कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।
मित्र के माधव तो शत्रु के काल कृष्ण,
दीनों के नाथ तो भक्त के गोपाल कृष्ण।
यशोदा के लाल है तो देवकी के चन्दन,
वसुदेव पुत्र कृष्ण मथुरा वासी नंदन।
राधा के संग में प्रेम का विस्तार हैं,
मीरा विष-प्याले में अमृत की धार हैं।
मित्र सुदामा के मित्रता का मान कृष्ण ,
द्रौपदी पुकार में रक्षा प्रमाण कृष्ण ।
कालिया के फण पर नर्तन स्वरूप भी,
वृंदावन गलियों के प्रेम में सरूप भी।
काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।
सारथी पार्थ के रण के संचालक पर,
अधर्म के विरूद्ध है धर्म के उपासक पर ।
कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,
धर्म कर्म मर्म आदि जिनके अनुकूल हो।
सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र हैं,
सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र हैं।
साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,
लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।
काम जहाँ बंधन है वहाँ पर कृष्ण संयम हैं ,
क्रोध जहाँ अग्नि, वहाँ पर कृष्ण नरम हैं ।
भोग में भी योग हैं, त्याग में अनुराग हैं,
भावों के रंग रंग में कृष्ण विराग हैं।
युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,
पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।
प्रेम में मधुरतम, रण में विकराल,
करुणा में कोमल, अधर्मी के काल।
आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत भी,
चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत भी।
मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,
सृष्टि की सृजना संरक्षण संहारण में।
रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,
सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।
जो दिखता है वह भी, जो अदृश्य संसार ,
जो आरंभ है सृष्टि का, वो अंतिम विस्तार ।
जहाँ प्रेम वहाँ कृष्ण, जहाँ धर्म वहाँ कृष्ण,
जहाँ त्याग वहाँ कृष्ण, जहाँ कर्म वहाँ कृष्ण।
जहाँ जीवन है कृष्ण है, मृत्यु के पार,
शून्य अवचेतन में वही कृष्ण निराकार
कृष्ण सर्व सत्व आदि तत्व अनेकार्थ है,
काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।
=====
कृष्ण
कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की, भक्ति की,
कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,
काल-दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।
कल्मष, विकर्म, पाप-पातक प्रतिकूल वो
धर्म, कर्म, मर्म सभी जिनके अनुकूल वो।
अधर्म के अंधकार में धर्म की हैं ज्योति,
शुष्क पड़े हृदयों में कृष्ण की पुकार होती।
सृष्टि की क्रिया-प्रतिक्रिया के चक्र हैं,
सृष्टि के क्रिया कर्म कर्ता पर अक्र हैं।
बीज में वृक्ष हैं, तो वृक्ष में बीज भी,
कण-कण में शामिल अनंत अतीत भी।
साम, दाम, दंड, भेद नीति के प्रधान कृष्ण,
विष-दंत आवेग आदि समय के प्रमाण कृष्ण।
लोभ का संवेग नहीं, मोह का व्याध नहीं,
माया के मध्य भी माया में साध्य नहीं।
काम जहाँ बंधन है वहाँ पर कृष्ण संयम,
क्रोध जहाँ अग्नि, वहाँ पर कृष्ण नरम।
भोग में भी योग हैं, त्याग में अनुराग हैं,
भावों के रंग रंग में कृष्ण विराग हैं।
युद्ध हो समक्ष अगर, शस्त्रों में दक्ष वो,
पक्ष में न विपक्ष में कोई समकक्ष वो।
यहाँ कृष्ण केवल युद्ध की बात नहीं करते।
वे उस निर्णय की बात करते हैं
जहाँ मनुष्य को अपने भीतर के मोह से
पहले स्वयं युद्ध करना पड़ता है।
शंख में उद्घोष हैं तो चक्र में काल,
गदा में शक्ति तो काल में त्रिकाल।
रणभूमि की नीति भी, वन में मधुर राग,
गोपी के प्रेम में तो, योगी के अनुराग।
आगत जो काल भी हैं, काल जो व्यतीत है,
चल रहा जो आज भी, गुज़रा हुआ अतीत है।
भविष्य की संभावना तो वर्तमान का ज्ञान,
अतीत की स्मृतियों में भी कृष्ण विद्यमान।
मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,
भावों के उत्थान में, बुद्धि के अनुशासन में।
सृष्टि की सृजना में, संरक्षण-संहार में,
जीवन के आरंभ में, जीवन के पार में।
रूप, रंग, देह धारी, दृश्य-दृष्टि से भिन्न वो,
सृष्टि की विभिन्नता में भी कृष्ण अभिन्न वो।
जल में तरंग हैं वो, अग्नि में ताप भी,
शब्दों में अर्थ वो तो, मौन में प्रताप भी।
समय उन्हें बाँध नहीं सकता।
वे बीते हुए क्षण में भी हैं
और उस क्षण में भी
जो अभी मनुष्य के सामने आया नहीं है।
पृथ्वी का धैर्य वो तो नभ में विस्तार,
वायु की गति वो तो जल की शीतल धार।
सूर्य में तेज हैं तो चंद्र की शीतलता,
कृष्ण ही चेतना हैं, कृष्ण ही निर्मलता।
कृष्ण सर्व-सत्त्व आदि, तत्त्व अनेकार्थ हैं,
एक ही सत्य के जाने कितने परमार्थ हैं।
काम, क्रोध, भोग भी, मोक्ष का द्वार हैं,
बंधन भी वही हैं, वही भव से पार हैं।
कृष्ण के अनेक रूप हैं,
पर उनमें बँटा हुआ कृष्ण नहीं है।
मित्र के लिए जो करुणा है,
उसी में अधर्म के लिए कठोरता भी है।
वह बाँसुरी की तान में, वह रण के नाद में,
वह प्रेम का मधुमास, वैराग्य के प्रसाद में।
वह योग का पथ हैं, वह भोग का विवेक हैं,
कर्म का विधान हैं तो ज्ञान का अभिषेक हैं।
वे वंशी की तान हैं, वे रण का निनाद,
वे प्रेम का मधुमास, वे वैराग्य-प्रसाद।
वे योग की साधना, वे भोग का विवेक,
वे कर्म का विधान, वे ज्ञान का अभिषेक।
न वे केवल नाम हैं, न केवल आख्यान,
न वे केवल मूर्ति, न केवल भगवान।
जो सत्य में स्थित है, जो धर्म में उदार,
जिस हृदय में प्रेम हो वहीं कृष्ण साकार।
कर्म करो यही उनका अमर संदेश है,
फल पर अधिकार नहीं यही उपदेश है।
जीवन पथ पर जो निष्काम भाव धरते हैं,
कृष्ण उसी के भीतर धीरे-धीरे उतरते हैं।
जब मोह घना हो जाए, जब बुद्धि अशक्त हो,
जब अपने और पराए में दृष्टि विभक्त हो,
जब धर्म-अधर्म का धूमिल होवे अंतर,
तब कृष्ण ही मन को दृष्टि दें निरंतर।
न वह केवल मंदिर में, न केवल प्रतिमा में,
न केवल वृंदावन में, न केवल महिमा में।
जिसने जाना सत्य को, धर्म-मर्म माना,
उसको श्रीकृष्ण ने अपना पहचाना।
कृष्ण को खोजने के लिए
किसी एक दिशा में देखना पर्याप्त नहीं।
जिस क्षण मनुष्य अपने भीतर के प्रश्नों से भागना छोड़ देता है,
शायद उसी क्षण उसकी यात्रा कृष्ण की ओर शुरू होती है।
वे सृष्टि के कारण, वे सृष्टि के सार,
वे काल के नियंता, समयातीत अपार।
प्रेम में मधुरतम, रण में विकराल,
करुणा में कोमल, अधर्मी के काल।
कृष्ण कहीं बाहर नहीं, भीतर के प्रकाश हैं,
कृष्ण सारे प्रश्नों के उत्तर आकाश हैं।
जो दिखता है वह भी, जो अदृश्य संसार है,
जो आरंभ है सृष्टि का, वो अंतिम विस्तार है।
जहाँ प्रेम वहाँ कृष्ण, जहाँ धर्म वहाँ कृष्ण,
जहाँ त्याग वहाँ कृष्ण, जहाँ कर्म वहाँ कृष्ण।
जहाँ जीवन है कृष्ण है, मृत्यु के पार,
शून्य अवचेतन में वही कृष्ण निराकार।
और शायद कृष्ण का अर्थ
किसी एक उत्तर में समाप्त होना नहीं है।
वे उस चेतना का नाम हैं
जो प्रश्नों के बीच भी मनुष्य को
सत्य की ओर देखना सिखाती है।
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खुद को जब खंगाला मैंने,क्या बोलूँ, क्या पाया मैंने?
अति कठिन है मित्र, तथ्य वो,बामुश्किल ही कहता हूँ।
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।
नेत्र ईश ने सरल दिए थे,प्रीति-युक्त मन तरल दिए थे,
पर जग ने विष-गरल दिया तो विष-प्याले भी रचता हूँ
हृदय रुष्ट है कोलाहल में,जीवन के इस विष-हलाहल में,
अनजाने चेहरे रच-रचकर,खुद ही से खुद को छलता हूँ;
ज्ञात नहीं क्या पथ्य है?इस जीवन का क्या तथ्य है?
कभी सबेरा बनकर चमकूँ,कभी साँझ-सा ढलता हूँ;
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।
सुनता हूँ माया है जग यह,छाया जैसी काया है जग यह;
फिर भी पग पे जीत मिले तो,विजय-हर्ष में चढ़ता हूँ।
जग जय को शाश्वत कहकर निज मन हीं खुश रहता हूं
छद्म-विजय पर तृष्णा जागे,चिंगारी बन भीतर भागे;
मरु-स्वप्न में हाथ नीर का,प्यासा होकर गलता हूँ।
मृग-मरीचिका जितनी दौड़ूँ,उतना ही मैं जलता हूँ।
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।
मन में जो मेरे चलता है,ना दर्पण में दिखता है?
मुख पर कितने रूप सजे हैं,अंतर कौन-सा रहता है?
जब तम अंतस में खिलता है,शब्दों से निज को ढँकता हू
जिस पथ का राही था मैं तो,प्यास रही थी जिसकी मुझको,
निज सत्य का उद्घाटन करना कठिन अति समझता हूँ।
जिस सत्य को जग में खोजूँ,उससे ही क्यों डरता हूँ?
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।
जाने राह कौन-सी उत्तम,नित करता हूँ मन-मंथन।
योग कठिन, अति भोग छद्म है,वैराग्य भी आकर्षण है।
कर्म पुकारे—चलते जाओ,ज्ञान कहे—पहले जानो;
इन दोनों के बीच खड़ा मैं,संशय में ही पलता हूँ—
कुछ कहते—अंतर में जाओ,निज को खोजो, निज को पाओ;
पर मुझमें यह जग ही जगता,जग में अपना अंश दिखता।
भीतर का ही रूप पढ़ने कोबाहर जग को पढ़ता हूँ—
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।
अंदर-बाहर की उलझन में,सुख-दुःख के आवागमन में,
किंचित् आस जगे जब मन में,घोर निशा में बढ़ता हूँ।
तम कितना भी घना हो लेकिन,एक दीप-सा जलता हूँ।”
एक दिवस शायद मौन मिलेगा,जब न कोई प्रश्न रहेगा,
जब दर्पण में दर्पण होगा, जब न कोई भेद बचेगा—
तब शायद यह समझ मेंआए क्यों मै ऐसा लिखता हूँ,
हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।
जितना उर के हँस पड़ने या,किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है,क्या रखा है जीत-हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू,क्या रखा है प्रीत-रार में।
जितना अंतर हर्ष-विषाद के,संग-संग हृदय संजोने में,
उतना अंतर बचा हुआ है,जीत हार के होने में।
पाना भी तो एक कहानी,खोना भी तो अध्याय है,
जिसको अपना मान लिया है वो भी तो क्षय-प्राय है।
कभी मिले तो हर्ष अनोखा,कभी बिछड़ना रोना है,
जो भी तेरे हाथ प्राप्त है एक दिन उसको खोना है।
जितना अंतर प्राप्ति हानि पर, हंसने या कि रोने में,
उतना अंतर बचा हुआ है,जीत हार के होने में।
कल तक जिसको जीत कहा था,कभी वही अभिशाप लगे,
जिसको कल तक हार था समझा ,कभी वही प्रताप लगे।
काल बदलता, अर्थ बदलते, बदलें मन के भाव सभी,
एक चरण में पुष्प खिले तो, दूजे में हों शूल कभी।
जितना अंतर पुष्प-सुगंध और, शूल-चुभन के सहने में,
उतना अंतर बचा हुआ है,जीत हार के होने में।
सुख-दुःख,हानि, यश और अपयश सारे जीवन के हीं अंग हैं,
आज शिखर पर जो आरोहित, कल वो अवरोहण के संग हैं।
जिसे नियति ने जय लिख दी, वह भी क्षणभंगुर लेखा है,
जिसे पराजय आज मिली है, उसमें भी तो नव-रेखा है।
चेतन पट पर चिन्हित अंतर, जो कुछ पाने खोने में,
उतना अंतर बचा हुआ है,जीत हार के होने में।
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आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,
और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
देखकर राजा ने सोचा गर यह वन खो जाएगा,
शेर का भोजन यकीनन यह यहीं हो जाएगा।
करुणागत राजा ने उसको राह से उठा लिया,
उस अभागे भिक्षु को निजअश्व पर बैठा लिया।
वो भिखारी स्वर्ण रंजित अश्व पे विस्मित हुआ,
साथ राजा का मिला निज भाग्य पे चकित हुआ।
नृप भी विस्मित हुआ भिक्षुक को यूँ देखकर,
ढो रहा पोटली क्यों भिक्षुक अश्व पर बैठकर?
अश्व हीं जब चल रहा है बोझ लेकर राह में,
पोटली का बोझ लेकर चल रहे क्यों बांह में?
आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,
और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
समझाया राजा ने भिक्षु कंधे को ना बोझ ढो,
अश्व पर बैठे हो तुम तो अश्व को ही बोझ दो।
राजा की बातों को सुनकर मुसकाया था मंद हीं,
भिक्षुक वो कहने लगा था बातें रुक कर चंद हीं।
आपने मुझको बैठाया कम नहीं उपकार है,
पर पोटली भी अश्व ढोये ये नहीं स्वीकार है।
अश्व तो पहले बेचारा ढो रहा मेरे बोझ को ,
हे राजा विनती है छोटी पोटली ना बोझ दो।
और कुछ तो कर सकूँ ना नृप तेरी राह में,
कम से कम ये पोटली रहने दे मेरी बाँह में।
आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,
और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
सोच के दिल को मेरे थोड़ा सा इत्मीनान है,
पोटली का बोझ मुझपे अश्व को आराम है।
एक राजा जा रहा था शेर की शिकार में,
पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
भिक्षुक तुम भी कैसे हो ना इसका कोई बोध है ,
पोटली का बोझ किसपे बुद्धि को अवरोध है?
या कि खुद की बाहों में या कि रख दो अश्व पे,
तेरा और तेरी पोटली का भार होगा अश्व पे।
राजा मुख सुन भिक्षुक बोला क्या है तेरी चाह में ,
बोला तू भी तो नादां है राजा फंसा अहम वाह में ।
आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,
और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
राजन अपनी पीठ पर चल रहे राज्य भार धर ,
सोचते तुम कर्म तेरा व्यर्थ ना अहंकार कर।
जिस धरा पर तू खड़ा है, वो भी तेरी तो नहीं,
जिस प्रजा पर राज तेरा वो भी तो तेरी नहीं।
जिस बदन से राज करता, वह बदन तेरा कहाँ,
जिस धारा से जी रहा तू, वो तरल तेरा कहाँ।
जिस हवा पर तू है फलता वह तेरा कैसे हुआ?
जिस जगत में तू है चलता, वह तेरा कैसे हुआ?
देख तो जगत का कारण छुपा क्यों निगाह में ,
बोझ तेरे राज्य का ईश्वर पर तू क्यों डाह में ?
आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,
और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
कल जो आने वाला है और गुजर जो कल गया ,
ना है तेरा कुछ भी राजन ना कर्म ना फल गया।
जीत उसकी हार उसकी प्रभु का संसार है ,
और तू नाहक हीं सोचे राज्य निज के भर है ।
इस जगत का बोझ प्रभु पर भार भी संसार का,
पर चला तू भार लेके निज के हीं अहंकार का।
कर भी क्या सकता है तू क्या क्या है तेरे हाथ में,
ज्यों मै लेकर चल रहा हूं पोटली ले हाथ में।
सब समपर्ण उन पर कर उन प्रभु की पांव में ,
बोझ लेके चल ना राजन जा पड़ो उन छाव में।
आखेट को ऊत्सुक वो राजा चल पड़ा उस राह में ,
पोटली लेके खड़ा वो भिक्षुक कह रहा जिस चाह में
====
आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।
दुनिया बदल रही है, सदियाँ बदल गईं पर,
रुकते नहीं कभी ये, कदमात आदमी के।
आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।
बुझते नहीं कफन से,अरमां दफ़न दफ़न से,
जलते हैं तन बदन से, आलात आदमी के।
आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।
कि दिन में है बेचैनी और रातों को उलझन,
संभले नहीं संभलते हालात आदमी के।
आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।
चेहरे पर कितने चेहरे , भीतर हजार चाहें ,
शिनाख्त हुई मुश्किल ,जज़्बात आदमी के।
आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।
मिट्टी से बन के निकला, मिट्टी में मिल गया वो,
फिर भी कहाँ मिटे हैं, ख़्वाहिशात आदमी के।
आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।
खुदा भी इससे हारा, इसे चाहिए जग सारा,
जग बदले पर बदले ना , जात आदमी के।
आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।
====
कटु कर्मों से आहत उर कर,
मृदु वचनों का कोई मतलब है?
अंबार सजा ना पढ़ने का,
किसी पुस्तक को कोई मतलब है?
मरुभूमि में प्यासे आकुल,
जब पानी को रहते व्याकुल,
जल पा सकते फिर भी श्रम से,
मुक्ति मिल सकती मरु भ्रम से,
जलपोत नहीं मीठा पानी ,
तब खारे उस समंदर का,
बोलो तुम कोई मतलब है?
जब प्रतिद्वंदी से युद्ध ठने,
अरिदल सीमा विरुद्ध पड़े,
तब उन प्रतिघातों का लड़कर,
तुम दे सकते कोई प्रतिउत्तर,
पर जब अपने अवरुद्ध अड़े,
उनसे लड़ कर उन जीतों का,
बोलो तुम कोई मतलब है?
अपेक्षित तुमने कर्म किए,
निजधर्म उचित तद्धर्म जिए,
पर वाणी मौन उर कलह फले,
सहकर्मी संग बस जिरह फले,
विवाद फले, प्रतिवाद फले,
फिर दूर पड़े संवादों का,
बोलो तुम कोई मतलब है?
जिन सहचरों संग खेले थे,
जिनके संग उत्सव मेले थे,
बड़े होकर उन्हीं अपनों से ,
लड़ते रहते निज सपनों से,
मिलते उनसे ना हंसते अब,
तब दुनिया में यूं हंसते का ,
बोलो तुम कोई मतलब है?
सच ना बना बात सिर्फ करने को,
लेखन अंकित कर रखने को,
जब कर्म फलित बस मिथ्या हो,
असत्य कर्म कटु जिभ्या हो,
हृदय सरल ना त्रिज्या हो,
तब मात्र सत रटते रहने का
बोलो तुम कोई मतलब है?
औरों पर जब हो अनुशासन,
आश्रित जन पर चलता शासन,
तेरे शब्दों का ना मान करे,
तू छोटों से अपमान सहे,
और अनुचर हीं अपमान करें ,
जब जीवन के सम्मानों का,
बोलो तुम कोई मतलब है?
कटु कर्मों से आहत उर कर,
मृदु वचनों का कोई मतलब है?
अंबार सजा ना पढ़ने का,
किसी पुस्तक को कोई मतलब है?
निशानी लहरों की
हवाओं पर कोई कहानी लिखूँ,
अपनी मैं क्यों ज़िंदगानी लिखूँ?
जो दिखता है वो ही तो सच है मेरा,
और क्या मैं दास्ताँ बयानी लिखूँ?
साहिल-ए-रेत निशानी का क्या,
सब मौजें मिटाएँ नादानी लिखूँ?
पल में बदलती है सूरत-ए-जहाँ,
हर एक लम्हा बस रवानी लिखूँ?
हवाओं पर कोई कहानी लिखूँ,
अपनी मैं क्यों ज़िंदगानी लिखूँ?
अजय अमिताभ सुमन
====
ये घर है मेरा दुकान नहीं है,
गैर ज़रूरी कोई सामान नहीं है।
हसरत है मेरी ये, ये ही मेरा धन है,
ना एहसान किसीका हो, कहता ये मन है।
हाँ उतना ही कहता हूँ जितना ज़रूरी,
हर लफ़्ज़ यूँ हीं बयान नहीं है।
ये घर है मेरा दुकान नहीं है,
गैर ज़रूरी कोई सामान नहीं है।
ज़मीं से उठा हूँ, ज़मीं मेरी दौलत,
मुझे अपनी मिट्टी से बढ़कर न चाहत।
जो किस्मत ने दी है, उसी में हूँ राज़ी,
मेरी ख़्वाहिश में कोई आसमान नहीं है।
ये घर है मेरा दुकान नहीं है,
गैर ज़रूरी कोई सामान नहीं है।
अमीरी का मौसम भले कम रहा है,
मगर इसका कोई मुझे ना गम रहा है।
जो मिलते हैं मुझसे, अदब से ही मिलते,
कि इतना भी मिलना आसान नहीं है।
ये घर है मेरा दुकान नहीं है,
गैर ज़रूरी कोई सामान नहीं है।
न दौलत की ख़्वाहिश, न शोहरत की चाहत,
सुकूँ मेरी फ़ितरत, सुकूँ ही इबादत।
जो मिलता है उतना ही काफ़ी है मुझको,
कुछ और हड़पने का अरमान नहीं है।
ये घर है मेरा, दुकान नहीं है,
ग़ैर-ज़रूरी कोई सामान नहीं है।
मिट्टी की प्यारी ही लगती है ख़ुशबू,
दिल में बची ना कोई और गुफ़्तगू।
जो भी हूँ, जैसा भी, ऐसा ही काफ़ी,
मेरी खुशी में कोई व्यवधान नहीं है।
ये घर है मेरा, कोई दुकान नहीं है,
ग़ैर-ज़रूरी यहाँ सामान नहीं है।
ये घर है मेरा दुकान नहीं है।
ये घर है मेरा दुकान नहीं है।
ग़ैर-ज़रूरी यहाँ सामान नहीं है।
====
मैं हिंदू, तुम मुस्लिम, दिन-रात जगते-सोते,
खो गए हो तुम अख़बार होते-होते
भारत पे हुए भारी ये मंदिर ये मस्जिद
बचा बस वोट मुद्दा चुनाव होते-होते।
====
ज़ुबाँ से बताना ज़रूरी नहीं अहले दिल जताना ज़रूरी नहीं
ख़ामोशियाँ कह जाती वो बातें चुप रह जाना कमजोरी नहीं
===
दुनिया में रहकर सीखते भी क्या हो
कि रेत पर बैठे हो लिखते भी क्या हो
====
ना नज़रें मिलायीं ना हँसकर ही कोई बात की,तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी।
बदलते हुए वक्त का ठहरा हुआ एक मंज़र,
ना दिल में कोई शिकवा और ना हीं कोई खंजर।
अफ़सोस कि हमने बेवजह हीं एहतियात की।
ना नज़रें मिलायीं ना हँसकर ही कोई बात की,
तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी।
हम एक ही पल में सदियों का सफ़र कर आए,
तुम ख़ामोश रहे और हम ख़ुद से गुज़र आए,
ना लफ़्ज़ों के कोई राज ना कोई जज्बात थी।
ना नज़रें मिलायीं ना हँसकर ही कोई बात की,
तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी।
अलविदा का ग़म भी मुस्कुराकर सह लेते,
बेरुख़ी से ही सही, हाल-ए-दिल कह देते,
मगर ख़ामोशी में भी तो कोई नहीं बात थी,
तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी।
वो लम्हा तो गुज़र गया पर वक्त रहा ठहरकर,
ना कोई दिया हममे जला था मन के अंदर, ,
फकत बस ज़माने की वही रस्म-ए-हयात की।
ना नज़रें मिलायीं ना हँसकर ही कोई बात की,
तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी।
====
अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी,
हासिल भी ऐसे कि जैसे है तू मेरी तनहाई भी।
ये हवा भी, ये पानी भी , ये आग भी आकाश भी,
कि मेरे जिंदा होने में हीं छुपी तेरी रहनुमाई भी।
सुकून भी मिलता है तेरी नाम के बदौलत मगर
सवालों के घेरे में अक्सर होती तेरी परछाई भी।
तुझे समझने की कोशिश में खो जाता हूँ अक्सर,
कि तू है,तेरे जहाँ में मै भी और तुझसे जुदाई भी।
अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी।
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अगर मस्जिद में तू है, मंदिर में तू है,
मंदिर में मस्जिद में नफरत फिर क्यूँ है?
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