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Thursday, January 8, 2026

रेस्ट आर रेस्ट

कचहरी की तीसरी मंज़िल पर बने उस पुराने से चेंबर में एडवोकेट साहब अपनी फाइलों के पहाड़ के बीच बैठे थे। मेज़ पर चाय ठंडी हो चुकी थी, चश्मा नाक के आधे रास्ते पर टिका था और सिर पर बाल… जैसे जीवन की पूरी केस-डायरी लिखी हो।

मुवक्किल साहब—नवीन-नवीन मुक़दमेबाज़—अंदर आए। हाथ में एक मोटी फाइल, चेहरे पर मासूमियत और दिमाग़ में एक ही सवाल।

उन्होंने कुर्सी खींचते हुए बड़े भोलेपन से पूछा,“सर… एक बात पूछूँ?”

वकील साहब ने बिना सिर उठाए कहा,“पूछिए, मगर जल्दी… जज साहब की कॉफी ब्रेक ख़त्म होने वाली है।”

मुवक्किल ने गौर से वकील साहब के सिर को देखा। फिर थोड़ी हिम्मत जुटाकर बोले—“सर, आपके सिर के सिर्फ़ 10 प्रतिशत बाल ही काले हैं और पूरे 90 प्रतिशत सफ़ेद क्यों?”

वकील साहब ने चश्मा उतारा, गहरी साँस ली और कुर्सी की पीठ से टिक गए।चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई, मानो कोई पुराना, दर्दभरा लेकिन मज़ेदार फैसला सुनाने वाले हों।

“देखिए,” उन्होंने गंभीर आवाज़ में कहा,“ये जो 90 प्रतिशत सफ़ेद बाल हैं ना… ये पूरी तरह डेली केस टेस्ट का स्ट्रेस हैं।”

मुवक्किल घबरा गया।“इतना ज़्यादा स्ट्रेस, सर?”

वकील साहब उँगलियों पर गिनाने लगे—“एक तारीख़ जो पड़ती है और जज साहब छुट्टी पर निकल जाते हैं—स्ट्रेस।मुवक्किल जो कहता है ‘सर, बस पाँच मिनट में सब समझा देता हूँ’ और पाँच घंटे निकल जाते हैं—स्ट्रेस।
फीस समय पर न मिले—स्ट्रेस।और जब केस जीत जाएँ और मुवक्किल कहे ‘सर, भगवान की कृपा से हुआ’—तब भी स्ट्रेस।”

मुवक्किल सिर हिलाता रहा।

फिर उसने हिम्मत करके आख़िरी सवाल पूछा—“और सर… जो 10 प्रतिशत बाल काले हैं?”

वकील साहब हल्का सा हँसे, फाइल बंद की और बोले—“वो?”

थोड़ा रुककर बोले—“रेस्ट आर रेस्ट.”

मुवक्किल चुप।वकील साहब चाय का आख़िरी घूँट लेते हुए बोले—“वो भगवान की दया है, जेनेटिक्स है, और थोड़ा सा भ्रम है कि ज़िंदगी में अभी सब कुछ बिगड़ा नहीं है।”

इतने में बाहर से पेशकार की आवाज़ आई—“सर, आपका केस पुकारा जा रहा है।”

वकील साहब खड़े हुए, कोट ठीक किया और जाते-जाते मुवक्किल से बोले—“अब समझे? केस तो आज आपका है… मगर सफ़ेद बाल मेरे क्यों हैं।”

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