Tuesday, December 30, 2025

तितलियाँ नही बदली

 

रविवार का दिन था। सुबह का वक्त था।शर्माजी चाय पीकर आराम फरमा रहे थे। दरवाजे की घंटी बजी। शर्मा जी ने गोलू से कहा जरा देखना कौन है?

गोलू बोला अभी आया दादाजी।गोलू के अनपेक्षित आज्ञाकारिता से दादाजी विस्मय पूर्वक आनंदित हो उठे।

गोलू दौड़ते हुए दरवाजे की तरफ भागा। बोला आज कालेज में स्पेशल क्लास है।जरा देर से आऊंगा।

शर्माजी का दिमाग ठनका।रविवार के दिन स्पेशल क्लास?खिड़की से देखा। गोलू के बाइक पे उसके कॉलेज की कोई दोस्त बैठी हुई थी।

शर्माजी मुस्कुराने लगे।बचपन पे गोलू ऐसे हीं झूठे बहाने बनाता था तितलियों को पकड़ने के लिए।

तितलियाँ बदल गयी थी पर तितलियाँ नहीँ बदलीं।

फटा हुआ ईमान:



ऑफिस का काम निबटा कर शाम को विश्वास घर की ओर चल पड़ा. अचानक जोर-जोर से चोर-चोर की आवाज आने लगी.एक जेबकतरा पकड़ा गया था. बीबी के नखरों ,ऑफिस के झगड़ों और जीवन के रगड़ों से परेशान लोगो को अपनी हताशा से निपटने का मौका मिला. जम के कुटाई हुई जेब कतरे की. लगभग मरी हुई सी हालत में उसे रोड पे फेककर सब चल पड़े फिर से बीबी के नखरों ,ऑफिस के झगड़ों और जीवन के रगड़ों से भिड़ने के लिए. 

रात हो चली थी. लगभग मरी हुई सी हालत में जेबकतरा रोड पे पड़ा हुआ था .विश्वास को जेबकतरे पे दया आ गई. उसने जेबकतरे को कंधे का सहारा देकर उठाया , पानी पिलाया और रोड के पार पहुंचा दिया. जेब कतरे ने विश्वास का बड़ा धन्यवाद दिया. कहा , गरीब होना बहुत बड़ी सजा है. जेब काटना थोड़े हीं अच्छा लगता है. उसपर पीटने का रिस्क अलग.

खैर विश्वास अपने रास्ते चल पड़ा. रास्ते में सब्जी मंडी से सब्जी ली और भुगतान के लिए ज्यों हीं अपने जेब में हाथ डाला, जेब मिली हीं नहीं. उसकी जेब कट चुकी थी. आश्चर्यचकित कोकर विश्वास कभी अपनी फटी हुई जेब देखता कभी जेबकतरे का हुआ ईमान.










रुका हुआ प्यार

 


वरुण आफिस जा रहा था। अचानक उसका मोबाइल बजने लगा। आवाज आई, वरुण मैं आशा। याद नही आ रहा था वरुण को।उसने याद दिलाया। अचानक पुरानी बातें याद आने लगी।बचपन से लेकर 10 वीं क्लास तक साथ पढ़े थे दोनों। खेल ,खुद , मार पीट साथ साथ किये। कब बचपन जवानी की दहलीज पे आ पहुंचा, पता ही ना चला।

फिर वो पढ़ने निकल पड़ा शहर। आशा की शादी हो गयी। बहुत कुछ कहने को था, कह नही पाया। आज उसने  वो बात कह ही दिया कि आशा को प्यार करता है। आशा ने फ़ोन काट दिया। 10 मिनट बाद फ़ोन आया, मैंने तुम्हे उस तरह से कभी नही देखा।

ईश्क सारा नशा उड़न छू हो गया। घर पे जाते ही बीबी को कहा जरा चाय देना। हमेशा की तरह अदरक वाली चाय मिली। आज उसकी बीबी बड़ी प्यारी लग रही थी। एक प्यार जो रुका हुआ था वर्षों से, आज बहने लगा।

समोसे वाले हाथ

 
बहुत दिनों से सोनू का पेट झड़ रहा था। बहुत दिनों से उसने समोसे नही खाये थे। घर पे खाने पीने में पूरी पाबन्दी थी। मन मसोस कर रहना पर रहा था उसे।

इसी बीच उसके बड़े भाई शहर जा रहे थे। उसे मौका मिला। जिद पकड़ ली भैया को बस पे छोड़ के ही आऊंगा।
माँ बाप भी भाई के अतिशय प्यार के प्रति नतमस्तक हो गए। अलबत्ता उसके बड़े भाई को सोनू के अचानक जगे भ्रातृ प्रेम पर शक जरूर हुआ।खैर सोनू ने भाई को बस तक  छोड़ दिया। बड़े भाई ने सोनू को 10 रुपये दिए।

इसके बाद सोनू तीर की तरह समोसे की दुकान की तरफ भागा। उसने समोसे वाले को 10 रुपये दिएे। जब उसने समोसे लेने के लिए हाथ बढ़ाए, अचानक उसके पीछे से दो हाथों ने उन समोसों को लपक लिया।

वो समोसे वाले दो हाथ उसके बड़े भाई के थे।

हिसाब पूरा हुआ

 हिसाब पूरा हुआ

गर्मी का मौसम था।श्रीकांत जी घर के बाहर नल पे साबुन लगा कर नहा रहे थे। आंखों में पूरा साबुन लगा था। अचानक उनके पीठ पे किसी ने जोर का मुक्का मारा। 
धपाक।
जब तक तक आंखों में पानी डालकर साबुन धोते, वो उड़न छू हो गया। श्रीकांत जी पकड़ नही पाए उसको।
उनका भतीजा शशि तुष्ट था।
श्रीकांत जी एक हाई स्कूल में शिक्षक थे। उनका भतीजा शशि उन्हीं के स्कूल में पढ़ता था। लगभग 6 महीने पहले श्रीकांत जी ने शशि को सही जवाब नही देने पर छड़ी से मारा था। बहुत दिनों से शशि इन्तेजार कर रहा था। आज चाचाजी के नहाते वक्त वो मौका मिला।
आज हिसाब पूरा हो गया था।

अमीरी की पहली शर्त


राजेश एक वकील के पास ड्राईवर था। पिछले पाँच दिनों से बीमार था। पगार देने वक्त साहब ने बताया कि ओवर टाइम मिलाकर और पांच दिन बीमारी के पैसे काटकर उसके 9122 रूपये बनते है। राजेश के ऊपर पुरे परिवार की जिम्मेवारी थी।मरता क्या ना करता।उसने चुप चाप स्वीकार कर लिया। साहब ने उसे 9100 रूपये दिए। पूछा तुम्हारे पास 78 रूपये खुल्ले है क्या? राजेश के पास खुल्ले नहीं थे।मजबूरन उसे  9100 रूपये लेकर लौटने पड़े। 

उसने रिक्शा लिया और घर की तरफ चल पड़ा।घर पहुंच कर रिक्शेवाले को 100 रूपये पकड़ा दिए।रिक्शेवाले के पास खुल्ले नहीं थे। रिक्शेवाले ने कोशिश की पर खुल्ले नही मिले।आखिर में रिक्शा वाले ने वो 100 रुपये राजेश को लौटा दिए।

राजेश को अपने साहब की बात याद आने लगी। बोल रहे थे, मेरा मकान , मेरी मर्सिडीज बेंज सब तो यहीं है। तुम्हारे 22 रूपये बचाने के लिए अपने घर और अपने मर्सिडीज बेंज को थोड़े हीं न बेच दूंगा। एक ये रिक्शा वाला था जिसने खुल्ले नहीं मिलने पे अपना 10 रुपया छोड़ दिया और एक उसके साहब थे जिन्होंने खुल्ले नहीं मिलने पे उसके 22 रूपये रख लिए। 

ये बात राजेश को समझ आ गयी। मर्सिडीज बेंज पाने के लिए पहली शर्त है साहब की तरह दिल से गरीबी को पकड़ना।  ज्यादा बड़ा दिल रख कर क्या बन लोगे, महज एक रिक्शे वाला।










बाबा की कुंडली

 घर छोड़ चला, मुँह मोड़ चला, मुँह मोड़ चला बुढ़ा दगाबाज निकला। दुख छोड़ चला, सुख मोड़ चला, सुख मोड़ चला बुढ़ा दगाबाज निकला।

ट्रेन द्रुत गति से  दौड़ी चली जा रही थी। बाबा इस गाने को गुनगुनाते हुए आनंद के सागर में गोते लगा रहे थे। सारे यात्री बाबा से गुढ़ रहस्य जानना चाह रहे थे। काफी अनुनय विनय के बाद उन्होंने कुंडली के गुढ़ रहस्य का  उद्घाटन करना शुरू किया।

एक एक करके उन्होंने  तंत्र, मंत्र, योग और साधना के आयामों को खोलना किया। सारे यात्री किंकर्तव्यविमूढ़ होकर बाबा से कुंडली का रहस्य सीखने को तत्पर थे।

इधर ट्रेन स्टेशनों पे रुकती, फिर बढ़ जाती। बाबा बीच बीच मे गाने को गुनगुनाने लगते। फिर रहस्य खोलने में लग जाते। यात्रियों के चेहरे पे विस्मय का भाव ज्यों का त्यों बना हुआ था।

एक नन्हे से बच्चे ने उस प्रवचन की श्रृंखला को तोड़ डाला। अब केवल ट्रेन की आवाज ही सुनाई पड़ रही थी।  ट्रेन में सन्नाटा था।

बच्चे ने पूछा था , बाबा आपकी कौन सी कुंडली जगी हुई है?




फटा हुआ ईमान

ऑफिस का काम निबटा कर शाम को विश्वास घर की ओर चल पड़ा।अचानक जोर-जोर से चोर-चोर की आवाज आने लगी।एक जेबकतरा पकड़ा गया था। बीबी के नखरों ,ऑफिस के झगड़ों और जीवन के रगड़ों से परेशान लोगो को अपनी हताशा से निपटने का मौका मिला।जम के कुटाई हुई जेब कतरे की. लगभग मरी हुई सी हालत में उसे रोड पे फेककर सब चल पड़े फिर से बीबी के नखरों ,ऑफिस के झगड़ों और जीवन के रगड़ों से भिड़ने के लिए।

रात हो चली थी।लगभग मरी हुई सी हालत में जेबकतरा रोड पे पड़ा हुआ था ।विश्वास को जेबकतरे पे दया आ गई।उसने जेबकतरे को कंधे का सहारा देकर उठाया , पानी पिलाया और रोड के पार पहुंचा दिया. जेब कतरे ने विश्वास का बड़ा धन्यवाद दिया. कहा , गरीब होना बहुत बड़ी सजा है।जेब काटना थोड़े हीं अच्छा लगता है।उसपर पीटने का रिस्क अलग।

खैर विश्वास अपने रास्ते चल पड़ा।रास्ते में सब्जी मंडी से सब्जी ली और भुगतान के लिए ज्यों हीं अपने जेब में हाथ डाला, जेब मिली हीं नहीं। उसकी जेब कट चुकी थी।आश्चर्यचकित कोकर विश्वास कभी अपनी फटी हुई जेब देखता कभी जेबकतरे का हुआ ईमान।










मर्सिडीज बेंज वाला गरीब आदमी

 


राजेश एक वकील के पास ड्राईवर था। पिछले पाँच दिनों से बीमार था। पगार देने वक्त साहब ने बताया कि ओवर टाइम मिलाकर और पांच दिन बीमारी के पैसे काटकर उसके 9122 रूपये बनते है। राजेश के ऊपर पुरे परिवार की जिम्मेवारी थी।मरता क्या ना करता।उसने चुप चाप स्वीकार कर लिया। साहब ने उसे 9100 रूपये दिए। पूछा तुम्हारे पास 78 रूपये खुल्ले है क्या? राजेश के पास खुल्ले नहीं थे।मजबूरन उसे  9100 रूपये लेकर लौटने पड़े। फिर उसने रिक्शा लिया और घर की तरफ चल पड़ा।घर पहुंच कर रिक्शेवाले को 100 रूपये पकड़ा दिए।पर रिक्शेवाले के पास खुल्ले नहीं थे। रिक्शेवाले ने कोशश की पर खुल्ले नही मिले।आखिर में रिक्शा वाले ने वो 100 रुपये राजेश को लौटा दिए।

राजेश को अपने साहब की बात याद आने लगी। बोल रहे थे, मेरा मकान , मेरी मर्सिडीज बेंज सब तो यहीं है। तुम्हारे 22 रूपये बचाने के लिए अपने घर और अपने मर्सिडीज बेंज को थोड़े हीं न बेच दूंगा। एक ये रिक्शा वाला था जिसने खुल्ले नहीं मिलने पे अपना 10 रुपया छोड़ दिया और एक उसके साहब थे जिन्होंने खुल्ले नहीं मिलने पे उसके 22 रूपये रख लिए।  ये बात राजेश को समझ आ गयी। मर्सिडीज बेंज पाने के लिए साहब की तरह गरीबी को पकड़ना बहुत जरूरी है। ज्यादा बड़ा दिल रख कर क्या बन लोगे, महज एक रिक्शे वाला।










रुकी हुई माफी



दिसंबर का महीना था।कड़ाके की ठंड पड़ रही थी।मार्च में परीक्षा होने वाली थी। भुवन मन लगाकर पढ़ रहा था। माँ ने भुवन को 2000 रुपये, गुप्ता अंकल को देंने के लिये दिए और बाजार चली गई। 

इसी बीच बिछिया आयी और झाड़ू पोछा लगाकर चली गई। जब गुप्ता अंकल पैसा लेने आये तो लाख कोशिश करने के बाद भी पैसे नही मिले।सबकी शक की नजर बिछिया पे गयी।  काफी पूछताछ की गई उससे। काफी  जलील किया गया।उसके कपड़े तक उतार लिए। कुछ नही पता चला।हाँ बीड़ी के 8-10 पैकेट जरूर मिले। शक पक्का हो गया।चोर बिछिया ही थी। पैसे न मिलने थे, न मिले।

मार्च आया। परीक्षा आयी। जुलाई में रिजल्ट भी आ गया। भुवन स्कूल में फर्स्ट आया था। अब पुराने किताबो को हटाने की बारी थी। सफाई के दौरान भुवन को वो 2000 रूपये किताबों के नीचे पड़े मिले। भुुुवन नेे वो रुपये माँ को दिए और बिछिया के बारे में पूछा। मालूम चला उसकी तबियत खराब रहने लगी थी। उसने काफी पहले से आना बंद कर दिया था।

भुवन बीछिया के घर गया, माफी मांगने। उसके पति ने कहा अच्छा ही हुआ, उस चोर को खुदा ने अपने पास बुला लिया।बिछिया गुजर चुकी थी।उसके पति ने दूसरी शादी कर ली थी। भुवन पश्चाताप की अग्नि में जलता हुआ लौट आया। 40 साल गुजर गए हैं। आज तक रुकी हुई है वो माफी।

नदी के पार

 दो युवा सन्यासी प्रातःकाल के धुंधलके में अपनी यात्रा पर निकले थे। सामने एक चौड़ी, वेगवती नदी थी—बरसात के कारण जल उफान पर था। दोनों ने अपने वस्त्र समेटे और तैरकर नदी पार करने की तैयारी करने लगे। उनके चेहरों पर वैराग्य की शांति थी, पर युवावस्था की ऊर्जा भी स्पष्ट झलक रही थी।

उसी समय, नदी के किनारे से एक युवती प्रकट हुई। उसका शरीर आधा ढका हुआ था; भीगे, हल्के और पारदर्शी वस्त्रों से उसका सौंदर्य अनायास झलक रहा था। नदी की नमी और हवा से उसके केश अस्त-व्यस्त थे। वह असहाय-सी खड़ी थी—न नदी पार कर पाने का साहस, न लौटने का मार्ग। उसने हाथ जोड़कर दोनों सन्यासियों से विनती की,
“महाराज, मुझे इस पार पहुँचा दीजिए। मैं तैर नहीं सकती।”

पहले सन्यासी ने दृष्टि झुकाई, स्वर कठोर नहीं पर दृढ़ था—
“बहन, हमने स्त्री-स्पर्श का त्याग किया है। हम आपकी सहायता नहीं कर सकते।”

दूसरा सन्यासी क्षण भर मौन रहा। उसने नदी की ओर देखा, फिर उस युवती के भयभीत चेहरे की ओर। बिना किसी तर्क-वितर्क के, बिना किसी आंतरिक उथल-पुथल को प्रकट किए, उसने कहा—
“आओ।”

उसने युवती को सम्मानपूर्वक गोद में उठाया और दृढ़ता से नदी में उतर गया। लहरें उसके शरीर से टकराती रहीं, पर उसका मन स्थिर था। कुछ ही क्षणों में वह नदी पार कर गया। किनारे पहुँचते ही उसने युवती को उतार दिया। युवती का शरीर भीगा हुआ था, वस्त्र जल से चिपके थे, पर सन्यासी की दृष्टि में न आकर्षण था, न विकार—केवल कर्तव्य की पूर्णता।

युवती ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, कृतज्ञता से नतमस्तक हुई और बिना पीछे देखे अपने मार्ग पर चली गई।

दोनों सन्यासी आगे बढ़े। कुछ दूर चलने के बाद पहला सन्यासी अपने मन की बेचैनी रोक न सका। उसने पूछा—
“भ्राता, तुम जानते हो कि नियम क्या कहते हैं। फिर तुमने उस युवती को गोद में क्यों उठाया?”

दूसरा सन्यासी मुस्कराया। उसकी मुस्कान में न अपराध था, न अहंकार। उसने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“मैंने तो उसे नदी के इस पार उतार दिया था। उसे वहीं छोड़ दिया।
पर तुम… तुम अब भी उसे अपने मन में उठाए चल रहे हो।”

पहला सन्यासी ठिठक गया। नदी तो बहुत पहले पीछे छूट चुकी थी, पर उसका मन अब भी उसी तट पर अटका हुआ था।

सिद्धि

एक शांत वन-प्रदेश के किनारे बहती हुई नदी के तट पर दो संत आमने-सामने बैठे थे। संध्या का समय था—काश में हल्की लालिमा, जल में सूर्य की अंतिम किरणों की थरथराती परछाइयाँ। वातावरण स्वयं ध्यानमय था। उसी मौन को भंग करते हुए एक संत ने दूसरे संत की ओर देखा और अपनी सिद्धि का परिचय देने की इच्छा से उठ खड़ा हुआ।

उसने बिना किसी सहारे के नदी की ओर कदम बढ़ाए। जैसे ही उसके चरण जल को स्पर्श करने लगे, लहरें थमने लगीं। जल कठोर भूमि-सा स्थिर हो गया, मानो प्रकृति स्वयं उसकी तपस्या के आगे नतमस्तक हो गई हो। वह संत धीरे-धीरे, पूरे आत्मविश्वास के साथ, जल के ऊपर पैदल चलता हुआ नदी पार करने लगा। उसके चेहरे पर संतोष नहीं, बल्कि सूक्ष्म गर्व की झलक थी—मानो वह कहना चाहता हो कि मैंने असंभव को संभव कर दिखाया है।

किनारे खड़ा दूसरा संत यह सब देख रहा था। उसके चेहरे पर न आश्चर्य था, न प्रशंसा, न ही कोई प्रतिक्रिया। उसकी आँखों में वही गहराई थी जो नदी के जल में थी—शांत, स्थिर और मौन।

नदी पार कर लेने के बाद पहला संत मुड़ा और गर्व से बोला,“देखा? यह है मेरी साधना की सिद्धि। वर्षों के तप, संयम और ध्यान का फल।”

दूसरे संत ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने न तर्क किया, न तुलना। वह बस धीरे-धीरे आगे बढ़ा, एक साधारण-सी लकड़ी की नाव पर चढ़ा, नाविक को संकेत किया और सहज भाव से नदी पार करने लगा। न कोई चमत्कार, न कोई प्रदर्शन—बस साधारण मार्ग, साधारण साधन।

जब वह किनारे पहुँचा, तो उसने शांत, स्थिर और करुण स्वर में कहा—“चमत्कार शक्ति प्राप्त कर लेने में नहीं है। शक्ति तो कई बार अहंकार को भी मजबूत कर देती है। सच्चा चमत्कार यह है कि शक्ति पा लेने के बाद भी मन शांत रहे, जीवन साधारण रहे, और अहंकार न जागे। जो दिखाने में लगा है, वह अभी भीतर की यात्रा में अधूरा है; और जो भीतर पहुँच गया है, उसे कुछ सिद्ध करने की आवश्यकता ही नहीं रहती।”

उसने आगे कहा—“नदी पर चलना कठिन नहीं, कठिन है अपने मन पर चलना। जल को जीत लेना साधना हो सकती है, पर स्वयं को जीत लेना ही सिद्धि है।”

यह कहकर वह बिना पीछे देखे आगे बढ़ गया। उसके कदमों में न गर्व था, न घोषणा—केवल सहजता थी। जैसे वह यह स्मरण कराता हो कि सच्ची आध्यात्मिक ऊँचाई ऊँचे दिखने में नहीं, बल्कि अदृश्य हो जाने में है; कि वास्तविक सामर्थ्य वही है जो मौन में विलीन हो जाए।

और नदी? वह फिर से बहने लगी—यह सिखाते हुए कि प्रवाह में रहना ही जीवन है, और ठहरकर दिखना केवल क्षणिक भ्रम।

पुस्तकालय की आग

 एक विद्वान प्रोफेसर का विशाल पुस्तकालय—हज़ारों दुर्लभ ग्रंथों, वर्षों की साधना और अनगिनत रातों की तपस्या का साक्षी—अचानक आग की भेंट चढ़ गया।

लकड़ी की अलमारियाँ चरमराईं, काग़ज़ की पत्तियाँ चीत्कार-सी करती हुई राख में बदल गईं।
धुआँ उठा, लपटें नाचीं, और ज्ञान का वह भौतिक संसार देखते ही देखते भस्म हो गया।

पूरे महाविद्यालय में हड़कंप मच गया।
क्लर्क घबराए हुए इधर-उधर दौड़ने लगे, छात्र स्तब्ध खड़े रह गए, सहकर्मी सिर पकड़कर बैठ गए—
“सब कुछ नष्ट हो गया!”
“इतने वर्षों का संग्रह!”
“अब क्या होगा?”

पर इस कोलाहल के बीच, प्रोफेसर शांत बैठे रहे।
न आँखों में आँसू, न चेहरे पर शिकन।
मानो आग ने केवल लकड़ी और काग़ज़ जलाए हों, उनके भीतर कुछ भी नहीं।

एक क्लर्क, जो यह दृश्य सह नहीं पाया, साहस जुटाकर पूछ बैठा—
“सर, आपको ज़रा भी चिंता नहीं है?
आपकी सारी किताबें… सब जल गईं…”

प्रोफेसर ने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया—
“चिंता किस बात की?”
“जो जल सकता था, वह तो केवल काग़ज़ था।”
“मेरी सारी पुस्तकें तो मेरे दिमाग में हैं।”

उस क्षण क्लर्क निरुत्तर रह गया।
उसे पहली बार समझ आया कि सच्चा ज्ञान अलमारियों में नहीं, चेतना में रहता है।
जो पढ़ा गया है और जिया गया है, वह आग, समय या विनाश से नष्ट नहीं होता।

पुस्तकालय राख हो गया था,
पर प्रोफेसर के भीतर ज्ञान का दीपक पहले से अधिक उज्ज्वल जल रहा था।

एक लोटा पानी

 एक नगर में एक अत्यंत धनवान व्यक्ति रहता था। उसके पास ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं थी—सोना, चाँदी, विशाल हवेलियाँ, सेवकों की कतारें और व्यापार का अथाह विस्तार। फिर भी उसका मन कहीं न कहीं अशांत रहता था। एक दिन उसने नगर के बाहर रहने वाले एक संत के विषय में सुना, जिनकी वाणी में शांति और जीवन का गूढ़ सत्य झलकता था।

जिज्ञासावश वह संत के पास पहुँचा। संत एक वृक्ष के नीचे बैठे थे—न कोई आडंबर, न कोई वैभव। उनका चेहरा शांत था, आँखों में करुणा और वाणी में सहज सत्य। धनवान व्यक्ति ने उनके उपदेश सुने। हर शब्द उसके हृदय को छू रहा था, मानो वर्षों से जमी धूल हटती जा रही हो। वह भीतर ही भीतर अत्यंत प्रसन्न और कृतज्ञ हो उठा।

भावावेश में आकर उसने संत से कहा—
“महाराज, आपने मुझे आज जीवन का सच्चा अर्थ समझा दिया। मैं अत्यंत धनवान हूँ। आप जो कुछ भी चाहें, मुझसे मांग लीजिए। धन, भूमि, वस्त्र, आश्रम—जो चाहें, वह मैं तुरंत प्रदान कर दूँगा।”

धनवान के मन में एक स्वाभाविक अपेक्षा थी—उसे लगा संत अवश्य कोई बड़ा दान, कोई विशाल व्यवस्था या संपत्ति माँगेंगे। किंतु संत मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में न लोभ था, न संकोच।

संत ने शांत स्वर में कहा—
“यदि संभव हो, तो इस लोटे में थोड़ा सा पानी भर दीजिए। प्यास लगी है।”

यह सुनते ही धनवान व्यक्ति स्तब्ध रह गया। उसके हाथ काँप गए। जिस व्यक्ति के पास सब कुछ था, वह पहली बार समझ पाया कि सच्चा वैराग्य क्या होता है। संत की यह सादगी उसके समस्त ऐश्वर्य पर भारी पड़ गई। उसे लगा जैसे उसके धन का भार अचानक बहुत हल्का हो गया हो, और संत की झोली—जो खाली थी—वास्तव में सबसे भरी हुई थी।

पानी भरते समय उसकी आँखें नम थीं। उस क्षण वह संत के चरणों में नहीं, बल्कि उनकी सादगी के सामने झुक गया।

उसने समझ लिया कि जिसे कम में तृप्ति मिल जाए, वही वास्तव में सबसे धनवान होता है।

संत , हाथी और माया

 किसी समय की बात है। गंगा के किनारे बसे एक शांत आश्रम में एक महान संत निवास करते थे। दूर-दूर से लोग उनके प्रवचनों को सुनने आते थे। संत का स्वर गंभीर और शांत था, और उनके वचनों में गहरी अनुभूति छिपी रहती थी। वे प्रायः कहा करते थे—

“यह संसार माया है। जो कुछ दिखाई देता है, वह नश्वर है। सत्य केवल ब्रह्म है।”

एक दिन आश्रम के प्रांगण में अनेक शिष्य और नगरवासी एकत्र थे। संत माया और ब्रह्म के भेद पर विस्तार से प्रकाश डाल रहे थे। शिष्य ध्यानमग्न होकर सुन रहे थे। उसी समय नगर की ओर से अचानक शोर सुनाई दिया—ढोल की आवाज़, लोगों की चिल्लाहट और ज़मीन के काँपने जैसा कंपन।

थोड़ी ही देर में एक पीलवान दिखाई दिया, जो एक विशाल हाथी को लेकर मार्ग से गुजर रहा था। हाथी मस्त था और उसकी आँखों में उग्रता झलक रही थी। पीलवान ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था—
“हटो! हटो! रास्ते से हट जाओ! हाथी बेकाबू है!”

अधिकांश लोग भयभीत होकर इधर-उधर हट गए। कुछ आश्रम के भीतर चले गए, कुछ पेड़ों के पीछे छिप गए। परंतु एक युवा शिष्य वहीं बैठा रहा। उसके चेहरे पर न भय था, न चिंता। वह मन ही मन गुरु के वचनों को दोहरा रहा था—
“यह संसार माया है… हाथी भी माया है… भय भी माया है।”

हाथी आगे बढ़ता गया। पीलवान ने उस शिष्य को देखकर और ज़ोर से पुकारा—
“अरे साधु! हट जाओ! जान चली जाएगी!”

पर शिष्य टस से मस न हुआ। उसने सोचा—यदि सब माया है, तो हटने वाला कौन और डरने वाला कौन?
क्षण भर में हाथी पास पहुँचा और अपनी सूँड़ से शिष्य को ज़ोर से धक्का दे दिया। शिष्य दूर जा गिरा और बुरी तरह घायल हो गया।

लोग दौड़कर आए, उसे उठाया और आश्रम में ले गए। संत भी वहाँ पहुँचे। उन्होंने शिष्य की चोटों पर मरहम लगाया और प्रेम से उसका मस्तक सहलाया।

कुछ समय बाद शिष्य ने कराहते हुए कहा—
“गुरुदेव, आप तो कहते हैं कि संसार माया है। फिर यह हाथी मुझे कैसे घायल कर गया?”

संत मंद मुस्कान के साथ बोले—
“वत्स, मैंने यह अवश्य कहा है कि संसार माया है, पर यह भी समझना आवश्यक है कि माया के भी अपने नियम होते हैं।
जब पीलवान तुम्हें हटने के लिए कह रहा था, तब वह भी उसी परम सत्ता का रूप था। भगवान ही तुम्हें चेतावनी दे रहे थे। तुमने माया को तो माना, पर माया के नियमों की उपेक्षा कर दी।”

संत ने आगे कहा—
“जल माया है, पर उसमें डूबने का नियम है। अग्नि माया है, पर उसका धर्म जलाना है। इसी प्रकार हाथी भी माया है, पर उसका स्वभाव कुचलना है।
माया में रहते हुए माया के नियमों से बचना भी विवेक है। केवल ज्ञान नहीं, व्यवहारिक बुद्धि भी आवश्यक है।”

शिष्य की आँखों से आँसू बह निकले। उसने गुरु के चरणों में सिर रख दिया और कहा—
“गुरुदेव, आज मुझे सच्चा ज्ञान मिला। माया को समझना ही नहीं, उसके बीच सही आचरण करना भी साधना है।”

संत ने आशीर्वाद देते हुए कहा—
“यही जीवन का संतुलन है—ज्ञान और व्यवहार का समन्वय।”

उस दिन के बाद आश्रम में यह कथा एक शिक्षा बनकर प्रचलित हो गई—
कि संसार भले ही माया हो, पर माया में जीते हुए उसके नियमों का सम्मान करना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है।


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