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Friday, January 9, 2026

दलील

 एक बार कोर्ट में ज़ोरदार बहस चल रही थी। एक तरफ का वकील साहब तो ऐसे चिल्ला रहे थे मानो वो कोयल नहीं, पूरा स्पीकर सिस्टम हों – "माई लॉर्ड! ये अन्याय है! ये ज़ुल्म है! ये... ये... बर्दाश्त के बाहर है!!" आवाज़ इतनी तेज़ कि कोर्ट की दीवारें भी काँप रही थीं।

दूसरी तरफ का वकील साहब चुपचाप बैठे मुस्कुरा रहे थे। जज साहब ने पहले वकील की तरफ देखा और बोले,
"वकील साहब, बार में आवाज़ ऊँची करने से केस नहीं जीता जाता। वरना कोयल आसानी से बाज़ को हरा देती।"

पहला वकील थोड़ा शांत हुआ, लेकिन अंदर से सोचा – "अरे, कोयल तो मीठा गाती है, मैं तो गरज रहा हूँ!"

अब दूसरी तरफ के वकील की बारी आई। वो उठे, गला साफ़ किया और बोले,"माई लॉर्ड, बिल्कुल सही कहा आपने। कोयल की आवाज़ भले मीठी हो, लेकिन जंगल में शिकार बाज़ ही करता है। पर एक बात है..."

वो रुके, थोड़ा ड्रामैटिक पॉज़ लिया और बोले,"अगर कोयल चालाकी से बाज़ के घोंसले के पास जाकर बार-बार 'कूहू-कूहू' करे, और बाज़ को इतना तंग कर दे कि बाज़ गुस्से में अपना शिकार छोड़कर कोयल का पीछा करने लगे... तो शिकार कोयल नहीं, पर दूसरे पक्षी उठा ले जाते हैं!"

कोर्ट रूम में ठहाका लग गया। पहला वकील साहब अब सोच में पड़ गए – "अरे, ये तो मेरे साथ ही हो रहा है! मैं चिल्ला रहा हूँ, और ये चुपचाप मेरी दलीलों की कमज़ोरियाँ निकाल रहे हैं!"

जज साहब हँसते हुए बोले, "बहुत खूब! तो साहब लोग, न कोयल बनिए जो सिर्फ़ गाए, न ऐसे बाज़ बनिए जो गुस्से में अपना शिकार गँवा दें। बस चालाक कोयल और समझदार बाज़ का कॉम्बिनेशन बनिए – मीठी आवाज़ में मज़बूत तर्क दीजिए।"

केस ख़त्म हुआ। दोनों वकील बाहर निकले। पहला वकील बोले, "यार, आज तो तुमने मुझे कोयल बना दिया।"
दूसरा वकील हँसा, "नहीं भाई, तुम खुद चिल्ला-चिल्लाकर कोयल बने थे। मैं तो बस बाज़ बना रहा – चुपचाप शिकार पर नज़र रखे हुए।"

मोरल ऑफ़ द स्टोरी: कोर्ट में न ज़्यादा कोयल बनो, न गुस्सैल बाज़। थोड़ा कोयल का मीठापन + थोड़ा बाज़ का फोकस = जीत पक्की!

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