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Thursday, December 25, 2025

अनुभूति

बरगद और प्रश्न

संध्या थी।
बरगद की छाया लंबी हो चली थी।
एक युवक आया—आँखों में प्रश्न,
हृदय में असंतोष।

उसने ऋषि से पूछा—

युवक:
“यदि ब्रह्म है, तो दृश्य क्यों नहीं?
जो है, वह प्रमाण क्यों न दे?”

ऋषि ने उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने पास गिरे पत्ते को उठाया।

ऋषि:
“क्या यह पत्ता है?”

युवक:
“हाँ।”

ऋषि ने पत्ते को चीर दिया।
रेशे दिखे।

ऋषि:
“अब यह क्या है?”

युवक:
“रेशे।”

ऋषि ने रेशे तोड़ दिए।
धूल रह गई।

ऋषि:
“अब पत्ता कहाँ है?”

युवक मौन रहा।

कुछ क्षण बाद बोला—

युवक:
“यदि ब्रह्म अनुभव है,
तो हर अनुभूति सत्य कैसे?
भ्रम भी तो अनुभव है।”

ऋषि ने आँखें बंद कीं।

ऋषि:
“स्वप्न में जो देखा,
जागरण में सत्य था?”

युवक बोला—
“नहीं।”

ऋषि:
“फिर भी स्वप्न ने तुम्हें रुलाया।”

हवा चली।
बरगद के पत्ते हिले।

युवक:
“यदि सत्य एक है,
तो अनुभव अनेक क्यों?
हर देश में अलग देव,
अलग नाम।”

ऋषि मुस्कराए।

ऋषि:
“नदियाँ अनेक हैं,
समुद्र एक।
जो किनारे से देखे,
उसे भेद दिखे।
जो डूबे,
उसे जल ही जल।”

युवक फिर बोला—

युवक:
“यदि ब्रह्म को जानने के लिए
विशेष अवस्था चाहिए,
तो क्या वह सत्य नहीं,
मन की स्थिति है?”

ऋषि ने दीपक जलाया।

ऋषि:
“दीपक अंधकार हटाता है,
पर सूर्य नहीं बनता।
मन शुद्ध हो तो
सत्य प्रकट होता है—
नया नहीं बनता।”

कुछ देर मौन रहा।

युवक:
“यदि ब्रह्म मौन में मिलता है,
तो वेद क्यों?”

ऋषि बोले—

ऋषि:
“काँटा काँटा निकालता है,
फिर दोनों फेंक दिए जाते हैं।”

युवक ने अंतिम प्रश्न रखा—

युवक:
“यदि ब्रह्म करुणा है,
तो पीड़ा क्यों?”

ऋषि ने आकाश की ओर देखा।

ऋषि:
“अग्नि जलाती है,
पर वही पकाती भी है।
पीड़ा रूप है,
करुणा स्वरूप।”

संध्या गहरी हो गई।
ऋषि मौन हो गए।

युवक समझ गया—
उत्तर शब्दों में नहीं थे।

वह प्रणाम कर उठा।

ब्रह्म न दृष्टि का विषय है,

न तर्क का निष्कर्ष।

वह वही है
जिससे प्रश्न उठते हैं,
और जिसमें प्रश्न विलीन हो जाते हैं।

नेति—नेति।


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