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Friday, May 1, 2026

2

कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
नन्हे से उस बीज के भीतर,
फैला सारा जंगल देखा।
माटी में जो दाना बोया,
उसमें पूरा सावन देखा,
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

रोज-रोज ये सूरज कैसे,
पूरब से उग जाता है।
सुबह गुलाबी दिन में तपता,
शाम को फिर डूब जाता है।
रात को कैसे जा छिपता है,
किसने बाँधा इसका लेखा?
दिन के पीछे रात खड़ी है,
रात में फिर दिन का रेखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

चंदा घटता, चंदा बढ़ता,
फिर भी चंदा पूरा है।
अंधियारे में राह दिखाता,
जैसे कोई नूरा है।
लाखों तारे नभ में चमके,
किसने इनको गिनकर देखा?
किसने नभ की इस चादर पर,
हीरों जैसा आभूषण लेखा?
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

पानी में मछली रहती क्यों?
पर चिड़िया इसमें मरती क्यों?
सर्प सरकता रेंग-रेंग कर,
छिपकली छत पे चढ़ती क्यों?
पंछी नभ में उड़ते कैसे,
मछली जल में तैरती देखा,
एक ही धरती, एक ही जीवन,
फिर इतना अंतर क्यों देखा?
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

कोयल कूके बाग में आके,
किसको अपना गीत सुनाती?
भँवरा फूलों पर मंडराकर,
किसकी खुशबू पीकर जाती?
फूल खिले तो रंग बिखेरे,
मुरझाए तो मौन सा देखा,
जीवन ने हर रंग में अपने,
मृत्यु का भी क्षण देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

बादल कैसे नभ में आते,
बिन पग धरती पर छा जाते?
सूखी धरती की प्यास बुझाकर,
फिर आकाश में लौट जाते।
बूंद-बूंद से नदी बनी है,
नदियों में सागर देखा,
एक बूँद में छिपा हुआ फिर,
पूरा एक समंदर देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

नदियाँ पर्वत छोड़ निकलतीं,
किसने इनको राह दिखाई?
पत्थर काटे, घाट बनाए,
फिर भी अपनी चाल न खोई।
राह मिली तो बहती जातीं,
रोक मिली तो ठहर गईं,
कितनी गहरी बात प्रकृति की,
चलते-चलते समझी, देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

गर्मी आई, वर्षा आई,
फिर पतझड़ और फिर बहार।
एक ही धरती, कितने मौसम,
हर मौसम का अलग श्रृंगार।
सूखी डाली फिर से फूली,
मृत समझे में जीवन देखा,
कल जो टूटा, आज उसी में,
फिर से नया सवेरा देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

पर्वत चुपचाप खड़े हैं कब से,
सदियों का इतिहास लिए।
नदियाँ जैसे गीत सुनातीं,
अपने भीतर प्यास लिए।
रेगिस्तान की रेत में भी,
जीने का साहस देखा,
काँटों के बीच खिले गुलाब में,
जीवन का विश्वास देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

चींटी जितनी छोटी होकर,
अपना पर्वत ढोती है।
नन्ही सी इक चिड़िया फिर भी,
आकाशों को छूती है।
हाथी जैसा बलवान यहाँ पर,
एक दिन मिट्टी में देखा,
जिस मानव ने जग जीता था,
उसको भी मिटते देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

माँ के आँचल में जो बच्चा,
कल दुनिया बन जाता है।
नन्हे पाँवों से जो चलता,
दौड़ के पर्वत चढ़ जाता है।
एक कली से फूल बना फिर,
फूल से फिर फल बनते देखा,
जीवन ने जीवन को देकर,
जीवन फिर से बनते देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

श्वास कहाँ से आती-जाती,
किसने भीतर दीप जलाया?
धड़कन की इस ताल को आखिर,
किसने इतना सुंदर बनाया?
तन मिट्टी का, प्राण अनोखे,
कैसा अद्भुत मेल है देखा,
माटी में चलता-फिरता मैंने,
जीता-जागता खेल देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

इंसान बना विज्ञान का मालिक,
फिर भी खुद से दूर हुआ।
चाँद छुआ, आकाश नापा,
पर मन का सागर अधूरा हुआ।
बाहर जितना खोज रहा है,
भीतर उतना कम देखा,
दुनिया जीत रहा था लेकिन,
खुद को हारा हुआ देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

न जाने क्या मकसद देखा,
हर रचना में संदेश देखा।
पत्थर में भी धीरज देखा,
नदिया में आवेग देखा।
काँटों में भी फूल खिले हैं,
दुःख में सुख का रंग देखा,
मृत्यु के उस पार खड़े होकर,
जीवन का प्रतिरूप देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

किसने पत्तों को रंग सिखाया,
किसने पवन को गीत दिया?
किसने नभ को नील बनाया,
किसने जल को नीर दिया?
किसने मन में प्रश्न जगाया,
किसने उत्तर मौन रखा?
जितना खोजा, उतना पाया—
रहस्य और भी गहन देखा।

कुदरत तेरा करतब देखा,
हर कण में संसार देखा।
रेत के कण में सागर देखा,
बूँद में पूरा धार देखा।
नन्ही चींटी में श्रम देखा,
पंछी में विस्तार देखा,
और उसी इक बीज के भीतर,
पूरा एक संसार देखा।

न जाने क्या मकसद देखा,
न जाने क्या राज़ है गहरा,
जितना देखा, उतना पाया—
ये जग सारा खेल सुनहरा।
आँखों ने जो देखा थोड़ा,
मन ने उससे पार देखा,
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

कुदरत तेरा करतब देखा,
कण-कण में संसार देखा।
बूँद में सागर, पत्ते में वन,
श्वासों में संसार देखा।
माटी में आकाश देखा,
मृत्यु में नवजीवन देखा,
न जाने क्या मकसद देखा—
एक बीज में बरगद देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।
=====
चाह नहीं धन-धान्य संपदा,
चाह नहीं अतुलित बल-ज्ञान,
तुष्ट यदि ईश्वर मुझसे तो,
इच्छित तुझसे ये वरदान।

मेरे मन में रहे न लालच,
मेरे वचन रहें निष्कलंक,
सेवा में जीवन बीते मेरा,
कर्म बने मेरा पुण्य-पथ।
स्वार्थ नहीं हो राष्ट्र से ऊपर,
निज हित हो ना राष्ट्र महान,
तुष्ट यदि ईश्वर मुझसे तो,
इच्छित तुझसे ये वरदान।

भिन्न प्रान्त के भाषा-भाषी,
इस राष्ट्र के सकल निवासी,
अलीगढ़ याकि मथुरा-काशी,
राष्ट्रहित के हों अभिलाषी।
उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम,
एक रहे भारत की शान,
कश्मीर से कन्याकुमारी,
एक रहे भारत की जान।

भिन्न वेश हों, भिन्न बोलियाँ,
भिन्न रहें आचार-विचार,
पर संकट में एक हो जाएँ,
जैसे एक हो जल की धार।
जाति-धर्म की दीवारों से,
ऊपर उठे मनुज की पहचान,
तुष्ट यदि ईश्वर मुझसे तो,
इच्छित तुझसे ये वरदान।

दया-क्षमा का यहाँ वरण हो,
प्रतिहिंसा को नहीं शरण हो,
राम नाम पे नहीं मरण हो,
ना अजान पे कोई रण हो।
मंदिर में भी शांति बसी हो,
मस्जिद में भी प्रेम महान,
गुरुद्वारे में सेवा गूँजे,
गिरजे में हो करुणा-गान।

धर्म बने निज जीवन-पथ पर,
घृणा का हथियार न बन पाए,
पूजा अपनी, मान सभी का,
कोई दूजे को न झुकाए।
आस्था अपनी-अपनी हो पर,
मानवता हो प्रथम विधान,
तुष्ट यदि ईश्वर मुझसे तो,
इच्छित तुझसे ये वरदान।

धर्म नियंत्रित न हो शासन,
मंदिर-मस्जिद ना हो भाषण,
प्रभु विनती ये तुझसे हर क्षण,
जनहित तत्पर रहे प्रशासन।
न्याय मिले निर्बल को पहले,
शक्ति न खरीदे न्याय की शान,
राजधर्म का मूल यही हो—
जनसेवा ही शासन-प्राण।

न रिश्वत हो, न छल का शासन,
न भय हो, न पक्षपात हो,
जिसके हाथों सत्ता सौंपें,
उसमें जनहित की बात हो।
कानून सभी पर एक चले और,
एक रहे उसका सम्मान,
तुष्ट यदि ईश्वर मुझसे तो,
इच्छित तुझसे ये वरदान।

भिन्न जाति, भिन्न धर्म तमाम,
बने राष्ट्र के मज्जा-प्राण,
आर्यावर्त के जन-गण-मन में,
राष्ट्रधर्म हो सर्वप्रधान।
पर राष्ट्रधर्म का अर्थ यही हो—
सबका गौरव, सबका मान,
सबके अधिकारों की रक्षा,
सबके सपनों का सम्मान।

हे ईश्वर तू वृद्धि दे,
शासक-सेवक को बुद्धि दे,
सम्मान रहे अक्षुण्ण, अक्षय,
उनको निर्मल शुद्धि दे।
लोभ-मोह से दूर रहें वे,
सत्य रहे उनका संधान,
राजमहल से गाँव तलक हो,
सेवा का पावन अभियान।

इस देश की सब संतानें,
तजें घृणा, मिथ्या-अभिमान,
करें प्रेममय सुधा का पान,
भारत का हो नव-निर्माण।
न कोई भूखा, न बेघर हो,
न कोई लाचार रहे,
श्रम का पूरा मान मिले और,
मेहनत का अधिकार रहे।

किसान खेत में हँसता जाए,
श्रमिक नगर को गढ़ता जाए,
सीमा पर प्रहरी निर्भय होकर,
मातृभूमि की लाज बचाए।
शिक्षक ज्ञान-ज्योति फैलाएँ,
वैज्ञानिक करें नव-सृजन,
कर्मठ हाथों से लिखता जाए,
भारत अपना नव-युग-गण।

नर-नारी में ना कोई भय हो,
युवती सबल हो व निर्भय हो,
हर बेटी को शिक्षा मिले और,
हर बेटी का स्वप्न अजय हो।
घर हो उसका, राह हो उसकी,
निर्णय का भी अधिकार मिले,
नारी केवल पूजित ही नहीं,
जीवन में उसको सम्मान मिले।

बेटा-बेटी एक समान हों,
दोनों राष्ट्र की शक्ति बनें,
ज्ञान, कला, विज्ञान, खेल में,
दोनों अपनी भक्ति धरें।
जिस आँगन में जन्मे कन्या,
उस आँगन में उत्सव हो,
हर बेटी के पंख खुले और,
आकाशों तक उसका पथ हो।

विपदा पड़े न पड़े अकाल,
ना बाढ़, न कोई प्रलय हो,
धरती माँ का आँचल हरा हो,
नदियों में निर्मल जल हो।
वन जीवित हों, पर्वत सुरक्षित,
जलवायु का संतुलन रहे,
विकास हो पर प्रकृति के संग,
धरती का भी मान रहे।

नदियाँ सूखी नहीं मिलें और,
न नभ धुएँ से भरता जाए,
शहर बढ़ें पर गाँव न उजड़ें,
कृषक सुखी मुस्काता जाए।
अन्नदाता के घर में दीपक,
ऋण के तम को दूर करे,
जिस मिट्टी से अन्न उगे वह,
मिट्टी फिर से चूर न हो।

ज्ञान-ज्योति घर-घर में पहुँचे,
अज्ञान का तम दूर रहे,
पुस्तक, विद्यालय, शोध-संस्थान,
हर बच्चे के पास रहे।
गुरु का गौरव, शिष्य का श्रम हो,
शिक्षा में संस्कार महान,
ज्ञान बने मानवता का प्रहरी,
विज्ञान बने कल्याण-विधान।

आत्मज्ञान में ना कोई क्षय हो,
फलित सर्वदा लभित अजय हो,
मन में साहस, कर्म में निष्ठा,
लक्ष्य हमारा सदैव विजय हो।
पर विजय अहंकार न बनकर,
बने विनय का एक प्रमाण,
शक्ति मिले तो रक्षा करने,
नहीं किसी पर करने प्रहार।

विश्व गुरु हो पुनर्स्थापित,
देश का ऐसा दृढ़ निश्चय हो,
ज्ञान हमारा दीप बने और,
विश्व-कल्याण हमारा विषय हो।
वेदों से लेकर विज्ञानों तक,
ज्ञान-परंपरा जीवित हो,
योग, आयुर्वेद, दर्शन संग,
नव-विज्ञान की गति हो।

जम्बूद्वीप की शान बढ़े,
यहाँ ज्ञान बढ़े, विज्ञान बढ़े,
चहुँ ओर हो अभिनंदन कि,
आर्यावर्त का नाम बढ़े।
शोध हमारे नभ को छू लें,
सागर में अभियान बढ़े,
अंतरिक्ष से अणु तक भारत,
नव-निर्माण में आगे बढ़े।

भाषाएँ अपनी फूलों जैसी,
हर बोली का मान रहे,
तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम,
हिंदी का भी सम्मान रहे।
बंगाली, मराठी, पंजाबी,
गुजराती, असमिया संग,
भाषा चाहे कोई हो अपनी,
भारत सबसे ऊपर अंग।

कला बचे, संगीत बचे और,
बचे हमारी लोक-विरासत,
नृत्य, नाटक, शिल्प, साहित्य में,
जीवित रहे अपनी संस्कृति।
आधुनिकता का हाथ पकड़कर,
परंपरा का मान रहे,
नवयुग में भी अपनी जड़ों का,
मन में सदा सम्मान रहे।

सीमा पर जो वीर खड़े हैं,
उनके मन में बल देना,
घर से दूर जो देश बचाएँ,
उनको अपना संबल देना।
उनके परिवारों के जीवन में,
सुख-शांति का वास रहे,
भारत की हर साँस में उनकी,
वीरता का विश्वास रहे।

जो विपदा में काम आएँ वे,
उनके मन में दया रहे,
आपदाओं में हाथ बढ़े और,
मानवता की जय रहे।
रक्त न पूछे जाति किसी की,
दर्द न पूछे धर्म यहाँ,
दुख में जो बन जाए सहारा,
वही मनुष्य महान यहाँ।

शहरों में हो स्वच्छ हवा और,
गाँवों में समृद्धि आए,
तकनीक बने सबकी साथी,
हर जन उसका लाभ उठाए।
डिजिटल हो देश मगर मन में,
मानवता का स्पर्श रहे,
प्रगति की हर एक सीढ़ी पर,
पीछे कोई न छूटे रहे।

युवा शक्ति को पथ दिखलाना,
भटके तो फिर हाथ पकड़ाना,
उनके सपनों को पंख लगाना,
कर्मभूमि का अर्थ समझाना।
नशा, निराशा, हिंसा से वे,
दूर रहें, उत्साह धरें,
अपने श्रम से अपने भारत,
का भविष्य उज्ज्वल कर दें।

वृद्धों का सम्मान रहे और,
बालक का मुस्कान रहे,
दिव्यांगों को अवसर पूरा,
हर जीवन का मान रहे।
जिस समाज में अंतिम मानव,
सम्मानित होकर जी पाए,
उस भारत के चरणों में ही,
सच्ची प्रगति स्थान बनाए।

सत्य रहे व्यापार हमारा,
श्रम में पावनता का भाव,
न्याय मिले हर सौदे में और,
न छल रहे, न कोई दाँव।
अर्थव्यवस्था ऐसी हो कि,
सबको आगे बढ़ने दे,
धन कुछ हाथों में सिमटे ना,
श्रमिक को भी फलने दे।

सीमा सुरक्षित, राष्ट्र समृद्ध हो,
लोकतंत्र का मान रहे,
मतभेदों में संवाद रहे और,
विचारों में सम्मान रहे।
वाणी तीखी हो सकती है पर,
मन में विष का वास न हो,
असहमति भी देशहित में हो,
देश कभी निराश न हो।

हम इतिहास पढ़ें पर उससे,
घृणा का पाठ न सीखें कभी,
भूलों से शिक्षा लेकर आगे,
बढ़ें निरंतर हम सभी।
वीरों का सम्मान करें पर,
शांति का भी मूल्य जानें,
युद्ध अंतिम हो, शांति प्रथम हो,
मानवता को सत्य मानें।

हे प्रभु! ऐसी बुद्धि हमें दे,
सत्ता को सेवा मानें हम,
अपने हिस्से का दीप जलाकर,
अंधियारा सब छाँटें हम।
निज गौरव में इतना न डूबें,
दूजे का अपमान करें,
भारत की धरती पर जन्मे हैं,
भारत का कल्याण करें।

एक ध्वज के नीचे हम सब,
एक हृदय, एक प्राण रहें,
भिन्न रहें पहचान हमारी,
फिर भी भारत की जान रहें।
सुख में सबके साथ हँसें हम,
दुःख में सबके साथ खड़े,
ऐसा हो भारत का जीवन,
जिसमें कोई न अकेला पड़े।

चिर मान रहे, चिर आन रहे,
ईश्वर तेरा वरदान रहे।
जन-जन के अधरों पर हँसी हो,
हर आँगन में अरमान रहे।
गंगा-यमुना निर्मल बहतीं,
हर खेतों में धान रहे,
मेहनत की जय, सत्य की विजय,
मानवता की पहचान रहे।

चिर मान रहे, चिर आन रहे,
ईश्वर तेरा वरदान रहे।
हिमगिरि जैसा धैर्य मिले और,
सागर जैसा ज्ञान रहे,
मरुभूमि में भी आशा फूटे,
हर मन में विश्वास रहे।
धरती माँ का शीश न झुके,
भारत का सम्मान रहे,
ईश्वर तेरा वरदान रहे।

राष्ट्र महान ये कल्पों से,
चिर कल्पों तक गुणगान रहे।
वीरों की गाथा अमर रहे,
ऋषियों का ज्ञान महान रहे।
कर्मभूमि यह पुण्यभूमि हो,
सत्य-धर्म का मान रहे,
जन-जन के जीवन में भारत,
भारत के मन में जन रहे।
====
मैं,

मेरा घर,
मेरा छोटा सा घर,
एक छोटे से गाँव में।

और गाँव,
मेरा गाँव,
मेरा छोटा सा गाँव,
कुछ खेतों के बीच,
कुछ पगडंडियों के बीच,
कुछ सपनों के बीच,
एक शहर के पास।

और शहर,
मेरा शहर,
वो छोटा सा शहर,
जहाँ हजारों चेहरे,
लाखों कहानियाँ,
अनगिनत सपने,
एक-दूसरे से मिलते हैं,
बिछड़ते हैं,
फिर अपनी-अपनी दिशाओं में चले जाते हैं,
एक राज्य में।

और राज्य,
मेरा राज्य,
मेरा छोटा सा राज्य,
जिसकी सीमाओं के भीतर
नदियाँ बहती हैं,
पर्वत खड़े हैं,
मैदान फैले हैं,
वन साँस लेते हैं,
और करोड़ों मनुष्य
अपने-अपने छोटे संसारों में जीते हैं,
मेरे इस देश में।

और देश,
मेरा देश,
मेरा प्यारा देश,
जिसकी मिट्टी में
किसी का बचपन है,
किसी की जवानी है,
किसी का बुढ़ापा है,
किसी की स्मृतियाँ हैं,
किसी के सपने हैं।

ऐसे सैंकड़ों देश,
ऐसे अनेक देश,
ऐसे अनगिनत देश,
इस धरती पर।

और धरती,
ये धरती,
मेरी प्यारी धरती,
मेरी छोटी सी धरती,
जिस पर मैं चलता हूँ,
जिसे मैं अपना कहता हूँ,
जिसके एक छोटे से कोने में
मेरा घर है,
मेरा गाँव है,
मेरा शहर है,
मेरा देश है,
और मेरा पूरा संसार है।

वही धरती
घूमती है गोल-गोल,
अपने अक्ष पर,
और घूमती है गोल-गोल
सूरज के चारों ओर,
अन्य ग्रहों के साथ।

और मैं सोचता हूँ—
जिस धरती को
मैं अपना पूरा संसार समझता हूँ,
वह स्वयं
इस विराट व्यवस्था में
कितनी छोटी है!

और सूरज,
मेरा सूरज,
मेरा प्यारा सूरज,
जिसकी एक किरण
मेरे घर की देहरी तक आती है,
जिसकी गर्मी
मेरे खेतों को जीवन देती है,
जिसकी रोशनी में
मेरी धरती चमकती है—

वह सूरज भी
अकेला नहीं।

वह घूमता है,
चलता है,
अपनी गति में,
अपने ग्रहों के साथ,
अपने तारों के साथ,
एक विशाल आकाशगंगा के भीतर।

और आकाशगंगा,
मेरी आकाशगंगा,
वो विशाल आकाशगंगा,
जिसे देखकर
मुझे अपना ब्रह्मांड लगता है।

जहाँ हजारों तारे,
करोड़ों तारे,
अरबों तारे,
अनगिनत तारे।

कुछ जन्म लेते हैं,
कुछ बुझ जाते हैं,
कुछ धधकते हैं,
कुछ विस्फोटित होते हैं,
कुछ अपने भीतर
रहस्यों को समेटे
अंधकार में विलीन हो जाते हैं।

जहाँ ब्लैक होल्स,
हजारों ब्लैक होल्स,
करोड़ों ब्लैक होल्स,
अनगिनत ब्लैक होल्स,

अपने भीतर
प्रकाश तक को
समेट लेने वाली
अदृश्य गहराइयों की तरह
महाकाश के रहस्यों को
अपने भीतर छिपाए बैठे हैं।

जहाँ समय भी
अपना अर्थ खो देता है,
जहाँ दूरी भी
एक प्रश्न बन जाती है,
जहाँ प्रकाश भी
अपनी सीमाओं से जूझता है।

जहाँ तारे
जन्म लेते हैं,
बड़े होते हैं,
जलते हैं,
बुझते हैं,
मिटते हैं—

और उनके मिटने से
फिर किसी नए जन्म की
संभावना बनती है।

और ऐसी आकाशगंगा,
एक नहीं।

हजारों आकाशगंगा,
करोड़ों आकाशगंगा,
अरबों आकाशगंगा,
अनगिनत आकाशगंगा।

कोई बन रही है,
कोई बिगड़ रही है,
कोई घूम रही है,
कोई टकरा रही है,
कोई जन्म ले रही है,
कोई अपना अस्तित्व खो रही है।

कहीं तारे बन रहे हैं,
कहीं तारे टूट रहे हैं,
कहीं प्रकाश जन्म ले रहा है,
कहीं अंधकार गहरा रहा है।

और इन सबके बीच
मेरा सूरज—
एक छोटा सा तारा।

और उसके साथ
मेरी धरती—
एक छोटा सा ग्रह।

और उस धरती पर
मेरा देश—
एक छोटा सा भूभाग।

और उस देश में
मेरा राज्य।

राज्य में
मेरा शहर।

शहर के पास
मेरा गाँव।

और उस गाँव में
मेरा घर।

और उस घर में—
मैं।

मैं!

कितना छोटा हूँ मैं?

इतना छोटा
कि अपनी ऊँचाई पर
मुझे गर्व है,
लेकिन ब्रह्मांड की ऊँचाई पर
मेरी ऊँचाई का कोई अर्थ नहीं।

इतना छोटा
कि मेरी चिंताएँ
मुझे पहाड़ लगती हैं,
पर महाकाश की विशालता में
वे शायद धूल के एक कण से भी छोटी हैं।

मेरी खुशियाँ,
मेरे दुःख,
मेरी जीत,
मेरी हार,
मेरी इच्छाएँ,
मेरी महत्वाकांक्षाएँ—

सब कुछ
मेरे लिए बहुत बड़ा,
पर ब्रह्मांड के लिए
शायद एक क्षण भर की
हल्की सी हलचल।

एक आकाश में
और वो आकाश भी
अकेला कहाँ?

ऐसे हजारों आकाश,
ऐसे लाखों आकाश,
ऐसे अनगिनत आकाश।

एक समय में,
और ऐसा एक समय
हर क्षण जन्म लेता है।

एक सेकंड—
जो मेरे लिए
घड़ी की टिक-टिक है।

वही एक सेकंड
कहीं किसी तारे के जन्म का क्षण है,
कहीं किसी तारे की मृत्यु का क्षण है,
कहीं किसी ग्रह की यात्रा का क्षण है,
कहीं किसी प्रकाश-कण की
अनंत यात्रा का एक छोटा सा पड़ाव है।

जहाँ एक सेकंड,
करोड़ों सेकंड,
अरबों सेकंड,
अनगिनत सेकंड—

मिलकर बनाते हैं
महासमय।

और उस महासमय में
मेरा पूरा जीवन?

बस एक क्षण।

एक क्षण का भी
शायद एक अंश।

जहाँ वॉर्महोल्स,
एक वॉर्महोल,
अनगिनत वॉर्महोल्स,

अंतरिक्ष की कल्पित
गहराइयों को
जोड़ने की संभावना लिए,
आकाश को
तोड़ते-मरोड़ते,
दूरी को
प्रश्न बनाते,
समय को
रहस्य बनाते,
महाकाश को
एक नए अर्थ में
देखने को विवश करते हैं।

जहाँ स्थान
सिर्फ स्थान नहीं,
समय
सिर्फ समय नहीं।

जहाँ दूरी
सिर्फ दूरी नहीं,
और गति
सिर्फ गति नहीं।

सब कुछ
किसी अदृश्य नियम में बँधा है,
किसी विराट लय में चलता है,
किसी अनसुने संगीत पर
नाचता है।

जहाँ ऐसे हजारों आकाश,
करोड़ों महाकाश,
अनगिनत संभावनाएँ,

बनती हैं,
बिगड़ती हैं,
जन्म लेती हैं,
मिटती हैं,
फिर किसी और रूप में
उभरती हैं—

समय में,
इस महासमय में।

और मैं?

मैं इन सबका हिस्सा।

एक अदना सा हिस्सा।

इतना छोटा
कि मेरी कोई सीमा नहीं दिखती,
इतना छोटा
कि मेरा अस्तित्व
ब्रह्मांड की विशालता में
लगभग नगण्य है।

फिर भी—

मैं हूँ।

मैं देखता हूँ।
मैं सोचता हूँ।
मैं प्रश्न करता हूँ।
मैं आकाश को देखता हूँ
और आकाश से पूछता हूँ—

मैं कौन हूँ?

कहाँ से आया हूँ?

कहाँ जा रहा हूँ?

क्या यह विराटता
मुझे देखती है?

या मैं ही
उस विराटता की
एक छोटी सी आँख हूँ,

जिससे
ब्रह्मांड स्वयं को
देखने की कोशिश कर रहा है?

शायद—

मेरा होना
ब्रह्मांड के लिए छोटा हो,
पर मेरे लिए
पूरा ब्रह्मांड है।

मेरी एक साँस,
मेरी एक धड़कन,
मेरी एक स्मृति,
मेरा एक सपना—

मेरे लिए
अनंत है।

और शायद
यही सबसे बड़ा रहस्य है—

कि अनंत ब्रह्मांड में
एक छोटा सा मनुष्य
अनंत को सोच सकता है।

एक छोटी सी आँख
अनंत आकाश को देख सकती है।

एक छोटा सा जीवन
महासमय की कल्पना कर सकता है।

और एक छोटा सा घर
पूरे ब्रह्मांड का प्रश्न
अपने भीतर रख सकता है।

मैं,

मेरा घर,
मेरा छोटा सा घर,

एक छोटे से गाँव में।

और गाँव,
मेरा छोटा सा गाँव,

एक शहर के पास।

और शहर,
मेरा छोटा सा शहर,

एक राज्य में।

और राज्य,
मेरा छोटा सा राज्य,

मेरे इस देश में।

और देश,
मेरा प्यारा देश,

इस छोटी सी धरती पर।

और धरती,
मेरी छोटी सी धरती,

इस विशाल अंतरिक्ष में।

और अंतरिक्ष,
उस महाकाश में।

और महाकाश,
उस महासमय में।

और महासमय,
उस अनंत ब्रह्मांड में।

और उस अनंत ब्रह्मांड में—

मैं।

मेरा छोटा सा जीवन।

मेरी छोटी सी साँस।

मेरा छोटा सा सपना।

मेरा छोटा सा घर।

और फिर भी—

मेरे भीतर
एक पूरा ब्रह्मांड।

मैं,

मेरा घर,

मेरा छोटा सा घर,

इस अनंत ब्रह्मांड में।
======

कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की,
कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।
मित्र के माधव तो शत्रु के काल कृष्ण,
दीनों के नाथ तो भक्त के गोपाल कृष्ण।
यशोदा के लाल है तो देवकी के चन्दन,
वसुदेव पुत्र कृष्ण मथुरा वासी नंदन।
राधा के संग में  प्रेम का विस्तार हैं,
मीरा विष-प्याले में अमृत की धार हैं।
मित्र सुदामा के मित्रता का मान कृष्ण ,
द्रौपदी पुकार में रक्षा प्रमाण कृष्ण ।
कालिया के फण पर नर्तन स्वरूप भी,
वृंदावन गलियों के प्रेम में सरूप भी।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,
काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।
सारथी पार्थ के रण के संचालक पर,
अधर्म के विरूद्ध है धर्म के उपासक पर ।
कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,
धर्म कर्म मर्म आदि जिनके अनुकूल हो।
सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र हैं,
सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र हैं।
साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,
लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।
काम, क्रोध, मद, पद इनसे जो दूर हों,
राग-द्वेष, छल-कपट ना कुछ मंजूर हों।
काम जहाँ बंधन है वहाँ पर कृष्ण संयम हैं ,
क्रोध जहाँ अग्नि, वहाँ पर कृष्ण नरम हैं ।
भोग में भी योग हैं, त्याग में अनुराग हैं,
भावों के रंग रंग में कृष्ण विराग हैं।
युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,
पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।
प्रेम में मधुरतम, रण में विकराल,
करुणा में कोमल, अधर्मी के काल।
ज्ञान-विज्ञान, ध्यान-धारणा के सार हैं,
योग, यज्ञ, तप त्याग तपस्या आधार हैं।
नीति, रीति, प्रीति, आदि शांति स्वरूप वो,
रण में भी धर्म मर्म कर्म के अनुरूप वो।
आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत भी,
चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत भी।
मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,
सृष्टि की सृजना संरक्षण संहारण में।
रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,
सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।
जो दिखता है वह भी, जो अदृश्य संसार ,
जो आरंभ है सृष्टि का, वो अंतिम विस्तार ।
जहाँ प्रेम वहाँ कृष्ण, जहाँ धर्म वहाँ कृष्ण,
जहाँ त्याग वहाँ कृष्ण, जहाँ कर्म वहाँ कृष्ण।
जहाँ जीवन है कृष्ण है, मृत्यु के पार,
शून्य अवचेतन में वही कृष्ण निराकार
कृष्ण सर्व सत्व आदि तत्व अनेकार्थ है,
काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।

=====

कृष्ण

कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की, भक्ति की,
कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,
काल-दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।

कल्मष, विकर्म, पाप-पातक प्रतिकूल वो
धर्म, कर्म, मर्म सभी जिनके अनुकूल वो।
अधर्म के अंधकार में धर्म की हैं ज्योति,
शुष्क पड़े हृदयों में कृष्ण की पुकार होती।

सृष्टि की क्रिया-प्रतिक्रिया के चक्र हैं,
सृष्टि के क्रिया कर्म कर्ता पर अक्र हैं।
बीज में वृक्ष हैं, तो वृक्ष में बीज भी,
कण-कण में शामिल अनंत अतीत भी।

साम, दाम, दंड, भेद नीति के प्रधान कृष्ण,
विष-दंत आवेग आदि समय के प्रमाण कृष्ण।
लोभ का संवेग नहीं, मोह का व्याध नहीं,
माया के मध्य भी माया में साध्य नहीं।

काम जहाँ बंधन है वहाँ पर कृष्ण संयम,
क्रोध जहाँ अग्नि, वहाँ पर कृष्ण नरम।
भोग में भी योग हैं, त्याग में अनुराग हैं,
भावों के रंग रंग में कृष्ण विराग हैं।

युद्ध हो समक्ष अगर, शस्त्रों में दक्ष वो,
पक्ष में न विपक्ष में कोई समकक्ष वो।

यहाँ कृष्ण केवल युद्ध की बात नहीं करते।
वे उस निर्णय की बात करते हैं
जहाँ मनुष्य को अपने भीतर के मोह से
पहले स्वयं युद्ध करना पड़ता है।

शंख में उद्घोष हैं तो चक्र में काल,

गदा में शक्ति तो काल में त्रिकाल।
रणभूमि की नीति भी, वन में मधुर राग,
गोपी के प्रेम में तो, योगी के अनुराग।

आगत जो काल भी हैं, काल जो व्यतीत है,
चल रहा जो आज भी, गुज़रा हुआ अतीत है।
भविष्य की संभावना तो वर्तमान का ज्ञान,
अतीत की स्मृतियों में भी कृष्ण विद्यमान।

मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,
भावों के उत्थान में, बुद्धि के अनुशासन में।
सृष्टि की सृजना में, संरक्षण-संहार में,
जीवन के आरंभ में, जीवन के पार में।

रूप, रंग, देह धारी, दृश्य-दृष्टि से भिन्न वो,
सृष्टि की विभिन्नता में भी कृष्ण अभिन्न वो।
जल में तरंग हैं वो, अग्नि में ताप भी,
शब्दों में अर्थ वो तो, मौन में प्रताप भी।

समय उन्हें बाँध नहीं सकता।
वे बीते हुए क्षण में भी हैं
और उस क्षण में भी
जो अभी मनुष्य के सामने आया नहीं है।

पृथ्वी का धैर्य वो तो नभ में विस्तार,
वायु की गति वो तो जल की शीतल धार।

सूर्य में तेज हैं तो चंद्र की शीतलता,
कृष्ण ही चेतना हैं, कृष्ण ही निर्मलता।

कृष्ण सर्व-सत्त्व आदि, तत्त्व अनेकार्थ हैं,
एक ही सत्य के जाने कितने परमार्थ हैं।
काम, क्रोध, भोग भी, मोक्ष का द्वार हैं,
बंधन भी वही हैं, वही भव से पार हैं।

कृष्ण के अनेक रूप हैं,

पर उनमें बँटा हुआ कृष्ण नहीं है।
मित्र के लिए जो करुणा है,
उसी में अधर्म के लिए कठोरता भी है।

वह बाँसुरी की तान में, वह रण के नाद में,
वह प्रेम का मधुमास, वैराग्य के प्रसाद में।
वह योग का पथ हैं, वह भोग का विवेक हैं,
कर्म का विधान हैं तो ज्ञान का अभिषेक हैं।

वे वंशी की तान हैं, वे रण का निनाद,
वे प्रेम का मधुमास, वे वैराग्य-प्रसाद।
वे योग की साधना, वे भोग का विवेक,
वे कर्म का विधान, वे ज्ञान का अभिषेक।

न वे केवल नाम हैं, न केवल आख्यान,
न वे केवल मूर्ति, न केवल भगवान।
जो सत्य में स्थित है, जो धर्म में उदार,
जिस हृदय में प्रेम हो वहीं कृष्ण साकार।

कर्म करो यही उनका अमर संदेश है,
फल पर अधिकार नहीं यही उपदेश है।
जीवन पथ पर जो निष्काम भाव धरते हैं,
कृष्ण उसी के भीतर धीरे-धीरे उतरते हैं।

जब मोह घना हो जाए, जब बुद्धि अशक्त हो,
जब अपने और पराए में दृष्टि विभक्त हो,
जब धर्म-अधर्म का धूमिल होवे अंतर,
तब कृष्ण ही मन को दृष्टि दें निरंतर।

न वह केवल मंदिर में, न केवल प्रतिमा में,
न केवल वृंदावन में, न केवल महिमा में।
जिसने जाना सत्य को, धर्म-मर्म माना,
उसको श्रीकृष्ण ने अपना पहचाना।

कृष्ण को खोजने के लिए
किसी एक दिशा में देखना पर्याप्त नहीं।
जिस क्षण मनुष्य अपने भीतर के प्रश्नों से भागना छोड़ देता है,
शायद उसी क्षण उसकी यात्रा कृष्ण की ओर शुरू होती है।

वे सृष्टि के कारण, वे सृष्टि के सार,
वे काल के नियंता, समयातीत अपार।
प्रेम में मधुरतम, रण में विकराल,
करुणा में कोमल, अधर्मी के काल।

कृष्ण कहीं बाहर नहीं, भीतर के प्रकाश हैं,
कृष्ण सारे प्रश्नों के उत्तर आकाश हैं।
जो दिखता है वह भी, जो अदृश्य संसार है,
जो आरंभ है सृष्टि का, वो अंतिम विस्तार है।

जहाँ प्रेम वहाँ कृष्ण, जहाँ धर्म वहाँ कृष्ण,
जहाँ त्याग वहाँ कृष्ण, जहाँ कर्म वहाँ कृष्ण।
जहाँ जीवन है कृष्ण है, मृत्यु के पार,
शून्य अवचेतन में वही कृष्ण निराकार।

और शायद कृष्ण का अर्थ
किसी एक उत्तर में समाप्त होना नहीं है।
वे उस चेतना का नाम हैं
जो प्रश्नों के बीच भी मनुष्य को
सत्य की ओर देखना सिखाती है।


====

खुद को जब खंगाला मैंने,क्या बोलूँ, क्या पाया मैंने?

अति कठिन है मित्र, तथ्य वो,बामुश्किल ही कहता हूँ।

हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।


नेत्र ईश ने सरल दिए थे,प्रीति-युक्त मन तरल दिए थे,

पर जग ने विष-गरल दिया तो विष-प्याले भी रचता हूँ

हृदय रुष्ट है कोलाहल में,जीवन के इस विष-हलाहल में,

अनजाने चेहरे रच-रचकर,खुद ही से खुद को छलता हूँ;

ज्ञात नहीं क्या पथ्य है?इस जीवन का क्या तथ्य है?

कभी सबेरा बनकर चमकूँ,कभी साँझ-सा ढलता हूँ;

हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।


सुनता हूँ माया है जग यह,छाया जैसी काया है जग यह;

फिर भी  पग पे जीत मिले तो,विजय-हर्ष में चढ़ता हूँ।

जग जय को शाश्वत कहकर निज मन हीं खुश रहता हूं

छद्म-विजय पर तृष्णा जागे,चिंगारी बन भीतर भागे;

मरु-स्वप्न में हाथ नीर का,प्यासा होकर गलता हूँ।

मृग-मरीचिका जितनी दौड़ूँ,उतना ही मैं जलता हूँ।

हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।


मन में जो मेरे चलता है,ना दर्पण में दिखता है?

मुख पर कितने रूप सजे हैं,अंतर कौन-सा रहता है?

जब तम अंतस में खिलता है,शब्दों से निज को ढँकता हू

जिस पथ का राही था मैं तो,प्यास रही थी जिसकी मुझको,

निज सत्य का उद्घाटन करना कठिन अति समझता हूँ।

जिस सत्य को जग में खोजूँ,उससे ही क्यों डरता हूँ?

हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।


जाने राह कौन-सी उत्तम,नित करता हूँ मन-मंथन।

योग कठिन, अति भोग छद्म है,वैराग्य भी आकर्षण है।

कर्म पुकारे—चलते जाओ,ज्ञान कहे—पहले जानो;

इन दोनों के बीच खड़ा मैं,संशय में ही पलता हूँ—

कुछ कहते—अंतर में जाओ,निज को खोजो, निज को पाओ;

पर मुझमें यह जग ही जगता,जग में अपना अंश दिखता।

भीतर का ही रूप पढ़ने कोबाहर जग को पढ़ता हूँ—

हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।


अंदर-बाहर की उलझन में,सुख-दुःख के आवागमन में,

किंचित् आस जगे जब मन में,घोर निशा में बढ़ता हूँ।

तम कितना भी घना हो लेकिन,एक दीप-सा जलता हूँ।”

एक दिवस शायद मौन मिलेगा,जब न कोई प्रश्न रहेगा,

जब दर्पण में दर्पण होगा, जब न कोई भेद बचेगा—

तब शायद यह  समझ मेंआए  क्यों मै ऐसा लिखता हूँ,

हौले कविता मैं गढ़ता हूँ,हौले कविता मैं गढ़ता हूँ।

=====
कितना अंतर बचा हुआ है,जीत हार के होने में,
जितना उर के हँस पड़ने या,किंचित इसके रोने में।
कहने को तो बात रही है,क्या रखा है जीत-हार में,
जीवन के बस दो ये पहलू,क्या रखा है प्रीत-रार में।
जितना अंतर हर्ष-विषाद के,संग-संग हृदय संजोने में,
उतना अंतर बचा हुआ है,जीत हार के होने में।

पाना भी तो एक कहानी,खोना भी तो अध्याय है,
जिसको अपना मान लिया है वो भी तो क्षय-प्राय है।
कभी मिले तो हर्ष अनोखा,कभी बिछड़ना रोना है,
जो भी तेरे हाथ प्राप्त है एक दिन उसको खोना है।
जितना अंतर प्राप्ति हानि पर, हंसने या कि रोने में,
उतना अंतर बचा हुआ है,जीत हार के होने में।

कल तक जिसको जीत कहा था,कभी वही अभिशाप लगे,
जिसको कल तक हार था समझा ,कभी वही प्रताप लगे।
काल बदलता, अर्थ बदलते, बदलें मन के भाव सभी,
एक चरण में पुष्प खिले तो, दूजे में हों शूल कभी।
जितना अंतर पुष्प-सुगंध और, शूल-चुभन के सहने में,
उतना अंतर बचा हुआ है,जीत हार के होने में।

सुख-दुःख,हानि, यश और अपयश सारे जीवन के हीं अंग हैं,
आज शिखर पर जो आरोहित, कल वो अवरोहण के संग हैं।
जिसे नियति ने जय लिख दी, वह भी क्षणभंगुर लेखा है,
जिसे पराजय आज मिली है, उसमें भी तो नव-रेखा है।
चेतन पट पर चिन्हित अंतर, जो कुछ पाने खोने में,
उतना अंतर बचा हुआ है,जीत हार के होने में।

=====

आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,

और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।


देखकर राजा ने सोचा गर यह वन खो जाएगा,

शेर का भोजन यकीनन यह यहीं हो जाएगा।

करुणागत राजा ने उसको राह से उठा लिया,

उस अभागे भिक्षु को निजअश्व पर बैठा लिया।

वो भिखारी स्वर्ण रंजित अश्व पे विस्मित हुआ,

साथ राजा का मिला निज भाग्य पे चकित हुआ।

नृप भी विस्मित हुआ भिक्षुक को यूँ देखकर,

ढो रहा पोटली क्यों भिक्षुक अश्व पर बैठकर?

अश्व हीं जब चल रहा है बोझ लेकर राह में,

पोटली का बोझ लेकर चल रहे क्यों बांह में?

आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,

और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।


समझाया राजा ने भिक्षु कंधे को ना बोझ ढो,

अश्व पर बैठे हो तुम तो अश्व को ही बोझ दो। 

राजा की बातों को सुनकर मुसकाया था मंद हीं,

भिक्षुक वो कहने लगा था बातें रुक कर चंद हीं।

आपने मुझको बैठाया कम नहीं उपकार है,

पर पोटली भी अश्व ढोये ये नहीं स्वीकार है।

अश्व तो पहले बेचारा ढो रहा मेरे बोझ को ,

हे राजा विनती है छोटी पोटली ना बोझ दो। 

और कुछ तो कर सकूँ ना नृप तेरी राह में,

कम से कम ये पोटली रहने दे मेरी बाँह में।

आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,

और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।


सोच के दिल को मेरे थोड़ा सा इत्मीनान है,

पोटली का बोझ मुझपे अश्व को आराम है।

एक राजा जा रहा था शेर की शिकार में,

पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।

भिक्षुक तुम भी कैसे हो ना इसका कोई बोध है ,

पोटली का बोझ किसपे बुद्धि को अवरोध है?

या कि खुद की बाहों में या कि रख दो अश्व पे,

तेरा और तेरी पोटली का भार होगा अश्व पे।

राजा मुख सुन भिक्षुक बोला क्या है तेरी चाह में ,

बोला तू भी तो नादां है राजा फंसा अहम वाह में ।

आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,

और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।


राजन अपनी पीठ पर चल रहे राज्य भार धर ,

सोचते तुम कर्म तेरा व्यर्थ ना अहंकार कर।

जिस धरा पर तू खड़ा है, वो भी तेरी तो नहीं,

जिस प्रजा पर राज तेरा वो भी तो तेरी नहीं।

जिस बदन से राज करता, वह बदन तेरा कहाँ,

जिस धारा से जी रहा तू, वो तरल तेरा कहाँ।

जिस हवा पर तू है फलता वह तेरा कैसे हुआ?

जिस जगत में तू है चलता, वह तेरा कैसे हुआ?

देख तो जगत का कारण छुपा क्यों निगाह में ,

बोझ तेरे राज्य का ईश्वर पर तू क्यों डाह में ?

आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,

और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।


कल जो आने वाला है और गुजर जो कल गया ,

ना है तेरा कुछ भी राजन ना कर्म ना फल गया। 

जीत उसकी हार उसकी प्रभु का संसार है ,

और तू नाहक हीं सोचे राज्य निज के भर है ।

इस जगत का बोझ प्रभु पर भार भी संसार का,

पर चला तू भार लेके निज के हीं अहंकार का।

कर भी क्या सकता है तू क्या क्या है तेरे हाथ में,

ज्यों मै लेकर चल रहा हूं पोटली ले हाथ में।

सब समपर्ण उन पर कर उन प्रभु की पांव में ,

बोझ लेके चल ना राजन जा पड़ो उन छाव में। 

आखेट को ऊत्सुक वो राजा चल पड़ा उस राह में ,

पोटली लेके खड़ा वो भिक्षुक कह रहा जिस चाह में 

====

आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।

दुनिया बदल रही है, सदियाँ बदल गईं पर,
रुकते नहीं कभी ये, कदमात आदमी के।

आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,

कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।

बुझते नहीं कफन से,अरमां दफ़न दफ़न से,
जलते हैं तन बदन से, आलात आदमी के।

आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।

कि दिन में है बेचैनी और रातों को उलझन,
संभले नहीं संभलते हालात आदमी के।

आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।

चेहरे पर कितने चेहरे , भीतर हजार चाहें ,
शिनाख्त हुई मुश्किल ,जज़्बात आदमी के।

आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,

कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।

मिट्टी से बन के निकला, मिट्टी में मिल गया वो,
फिर भी कहाँ मिटे हैं, ख़्वाहिशात आदमी के।

आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,
कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।

खुदा भी इससे हारा, इसे चाहिए जग सारा,
जग बदले पर बदले ना , जात आदमी के।

आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,

कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।

====

कटु कर्मों से आहत उर कर,

मृदु वचनों का कोई मतलब है?

अंबार सजा ना पढ़ने का,

किसी पुस्तक को कोई मतलब है?


मरुभूमि में प्यासे आकुल,

जब पानी को रहते व्याकुल,

जल पा सकते फिर भी श्रम से,

मुक्ति मिल सकती मरु भ्रम से,

जलपोत नहीं मीठा पानी ,

तब खारे उस समंदर का,

बोलो तुम कोई मतलब है?


जब प्रतिद्वंदी से युद्ध ठने,

अरिदल सीमा विरुद्ध पड़े,

तब उन प्रतिघातों का लड़कर,

तुम दे सकते कोई प्रतिउत्तर,

पर जब अपने अवरुद्ध अड़े,

उनसे लड़ कर उन जीतों का,

बोलो तुम कोई मतलब है?


अपेक्षित तुमने कर्म किए,

निजधर्म उचित तद्धर्म जिए,

पर वाणी मौन उर कलह फले,

सहकर्मी संग बस जिरह फले,

विवाद फले, प्रतिवाद फले,

फिर दूर पड़े संवादों का,

बोलो तुम कोई मतलब है?


जिन सहचरों संग खेले थे,

जिनके संग उत्सव मेले थे,

बड़े होकर उन्हीं अपनों से ,

लड़ते रहते निज सपनों से,

मिलते उनसे ना हंसते अब,

तब दुनिया में यूं हंसते का ,

बोलो तुम कोई मतलब है?


सच ना बना बात सिर्फ करने को,

लेखन अंकित कर रखने को,

जब कर्म फलित बस मिथ्या हो,

असत्य कर्म कटु  जिभ्या हो,

हृदय सरल ना त्रिज्या हो,

तब मात्र सत रटते रहने का

बोलो तुम कोई मतलब है?


औरों पर जब हो अनुशासन, 

आश्रित जन पर चलता शासन,

तेरे शब्दों का ना मान करे,

तू छोटों से अपमान सहे,

और अनुचर हीं अपमान करें ,

जब जीवन के सम्मानों का,

बोलो तुम कोई मतलब है?


कटु कर्मों से आहत उर कर,

मृदु वचनों का कोई मतलब है?

अंबार सजा ना पढ़ने का,

किसी पुस्तक को कोई मतलब है?

=====

निशानी लहरों की

हवाओं पर कोई कहानी लिखूँ,
अपनी मैं क्यों ज़िंदगानी लिखूँ?
जो दिखता है वो ही तो सच है मेरा,
और क्या मैं दास्ताँ बयानी लिखूँ?
साहिल-ए-रेत निशानी का क्या,
सब मौजें मिटाएँ नादानी लिखूँ?
पल में बदलती है सूरत-ए-जहाँ,
हर एक लम्हा बस रवानी लिखूँ?
हवाओं पर कोई कहानी लिखूँ,
अपनी मैं क्यों ज़िंदगानी लिखूँ?

अजय अमिताभ सुमन

====

ये घर है मेरा दुकान नहीं है,

गैर ज़रूरी कोई सामान नहीं है।


हसरत है मेरी ये, ये ही मेरा धन है,

ना एहसान किसीका हो, कहता ये मन है।

हाँ उतना ही कहता हूँ जितना ज़रूरी,

हर लफ़्ज़ यूँ हीं बयान नहीं है।

ये घर है मेरा दुकान नहीं है,

गैर ज़रूरी कोई सामान नहीं है।


ज़मीं से उठा हूँ, ज़मीं मेरी दौलत,

मुझे अपनी मिट्टी से बढ़कर न चाहत।

जो किस्मत ने दी है, उसी में हूँ राज़ी,

मेरी ख़्वाहिश में कोई आसमान नहीं है।

ये घर है मेरा दुकान नहीं है,

गैर ज़रूरी कोई सामान नहीं है।


अमीरी का मौसम भले कम रहा है,

मगर इसका कोई मुझे ना गम रहा है।

जो मिलते हैं मुझसे, अदब से ही मिलते,

कि इतना भी मिलना आसान नहीं है।

ये घर है मेरा दुकान नहीं है,

गैर ज़रूरी कोई सामान नहीं है।


न दौलत की ख़्वाहिश, न शोहरत की चाहत,

सुकूँ मेरी फ़ितरत, सुकूँ ही इबादत।

जो मिलता है उतना ही काफ़ी है मुझको,

कुछ और हड़पने का अरमान नहीं है।

ये घर है मेरा, दुकान नहीं है,

ग़ैर-ज़रूरी कोई सामान नहीं है।


मिट्टी की प्यारी ही लगती है ख़ुशबू,

दिल में बची ना कोई और गुफ़्तगू।

जो भी हूँ, जैसा भी, ऐसा ही काफ़ी,

मेरी खुशी में कोई व्यवधान नहीं है।

ये घर है मेरा, कोई दुकान नहीं है,

ग़ैर-ज़रूरी यहाँ सामान नहीं है।

ये घर है मेरा दुकान नहीं है।


ये घर है मेरा दुकान नहीं है।

ग़ैर-ज़रूरी यहाँ सामान नहीं है।


====

मैं हिंदू, तुम मुस्लिम, दिन-रात जगते-सोते,

खो गए हो तुम अख़बार होते-होते

भारत पे हुए भारी ये मंदिर ये मस्जिद

बचा बस वोट मुद्दा चुनाव होते-होते।

====

ज़ुबाँ से बताना ज़रूरी नहीं अहले दिल जताना ज़रूरी नहीं 

ख़ामोशियाँ कह जाती वो बातें चुप रह जाना कमजोरी नहीं

===

दुनिया में रहकर सीखते भी क्या हो

कि रेत पर बैठे हो लिखते भी क्या हो

====

ना नज़रें मिलायीं ना हँसकर ही कोई बात की,
तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी।

बदलते हुए वक्त का ठहरा हुआ एक मंज़र,
ना दिल में कोई शिकवा और ना हीं कोई खंजर।
अफ़सोस कि हमने बेवजह हीं एहतियात की।
ना नज़रें मिलायीं ना हँसकर ही कोई बात की,
तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी।

हम एक ही पल में सदियों का सफ़र कर आए,
तुम ख़ामोश रहे और हम ख़ुद से गुज़र आए,
ना लफ़्ज़ों के कोई राज ना कोई जज्बात थी।
ना नज़रें मिलायीं ना हँसकर ही कोई बात की,
तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी।

अलविदा का ग़म भी मुस्कुराकर सह लेते,
बेरुख़ी से ही सही, हाल-ए-दिल कह देते,
मगर ख़ामोशी में भी तो कोई नहीं बात थी,
तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी।

वो लम्हा तो गुज़र गया पर वक्त रहा ठहरकर,
ना कोई दिया हममे  जला था मन के अंदर, ,
फकत बस ज़माने की वही रस्म-ए-हयात की।
ना नज़रें मिलायीं ना हँसकर ही कोई बात की,
तुम्हीं कहो भला, ये भी कोई मुलाक़ात थी।

====

अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी,

हासिल भी ऐसे कि जैसे है तू मेरी तनहाई भी।

ये हवा भी, ये पानी भी , ये आग भी आकाश भी,

कि मेरे जिंदा होने में हीं छुपी तेरी रहनुमाई भी।

सुकून भी मिलता है तेरी नाम के बदौलत मगर

सवालों के घेरे में अक्सर होती तेरी परछाई भी।

तुझे समझने की कोशिश में खो जाता हूँ अक्सर,

कि तू है,तेरे जहाँ में मै भी और तुझसे जुदाई भी।

अजीब है ऐ ख़ुदा तू, और तेरी ये ख़ुदाई भी।

====

अगर मस्जिद में तू है, मंदिर में तू है,

 मंदिर में मस्जिद में नफरत फिर क्यूँ है? 

====

झूठ के बाजार में मिला नहीं ,
माजरा ये क्या है,हिला नहीं।
=====



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