Wednesday, December 31, 2025

ओहदा

 शाम तक फाइलों में व्यस्त रहने के बाद शुक्ला जी ने अपने क्लर्क से आगामी सप्ताह आने वाली फाइलों के बारे में पूछताछ की। क्लर्क ने सारी फाइलों की डिटेल शुक्ला जी को बता दी। कुछ फाइलें हाई कोर्ट की थी तो कुछ फाइलें डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की थीं।

पास हीं बैठे उनके सहयोगी गुप्ता जी ने हाई कोर्ट में आने वाली फाइल के बारे में पूछा तो क्लर्क उस वकील का नाम बता दिया जो उस फाइल को हैंडल करने वाले थे। गुप्ता जी ने पूछा कि उस फाइल के बारे में तो मुझसे बात की गई थी। फिर किसी और को फाइल क्यों पकड़ा दिया गया?क्लर्क ने शुक्ला जी की तरफ इशारा कर दिया।

शुक्ला जी ने कहा; गुप्ता जी आपको तो पता हीं है, काफी काम करना है इस फ़ाइल में। आपने कोई रुचि नहीं दिखाई सो मैंने फाइल किसी और को दे दिया है।

गुप्ता जी ने कहा; अरे भाई रुचि दिखाई या ना दिखाई , क्या फर्क पड़ता है? फाइल तो लाकर मुझे दे देते। फिर मैं निश्चय करता कि मुझे केस को करना है या नहीं।

गुप्ता जी इन बातों ने शुक्ला जी के अहम को चोटिल कर दिया। उन्होंने चुभती हुई आवाज में कहा;गुप्ता जी आपने मुझे क्लर्क समझ रखा है क्या जो फ़ाइलों को ढोता फिरूँ?आपको रुचि थी तो फाइल खुद हीं मंगवा लेते।

शुक्ला जी को इस बात का ध्यान नहीं रहा कि अनजाने में उनके द्वारा दिये गए जवाब का असर किसपे किसपे हो सकता है। उनके क्लर्क को ये बात चुभ गई। उसने गुप्ता जी से पूछा; सर क्या क्लर्क का काम केवल फाइल ढ़ोना हीं होता है क्या? क्या क्लर्क मंद बुद्धि के हीं होते हैं?

शुक्ला जी उसकी बात समझ गए। उन्होंने बताया; नहीं ऐसी बात बिल्कुल नहीं है। क्लर्क काफी महत्वपूर्ण हैं किसी भी वकील के लिये। ऐसा नहीं है कि क्लर्क कम बुद्धिमत्ता वाले हीं होते हैं। उन्होंने बहुत सारे उदाहरण दिये जहाँ क्लर्क अपने मेहनत के बल पर जज और वकील बन गए।

शुक्ला जी ने आगे बताया ;केवल ओहदा काफी नही है किसी के लिए। किसी ने वकील की डिग्री ले ली है इसका ये मतलब नहीं कि वो वकील का काम करने में भी सक्षम हो। बहुत सारे वकील मिल जाएंगे जो आजीवन क्लरिकल जॉब हीं करते रहे गए, और बहुत सारे ऐसे क्लर्क भी मिल जाएंगे तो वकीलों से भी ज्यादा काम कर लेते हैं।

केवल डिग्री या पद काफी नहीं है पदानुसार सम्मान प्राप्त करने के लिए। सम्मान कमाना पड़ता है। एक विशेष पदवी पर आसीन व्यक्ति के पास उसी तरह की योग्यता या बुद्धिमता हो ये कोई जरूरी । बुद्धिमता तो सतत अभ्यास मांगती है। इसे लगातार कोशिश करके अर्जित करना पड़ता है।

महाभारत के समय सारथी को नीची दृष्टि से देखा जाता था। महारथी कर्ण को जीवन भर सूतपुत्र कहकर अपमानित किया जाता रहा। परंतु जब भगवान श्रीकृष्ण ने सारथी का काम किया तो उनकी गरिमा का क्षय नहीं हुआ बल्कि सारथी का पद हीं ऊंचा हो गया।

अल्बर्ट आइंस्टीन भी ऑफिस में किसी बड़े पोस्ट पर नही थे। उनका जॉब भी क्लरिकल हीं था। परंतु विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने कितनी ऊंचाई प्राप्त की ये सब जानते हैं। आजकल अल्बर्ट आइंस्टीन को महान वैज्ञानिक के रूप में हीं जाना जाता है न कि इस बात के लिए की वो किस प्रकार का जॉब किया करते थे।

अनजाने में शुक्ला जी के मुख से जो बात निकल गई थी उसकी भरपाई करने की शुक्ला जी ने काफी कोशिश की। शुक्ला जी की कोशिश रंग ला रही थी। उनके क्लर्क के चेहरे पर शांति की मुस्कान प्रतिफलित होने लगी थी।

बेईमानी का नमक

 अरोड़ा साहब का कपड़ों के इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का दिल्ली में बहुत बड़ा कारोबार था। अक्सर वो चीन के व्यापारियों से संपर्क करके उनसे कपड़ों के एक्सपोर्ट का आर्डर लेते, फिर अपनी फैक्ट्री में कपड़ों को बनवा कर चीन भेज देते। इस काम में अरोड़ा साहब को बहुत मुनाफा होता था। उनकी इंपोर्ट और एक्सपोर्ट डिपार्टमेंट में बहुत बड़ी पहुंच थी। अरोड़ा साहब इस बात का बराबर ख्याल रखते कि दिवाली या नए वर्ष के समय एक्सपोर्ट डिपार्टमेंट के सरकारी कर्मचारियों के पास बख्शीश समय पर पहुंच जाए। ये अरोड़ा साहब की दिलदारी का ही प्रभाव था कि उनके एक कॉल के आते ही सरकारी कर्मचारी उनकी फाइल को आगे बढ़ा देते थे। इस कारण से अरोड़ा साहब अपने बिजनेस में काफी आगे निकल गए। उनके आगे बढ़ने में कुछ विश्वस्त कर्मचारियों का भी बहुत बड़ा योगदान था। उनका मैनेजर नीरज और क्लर्क सुभाष उनके प्रति बहुत ही वफादार थे। अरोड़ा साहब भी अपने मैनेजर नीरज और अपने क्लर्क सुभाष पर बहुत विश्वास करते थे।

यह बात जगजाहिर है कि जब भी कोई व्यापारी अपने व्यापार में आगे बढ़ना चाहता है कुछ गैर कानूनी तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ता है। अरोड़ा साहब की प्रगति से यह बात तो बिल्कुल साफ थी कि अरोड़ा साहब भी कुछ गैर कानूनी तौर तरीकों का इस्तेमाल करते थे। इंपोर्ट एक्सपोर्ट डिपार्टमेंट में इस बात का बराबर ध्यान रखा जाता था कि किसी एक व्यापारी की धाक न चले। सरकार की तरफ से इस बात का दिशा निर्देश दिया जाता था कि सारे व्यापारियों को बराबर का मौका मिले। इधर अरोड़ा साहब अपनी पहुंच का इस्तेमाल अपनी सारी फाइलों को आगे बढ़ाने में बराबर कर रहे थे। जब भी उनकी एक फाइल आगे बढ़ जाती तो अपनी बाकी और फाइलों को अपनी आगे बढ़ी हुई फाइल के साथ लगवा देते। इस तरीके से एक ही बार में बहुत सारा काम करवा लेते।

अपनी इस तरह की क्रिया-पद्धति का इस्तेमाल करते हुए और अरोड़ा साहब ने अपने बिजनेस को बहुत ज्यादा फैला लिया। इसका नतीजा यह हुआ कि कपड़ों के व्यवसाय में उनके जितने भी प्रतिस्पर्धी थे उनको अरोड़ा साहब से जलन होने लगी। अरोड़ा साहब के प्रतिस्पर्धीयों ने एक्सपोर्ट इम्पोर्ट डिपार्टमेंट में कंप्लेंट कर दिया। अरोड़ा साहब के प्रतिस्पर्धीयों ने यह तर्क दिया कि एक बार में 10-12 फाइलें इकट्ठे आगे कराकर अरोड़ा साहब गैरकानूनी काम कर रहे हैं। साहब के लिए मुश्किल की घड़ी आ गई। किसी ने अरोड़ा साहब को बताया कि कोई एक सरकारी नोटिफिकेशन है जिसके हिसाब से यदि कोई संबंधित फाइलें हैं तो उन सारी संबंधित फाइलों को इकट्ठे लगाया जा सकता है। लेकिन मुश्किल बात यह थी कि वह नोटिफिकेशन लगभग 15 साल पहले आई थी।वो कब आई थी इसका पता लगाना मुश्किल था। अरोड़ा साहब के लिए उस नोटिफिकेशन का मिलना बहुत जरूरी था, लेकिन ये काम था बहुत कठिन। खैर इस काम को किसी भी हाल में होना ही था। अरोड़ा साहब को नीरज और सुभाष पर बहुत भरोसा था। उन्होंने अपने इस काम के लिए अपने मैनेजर नीरज और अपने क्लर्क सुभाष को लगाया। अरोड़ा साहब ने उन दोनों को काफी हिदायत दी यह बात किसी को भी मालूम नहीं चलनी चाहिए।

ये नीरज और सुभाष के लिए भी परीक्षा की घड़ी थी। सवाल ये था कि काम की शुरुआत कैसे की जाए? वह नोटिफिकेशन जो कि लगभग 15 साल पहले आया था, उसके बारे में तहकीकात कैसे की जाए? उन दोनों ने दिमाग लगाया। सबसे पहले रिकॉर्ड रूम जाकर जितनी फाइलें सरकारी डिपार्टमेंट में थी , उसकी तहकीकात शुरू करनी चाहिए। नीरज में जाकर रिकॉर्ड रूम के इंचार्ज से उस नोटिफिकेशन के बारे में पूछा। रिकॉर्ड रूम के इंचार्ज ने कहा कि तकरीबन 7 साल पहले की सारी फाइलें और नोटिफिकेशन यहां से हटा दी जाती हैं। रिकॉर्ड रूम के इंचार्ज अहमद ने कहा कि आप जाकर फाइलिंग डिपार्टमेंट में पता कीजिए वहां पर हो सकता है कि आप तो कोई जानकारी मिल सके।

नीरज के पास कोई और उपाय नहीं था। वह फाइलिंग डिपार्टमेंट में गया। वहां जाने पर पता चला कि फाइलिंग डिपार्टमेंट का इंचार्ज अभी तक आया नहीं है। तकरीबन दिन के 11:30 बज गए थे और उस समय भी फाइलिंग डिपार्टमेंट का इंचार्ज नहीं आया था। सुभाष ने कहा; साहब इस डिपार्टमेंट का हाल भी हमारे ऑफिस के महेश जैसा है। नीरज भी हंसने लगा। उसके ऑफिस में महेश कभी भी 11:00 बजे से पहले नहीं आता था। नीरज ने खिसियाती हुई हंसी में कहा ; भाई महेश जैसे आदमी केवल हमारे ऑफिस में ही नहीं बल्कि हर जगह है। कामचोर लोगों की कोई कमी नहीं है। खैर अब काम आगे कैसे किया जाए?

सुभाष ने नीरज को सलाह दी कि फाइलिंग डिपार्टमेंट के किसी और क्लर्क से बातचीत की जाए। उन दोनों के पास कोई और उपाय नहीं था। वह दोनों फाइलिंग डिपार्टमेंट में दूसरे क्लर्क के पास गए और अपनी समस्या के बारे में बताया। उस क्लर्क ने कहा कि आप जो भी समस्या लेकर आए हैं उसका समाधान तो फाइलिंग डिपार्टमेंट में नहीं है। आपको लिस्टिंग डिपार्टमेंट में जाना चाहिए।

नीरज और सुभाष के सामने आशा की किरणें क्षीण होती जा रही थी। वह दोनों लिस्टिंग डिपार्टमेंट में गए। वहां पर जाकर तकरीबन 15 साल पहले आए नोटिफिकेशन के बारे में पूछताछ की। वहां पर उन लोगों को यह ज्ञात हुआ कि रिकॉर्ड डिपार्टमेंट में ही आदिल नाम का बहुत पुराना मुलाजिम रहता है। वह आदिल ही उनकी सहायता कर सकता है।

दोनों वापस फिर रिकॉर्ड रूम में गए। उस रिकॉर्ड रूम में फाइलों के ढेर के पीछे आदिल मिला। आदिल से उन लोगों ने तकरीबन 15 साल पहले नोटिफिकेशन के बारे में पूछा। आदिल ने कहा कि वह यहां पर लगभग 12 साल से है। इस कारण से वह उन फाइलों के बारे में तो नहीं बता सकता है। हाँ इतना तो जरूर बता सकता है कि वह फाइलें लिस्टिंग ब्रांच में ही हो सकती है। आदिल ने बताया कि लिस्टिंग ब्रांच में ही इंटरनेट का नया ब्रांच खुला है। इंटरनेट ब्रांच में जितनी भी बंद हो चुकी फ़ाइलें हैं ,उनका साइबर रिकॉर्ड मौजूद है।

दोनों के सामने आशा की किरणें दिखाई पड़ने लगी। दोनों जाकर लिस्टिंग ब्रांच के साइबर सेल के बारे में तहकीकात करने लगे। साइबर सेल का ब्रांच दूसरी बिल्डिंग में था। सुभाष को रास्ता पता था। सुभाष के पीछे पीछे नीरज चलने लगा। वहां पर जाकर गेटकीपर ने बताया कि साइबर सेल तीसरी मंजिल पर है। नीरज जाकर तीसरी मंजिल पर साइबर सेल के बारे में पता किया, वहां पर ज्ञात हुआ कि वह दूसरी मंजिल पर है। नीरज और सुभाष काफी चिढ़ गए थे। खैर जब दोनों दूसरी मंजिल पर गए और साइबर सेल के बारे में तहकीकात की तो वहां पर एक महिला कर्मचारी मिली। उस महिला ने दुपट्टे नहीं डाल रखे थे। उसके कपड़ों के नीचे से उसका सारा बदन दिख रहा था।उस महिला कर्मचारी ने नीरज और सुभाष को बताया कि तीसरी मंजिल पर ही पिछले साइड में छोटा सा साइबर सेल खुला है आप वहां जाकर तहकीकात कर सकते हैं। नीरज और सुभाष को ऐसा लगने लगा था कि शायद उन्हें वह नोटिफिकेशन मिल नहीं पाएगा। उस पर से उस महिला कर्मचारी की निर्लज्जता ने दोनों को और परेशान कर दिया। पता नहीं क्यों इन सरकारी डिपार्टमेंट में कोड ऑफ ड्रेस नहीं हैं। इस तरह तो मर्दों के ध्यान काम पर क्या खाक लगेगा? वो तो इन मैडम लोगों को निहारने में हीं लगे रहेंगे। सुभाष भी खिन्न हो चुका था। उसने खीजते हुए कहा, हम इतनी कोशिश कर रहें हैं फिर भी कुछ पता नहीं चल पा रहा है। किस तरह का डिपार्टमेंट है ये?किसी को ठीक से पता हीं नहीं है नोटिफिकेशन के बारे में? सारे के सारे लोगों का ध्यान तो बदन दिखाने और बदन निहारने में हीं लगा हुआ है। काम पे ध्यान क्या खाक लगेगा। पता नहीं किसी को नोटिफिकेशन के बारे जानकारी है भी या नहीं ? हताश हुए सुभाष को ढांढस बढ़ाते हुए नीरज ने कहा, कोई बात नहीं, हमारे हाथ में तो कर्म ही हैं। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश ही कर सकते हैं। इतनी कोशिश कर ली, तो चल के बाहर ऊपर भी देख लेते हैं।

जब नीरज और सुभाष तीसरी मंजिल की पिछली साइड में गए तो वहाँ दरवाजे बंद मिले। निराशा के बादल दोनों के सामने छाने लगे। दोनों लौट हीं रहे थे कि सुभाष के जान पहचान का कोई दूसरा क्लर्क मिला ।उसने बताया कि अभी 3 दिन पहले यह डिपार्टमेंट यहां से हटकर छठी मंजिल पर चला गया है। आप दोनों को वहां जाना पड़ेगा।

नीरज और सुभाष काफी थक गए थे। दोनों ने नीचे आकर गर्म गरम चाय पी फिर छठी मंजिल पर गए। छथि मंजिल पे एक छोटा सा कमरा था और उस कमरे में एक पुरुष और 2 महिला कर्मचारी मिले। नीरज ने उनसे नोटिफिकेशन के बारे में पूछा तो उन लोगों ने बताया आप बिल्कुल ठीक जगह आए हैं ।लेकिन यहाँ पे सारे के सारे रिकॉर्ड हैं कहां? सारी फाइलों को लाइब्रेरी भेज दिया है।

इतनी ज्यादा दौड़ धूप से नीरज और सुभाष परेशान हो चुके थे। उन्होंने नीचे आकर फिर गरमा गरम चाय पी, समोसा खाया, और पहुंच गए लाइब्रेरी में ।वहाँ पे दोनों नोटिफिकेशन के बारे में पता कर पता करने लगे। जब लाइब्रेरियन से नोटिफिकेशन के बारे में पूछा तो वहां बताया गया कि जितने भी पुराने नोटिफिकेशन है उसका प्रिंट आउट अब यहां से हटा दिया गया है और वो सारे के सारे प्रिंट आउट नई ब्रांच के कंप्यूटर सेल में मिलेंगे।

नीरज और सुभाष दोनो को गुस्सा आने लगा। पता नहीं ये किसने अरोड़ा साहब को नोटिफिकेशन के बारे में बता दिया। नोटिफिकेशन तो जैसे सुरसा का मुँह हो गया था। खत्म होने का नाम हीं नहीं ले रहा था। इधर इतनी दौड़ धूप से परेशान सुभाष ने कहा, अब रहने देते है, कल कोशिश करेंगे। नीरज ने झिड़क कर कहा, नहीं चलो अभी। सुभाष आराम करने लगा।नीरज ने कहा, इतने दिनों से तुम यहाँ आते जाते हो, कोई जान पहचान भी नहीं है क्या? तिस पर सुभाष ने कहा रोज का आना जाना तो आपका भी यहाँ लगा रहता है। आप हीं जान पहचान निकाल लो ना।उसपर से आपकी तरह मुझे सैलरी भी तो समय पर नहीं मिलती।दिया तो उतना हीं जलेगा जितना की उसमे तेल पड़ा हो।

आपसी नोक झोंक और ऊपर नीचे करते हुए दोनी काफी थक चुके थे। धीरे-धीरे चलते हुए लाइब्रेरी के सेकंड फ्लोर पर पहुंचे और वहां पर जाकर उन लोगों ने उस नोटिफिकेशन के बारे में पूछताछ की। वहां पर उन्हें बताया गया कि यहां पर तकरीबन 40 साल से पहले की सारी नोटिफिकेशन की डिजिटल कॉपी मौजूद है। उसने नीरज को वहां पर एक कंप्यूटर के सामने बैठा दिया और कहा कि वह इन नोटिफिकेशन की छानबीन कर सकता है।

नीरज के साथ वहां पर सुभाष भी बैठ गया। पर कंप्यूटर सेल के इंचार्ज ने सुभाष को वहां पर बैठने से मना कर दिया। उसने कहा कि यहां पर केवल नीरज बैठ सकता है यहां पर क्लर्क नहीं बैठ सकते। नीरज के सामने बहुत बड़ी समस्या थी। उन 40 साल के सारी फाइलों, नोटिफिकेशन में से एक नोटिफिकेशन को निकालना। यानी कि लगभग 600-700 फाइलों में से किसी एक फाइल में पड़े एक नोटिफिकेशन को पढ़ना। यह कैसे हो?

नीरज ने हिम्मत नहीं हारी और उसने अपना दिमाग लगाया। उसे यह बताया गया था कि तकरीबन 15 साल पहले की फाइलों में इस तरह की नोटिफिकेशन आई थी। नीरज 10 साल पहले की फाइलों को पढ़ना शुरू किया। और तकरीबन 3 साल पीछे जाते हीं उसको वह नोटिफिकेशन मिल गया। मेहनत तो काफी करनी पड़ी पर इस बात से दोनों को बहुत खुशी हुई कि उनकी मेहनत सफल हुई।

नीरज ने तुरंत हीं उस नोटिफिकेशन की कॉपी ली और अपने मोबाइल से उसका फोटो खींच लिया। जैसे ही नीरज उस नोटिफिकेशन को अपने व्हाट्सएप से अरोड़ा साहब के मोबाइल पर भेजना चाहा, सुभाष ने उसे ऐसा करने से रोक लिया। सुभाष ने कहा कि यह बात काफी गुप्त है। यदि व्हाट्सएप पर किसी और ने देख लिया तो समस्या खड़ी हो सकती है। नीरज ने सुभाष की बात मान ली।

सुभाष ने अरोड़ा साहब के मोबाइल पर फोन किया तो उस फोन को अरोड़ा साहब के सेक्रेटरी दीपक ने रिसीव किया। सुभाष ने दीपक से कहा कि एक बहुत ही जरूरी मैसेज है ,अरोडा साहब को बताना है। दीपक ने पूछा क्या है मैसेज? सुभाष ने मैसेज बताने से मना कर दिया। सुभाष को इस समय अपने आप पर काफी अभिमान आ रहा था। दरअसल दीपक साहब का सेक्रेटरी था और इस बात का उसे हमेशा घमंड रहता था कि जितनी भी गुप्त बातें थीं वो उन सारी बातों को वह जानता था। कितनी हीं बार उसने सुभाष को झिड़क दिया था।। लेकिन इस बार पाशा सुभाष के हाथ में था। दीपक बार-बार पूछ रहा था सुभाष से , लेकिन सुभाष ने कहा जाकर साहब से कहो कि वह नोटिफिकेशन मिल गया है। दीपक को ये बात समझ में नहीं आ रही थी कि आखिर में वह कौन सा नोटिफिकेशन है जिसके बारे में सुभाष को पता है और उसे पता नहीं है? सेक्रेटरी और क्लर्क के बीच जंग चल रहा था। जंग में हमेशा जीतने का आदि रहा सेक्रेटरी इस अनपेक्षित हार से परेशान और दुखी हो चला। इधर हमेशा पराजित होने वाला क्लर्क जीत के इस मौके को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। अंत में जीत सुभाष की हुई। दीपक ने सुभाष की बात को और अरोड़ा साहब तक पहुंचा दिया।

अब पाशा सुभाष के हाथों में थी। उसने नीरज से कहा कि आप यह मत बताइएगा कि कंप्यूटर से नोटिफिकेशन को निकाला है । सुभाष ने नीरज से कहा कि आप यह बता दीजिएगा कि उस नोटिफिकेशन को सुभाष ने बहुत सारी फाइलों को छानबीन करके पैसा खिला कर निकाला है। दरअसल इस मौके का इस्तेमाल सुभाष कुछ पैसे कमाने के लिए करना चाह रहा था। नीरज बहुत ही ईमानदार आदमी था। उसने ऐसा करने से मना कर दिया।नीरज ने कहा कि यदि अरोड़ा साहब पूछेंगे कि फाइलें उसने कैसे निकाली है तो वह इस बात को बता देगा कि कंप्यूटर से निकाली है। यदि यह नहीं पूछा कि किस तरह से नोटिफिकेशन निकाला गया है तो वह अपनी तरफ से बताएगा नहीं।

नीरज ने शक की निगाहों से सुभाष की तरफ देखा।सुभाष को नीरज का उड़की शक की निगाहों देखना गवारा न लगा। सुभाष ने कहा कि अरोड़ा साहब भी तो उसे हर महीने की सैलरी बराबर समय पर नहीं देते। वह अपनी काम को पूरी ईमानदारी से करता है। ऐसा कोई काम नहीं करता है जिससे अरोड़ा साहब को नुकसान पहुंचे। फिर भी यदि वह बीमार पड़ता है तो अरोड़ा साहब उसके पैसे काट लेते हैं। हॉस्पिटल में जाने पर यदि ऑफिस नहीं आता है तो उस दिन की पगार उसे काट ली जाती है। यहां तक कि उसके जितने भी ओवरटाइम के पैसे हैं ,जितने भी बोनस के पैसे हैं उन पैसों को मांगने पर भी एक बार में वह पैसे नहीं मिलते। नीरज बाबू आपको तो पैसे समय पर मिल जाते हैं। आपका तो पैसा छुट्टी लेने पर नहीं कटता। यदि उसकी ईमानदारी के साथ भी बेईमानी की जा रही है तो वह भी वैसी बेईमानी क्यों न करें। वैसे भी उसकी बेईमानी से अरोड़ा साहब को तो कोई नुकसान नहीं पहुँचता, अलबत्ता उसे फायदा जरूर हो जाता है। नीरज चाह कर भी सुभाष को यह नहीं बता पाया कि उसके भी बोनस के पैसे समय पर नहीं मिलते।

नीरज ने कहा कि यदि कोई लोमड़ी की तरह व्यवहार कर रहा है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम भी लोमड़ी की तरह ही व्यवहार करने लगो। नीरज ने सुभाष से पूछा, क्या तुमने साधु और बिच्छू की कहानी नहीं सुनी है? नीरज बोलता गया। उसने सुभाष को कहानी याद दिलाई। एक साधु था। वह तालाब में सुबह सुबह स्नान करने गया हुआ था। वहां पर उसने एक बिच्छू को देखा। उस तालाब में वह बिच्छू डूब कर मरने वाला था। साधु बार बार अपने हथेली में बिच्छू को लाकर किनारे पर डालने की कोशिश करता, और बिच्छू बार बार साधु को डंक मारता।साधु का स्वभाव था बिच्छू को बचाना और बिच्छू का स्वभाव था साधु को काटना।

गिद्ध सड़े गले मांस को खाकर जिंदा रहता है। पर गिद्ध के सड़े गले मांस के खाने के हंस का स्वभाव तो नहीं बदलता। कौए को लाख मिठाई खिला दो, पर वो काँव काँव हीं करेगा। कौए को देखकर तोता तो राम नाम जपना तो नहीं छोड़ता। माना कि अरोड़ा साहब तुम्हारे साथ बेईमानी करते हैं, न्याय नहीं करते पर इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम भी उनके साथ बेईमानी करने लगो। अरोड़ा साहब के स्वभाव में हीं बेईमानी है। वो व्यवसायी है, व्यापार केवल ईमानदारी के भरोसे चलता भी नहीं। तुम तो अपने स्वभाव में रहो।

राम और रावण दोनों को दुनिया याद रखती है। राम अपने स्वभाव के कारण जाने जाते हैं और रावण अपने कर्मों के कारण। दुर्योधन के रास्ते को युद्धिष्ठिर ने कभी नहीं अपनाया। इसी तरीके से तुम भी अपने रास्ते से मत चूको। माना कि अरोड़ा साहब समय पर पैसे नहीं देते, पर पूरे पैसे दे तो देते हैं। यदि छुट्टी के पैसे काटते हैं तो उनसे बात करो। इन सारी बातों को मन मे क्यों रखते हो?

सुभाष ने कहा कि मुझे यह सारी बातें समझ में नहीं आती है। पढ़ा लिखा आदमी नहीं हूं। मैं तो सिर्फ इतना जानता हूं कि मेरी ईमानदारी के साथ बेईमानी की जाती है। तो फिर मैं अरोड़ा साहब साथ में थोड़ी सी बेईमानी क्यों न करूं? प्रभु श्रीराम समुद्र के किनारे 3 दिन तक याचना करते रहे, आखिर में जब उन्होंने धनुष ताना तभी समुद्र उनके आगे झुका।

याद कीजिए पांडवों ने भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन आदि का वध कैसे किया?यहाँ तक कि राम ने भी बाली का शिकार छिप कर हीं किया था।सियार के सामने कोई हनुमान चालीसा का पाठ करता है क्या? भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा? यदि कोई जंगल के कानून से चलता है तो उसको जंगल के कानून हीं समझ आते है। कोई अच्छा है इसका मतलब ये नहीं कि वो कमजोर है।

नीरज ने कहा कि सच्चाई के रास्ते पर चलने के लिए असीम ताकत चाहिए होती है।यदि तुम किसी की बेईमानी से प्रभावित होते हो इसका कुल मतलब इतना हीं है कि तुम कमजोर हो। होना ये चाहिए कि तुम्हारी अच्छाई का असर बेईमानों पे हो।तुमने गौतम बुद्ध और अंगुलिमाल की कहानी नहीं सुनी क्या?गौतम बुद्ध के प्रभाव में आकर अंगुलिमाल कैसे बौद्ध भिक्षु बन गया?नारद मुनि के कारण डाकू रत्नाकर महाकवि वाल्मीकि बन गया।यदि तुममे पहाड़ की ऊंचाई पर चढ़ने का सामर्थ्य नहीं है तो इसमें पहाड़ की चोटी क्या दोष? कोई ना कोई तो पहाड़ की चोटी पर चढ़ता हीं है। यदि स्वयं में सामर्थ्य नहीं है तो कम से कम रास्ते की महत्ता का अपमान तो मत करो।

खैर तुम तो मानोगे नहीं।तुमको जो करना है करो। मेरी तो स्वभाव में बेईमानी है ही नहीं।भाई मैं तो सुबह सुबह उठकर रोज ध्यान करता हूं। ध्यान में ईश्वर से यह प्रार्थना करता हूं कि जिन सिद्धांतों का पालन मेरे पिता ने किया है , उन सिद्धांतों और आदर्शों पर मैं टिका रहूं। और एक बात और है, मैं चाह कर भी बेईमानी नहीं कर सकता। नीरज ने वह नोटिफिकेशन सुभाष के हाथ में पकड़ा दिया और वहां से चल दिया।अरोड़ा साहब अपनी करनी का फल भुगतेंगे और तुम अपनी करनी का। मैं तो अपने रास्ते इसलिए चलता हूँ कि मुझे सुकून मिलता है और इससे मेरा दिल हल्का रहता है।

सुभाष ने कहा , आपकी बात सही है, लेकिन आदर्शों से दुनिया नहीं चलती। मेरे बाबूजी गांव से आये थे। उन्हें हॉस्पिटल दिखाने के लिए चार दिन की छुट्टी ली थी। अरोड़ा साहब ने पैसे काट लिए।बोनस के पैसे भी नहीं दे रहे हैं। हालांकि पैसे पूरे दे देते हैं, पर समय पर नहीं मिलने पर क्या फायदा। इन आदर्शों के भरोसे दवाई कहाँ से लाऊं? मैं तो ठहरा गँवार आदमी। आपकी तरह पढा लिखा नहीं। मुझे तो बस इतना पता है कि जिस मरीज को जैसी बीमारी हो, उसे वैसी हीं दवा दिया जाना चाहिए। जंगल के कानून से जीने वाले व्यक्ति भक्ति के पाठ से कभी नहीं सुधरते। ईमानदारी कभी भी बेइमानी का इलाज नहीं हो सकती। बेईमानी तो बेईमानी से हीं पछाड़ खा सकती है।

नीरज ने सुभाष की फिर समझाने की कोशिश की। उसने कहा कि बेईमानी को ठीक करने का ठेका उसने अपने सर पर क्यों उठा रखा है। बेईमानों को सजा देने का काम तो ईश्वर का है। तुमको दिखाई नहीं पड़ता, अरोड़ा साहब को बी.पी. है, मधुमेह है, थाइरॉयड की बीमारी है? मसाला खा नहीं सकते, मीठा खा नहीं सकते, तितापन, खट्टापन ,धूल धक्कड़ से एलर्जी है उनको। दूध , दही से परहेज करना पड़ता है।ये सारी बेईमानियां उनके शरीर से निकल रही है। तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती क्या?

सुभाष ने कहा कि चलिए मान लिया कि अरोड़ा साहब को अपनी करनी का फल मिल रहा है, पर इससे उसको क्या फायदा हुआ? अरोड़ा साहब के बी.पी., मधुमेह या थाइरॉयड , एलर्जी होने से उसके पिता का इलाज तो संभव नहीं हो पा रहा है ना? और यदि बेईमानी की सजा उसे मिलती है तो उसे कोई अफसोस नहीं होगा। कम से कम उसके पिता का इलाज तो संभव हो पायेगा। नीरज को समझ आ गया कि भैंस के आगे बीन बजाने से कोई फायदा होने वाला नहीं।

तकरीबन आधे घंटे बाद अरोड़ा साहब वहां पर आए। सुभाष और नीरज दोनों की प्रसंशा खुले दिल से करने लगे। जब नीरज ने अरोड़ा साहब को उस नोटिफिकेशन को दिखाना चाहा , साहब ने कहा कि नोटिफिकेशन सुभाष ने व्हाट्सएप से पहले ही भेज दिया है। अरोड़ा साहब ने सुभाष को बुलाकर कहा, जितने पैसे खर्च हुए हैं, जाकर दीपक से ले लेना। नीरज चुप चाप देखता रहा।सुभाष ने 5000/- रुपये नोटिफिकेशन के खर्चे के नाम पर ले लिए। उन रुपयों से उसने अपने बीमार पिता के लिए दवाईयाँ खरीदी और गाँव भेज दिया। बेईमानी के नमक का हक अदा हो चुका था।

बिछिया

अनिमेश आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था । उसके पिताजी ने बचपन में हीं ये शिक्षा प्रदान कर रखी थी कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए आदमी का योग्य होना बहुत जरुरी है। अनिमेश अपने पिता की सिखाई हुई बात का बड़ा सम्मान करता था । उसकी दैनिक दिनचर्या किताबों से शुरू होकर किताबों पे हीं बंद होती थी । हालाँकि खेलने कूदने में भी पीछे नहीं था।

नवम्बर का महीना चल रहा था। आठवीं कक्षा की परीक्षा दिसम्बर में होने वाली थी। परीक्षा काफी नजदीक थी। अनिमेश अपनी किताबों में मशगुल था। ठण्ड पड़नी शुरू हो गयी थी। वो रजाई में दुबक कर अपनी होने वाली वार्षिक परीक्षा की तैयारी कर रहा था।

उसकी माँ बाजार जा रही थी। अनिमेश की माँ ने उसको 2000 रूपये दिए और बाजार चली गयी । वो रूपये अनिमेश को अपने छोटे चाचाजी को देने थे।

अनिमेश के छोटे चाचाजी गाँव में किसान थे। कड़ाके की ठण्ड पड़ने के कारण फसल खराब हो रही थी। फसल में खाद और कीटनाशक डालना बहुत जरुरी था। अनिमेश के बड़े चाचाजी दिल्ली में प्राइवेट नौकरी कर रहे थे। उन्होंने हीं वो 2000 रूपये गाँव की खेती के लिए भेजवाए थे। अनिमेश की माँ ने वो 2000 रूपये अनिमेश को दिए ताकि वो अपने गाँव के छोटे चाचाजी को दे सके।

अनिमेश पढ़ने में मशगुल था। उसने रुपयों को किताबों में रखा और फिर परीक्षा की तैयारी में मशगुल हो था। इसी बीच बिछिया आई और घर में झाड़ू पोछा लगाकर चली गई। जब गाँव से चाचाजी पैसा लेने आये तो अनिमेश ने उन रुपयों को किताबों से निकालने की कोशिश की। पर वो मिले नहीं। वो गायब हो चुके थे । अनिमेश के मम्मी पापा ने भी लाख कोशिश की पर वो रूपये मिल नहीं पाए । या तो वो जमीं में चले गए थे या आसमां में गायब हो गये थे। खोजने की सारी कोशिशें बेकार गयीं।

खैर अनिमेश के पापा ने 2000 रूपये खुद हीं निकाल कर गाँव के चाचाजी को दे दिए। रुपयों के गायब होने पे सबको गुस्सा था ।अनिमेश पे शक करने का सवाल हीं नही था। काफी मेहनती , आज्ञाकारी और ईमानदार बच्चा था। स्कुल में दिए गए हर होम वर्क को पुरा करता। वो वैसे हीं पढाई लिखाई में काफी गंभीर था , तिस पर से उसकी परीक्षा नजदीक थी। इस कारण अनिमेश के पिताजी ने अनिमेश ने ज्यादा पूछ ताछ नहीं ही।

कहते हैं जब समस्या का निदान नजर नहीं आता, आदमी जा मन अनगिनत दिशाओं में घूमने लगता है। शक की सुईयां चारो तरफ घूमने लगती है।

इन परिस्थितियों में हितैषियों की संख्या बढ़ने लगती हैं।सारे के सारे व्यक्ति सलाह देने के सुख से वंचित नहीं होना चाहते। गुरू होने के रस का आनंद गुरु होने से बेहतर होता है। पड़ोसी, नौकर , अपरिचित सारे के सारे आ आकर सलाह देने से नहीं चूक रहे थे। सारे के सारे अपने अनुभवों का सार बताने लगे।

आखिर पैसे गए कहाँ। भूत तो आ नहीं सकता। पैसों के अपने पैर तो होते नहीं। वो अपने आप तो चलकर भागेंगे नहीं। अनिमेश तो ऐसा बालक है जिससे ऐसी ओछी हरकत की उम्मीद की हीं नहीं जा सकती।

हो ना हो, कोई तो है जिसने पैसा गायब किया है।

गरीबी और ढ़ोल में एक समानता है। जिसे जब ईक्क्षा हो, बजाने की पूरी छूट होती है। तिस पे ढ़ोल प्रतिरोध नहीं करता, कर नहीं सकता।

रोज रोज हजारों जानवर जीभ के चक्कर में काट दिए जातें हैं। कोई सुनवाई नहीं होती, जबकि आदमी जोर से अकारण हँस दे, तो कोर्ट कचहरी तक बात चली जाती है।

कुल मिलाकर ये कहना है कि अगर आप अपनी आवाज उठा नहीं सकते, आरोपी साबित होने लगते हैं। निरीह का कोई पालन हार नहीं होता। यही हुआ बिछिया के साथ।घूम फिरकर शक की सूई उसके आस पास घूमने लगी।

बिछिया लगभग 50 वर्ष की मुसलमान अधेड़ महिला थी। उसका रंग काला था। बिच्छु की तरह काला होने के कारण सारे लोग उसे बिछिया हीं कह के पुकारते थे। उसके नाम की तरह उसके चेहरे पे भी कोई आकर्षण नहीं था। साधारण सी साड़ी, बेतरतीब बाल और कोई साज श्रृंगार नहीं। तिस पर से साधारण नाक नक्श। इसी कारण से वो अपने पति का प्रेम पाने में असक्षम रही। उसकी शादी के दो साल बाद हीं उसके पति ने दूसरी शादी कर ली। जाहिर सी बात है , बिछिया को कोई बच्चा नहीं था। नई दुल्हन उसके साथ नौकरानी का व्यव्हार करती।

बिछिया बेचारी अकेली घुट घुट कर जी रही थी। अकेलेपन में उसे बिड़ी का साथ मिला। बिड़ी पीकर वो अपने सारा गम भुला देती। जब बीड़ी के लिए रूपये कम पड़ते तो कभी कभार अपने पति के जेब पर हाथ साफ़ कर देती। दो तीन बार उसकी चोरी पकड़ी गयी। अब सजा के तौर पर उसे अपनी जीविका खुद हीं चलानी थी। उसने झाड़ू पोछा का काम करना शुरू कर दिया। इसी बीच उसका बिड़ी पीना जारी रहा।

पर आखिर में रूपये गये कहाँ? अनिमेश चुरा नहीं सकता। घर में बिछिया के आलावा कोई और आया नही। हो ना हो , जरुर ये रूपये बिछिया ने हीं चुराये है।सबकी शक की नजर बिछिया पे गयी। किसी कौए को कोई बच्चा पकड़ कर छोड़ देता है तो बाकि सारे कौए उसे बिरादरी से बाहर कर देते है और उस कौए को सारे मिलकर मार डालते है। वो ही हाल बिछिया का हो गया था। सारे लोग उसके पीछे हाथ धोकर पीछे पड़ गए।

किसी को पड़ोसी से नफरत थी । कोई मकान मालिक से परेशान था । कोई अपनी गरीबी से परेशान था । किसी की प्रोमोशन काफी समय से रुकी हुई थी । सबको अपना गुस्सा निकालने का बहाना मिल गया था। बिछिया मंदिर का घंटा बन गयी थी। जिसकी ईक्छा हुई , चला आया घंटी बजाने। काफी पूछताछ की गई उससे। काफी जलील किया गया। उसके कपड़े तक उतार लिए गए । कुछ नही पता चला। हाँ , अलबत्ता बीड़ी के 8-10 पैकेट जरूर मिले। शक पक्का हो गया।चोर बिछिया ही थी। रूपये न मिलने थे, न मिले।

दिसम्बर आया। परीक्षा आयी और चली गई । जनवरी में रिजल्ट भी आ गया। अनिमेश स्कूल में फर्स्ट आया था। अनिमेश के पिताजी ने खुश होकर अनिमेश को साईकिल खरीद दी । स्कूल में 26 जनवरी मनाने की तैयारी चल रही थी । अनिमेश के मम्मी पापा गाँव गए थे। परीक्षा के कारण अनिमेश अपने कमरे की सफाई पर ध्यान नहीं दे पाया था। अब छुट्टियाँ आ रही थी। वो अपने किताबों को साफ़ करने में गया । सफाई के दौरान अनिमेश को वो 2000 रूपये किताबों के नीचे पड़े मिले। अनिमेश की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। तुरंत साईकिल उठा कर गाँव गया और 2000 रूपये अपनी माँ माँ को दे दिए।

बिछिया के बारे में पूछा। मालूम चला वो आजकल काम पे नहीं आ रही थी। परीक्षा के कारण अनिमेश को ये बात ख्याल में आई हीं नहीं कि जाने कबसे बिछिया ने काम करना बंद कर रखा था। अनिमेश जल्दी से जल्दी बिछिया से मिलकर माफ़ी मांगना चाह रहा था।

वो साईकिल उठाकर बिछिया के घर पर जल्दी जल्दी पहुँचने की कोशिश कर रहा था । उसके घर का पता ऐसा हो गया जैसे की सुरसा का मुंह । जितनी जल्दी पहुँचने की कोशिश करता , उतना हीं अटपटे रास्तों के बीच उसकी मंजिल दूर होती जाती।खैर उसका सफ़र आख़िरकार ख़त्म हुआ। उसकी साईकिल बीछिया के घर के सामने रुक गई ।

उसका सीना आत्म ग्लानि से भरा हुआ था । उसकी धड़कन तेज थी । वो सोच रहा था कि वो बिछिया का सामना कैसे करेगा। बिछिया उसे माफ़ करेगी भी या नहीं । उसने मन ही मन सोचा कि बिछिया अगर माफ़ नहीं करेगी तो पैर पकड़ लेगा। उसकी माँ ने तो अनिमेश को कितनी हीं बार माफ़ किया है । फिर बिछिया माफ़ क्यों नहीं करेगी ? और उसने कोई गलती भी तो नहीं की।

तभी एक कड़कती आवाज ने उसकी विचारों के श्रृंखला को तोड़ दिया । अच्छा ही हुआ, उस चोर को खुदा ने अपने पास बुला लिया। ये आवाज बिछिया के पति की थी । उसके पति ने कहा , खुदा ने उसके पापों की सजा दे दी । हुक्का पीते हुए उसने कहा, 2000 रूपये कम थोड़े न होते हैं बाबूजी । इतना रुपया चुराकर कहाँ जाती । अल्लाह को सब मालूम है । बिछिया को टी. बी. हो गया था। उस चोर को बचा कर भी मैं क्या कर लेता। और उसपर से मुझे परिवार भी तो चलाना होता है।

अनिमेश सीने में पश्चाताप की अग्नि लिए घर लौट आया। उसके पिताजी ने पूछा , अरे ये साईकिल चला के क्यों नही आ रहे हो ? ये साईकिल को डुगरा के क्यों आ रहे हो? दरअसल अनिमेश अपने भाव में इतना खो गया था कि उसे याद हीं नहीं रहा कि वो साईकिल लेकर पैदल हीं चला आ रहा है। उसने बिछिया के बारे में तहकीकात की।

अधेड़ थी बिछिया । कितना अपमान बर्दास्त करती ? मन पे किए गये वार तन पर असर दिखाने लगे। उपर से बीड़ी की बुरी लत। बिछिया बार बार बीमार पड़ने लगी थी। खांसी के दौरे पड़ने लगे थे। काम करना मुश्किल हो गया। घर पे हीं रहने लगी।

हालांकि उसके पति ने अपनी हैसियत के हिसाब से उसका ईलाज कराया। पर ज़माने की जिल्लत ने बिछिया में जीने की ईक्छा को मार दिया था। तिस पर से उसके पति की खीज और बच्चों का उपहास। बिछिया अपने सीने पे चोरी का ईल्जाम लिए हुए इस संसार से गुजर गई थी।

अनिमेश के ह्रदय की पश्चाताप की अग्नि शांत नहीं हुई है। 4o साल गुजर गए हैं बिछिया के गुजरे हुए। आज तक रुकी हुई है वो माफी।

कोर्पोरेट डोंकी

दिल्ली में गर्मी उफान पर थी—सूरज मानो आसमान से आग बरसा रहा था। दोपहर की तपिश ने सड़कों को तवे की तरह गरमा दिया था और हवा में धूल के साथ पसीने की गंध घुली हुई थी। कार की सर्विस कराने के लिए मैं ओखला के उस जाने-पहचाने कार सर्विस सेंटर पहुँचा, जहाँ मशीनों की घरघराहट और मैकेनिकों की आवाज़ें पहले से ही माहौल को और बोझिल बना रही थीं। ज़रूरी काग़ज़ात पूरे कर, चाबी काउंटर पर रखकर मैंने कार वहीं छोड़ दी।

अब अगली चुनौती थी—इस झुलसाती गर्मी में घर लौटने का इंतज़ाम। सर्विस सेंटर से बाहर निकलते ही मैं सड़क के किनारे खड़ा होकर इधर-उधर नज़र दौड़ाने लगा, किसी खाली ऑटो रिक्शा की तलाश में। कुछ ऑटो तेज़ी से आगे निकल गए, कुछ में पहले से सवारियाँ भरी थीं। पसीना माथे से टपक रहा था और हर गुजरते पल के साथ घर पहुँचने की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। 

एक दो ऑटो वाले रुके और अनाप शनाप किराया माँगते। मैंने झुंझला के मना कर दिया। एक ने नया आदमी समझकर 300 रुपये मांगा। मैंने कहा 1000 लोगे क्या? जिस झुंझलाहट से मैंने उसका डिमांड सुना, उसी झुंझलाहट से मैंने उत्तर दिया और उसी झुंझलाहट से ऑटो वाला आगे बढ़ गया। मन में गुस्सा आ रहा था। ये ऑटो वाले सही किराया लेकर चलते क्यों नहीं? बेईमानी तो इनके नस नस में समाई हुई है। खैर मैं अपने जिद पर अड़ा रहा और ऑटो वाले अपनी जिद पर। जंग जारी रही।

थोड़ी देर में एक ऑटो वाला दिखा। साफ सुथरे कपड़े, क्लीन शेव। देखने में संभ्रांत लग रहा था। आशा की किरण उठती दिखाई पड़ी।मैंने उससे बदरपुर चलने को कहा। मेरी आशा के विपरीत उसने कहा ठीक है साहब, कितना दोगे ? मैंने कहा: भाई मीटर पे ले चलो। अब तो किराया भी बढ़ गया है। अब क्या तकलीफ है? उसने कहा :साहब महंगाई बढ़ गयी है इससे काम नहीं चलता।

मैं सोच रहा था अगर बेईमानी चरित्र में हो तो लाख बहाने बना लेती है। इसी बेईमानी के मुद्दे पे सरकार बदल गयी। मनमोहन जी चले गए ,मोदी जी आ गए। और ये बेईमानी है कि लोगों की नसों में जड़े जमाये बैठी है।मैंने पूछा , एक कहावत सुने हो , "ते ते पांव पसरिए जे ते लंबी ठौर"? अपनी हैसियत के मुताबिक रहोगे तो महंगाई कभी कष्ट नहीं देगी।

मैं अभी कार में घूमता हूँ। जब औकात नहीं थी , बस में चलने में शर्म नहीं आती थी । तुमको अगर इतना हीं कष्ट है ,तो जाओ परीक्षा पास करो और सरकारी नौकरी पा लो , कौन रोका है तुम्हे? ये जनतंत्र है , एक चायवाला भी प्रधान मंत्री बन जाता है, तुम कोशिश क्यों नहीं करते?

शायद मैंने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया था। जलती हुई मुस्कान से साथ उसने कहा , इस आरक्षण के ज़माने में सरकारी नौकरी पाना रेगिस्तान में तेल निकालने के बराबर है।संविधान बनाने वालों ने तो कुछ ही समय के लिए आरक्षण का प्रावधान रखा था पर ये है कि सुरसा के मुंह की तरह ख़त्म होने का नाम हीं नहीं ले रही है । पिछड़ों का भला हो ना हो, पिछड़ों की राजनीति करने वालों का जरूर भला हो रहा है।

आप सही किराया लेने की बात करते हैं। ये प्रश्न आप डॉक्टरों, वकीलों से क्यों नहीं पूछते? कुछ भी पैसा डिमांड कर लेते हैं। ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड , पासपोर्ट , यहां कौन सा काम बिना दलाल के होता है?बिना पैसों के किसी भी सरकारी दफ्तर में फाइल सरक सकती है क्या? परीक्षा में दलाली, इंटरव्यू में दलाली, कैसे आदमी पास करे परीक्षा?

मैंने ऑटो में बैठते हुए पूछा ,तो फिर प्राइवेट नौकरी क्यों नहीं कर लेते? वहाँ पे तो कोई आरक्षण नहीं? वहाँ पे तो घुस नहीं चलता। वहाँ पे तो प्रतिभा की पहचान है। उसने ऑटो स्टार्ट कर दिया। ऑटो चल पड़ी। प्रतिभा की पहचान है?वो हँसने लगा। साहब आपको लगता है प्राइवेट सेक्टर में काबिलीयत की क़द्र है ? कैसी प्रतिभा? किस तरह की काबलियत? खैर जो सचमुच काबिल है उसे नीचे खींचने में सारे लग जाते है । जो चाटुकार है , आगे बढ़ जाता है, भले हीं गधा क्यों न हो। उसने आग उगलना जारी रखा, रामधारी सिंह दिनकर की बातें आपको याद है न? "यदि सारे गधे किसी व्यक्ति को मारना शुरू कर दें तो समझो वो व्यक्ति प्रतिभाशाली नहीं बल्कि महाप्रतिभाशाली है"। और प्रतिभा भी तो कैसी?क्या ईमानदारी और सच्चाई? मेहनत और लगन?क्या आप इसकी बात कर रहे हैं? उसने आग उगलना जारी रखा। बीच में ट्रैफिक जाम आ गया। ऑटो रुक गया। फिर ग्रीन लाइट हो गई। एक बाइक वाला उल्टी दिशा से ऑटो को टेक ओवर करते हुए निकल गया। साले को ओलिम्पिक का मेडल जितना है। ऑटो वाले ने गुस्साते हुए कहा। ऑटो को संभालते हुए चला रहा था। उसका आग उगलना जारी रहा। भाई भतीजावाद कहाँ नहीं है?वकालत में, बिज़नेस में, सिनेमा मे , कहाँ नहीं है?सुना नहीं आपने ये कंगना रौनत और करण जौहर की कहानी? टाटा, अम्बानी को देखिए।और तो और लालू को देखिए, राम विलास पासवान को देखिए,मायावती मुलायम को देखिए, देवगौड़ा को देखिए, कहाँ नहीं है भाई भतीजावाद? वकील, डॉक्टर, बिजनेसमैन , कौन यहाँ आगे बढ़ पाता है बिना दलाली के?हर काम में कट की आदत सबको लड़ी हुई है। और हम दो रोटी के लिए थोड़ा सा किराया ज्यादा क्या मांग लिए, आपको बुरा लग रहा है? ईमानदारी का पाठ पढ़ाने चल दिए।अगर पूरी व्यवस्था हीं गलत है तो आप हमसे ईमानदारी की उम्मीद क्यों लगा रहे हैं? मैंने कहा कि सूरज तो रोज हीं उगता है और उजाला फैलता है। और कोई काला चश्मा पहनकर कहे कि अंधेरा है तो दोष सूरज का है या काले चश्मे का?क्या तुमको नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार नहीं दिखते?अपनी ईमादार राजनीति से पूरे भारत को बदल दिया। वो फिर हँसने लगा:भाई साहब ईमानदारी पर संदेह नहीं है। पर बुरा न माने, बीबी को छोड़कर भाग खड़ा होना कोई उचित बात भी नहीं। इन दोनों के पारिवारिक जीवन पर जरा प्रकाश डालिए। दोनों ने हीं पारिवारिक जिम्मेदारियों को उठाने से मना कर दिया। मैं चिढ़ गया:अजीब आदमी हो, कोई परिवार को सपोर्ट करे तो भाई भतीजावाद, और परिवार को छोड़े तो कमजोर। आखिर है कौन आदर्श तुम्हारी नजरों में। खैर महात्मा गाँधी जी को देखो। शादी शुदा भी थे और परिवारवाद के समर्थक तो कतई नहीं। सही बात है। इतने ईमानदार कि नंगी लड़कियों के साथ ब्रह्मचर्य के प्रयोग करते। पर उनके बच्चों का क्या हुआ? उनसे तो बेहतर ये नेहरू निकला जिसने अपने परिवार के लिए तो पूरी व्यवस्था कर दी। मैंने गुस्से में झड़प दिया। अजब मूर्ख हो। कोई परिवार वाद को बढ़ावा दे रहा है तो खराब और परिवारवाद को प्रश्रय दे वो बेहतर। आखिर तुम्हारा मापदंड क्या है? उसने कहा, नाराज न हों भाई साहब। आपका कहना वाकई जायज है। मैंने कहा कि नेहरू ने अपने परिवार के लिए अच्छा किया, पर मैं उसका प्रशंसक नहीं हूं। मुझे गाँधी के अलावा अन्ना हज़ारे भी दिखाई पड़ते हैं। परिवार छोड़ा, ईमानदार रहे, पर उनका हुआ क्या? लोकपाल आंदोलन का फायदा किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल को मिला। खासकर अरविंद केजरीवाल ने अन्ना हज़ारे को चूसकर फेक दिया। आपको स्टॅलिन, गद्दाफी क्यों दिखाई नहीं पड़ते?स्टॅलिन ने इतने लोगो को मरवाया पर फिर भी रूस में निंदनीय नहीं है। गद्दाफी ने इतने लोगो ओर निरंकुशता से लीबिया में शासन किया,फिर भी लोग उसे ठीक हीं मानते हैं। जरूरत पड़ने पे इनलोगों ने अपनी दुम भी हिलाई और दुलत्ती भी मेरी। न केवल इनलोगों को जीभ निकालने हीं आता था, बल्कि जरूरत पड़ने पर आँख दिखाने की भी कला भी आती थी। कहा भी गया है, "क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो।" मैं उसकी प्रतिभा पर चकित था। मैं सोच रहा था कि ऐसे लोग भारत में ऑटो चलाने को मजबूर हैं। ये भारत का सौभाग्य है या दुर्भाग्य? एक तरफ तो एक चाय वाला भारत का प्रधान मंत्री बन जाता है, तो दूसरी तरफ इस ऑटो वाले की तरह अनगिनत लोग इस तरह के पेशे में उतरने को मजबूर हो जाते हैं। वो बोलता हीं चला जा रहा था। युद्धिष्ठिर के भरोसे तो महाभारत की जंग नही जीती जा सकती। अगर कृष्ण भी युद्धिष्ठिर की राह चल पड़ते तो क्या महाभारत का युद्ध जीत पाते?क्या शकुनि और दुर्योधन के सामने युद्धिष्ठिर अपनी मात्र धर्मपरायणता का संस्थापन बिना अर्जुन और भीम के कर पाते? ऑटो गंतव्य स्थल के नजदीक आ गई थी। उसका आग उगलना जारी रहा। मेरे कहने का कुल मतलब ये है कि ईमानदार होना कोई गुण नहीं, कोई प्रतिभा नहीं। ईमानदार रहे तो अन्ना हज़ारे और गाँधी का हाल हो जाएगा। जिसने बेईमानी का सदुपयोग किया वो आगे बढ़ा। मैंने पूछा भाई ये सब तुम कैसे जानते हो ? उसने कहा , कभी सरकारी नौकरियों के लिए तैयारी की थी।बैंक पी ओ बनने के लिए इतिहास, भूगोल, गणित, विज्ञान जाने क्या क्या छान मारा। पर इस आरक्षण के सामने सब फीका पड़ गया। अलबत्ता पढ़ने की लत लग गई। पढ़ने की वो आदत आज तक नहीं गई। बिना पढ़े रहा नहीं जाता। कविता , कहानियां भी लिखता हूँ । पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं । पर इन कविताओं और कहानियों से परिवार नहीं चलता । ये तो भला हो इस ऑटो का , जिसने कितनी हीं कविताओं , कहानियों को बिखरने से बचा लिया। उसने आगे कहा, प्राइवेट जॉब भी करके देख लिया। वहां पे तो आत्म स्वाभिमान की तो ऐसी की तैसी हो जाती है। काम करो और बस करते रहो। क्या सोमवार , क्या रविवार। बीमार पड़े तो पैसे कटते है, छुट्टी करो तो छुट्टी कर देते हैं । मैं कोई गधा नहीं जो पैसों के लिए मालिक के सामने अपनी दुम हिलाता रहूँ। और छुट्टी का कोई सिस्टम नहीं। इस साल रामनवमी पे छुट्टी तो अगले साल कैंसिल। सब एक लाला के मूड पर निर्भर करता है। आज बीबी से लड़कर आया है, तो सैलरी नहीं मांग सकते। बोनस भी साल खुदरे खुदरे में 6-6 महीने तक मिलता रहता है। लाला को जो अच्छा लगता है, तुमको भी अच्छा लगना चाहिए।अगर उसको फुटबॉल की सनक है तो तुमको भी क्रिकेट जा शौक छोड़ देना चाहिए। साला पूरा दिमाग का दही बन जाता है।मैं इन जगहों पर टिक नहीं पाया। ऑफिस में काम करो ना करो पर चौकीदारी करते रहो। पूरे दिन लैपटॉप पर ब्लू फिल्म देखते हुए गुजार दो, कोई नहीं पूछने वाला, अलबत्ता देर रात तक टीके रहो, तभी लाला के करीब जाते हो। कोई सोशल लाइफ नहीं। ये सब मेरे बस का नहीं। ये मेरा ऑटो मेरा साम्राज्य है और मैं इसका मालिक। अपनी मर्जी से निकलता हूँ, अपनी मर्जी से लौटता हूँ। कोई जी हुजूरी नहीं, कोई रोक टोक नहीं। किराया जँचे तो बैठिए वरना राम राम। और ऊपर वाले की कृपा से परिवार का खर्चा बड़े आराम से चल जाता है। "ना ऊधो का देना, ना माधो का लेना" गंतव्य स्थल आ चुका था। ऑटो वाले को मुँह मांगा किराया देना मजबूरी थी। उतरने के बाद घर की तरफ आगे चल पड़ा। ऑटो वाले की बात मेरे जेहन में घूम रही थी। मैं सोच रहा था , सहना भी तो एक प्रतिभा है।मालिक की हाँ में हाँ मिलाना भी तो एक प्रतिभा है। दुम हिलाना भी तो एक प्रतिभा है। गधे की तरह ही सही। नौकर मालिक के सामने दुम हिलाता है, और मालिक क्लाइंट के आगे।जो सही तरीके से अपनी दुम हिलाना जान गया समझो वो चल गया। समय की मांग के अनुसार दुम हिलाना भी पड़ता है, दुम मरोड़ना भी पड़ता है और दुलत्ती भी मारनी पड़ती है। अलबत्ता वेश भूषा समय के अनुसार बदलनी पड़ती है। "कोर्पोरेट डोंकी" हीं आगे बढ़ते है। ये बात शायद ऑटो वाला नहीं समझ पाया था।

कालिदास और कलिभक्त

 ऑफिस से काम निपटा के दो मित्र कार से घर की ओर जा रहे थे । शाम के करीब 6.30 बज रहे थे । मई का महीना चल रहा था । गर्मी अपने उफान पे थी । शाम होने पे भी गर्मी से कोई निजात नहीं थी । बाहर धुआं और धूल काफी था इसलिये कार के विडोव-मिरर को बंद करके कार ड्राइव कर रहे थे । ए.सी. तेज रखने पे भी गर्मी पे असर बेअसर साबित हो रही थी । दोनों मित्र पीकू फ़िल्म पे हल्की फुल्की बात करते हुए जा रहे थे ।

रेड लाइट पे कार रुकी । इतने समय में स्कूटी पे तीन नवयुवतियां कार के विडोव-मिरर के ठीक बगल में आकर रुकी । तीनों नवयुवतियों ने वेस्टर्न पोशाक पहन रखे थे । उनकी पोशाक का वर्णन करके थर्ड क्लास के लेखक की संज्ञा का पाने से बेहतर है क़ि ये पाठकों की कल्पना शक्ति पर छोड़ दिया जाये । कुल मिला के ये कहना है कि उन युवतियों ने ऐसे पोशाक धारण कर रखे थे कि उनका अंग अंग दृष्टिगोचित हो रहा है । एक बात और इन नवयुवतियों ने हेलमेट भी नही डाल रखे थे अपने सर पे । ऐसा लगता है इनको ट्रैफिक नियमों की कोई परवाह नहीं थी या यूँ कहे कि ट्रैफिक के रखवालों की नजर में ये अपवाद थी ।

जो मित्र कार ड्राइव कर रहे थे उन्होंने विडोव-मिरर नीचे कर दिया । नवयुवतियां मुस्कुराने लगी । नयनों ही नयनों में वार्तालाप होने लगे। एक ओर खूबसूरत प्रतिमाएं और दूसरी और खूबसूरती का पारखी । प्रतिमाओं ने अपनी खूबसूरती के एक्स्प्रेशन में कोई कमी नहीं छोड़ी तो कलाकार ने भी अपनी प्रशंसा के भाव में कोई कमी नहीं छोड़ी । हलाकि दूसरे मित्र को को ये नैनों के वार्तालाप रास नहीं आ रहे थे । खैर रेड लाइट ग्रीन हो गयी और कार आगे बढ़ चली। कलाकार मित्र ने कहा भगवान ने क्या खूबसूरती दी है इन नव युवतियों को । दूसरे मित्र ने कहा कि मै तो कालीभक्त हूँ भाई, मुझे ये सब पसंद नहीं ।

कलाकार मित्र ने कहा भाई मै तो कालिदास का भक्त हूँ भाई , कालिदास की नजरें रखता हूँ । जहाँ खूबसूरती दिखाई पड़ती है , प्रशंसा का भाव अपने आप उभर आता है ।

“चुनाव नहीं कुछ भी नहीं, सब कुछ स्वीकार्य है” कालीभक्त ने पूछा अगर सबकुछ स्वीकार्य है तो क्या आप जहर भी खा लेंगे। कालिदास भक्त ने कहा भाई जहर भी तो लेते हीं है । ये धुआं , ये प्रदुषण , क्या है ये । सबकुछ स्वीकार्य है , पर मर्यादा में । काली की भक्ति भी स्वीकार्य है पर रामकृष्ण परमहंस की तरह नहीं , उनकी तरह आध्यात्मिक शक्ति नहीं मेरे पास और खूबसूरती की प्रशंसा भी स्वीकार्य है पर कालिदास की तरह मेघदूत नहीं लिख सकता। कालिदास ने कहा:-काली की भक्ति और खूबसूरती के प्रति आसक्ति दोनों का सम्प्रेषण मर्यादा में हों तो ही ठीक । भाई मेरे पास अपनी मर्यादा है और मैं मर्यादित रहना हीं पसंद करता हूँ.।

दिल की अग्नि

 मेरे पिताजी अति अनुशासन प्रिय व्यक्ति रहें है। पेशे से शिक्षक है। स्कूल में भी बहुत अनुशासन प्रिय और योग्य शिक्षक के रूप में उनकी प्रसिद्धि थी।अब सेवनिर्वित्त हो चुके है। उनकी अनुशासन प्रियता घर में भी लागू होती थी।रोज सुबह 5 बजे उठकर हम सब बच्चे कसरत करते, प्रार्थना करते।शाम के 5 बजते हीं हम सब बच्चों को लालटेन के पास पढ़ाई के लिए बैठना होता था। मेरे पिताजी की नजरों में सिनेमा पढ़ाई लिखाई से बच्चों को भटकाता है। अतः किसी भी बच्चों को सिनेमाघर जाने की इजाजत नहीं थी।

मुझे याद है होली के समय मेरे गाँव में हुड़दंग का माहौल रहता था। गाँव के बच्चे रंग खेलते, एक दूसरे पे कीचड़ फेकते। गोबर लगाते। पूरे सड़क पे तमाशा चलता रहता था।इसी हुड़दंग के माहौल में मेरे पिताजी नहा धोकर, खादी का कुर्ता पायजामा पहनकर , गर्दन में सफेद मफ़लर लगाकर अपने लाइब्रेरी निकलते पढ़ने के लिए। और इस हुड़दंग के माहौल में, होली के हुल्लड़ में भी सारे लोग रास्ते से हट जाते। भागो भागो मास्टरजी आ रहे हैं यह कहकर सारे भाग जाते। किसी को हिम्मत नहीं होती कि मेरे पिताजी पर रंग फेंक सके। इस तरह का आतंक था मेरे पिताजी की अनुशासन प्रियता का।

इन्हीं दिनों, एक बार होली के समय गाँव के सारे बच्चे रंग खेल रहे थे। मैं अपने पिताजी के प्रकोप के कारण रंग नहीं खेल पा रहा था। मैंने अपनी माँ से याचना की पर माँ भी पिताजी के प्रकोप के कारण कुछ नहीं कर पायी। मन अति खिन्न हो उठा। गुस्से में उठकर मैं चुपचाप घर से निकलकर गाँव के खेतों में सुदूर स्थित एक नीम के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया। शाम तक वहीं बैठा रहा। पिताजी की अति अनुशासन प्रियता के कारण मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था।

ईधर घर से मेरी अचानक अनुपस्थिति से सारे परेशान हो उठे। शाम को मेरे बड़े पिताजी ढूंढते हुए आये और मुझे शांत करके घर ले गए। मैं घर जाते वक्त काफी डरा हुआ था। मुझे इस बात की चिंता थी कि शायद मेरे पिताजी गुस्सा होंगे। पर घर जाने पर परिस्थितियाँ उल्टी थी। मेरी माँ मेरे अचानक गायब होने से बहुत परेशान थी। मेरी दादी के सामने मेरे पिताजी अपराधी भाव से खड़े थे। मुझे देखकर मेरी माँ और दादी काफी खुश हो गए। मेरे पिताजी के चेहरे पे क्रोध के स्थान पर सुकून का भाव दृष्टिगोचित हो उठा।

शाम के वक्त हम सब बच्चों को अपने से बड़ों को पैर छूकर प्रणाम करना होता था। मेरी इक्छा नहीं थी फिर मैंने सबको प्रणाम किया। अचानक मैंने देखा जब मैं दादी को प्रणाम कर रहा था तो मेरे पिताजी वहाँ से खिसक पड़े। पूछने पर ज्ञात हुआ पिताजी बचपन से लेकर आज तक कभी दादी को हिचकिचाहट वश प्रणाम नहीं किए थे।

मुझे मौका मिल गया। आज हिरण के हाथ में तलवार मिल चुका था। शेरे भागने लगा। हिरण पीछा करने लगा। मैंने देखा मेरे पिताजी अपने दोस्तों की मंडली में जाकर बैठ गए है। मैंने सबके सामने अपनी दादी को ले जाकर खड़ा कर दिया और आदेश दिया, पिताजी , दादी को प्रणाम कीजिए।

पिताजी के दोस्त आश्चर्यचकित हो उठे। आजतक किसी ने मेरे पिताजी के लिए आज्ञासूचक शब्दों का प्रयोग नहीं किया था। माजरा स्पष्ट होने पर सबलोग मेरे पक्ष में उठ खड़े हुए। आज आसमान के झुकने का समय था। मेरे हृदय की अग्नि के शांत होने का समय था।

हिचकिचाते हुए उन्होंने मेरी दादी को प्रणाम किया। लज्जावश घुटने तक प्रणाम करके हटने की कोशिश की। मैं जोर से चिल्लाया, ठीक से प्रणाम कीजिए। उन्होंने फिर घुटने तक प्रणाम किया और भागने की कोशिश की। इस पर दादी ने कहा, पोता ठीक हीं तो कह रहा है। ठीक से क्यों नहीं प्रणाम कर रहे हो? इस बात पर मेरे पिताजी लज्जित होते हुए दादी को 10 बार दंडवत प्रणाम किया। परिवार के सारे लोग ताली मार कर प्रसन्नता व्यक्त कर रहे थे। उनके मित्र मुस्कुरा रहे थे। दादी बोल रही थी आज मेरे पोते के कारण मेरे बेटे ने पूरी जिंदगी में पहली बार प्रणाम किया है। मेरे दिल की अग्नि शांत हो चुकी थी।

Tuesday, December 30, 2025

24 घंटे

रमेश एक अत्यंत मेहनती, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ वकील थे। उनके लिए वकालत महज एक जीविका का साधन नहीं थी, बल्कि एक साधना थी—एक ऐसी साधना जिसमें हर छोटा-बड़ा काम पूर्ण ईमानदारी, सूक्ष्म ध्यान और परिपूर्णता के साथ किया जाना चाहिए। अधूरा काम उनके लिए असहनीय था; वह उनके मन में एक स्थायी बेचैनी पैदा कर देता था, जैसे कोई काँटा लगातार चुभता रहे।

वे दिल्ली हाई कोर्ट के एक प्रतिष्ठित सीनियर एडवोकेट, श्री हरिशंकर शर्मा के चैंबर में कार्यरत थे। श्री शर्मा का नाम दिल्ली की कानूनी दुनिया में भारी था—उनकी प्रतिष्ठा, उनके मुकदमों की सफलता दर और उनका कार्यभार, तीनों ही विशाल थे। वे दिन में 18-20 घंटे काम करते, और उनके जूनियर वकीलों से भी यही अपेक्षा रखते थे। रमेश उनके सबसे भरोसेमंद जूनियर थे। सुबह सात बजे चैंबर में सबसे पहले पहुँचने वाले रमेश ही थे, और रात दस-ग्यारह बजे तक फाइलों के ढेर के बीच आखिरी व्यक्ति भी वही रहते।

फाइलों का पहाड़, लगातार अदालती तारीखें, क्लाइंट्स की बेचैनी भरी उम्मीदें, और श्री शर्मा की कभी न रुकने वाली अपेक्षाएँ—यह सब रमेश के कंधों पर था। लेकिन उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। न कभी काम से मुँह मोड़ा, न जिम्मेदारी से पीठ दिखाई। शायद यही कारण था कि श्री शर्मा को रमेश पर अटूट विश्वास था। वे अक्सर कहते, “रमेश को काम सौंप दिया तो समझो काम हो गया।”

एक बार ऐसा हुआ जब श्री शर्मा का एक बहुत महत्वपूर्ण क्लाइंट—बेंगलुरु के बड़े उद्योगपति श्री रवि मेहरा—दिल्ली बुलाए गए। मामला एक जटिल कॉर्पोरेट विवाद का था, जिसमें करोड़ों की संपत्ति और प्रतिष्ठा दाँव पर लगी थी। पूरा केस श्री शर्मा ने रमेश को ही सौंप दिया। रमेश ने पूरी लगन से फाइल पढ़ी, नोट्स तैयार किए, कानूनी धाराएँ चेक कीं और ड्राफ्ट तैयार करना शुरू किया। लेकिन ठीक उसी समय कई अन्य अत्यावश्यक मामले एक साथ आ गए—एक हाई-प्रोफाइल क्रिमिनल अपील की अंतिम सुनवाई, दो पुराने क्लाइंट्स की अर्जेंट याचिकाएँ, और एक हफ्ते में तीन महत्वपूर्ण हियरिंग्स। काम का बोझ इतना बढ़ गया कि बेंगलुरु वाले केस की तैयारी अनजाने में पीछे छूट गई।

जब वह निर्णायक दिन आया और श्री रवि मेहरा दिल्ली पहुँचे, तो श्री शर्मा ने चैंबर में सभी जूनियर्स के सामने रमेश से पूछा, “रमेश, मेहरा जी का केस तैयार है न? आज शाम को मीटिंग है, उन्हें सब डिटेल्स चाहिए।”

उस पल रमेश का दिमाग खाली हो गया। उन्हें कुछ याद नहीं आ रहा था। चेहरा सफेद पड़ गया। श्री शर्मा का चेहरा लाल हो उठा। क्लाइंट के सामने उनकी सारी प्रतिष्ठा दाँव पर लग गई। संयम टूटा और उन्होंने सबके सामने रमेश को कठोर शब्दों में फटकार लगाई—“तुम्हें पता है इस केस की अहमियत? तुम्हारी लापरवाही से मेरी पूरी साख पर सवाल उठ रहा है! इतने सालों से काम कर रहे हो और आज भी ऐसी गलती?”

शब्द इतने तीखे थे कि रमेश के आत्मसम्मान को गहरी चोट लगी। वे चुपचाप खड़े रहे। न कोई सफाई दी, न कोई बहाना बनाया। लेकिन भीतर उनका मन उबल रहा था। विचारों का तूफान चल रहा था—

“मैं रात-दिन एक नहीं करता, परिवार को भी समय नहीं दे पाता। छुट्टियाँ नहीं लेता, बीमार होने पर भी फाइलें लेकर घर जाता हूँ। फिर भी अपमान? मेरी मेहनत, मेरी निष्ठा का यही इनाम?”

क्रोध आग की तरह धधक रहा था। वे उसी क्षण श्री शर्मा के पास जाकर सब कुछ कह देना चाहते थे—अपनी थकान, अपनी पीड़ा, अपनी समर्पण की कहानी। वे लगभग उठ ही चुके थे कि तभी उनके सहकर्मी और अच्छे मित्र, अजय ने स्थिति भाँप ली। अजय रमेश के स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ था। वह जानता था कि अगर अभी रमेश गुस्से में कुछ कह देगा, तो नौकरी जा सकती है, रिश्ता बिगड़ सकता है—शायद अपूरणीय रूप से।

अजय ने धीरे से रमेश का हाथ पकड़ा और कहा, “रमेश, बस एक मिनट रुक। अभी मत जाओ।”

रमेश का क्रोध उन्हें आगे धकेल रहा था, लेकिन अजय ने शांत स्वर में कहा, “बस तीन मिनट दे दो। एक छोटी-सी कहानी सुनाता हूँ। उसके बाद जो चाहो, कर लेना।”

और अजय ने कहानी सुनानी शुरू की—

“एक संत थे, जिनकी शांति के लिए दूर-दूर तक नाम था। कोई भी अपमान, कोई भी अन्याय—उनके चेहरे पर कभी क्रोध नहीं दिखता था। एक दिन उनके शिष्य ने पूछा, ‘गुरुदेव, इतना संयम कैसे रखते हैं आप? क्रोध तो हर इंसान में आता है।’

संत ने मुस्कुराकर कहा, ‘बेटा, मेरे पिताजी ने मृत्युशय्या पर मुझे सिर्फ एक मंत्र दिया था—जब भी गुस्सा आए, 24 घंटे रुक जाना। अगर 24 घंटे बाद भी मन वही कहे, तो जो करना हो, कर लेना।’

मैंने जीवन भर इसी मंत्र को अपनाया। हर बार क्रोध आया, मैंने तुरंत जवाब नहीं दिया। 24 घंटे में परिस्थितियाँ बदल जाती हैं, मन शांत हो जाता है, और ज्यादातर मामलों में क्रोध अपने आप गायब हो जाता है। कभी-कभी तो पता चलता है कि गुस्सा आने की वजह ही गलतफहमी थी।’”

कहानी सुनकर रमेश ठिठक गए। उनका तूफान थमने लगा। उन्होंने मन ही मन तय किया—“ठीक है, मैं भी 24 घंटे रुकता हूँ।”

उसी शाम श्री शर्मा ने फिर रमेश को बुलाया। रमेश ने बहुत शांत स्वर में कहा, “सर, मुझे सिर्फ 3-4 घंटे का समय दीजिए। मैं मेहरा जी का पूरा काम तैयार कर दूँगा।”

उन्होंने रात भर जागकर, पूरी एकाग्रता से काम किया। सुबह तक केस की पूरी तैयारी हो गई—ड्राफ्ट, दस्तावेज़, कानूनी तर्क, सब कुछ। श्री रवि मेहरा मीटिंग में संतुष्ट होकर चले गए और श्री शर्मा को धन्यवाद दिया।

अगले दिन रमेश श्री शर्मा से अपनी बात कहने के लिए तैयार थे कि श्री शर्मा ने खुद उन्हें बुलाया। उनकी आँखों में पश्चाताप था। वे बोले, “रमेश, कल मैंने जो व्यवहार किया, उसके लिए मुझे बहुत खेद है। काम का दबाव इतना था कि मैंने संयम खो दिया। तुमने रात भर जागकर काम पूरा किया—यह मेरी गलती थी कि मैंने तुम पर शक किया।”

रमेश सब समझ गए। उन्हें एहसास हुआ कि कल का क्रोध श्री शर्मा के अत्यधिक दबाव का परिणाम था, न कि व्यक्तिगत द्वेष का। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “सर, कोई बात नहीं। हम सब इंसान हैं।”

उस दिन रमेश ने जीवन का एक अनमोल सबक सीखा—क्रोध का जवाब क्रोध नहीं, समय होता है।

यदि मन में आग भड़क उठे, तो तुरंत प्रतिक्रिया न दें। 24 घंटे रुकें। कारणों को समझें। भावनाओं को ठंडा होने दें। ज्यादातर मामलों में वह आग अपने आप बुझ जाती है, और जो बचता है, वह सिर्फ स्पष्टता और समझ।

इसी सिद्धांत को अपनाकर रमेश ने न केवल अपने क्रोध पर विजय पाई, बल्कि कार्यालय में उनका सम्मान और बढ़ गया। सहकर्मी उन्हें ‘शांत रमेश’ कहकर बुलाने लगे। श्री शर्मा भी अब उन्हें और अधिक जिम्मेदारी सौंपते, और रमेश हर काम को पहले से अधिक संतुलन और शांति के साथ निभाते।

सच्ची विजय वह नहीं जो बाहर जीती जाती है, बल्कि वह जो स्वयं पर प्राप्त की जाती है। और उसका सबसे सरल, सबसे प्रभावी हथियार है—शांति के साथ 24 घंटे का इंतज़ार।

नई लहर

समुद्र उस दिन असामान्य रूप से शांत था। आसमान और पानी के बीच कोई रेखा नहीं दिख रही थी, मानो दोनों ने आपस में समझौता कर लिया हो। उसी शांति को चीरते हुए एक छोटी-सी नाव भटकती हुई एक विरान टापू के किनारे आ लगी। नाव में पाँच लोग थे—एक हिंदू, एक नास्तिक, एक ईसाई, एक बौद्धिस्ट और पाँचवाँ व्यक्ति… परिस्थितियाँ स्वयं।
नाव के टूटते ही सब लोग किसी तरह तैरकर किनारे पहुँचे। दूर-दूर तक कोई बस्ती नहीं थी। ऊँचे पेड़, जंगली झाड़ियाँ और पत्थरों से भरा वह टापू मानो समय से कट चुका था।
पात्रों का परिचय
हिंदू था पंडित माधव शास्त्री—माथे पर चंदन, गले में रुद्राक्ष। हर घटना में ईश्वर की लीला खोजने वाला।
नास्तिक था अरुण—तर्कशील, आँखों में सवाल और होंठों पर हल्की मुस्कान। ईश्वर को मानव की कल्पना मानने वाला।
ईसाई था डेविड—गले में क्रॉस, चेहरे पर करुणा। हर पीड़ा में प्रार्थना खोजने वाला।
बौद्धिस्ट था तेनजिन—शांत, मौनप्रिय, आँखें आधी बंद, जैसे भीतर किसी और ही संसार में हो।
पहले दिन सबका लक्ष्य एक ही था—जीवित रहना। पानी ढूँढा गया, फल तोड़े गए, आग जलाई गई। लेकिन जैसे ही रात हुई, असली आग जल उठी—विश्वास की।
विश्वास और विवाद
माधव ने आग के पास बैठकर कहा,
“यह सब भगवान की इच्छा है। शायद हमें कोई शिक्षा देने के लिए यहाँ लाया गया है।”
अरुण हँस पड़ा।
“नाव टूटी क्योंकि लकड़ी सड़ी थी, भगवान नहीं। हर दुर्घटना में ईश्वर को घसीटना बंद करो।”
डेविड ने बीच में कहा,
“पर प्रभु की योजना हमारी समझ से परे होती है। वह हमें परीक्षा में डालते हैं।”
अरुण ने तीखे स्वर में कहा,
“अगर यह परीक्षा है, तो बच्चों की भूख और युद्ध भी परीक्षा हैं क्या?”
तेनजिन अब तक चुप था। उसने धीरे से कहा,
“दुख है। उसका कारण खोजने से अधिक आवश्यक है उसे समझना।”
माधव को यह बात खली।
“बिना ईश्वर के समझ कैसे आएगी?”
तेनजिन मुस्कुराया।
“बिना आसक्ति के।”
हर रात यही होता। कोई ईश्वर की महिमा गाता, कोई उसे नकारता, कोई करुणा की बात करता, कोई मौन में सत्य खोजता। टापू मानो एक जीवित मंच बन गया था, जहाँ सदियों पुराने मतभेद फिर से खेले जा रहे थे।
संकट
एक दिन भयंकर तूफान आया। पेड़ गिर गए, उनका आश्रय टूट गया। भोजन समाप्त होने लगा। डर सबके चेहरों पर था।
माधव ने हवन करने का प्रस्ताव रखा।
डेविड ने प्रार्थना की।
अरुण ने नाव मरम्मत की योजना बनाई।
तेनजिन ध्यान में बैठ गया।
तूफान के बाद सब थके हुए थे, पर जीवित।
अरुण ने कहा,
“अगर मैंने तर्क से लकड़ी न जोड़ी होती, तो हम बह गए होते।”
माधव बोला,
“और अगर भगवान ने शक्ति न दी होती?”
डेविड ने जोड़ा,
“और अगर प्रार्थना न होती?”
तेनजिन ने आँखें खोलीं।
“और अगर हम एक-दूसरे के बिना होते?”
समझ की सुबह
उस दिन पहली बार कोई विवाद नहीं हुआ। सब चुप थे। उन्हें समझ आ रहा था कि टापू ने उन्हें केवल फँसाया नहीं था, उसने उन्हें आईना दिखाया था।
अरुण ने माना कि आशा भी एक शक्ति है।
माधव ने स्वीकारा कि कर्म के बिना विश्वास अधूरा है।
डेविड ने समझा कि प्रार्थना के साथ प्रयास जरूरी है।
तेनजिन ने देखा कि मौन भी संवाद कर सकता है।
कुछ दिनों बाद एक जहाज़ ने उन्हें देख लिया। बचाव हो गया।
टापू पीछे छूट गया, लेकिन एक बात सबके साथ चली गई—
विश्वास अलग-अलग हो सकते हैं, पर मानवता एक ही है।
और विवाद तभी तक है, जब तक सुनना बंद है।
समुद्र फिर शांत था, पर पाँचों के भीतर अब एक नई लहर उठ चुकी थी—समझ 

तितलियाँ नही बदली

 

रविवार का दिन था। सुबह का वक्त था।शर्माजी चाय पीकर आराम फरमा रहे थे। दरवाजे की घंटी बजी। शर्मा जी ने गोलू से कहा जरा देखना कौन है?

गोलू बोला अभी आया दादाजी।गोलू के अनपेक्षित आज्ञाकारिता से दादाजी विस्मय पूर्वक आनंदित हो उठे।

गोलू दौड़ते हुए दरवाजे की तरफ भागा। बोला आज कालेज में स्पेशल क्लास है।जरा देर से आऊंगा।

शर्माजी का दिमाग ठनका।रविवार के दिन स्पेशल क्लास?खिड़की से देखा। गोलू के बाइक पे उसके कॉलेज की कोई दोस्त बैठी हुई थी।

शर्माजी मुस्कुराने लगे।बचपन पे गोलू ऐसे हीं झूठे बहाने बनाता था तितलियों को पकड़ने के लिए।

तितलियाँ बदल गयी थी पर तितलियाँ नहीँ बदलीं।

फटा हुआ ईमान:



ऑफिस का काम निबटा कर शाम को विश्वास घर की ओर चल पड़ा. अचानक जोर-जोर से चोर-चोर की आवाज आने लगी.एक जेबकतरा पकड़ा गया था. बीबी के नखरों ,ऑफिस के झगड़ों और जीवन के रगड़ों से परेशान लोगो को अपनी हताशा से निपटने का मौका मिला. जम के कुटाई हुई जेब कतरे की. लगभग मरी हुई सी हालत में उसे रोड पे फेककर सब चल पड़े फिर से बीबी के नखरों ,ऑफिस के झगड़ों और जीवन के रगड़ों से भिड़ने के लिए. 

रात हो चली थी. लगभग मरी हुई सी हालत में जेबकतरा रोड पे पड़ा हुआ था .विश्वास को जेबकतरे पे दया आ गई. उसने जेबकतरे को कंधे का सहारा देकर उठाया , पानी पिलाया और रोड के पार पहुंचा दिया. जेब कतरे ने विश्वास का बड़ा धन्यवाद दिया. कहा , गरीब होना बहुत बड़ी सजा है. जेब काटना थोड़े हीं अच्छा लगता है. उसपर पीटने का रिस्क अलग.

खैर विश्वास अपने रास्ते चल पड़ा. रास्ते में सब्जी मंडी से सब्जी ली और भुगतान के लिए ज्यों हीं अपने जेब में हाथ डाला, जेब मिली हीं नहीं. उसकी जेब कट चुकी थी. आश्चर्यचकित कोकर विश्वास कभी अपनी फटी हुई जेब देखता कभी जेबकतरे का हुआ ईमान.










रुका हुआ प्यार

 


वरुण आफिस जा रहा था। अचानक उसका मोबाइल बजने लगा। आवाज आई, वरुण मैं आशा। याद नही आ रहा था वरुण को।उसने याद दिलाया। अचानक पुरानी बातें याद आने लगी।बचपन से लेकर 10 वीं क्लास तक साथ पढ़े थे दोनों। खेल ,खुद , मार पीट साथ साथ किये। कब बचपन जवानी की दहलीज पे आ पहुंचा, पता ही ना चला।

फिर वो पढ़ने निकल पड़ा शहर। आशा की शादी हो गयी। बहुत कुछ कहने को था, कह नही पाया। आज उसने  वो बात कह ही दिया कि आशा को प्यार करता है। आशा ने फ़ोन काट दिया। 10 मिनट बाद फ़ोन आया, मैंने तुम्हे उस तरह से कभी नही देखा।

ईश्क सारा नशा उड़न छू हो गया। घर पे जाते ही बीबी को कहा जरा चाय देना। हमेशा की तरह अदरक वाली चाय मिली। आज उसकी बीबी बड़ी प्यारी लग रही थी। एक प्यार जो रुका हुआ था वर्षों से, आज बहने लगा।

समोसे वाले हाथ

 
बहुत दिनों से सोनू का पेट झड़ रहा था। बहुत दिनों से उसने समोसे नही खाये थे। घर पे खाने पीने में पूरी पाबन्दी थी। मन मसोस कर रहना पर रहा था उसे।

इसी बीच उसके बड़े भाई शहर जा रहे थे। उसे मौका मिला। जिद पकड़ ली भैया को बस पे छोड़ के ही आऊंगा।
माँ बाप भी भाई के अतिशय प्यार के प्रति नतमस्तक हो गए। अलबत्ता उसके बड़े भाई को सोनू के अचानक जगे भ्रातृ प्रेम पर शक जरूर हुआ।खैर सोनू ने भाई को बस तक  छोड़ दिया। बड़े भाई ने सोनू को 10 रुपये दिए।

इसके बाद सोनू तीर की तरह समोसे की दुकान की तरफ भागा। उसने समोसे वाले को 10 रुपये दिएे। जब उसने समोसे लेने के लिए हाथ बढ़ाए, अचानक उसके पीछे से दो हाथों ने उन समोसों को लपक लिया।

वो समोसे वाले दो हाथ उसके बड़े भाई के थे।

हिसाब पूरा हुआ

 हिसाब पूरा हुआ

गर्मी का मौसम था।श्रीकांत जी घर के बाहर नल पे साबुन लगा कर नहा रहे थे। आंखों में पूरा साबुन लगा था। अचानक उनके पीठ पे किसी ने जोर का मुक्का मारा। 
धपाक।
जब तक तक आंखों में पानी डालकर साबुन धोते, वो उड़न छू हो गया। श्रीकांत जी पकड़ नही पाए उसको।
उनका भतीजा शशि तुष्ट था।
श्रीकांत जी एक हाई स्कूल में शिक्षक थे। उनका भतीजा शशि उन्हीं के स्कूल में पढ़ता था। लगभग 6 महीने पहले श्रीकांत जी ने शशि को सही जवाब नही देने पर छड़ी से मारा था। बहुत दिनों से शशि इन्तेजार कर रहा था। आज चाचाजी के नहाते वक्त वो मौका मिला।
आज हिसाब पूरा हो गया था।

अमीरी की पहली शर्त


राजेश एक वकील के पास ड्राईवर था। पिछले पाँच दिनों से बीमार था। पगार देने वक्त साहब ने बताया कि ओवर टाइम मिलाकर और पांच दिन बीमारी के पैसे काटकर उसके 9122 रूपये बनते है। राजेश के ऊपर पुरे परिवार की जिम्मेवारी थी।मरता क्या ना करता।उसने चुप चाप स्वीकार कर लिया। साहब ने उसे 9100 रूपये दिए। पूछा तुम्हारे पास 78 रूपये खुल्ले है क्या? राजेश के पास खुल्ले नहीं थे।मजबूरन उसे  9100 रूपये लेकर लौटने पड़े। 

उसने रिक्शा लिया और घर की तरफ चल पड़ा।घर पहुंच कर रिक्शेवाले को 100 रूपये पकड़ा दिए।रिक्शेवाले के पास खुल्ले नहीं थे। रिक्शेवाले ने कोशिश की पर खुल्ले नही मिले।आखिर में रिक्शा वाले ने वो 100 रुपये राजेश को लौटा दिए।

राजेश को अपने साहब की बात याद आने लगी। बोल रहे थे, मेरा मकान , मेरी मर्सिडीज बेंज सब तो यहीं है। तुम्हारे 22 रूपये बचाने के लिए अपने घर और अपने मर्सिडीज बेंज को थोड़े हीं न बेच दूंगा। एक ये रिक्शा वाला था जिसने खुल्ले नहीं मिलने पे अपना 10 रुपया छोड़ दिया और एक उसके साहब थे जिन्होंने खुल्ले नहीं मिलने पे उसके 22 रूपये रख लिए। 

ये बात राजेश को समझ आ गयी। मर्सिडीज बेंज पाने के लिए पहली शर्त है साहब की तरह दिल से गरीबी को पकड़ना।  ज्यादा बड़ा दिल रख कर क्या बन लोगे, महज एक रिक्शे वाला।










बाबा की कुंडली

 घर छोड़ चला, मुँह मोड़ चला, मुँह मोड़ चला बुढ़ा दगाबाज निकला। दुख छोड़ चला, सुख मोड़ चला, सुख मोड़ चला बुढ़ा दगाबाज निकला।

ट्रेन द्रुत गति से  दौड़ी चली जा रही थी। बाबा इस गाने को गुनगुनाते हुए आनंद के सागर में गोते लगा रहे थे। सारे यात्री बाबा से गुढ़ रहस्य जानना चाह रहे थे। काफी अनुनय विनय के बाद उन्होंने कुंडली के गुढ़ रहस्य का  उद्घाटन करना शुरू किया।

एक एक करके उन्होंने  तंत्र, मंत्र, योग और साधना के आयामों को खोलना किया। सारे यात्री किंकर्तव्यविमूढ़ होकर बाबा से कुंडली का रहस्य सीखने को तत्पर थे।

इधर ट्रेन स्टेशनों पे रुकती, फिर बढ़ जाती। बाबा बीच बीच मे गाने को गुनगुनाने लगते। फिर रहस्य खोलने में लग जाते। यात्रियों के चेहरे पे विस्मय का भाव ज्यों का त्यों बना हुआ था।

एक नन्हे से बच्चे ने उस प्रवचन की श्रृंखला को तोड़ डाला। अब केवल ट्रेन की आवाज ही सुनाई पड़ रही थी।  ट्रेन में सन्नाटा था।

बच्चे ने पूछा था , बाबा आपकी कौन सी कुंडली जगी हुई है?




फटा हुआ ईमान

ऑफिस का काम निबटा कर शाम को विश्वास घर की ओर चल पड़ा।अचानक जोर-जोर से चोर-चोर की आवाज आने लगी।एक जेबकतरा पकड़ा गया था। बीबी के नखरों ,ऑफिस के झगड़ों और जीवन के रगड़ों से परेशान लोगो को अपनी हताशा से निपटने का मौका मिला।जम के कुटाई हुई जेब कतरे की. लगभग मरी हुई सी हालत में उसे रोड पे फेककर सब चल पड़े फिर से बीबी के नखरों ,ऑफिस के झगड़ों और जीवन के रगड़ों से भिड़ने के लिए।

रात हो चली थी।लगभग मरी हुई सी हालत में जेबकतरा रोड पे पड़ा हुआ था ।विश्वास को जेबकतरे पे दया आ गई।उसने जेबकतरे को कंधे का सहारा देकर उठाया , पानी पिलाया और रोड के पार पहुंचा दिया. जेब कतरे ने विश्वास का बड़ा धन्यवाद दिया. कहा , गरीब होना बहुत बड़ी सजा है।जेब काटना थोड़े हीं अच्छा लगता है।उसपर पीटने का रिस्क अलग।

खैर विश्वास अपने रास्ते चल पड़ा।रास्ते में सब्जी मंडी से सब्जी ली और भुगतान के लिए ज्यों हीं अपने जेब में हाथ डाला, जेब मिली हीं नहीं। उसकी जेब कट चुकी थी।आश्चर्यचकित कोकर विश्वास कभी अपनी फटी हुई जेब देखता कभी जेबकतरे का हुआ ईमान।










मर्सिडीज बेंज वाला गरीब आदमी

 


राजेश एक वकील के पास ड्राईवर था। पिछले पाँच दिनों से बीमार था। पगार देने वक्त साहब ने बताया कि ओवर टाइम मिलाकर और पांच दिन बीमारी के पैसे काटकर उसके 9122 रूपये बनते है। राजेश के ऊपर पुरे परिवार की जिम्मेवारी थी।मरता क्या ना करता।उसने चुप चाप स्वीकार कर लिया। साहब ने उसे 9100 रूपये दिए। पूछा तुम्हारे पास 78 रूपये खुल्ले है क्या? राजेश के पास खुल्ले नहीं थे।मजबूरन उसे  9100 रूपये लेकर लौटने पड़े। फिर उसने रिक्शा लिया और घर की तरफ चल पड़ा।घर पहुंच कर रिक्शेवाले को 100 रूपये पकड़ा दिए।पर रिक्शेवाले के पास खुल्ले नहीं थे। रिक्शेवाले ने कोशश की पर खुल्ले नही मिले।आखिर में रिक्शा वाले ने वो 100 रुपये राजेश को लौटा दिए।

राजेश को अपने साहब की बात याद आने लगी। बोल रहे थे, मेरा मकान , मेरी मर्सिडीज बेंज सब तो यहीं है। तुम्हारे 22 रूपये बचाने के लिए अपने घर और अपने मर्सिडीज बेंज को थोड़े हीं न बेच दूंगा। एक ये रिक्शा वाला था जिसने खुल्ले नहीं मिलने पे अपना 10 रुपया छोड़ दिया और एक उसके साहब थे जिन्होंने खुल्ले नहीं मिलने पे उसके 22 रूपये रख लिए।  ये बात राजेश को समझ आ गयी। मर्सिडीज बेंज पाने के लिए साहब की तरह गरीबी को पकड़ना बहुत जरूरी है। ज्यादा बड़ा दिल रख कर क्या बन लोगे, महज एक रिक्शे वाला।










रुकी हुई माफी



दिसंबर का महीना था।कड़ाके की ठंड पड़ रही थी।मार्च में परीक्षा होने वाली थी। भुवन मन लगाकर पढ़ रहा था। माँ ने भुवन को 2000 रुपये, गुप्ता अंकल को देंने के लिये दिए और बाजार चली गई। 

इसी बीच बिछिया आयी और झाड़ू पोछा लगाकर चली गई। जब गुप्ता अंकल पैसा लेने आये तो लाख कोशिश करने के बाद भी पैसे नही मिले।सबकी शक की नजर बिछिया पे गयी।  काफी पूछताछ की गई उससे। काफी  जलील किया गया।उसके कपड़े तक उतार लिए। कुछ नही पता चला।हाँ बीड़ी के 8-10 पैकेट जरूर मिले। शक पक्का हो गया।चोर बिछिया ही थी। पैसे न मिलने थे, न मिले।

मार्च आया। परीक्षा आयी। जुलाई में रिजल्ट भी आ गया। भुवन स्कूल में फर्स्ट आया था। अब पुराने किताबो को हटाने की बारी थी। सफाई के दौरान भुवन को वो 2000 रूपये किताबों के नीचे पड़े मिले। भुुुवन नेे वो रुपये माँ को दिए और बिछिया के बारे में पूछा। मालूम चला उसकी तबियत खराब रहने लगी थी। उसने काफी पहले से आना बंद कर दिया था।

भुवन बीछिया के घर गया, माफी मांगने। उसके पति ने कहा अच्छा ही हुआ, उस चोर को खुदा ने अपने पास बुला लिया।बिछिया गुजर चुकी थी।उसके पति ने दूसरी शादी कर ली थी। भुवन पश्चाताप की अग्नि में जलता हुआ लौट आया। 40 साल गुजर गए हैं। आज तक रुकी हुई है वो माफी।

नदी के पार

 दो युवा सन्यासी प्रातःकाल के धुंधलके में अपनी यात्रा पर निकले थे। सामने एक चौड़ी, वेगवती नदी थी—बरसात के कारण जल उफान पर था। दोनों ने अपने वस्त्र समेटे और तैरकर नदी पार करने की तैयारी करने लगे। उनके चेहरों पर वैराग्य की शांति थी, पर युवावस्था की ऊर्जा भी स्पष्ट झलक रही थी।

उसी समय, नदी के किनारे से एक युवती प्रकट हुई। उसका शरीर आधा ढका हुआ था; भीगे, हल्के और पारदर्शी वस्त्रों से उसका सौंदर्य अनायास झलक रहा था। नदी की नमी और हवा से उसके केश अस्त-व्यस्त थे। वह असहाय-सी खड़ी थी—न नदी पार कर पाने का साहस, न लौटने का मार्ग। उसने हाथ जोड़कर दोनों सन्यासियों से विनती की,
“महाराज, मुझे इस पार पहुँचा दीजिए। मैं तैर नहीं सकती।”

पहले सन्यासी ने दृष्टि झुकाई, स्वर कठोर नहीं पर दृढ़ था—
“बहन, हमने स्त्री-स्पर्श का त्याग किया है। हम आपकी सहायता नहीं कर सकते।”

दूसरा सन्यासी क्षण भर मौन रहा। उसने नदी की ओर देखा, फिर उस युवती के भयभीत चेहरे की ओर। बिना किसी तर्क-वितर्क के, बिना किसी आंतरिक उथल-पुथल को प्रकट किए, उसने कहा—
“आओ।”

उसने युवती को सम्मानपूर्वक गोद में उठाया और दृढ़ता से नदी में उतर गया। लहरें उसके शरीर से टकराती रहीं, पर उसका मन स्थिर था। कुछ ही क्षणों में वह नदी पार कर गया। किनारे पहुँचते ही उसने युवती को उतार दिया। युवती का शरीर भीगा हुआ था, वस्त्र जल से चिपके थे, पर सन्यासी की दृष्टि में न आकर्षण था, न विकार—केवल कर्तव्य की पूर्णता।

युवती ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, कृतज्ञता से नतमस्तक हुई और बिना पीछे देखे अपने मार्ग पर चली गई।

दोनों सन्यासी आगे बढ़े। कुछ दूर चलने के बाद पहला सन्यासी अपने मन की बेचैनी रोक न सका। उसने पूछा—
“भ्राता, तुम जानते हो कि नियम क्या कहते हैं। फिर तुमने उस युवती को गोद में क्यों उठाया?”

दूसरा सन्यासी मुस्कराया। उसकी मुस्कान में न अपराध था, न अहंकार। उसने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“मैंने तो उसे नदी के इस पार उतार दिया था। उसे वहीं छोड़ दिया।
पर तुम… तुम अब भी उसे अपने मन में उठाए चल रहे हो।”

पहला सन्यासी ठिठक गया। नदी तो बहुत पहले पीछे छूट चुकी थी, पर उसका मन अब भी उसी तट पर अटका हुआ था।

सिद्धि

एक शांत वन-प्रदेश के किनारे बहती हुई नदी के तट पर दो संत आमने-सामने बैठे थे। संध्या का समय था—काश में हल्की लालिमा, जल में सूर्य की अंतिम किरणों की थरथराती परछाइयाँ। वातावरण स्वयं ध्यानमय था। उसी मौन को भंग करते हुए एक संत ने दूसरे संत की ओर देखा और अपनी सिद्धि का परिचय देने की इच्छा से उठ खड़ा हुआ।

उसने बिना किसी सहारे के नदी की ओर कदम बढ़ाए। जैसे ही उसके चरण जल को स्पर्श करने लगे, लहरें थमने लगीं। जल कठोर भूमि-सा स्थिर हो गया, मानो प्रकृति स्वयं उसकी तपस्या के आगे नतमस्तक हो गई हो। वह संत धीरे-धीरे, पूरे आत्मविश्वास के साथ, जल के ऊपर पैदल चलता हुआ नदी पार करने लगा। उसके चेहरे पर संतोष नहीं, बल्कि सूक्ष्म गर्व की झलक थी—मानो वह कहना चाहता हो कि मैंने असंभव को संभव कर दिखाया है

किनारे खड़ा दूसरा संत यह सब देख रहा था। उसके चेहरे पर न आश्चर्य था, न प्रशंसा, न ही कोई प्रतिक्रिया। उसकी आँखों में वही गहराई थी जो नदी के जल में थी—शांत, स्थिर और मौन।

नदी पार कर लेने के बाद पहला संत मुड़ा और गर्व से बोला,“देखा? यह है मेरी साधना की सिद्धि। वर्षों के तप, संयम और ध्यान का फल।”

दूसरे संत ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने न तर्क किया, न तुलना। वह बस धीरे-धीरे आगे बढ़ा, एक साधारण-सी लकड़ी की नाव पर चढ़ा, नाविक को संकेत किया और सहज भाव से नदी पार करने लगा। न कोई चमत्कार, न कोई प्रदर्शन—बस साधारण मार्ग, साधारण साधन।

जब वह किनारे पहुँचा, तो उसने शांत, स्थिर और करुण स्वर में कहा—“चमत्कार शक्ति प्राप्त कर लेने में नहीं है। शक्ति तो कई बार अहंकार को भी मजबूत कर देती है। सच्चा चमत्कार यह है कि शक्ति पा लेने के बाद भी मन शांत रहे, जीवन साधारण रहे, और अहंकार न जागे। जो दिखाने में लगा है, वह अभी भीतर की यात्रा में अधूरा है; और जो भीतर पहुँच गया है, उसे कुछ सिद्ध करने की आवश्यकता ही नहीं रहती।”

उसने आगे कहा—“नदी पर चलना कठिन नहीं, कठिन है अपने मन पर चलना। जल को जीत लेना साधना हो सकती है, पर स्वयं को जीत लेना ही सिद्धि है।”

यह कहकर वह बिना पीछे देखे आगे बढ़ गया। उसके कदमों में न गर्व था, न घोषणा—केवल सहजता थी। जैसे वह यह स्मरण कराता हो कि सच्ची आध्यात्मिक ऊँचाई ऊँचे दिखने में नहीं, बल्कि अदृश्य हो जाने में है; कि वास्तविक सामर्थ्य वही है जो मौन में विलीन हो जाए।

और नदी? वह फिर से बहने लगी—यह सिखाते हुए कि प्रवाह में रहना ही जीवन है, और ठहरकर दिखना केवल क्षणिक भ्रम।

पुस्तकालय की आग

 एक विद्वान प्रोफेसर का विशाल पुस्तकालय—हज़ारों दुर्लभ ग्रंथों, वर्षों की साधना और अनगिनत रातों की तपस्या का साक्षी—अचानक आग की भेंट चढ़ गया।

लकड़ी की अलमारियाँ चरमराईं, काग़ज़ की पत्तियाँ चीत्कार-सी करती हुई राख में बदल गईं।
धुआँ उठा, लपटें नाचीं, और ज्ञान का वह भौतिक संसार देखते ही देखते भस्म हो गया।

पूरे महाविद्यालय में हड़कंप मच गया।
क्लर्क घबराए हुए इधर-उधर दौड़ने लगे, छात्र स्तब्ध खड़े रह गए, सहकर्मी सिर पकड़कर बैठ गए—
“सब कुछ नष्ट हो गया!”
“इतने वर्षों का संग्रह!”
“अब क्या होगा?”

पर इस कोलाहल के बीच, प्रोफेसर शांत बैठे रहे।
न आँखों में आँसू, न चेहरे पर शिकन।
मानो आग ने केवल लकड़ी और काग़ज़ जलाए हों, उनके भीतर कुछ भी नहीं।

एक क्लर्क, जो यह दृश्य सह नहीं पाया, साहस जुटाकर पूछ बैठा—
“सर, आपको ज़रा भी चिंता नहीं है?
आपकी सारी किताबें… सब जल गईं…”

प्रोफेसर ने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया—
“चिंता किस बात की?”
“जो जल सकता था, वह तो केवल काग़ज़ था।”
“मेरी सारी पुस्तकें तो मेरे दिमाग में हैं।”

उस क्षण क्लर्क निरुत्तर रह गया।
उसे पहली बार समझ आया कि सच्चा ज्ञान अलमारियों में नहीं, चेतना में रहता है
जो पढ़ा गया है और जिया गया है, वह आग, समय या विनाश से नष्ट नहीं होता।

पुस्तकालय राख हो गया था,
पर प्रोफेसर के भीतर ज्ञान का दीपक पहले से अधिक उज्ज्वल जल रहा था।

एक लोटा पानी

 एक नगर में एक अत्यंत धनवान व्यक्ति रहता था। उसके पास ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं थी—सोना, चाँदी, विशाल हवेलियाँ, सेवकों की कतारें और व्यापार का अथाह विस्तार। फिर भी उसका मन कहीं न कहीं अशांत रहता था। एक दिन उसने नगर के बाहर रहने वाले एक संत के विषय में सुना, जिनकी वाणी में शांति और जीवन का गूढ़ सत्य झलकता था।

जिज्ञासावश वह संत के पास पहुँचा। संत एक वृक्ष के नीचे बैठे थे—न कोई आडंबर, न कोई वैभव। उनका चेहरा शांत था, आँखों में करुणा और वाणी में सहज सत्य। धनवान व्यक्ति ने उनके उपदेश सुने। हर शब्द उसके हृदय को छू रहा था, मानो वर्षों से जमी धूल हटती जा रही हो। वह भीतर ही भीतर अत्यंत प्रसन्न और कृतज्ञ हो उठा।

भावावेश में आकर उसने संत से कहा—
“महाराज, आपने मुझे आज जीवन का सच्चा अर्थ समझा दिया। मैं अत्यंत धनवान हूँ। आप जो कुछ भी चाहें, मुझसे मांग लीजिए। धन, भूमि, वस्त्र, आश्रम—जो चाहें, वह मैं तुरंत प्रदान कर दूँगा।”

धनवान के मन में एक स्वाभाविक अपेक्षा थी—उसे लगा संत अवश्य कोई बड़ा दान, कोई विशाल व्यवस्था या संपत्ति माँगेंगे। किंतु संत मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में न लोभ था, न संकोच।

संत ने शांत स्वर में कहा—
“यदि संभव हो, तो इस लोटे में थोड़ा सा पानी भर दीजिए। प्यास लगी है।”

यह सुनते ही धनवान व्यक्ति स्तब्ध रह गया। उसके हाथ काँप गए। जिस व्यक्ति के पास सब कुछ था, वह पहली बार समझ पाया कि सच्चा वैराग्य क्या होता है। संत की यह सादगी उसके समस्त ऐश्वर्य पर भारी पड़ गई। उसे लगा जैसे उसके धन का भार अचानक बहुत हल्का हो गया हो, और संत की झोली—जो खाली थी—वास्तव में सबसे भरी हुई थी।

पानी भरते समय उसकी आँखें नम थीं। उस क्षण वह संत के चरणों में नहीं, बल्कि उनकी सादगी के सामने झुक गया।

उसने समझ लिया कि जिसे कम में तृप्ति मिल जाए, वही वास्तव में सबसे धनवान होता है।

संत , हाथी और माया

 किसी समय की बात है। गंगा के किनारे बसे एक शांत आश्रम में एक महान संत निवास करते थे। दूर-दूर से लोग उनके प्रवचनों को सुनने आते थे। संत का स्वर गंभीर और शांत था, और उनके वचनों में गहरी अनुभूति छिपी रहती थी। वे प्रायः कहा करते थे—

“यह संसार माया है। जो कुछ दिखाई देता है, वह नश्वर है। सत्य केवल ब्रह्म है।”

एक दिन आश्रम के प्रांगण में अनेक शिष्य और नगरवासी एकत्र थे। संत माया और ब्रह्म के भेद पर विस्तार से प्रकाश डाल रहे थे। शिष्य ध्यानमग्न होकर सुन रहे थे। उसी समय नगर की ओर से अचानक शोर सुनाई दिया—ढोल की आवाज़, लोगों की चिल्लाहट और ज़मीन के काँपने जैसा कंपन।

थोड़ी ही देर में एक पीलवान दिखाई दिया, जो एक विशाल हाथी को लेकर मार्ग से गुजर रहा था। हाथी मस्त था और उसकी आँखों में उग्रता झलक रही थी। पीलवान ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था—
“हटो! हटो! रास्ते से हट जाओ! हाथी बेकाबू है!”

अधिकांश लोग भयभीत होकर इधर-उधर हट गए। कुछ आश्रम के भीतर चले गए, कुछ पेड़ों के पीछे छिप गए। परंतु एक युवा शिष्य वहीं बैठा रहा। उसके चेहरे पर न भय था, न चिंता। वह मन ही मन गुरु के वचनों को दोहरा रहा था—
“यह संसार माया है… हाथी भी माया है… भय भी माया है।”

हाथी आगे बढ़ता गया। पीलवान ने उस शिष्य को देखकर और ज़ोर से पुकारा—
“अरे साधु! हट जाओ! जान चली जाएगी!”

पर शिष्य टस से मस न हुआ। उसने सोचा—यदि सब माया है, तो हटने वाला कौन और डरने वाला कौन?
क्षण भर में हाथी पास पहुँचा और अपनी सूँड़ से शिष्य को ज़ोर से धक्का दे दिया। शिष्य दूर जा गिरा और बुरी तरह घायल हो गया।

लोग दौड़कर आए, उसे उठाया और आश्रम में ले गए। संत भी वहाँ पहुँचे। उन्होंने शिष्य की चोटों पर मरहम लगाया और प्रेम से उसका मस्तक सहलाया।

कुछ समय बाद शिष्य ने कराहते हुए कहा—
“गुरुदेव, आप तो कहते हैं कि संसार माया है। फिर यह हाथी मुझे कैसे घायल कर गया?”

संत मंद मुस्कान के साथ बोले—
“वत्स, मैंने यह अवश्य कहा है कि संसार माया है, पर यह भी समझना आवश्यक है कि माया के भी अपने नियम होते हैं
जब पीलवान तुम्हें हटने के लिए कह रहा था, तब वह भी उसी परम सत्ता का रूप था। भगवान ही तुम्हें चेतावनी दे रहे थे। तुमने माया को तो माना, पर माया के नियमों की उपेक्षा कर दी।”

संत ने आगे कहा—
“जल माया है, पर उसमें डूबने का नियम है। अग्नि माया है, पर उसका धर्म जलाना है। इसी प्रकार हाथी भी माया है, पर उसका स्वभाव कुचलना है।
माया में रहते हुए माया के नियमों से बचना भी विवेक है। केवल ज्ञान नहीं, व्यवहारिक बुद्धि भी आवश्यक है।”

शिष्य की आँखों से आँसू बह निकले। उसने गुरु के चरणों में सिर रख दिया और कहा—
“गुरुदेव, आज मुझे सच्चा ज्ञान मिला। माया को समझना ही नहीं, उसके बीच सही आचरण करना भी साधना है।”

संत ने आशीर्वाद देते हुए कहा—
“यही जीवन का संतुलन है—ज्ञान और व्यवहार का समन्वय।”

उस दिन के बाद आश्रम में यह कथा एक शिक्षा बनकर प्रचलित हो गई—
कि संसार भले ही माया हो, पर माया में जीते हुए उसके नियमों का सम्मान करना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है।

Monday, December 29, 2025

अशोक वाटिका

 

रामायण की कथा में, जब भगवान राम की सेना वानरों के साथ दक्षिण समुद्र के तट पर पहुंची, तब उन्हें लंका जाने के लिए विशाल समुद्र को पार करने की चुनौती का सामना करना पड़ा। सीता जी को रावण द्वारा अपहरण कर लंका ले जाया गया था, और अब राम की सेना को उनकी खोज में लंका पहुंचना था। लेकिन समुद्र इतना विशाल था कि कोई भी वानर उसे पार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। सभी वानर और भालू अपनी-अपनी शक्तियों का बखान कर रहे थे, लेकिन कोई भी पूरे समुद्र को लांघने में सक्षम नहीं लग रहा था।

उस समय, वानर सेना में जामवंत जी थे, जो एक प्राचीन और बुद्धिमान भालू राजा थे। वे भगवान राम के पिता दशरथ के समय से ही जीवित थे और उन्हें देवताओं की कई कथाएं मालूम थीं। जामवंत जी ने देखा कि हनुमान जी चुपचाप बैठे हुए हैं, मानो वे अपनी शक्ति को भूल चुके हों। हनुमान जी बचपन में बहुत शरारती और शक्तिशाली थे, लेकिन एक श्राप के कारण उन्होंने अपनी शक्तियां भूल ली थीं। जामवंत जी को यह सब मालूम था, इसलिए उन्होंने हनुमान जी को प्रोत्साहित करने का फैसला किया।

जामवंत जी ने हनुमान जी से कहा, "हे पवनपुत्र! तुम्हें अपनी जन्म कथा याद है? तुम देवराज इंद्र के वरदान से अविनाशी हो, ब्रह्मा जी ने तुम्हें अजर-अमर बनाया है। तुम्हारे पिता पवन देव हैं, जो हवा की गति से तेज हैं। बचपन में तुमने सूर्य को फल समझकर निगलने की कोशिश की थी, और देवताओं ने तुम्हारी शक्ति देखकर डर गए थे। लेकिन जब तुमने इंद्र के वज्र से चोट खाई, तो पवन देव ने क्रोधित होकर सारी हवा रोक दी थी। तब देवताओं ने तुम्हें कई वरदान दिए – अग्नि तुम्हें जला नहीं सकती, जल तुम्हें डुबो नहीं सकता, और तुम्हारी गति असीम है।"

जामवंत जी ने आगे कहा, "हे वीर! तुम्हारे गुरु सूर्य देव ने तुम्हें सभी शास्त्र सिखाए हैं। तुम राम भक्त हो, और राम का कार्य करने के लिए तुम्हारी शक्तियां स्वतः जागृत हो जाएंगी। यह श्राप था कि तुम अपनी शक्ति तब तक भूलोगे जब तक कोई तुम्हें याद न दिलाए। अब मैं तुम्हें याद दिला रहा हूं – तुम समुद्र को लांघ सकते हो, पर्वतों को उखाड़ सकते हो, और राक्षसों को पराजित कर सकते हो। उठो, हनुमान! राम का कार्य करो और सीता जी की खोज में लंका जाओ!"

जामवंत जी की ये बातें सुनकर हनुमान जी की आंखें खुल गईं। वे अपनी भूली हुई शक्तियों को याद करने लगे। बचपन की सारी घटनाएं उनकी आंखों के सामने घूम गईं – कैसे वे आकाश में उड़कर सूर्य तक पहुंचे थे, कैसे देवताओं ने उन्हें वरदान दिए थे। हनुमान जी का शरीर विशाल होने लगा, उनकी आंखें लाल हो गईं, और वे जोर से गरज उठे। उन्होंने कहा, "अब मुझे सब याद आ गया। मैं राम का दूत हूं, और मैं लंका जाकर सीता जी का पता लगाऊंगा!" सभी वानरों ने जयकारे लगाए, और हनुमान जी ने समुद्र पार करने की तैयारी की।

हनुमान जी ने महेंद्र पर्वत पर चढ़कर अपनी पूंछ को लपेटा और एक विशाल छलांग लगाई। वे आकाश में उड़ चले, मानो पवन देव स्वयं उन्हें सहारा दे रहे हों। समुद्र पार करने के दौरान कई चुनौतियां आईं। सबसे पहले, मैनाक पर्वत ने उन्हें विश्राम करने के लिए आमंत्रित किया, लेकिन हनुमान जी ने मना कर दिया क्योंकि वे राम के कार्य में विलंब नहीं करना चाहते थे। फिर, सुरसा नाम की एक नागमाता ने उनका रास्ता रोका। सुरसा देवताओं की आज्ञा से आई थीं, जो हनुमान जी की परीक्षा लेना चाहते थे। सुरसा ने कहा, "तुम्हें मेरे मुंह से होकर जाना होगा!"

हनुमान जी ने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया। वे पहले अपने शरीर को विशाल बनाए, लेकिन सुरसा ने अपना मुंह और बड़ा कर लिया। फिर हनुमान जी ने खुद को बहुत छोटा कर लिया – मच्छर के आकार का – और सुरसा के मुंह में घुसकर तुरंत बाहर निकल आए। सुरसा प्रसन्न हुईं और बोलीं, "तुम्हारी बुद्धि और शक्ति दोनों अद्भुत हैं। जाओ, तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा!" इस तरह हनुमान जी ने सुरसा का सामना किया और आगे बढ़े।

समुद्र पार करने के दौरान हनुमान जी की छाया पर एक राक्षसी सिंहिका ने हमला किया, लेकिन हनुमान जी ने उसे मार गिराया। आखिरकार, वे लंका के तट पर पहुंचे। लंका सोने की नगरी थी, चारों ओर ऊंची दीवारें और राक्षस पहरेदार थे। हनुमान जी ने खुद को छोटा कर लिया और लंका में प्रवेश किया। उन्होंने पूरी नगरी की खोज की – रावण के महल, उसके कक्ष, लेकिन सीता जी कहीं नहीं मिलीं।

फिर वे अशोक वाटिका पहुंचे, जो एक सुंदर उद्यान था, जहां फूलों और वृक्षों की छांव में सीता जी कैद थीं। सीता जी उदास बैठी हुई थीं, रावण की राक्षसियां उन्हें घेरे हुए थीं। हनुमान जी एक वृक्ष पर छिपकर बैठ गए और सीता जी को देखते रहे। उन्होंने राम की अंगूठी को नीचे गिराकर सीता जी का ध्यान आकर्षित किया। सीता जी डर गईं, लेकिन हनुमान जी ने खुद को प्रकट किया और कहा, "मैं राम का दूत हूं, हनुमान। राम आपको लेने आएंगे। यह उनकी अंगूठी है प्रमाण के रूप में।"

सीता जी ने हनुमान जी को पहचाना और प्रसन्न हुईं। उन्होंने अपना चूड़ामणि हनुमान जी को दिया, जो राम तक पहुंचाने के लिए था। हनुमान जी ने सीता जी को आश्वासन दिया कि राम जल्दी ही लंका पर चढ़ाई करेंगे और रावण का वध करेंगे। फिर हनुमान जी ने अशोक वाटिका में उत्पात मचाया, कई राक्षसों को मारा, और अंत में रावण के पुत्र अक्षयकुमार को भी पराजित किया। लेकिन वे स्वयं को बंधन में डलवाया ताकि रावण के दरबार में पहुंच सकें और उसकी शक्ति का आकलन कर सकें।

इस तरह, जामवंत जी के प्रोत्साहन से हनुमान जी ने अपनी शक्तियां याद कीं, समुद्र पार किया, सुरसा का सामना किया, लंका पहुंचे और अशोक वाटिका में सीता जी से मिलकर राम के कार्य को आगे बढ़ाया। यह कथा हनुमान जी की भक्ति, शक्ति और बुद्धि का प्रतीक है, जो आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करती है।

Sunday, December 28, 2025

ईश्वर की पर्ची

शाम का समय था। छोटे से कस्बे के सरकारी अस्पताल में अब मरीजों की भीड़ छँट चुकी थी। बरामदे में फैली दवाइयों की तीखी गंध, फर्श पर गूंजते कदमों की प्रतिध्वनि और दीवार पर टंगी घड़ी की लगातार होती टिक–टिक—सब मिलकर एक नीरस, किंतु यथार्थपूर्ण वातावरण रच रहे थे।

उसी निस्तब्धता को चीरते हुए एक संत धीरे–धीरे भीतर आए। कंधे पर पुराना झोला, चेहरे पर अद्भुत शांति, पर छाती में जमी पुरानी खाँसी जो हर कुछ क्षणों में उनके शरीर को झकझोर देती थी।

डाक्टर ने ऊपर देखा। सफेद कोट में बैठा वह व्यक्ति आधुनिक विज्ञान का प्रतिनिधि था—जिसका विश्वास नाड़ी की गति, एक्स–रे की रिपोर्ट और रासायनिक दवाओं की संरचना में था। उसने संत को ऊपर से नीचे तक देखा, मानो किसी सिद्धांत का परीक्षण कर रहा हो। हल्की मुस्कान के साथ, किंचित व्यंग्य में बोला—

“बाबा, आप तो संन्यासी हैं। ईश्वर पर आपकी आस्था अटूट होगी। इतनी खाँसी है, तो अपने भगवान से ही ठीक क्यों नहीं करा लेते? यहाँ विज्ञान का क्या काम?”

यह प्रश्न केवल जिज्ञासा नहीं था—यह विज्ञान की श्रेष्ठता का एक मौन दावा था।

संत ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। उन्होंने पास पड़ी कुर्सी खींची, बैठ गए। खाँसी को थामते हुए उन्होंने गहरी साँस ली और शांत, स्थिर दृष्टि से डाक्टर की आँखों में देखा। फिर बोले—

“बेटा, यदि ईश्वर सब कुछ स्वयं ही कर देता, तो मनुष्य को बुद्धि क्यों देता? और यदि बुद्धि दी है, तो उसका प्रयोग भी उसी की इच्छा से है। उसी भगवान ने तो मुझे आपके पास भेजा है—इलाज के लिए।”

डाक्टर क्षण भर को चुप हो गया। उसकी कलम हवा में ही थम गई। यह उत्तर उसे भीतर तक चुभ गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके मन में छिपे उस अहं को छू लिया हो, जो कहता था—‘सब कुछ मैं जानता हूँ।’

फिर भी उसने तर्क का सहारा लिया—

“लेकिन बाबा, बीमारी का कारण तो जीवाणु हैं, वायरस हैं, शारीरिक कमजोरी है। इसमें ईश्वर कहाँ से आ गया?”

संत मुस्कुराए। यह मुस्कान विजय की नहीं, समझ की थी।

“और उन जीवाणुओं को पहचानने की दृष्टि किसने दी? दवाइयों की खोज किस बुद्धि से हुई? क्या कारण और कार्य की यह पूरी श्रृंखला भी किसी नियम से नहीं चलती? आप उसे प्रकृति कहते हैं, मैं उसे ईश्वर कहता हूँ—नाम अलग हैं, सत्य एक है।”

संत ने आगे कहा—

“ईश्वर केवल मंदिरों या आश्रमों में नहीं रहते, बेटा। वह प्रयोगशालाओं में भी हैं, पुस्तकों में भी हैं, और आपके हाथों में भी। जब कोई किसान बीज बोता है, तो क्या वह केवल भगवान पर निर्भर रहता है? नहीं—वह हल चलाता है, खेत सींचता है। पर भीतर कहीं यह विश्वास भी रखता है कि प्रकृति साथ देगी। यही संतुलन जीवन है।”

डाक्टर की आँखें अब झुकी हुई थीं। उसका विज्ञान अस्वीकार नहीं हुआ था, बल्कि उसे एक व्यापक अर्थ मिल गया था। उसे पहली बार लगा कि विज्ञान और भक्ति परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो पूरक मार्ग हैं—एक बाह्य जगत को समझता है, दूसरा आंतरिक को।

उसने चुपचाप पर्ची लिखी, दवा दी, और अनायास ही उसके हाथ संत के चरणों की ओर बढ़ गए। यह श्रद्धा किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि विनम्रता की थी।

संत उठे, झोला संभाला और जाते–जाते बोले—

“आप अपना कर्म करते रहिए, मैं अपनी प्रार्थना। जब कर्म और विश्वास साथ चलते हैं, तभी रोग भी हार मानता है।”

घड़ी फिर से टिक–टिक करने लगी। अस्पताल वही था, कुर्सियाँ वही थीं, दवाइयों की गंध भी वही—पर डाक्टर के भीतर कुछ बदल चुका था। अब जब भी कोई मरीज उसके सामने बैठता, उसे लगता—

शायद आज भी भगवान किसी और रूप में उसके पास आए हैं—इलाज के लिए नहीं, बल्कि उसे और अधिक मानवीय बनाने के लिए।

Saturday, December 27, 2025

मिश्रा का मतलब क्या

एक दिन रोज़ की तरह मैं ऑफिस से घर गया तो मेरा बेटा अनिकेत कुछ नाराज़-सा बैठा हुआ था।

मैंने उससे पूछा :
पिता : बेटा, क्यों नाराज़ हो?

पुत्र : पापा, आज स्कूल में मुझे डाँट पड़ी। मैडम ने मेरे नाम का मतलब मुझसे पूछा तो मैं बता नहीं पाया। पापा, आपने मुझे मेरे नाम का मतलब क्यों नहीं बताया?

पिता : बेटा, तुमने मुझसे पूछा नहीं। तुम्हारे नाम अनिकेत का मतलब होता है — जो किसी एक जगह या इच्छा से बँधा न हो।

पुत्र : इच्छा मतलब?

पिता : इसका मतलब जो तुम्हें अच्छा लगता है। जैसे कि तुम मिठाई चाहते हो।

पुत्र : लेकिन मैं तो स्पाइडर-मैन भी चाहता हूँ, डोरेमॉन भी चाहता हूँ। तो फिर आपने मेरा नाम अनिकेत क्यों रखा?

पिता : ताकि बड़े होकर तुम अपनी चाहतों से ऊपर उठ सको।

पुत्र : तो क्या चाहतों से ऊपर उठना अच्छी बात है?

पिता : हाँ।

पुत्र : तो फिर आपने अपना नाम अनिकेत क्यों नहीं रखा?

पिता : क्योंकि मेरा नाम रोहन प्रकाश तुम्हारे दादाजी ने रखा था।

पुत्र : आपने अपना नाम खुद क्यों नहीं रखा?

पिता : बेटा, आदमी अपना नाम खुद नहीं रखता, माँ-बाप ही रखते हैं।

पुत्र : लेकिन दादाजी का नाम तो हरिनाथ वर्मा था, फिर लोग उन्हें आशादीप जी क्यों कहते हैं?

पिता : क्योंकि तुम्हारे दादाजी कभी निराश नहीं होते थे।

पुत्र : तो लोग उन्हें हरिनाथ वर्मा भी तो कह सकते थे?

पिता : हाँ, लेकिन दादाजी नहीं चाहते थे कि लोग उन्हें उपनाम से पहचानें।

पुत्र : क्यों? उपनाम में बुरी बात क्या है?

पिता : बेटा, तुम्हारे दादाजी सामाजिक भेदभाव के खिलाफ थे, इसलिए।

पुत्र : अच्छा, इसीलिए आपने मेरा नाम सिर्फ अनिकेत रखा, अनिकेत वर्मा नहीं।

पिता : हाँ बेटा।

पुत्र : तो क्या किसी समाज से जुड़ना गलत बात है?

पिता : बेटा, ये सवाल तुम दादाजी से पूछ लेना।

पुत्र : नहीं पापा, मैं समझ गया। इसीलिए चाचाजी का नाम निखिल भारद्वाज है, क्योंकि वो अलग पहचान रखना चाहते हैं।

पिता : नहीं बेटा, भारद्वाज एक पारिवारिक परंपरा से जुड़ा नाम है।

पुत्र : तो क्या सब लोग भारद्वाज होते हैं?

पिता : नहीं अनिकेत, अब तुम चुप हो जाओ और पढ़ाई करो।

पुत्र : आप गंदे पापा हैं। आप मुझे समझाइए — ये परंपरा क्या होती है?

पिता : बेटा, तुम अभी नहीं समझ पाओगे।

पुत्र : पापा, आप मुझे कुछ नहीं बताते। मैं फिर स्कूल में डाँट खाऊँगा। मोहन चतुर्वेदी को कम डाँट पड़ती है क्योंकि उसके पापा उसे सब कुछ बताते हैं।

पिता : अच्छा पूछो, और क्या पूछना है?

पुत्र : पापा, चतुर्वेदी का मतलब क्या होता है?

पिता : बेटा, इसका मतलब होता है — बहुत ज्ञान रखने वाला।

पुत्र : ज्ञान क्या चीज़ है?

मैं बेटे के इतने सवालों से झुँझला उठा था, फिर भी अच्छा पापा बनने के चक्कर में जवाब देता जा रहा था।

पिता : बेटा, ज्ञान मतलब बहुत अच्छी किताबें।

पुत्र : तो क्या मेरी ए-बी-सी-डी वाली किताब जैसी?

पिता : नहीं बेटा, उससे बहुत बड़ी।

पुत्र : तो क्या मोहन चतुर्वेदी ने बहुत बड़ी किताबें पढ़ रखी हैं?

पिता : नहीं बेटा, ये नाम लोग इसलिए रखते हैं ताकि बच्चे पढ़े-लिखे बनें।

पुत्र : तो क्या अच्छे कामों के लिए लोग अच्छे-अच्छे नाम रखते हैं?

पिता : हाँ बेटा, बिल्कुल सही समझे।

पुत्र : हाँ पापा, पर मेरा दोस्त सौरभ मिश्रा मुझसे पूछ रहा था कि मिश्रा का मतलब क्या होता है। पापा, आप बताइए ना।

मैं झुँझला गया और बेटे को डाँट दिया —
बोला, ये बात बाद में बताऊँगा।

सच तो ये है पाठकों, मुझे भी नहीं पता कि मिश्रा का असली मतलब क्या है।

इसीलिए ये कहानी लिख रहा हूँ।
अब आप समझदार लोग ही मेरी मदद करें और मेरे बेटे को बताएं कि —

मिश्रा का मतलब क्या होता है?

सन्डे के बाद मंडे , सैटरडे क्यों नहीं ?

 एक दिन रविवार बहुत खुश था।

पूरे हफ्ते काम करवाने के बाद उसे आराम करने का संवैधानिक अधिकार मिला हुआ था।
लोग देर से उठते, चाय ठंडी हो जाती, और आत्मा गरम। 

लेकिन जैसे ही शाम ढली, रविवार की हँसी फीकी पड़ने लगी।

रविवार ने कैलेंडर से पूछा—
“भाई, मेरे बाद मंडे ही क्यों आता है?
कोई और क्यों नहीं?
जैसे… सैटरडे?”

कैलेंडर ने चश्मा ठीक किया और बोला—
“यह प्रश्न साधारण नहीं है, यह अस्तित्ववादी संकट है।”

मंडे काली फाइल, अलार्म घड़ी और ई-मेल्स की तलवार लेकर आया।

उसने कहा—
“देखो रविवार,
मैं दुख देने नहीं आता,
मैं अनुशासन लेकर आता हूँ।”

रविवार बोला—
“पर लोग तो तुम्हें देखकर
आत्मा तक साइलेंट मोड पर डाल देते हैं!”

मंडे मुस्कुराया—
“यही तो मेरी उपयोगिता है।
अगर मैं न होऊँ,
तो तुम्हारी कीमत कौन समझे?”

इतने में सैटरडे बीच में कूद पड़ा—

“मुझे क्यों नहीं मौका मिलता?
मैं भी तो खुशमिज़ाज हूँ,
पार्टी, पिज़्ज़ा और प्लान्स से भरा हुआ!”

कैलेंडर बोला—
“तुम्हारी समस्या यही है सैटरडे,
तुम जिम्मेदारी से एलर्जिक हो।”

तभी समय स्वयं प्रकट हुआ—

गंभीर, शांत और लेट होने वाला।

उसने कहा—
“सन्डे के बाद मंडे इसलिए है
क्योंकि जीवन में
हर सुख के बाद
एक उत्तरदायित्व आता है।

अगर सन्डे के बाद सैटरडे होता,
तो मनुष्य
कभी बड़ा ही न होता।”

रविवार ने गहरी साँस ली और कहा—

“तो मैं सिर्फ़ छुट्टी नहीं हूँ…
मैं तैयारी हूँ।”

मंडे बोला—
“और मैं सज़ा नहीं…
मैं संस्कार हूँ।”

और तभी अलार्म बजा… 

मनुष्य उठा और बोला—
“सन्डे के बाद मंडे क्यों है,
अब समझ आया…
पर मानना अभी भी मुश्किल है।”

— समाप्त, पर मंडे जारी है। 

Thursday, December 25, 2025

एक और एक दो क्यों, तीन क्यों नहीं

भारत के एक छोटे से शहर में एक स्कूल था,
और उस स्कूल में एक ऐसी चीज़ पढ़ाई जाती थी
जिससे बच्चे ज़्यादा डरते थे—
गणित।

उस दिन मैथ्स की परीक्षा थी।
क्लास में सन्नाटा ऐसा था
जैसे सबको पता हो कि
आज इमोशनल डैमेज पक्का है।

पेपर खुला।
पहला सवाल:

“एक और एक कितने होते हैं?”

पूरी क्लास ने चैन की साँस ली—
“चलो, आज ज़िंदा बच जाएँगे।”

सबने लिखा: दो
क्योंकि सिस्टम यही चाहता है।

लेकिन चीकू…
चीकू ने सिस्टम को देखा,
ज़िंदगी को देखा,
और लिखा—
तीन।

टीचर की आँखों में वही चमक आई
जो तब आती है
जब कोई बच्चा करियर बर्बाद करने पर तुला हो।

“चीकू,” टीचर बोलीं,
“एक और एक दो होते हैं।
तीन कैसे?”

चीकू बोला:

“मैडम, एक सुनसान टापू पर
एक अकेला मर्द रहता है।
इतना अकेला कि
उससे बात करने को
उसकी परछाईं भी मना कर चुकी थी।”

क्लास अब पूरी तरह अलर्ट।

“फिर एक दिन,” चीकू बोला,
“वहाँ एक लड़की आती है।
सुंदर।
ज़िंदा।
और सबसे बड़ी बात—
अकेली।”

टीचर को अब पछतावा होने लगा
कि सवाल पूछा क्यों।

“पहले बातें होती हैं,”
“फिर नज़दीकियाँ,”
“फिर प्यार,”
“और फिर वो गलती
जिसे समाज ‘भविष्य’ कहता है।”

नौ महीने बाद…
एक बच्चा पैदा होता है।

चीकू मुस्कुराया:

“तो मैडम,
एक और एक मिलकर तीन हो गए।”

टीचर ने गुस्से में कहा:

“चीकू!
गणित में हम नंबर जोड़ते हैं,
इंसान नहीं!”

चीकू ने शांत स्वर में जवाब दिया:

“मैडम,
गणित में दो होते हैं,
ज़िंदगी में तीन,
और ज़िम्मेदारियों में
हमेशा चार।

क्लास हँसी,
टीचर चुप,
और गणित उस दिन समझ गया कि—

वह ज़िंदगी के सामने
केवल एक थ्योरी है।

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