जाने कैसे ज़िंदगी छोटी हो गई… और मैं बड़ा, मैं बड़ा हो गया
कल हीं तो था अपने बचपन की वो चौखट,
सपनों की रोशनी में पलता, खिलता नटखट
पर आज वही सपने जैसे दूर कहीं परछाईं बन गए,
नज़र के सामने होते हुए भी हाथों से दूर चले गए,
ना जाने कैसे वक़्त इतना तेज़ चला… किसी तूफ़ान सा बड़ा
इतनी जल्दी मैं कैसे बूढ़ा हो गया…
ना जाने कैसे ज़िंदगी छोटी हो गई…
कल तक जो मैं था — वो अब कहाँ है, कहाँ खो गया है
आईनों में मेरा अक्स भी जैसे कहीं सो गया है
रिश्तों का घर दिल में अब भी वैसे ही बसता है,
कल तक जो मेरे अपने थे वो रिश्ते दूर हो गए ,
पुराने रिश्ते नए अजनबियों के सामने मजबूर हो गए
इतनी बड़ी ज़िंदगी… मैं जानता ही क्या हूँ
अपने ही किस्सों को पहचानता ही क्या हूँ
जाने कब कैसे मै ऊँचा थोड़ा हो गया
जज्बात ना जाने कब कैसे मेरी राह का रोड़ा हो गया
मेरे अपने सब छोटे हो गए मै बड़ा हो गया
ना जाने कैसे ज़िंदगी छोटी हो गई
और मैं बड़ा…बड़ा हो गया…
कभी बच्चों की हँसी में था — मेरा घर, मेरी दुनिया, मेरी धड़कन
वो भागते थे मेरी ओर और उनके आने से खिल उठता था मेरा मन
आज वही बच्चे मेरी उम्र की परछाइयों की लिख देते है उत्तर गर मेरी उम्र करती है कोई सवाल
न जाने कब उनके बचपन की धूप — मेरी झुर्रियों की छाँव बन गई है फिलहाल
वो नन्हे हाथ जो मेरी ऊँगली थामे थे डरे हुए,
आज मेरी थकी साँसों को थामे हैं सहारा बने हुए
वक़्त की चाल में कुछ ऐसा हुआ…हर लम्हा जैसे अपनी आवाज़ सुनाता है ख़ामोशी गढ़कर
थकने लगा हूँ हर रिश्तों की अनकही आवाजों को पढ़ पढ़ कर
वक्त तो ठीक हीं है शायद मैं हीं बुरा हो गया ,
अनुभवों से बड़ा पर खुद पहले से छोटा हो गया
इतनी जल्दी मैं कैसे बूढ़ा हो गया…
ना जाने कैसे ज़िंदगी छोटी हो गई…
एक वक़्त था — मैं कहानी सुनाता था
अब मैं ही एक कहानी बनकर रह गया हूँ
जिन गलियों में मैंने उन्हें चलना सिखाया,
आज वो वही पीढ़ी मुझे पकड़कर आगे बढ़ा रही हैं
कभी कभी सोचता रह जाता हूँ —
काश वक़्त थोड़ा रुक जाए…
काश एक शाम फिर वही बचपन लौट आए…
वो शोर, वो क़हकहे, वो खेल, वो शरारतें…
काश एक बार फिर मैं भी बच्चा बन जाऊँ
बिना किसी मुक़ाम के… बिना किसी सबूत के
बस जिऊँ…जैसे पहले जीता था…
पर वक़्त कहता है — नहीं रुकना है, चलो और थोड़ा
आँखें नम होती हैं, पर क़दम फिर भी आगे बढ़ते हैं
ना जाने कैसे ये सफ़र ढलता गया,
और मैं बस चलता गया… चलता गया…
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