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Wednesday, December 24, 2025

भगवान कौन?

शहर का वह चौराहा बहुत प्रसिद्ध नहीं था, पर बहुत साधारण भी नहीं था।वहाँ चार सड़कों का मिलन होता था—जैसे चार विचारों का।एक सड़क बाज़ार की तरफ जाती थी, जहाँ मोलभाव जीवन का दर्शन था।दूसरी मंदिर की तरफ, जहाँ आस्था और चढ़ावे का संतुलन चलता था।तीसरी अस्पताल की ओर जाती थी, जहाँ जीवन और मृत्यु रोज़ एक-दूसरे से हाथ मिलाते थे।और चौथी… सरकारी दफ़्तर की ओर, जहाँ फाइलें कभी-कभी ही जागती थीं।

उस दिन सुबह कुछ अलग थी।चौराहे के बीचोंबीच एक आकृति खड़ी थी।गेरुए वस्त्र, माथे पर चंदन का तिलक, गले में रुद्राक्ष की माला, हाथ में लकड़ी की छड़ी।

और हाँ…चेहरा बकरे का।

पहले तो लोगों को लगा किसी ने मज़ाक किया है।शहर में पहले भी तरह-तरह के बाबा आए थे—योग बाबा, चमत्कार बाबा, ऑनलाइन प्रवचन बाबा, यहाँ तक कि बिटकॉइन बाबा भी। लेकिन बकरा बाबा पहली बार आए थे।

पहले तो लोगों को लगा किसी ने सोशल मीडिया के लिए मज़ाक रचा है।किसी ने कहा, “लगता है नई वेब सीरीज़ की शूटिंग चल रही है।”एक युवक बोला, “नहीं भाई, ये जरूर कोई यूट्यूबर होगा। आजकल कंटेंट के लिए लोग कुछ भी कर रहे हैं।”

पान वाले रामखिलावन ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा—“कंटेंट नहीं, कलियुग है।”धीरे-धीरे भीड़ जमा होने लगी।

कुछ लोग हँस रहे थे,कुछ मोबाइल कैमरे तैयार कर रहे थे,और कुछ यह तय करने में लगे थे कि यह धार्मिक कार्यक्रम है या मनोरंजन।

तभी बकरा खाँसा।भीड़ में सन्नाटा।फिर वह गहरी, लगभग प्रवचन जैसी आवाज़ में बोला—

“भाइयों और बहनों…”भीड़ में हलचल।

किसी ने फुसफुसाकर कहा—“अरे, यह तो सचमुच बोल रहा है!”

बकरा आगे बोला—“आज मैं तुमसे एक छोटा-सा सवाल पूछने आया हूँ।

कोरोना के समय मंदिर बंद,
मस्जिद बंद,
चर्च बंद,
गुरुद्वारा बंद।”

वह थोड़ा रुका, फिर गर्दन घुमाकर भीड़ को देखने लगा।

“तो बताओ…
क्या भगवान को भी कोरोना हो गया था?”

भीड़ में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई।

एक युवक ने तुरंत वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया।
दूसरे ने व्हाट्सऐप पर लिखा—
“चौराहे पर बोलता हुआ बकरा मिला, लाइव देखो।”

बकरा शांत खड़ा रहा, जैसे उसे पता हो कि सच्चे सवाल हमेशा थोड़ी देर बाद असर करते हैं।

फिर वह बोला—

“तुम कहते हो भगवान सर्वव्यापी हैं।
कण-कण में हैं।
हवा में हैं।
जल में हैं।
पत्थर में हैं।”

उसने चौराहे के चारों तरफ हाथ घुमाया।

“फिर दरवाज़ों के भीतर कैसे कैद हो गए?”

“अगर भगवान हर जगह हैं,
तो ताले किसके लिए लगे थे?
भगवान के लिए…
या तुम्हारी समझ के लिए?”

भीड़ थोड़ी असहज होने लगी।

तभी भीड़ से एक पंडित जी आगे आए।
उनका माथा गुस्से से लाल था।

उन्होंने कहा—

“यह सब धर्म का अपमान है!”

बकरा मुस्कराया।

वह मुस्कान वैसी थी जैसी किसी बूढ़े शिक्षक की होती है जब कोई छात्र गलत सवाल पूछ देता है।

“धर्म का?”
बकरा बोला।

“या तुम्हारे ठेके का?”

भीड़ अचानक चुप।

पंडित जी कुछ कहना चाहते थे, पर शब्द नहीं मिले।

बकरा अब पूरी तरह मंच पर था।

वह बोला—

“मैं बकरा हूँ।
पर इतना जानता हूँ कि कोरोना के समय डर बीमारी से कम था,
और सवालों से ज़्यादा।”

“डर था कि कहीं इंसान अपने भीतर झाँक न ले।”

उसने सामने खड़े लोगों को देखा—

“तुमने भगवान को भी क्वारंटीन कर दिया।
क्योंकि असली संक्रमण इंसान में था—
डर का,
अज्ञान का,
और अहंकार का।”

भीड़ में एक कॉलेज का लड़का खड़ा था।
उसने हिम्मत करके पूछा—

“तो क्या पूजा-पाठ गलत है?”

बकरा हँसा।

“नहीं मित्र,” उसने कहा।

“पूजा गलत नहीं है।
पर पूजा के नाम पर सोचना बंद कर देना—
सबसे बड़ा पाप है।”

अब बकरा धीरे-धीरे चौराहे के बीच टहलने लगा।

“जब अस्पताल भरे थे,” वह बोला,
“तब तुमने भगवान से पूछा—
ऑक्सीजन कहाँ है?”

“या सिर्फ़ घंटी बजाई?”

“जब लोग भूखे थे,
तब तुमने पूछा—
रोटी कौन देगा?”

“या सिर्फ़ आरती उतारी?”

अब भीड़ की हँसी गायब हो चुकी थी।

किसी ने मोबाइल नीचे कर दिया।

किसी ने नजरें झुका लीं।

बकरा बोला—

“अजीब बात है…
मैं बकरा होकर सच बोल रहा हूँ,
और तुम इंसान होकर अब भी पहचानने में लगे हो
कि बोलने वाला कौन है।”

वह एक युवक के पास गया और बोला—

“तुम पूछते हो—
यह बकरा है या साधु?”

फिर उसने जोर से पूछा—

“मैं पूछता हूँ—
तुम इंसान हो
या सिर्फ़ भीड़?”

हवा का एक झोंका आया।

चौराहे पर खड़े पीपल के पत्ते हिलने लगे।

बकरा अब आखिरी सवाल के लिए तैयार था।

उसने कहा—

“बताओ मुझे…
भगवान कौन है?”

“वह जो ताले के पीछे बैठा है?”

“या वह
जो भूखे को रोटी देता है?”

“वह जो डर फैलाता है?”

“या वह
जो डर के बावजूद सच बोलता है?”

पूरा चौराहा खामोश।

कुछ लोग गुस्से में वहाँ से चले गए।
कुछ ने वीडियो तुरंत यूट्यूब पर डाल दिया—
शीर्षक था:
“LIVE: बोलता हुआ बकरा धर्म पर सवाल उठाता हुआ!”

कुछ लोग बस चुप खड़े रहे।

और बकरा?

वह धीरे-धीरे भीड़ से निकल गया।
किसी ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।

थोड़ी देर बाद चौराहा फिर वैसा ही हो गया—
ठेले, पान की दुकान, ट्रैफिक और शोर।

लेकिन हवा में एक सवाल तैर रहा था।

वह सवाल किसी धर्म का नहीं था,
किसी किताब का नहीं था।

वह बस एक साधारण-सा सवाल था—

इंसान होना आखिर होता क्या है?

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