्लियामेंट में गधों की हीं सरकार थी, पर गधों की बात कोई नहीं करता। घास की जरुरत थी गधों को। खेत के खेत कंक्रीट में तब्दील होते जा रहे थे। सारे के सारे गधे कौओं की भाषा बोल रहे थे। कोई मंदिर की बात करता, कोई मस्जिद की बात करता। मंदिर-मस्जिद की लड़ाई में कौओं की चाँदी हो रही थी। मंदिर के सामने बहुत तरह के छप्पन भोगों की बरसात हो रही थी। बड़े बड़े मैदान, खलिहान शहरों में तब्दील हो रहे थे और गधों में भुखमरी बढ़ती जा रही थी। पार्लियामेंट में गधे, कौओं की बातें करते और कौओं से चुनाव के वक्त पोलिटिकल डोनेशन लेते। कहने को गधों की सरकार थी, पर कौओं के मौज़ थे। सारे चैनेल पे गधे कौओं की भाषा बोल रहे थे। एक चैनल पर डिबेट: "क्या गधों को घास मिलनी चाहिए?" लेकिन पैनल में सब कौए थे, जो कहते, "नहीं, गधों को कंक्रीट खाना चाहिए, डेवलपमेंट के लिए!" गधा हँसा, "ये डिबेट तो मेरी लाइफ जैसी है – सब बोलते हैं, कोई सुनता नहीं।"

ऊब कर गधे ने टी. वी. स्विच ऑफ किया और अपनी 40 मंज़िली अपार्ट्मेंट के कबुतरखाने नुमा घोसले से बाहर निकल कर नीचे देखने लगा। दूर दूर तक अपार्ट्मेंट हीं अपार्ट्मेंट। कोई पेड़ नहीं, कोई चिड़िया नहीं। चिड़िया भी क्या करे, सारी की सारी "ट्विटर" पे ट्विट करने में व्यस्त थीं। कोई चहचहाहट सुनाई नहीं पड़ती थी। तभी एक ड्रोन उड़ा, जो अमेज़न से पैकेज डिलिवर कर रहा था। गधा सोचा, "अब तो हवा में भी ट्रैफिक है, ज़मीन पर क्या बचा?" फिर एक विचार आया – क्यों न वर्क फ्रॉम होम की जगह वर्क फ्रॉम जंगल ट्राई किया जाए? लेकिन जंगल कहाँ? सब तो मॉल में बदल चुके थे।

अंत में गधा समझ गया, खुशी न पार्क में है, न जिम में, न शॉपिंग में, न सोशल मीडिया में। खुशी तो बस एक मिथ है, जिसे कॉर्पोरेट वाले बेचते हैं ताकि गधे चलते रहें। लेकिन गधा अब भी दौड़ रहा है, क्योंकि रुकना तो गधों की डिक्शनरी में नहीं है। और इस तरह, गधे की जिंदगी एक अंतहीन सर्कस बन गई, जहाँ हर कोई जोकर है, लेकिन हँसी किसी की नहीं आती।

मुमुक्षु

 

अध्याय 1: प्रश्न और उत्तर

एक शांत शाम थी, जब सूरज की अंतिम किरणें आश्रम की दीवारों पर सुनहरी चमक बिखेर रही थीं। मुमुक्षु, एक युवा स्नातक छात्र, गुरुदेव के चरणों में बैठा था। उसका मन ईश्वर की खोज में व्याकुल था। बचपन से ही वह भगवान के बारे में इतनी उत्कंठा से बात करता था कि उसके मित्र उसे 'भक्त' कहकर चिढ़ाते थे। आज उसने एक गहन प्रश्न पूछा, "गुरुदेव, क्या भोग और स्त्री का उपभोग करते हुए परम ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सकता है?"

गुरुदेव की आँखें शांत झील की तरह थीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "बिल्कुल किया जा सकता है, मुमुक्षु। इतिहास के पन्नों में अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। तंत्र मार्ग में तो यौन क्रीड़ा और स्त्री का बड़ा उपयोग है। वहाँ काम को साधना का माध्यम बनाया जाता है। यहां तक कि श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने स्त्री का उपयोग करते हुए भी उसी परम ब्रह्म के दर्शन किए, जो भक्ति मार्ग का अनुसरण करते हुए। उन्होंने अपनी पत्नी शारदा देवी को माँ काली का रूप मानकर पूजा की, और उस माध्यम से दिव्य अनुभूति प्राप्त की। लेकिन याद रखो, ईश्वर प्राप्ति के लिए योग, ध्यान और ब्रह्मचर्य का मार्ग ही सर्वोत्तम है। तंत्र मार्ग पशु वृत्ति के मनुष्यों के लिए उपयोगी है, जहां काम को नियंत्रित कर ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। ब्रह्मचर्य के पालन से पुरुष की इंद्रियां इतनी संयमित, सूक्ष्म और शरीर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि जब परम ऊर्जा का शरीर पर शक्तिपात होता है, तब शरीर उस परम ऊर्जा को झेलने में सक्षम हो पाता है।"

मुमुक्षु के मन में यह बात गहराई से उतर गई। वह सोचने लगा कि क्या वह इस मार्ग पर चल सकता है?

अध्याय 2: मुमुक्षु का परिचय और गुरु से भेंट

मुमुक्षु एक साधारण परिवार का लड़का था, दिल्ली के एक कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। उसका नाम राजीव था, लेकिन आध्यात्मिक खोज में वह खुद को 'मुमुक्षु' कहलाना पसंद करता था, अर्थात मुक्ति की इच्छा रखने वाला। बचपन से ही वह मंदिरों में घंटों बैठा रहता, रामायण और गीता पढ़ता। उसके पिता एक सरकारी क्लर्क थे, जो कहते थे, "बेटा, पहले नौकरी कर लो, फिर भगवान की खोज करना।" लेकिन मुमुक्षु का मन दुनिया की चकाचौंध से ऊब चुका था।

उसी शहर में एक दिन गुरुजी पधारे। उनका नाम स्वामी विवेकानंद सरस्वती था, लेकिन लोग उन्हें बस 'गुरुजी' कहते थे। अफवाहें थीं कि उन्हें ईश्वरानुभूति हो चुकी है। वे ध्यान की गहराइयों में उतरकर लोगों को मार्गदर्शन देते थे। मुमुक्षु ने सुना तो उत्सुक हो उठा। वह आश्रम पहुंचा, जहां सैकड़ों लोग बैठे थे। गुरुजी की सभा में वह पहली बार गया। गुरुजी ने प्रवचन दिया, "ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है। ध्यान से उसे खोजो।" मुमुक्षु प्रभावित हुआ और नियमित रूप से आने लगा। गुरुजी ने उसे देखा और कहा, "तुममें जिज्ञासा है, लेकिन धैर्य सीखो।" जल्द ही मुमुक्षु उनके निर्देशानुसार ध्यान करने लगा – सुबह उठकर प्राणायाम, फिर ध्यान।

कॉलेज में उसकी क्लास में अनेक लड़कियां थीं। वे फैशनेबल कपड़े पहनतीं – टॉप जो पीठ को नंगा छोड़ देते, स्कर्ट जो जांघों को उजागर करते, और ब्लाउज जो वक्ष को उभारते। मुमुक्षु बहुतों के प्रति आकर्षित होता। ध्यान के समय उसके मानस पटल पर उनके वक्ष, उनकी मांसल जांघें, उनके उन्नत स्तन, उनकी नंगी पीठ बार-बार आ जातीं। वह विचलित हो जाता, ध्यान टूट जाता।

अध्याय 3: प्रारंभिक संघर्ष और गुरु की सलाह

एक दिन क्लास में एक लड़की, नाम था रिया, उसके बगल में बैठी। उसकी शर्ट की नेकलाइन इतनी गहरी थी कि उसके उभरे वक्ष साफ दिख रहे थे। मुमुक्षु की नजरें बार-बार वहां जातीं। घर लौटकर ध्यान में वह दृश्य फिर आया। वह परेशान हो गया। अगले दिन वह गुरुजी के पास गया और सब बता दिया। "गुरुदेव, मेरी इंद्रियां मुझे धोखा दे रही हैं। ध्यान में वासना आ जाती है।"

गुरुजी ने शांत स्वर में कहा, "यह स्वाभाविक है, मुमुक्षु। वासना मन की कमजोरी है। सर्वदा स्वयं की श्वासों पर ध्यान दो। जब-जब किसी युवती के शरीर के प्रति वासना जागे, अपने ध्यान को अपनी नाभि पर ले जाओ। वासना को जब तक ध्यान का साथ नहीं मिलता, ये प्रकट नहीं होती। ध्यान नाभि पर होने से मन मस्तिष्क में वासना का जन्म नहीं हो पाता।"

मुमुक्षु ने इस मार्ग पर चलना शुरू किया। अब क्लास में जब किसी सहपाठिनी के उरोज उसे आकर्षित करते, नंगी पीठ दिखाई पड़ती, खुली नाभि चमकती, मोटी जांघें लुभातीं, मांसल वक्ष उभरते, वह तुरंत अपना ध्यान स्वयं की नाभि पर ले जाता। श्वासों की गति पर फोकस करता। धीरे-धीरे वासना साक्षीभाव से नियंत्रित होने लगी। वह ध्यान के मार्ग पर आगे बढ़ चला।

नया घटना: एक दिन कॉलेज फेस्ट में वह शामिल हुआ। वहां लड़कियां डांस कर रही थीं, उनके शरीर की हर हलचल कामुक लग रही थी। एक लड़की ने उसे डांस के लिए आमंत्रित किया। वह इनकार कर गया, लेकिन मन में तूफान उठा। घर जाकर उसने घंटों ध्यान किया, नाभि पर फोकस कर वासना को दबाया।

अध्याय 4: प्रगति और घमंड का उदय

लगभग दो महीने बीत चुके थे। अब उसे लड़कियों के उभरे वक्ष, खुली नाभि दिखाई पड़तीं, लेकिन वह विचलित न होता। लड़कियां उसे देखकर मुस्कुरातीं, लेकिन वह कोई प्रतिउत्तर न देता। उसके मन में घमंड आने लगा। उसे लगने लगा कि वह जितेंद्रिय बन चुका है, काम वासना पर विजय प्राप्त कर चुका है। वह दोस्तों से कहता, "मैं अब इंद्रियों का स्वामी हूं।"

नया घटना: एक बार वह बाजार गया। वहां एक युवती से टकरा गया। उसकी साड़ी सरक गई, कमर दिख गई। पहले तो मन डोला, लेकिन उसने तुरंत नाभि पर ध्यान केंद्रित किया। वासना शांत हो गई। वह खुद पर गर्व करने लगा।

अध्याय 5: पहला स्वप्न और निराशा

एक रात वह सोया हुआ था। स्वप्न में उसने देखा कि उसकी सहपाठिनी रिया उसके पास आकर एकदम से खड़ी हो गई। उससे कलम मांगती है। जब वह देता है, कलम हाथ से छूट जाती है। जैसे ही रिया कलम लेने झुकती है, उसके कपड़े पीछे से सरक कर नीचे गिर जाते हैं। उसका पूरा नंगा बदन, कमर की उभार, सब मुमुक्षु के सामने आ जाते हैं। वह घबराकर मुमुक्षु की गोद में गिर जाती है। मुमुक्षु उसे कसकर अपने बदन से भींच लेता है। उसके हाथ नवयुवती के स्तनों को दबोच लेते हैं। स्वप्न टूटने पर मुमुक्षु बहुत निराश हुआ। उसकी दो महीनों की मेहनत बेकार हो चुकी थी। वह रोने लगा, "मैं असफल हूं।"

अगले दिन गुरुजी को बताया। गुरुजी ने कहा, "मुमुक्षु, तुमने चेतन मन को तो वश में कर लिया है, लेकिन असली परीक्षा अवचेतन मन पर विजय है। स्वप्न के समय अवचेतन मन दबी हुई वासनाओं को दिखाता है। उसी पर विजय प्राप्त करनी होती है। स्वयं पर नियंत्रण बनाए रखो। ध्यान जारी रखो।"

अध्याय 6: निरंतर अभ्यास और नए स्वप्न

मुमुक्षु ने अभ्यास तेज किया। अब वह रात को सोने से पहले भी नाभि ध्यान करता। दो-तीन महीने बाद फिर स्वप्न आया। लड़की फिर आई, इस बार पूर्ण नग्न रूप में। उसने मुमुक्षु के कपड़े खोल दिए। मुमुक्षु की नसें फटने लगीं। उस अति सुंदरी नग्न स्त्री को चूमने की इच्छा हुई, लेकिन वह स्वयं पर नियंत्रण रखता रहा। स्वप्न टूट गया। उसे अपनी जीत पर खुशी हुई।

नया घटना: इस बीच वह एक यात्रा पर गया। हिमालय की तलहटी में एक आश्रम में रहा। वहां साधु मिले, जिन्होंने उसे बताया कि वासना प्रकृति का हिस्सा है, लेकिन उसे ऊर्जा में बदलो। वहां ध्यान में उसे पहली बार हल्की रोशनी दिखी। लौटकर गुरुजी को बताया, वे खुश हुए।

इस तरह समय बीतने लगा। दो-तीन महीने के अंतराल पर नग्न लड़कियों के स्वप्न आते – कभी कोई नंगा बदन दिखाती, कभी खुली नाभि, कभी मांसल जांघ, तो कभी मादक स्तन। लेकिन वह सजग रहता और उठ जाता। इसी बीच ध्यान में विचित्र रोशनियां नजर आने लगीं। गुरुजी के पास जाकर वह स्वयं के जितेंद्रिय होने की घोषणा करने लगा।

अध्याय 7: चार साल बाद की हार और अहंकार का पतन

लगभग चार साल बीत चुके थे। मुमुक्षु ध्यान की गहराइयों में गोते लगा रहा था। वह अब आश्रम में ज्यादा समय बिताता, कॉलेज खत्म हो चुका था। एक दिन ध्यान में उसने देखा एक पुरुष चोट खाकर गिर पड़ा है। वह जैसे ही उसके पास जाता है, अचानक वह पुरुष एक नग्न स्त्री में परिवर्तित हो जाता। उसके दो बड़े-बड़े स्तन मुमुक्षु की छाती में गड़ जाते हैं। मुमुक्षु हमेशा की तरह जगना चाहता था, लेकिन उस कामुक स्त्री ने मुमुक्षु के हाथ को स्वयं के कमर के नीचे भाग में चिपका दिया। मुमुक्षु की सांस तेज हो गई। उस स्त्री ने मुमुक्षु को पकड़कर सारे कपड़े फाड़ डाले। उसकी नसें गर्म हो उठीं। वह उस स्त्री के चुम्बन लेने लगा। उसका ब्रह्मचर्य फिर भंग हो चुका था।

नया घटना: इस घटना से पहले, वह एक गांव में गया जहां एक युवती की मदद की। वह बीमार थी, मुमुक्षु ने उसे दवा दी। लेकिन उसकी नजरें उसके शरीर पर गईं। वह भागा, लेकिन मन में अपराध बोध रहा।

अति निराशा से वह अपराध भाव में गुरु के सामने प्रस्तुत हुआ। गुरुजी ने कहा, "ये तुम्हारे अहंकार की हार हुई है। अवचेतन मन बहुत मजबूत होता है। कभी उसके सामने तन कर मत जाओ। जब तक तुम्हारे मन में जितेंद्रिय होने का भाव रहेगा, तब तक तुम हारते रहोगे। स्त्री से घृणा नहीं, स्त्री को स्वीकार करो। अपनी माँ के रूप में, अपनी बहन के रूप में। फिर स्त्री से भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ईश्वर के सामने तन कर खड़े होने से नहीं, बल्कि झुकने से जीत मिलती है। जितने की कोशिश करोगे तो हारोगे। हार स्वीकारोगे तो जीतोगे।"

अध्याय 8: परिवर्तन और नई दृष्टि

मुमुक्षु के मन में काफी परिवर्तन आ चुका था। अब वह लड़कियों को देखता, लेकिन उनके अर्धनग्न कपड़े नहीं दिखते। उनकी मुस्कान दिखती, उनके खुले बदन नहीं। उनकी करुणा दिखती, वासना नहीं। वह अब स्त्रियों को देवी रूप में देखता। ध्यान के मार्ग पर वह काफी आगे बढ़ चुका था। ध्यान के समय दूधिया प्रकाश में तैरता रहता।

नया घटना: वह अब आश्रम में दूसरों को सिखाने लगा। एक युवती आई, जो ध्यान सीखना चाहती थी। पहले वह डरता, लेकिन अब उसे माँ का रूप देखा। उसने बिना विचलित हुए सिखाया।

अध्याय 9: अंतिम वर्ष और गुरु का स्वर्गवास

दस-बारह साल बीत चुके। उसके गुरुजी का स्वर्गवास हो चुका था। मुमुक्षु आश्रम में ही रह रहा था, अब वह खुद गुरु बन चुका था। एक दिन ध्यान के समय उसने देखा एक शेर गाय के पीछे भाग रहा है। वह गाय को बचाने के लिए शेर के सामने आ खड़ा होता है। जैसे ही शेर उस पर झपट्टा मारता है, मुमुक्षु जमीन पर गिर जाता है। शेर और गाय खूबसूरत पुरुष और स्त्री में परिवर्तित हो जाते हैं और प्रेमालिंगन करने लगते हैं। एक दूसरे को चूमने लगते हैं। उनकी जांघें, कमर, वक्ष एक दूसरे में समा जाते हैं। उनके कपड़े एक-एक कर शरीर से सरक कर नीचे गिरने लगते हैं। फिर दोनों नग्न स्त्री में परिवर्तित होकर उसकी तरफ आने लगते हैं। खूबसूरत युवतियों के स्तन कड़े हैं। आँखों से वासनामयी निमंत्रण आ रही थी।

नया घटना: इससे पहले, वह एक सपने में एक नदी किनारे गया। वहां देवी का दर्शन हुआ, जो स्त्री रूप में थी। उसने सीखा कि प्रकृति में पुरुष और स्त्री का मिलन सृष्टि का आधार है।

मुमुक्षु अवचेतन मन के इस प्रहार से नहीं भागता। इस बार ध्यान से उठने की कोशिश नहीं करता। वह खुद दोनों युवतियों के पास उनके कपड़े पहनाकर उनकी पूजा करता है। दोनों स्त्रियां देवी में परिवर्तित होकर अंतर्ध्यान हो जाती हैं। इस बार वह युवतियों से भागता नहीं, अपितु उनको स्वीकार करता है। चारों तरफ दूधिया प्रकाश फैल जाता है। मुमुक्षु अति शांति की अवस्था में स्थापित हो जाता है। अब उसे ब्रह्मचर्य के रक्षण की आवश्यकता नहीं थी। वह परम ब्रह्म में विलीन हो चुका था।

समापन: शिक्षा

इस यात्रा से मुमुक्षु ने सीखा कि सच्ची विजय संघर्ष में नहीं, स्वीकृति में है। वह अब दूसरों को यही सिखाता – भोग में नहीं, संयम में; घृणा में नहीं, प्रेम में ईश्वर मिलता है।

Thursday, January 8, 2026

संदर्भ

रेस्तरां में हल्की पीली रोशनी फैली हुई थी। धीमा संगीत बज रहा था और चम्मच-काँटों की आवाज़ों के बीच बातचीत का एक शोर था। उसी माहौल में एक युवक ने हिम्मत जुटाई। उसने सामने वाली मेज़ पर अकेली बैठी एक लड़की की ओर देखा, मुस्कराया और शालीनता से पूछा—
“क्या मैं आपके साथ बैठ सकता हूँ?”
अचानक लड़की की आवाज़ पूरे रेस्तरां में गूँज उठी।
“क्या?? क्या तुम मेरे साथ एक रात बिताना चाहोगे?? क्या तुम पागल हो?!”
एक पल के लिए जैसे समय थम गया। आसपास बैठे लोग खाना छोड़कर उनकी ओर देखने लगे। कुछ की भौंहें चढ़ गईं, कुछ के चेहरे पर हैरानी थी, और कुछ में नैतिक गुस्सा। युवक का चेहरा लाल पड़ गया। उसे समझ ही नहीं आया कि उसने ऐसा क्या कह दिया। बिना कुछ बोले, सिर झुकाए वह उठ खड़ा हुआ और शर्मिंदगी के साथ दूसरी खाली मेज़ पर जाकर बैठ गया।
कुछ मिनट बीते। माहौल फिर सामान्य होने लगा। तभी लड़की उठी, अपना बैग संभाला और बाहर चली गई।
अब युवक ने चैन की साँस ली। वह पास की मेज़ पर बैठे एक व्यक्ति की ओर मुड़ा और बोला,
“मैं मनोविज्ञान का छात्र हूँ। दरअसल, मैं आपका और उस लड़की का व्यवहार देख रहा था। यह जानना चाहता था कि अचानक सार्वजनिक अपमान पर इंसान कैसे प्रतिक्रिया करता है।”
उस व्यक्ति ने हल्की मुस्कान के साथ युवक को देखा। फिर उसने जानबूझकर अपनी आवाज़ ऊँची कर दी और बोला—
“क्या?? सिर्फ एक रात के लिए 3,000 डॉलर?! यह तो हद से ज़्यादा है!!”
अब की बार पूरा रेस्तरां चौंक गया। सभी की निगाहें दरवाज़े की ओर जाती लड़की पर टिक गईं। कुछ के चेहरे पर अविश्वास था, कुछ में घृणा, और कुछ में फुसफुसाहटें शुरू हो गईं। वही लड़की, जो कुछ देर पहले नैतिकता की ऊँची आवाज़ थी, अब सबकी नज़रों में कटघरे में खड़ी थी।
युवक खामोशी से उठा, उसके पास गया और धीरे से उसके कान में फुसफुसाया—
“मैं भी एक वकील हूँ… और मुझे अच्छे से पता है कि हालात को अपने पक्ष में कैसे मोड़ा जाता है।”
यह कहकर वह मुस्कराया और बाहर निकल गया, पीछे छोड़ गया एक सवाल—
शब्द ज़्यादा ताक़तवर होते हैं या संदर्भ?

रेस्ट आर रेस्ट

कचहरी की तीसरी मंज़िल पर बने उस पुराने से चेंबर में एडवोकेट साहब अपनी फाइलों के पहाड़ के बीच बैठे थे। मेज़ पर चाय ठंडी हो चुकी थी, चश्मा नाक के आधे रास्ते पर टिका था और सिर पर बाल… जैसे जीवन की पूरी केस-डायरी लिखी हो।

मुवक्किल साहब—नवीन-नवीन मुक़दमेबाज़—अंदर आए। हाथ में एक मोटी फाइल, चेहरे पर मासूमियत और दिमाग़ में एक ही सवाल।

उन्होंने कुर्सी खींचते हुए बड़े भोलेपन से पूछा,“सर… एक बात पूछूँ?”

वकील साहब ने बिना सिर उठाए कहा,“पूछिए, मगर जल्दी… जज साहब की कॉफी ब्रेक ख़त्म होने वाली है।”

मुवक्किल ने गौर से वकील साहब के सिर को देखा। फिर थोड़ी हिम्मत जुटाकर बोले—“सर, आपके सिर के सिर्फ़ 10 प्रतिशत बाल ही काले हैं और पूरे 90 प्रतिशत सफ़ेद क्यों?”

वकील साहब ने चश्मा उतारा, गहरी साँस ली और कुर्सी की पीठ से टिक गए।चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई, मानो कोई पुराना, दर्दभरा लेकिन मज़ेदार फैसला सुनाने वाले हों।

“देखिए,” उन्होंने गंभीर आवाज़ में कहा,“ये जो 90 प्रतिशत सफ़ेद बाल हैं ना… ये पूरी तरह डेली केस टेस्ट का स्ट्रेस हैं।”

मुवक्किल घबरा गया।“इतना ज़्यादा स्ट्रेस, सर?”

वकील साहब उँगलियों पर गिनाने लगे—“एक तारीख़ जो पड़ती है और जज साहब छुट्टी पर निकल जाते हैं—स्ट्रेस।मुवक्किल जो कहता है ‘सर, बस पाँच मिनट में सब समझा देता हूँ’ और पाँच घंटे निकल जाते हैं—स्ट्रेस।
फीस समय पर न मिले—स्ट्रेस।और जब केस जीत जाएँ और मुवक्किल कहे ‘सर, भगवान की कृपा से हुआ’—तब भी स्ट्रेस।”

मुवक्किल सिर हिलाता रहा।

फिर उसने हिम्मत करके आख़िरी सवाल पूछा—“और सर… जो 10 प्रतिशत बाल काले हैं?”

वकील साहब हल्का सा हँसे, फाइल बंद की और बोले—“वो?”

थोड़ा रुककर बोले—“रेस्ट आर रेस्ट.

मुवक्किल चुप।वकील साहब चाय का आख़िरी घूँट लेते हुए बोले—“वो भगवान की दया है, जेनेटिक्स है, और थोड़ा सा भ्रम है कि ज़िंदगी में अभी सब कुछ बिगड़ा नहीं है।”

इतने में बाहर से पेशकार की आवाज़ आई—“सर, आपका केस पुकारा जा रहा है।”

वकील साहब खड़े हुए, कोट ठीक किया और जाते-जाते मुवक्किल से बोले—“अब समझे? केस तो आज आपका है… मगर सफ़ेद बाल मेरे क्यों हैं।”

डेडली इंस्ट्रक्शन्स

 

लकड़ी की पुरानी बेंचें, दीवार पर संविधान की प्रस्तावना, और बीच में ऊँचे आसन पर विराजमान माननीय न्यायाधीश महोदय, जिनकी भौंहें हमेशा ऐसी तनी रहती थीं मानो contempt jurisdiction अभी-अभी जाग उठेगा।

कटघरे में खड़ा था अभियुक्त—चेहरे पर वही क्लासिक भाव: “मैं निर्दोष हूँ, बाकी सब परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं।”
और सामने खड़े थे पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता—काली कोट, सफेद बैंड, और आत्मविश्वास ऐसा कि मानो IPC की सारी धाराएँ उन्हें कंठस्थ हों।

न्यायाधीश ने फाइल पलटी, चश्मा ठीक किया और गंभीर स्वर में पूछा—मिस्टर लॉयर, एक प्रारंभिक प्रश्न है। आप इस हत्या के मामले में पीड़ित की ओर से पेश हो रहे हैं—यह तो स्पष्ट है।परंतु यह बताइए… आपको निर्देश किसने दिए हैं?

अदालत में सन्नाटा।स्टेनोग्राफर ने टाइप करना रोक दिया।पेशकार ने पानी का गिलास आधा रास्ते में ही रोक लिया।

अधिवक्ता ने आत्मविश्वास से उत्तर दिया—“माई लॉर्ड… पीड़ित ने।”

अब सन्नाटा नहीं, बल्कि सस्पेंस।न्यायाधीश ने धीरे से चश्मा उतारा, अधिवक्ता को ऊपर से नीचे तक देखा और बोले—“आप कहना क्या चाहते हैं?पीड़ित… जो कि इस समय स्वर्गवासी है…उसने आपको निर्देश दिए?”

अधिवक्ता ने पूरे आत्मविश्वास से सिर हिलाया—“जी हाँ, माई लॉर्ड।”

अब अदालत में हल्की खुसर-पुसर।पीछे बैठा एक जूनियर वकील फुसफुसाया—“लगता है अब Evidence Act में नई धारा जुड़ने वाली है—Section 32A: Instructions from Afterlife।”

न्यायाधीश ने हथौड़ा हल्का सा बजाया—“शांति बनाए रखें।मिस्टर लॉयर, क्या आप यह कहना चाहते हैं कि आपको मृत व्यक्ति से निर्देश प्राप्त हुए?”

अधिवक्ता (शांत स्वर में):“माई लॉर्ड, बिल्कुल।और यदि मैं जोड़ सकूँ—ये निर्देश अत्यंत स्पष्ट थे।”

न्यायाधीश की भौंहें और ऊपर चली गईं—“यह तो बड़ा ही… असामान्य है।क्या आप अदालत को यह भी बताएँगे कि ये निर्देश किस माध्यम से प्राप्त हुए?”

अधिवक्ता ने फाइल खोली, एक काग़ज़ निकाला और बोला—“माई लॉर्ड, ये निर्देश मरने से पहले दिए गए थे।जब पीड़ित जीवित था—inter vivos, जैसा कि रोमन विधि में कहा गया है।उसने स्पष्ट कहा था—‘अगर मेरे साथ कुछ हो जाए, तो केस लड़ना… और पूरी ताकत से लड़ना।’”

पीछे से किसी ने धीमे से कहा—“वाह, ये तो dying declaration 2.0 है।”

न्यायाधीश ने हल्की मुस्कान दबाते हुए कहा—“तो आप यह कहना चाहते हैं कि यह कोई paranormal instruction नहीं, बल्कि पूर्व निर्देश हैं?”

अधिवक्ता:“बिल्कुल माई लॉर्ड।हालाँकि यदि अदालत अनुमति दे, तो मैं यह भी कहना चाहूँगा कि इस केस में निर्देश मरने के बाद भी प्रभावी हैं।”

अब न्यायाधीश मुस्कुरा ही पड़े—“तो यह कहा जा सकता है कि यह मामला Dead men tell no tales का अपवाद है?”

अधिवक्ता (झुककर):“माई लॉर्ड, कानून में एक सिद्धांत है—Actus non facit reum nisi mens sit rea
यहाँ मृतक की mens आज भी अदालत के समक्ष जीवित है।”

पूरा कोर्टरूम हँसी से गूँज उठा।यहाँ तक कि अभियुक्त भी मुस्कुरा दिया—हालाँकि उसे तुरंत एहसास हुआ कि यह मुस्कान उसके लिए खतरनाक हो सकती है।

न्यायाधीश ने हथौड़ा बजाया और बोले—ठीक है, मिस्टर लॉयर। अदालत आपके ‘डेडली इंस्ट्रक्शन्स’ को स्वीकार करती है। लेकिन एक बात याद रखिए— अगर अगली तारीख पर आप कहेंगे कि ‘आज पीड़ित सपने में आया था’,तो आपको पहले मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होना पड़ेगा।”

पूरा कोर्ट फिर से ठहाकों से भर गया। और इस तरह अदालत ने यह मान लिया कि—कभी-कभी न्याय की लड़ाई इतनी ज़ोरदार होती है कि मौत भी उसे चुप नहीं करा पाती।

मिठास


शाम के लगभग सात बज रहे थे।कचहरी की पुरानी इमारत से निकलते हुए अधिवक्ता आदित्य वर्मा ने अपनी काली कोट की जेब में हाथ डाला और गहरी साँस ली। आज भी वही दिन—तीन तारीखें, दो स्थगन, एक तीखी बहस और जज साहब की वही गंभीर दृष्टि।

उसका सिर भारी था, दिमाग थका हुआ और दिल… दिल किसी मीठी राहत की तलाश में था।“कुछ तो ऐसा चाहिए जो आज की कड़वाहट धो दे,” उसने खुद से कहा।सड़क के कोने पर एक छोटी-सी आइसक्रीम की दुकान चमक रही थी। रंगीन बोर्ड, फ्रिज की हल्की गुनगुनाहट और बच्चों की हँसी। आदित्य वहीं रुक गया।

“भैया, एक चॉकलेट आइसक्रीम देना,”फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला—“आज कुछ ज़्यादा ही तनाव है। थोड़ा सुकून चाहिए।”

दुकान के पीछे खड़ा व्यक्ति—लगभग पचास साल का, साधारण कपड़े, माथे पर पसीने की हल्की रेखा—आदित्य को देख मुस्कुराया।उसकी मुस्कान में अपनापन था, पर आँखों में कोई अनकहा बोझ।

“तनाव?”वह बोला,“साहब, आपका काम तो फिर भी आसान है।”

आदित्य चौंका।“आसान?”“मैं वकील हूँ। रोज़ लोगों की लड़ाइयाँ, झूठ-सच, हार-जीत… आपको लगता है ये आसान है?”

दुकानदार ने आइसक्रीम निकालते हुए कहा—“साहब, आपकी लड़ाई दिमाग की है। मेरी लड़ाई शरीर और मन—दोनों से है।”

आदित्य ने उत्सुकता से पूछा—“कैसे?”

दुकानदार ने गहरी साँस ली।“मैं डायबिटिक हूँ।”

आदित्य ने सहानुभूति से सिर हिलाया।“तो?”

वह हल्की-सी कड़वी हँसी हँसा—“तो साहब, मुझे इस आइसक्रीम की दुकान पर लगातार बारह दिन खड़ा रहना है।”

“बारह दिन?”आदित्य की भौंहें सिकुड़ीं।

“हाँ,”वह बोला,“चारों तरफ मिठास—वनीला, स्ट्रॉबेरी, चॉकलेट। बच्चों की खुशी, कपल्स की फरमाइशें… और मैं?
मैं सिर्फ देख सकता हूँ, बेच सकता हूँ…खा नहीं सकता।”

उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक सच्चाई थी।

“साहब,”वह बोला,“आप केस हारते हैं तो अपील होती है।मेरे लिए हर दिन एक नई परीक्षा है—स्वाद सामने है, पर मना है।खुशी चारों तरफ है, पर मेरे लिए नहीं।”

आदित्य चुप हो गया।उसने महसूस किया कि कोर्टरूम की बहसें, ऊँची आवाज़ें, फाइलों का बोझ—सब अचानक हल्के लगने लगे।

आदित्य ने आइसक्रीम ली, कुछ क्षण उसे देखा, फिर दुकानदार से कहा—“भैया, आज ये आइसक्रीम सिर्फ मेरी नहीं है।”

उसने एक चम्मच लिया, एक कौर खाया और फिर आइसक्रीम आगे बढ़ा दी।“नहीं साहब, मैं नहीं खा सकता।”

आदित्य मुस्कुराया—“चिंता मत कीजिए, ये अदालत का आदेश नहीं…बस इंसानियत की पेशकश है।”

दुकानदार की आँखों में नमी आ गई।

Sunday, January 4, 2026

धार्मिक भेड़िया


कोरोना के दुसरे दौर का प्रकोप कम हो चला था। दिल्ली सरकार ने थोड़ी और ढील दे दी थी। डिस्ट्रिक्ट कोर्ट थोड़े थोड़े करके खोले जा रहे थे। मित्तल साहब का एक मैटर तीस हजारी कोर्ट में लगा हुआ था। 

जज साहब छुट्टी पे थे। उनके कोर्ट मास्टर को कोरोना हो गया था। लिहाजा कोर्ट से तारीख लेकर टी कैंटीन में चले गए। सोचा चाय के साथ साथ मित्रों से भी मुलाकात हो जाएगी। 

वहाँ पे उनके मित्र चावला साहब भी मिल गए। दोनों मित्र चाय की चुस्की लेने लगे। बातों बातों में बातों बातों का सिलसिला शुरु हो गया।

चावला साहब ने कहा, अब तो ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे कि वो जीभ हैं और चारों तरफ दातों से घिरे हुए हैं। बड़ा संभल के रहना पड़ रहा है। थोड़ा सा बेफिक्र हुए कि नहीं कि दांतों से कुचल दिए जाओगे।

मित्तल साहब को बड़ा आश्चर्य हुआ। इतने मजबूत और दृढ निश्चयी व्यक्ति के मुख से ऐसी निराशाजनक बातें। उम्मीद के बिल्कुल प्रतिकूल। कम से कम चावला साहब के मुख से ऐसी बातों की उम्मीद तो बिल्कुल नहीं थी।

मित्तल साहब ने थोड़ा आश्चर्य चकित होकर पूछा ; क्या हो गया चावला साहब, ऐसी नाउम्मीदी की बातें क्यों ? बुरे वक्त का दौर चल रहा है। बुरे वक्त की एक अच्छी बात ये है कि इसको भी एक दिन गुजर जाना होता है। बस थोड़े से वक्त की बात है।

चावला साहब ने बताया : ये जो डॉक्टर की कौम होती है ना, जिसे हम भगवान का दूसरा रूप कहते हैं, दरअसल इन्सान की शक्ल में भेड़िये होते हैं। उन्होंने आगे कहा, उन्हें कोरोना हो गया था। उनका ओक्सिजन लेवल 70 चला गया था। फेफड़े की भी कंडीशन 16/25 थी जो की काफी खराब थी। 

हॉस्पिटल को रोगी से कोई मतलब नहीं था। उन्हें तो लेवल नोट गिनने से मतलब था। रोज के रोज लोग मरते चले जा रहे थे। पर डॉक्टर केवल ऑनलाइन हीं सलाह दे रहे थे। किसी को भी खांसी हो तो काफी मोटे मोटे पैसे वसूले जा रहे थे।आखिर किस मुंह से हम इन्हें ईश्वर का दूसरा रूप कहें ?

मित्तल साहब ने कहा : देखिए चावला साहब, यदि आपका अनुभव किसी एक हॉस्पिटल या किसी एक डॉक्टर के साथ खराब है, इसका ये तो मतलब नहीं कि सारी की सारी डॉक्टर की कौम हीं खराब है। 

अभी देखिए, हमारे सामने डॉ. अग्रवाल का उदाहरण है। जब तक जिन्दा रहे, तब तक लोगो की सेवा करते रहे, यहाँ तक मरते मरते भी लोगो को कोरोना से चेताते हीं रहे।

चावला साहब ने आगे कहा : भाई होस्पिटल तो हास्पिटल, हमारे दफ्तर में भी सब भेड़िये हीं बैठे हैं। किसी को ये फ़िक्र नहीं कि चावला साहब मौत के मुंह से लड़कर आये हैं, थोड़ी सहायता कर लें। 

चाहे जूनियर हो, स्टेनो ग्राफर हो, क्लर्क हो या क्लाइंट हो, मुंह पर तो सब मीठी मीठी बातें करते हैं, पर सबको अपनी अपनी पड़ी हैं। सबको अपने मतलब से मतलब है। कभी कभी तो मुझे मौत से भय लगने लगता है।

मित्तल साहब बोले : भाई हम वकीलों की जमात भी कौन सी अच्छी है ? हमारे सामने जो भी क्लाइंट आता है, वो अपनी परेशानी लेकर हीं आता है। उसके लिए परेशानी का मौका हमारे लिए मौका है। हम कौन सा संत जैसा व्यवहार करते हैं ?

चावला साहब ने बीच में टोकते हुए कहा ; लेकिन हम तो मौत के बाद भी सौदा तो नहीं करते। हमारे केस में यदि कोई क्लाइंट लूट भी जाता है, फिर भी वो जिन्दा तो रहता है। कम से कम वो फिर से कमा तो सकता है।

मित्तल साहब ने कहा : भाई यदि किसी क्लाइंट का खून चूस चूस के छोड़ दिया भी तो क्या बचा ? इससे तो अच्छा यही कि जिन्दा लाश न बनकर कोई मर हीं जाये। और रोज रोज मुर्दा लाशें देखकर डॉक्टर तो ऐसे हीं निर्दयी हो जाते हैं। आप हीं बताइये अगर डॉक्टर मरीज से प्यार करने लगे तो शरीर की चिर फाड़ कैसे कर पाएंगे ?

शमशान घाट का कर्मचारी लाशों को जलाकर हीं अपनी जीविका चलाता है। किसी की मृत्यु उसके लिए मौका प्रदान करती है पैसे कमाने का। एक शेर गाय के दोस्ती तो नहीं कर सकता। गाय और घास में कोई मित्रता का तो समंध नहीं हो सकता ? एक की मृत्यु दिसरे के लिए जीवन है। हमें इस तथ्य को स्वीकार कर लेना चाहिए। 

चावला साहब ने आगे कहा ; ठीक है डाक्टरों की बात छोड़िये, कोर्ट को हीं देख लीजिए, एक स्टाफ को कोरोना हो जाये तो पुरे कोर्ट की छुट्टी, पर यदि वकील साहब को कोरोना हुआ है तो एक सप्ताह की डेट ऐसे देते हैं जैसे कि एहसान कर रहे हों। 

और तो और दफ्तर से सारे कर्मचारी को अपनी पड़ी है, चावला साहब कैसे हैं, इसकी चिंता किसी को नहीं ? अपने भी पराये हो गए। जिन्हें मैं अपना समझता था, सबने दुरी बना ली, जैसे कि मैं कोई अछूत हूँ। कभी कभी तो मुझे जीवन से भय लगने लगता है। 

मित्तल साहब समझ गए, कोरोना के समय अपने व्यक्तिगत बुरे अनुभवों के कारण चावला साहब काफी हताश हो गए हैं। 

उन्होंने चावला साहब को समझाते हुए कहा : देखिए चावला साहब जीवन तो संघर्ष का हीं नाम है। जो चले गए वो चले गए। हम तो जंगल में हीं जी रहे हैं। जीवन जंगल के नियमों के अनुसार हीं चलता है। जो समर्थवान है वो जीता है। 

चावला साहब ने कहा : लेकिन नैतिकता भी तो किसी चिड़िया का नाम है। 

मित्तल साहब ने कहा : भाई साहब नैतिकता तो हमें तभी दिखाई पड़ती है जब हम विपत्ति में पड़ते हैं। जब औरों पे दुःख आता है तो हम कौन सा नैतिकता का पालन कर लेते हैं ? कौन सा व्यक्ति है जो ज्यादा से ज्यादा पैसा नहीं कमाना चाहता है ? पैसा कमाने में हम कौन सा नैतिक रह पाते हैं। 

जब ट्रैफिक सिग्नल पर भरी गर्मी में कोई लंगड़ा आकर पैसा मांगता है, तो हम कौन सा पैसा दे देते हैं। हमारे दफ्तर में यदि कोई स्टाफ बीमार पड़ जाता है तो हमें कौन सी दया आती है उनपर ? क्या हम उनका पैसा नहीं काट लेते ? कम से कम इस तरह की हरकत डॉक्टर तो नहीं करते होंगे। 

चावला साहब : पर कुछ डॉक्टर तो किडनी भी निकला लेते हैं ?

मित्तल साहब : हाँ पर कुछ हीं। पकडे जाने पर सजा भी तो होती है। जो क्राइम करते हैं सजा तो भुगतते हीं हैं, चाहे डॉक्टर हो, वकील हो या कि दफ्तर का कोई कर्मचारी। 

यदि ये दुनिया जंगल है तो जीने के लिए भेड़िया बनना हीं पड़ता है। ये जो कोर्ट, स्टाफ, डॉक्टर, दफ्तर के लोग आपको भेड़िये दिखाई पड़ है, केवल वो हीं नहीं, अपितु आप और मैं भी भेड़िये हैं। ये भेड़िया पन जीने के लिए जरुरी है। हाँ अब ये स्वयं पर निर्भर करता है कि आप एक अच्छा भेड़िया बनकर रहते है, या कि सिर्फ भेड़िया।

चावला साहब के होठों पर व्ययन्गात्मक मुस्कान खेलने लगी। 

उन्होंने उसी लहजे में मित्तल साहब से कहा : अच्छा मित्तल साहब कोई धर्मिक भेड़िया को जानते हैं तो जरा बताइए ?

मित्तल साहब सोचने की मुद्रा में आ गए। उत्तर नहीं मिल रहा था।

चावला साहब ने कहा : अच्छा भाई चाय तो ख़त्म हो गई, अब चला जाया। और हाँ उत्तर मिले तो जरुर बताइएगा, कोई धार्मिक भेड़िया, किसी एक दफ्तर का।

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