शाम का समय था। छोटे से कस्बे के सरकारी अस्पताल में अब मरीजों की भीड़ छँट चुकी थी। बरामदे में फैली दवाइयों की तीखी गंध, फर्श पर गूंजते कदमों की प्रतिध्वनि और दीवार पर टंगी घड़ी की लगातार होती टिक–टिक—सब मिलकर एक नीरस, किंतु यथार्थपूर्ण वातावरण रच रहे थे।
उसी निस्तब्धता को चीरते हुए एक संत धीरे–धीरे भीतर आए। कंधे पर पुराना झोला, चेहरे पर अद्भुत शांति, पर छाती में जमी पुरानी खाँसी जो हर कुछ क्षणों में उनके शरीर को झकझोर देती थी।
डाक्टर ने ऊपर देखा। सफेद कोट में बैठा वह व्यक्ति आधुनिक विज्ञान का प्रतिनिधि था—जिसका विश्वास नाड़ी की गति, एक्स–रे की रिपोर्ट और रासायनिक दवाओं की संरचना में था। उसने संत को ऊपर से नीचे तक देखा, मानो किसी सिद्धांत का परीक्षण कर रहा हो। हल्की मुस्कान के साथ, किंचित व्यंग्य में बोला—
“बाबा, आप तो संन्यासी हैं। ईश्वर पर आपकी आस्था अटूट होगी। इतनी खाँसी है, तो अपने भगवान से ही ठीक क्यों नहीं करा लेते? यहाँ विज्ञान का क्या काम?”
यह प्रश्न केवल जिज्ञासा नहीं था—यह विज्ञान की श्रेष्ठता का एक मौन दावा था।
संत ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। उन्होंने पास पड़ी कुर्सी खींची, बैठ गए। खाँसी को थामते हुए उन्होंने गहरी साँस ली और शांत, स्थिर दृष्टि से डाक्टर की आँखों में देखा। फिर बोले—
“बेटा, यदि ईश्वर सब कुछ स्वयं ही कर देता, तो मनुष्य को बुद्धि क्यों देता? और यदि बुद्धि दी है, तो उसका प्रयोग भी उसी की इच्छा से है। उसी भगवान ने तो मुझे आपके पास भेजा है—इलाज के लिए।”
डाक्टर क्षण भर को चुप हो गया। उसकी कलम हवा में ही थम गई। यह उत्तर उसे भीतर तक चुभ गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके मन में छिपे उस अहं को छू लिया हो, जो कहता था—‘सब कुछ मैं जानता हूँ।’
फिर भी उसने तर्क का सहारा लिया—
“लेकिन बाबा, बीमारी का कारण तो जीवाणु हैं, वायरस हैं, शारीरिक कमजोरी है। इसमें ईश्वर कहाँ से आ गया?”
संत मुस्कुराए। यह मुस्कान विजय की नहीं, समझ की थी।
“और उन जीवाणुओं को पहचानने की दृष्टि किसने दी? दवाइयों की खोज किस बुद्धि से हुई? क्या कारण और कार्य की यह पूरी श्रृंखला भी किसी नियम से नहीं चलती? आप उसे प्रकृति कहते हैं, मैं उसे ईश्वर कहता हूँ—नाम अलग हैं, सत्य एक है।”
संत ने आगे कहा—
“ईश्वर केवल मंदिरों या आश्रमों में नहीं रहते, बेटा। वह प्रयोगशालाओं में भी हैं, पुस्तकों में भी हैं, और आपके हाथों में भी। जब कोई किसान बीज बोता है, तो क्या वह केवल भगवान पर निर्भर रहता है? नहीं—वह हल चलाता है, खेत सींचता है। पर भीतर कहीं यह विश्वास भी रखता है कि प्रकृति साथ देगी। यही संतुलन जीवन है।”
डाक्टर की आँखें अब झुकी हुई थीं। उसका विज्ञान अस्वीकार नहीं हुआ था, बल्कि उसे एक व्यापक अर्थ मिल गया था। उसे पहली बार लगा कि विज्ञान और भक्ति परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो पूरक मार्ग हैं—एक बाह्य जगत को समझता है, दूसरा आंतरिक को।
उसने चुपचाप पर्ची लिखी, दवा दी, और अनायास ही उसके हाथ संत के चरणों की ओर बढ़ गए। यह श्रद्धा किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि विनम्रता की थी।
संत उठे, झोला संभाला और जाते–जाते बोले—
“आप अपना कर्म करते रहिए, मैं अपनी प्रार्थना। जब कर्म और विश्वास साथ चलते हैं, तभी रोग भी हार मानता है।”
घड़ी फिर से टिक–टिक करने लगी। अस्पताल वही था, कुर्सियाँ वही थीं, दवाइयों की गंध भी वही—पर डाक्टर के भीतर कुछ बदल चुका था। अब जब भी कोई मरीज उसके सामने बैठता, उसे लगता—
शायद आज भी भगवान किसी और रूप में उसके पास आए हैं—इलाज के लिए नहीं, बल्कि उसे और अधिक मानवीय बनाने के लिए।
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