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Thursday, February 26, 2026

सुभाष

जिस वीर ने  गुंजाया था  “जय हिन्द” का  आस,

दहक रही थी उर में  क्रांति  ज्वाला-सा विश्वास?


तुम खून दो   आजादी दूंगा उनकी ऐसी भाषा ,

सुप्त पड़ी धूमिल नयनों में जो गढ़ते थे आशा।


रचने लगे थे रक्त रक्त से अभिनव भारत  गाथा,

रचयिता आजाद फौज के विजय की परिभाषा।


गुलामी की जंजीरों को काटा वो थे अभय अजय,

किंतु मात्र कुछ हीं पन्नों में  सिमटा उनका परिचय।


सत्ता के  गलियारों में है   नाम मात्र उल्हास ,

मालाएँ तो भारी भरकम पर हल्का  इतिहास।


यक्ष प्रश्न ले आज खड़ा है "अजय " वक़्त के पास,

क्या उनको सम्मान मिला जिस काबिल थे सुभाष?

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