एक विद्वान प्रोफेसर का विशाल पुस्तकालय—हज़ारों दुर्लभ ग्रंथों, वर्षों की साधना और अनगिनत रातों की तपस्या का साक्षी—अचानक आग की भेंट चढ़ गया।
लकड़ी की अलमारियाँ चरमराईं, काग़ज़ की पत्तियाँ चीत्कार-सी करती हुई राख में बदल गईं।
धुआँ उठा, लपटें नाचीं, और ज्ञान का वह भौतिक संसार देखते ही देखते भस्म हो गया।
पूरे महाविद्यालय में हड़कंप मच गया।
क्लर्क घबराए हुए इधर-उधर दौड़ने लगे, छात्र स्तब्ध खड़े रह गए, सहकर्मी सिर पकड़कर बैठ गए—
“सब कुछ नष्ट हो गया!”
“इतने वर्षों का संग्रह!”
“अब क्या होगा?”
पर इस कोलाहल के बीच, प्रोफेसर शांत बैठे रहे।
न आँखों में आँसू, न चेहरे पर शिकन।
मानो आग ने केवल लकड़ी और काग़ज़ जलाए हों, उनके भीतर कुछ भी नहीं।
एक क्लर्क, जो यह दृश्य सह नहीं पाया, साहस जुटाकर पूछ बैठा—
“सर, आपको ज़रा भी चिंता नहीं है?
आपकी सारी किताबें… सब जल गईं…”
प्रोफेसर ने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया—
“चिंता किस बात की?”
“जो जल सकता था, वह तो केवल काग़ज़ था।”
“मेरी सारी पुस्तकें तो मेरे दिमाग में हैं।”
उस क्षण क्लर्क निरुत्तर रह गया।
उसे पहली बार समझ आया कि सच्चा ज्ञान अलमारियों में नहीं, चेतना में रहता है।
जो पढ़ा गया है और जिया गया है, वह आग, समय या विनाश से नष्ट नहीं होता।
पुस्तकालय राख हो गया था,
पर प्रोफेसर के भीतर ज्ञान का दीपक पहले से अधिक उज्ज्वल जल रहा था।
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