Thursday, December 25, 2025

अनुभूति

बरगद और प्रश्न

संध्या थी।
बरगद की छाया लंबी हो चली थी।
एक युवक आया—आँखों में प्रश्न,
हृदय में असंतोष।

उसने ऋषि से पूछा—

युवक:
“यदि ब्रह्म है, तो दृश्य क्यों नहीं?
जो है, वह प्रमाण क्यों न दे?”

ऋषि ने उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने पास गिरे पत्ते को उठाया।

ऋषि:
“क्या यह पत्ता है?”

युवक:
“हाँ।”

ऋषि ने पत्ते को चीर दिया।
रेशे दिखे।

ऋषि:
“अब यह क्या है?”

युवक:
“रेशे।”

ऋषि ने रेशे तोड़ दिए।
धूल रह गई।

ऋषि:
“अब पत्ता कहाँ है?”

युवक मौन रहा।

कुछ क्षण बाद बोला—

युवक:
“यदि ब्रह्म अनुभव है,
तो हर अनुभूति सत्य कैसे?
भ्रम भी तो अनुभव है।”

ऋषि ने आँखें बंद कीं।

ऋषि:
“स्वप्न में जो देखा,
जागरण में सत्य था?”

युवक बोला—
“नहीं।”

ऋषि:
“फिर भी स्वप्न ने तुम्हें रुलाया।”

हवा चली।
बरगद के पत्ते हिले।

युवक:
“यदि सत्य एक है,
तो अनुभव अनेक क्यों?
हर देश में अलग देव,
अलग नाम।”

ऋषि मुस्कराए।

ऋषि:
“नदियाँ अनेक हैं,
समुद्र एक।
जो किनारे से देखे,
उसे भेद दिखे।
जो डूबे,
उसे जल ही जल।”

युवक फिर बोला—

युवक:
“यदि ब्रह्म को जानने के लिए
विशेष अवस्था चाहिए,
तो क्या वह सत्य नहीं,
मन की स्थिति है?”

ऋषि ने दीपक जलाया।

ऋषि:
“दीपक अंधकार हटाता है,
पर सूर्य नहीं बनता।
मन शुद्ध हो तो
सत्य प्रकट होता है—
नया नहीं बनता।”

कुछ देर मौन रहा।

युवक:
“यदि ब्रह्म मौन में मिलता है,
तो वेद क्यों?”

ऋषि बोले—

ऋषि:
“काँटा काँटा निकालता है,
फिर दोनों फेंक दिए जाते हैं।”

युवक ने अंतिम प्रश्न रखा—

युवक:
“यदि ब्रह्म करुणा है,
तो पीड़ा क्यों?”

ऋषि ने आकाश की ओर देखा।

ऋषि:
“अग्नि जलाती है,
पर वही पकाती भी है।
पीड़ा रूप है,
करुणा स्वरूप।”

संध्या गहरी हो गई।
ऋषि मौन हो गए।

युवक समझ गया—
उत्तर शब्दों में नहीं थे।

वह प्रणाम कर उठा।

ब्रह्म न दृष्टि का विषय है,

न तर्क का निष्कर्ष।

वह वही है
जिससे प्रश्न उठते हैं,
और जिसमें प्रश्न विलीन हो जाते हैं।

नेति—नेति।


Wednesday, December 24, 2025

भगवान कौन?

शहर का वह चौराहा बहुत प्रसिद्ध नहीं था, पर बहुत साधारण भी नहीं था।वहाँ चार सड़कों का मिलन होता था—जैसे चार विचारों का।एक सड़क बाज़ार की तरफ जाती थी, जहाँ मोलभाव जीवन का दर्शन था।दूसरी मंदिर की तरफ, जहाँ आस्था और चढ़ावे का संतुलन चलता था।तीसरी अस्पताल की ओर जाती थी, जहाँ जीवन और मृत्यु रोज़ एक-दूसरे से हाथ मिलाते थे।और चौथी… सरकारी दफ़्तर की ओर, जहाँ फाइलें कभी-कभी ही जागती थीं।

उस दिन सुबह कुछ अलग थी।चौराहे के बीचोंबीच एक आकृति खड़ी थी।गेरुए वस्त्र, माथे पर चंदन का तिलक, गले में रुद्राक्ष की माला, हाथ में लकड़ी की छड़ी।

और हाँ…चेहरा बकरे का।

पहले तो लोगों को लगा किसी ने मज़ाक किया है।शहर में पहले भी तरह-तरह के बाबा आए थे—योग बाबा, चमत्कार बाबा, ऑनलाइन प्रवचन बाबा, यहाँ तक कि बिटकॉइन बाबा भी। लेकिन बकरा बाबा पहली बार आए थे।

पहले तो लोगों को लगा किसी ने सोशल मीडिया के लिए मज़ाक रचा है।किसी ने कहा, “लगता है नई वेब सीरीज़ की शूटिंग चल रही है।”एक युवक बोला, “नहीं भाई, ये जरूर कोई यूट्यूबर होगा। आजकल कंटेंट के लिए लोग कुछ भी कर रहे हैं।”

पान वाले रामखिलावन ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा—“कंटेंट नहीं, कलियुग है।”धीरे-धीरे भीड़ जमा होने लगी।

कुछ लोग हँस रहे थे,कुछ मोबाइल कैमरे तैयार कर रहे थे,और कुछ यह तय करने में लगे थे कि यह धार्मिक कार्यक्रम है या मनोरंजन।

तभी बकरा खाँसा।भीड़ में सन्नाटा।फिर वह गहरी, लगभग प्रवचन जैसी आवाज़ में बोला—

“भाइयों और बहनों…”भीड़ में हलचल।

किसी ने फुसफुसाकर कहा—“अरे, यह तो सचमुच बोल रहा है!”

बकरा आगे बोला—“आज मैं तुमसे एक छोटा-सा सवाल पूछने आया हूँ।

कोरोना के समय मंदिर बंद,
मस्जिद बंद,
चर्च बंद,
गुरुद्वारा बंद।”

वह थोड़ा रुका, फिर गर्दन घुमाकर भीड़ को देखने लगा।

“तो बताओ…
क्या भगवान को भी कोरोना हो गया था?”

भीड़ में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई।

एक युवक ने तुरंत वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया।
दूसरे ने व्हाट्सऐप पर लिखा—
“चौराहे पर बोलता हुआ बकरा मिला, लाइव देखो।”

बकरा शांत खड़ा रहा, जैसे उसे पता हो कि सच्चे सवाल हमेशा थोड़ी देर बाद असर करते हैं।

फिर वह बोला—

“तुम कहते हो भगवान सर्वव्यापी हैं।
कण-कण में हैं।
हवा में हैं।
जल में हैं।
पत्थर में हैं।”

उसने चौराहे के चारों तरफ हाथ घुमाया।

“फिर दरवाज़ों के भीतर कैसे कैद हो गए?”

“अगर भगवान हर जगह हैं,
तो ताले किसके लिए लगे थे?
भगवान के लिए…
या तुम्हारी समझ के लिए?”

भीड़ थोड़ी असहज होने लगी।

तभी भीड़ से एक पंडित जी आगे आए।
उनका माथा गुस्से से लाल था।

उन्होंने कहा—

“यह सब धर्म का अपमान है!”

बकरा मुस्कराया।

वह मुस्कान वैसी थी जैसी किसी बूढ़े शिक्षक की होती है जब कोई छात्र गलत सवाल पूछ देता है।

“धर्म का?”
बकरा बोला।

“या तुम्हारे ठेके का?”

भीड़ अचानक चुप।

पंडित जी कुछ कहना चाहते थे, पर शब्द नहीं मिले।

बकरा अब पूरी तरह मंच पर था।

वह बोला—

“मैं बकरा हूँ।
पर इतना जानता हूँ कि कोरोना के समय डर बीमारी से कम था,
और सवालों से ज़्यादा।”

“डर था कि कहीं इंसान अपने भीतर झाँक न ले।”

उसने सामने खड़े लोगों को देखा—

“तुमने भगवान को भी क्वारंटीन कर दिया।
क्योंकि असली संक्रमण इंसान में था—
डर का,
अज्ञान का,
और अहंकार का।”

भीड़ में एक कॉलेज का लड़का खड़ा था।
उसने हिम्मत करके पूछा—

“तो क्या पूजा-पाठ गलत है?”

बकरा हँसा।

“नहीं मित्र,” उसने कहा।

“पूजा गलत नहीं है।
पर पूजा के नाम पर सोचना बंद कर देना—
सबसे बड़ा पाप है।”

अब बकरा धीरे-धीरे चौराहे के बीच टहलने लगा।

“जब अस्पताल भरे थे,” वह बोला,
“तब तुमने भगवान से पूछा—
ऑक्सीजन कहाँ है?”

“या सिर्फ़ घंटी बजाई?”

“जब लोग भूखे थे,
तब तुमने पूछा—
रोटी कौन देगा?”

“या सिर्फ़ आरती उतारी?”

अब भीड़ की हँसी गायब हो चुकी थी।

किसी ने मोबाइल नीचे कर दिया।

किसी ने नजरें झुका लीं।

बकरा बोला—

“अजीब बात है…
मैं बकरा होकर सच बोल रहा हूँ,
और तुम इंसान होकर अब भी पहचानने में लगे हो
कि बोलने वाला कौन है।”

वह एक युवक के पास गया और बोला—

“तुम पूछते हो—
यह बकरा है या साधु?”

फिर उसने जोर से पूछा—

“मैं पूछता हूँ—
तुम इंसान हो
या सिर्फ़ भीड़?”

हवा का एक झोंका आया।

चौराहे पर खड़े पीपल के पत्ते हिलने लगे।

बकरा अब आखिरी सवाल के लिए तैयार था।

उसने कहा—

“बताओ मुझे…
भगवान कौन है?”

“वह जो ताले के पीछे बैठा है?”

“या वह
जो भूखे को रोटी देता है?”

“वह जो डर फैलाता है?”

“या वह
जो डर के बावजूद सच बोलता है?”

पूरा चौराहा खामोश।

कुछ लोग गुस्से में वहाँ से चले गए।
कुछ ने वीडियो तुरंत यूट्यूब पर डाल दिया—
शीर्षक था:
“LIVE: बोलता हुआ बकरा धर्म पर सवाल उठाता हुआ!”

कुछ लोग बस चुप खड़े रहे।

और बकरा?

वह धीरे-धीरे भीड़ से निकल गया।
किसी ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।

थोड़ी देर बाद चौराहा फिर वैसा ही हो गया—
ठेले, पान की दुकान, ट्रैफिक और शोर।

लेकिन हवा में एक सवाल तैर रहा था।

वह सवाल किसी धर्म का नहीं था,
किसी किताब का नहीं था।

वह बस एक साधारण-सा सवाल था—

इंसान होना आखिर होता क्या है?

Saturday, December 20, 2025

आत्म रक्षा और अहिंसा

एक समय की बात है, एक छोटे से राज्य में एक न्यायप्रिय राजा राज्य करता था। उसका नाम था राजा विक्रमादित्य। वह प्रजा का बहुत खयाल रखता था और हमेशा धर्म व नीति के मार्ग पर चलता था। लेकिन राज्य में एक समस्या ने उसे बहुत चिंतित कर दिया था—लोगों में अहिंसा की गलत समझ फैल रही थी। कई लोग अहिंसा को इतनी चरम सीमा तक ले जा रहे थे कि अपराधी बेखौफ होकर अत्याचार कर रहे थे, और निर्दोष लोग केवल सहते रहते थे। राजा सोचता, “क्या अहिंसा का अर्थ केवल सहना ही है? क्या कभी अपनी या दूसरों की रक्षा के लिए बल प्रयोग करना भी धर्म है?”

इस दुविधा को सुलझाने के लिए राजा ने निर्णय लिया कि वह जंगल में रहने वाले एक प्रसिद्ध सद्गुरु साधु के पास जाएँगे, जिनकी बुद्धि और करुणा की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। राजा ने साधारण वेश धारण किया और अकेले ही जंगल की ओर प्रस्थान कर दिया।

घने जंगल में एक छोटी सी कुटिया में साधु मिले। राजा ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी समस्या बताई। “महाराज,” साधु ने मुस्कुराते हुए कहा, “आपकी यह दुविधा बहुत गहरी है। अहिंसा महान धर्म है, लेकिन उसे सही अर्थ में समझना आवश्यक है। मैं आपको एक कथा सुनाता हूँ, जो भय, करुणा और विवेक की सीमाओं को छूती है। यह कथा एक साँप और एक साधु की है, जहाँ अहिंसा को कमजोरी नहीं बल्कि समझदारी के रूप में परखा जाता है।”

फिर साधु ने राजा को वह प्रसिद्ध कथा सुनानी शुरू की:

भय, करुणा और विवेक की सीमाओं को छूती यह कथा एक ऐसे साँप और साधु की है, जहाँ अहिंसा को कमजोरी नहीं बल्कि समझदारी के रूप में परखा जाता है। यह घटना पाठक को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सहनशीलता का अर्थ हमेशा सहना ही होता है, या कभी-कभी स्वयं की रक्षा भी धर्म बन जाती है।

घने और रहस्यमय जंगल के बीचोंबीच एक बहुत ही विशाल और भयानक साँप रहता था। उसका शरीर मोटे वृक्षों के तने जितना चौड़ा था और आँखों में ऐसी चमक थी कि उसे देखते ही मनुष्य का कलेजा काँप उठे। जंगल से होकर जो भी उस रास्ते से गुजरता, वह साँप उसे डस लेता। उसके विष से न जाने कितने प्राणी और मनुष्य मारे जा चुके थे। धीरे-धीरे उस पूरे क्षेत्र में यह प्रसिद्ध हो गया कि वहाँ जाना मृत्यु को निमंत्रण देने जैसा है।

लोग उस इलाके से दूर-दूर तक बचते थे। बच्चे, बूढ़े, चरवाहे, लकड़हारे—सब उस जंगल का नाम सुनते ही काँप जाते। उस साँप को लोग “भुजंग” कहने लगे थे, और भय ने वहाँ अपना स्थायी निवास बना लिया था।

एक दिन एक साधु उस क्षेत्र से होकर जाने वाले थे। उनके चेहरे पर गहरी शांति थी और आँखों में करुणा। जब गाँव वालों को पता चला कि साधु उसी खतरनाक जंगल से गुजरने वाले हैं, तो वे घबरा गए। उन्होंने हाथ जोड़कर विनती की,“महात्मा, उस ओर मत जाइए। वहाँ एक भयानक साँप रहता है। वह किसी को भी जीवित नहीं छोड़ता।”

लेकिन साधु मुस्कराए।“जिस मार्ग पर भय का राज्य हो, वहीं करुणा की सबसे अधिक आवश्यकता होती है,”

यह कहकर वे निडर होकर जंगल की ओर बढ़ गए।

कुछ ही दूर गए थे कि अचानक झाड़ियों से सरसराहट की आवाज़ आई। विशाल साँप फुफकारता हुआ सामने आ गया। उसने अपना फन फैलाया और साधु की ओर बढ़ा, मानो उन्हें डस ही लेगा। जंगल का वातावरण सन्नाटे से भर गया।

लेकिन साधु तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने शांत स्वर में कहा,“तुम बार-बार दूसरों को क्यों डसते हो? तुम्हें इससे क्या मिलता है? क्या तुम्हें इससे सुख या आनंद की अनुभूति होती है?”

साँप ठिठक गया। पहली बार किसी ने उससे भय के बिना बात की थी। कुछ क्षण बाद उसने धीमी, थरथराती आवाज़ में कहा, “नहीं, मुझे कोई आनंद नहीं मिलता। सच तो यह है कि मैं स्वयं डरा हुआ रहता हूँ। इसी डर के कारण मैं अकेला हूँ। मुझे लगता है कि अगर मैं पहले न डसू, तो लोग मुझे मार डालेंगे।”

साधु की आँखों में करुणा और गहरी हो गई। “यदि तुम चाहते हो कि लोग तुमसे प्रेम करें, तो डसना छोड़ दो। किसी को अनावश्यक कष्ट मत दो। प्रेम भय से नहीं, करुणा से जन्म लेता है।”

इतना कहकर साधु आगे बढ़ गए।

साधु की बात साँप के मन में गूँजती रही। कुछ दिनों बाद उसने सचमुच लोगों को डसना बंद कर दिया। जो भी उधर से गुजरता, वह बस चुपचाप किनारे हट जाता। धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि साँप अब काटता नहीं है। भय कम होने लगा।

लेकिन मनुष्य की प्रवृत्ति विचित्र होती है। जहाँ भय कम हुआ, वहाँ निर्दयता बढ़ गई। बच्चे उसे छेड़ने लगे, लोग उस पर पत्थर फेंकने लगे, कुछ उसे मारने की कोशिश करने लगे। साँप कुछ नहीं करता, बस सहता रहता।

कुछ ही दिनों में उसका शरीर घावों से भर गया। वह लहूलुहान होकर ज़मीन पर पड़ा रहता। कमजोरी और पीड़ा से उसकी साँसें उखड़ने लगीं। उस अवस्था में उसे साधु की याद आई। उसने पूरी शक्ति लगाकर साधु को पुकारा।

साधु उसकी पुकार सुनकर वहाँ पहुँचे। जब उन्होंने साँप को उस दयनीय अवस्था में देखा, तो उनका हृदय व्यथित हो उठा।

“यह तुमने क्या कर लिया?” साधु ने पूछा।

साँप ने कराहते हुए कहा,

“मैंने आपकी बात मानी। मैंने अहिंसा का पालन किया और किसी को डसना बंद कर दिया। लेकिन लोग मुझे मारने लगे।”

साधु ने गंभीर स्वर में कहा,

“अरे भाई, मैंने तुम्हें डसने से मना किया था, आत्मरक्षा से नहीं। अहिंसा का अर्थ यह नहीं कि कोई तुम्हें मारे और तुम चुपचाप सहते रहो। अहिंसा का अर्थ है—किसी को अनावश्यक रूप से कष्ट न देना। लेकिन जब कोई तुम्हारी जान लेने आए, तब अपनी रक्षा करना भी धर्म है।”

उन्होंने आगे कहा,

“आत्मरक्षा अहिंसा के विरुद्ध नहीं है। यह उसका ही अंग है। बिना कारण किसी को चोट मत पहुँचाओ, लेकिन जब कोई तुम्हें चोट पहुँचाने आए, तो स्वयं को बचाना तुम्हारा अधिकार और कर्तव्य है।”

साधु के शब्द साँप के मन में दीपक की तरह जल उठे। उसने समझ लिया कि सच्ची अहिंसा कमजोरी नहीं, विवेक है। उस दिन से उसने न किसी को अनावश्यक डसा और न ही अत्याचार सहा।

कथा समाप्त होते ही साधु ने राजा से कहा, “महाराज, इसी प्रकार राज्य में भी अहिंसा का सही अर्थ समझाना चाहिए। प्रजा को सिखाएँ कि अहिंसा कायरता नहीं है। दूसरों को बिना कारण चोट न पहुँचाना ही अहिंसा है, और आत्मरक्षा तथा न्याय की रक्षा करना उसका सबसे महत्वपूर्ण धर्म है।”

राजा को ज्ञान की ज्योति प्राप्त हुई। वे लौटकर राज्य में आए और प्रजा को यह कथा सुनाई। इसके बाद राज्य में अपराधियों पर न्यायपूर्ण दंड दिया जाने लगा, निर्दोषों की रक्षा हुई, और सच्ची अहिंसा का प्रकाश फैल गया। राजा विक्रमादित्य का राज्य धर्म, करुणा और विवेक का प्रतीक बन गया।

इस कथा से यही शिक्षा मिलती है कि अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं है। दूसरों को बिना कारण चोट न पहुँचाना ही अहिंसा है, और आत्मरक्षा करना उसका सबसे महत्वपूर्ण धर्म।

Friday, December 19, 2025

लाला जिसे सताए, खुदा क्या उसे बचाए

 दिल्ली की रात उस दिन कुछ ज़्यादा ही बेरहम थी। हवा में ऐसी ठण्ड घुली हुई थी कि साँस लेते ही फेफड़ों तक चुभन उतर जाती। सड़कें सूनी थीं, दुकानों के शटर आधे झुके हुए, और स्ट्रीट लाइटों के नीचे धुंध किसी बूढ़े कम्बल की तरह लटक रही थी।

प्रदीप साईं बाबा के मंदिर से लौट रहा था। आरती की ध्वनि अब भी कानों में गूँज रही थी—“सबका मालिक एक…”। मन में थोड़ी शांति थी, थोड़ी उम्मीद भी, जैसे ईश्वर ने क्षणभर के लिए जीवन की कठोरता पर मरहम रख दिया हो।

बस आई। प्रदीप जल्दी से चढ़ा और भीतर की ठण्ड से जूझती हुई किसी सीट की तलाश करने लगा। बस के अंदर बैठे लोग अपने-अपने खोल में सिमटे हुए थे—कोई मफलर में मुँह छुपाए, कोई हाथों पर फूँक मारता हुआ। तभी उसकी नज़र सामने खड़े तीन युवकों पर पड़ी।

तीनों साधारण से कपड़ों में थे। पुराने स्वेटर, सस्ते जैकेट और ऐसे जूते, जिनमें चमक से ज़्यादा मजबूरी झलक रही थी। उम्र शायद पच्चीस-छब्बीस के आसपास होगी, पर चेहरों पर समय से पहले आई थकान साफ़ दिखाई दे रही थी। उनकी बातचीत से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि वे किसी छोटी-सी कंपनी में क्लर्की करते थे—वही नौकरी, जिसमें काम ज़्यादा और इज़्ज़त कम मिलती है।

बस के झटकों के साथ उनकी बातचीत भी आगे बढ़ी।

मनोज, रवि को ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोला—
“यार, तुमने तो पूरे कपड़ों की दुकान पहन रखी है। माना कि यहाँ ठण्ड है, पर दिल्ली में शिमला की बर्फ़ तो नहीं गिर रही।”

रवि मुस्कुराया, पर उस मुस्कान में मज़ाक से ज़्यादा अनुभव था।
“शिमला की बर्फ़ न सही, पर खुद को बचाकर रखने में क्या बुराई है? लगता है बिना ठण्ड का शिकार हुए नहीं समझोगे। बीमारी भी तो हमें ही पकड़ती है—मालिकों को नहीं।”

अब तक चुप खड़ा गौतम अचानक हँस पड़ा—एक ऐसी हँसी, जो गले में अटक जाती है।
“अरे यार, हम गरीब लोगों को तो खुदा पैदा ही आधा मरा हुआ करता है। अब ठण्ड मारने की क्या ज़रूरत है? ज़िन्दगी खुद ही रोज़ थोड़ा-थोड़ा मार देती है।”

बस में खड़े कुछ यात्रियों ने गर्दन उठाकर उनकी ओर देखा। किसी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, किसी की आँखों में सहानुभूति झलक गई।

रवि ने गहरी साँस ली और बोला—
“बिलकुल सही कहा। खुदा भी हमें क्या मारेगा? दिल्ली के ये लाला लोग—जिनके यहाँ हम नौकरी करते हैं—वो खुद ही हमें चूस-चूस कर मार देते हैं। सुबह नौ बजे से रात आठ बजे तक, ओवरटाइम का कोई हिसाब नहीं, छुट्टी माँगो तो जैसे कोई गुनाह कर दिया हो।”

मनोज कड़वी हँसी हँसा।
“सच में दोस्त। तनख्वाह इतनी कि महीने के आख़िर में जेब भी हमसे नज़रें चुरा लेती है।”

थोड़ी देर के लिए चुप्पी छा गई। बस की खिड़की से ठण्डी हवा अंदर घुसी और तीनों एक साथ सिहर उठे।

फिर मनोज ने कहा—
“तो भाई, यही समझ लो—लाला जिसे सताए, खुदा क्या उसे बचाए?”

उस वाक्य के साथ जैसे पूरी बस कुछ पल के लिए खामोश हो गई। प्रदीप के कानों में मंदिर में गूँजता वह वाक्य फिर से उभर आया—“सबका मालिक एक…”। मन में एक सवाल चुभ गया—अगर सचमुच सबका मालिक एक है, तो किसी की ज़िन्दगी इतनी सस्ती क्यों है?

बस अगले स्टॉप पर रुकी। मनोज, रवि और गौतम उतर गए। जाते-जाते उन्होंने अपने-अपने फटे जैकेट और कस लिए और ठण्ड में गुम हो गए—जैसे दिल्ली की रात ने उन्हें चुपचाप निगल लिया हो।

प्रदीप अपनी सीट पर बैठा रह गया। ठण्ड अब भी वही थी, पर उसके भीतर एक और ठण्ड उतर चुकी थी—
ज़िन्दगी की।

चाय और कुर्सी



नगर के सामुदायिक भवन में आज “महान नागरिक सम्मान समारोह” रखा गया था। जगह-जगह पोस्टर लगे थे, चाय की खुशबू फैली थी और कुर्सियाँ ऐसी करीने से लगी थीं मानो खुद भी पुरस्कार पाने आई हों।

हर कुर्सी पर पर्ची चिपकी थी—
विशेष अतिथि
मुख्य अतिथि
अति विशेष अतिथि
और आख़िर में—
सामान्य जनता (पीछे बैठें)

इसी बीच अंदर आए चाचा गोलमटोल।
पहनावा साधारण, चाल आरामदेह और चेहरा ऐसा जैसे अभी-अभी कचौरी खाकर आए हों।

चाचा ने चारों ओर देखा और सबसे आगे रखी बड़ी, गद्देदार कुर्सी पर जाकर बैठ गए।
पहला टोका-टोकी

तुरंत एक गार्ड आया,
“चाचा जी, ये कुर्सी खास लोगों के लिए है।”

चाचा मुस्कुराए,
“अच्छा! तभी तो इतनी आरामदेह है।”

गार्ड ने समझाया,
“आपको पीछे वाली पंक्ति में बैठना होगा।”

चाचा बोले,
“पीछे? वहाँ से मंच दिखेगा भी?”
पूछताछ शुरू

गार्ड ने पूछा,
“आप कोई मेहमान हैं?”

चाचा बोले,
“मेहमान तो हूँ, लेकिन बिना बुलाए।”

“तो आप कोई अधिकारी होंगे?”

“नहीं बेटा, मैं तो रिटायर भी नहीं हुआ।”

“कोई नेता?”

“नहीं, मैं वादा करना ही भूल जाता हूँ।”

गार्ड थोड़ा झुंझलाया,
“तो आप हैं कौन?”
महान परिचय

चाचा ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा,
“मैं हूँ—चाय पीने आया आदमी।”

गार्ड चौंका,
“ये कोई पद हुआ?”

चाचा बोले,
“बिल्कुल! बिना चाय के समारोह अधूरा रहता है।”
अंतिम फैसला

तभी आयोजक आ गए। बोले,
“चाचा जी, आप कहाँ बैठना चाहेंगे?”

चाचा बोले,
“जहाँ से भाषण कम और समोसे ज़्यादा दिखें।”

सब हँस पड़े।

आयोजक ने कहा,
“ठीक है चाचा जी, आप यहीं बैठिए।”

चाचा आराम से टिके और बोले,
“देखा! कुछ भी नहीं होने का फ़ायदा—
कोई ज़िम्मेदारी नहीं, लेकिन कुर्सी पक्की!”

और पूरा हॉल ठहाकों से गूँज उठा।

छाया की माया

यह कथा एक ऐसे राजकुमार की है, जिसके पास वैभव था, यौवन था, शिक्षा थी, पर मन में एक अजीब-सी उदासी घर कर गई थी। दिन में वह सभा में बैठता, पर उसकी दृष्टि कहीं खोई रहती। रात में शयनकक्ष में सोने की कोशिश करता, पर करवटें बदलते-बदलते भोर हो जाती। राजमहल के गलियारों में धीरे-धीरे यह चर्चा फैलने लगी कि राजकुमार किसी गहरे दुख में डूबा है।

महामंत्री, जो वर्षों से राज्य ही नहीं बल्कि राजपरिवार के मनोभावों को भी समझते आए थे, एक दिन साहस करके राजकुमार के पास पहुँचे। उन्होंने आदर से पूछा,
“राजकुमार, आपके मुख की आभा फीकी क्यों पड़ गई है? क्या राज्य में कोई संकट है, या हृदय में कोई पीड़ा?”

राजकुमार कुछ क्षण चुप रहा। फिर जैसे भीतर का बाँध टूट गया हो, वह बोला,
“महामंत्री, मैं प्रेम में पड़ गया हूँ। ऐसा प्रेम, जो हर क्षण मुझे बेचैन रखता है। उसके बिना सब कुछ व्यर्थ लगता है।”

महामंत्री चौंक गए। उन्होंने सोचा, शायद किसी राज्य की राजकुमारी होगी, या किसी दरबार में आई सुंदरी। उन्होंने संयत स्वर में पूछा,
“वह कौन है, राजकुमार? किस कुल की कन्या?”

उत्तर में राजकुमार ने कुछ नहीं कहा। वह अपने कक्ष के भीतर गया और एक पुराना चित्र लेकर आया। चित्र देखकर महामंत्री और भी अधिक चकित हो गए। उसमें एक लगभग पाँच वर्ष की बच्ची थी—बड़ी-बड़ी आँखें, कोमल मुख, राधा के वस्त्रों में सजी हुई।

राजकुमार ने भावुक स्वर में कहा,
“महामंत्री, यही वह है। देखिए, इतनी छोटी उम्र में भी कितनी सुंदर थी। सोचिए, अब जब वह बड़ी हो गई होगी, तो कितनी अनुपम होगी। मेरा मन उसी की कल्पना में डूबा रहता है।”

महामंत्री पहले तो कुछ समझ ही नहीं पाए। फिर उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई, जो धीरे-धीरे ठहाके में बदल गई। वे हँस पड़े।

राजकुमार को यह हँसी चुभ गई। वह नाराज़ होकर बोला,
“आप मेरी पीड़ा पर हँस रहे हैं?”

महामंत्री ने गंभीर होकर कहा,
“नहीं राजकुमार, मैं आपकी पीड़ा पर नहीं, आपके भ्रम पर हँस रहा हूँ। क्योंकि यह चित्र किसी और का नहीं, स्वयं आपका ही है।”

राजकुमार स्तब्ध रह गया।
“यह… मेरा?” उसने अविश्वास से पूछा।

महामंत्री ने स्मृतियों का द्वार खोला। “क्या आपको याद है, बचपन में राजमहल में श्रीकृष्ण-राधा का एक नाटक हुआ था? उस समय राधा की भूमिका निभाने वाली बच्ची अचानक बीमार पड़ गई थी। नाटक रद्द होने वाला था। तब महारानी ने, मज़ाक-मज़ाक में ही सही, आपको राधा के वस्त्र पहनाए। आपकी बड़ी आँखें, कोमल चेहरा और बालों की लटें देखकर सबने कहा—यही तो साक्षात राधा है। उसी दिन यह चित्र बनाया गया था।”

राजकुमार का चेहरा लाल पड़ गया। वर्षों से जिस प्रेम को वह अपने हृदय का सत्य मान रहा था, वह एक स्मृति-भ्रम निकला। वह देर तक चुप बैठा रहा।

महामंत्री ने धीरे से कहा, “राजकुमार, यह कथा केवल एक चित्र की नहीं है। यह मन की लीला है। मन कभी-कभी अपनी ही छाया को प्रेम समझ बैठता है। हम किसी बाहरी व्यक्ति में नहीं, बल्कि अपनी ही कल्पना में उलझ जाते हैं।”

राजकुमार की आँखों में समझ की चमक आई। उसकी उदासी जैसे धीरे-धीरे पिघलने लगी। उसने चित्र को आदर से रखा और गहरी साँस ली।

उस दिन राजकुमार ने केवल अपने भ्रम से नहीं, बल्कि अपने मन की चंचलता से भी परिचय पाया। और महल में पहली बार, बहुत दिनों बाद, उसके चेहरे पर हल्की-सी शांत मुस्कान लौट आई।

संसार पर विजय

वर्षों तक युद्ध के मैदानों में धूल उड़ाते, रक्त बहाते, सम्राट अशोकवर्धन—नहीं, उसका नाम इतिहास की किताबों में नहीं लिखा गया था, पर उसकी सेनाओं का नाम सुनकर पहाड़ भी काँप जाते थे। उत्तर में हिमालय की बर्फीली चोटियाँ, दक्षिण में समुद्र की लहरें, पूर्व में सूर्योदय की पहली किरण और पश्चिम में सूर्यास्त की आखिरी लाली—सब कुछ उसकी मुहर लगी हुई सी लगती थी।

जिन राजाओं के नाम पर नगर के बच्चे रात को डरते थे, वे अब उसके सिंहासन के सामने माथा टेके खड़े थे। जिनके पिता ने कभी सपने में भी उसके सामने सिर नहीं झुकाया था, उनकी संतानें अब उसके चरणों में भेंट चढ़ाती थीं।

महासभा में शंखनाद हुआ।चारों वेदों के विद्वान एक साथ मंत्रोच्चार करने लगे।पुरोहितों ने अग्नि में घी और चंदन की आहुति दी।और फिर घोषणा हुई—“चक्रवर्ती सम्राट!”

राजधानी तीन दिन-तीन रात नाचती रही।सोने के तोरण लगे, हाथियों की टोलियाँ सजाई गईं, नृत्यांगनाओं के घुंघरुओं की झनकार से रातें जाग उठीं। कवि नए-नए छंद रचते रहे, गीतकार स्वर लुटाते रहे।

पर चौथी रात जब उत्सव थम गए, जब नगर सो गया, जब महल के अंतिम दीपक भी बुझ गए, तब वह अकेला रह गया—सिंहासन पर नहीं, अपने शयनकक्ष की खिड़की के पास खड़ा, अंधेरे में टकटकी लगाए।

उसके हाथ में अभी भी वह तलवार थी जिसने सैकड़ों युद्ध जीते थे, पर उंगलियाँ काँप रही थीं।मन में एक ही प्रश्न बार-बार उछल रहा था—“सब कुछ मिल गया... फिर यह खालीपन क्यों?”

अगले दिन उसने महामंत्री हरिशेण को बुलाया।हरिशेण वही था जो बीस वर्ष से उसके साथ था—जब वह केवल एक युवा राजकुमार था, तब भी। युद्ध के मैदान में ढाल बनकर खड़ा रहा था, संधि के समय कठोर शब्दों को नरम करने वाला था, रात के अँधेरे में जब सम्राट को नींद नहीं आती थी, तब चुपचाप पास बैठकर कथा सुनाता था।

“हरिशेण,” सम्राट की आवाज में थकान थी,“मेरे पास सारा संसार है। फिर भी मन किसी बच्चे की तरह रोता रहता है। क्या कोई प्रदेश बाकी है? क्या कोई दुश्मन बचा है जिसे जीतना बाकी है?”

हरिशेण ने पहले तो कुछ नहीं कहा।फिर धीरे से मुस्कुराया—वह मुस्कान न तो चाटुकारिता की थी, न ही डर की। वह मुस्कान एक ऐसे व्यक्ति की थी जो बहुत कुछ देख चुका हो।

“महाराज,” उसने कहा,“आपने जो प्रदेश जीते, वे बाहर के थे।पर एक प्रदेश ऐसा है जो अभी तक आपकी सेनाओं के सामने नहीं आया।वह प्रदेश है—आप स्वयं।”

सम्राट की भौंहें सिकुड़ गईं।हरिशेण ने आगे कहा,“यदि आज्ञा हो तो मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति के पास ले चलूँ, जिसके पास न कोई सेना है, न कोई साम्राज्य, न कोई मुकुट। फिर भी वह हर दिन सूर्योदय के साथ हँसता है और सूर्यास्त के साथ सो जाता है। उसकी आँखों में कोई युद्ध नहीं, कोई विजय नहीं—केवल शांति।”

अगले प्रातःकाल, बिना किसी शाही जुलूस के, बिना नगाड़ों के, बिना सैनिकों के, केवल एक सादा वस्त्र पहने सम्राट और हरिशेण नगर से बाहर निकले।वे एक पुरानी नदी के तट पर पहुँचे।

नदी धीरे-धीरे बह रही थी, जैसे समय को भी कोई जल्दी न हो।वहीं एक फटे वस्त्रों वाला फकीर बैठा था।उसके बाल खुले थे, पैर नंगे थे, और चेहरा... चेहरा ऐसा था मानो उस पर कभी कोई बोझ न पड़ा हो।सूर्य की पहली सुनहरी किरणें उसके माथे को छू रही थीं।

सम्राट ने आगे बढ़कर पूछा—“बाबा, मेरे पास सब कुछ है—सोना, राज्य, सेना, सम्मान। फिर भी रातों को नींद नहीं आती। तुम्हारे पास कुछ भी नहीं—फिर भी तुम्हारी आँखों में ऐसी शांति है जैसे तुमने कभी कोई युद्ध ही न देखा हो। इसका रहस्य बताओ।”

फकीर ने धीरे से आँखें खोलीं।उसकी नजर सम्राट के चेहरे पर ठहरी, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला—
“मैं उत्तर दे सकता हूँ... पर पहले मेरी गुरु-दक्षिणा देनी होगी।”

सम्राट ने तुरंत कहा—“जो माँगोगे, मिलेगा। सोना? भूमि? महल? वस्त्र? नाम बताओ।”

फकीर हँसा—नरम, लगभग बच्चों जैसी हँसी।फिर बोला—“अभी केवल इतना करो कि सूर्य और मेरे बीच से हट जाओ।तुम मेरी धूप रोक रहे हो।”

सम्राट जैसे पत्थर बन गया।चक्रवर्ती सम्राट।जिसके सामने पूरा संसार झुकता था।और दक्षिणा में केवल... दो कदम पीछे हटना?

कुछ पल तक वह हिल ही नहीं सका।फिर धीरे-धीरे, लगभग अनिच्छा से, वह दो कदम पीछे हटा।

सूर्य की किरणें फिर से फकीर के चेहरे पर बिखर गईं।फकीर ने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली, जैसे वह पहली बार साँस ले रहा हो।

फिर उसने धीरे से कहा—“देखा महाराज?जैसे तुम्हारा शरीर मेरे और सूर्य के बीच आकर प्रकाश को रोक रहा था,
वैसे ही तुम्हारा ‘मैं’ तुम्हारे और उस अनंत प्रकाश के बीच खड़ा है।वह प्रकाश हर जगह है—नदी में, हवा में, पेड़ों में, तुम्हारे भीतर भी।


पर तुम्हारा ‘मैं’ बहुत बड़ा हो गया है।वह कहता है—मैं सम्राट हूँ, मैं विजेता हूँ, मैं सबसे बड़ा हूँ।जब तक यह ‘मैं’ खड़ा रहेगा, शांति की धूप तुम तक नहीं पहुँचेगी।”

सम्राट चुपचाप सुन रहा था।उसकी आँखें नम हो चली थीं।

फकीर ने फिर कहा—“सबसे बड़ा त्याग राज्य का नहीं, मुकुट का नहीं, सेना का नहीं...सबसे बड़ा त्याग है उस ‘मैं’ का।जिस दिन तुम उसके सामने से हट जाओगे,उसी दिन वह अनंत प्रकाश तुम्हें ढक लेगा।और तब तुम पाओगे कि जिसे तुम जीतने दौड़ रहे थे,वह तो तुममें ही बैठा था।”

नदी बहती रही।सूर्य ढलने लगा।हवा में ठंडक आ गई।

सम्राट ने कुछ नहीं कहा।वह बस धीरे से झुका।न झुकना था किसी फकीर के सामने।झुकना था उस अनंत के सामने, जो पहली बार उसे स्पष्ट दिखाई दे रहा था।

उस दिन उसने कोई युद्ध नहीं लड़ा।कोई किला नहीं जीता।कोई राजा उसके सामने सिर नहीं झुकाया।

फिर भी वह जान गया था—सबसे बड़ी विजय वही है,जिसमें कोई हारा नहीं।सिर्फ ‘मैं’ हारा।

और जब ‘मैं’ हार जाता है,तब जीतने वाला भी वही रह जाता है—और हारने वाला भी वही।

Thursday, December 18, 2025

स्वामित्व

बहुत समय पहले की बात है। एक विस्तृत मैदान के बीच, ऊँची पहाड़ी पर एक विशाल किला खड़ा था। उसकी मोटी पत्थर की दीवारें समय की मार सह चुकी थीं, बुर्ज़ों पर हवा सीटी बजाती थी और दरवाज़ों पर जंग लगी लोहे की कीलें अतीत की गवाही दे रही थीं। उसी किले के सामने दो व्यक्ति आमने-सामने खड़े थे, आँखों में आग और शब्दों में ज़िद।

पहला व्यक्ति ऊँचे स्वर में बोला,
“यह किला मेरे पूर्वजों का है। पीढ़ियों तक हमारे परिवार ने इसकी रक्षा की है। इन दीवारों में मेरे खानदान का पसीना और रक्त मिला है।”

दूसरा व्यक्ति तुरंत पलटकर बोला,
“यह झूठ है। यह किला मेरे पूर्वजों को उपहार में दिया गया था। राजाओं की कृपा से यह हमारे परिवार के पास आया। मैं ही इसका वास्तविक अधिकारी हूँ।”

दोनों की आवाज़ें ऊँची होती चली गईं। तर्क, आरोप और क्रोध आपस में उलझ गए। अंततः मामला राजा के पास  पहुँचा। राजा ने दोनों की बातें धैर्यपूर्वक सुनीं, पर जब उन्होंने प्रमाण माँगे तो दोनों ही चुप हो गए। न कोई दस्तावेज़ था, न कोई शिलालेख, न कोई साक्षी।

राजा कुछ देर सोचते रहे। फिर उन्होंने अपने बुद्धिमान मंत्री की ओर देखा और बोले,
“इस विवाद का कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे इन दोनों को सत्य का बोध हो सके।”

मंत्री ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार की और दोनों व्यक्तियों को अपने साथ ले चले। वे उन्हें नगर की गलियों से होते हुए एक खुले मैदान में ले आए। वहाँ दो छोटे बच्चे आपस में झगड़ रहे थे। उनके बीच ज़मीन पर एक छोटा सा लकड़ी का रथ पड़ा था—खिलौना ही सही, पर बच्चों के लिए वह किसी खजाने से कम नहीं था।

एक बच्चा रोते हुए कह रहा था,
“यह रथ मेरा है, मैंने इसे पहले देखा था।”

दूसरा बच्चा गुस्से में चिल्लाया,
“नहीं, मैंने इसे पहले उठाया था, इसलिए यह मेरा है।”

मंत्री कुछ देर बच्चों की बहस सुनते रहे। फिर मुस्कराकर दोनों वयस्कों की ओर मुड़े और बोले,
“आप इन बच्चों की बात सुन रहे हैं? एक कहता है—पहले देखा, इसलिए मेरा। दूसरा कहता है—पहले पकड़ा, इसलिए मेरा। पर क्या देखने या पकड़ने भर से किसी वस्तु का स्वामित्व सिद्ध हो जाता है?”

दोनों व्यक्ति चुप हो गए।

मंत्री ने आगे कहा,
“आप दोनों भी उसी प्रकार उस किले पर दावा कर रहे हैं। न आपके पास प्रमाण है, न साक्ष्य—केवल कथाएँ और अनुमान। जैसे ये बच्चे बिना ठोस आधार के रथ को अपना बता रहे हैं, वैसे ही आप किले को।”

फिर मंत्री ने किले की ओर देखते हुए गंभीर स्वर में पूछा,
“क्या आपने कभी उस किले से यह जानने का प्रयास किया कि वह किसे अपना स्वामी मानता है? क्या आपने उसकी रक्षा की, उसकी सेवा की, उसके अस्तित्व का भार उठाया? या केवल अधिकार की भाषा में उसे बाँटना चाहते हैं?”

दोनों व्यक्तियों की आँखें झुक गईं। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि स्वामित्व केवल वंश या उपहार की कहानी से नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व, सेवा और प्रमाण से सिद्ध होता है।

मंत्री ने शांत स्वर में निष्कर्ष दिया,
“जिसका अधिकार केवल दावे पर टिका हो, वह रेत पर खड़े महल के समान होता है। सच्चा स्वामी वही है जो भार उठाए, न कि केवल नाम ले।”

यह सुनकर दोनों व्यक्ति निःशब्द लौट गए। किला वहीं खड़ा रहा—मौन, अडिग और साक्षी—मानो कह रहा हो कि वह स्वयं किसी का नहीं, बल्कि समय का है।

Sunday, December 14, 2025

परफेक्टनेस

अदालत में उस दिन कुछ अलग ही माहौल था। वकील साहब पूरे जोश में अपनी दलीलें रख चुके थे। फ़ाइलें बंद हो चुकी थीं, पंखे की आवाज़ भी मानो अचानक तेज़ लगने लगी थी। तभी जज साहब कुर्सी पर थोड़ा आगे झुके। उनके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान तैर रही थी, वैसी मुस्कान जो आमतौर पर फैसले से पहले नहीं आती।

जज साहब बोले,
“काउंसल, कहना पड़ेगा, आपकी दलीलें बिल्कुल परफेक्ट थीं।”

पूरी अदालत में सन्नाटा छा गया। मुवक्किल ने राहत की साँस लेने से पहले ही रोक ली, विपक्षी वकील ने चश्मा ठीक किया, और स्टेनोग्राफ़र ने उँगलियाँ हवा में ही रोक दीं। सबको लगा अब वकील साहब आदतन सिर झुकाकर कहेंगे—“थैंक यू, योर ऑनर।”

लेकिन वकील साहब के चेहरे पर हल्की शरारत चमकी। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“धन्यवाद, योर ऑनर। मगर ये परफेक्टनेस यूँ ही नहीं आया है। ये उन तमाम गलतियों का नतीजा है, जो मैंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में किए थे।”

एक पल को जज साहब भी चौंके, फिर खुद को रोक नहीं पाए। अदालत ठहाकों से गूँज उठी। पेशकार हँसते-हँसते खाँसने लगा, और मुवक्किल पहली बार पूरे केस में दिल खोलकर मुस्कुराया।

जज साहब हँसी दबाते हुए बोले,
“तो मतलब ये कि आपने गलतियाँ भरपूर की हैं।”

वकील साहब ने तुरंत जवाब दिया,
“जी योर ऑनर, इतनी कि अब दूसरों की गलती पहचानने में देर ही नहीं लगती।”

इस पर जज साहब ने हथौड़ा हल्के से मेज़ पर रखते हुए कहा,
“अच्छा है, आपने गलतियों से सीख ली। बस आज आपकी सीख की फीस आपका मुवक्किल न चुकाए, यही उम्मीद है।”

Saturday, December 13, 2025

जय भारत

जलियाँवाला बाग़ कांड के कुछ ही सप्ताह बाद की एक कल्पित संध्या थी।
अमृतसर के बाहर एक पुराने आश्रम में दीपक की मद्धम लौ जल रही थी। बाहर सन्नाटा था, भीतर इतिहास साँस ले रहा था।

भगत सिंह तेज़ क़दमों से आए। आँखों में आग थी, पर आवाज़ में संयम।
सामने चटाई पर बैठे थे मोहनदास करमचंद गांधी—शांत, निर्विकार, जैसे भीतर कोई महासागर ठहरा हो।

भगत सिंह:
बापू, अमृतसर की मिट्टी आज भी गरम है। वहाँ सिर्फ़ लोग नहीं मरे, वहाँ भरोसा मरा है। क्या अहिंसा उन गोलियों को रोक सकती थी?

गांधी:
भगत, गोलियाँ शरीर को मारती हैं, पर हिंसा आत्मा को। मैं उन लाशों को भूल नहीं सकता, पर यदि हम भी वही बन गए जो जनरल डायर था, तो फ़र्क़ क्या रहेगा?

भगत सिंह (कठोर स्वर में):
फ़र्क़ रहेगा, बापू। वह सत्ता के लिए मारा, हम आज़ादी के लिए मारेंगे। उसने डर पैदा किया, हम डर तोड़ेंगे।

गांधी (धीरे मुस्कुराते हुए):
डर टूटता है साहस से, और साहस केवल बंदूक से नहीं आता। क्या तुमने उन माताओं की आँखें देखी हैं, जो अपने बेटों को खो चुकी हैं? वे और लाशें नहीं चाहतीं।

भगत सिंह:
और मैंने उन युवाओं की आँखें देखी हैं, बापू, जिनके भीतर अब सवाल नहीं, ज्वालामुखी है। वे पूछते हैं—कब तक याचना? कब तक प्रार्थना?

गांधी:
प्रार्थना कमज़ोरी नहीं, अनुशासन है। अहिंसा कायरों का हथियार नहीं, वीरों की परीक्षा है।

भगत सिंह (एक पल चुप रहकर):
अगर अहिंसा इतनी ही शक्तिशाली है, तो जलियाँवाला बाग़ क्यों हुआ?

गांधी (आँखें नम):
क्योंकि साम्राज्य भय से चलता है, और भय बहरे होते हैं। पर इतिहास का कान अंततः नैतिकता सुनता है।

भगत सिंह:
इतिहास तब सुनता है जब उसे झकझोरा जाए। बापू, मेरा रास्ता खून से सना हो सकता है, पर उसका अंत भी आज़ादी ही है।

गांधी:
और मेरा रास्ता काँटों से भरा है, पर उसका अंत भी वही है। सवाल रास्ते का नहीं, कीमत का है। तुम अपनी जान दोगे—मैं हज़ारों की जान बचाना चाहता हूँ।

भगत सिंह (नरम पड़ते हुए):
अगर मेरा बलिदान उन हज़ारों को जगाए?

गांधी:
तो वह बलिदान कहलाएगा, प्रतिशोध नहीं। पर याद रखो—क्रांति केवल शासन बदलने का नाम नहीं, मन बदलने का भी है।

भगत सिंह (गहरी साँस लेते हुए):
शायद हम दोनों एक ही पर्वत की दो ढलानों से चढ़ रहे हैं।

गांधी (मुस्कुरा कर):
और शिखर पर तिरंगा फहरेगा, चाहे कदम किसी भी दिशा से आए हों।

दीपक की लौ काँपी। बाहर कहीं मंदिर की घंटी बजी।
दो पीढ़ियाँ, दो रास्ते—पर सपना एक।
जय भारत।

Thursday, November 20, 2025

जाने कैसे ज़िंदगी छोटी हो गई…

जाने कैसे ज़िंदगी छोटी हो गई… और मैं बड़ा, मैं बड़ा हो गया
कल हीं तो था अपने बचपन की वो चौखट, 
सपनों की रोशनी में पलता, खिलता नटखट 
पर आज वही सपने जैसे दूर कहीं परछाईं बन गए,
नज़र के सामने होते हुए भी हाथों से दूर चले गए, 
ना जाने कैसे वक़्त इतना तेज़ चला… किसी तूफ़ान सा बड़ा
इतनी जल्दी मैं कैसे बूढ़ा हो गया…
ना जाने कैसे ज़िंदगी छोटी हो गई…

कल तक जो मैं था — वो अब कहाँ है, कहाँ खो गया है
आईनों में मेरा अक्स भी जैसे कहीं सो गया है
रिश्तों का घर दिल में अब भी वैसे ही बसता है,
कल तक जो मेरे  अपने थे वो  रिश्ते दूर हो गए ,
पुराने रिश्ते नए अजनबियों के सामने मजबूर हो गए 
इतनी बड़ी ज़िंदगी… मैं जानता ही क्या हूँ
अपने ही किस्सों को पहचानता ही क्या हूँ
जाने कब कैसे मै ऊँचा थोड़ा  हो गया 
जज्बात ना जाने कब कैसे मेरी राह का रोड़ा हो गया
मेरे अपने सब  छोटे हो गए  मै बड़ा हो गया 
ना जाने कैसे ज़िंदगी छोटी हो गई
और मैं बड़ा…बड़ा हो गया…

कभी बच्चों की हँसी में था — मेरा घर, मेरी दुनिया, मेरी धड़कन
वो भागते थे मेरी ओर और उनके आने से खिल उठता था मेरा मन
आज वही बच्चे मेरी उम्र की परछाइयों की लिख देते है उत्तर गर मेरी  उम्र करती है कोई सवाल
न जाने कब उनके बचपन की धूप — मेरी झुर्रियों की छाँव बन गई है फिलहाल
वो नन्हे हाथ जो मेरी ऊँगली थामे थे डरे हुए,
आज मेरी थकी साँसों को थामे हैं सहारा बने हुए 
वक़्त की चाल में कुछ ऐसा हुआ…हर लम्हा जैसे अपनी आवाज़ सुनाता है ख़ामोशी गढ़कर
थकने लगा हूँ हर रिश्तों की अनकही आवाजों को  पढ़ पढ़ कर
वक्त तो ठीक हीं है शायद मैं हीं बुरा हो गया  ,
अनुभवों से बड़ा पर खुद पहले से छोटा हो गया
इतनी जल्दी मैं कैसे बूढ़ा हो गया…
ना जाने कैसे ज़िंदगी छोटी हो गई…

एक वक़्त था — मैं कहानी सुनाता था
अब मैं ही एक कहानी बनकर रह गया हूँ
जिन गलियों में मैंने उन्हें चलना सिखाया,
आज वो वही पीढ़ी मुझे पकड़कर आगे बढ़ा रही हैं
कभी कभी सोचता रह जाता हूँ —
काश वक़्त थोड़ा रुक जाए…
काश एक शाम फिर वही बचपन लौट आए…
वो शोर, वो क़हकहे, वो खेल, वो शरारतें…
काश एक बार फिर मैं भी बच्चा बन जाऊँ
बिना किसी मुक़ाम के… बिना किसी सबूत के
बस जिऊँ…जैसे पहले जीता था…
पर वक़्त कहता है — नहीं रुकना है, चलो और थोड़ा
आँखें नम होती हैं, पर क़दम फिर भी आगे बढ़ते हैं
ना जाने कैसे ये सफ़र ढलता गया,
और मैं बस चलता गया… चलता गया…

Monday, November 17, 2025

बात है ऐसी क्यों बहुरानी

 ना जाने किस घाट घुमाया,

पंडित ने क्या पाठ पढ़ाया?
कौन ज्ञान था कैसी घुटी,
सासूजी का दिल भर आया।

दिल भर आया बोली रानी,
तुझको है एक बात बतानी।
क्यों सहमी सी डरती रहती,
बात है ऐसी क्यों बहुरानी?

ससुराल भी नैहर जैसा,
फिर तेरे मन ये डर कैसा?
मेरा तो कुछ दिन का डेरा,
ये घर तो तेरे घर जैसा।

पंडित जी सच ही कहते हैं,
जो बहू को बेटी कहते हैं।
वहीं स्वर्ग है इस धरती पे,
वहीं स्वर्ग से सुख मिलते हैं।

तुझको बस इतना ही कहना,
तू ही तो मेरे दिल का गहना।
जो इच्छा हो मुझे बताओ,
बहुरानी बेटी बन जाओ।

सासू मां की बात जान के,
उनके मन के राज जान के।
बहुरानी समझी घर अपना,
बोली उनको मां मान के।

अम्माजी ना मुझे जगाएँ,
बिस्तर से ना मुझे उठाएँ।
नींद घोर सुबहो आती है,
बिना बात के ना चिल्लाएँ।

मैं जब नैहर में रहती थी,
मम्मी से सब कह देती थी।
उठकर मम्मी चाय पिलाती,
पैर दर्द तब पैर दबाती।

बोली अम्मा चाय बनाओ,
सूत उठकर मुझे पिलाओ।
जब सर थोड़ा भारी लगता,
हौले हौले उसे दबाओ।

पैसा रखा बचा बचा के,
पापाजी से छुपा छुपा के।
बनवा दो मुझको तुम गहना,
अम्माजी इतना ही कहना।

अम्माजी थोड़ी सकपकाईं,
थोड़ी मुस्काईं, गला खँखाराईं।
बोली बेटी पंडित बोले,
बोले पर सब बात न ठोले।

बेटी तुम हो, ये भी माना,
पर घर कोई होटल न खाना।
थोड़ी बहू, थोड़ी बेटी,
और थोड़ा घर का कर्तव्य भी।

नैहर जैसा अधिकार मिलेगा,
पर थोड़ा श्रम का प्यार मिलेगा।
काम बाँट लो घर के संग तुम,
फिर हर दिन त्योहार मिलेगा।

बहू बोली — ठीक है अम्मा,
पहले दो काजू की अम्मा।
खीर बनाऊँगी, पर पहले मैं,
मोतीचूर लड्डू खाऊँगी अम्मा।

अम्माजी ने माथा पीटा,
लगता है भाग्य में लिखा जीता।
इतनी प्यारी बेटी पाई,
पर किस पुण्य से या किस पीड़ा?

तभी पधारे पापाजी हँसकर,
बोले — आज क्या चाल चली बहू ने घर भर?
अम्मा बोली — बेटी है ये,
बहू नहीं अब बेटी है ये।

पापाजी बोले — बेटी तो ठीक,
पर बेटी थोड़ी सी काम भी सीख।
नहीं तो बेटा दफ्तर से आएगा,
मैगी खाकर सो जाएगा।

बहू बोली — ठीक है बाबा,
आज से सीखूँ सबका नज़ारा।
बनाऊँगी खाना, माँजूँगी बर्तन,
पर पहले चाहिए एक कार अब्बल।

अम्मा–बाबा दोनों घबराए,
घर में बिजली बादल आए।
बोलीं — पंडित जी कल ही बुलाओ,
और ‘बहू अध्याय’ उल्टा हटाओ

Saturday, November 15, 2025

पलायन

पटना के सबसे चकाचक न्यूज़ चैनल “गरम बहस लाइव” पर आज स्टूडियो में कुर्सियों से ज्यादा माइक्रोफोन लगे थे। होस्ट अपनी मशहूर गरजती आवाज़ में चीखता हुआ बोला —

“आज का ज्वलंत सवाल! क्या बिहार में पलायन समस्या है या वरदान? पैनल से मिलिए!”

पहली स्क्रीन पर दुबई से जुड़ते हैं रंजीत कुमार, जो पिछले पाँच सालों से कॉल सेंटर में काम करता है, लेकिन अपने इंस्टाग्राम बायो में proudly लिखता है — Global Corporate Executive (Night Shift).

दूसरी स्क्रीन पर मेलबर्न से गुड्डू पासवान जुड़े हैं, जिनकी नौकरी पूछो तो जवाब मिलता — “By profession Plumber, by attitude Australian.”

तीसरी स्क्रीन पर पंजाब से मनोज सिंह, जो खुद कहते हैं —“मैं परदेश गया नहीं, पंजाब ही बिहार के पास आ गया था।”

और स्टूडियो में आमने-सामने बैठाए गए मेहमान —
कर्नाटक से रवि
गुजरात से प्रवीण
महाराष्ट्र से भावना
और UP से पंडित जी (जो हर राज्य विषय में अपनी राय रखने का constitutional अधिकार रखते हैं।)

बहस शुरू होते ही रवि बोले —“बिहार में लोग बाहर क्यों भाग जाते हैं? क्या वहां रह नहीं सकते?”

गुड्डू ने मेलबर्न से चश्मा सीधा किया —“रह सकते थे भाई, पर फिर मेलबर्न में भोजपुरी वाला ठाठ कौन लाता? हम नहीं आते तो ऑस्ट्रेलिया को IPL, भांगड़ा और बॉलीवुड का अंतर कैसे समझ आता?”

प्रवीण ने हल्का सा तंज कसा —“हम गुजरात में बिजनेस फैलाते हैं, तुम लोग बस पलायन फैलाते हो।”

तभी मनोज ने मेज पर हल्की चोट मारी —“प्रवीण भाई, वही पलायन किए बिहारी लोग हैं जो आपकी कंपनियाँ चला रहे हैं। हम नहीं जाएँगे तो गुजरात में इंजीनियर ढूँढने की टेंडर निकालनी पड़ेगी।”

पूरे स्टूडियो में हँसी दब गई, मगर बहस गरम होती गई।

भवना बोली —“लेकिन फैमिली से दूर रहना इमोशनली मुश्किल नहीं होता?”

रंजीत ने दुबई से जवाब दिया —“पहले हम पापा की बात घर में नहीं सुनते थे, आज रोज वीडियो कॉल पर पूछते हैं —‘पापा, दाल चावल खाया कि नहीं? ठंडा पानी मत पीजिएगा।’इमोशनल कनेक्शन और कहाँ मिलता है? पलायन न होता तो ये प्यार कभी activate नहीं होता।”

यही समय था जब UP वाले पंडित जी कूद पड़े —“लेकिन पलायन से बिहार का विकास रुक जाता है!”

गुड्डू ने तुरंत काउंटर फेंका —“अगर हम सब बिहार में ही रुक जाएँ तो —दिल्ली के पीजी में रहेगा कौन?गुड़गाँव में 3 बजे रात को ‘भैया U टर्न मारीए’ कौन बोलेगा?IAS टॉपरों की लिस्ट में नाम कौन भरेगा?और विदेशी को क्रिएटिव इंग्लिश एक्सेंट में ‘हे ब्रदर नो टेंशन’ सिखाएगा कौन?”

स्टूडियो तालियों और हँसी से गूँज गया।

होस्ट गला फाड़ते हुए बोला —“मतलब आप पलायन को वरदान मानते हैं?”

मनोज मुस्कुराए —“देखिए, बिहार में ना पलायन है, ना migration है… यह National Human Resource Distribution Policy है। हम लोग देश और दुनिया में भेजे गए skilled ambassadors हैं। दूसरों के बच्चे GPS पर जगह ढूँढते हैं, बिहारी बच्चे GPS को जगह सिखा देते हैं — ‘देख ले, घर पटना से दाहिने मुड़के ही शुरू होता है।’”

रंजीत दुबई वाली स्क्रीन से जोड़ा —“और जब हम वापस घर आते हैं ना — तो गाँव में एंट्री ही बॉलीवुड हीरो वाली होती है। माँ घोषणा करती है — बेटा दुबई वाला आ गया!छोटे बच्चों को प्रेरणा मिलती है, बुजुर्गों को उम्मीद मिलती है, और दुकानदारों को उधारी मिलती है।”

होस्ट ने अंतिम सवाल दागा —“तो आपका अंतिम बयान?”

गुड्डू ने मॉर्निंग सनग्लासेस पहनते हुए कहा —“आप बोलिए पलायन समस्या है… हम कहेंगे वरदान है। क्योंकि दुनिया में जहाँ जहाँ बिहारी पहुँचा — वहाँ वहाँ बिहार भी पहुँच गया।”

मनोज ने जोड़ दिया —“पलायन ने बिहार को ग्लोबल बनाया है, परिवार को इमोशनल बनाया है और इंडिया को वर्किंग बनाया है। हम जहाँ भी जाते हैं — ट्रैवल बैग भले बदल जाता है, दिल हमेशा गाँव वाला रहता है।”

और तभी अचानक भारत-ऑस्ट्रेलिया वीडियो कॉल पर गुड्डू की माँ आ गई —“बाबू, खाना खा लेना। और ठंडा पानी मत पीना।”

पूरी बहस खड़ी हँसी में बदल गई।

कैमरामैन ने होस्ट से धीमे में बोला —“सर, आज के TRP सेट है — दर्शक हँसते भी हैं और सीखते भी।”

स्क्रीन पर हेडलाइन चमकी —“बिहार में पलायन — संकट नहीं, सुपरपावर!”

और कहानी यहीं खत्म होती है…क्योंकि बहस ख़त्म होने के बाद NRI पैनल के सारे बिहारी —
व्हाट्सऐप फैमिली ग्रुप में फोटो भेजने चले गए:“स्टूडियो में थे… माँ टीवी पे देखना!”

Sunday, November 9, 2025

खेतवा में रोएली जनानवा


गरीब के कहानी लिखे में आँख से लोर बह जाला,

दूख के जिनगी देख के सांचो नु करेज फट जाला ।

आशावादी कहे भगवान बारे कि नईखन

गरीब के देख के इहे प्रश्न बन जाला ।।

 

खेतवा में रोएली जनानवा ए मएनवाकहाँ गईले ना ।

हमार आँखि के रतनवा कहाँ गईले ना ॥

 

पूछला पर मालूम भईलघर के गरीब हई,

मरद हरवाह हटे बड़ा बदनसीब हई ।

बारी जनमवले उ तीन गो लईकवा,

तरसेलेसन अन्नअ खातिर उ बालाकावा ॥

बाटे टूटल फूस के मकानवा ए मएनवादुख वे में ना

बीते जिनगी दिनवा दुखवे में ना ॥ 

हमार आँखि के रतनवा कहाँ गईले ना ॥

 

घरवा में पड़ल रहे मरद बेरमिया,

दउवा ना उधार करे डाक्टर हरमिया ।

मालिक से कर्जा लेक दवा-दारु कईली,

मरत संवागवा के प्राणवा बचवली।

पथअ खातिर रहे नाहीं अन्नवा ए मएनवा ।

बरसे झर-झर नएनवासावन अईसन ना ॥ 

हमार आँखि के रतनवा कहाँ गईले ना ॥

 

अनअ बिना घरवा में बनेना भोजनवा,

खाये खातिर बिलखत रलेसन ललनवा ।

ओकनी के आपन कलेजा से सटवली,

सुसुकत लईकवन के रोवत समझवली ।

होत भोरे करब कटनिया ए मएनवा

तोह के देहब हम भोजनवाकरेजवा सुनु ना ।। 

हमार आँखि के रतनवा कहाँ गईले ना ॥

 

खईला बिना छतिया में दूधवो ना आवे,

गोदी के बालकवा उ सूखले चबावे ।

फाटि जाइत छतिया त खूनवे पियवतीं,

बिलखत मएनवा के भूखवा मिटइतीं।।

इहे करे धनिया के मनवा ए मएनवापूरा होखे ना ।

कभी मनआ के सपनवापूरा होखे ना ।। 

हमार आँखि के रतनवा कहाँ गईले ना ॥

 

बगिया में कोईल जब कुहू कुहु करेला,

चिड़ई चुड़ूंगवन के चह-चह होखेला ।

बीस दिन के बालका के गोदिया उठवली,

काटे खातिर गेहुआँ के खेतवा में गईली ।

पेट खातिर सुख बा सपनवा ए मएनवादेहिआ में ना ।

नईखे एक बूद खूनवादेहिआ में ना ॥ 

हमार आँखि के रतनवा कहाँ गईले ना ॥

 

बुंदा- बूंदी होखे कभी बहेला पवनवा,

धनिया के दूख देखि रोवे आसमानवा ।

खेतवा के एक ओर लईको सुतवली,

फाटल गमछिया के देह पर ओढ़वली ।

काटे लगली गेहुआँ के थानवा ए मएनवाकामवे पर ना ।

रहे धनिया के धेयानवा कामवे पर ना ॥ 

हमार आँखि के रतनवा कहाँ गईले ना ॥

 

एहि बीचे जोर से बालकवा चिहुँकलस,

सोचली कि बाबू नींदवे में सपनईलस ।

काटे लगली गेहुँआ त गोदिया उठावे,

गईली लईकवा के दूधवा पियावे ।

करे लगली जोर से रोदनवा ए मएनवासियरा लेलस ना ।

हमारे बाबू के परानवासियरा लेलस ना। 

हमार आँखि के रतनवा कहाँ गईले ना ॥

 

रोअल सुनि गँउआ के लोग सब जुटल,

श्रीनाथ आशावादी छाती सभे पीटल ।

देणवा में बड़कन लोगवा के राज बा,

मिहनत करे वाला इहाँ मुँहताज वा ।

इहे ह आजाद हिन्दुस्तानवा ए मएनवागरीबवन के ना ।

नईले केह भगवानवा गरीबवन के ना । 

हमार आँखि के रतनवा कहाँ गईले ना ॥


Saturday, November 8, 2025

जइसे चंदा के संगे चंदनिया रे

 चले साजन के साथ दुलह्विनिया रे

चले साजन के साथे दुलहिनिया रे ।

जइसे चंदा के संगे चंदनिया रे ॥


 सुन्दर चेहरा इ कमल के बा फूलवा बनल,

आँख दीखे जइसे फूलबा पर भौरा बइ ठल ।

चमके चाँद अइसन सोना के नथुनिया रे। 

चले साजन के साथ दुलह्विनिया रे

चले साजन के साथे दुलहिनिया रे ।

जइसे चंदा के संगे चंदनिया रे ॥


दुनू सेव अइसन दौखेला लाल गालवा,

नाक सुगवा इ देखि के लुभाय जाला।

काला केश ज इसे काली नगीनिया रे । 

चले साजन के साथ दुलह्विनिया रे

चले साजन के साथे दुलहिनिया रे ।

जइसे चंदा के संगे चंदनिया रे ॥


गरदन हवे कपोत कंठ कोईलिया,

दाँत चमक ता जइसे ह बिजुरिया ।

गाल लजाईल जइसे अंजनिया रे,

कजरारी आँख में झलके जादू गरिया रे। 

महके रजनीगंधा से बथनिया  रे। 

चले साजन के साथ दुलह्विनिया रे

चले साजन के साथे दुलहिनिया रे ।

जइसे चंदा के संगे चंदनिया रे ॥


ओठ ललना जइसे रस से भरल,

बोली पियरी जइसे गागरिया छलकल।

साजन के नयनवा में परल जादू,

एगो निगाह में बान चलल सादू। 

सभी देख खुश घर मचनिया रे । 


दुनू सेव अइसन लाल लाल गालवा,

नाक सुगवा देखि सब भइल बेहालवा।

काला केसवा जैसे रात के घटरिया,

उहे सजा के चलली फूलन के बगरिया। 

इहे बा भैया भउजी प्रेम  कहानिया रे । 

चले साजन के साथ दुलह्विनिया रे

चले साजन के साथे दुलहिनिया रे ।

जइसे चंदा के संगे चंदनिया रे ॥

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