Monday, November 4, 2024

दिन में दिखते रात हैं इनके

 दिन में दिखते रात हैं इनके,

ऑफिस से आघात हैं इनके।
दफ्तर में आये हैं जबसे,
कुर्सी पर बैठे हैं तबसे।
बॉस मेल मीटिंग की मार,
क्लाइंट से तन हुआ बेजार।
एक खतम तब दुजा काम,
कुर्सी बोले करो आराम।
वर्कलोड का बोझ है भारी,
चाय भी ठंडी, कब पी सारी?
क्या हो सन्डे क्या हो मन्डे,
फन ना कोई सब हैं गन डे।
कहाँ भी जाएँ ये बेचारे,
वर्कलोड के रहते मारे।
फटे फटे जज्बात हैं इनके,
दिन में दिखते रात हैं इनके।

अजय अमिताभ सुमन

शोर शराबा धूम धड़ाम, सबके सब ईश्वर के नाम

 सबके सब ईश्वर के नाम।


शोर शराबा धूम धड़ाम,
सबके सब ईश्वर के नाम।
फुल वोल्युम मे चलता गाना,
सड़कों पे सब करें हंगामा।
हस्पिटल हो कोई पास,
इन्हें फिकर ना कोई खास।
दारू पे ना रोक है कोई,
पुलिस की ना टोक है कोई।
चलता हुक्का चलता भांग,
आधे रोड पे करते जाम।
स्वर्ग का जैसे टिकट मिला हो,
ईश्वर का वरदान फला हो।
कोई रोए या चिल्लाए,
पूरी दुनिया भाड़ में जाए।
सब कुछ जायज है सब ठीक,
प्रभु नाम पर फलते ढ़ीठ।
करते हरकत उट पटांग,
सबके सब ईश्वर के नाम।

अजय अमिताभ सुमन

अगर डाक्टर माँगे पैसा,

 

अगर डाक्टर माँगे पैसा,
दोष कहो तुम किसका कैसा?
एक करोड़ के नीचे भैया,
बने ना कोई डाक्टर भैया।
कॉलेज का इतना फी भरकर,
जो कोई भी बनता डॉक्टर।
उसको फिर फिक्र हो कैसे,
सेवा का फ़िर जिक्र हो कैसे?
दर्द की कीमत लगती भारी,
हॉस्पिटल की भी लाचारी।
सिस्टम का इलाज ना कोई,
क्यों गरीब नवाज़ हो कोई?
अगर डॉक्टर मांगे धन है,
सोच प्रश्न क्यों गुढ़ गहन है?
सिस्टम से सब हुए लाचार,
कि पेशा अब बना व्यापार।

अजय अमिताभ सुमन

प्रश्न चिन्ह सा लक्ष्य दृष्टि में

 प्रश्न चिन्ह सा लक्ष्य दृष्टि में,निज बल से सृष्टि रचता हूँ।

फुटपाथ पर रहने वाला,ऐसे निज जीवन गढ़ता हूँ।

माना द्रोण नहीं मिलते हैं,भीष्म दृष्टि में ना रहते हैं।
परशुराम से क्या अपेक्षण,श्राप गरल हीं तो मिलते हैं।

एकलव्य सा ध्यान लगाकर,निज हीं शास्त्र संधान चढ़ाकर।
फूटपाथ पर मैं पढ़ता हूँ,निज जीवन रक्षण करता हूँ।

ऐसे हीं रण मैं लड़ता हूँ,जीवन रण ऐसे लड़ता हूँ।

ओ मरघट के मूल निवासी

 ओ मरघट के मूल निवासी,भोले भाले शिव कैलाशी।

यदा कदा मन आकुल व्याकुल,जग जाता अंतर सन्यासी।
जब जग बन्धन जुड़ जाते हैं,भाव सागर को मुड़ जाते हैं।
इस भव में यम के जब दर्शन,मन इक्छुक होता वनवासी।
ओ मरघट के मूल निवासी,भोले भाले शिव कैलाशी।
अति दूर है धाम तुम्हारे,किस भांति शिव धाम पधारे।
हम तो कर कर करम सब हारे,तन शक्ति भर रह उपवासी।
मन ईक्षण है चाह तुम्हारा,चेतन प्यासा छांह तुम्हारा।
ईधर उधर प्यासा बन फिरता,कभी मथुरा कभी काशी ।
ओ मरघट के मूल निवासी,भोले भाले शिव कैलाशी।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

कौन हूँ मैं ? ये मिट्टी? मिट्टी से बीज, बीज से तना

कौन हूँ मैं ?
ये मिट्टी?
मिट्टी से बीज,
बीज से तना ,
तना से शाखें ,
शाखों से पत्ती ,
पत्ती से कली ,
कली से फूल,
फूल से फल,
फल से अन्न,
अन्न से रक्त,
रक्त से कोशिका ,
कोशिका से ऊतक ,
ऊतक से मांस,
मांस से पेशी,
पेशी से मज्जा,
मज़्ज़ा से अस्थि
अस्थि से देह,
और देह से श्वांस ,
श्वांस से प्राण ,
प्राण से मैं
मिट्टी हूँ मैं,
मिट्टी से ,
बीज,
तना ,
शाखें ,
पत्ती ,
कली ,
फूल,
फल,
अन्न,
रक्त,
कोशिका ,
ऊतक ,
मांस,
पेशी,
मज्जा,
अस्थि
देह,
श्वांस ,
प्राण ,
प्राण से मैं
मिट्टी हूँ मैं,

मैं, मेरा घर, मेरा छोटा सा घर,

 मैं,


मेरा घर,
मेरा छोटा सा घर,
एक छोटे से गाँव में।

और गाँव,
मेरा गाँव,
मेरा छोटा सा गाँव,
एक शहर के पास।

और शहर,
मेरा शहर ,
वो छोटा सा शहर,
एक राज्य में।

और राज्य ,
मेरा राज्य ,
मेरा छोटा सा राज्य
मेरे इस देश में।

और देश,
मेरा देश,
मेरा प्यारा देश ,
ऐसे सैंकड़ों देश,
इस धरती पे।

और धरती,
ये धरती,
मेरी प्यारी धरती,
मेरी छोटी सी धरती,
घुमती गोल गोल,
सूरज के चारों ओर,
अन्य ग्रहों के साथ।

और सूरज,
मेरा सूरज,
मेरा प्यारा सूरज,
घुमता गोल गोल,
अपने ग्रहों के साथ,
एक आकाश गंगा के पीछे।

और आकाश गंगा,
मेरी आकाश गंगा,
जहाँ हजारों तारे,
करोड़ो तारे,
जहाँ ब्लैक होल्स,
हजारों ब्लैक होल्स,
करोड़ो ब्लैक होल्स,
अनगिनत ब्लैक होल्स।

जहाँ तारे,
हजारों तारे,
करोड़ों तारे,
बनते, मिटते।

और ऐसी आकाश गंगा,
हजारों आकाश गंगा,
करोड़ों आकाश गंगा,
अनगिनत आकाश गंगा,
जनमती आकाश गंगा,
बनती आकाश गंगा ,
बिगड़ती आकाश गंगा,
मिटती आकाश गंगा।

एक आकाश में ,
और वो आकाश ,
ऐसे हजारों आकाश,
ऐसे अनगिनत आकाश ।

एक समय में ,
और ऐसा एक समय,
हरेक सेकंड में।
जहाँ एक सेकंड,
करोड़ों सेकंड,
अनगिनत सेकंड,
महा समय में।

जहाँ वॉर्म होल्स,
एक वॉर्म होल्स ,
अनगिनत वॉर्म होल्स।

तोड़ते, मरोड़ते,
आकाश को,
समय को,
महाकाश को।

जहाँ ऐसे हजारों आकाश ,
महाकाश,
बनते, बिगड़ते,
मिटने,
समय में,
इस महासमय में।
और मैं इनका हिस्सा,
अदना सा हिस्सा।

मैं,
मेरा घर,
मेरा छोटा सा घर,
इस अनंत ब्रह्मांड में।

आंगना में सोना जईसन

 आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,

देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

मह मह महकेला आम के मंजरिया,आम के मंजरिया,
कुहू कुहू कुहुकेले काली रे कोईलिया, काली रे कोईलिया।
रस रस टपकेला महुआ जे गछिया कि,
बिनत में होखे लागल भोर, कि बिनत में होखे लागल भोर।
आंगना में जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

हरिहर पातवा ह घरती के सड़िया, कि घरती के सड़िया
सेमर के फूलवा से शोभेला सेजरिया, कि शोभेला सेजरिया।
देखि के सजल रुप ऋतुराज बिहँसेले,
भौरा मचावे लागल शोर , कि भौरा मचावे लागल शोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

गेंदवा के फूलवा ह सोना के गहनवा, कि सोना के गहनवा,
रंगे रंगे फूलवा से शोभेला लहँगवा , कि शोभेला लहँगवा।
श्रीनाथ 'आशावादी, अंखिया निहारे देखि,
गउआँ ई रस में विभोर , कि गउआँ ई रस में विभोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

Sunday, November 3, 2024

रुद्रावताराय हनूमते नमः


रुद्रावताराय हनूमते नमः
(Rudravataraya Hanumate Namah)

रुद्रावताराय नमो हनूमते,
क्रोधाग्निसंयुताय महाबलाय।
लंका दहनकारिणे दयापराय,
शत्रुविनाशकाय नमो नमः॥

रक्तनेत्राय वीराय महाकायाय,
रामप्रियाय भक्ताय अनन्यदाय।
वज्रकायाय योगिनां वरिष्ठाय,
दुष्टनिवारणाय सदा शुभदाय॥

सर्वसंकटनाशकाय करालवक्त्राय,
जय जय हनुमान महाक्रोधमूर्तये॥

Praise to Devotee Hanuman
(Praise to Devotee Hanuman)

O humble Hanuman, so loyal and true,
In service of Ram, all strength flows through you.
With boundless devotion, you carry His name,
In every deed, you honor His flame.

You bridge worlds with love, both fierce and kind,
Protector of hearts, with wisdom refined.
Through trials and storms, your faith stands tall,
The purest devotee, answering His call.

O Hanuman, bless us with love and grace,
In your fearless heart, we find our place.

योगी तुम, ज्ञानी हनुमान,
भक्ति और ज्ञान से भरा है तू ध्यान।

संकटों में साथी, संकट मोचन नाम,
तेरी कृपा से मिलता, हर भक्त को आराम।

तेरे तेज से मिटता, हर एक अंधकार,
भक्तों के हृदय में, बसा है तेरा प्यार।

राम का प्रिय भक्त, हर दिल में बसता,
तेरे नाम का जाप कर, हर दुःख से लड़ता।

तेरी भक्ति से मिलता, हर मन को सुकून,
दुखों का नाशक, हर भक्त का हो तुम मूल।

हे हनुमान, तेरा आशीर्वाद सदा मेरे साथ,
तेरी महिमा से मिलता, हर दिन नया विश्वास।



डमरूनादमाश्रितं शिवं

डमरूनादमाश्रितं शिवं
(Damaru Nadam Ashritam Shivam)

डमरूनादमाश्रितं शिवं, नृत्यम् अतुलं महेश्वरम्,
सृष्टिसंहारकर्ता यो, तस्मै नतमहम् शंकरम्।

यदा डमरू मृदुलध्वनिं करोतिसंप्रभासते,
शिवस्य ताण्डवे लीनं, यत्र विश्वं निवासते।
तस्मिन् रुद्रनृत्ये नूतनं, संजीवयति अणुरणुः,
संहारसृष्टिसंयुजं, तस्य पदं परमं ध्रुवम्।

(डमरूनादमाश्रितं शिवं, नृत्यम् अतुलं महेश्वरम्)

भस्मलेपनधारिणं, अर्धनारीश्वरं हरम्,
डमरूध्वनितं वादनं, योगिश्रेष्ठं नमाम्यहम्।
ताण्डवकालनृत्ये, लीनं सर्वं चराचरम्,
शिवस्य नर्तनं हि भव, जीवितं च जगद्धरम्।

(डमरूनादमाश्रितं शिवं, नृत्यम् अतुलं महेश्वरम्)

डमरूस्वनजागृतं हि, वेदनादस्य मूलकम्,
कालोऽपि नमति तस्मै, महादेवस्य शूलिनः।
सर्वत्र शिवः सदा स्थितः, कालक्ष्णे शिवस्य छवि,
डमरूध्वनितेन यो, समस्तं विश्वं निर्ममे।

(डमरूनादमाश्रितं शिवं, नृत्यम् अतुलं महेश्वरम्)

सर्वयुगान्तरं नित्यं, यो निर्माति महेश्वरः,
शिवस्य लीला अनंतकं, महाकालस्य योगिनः।
जयतु जयतु देवो, नित्यशक्तिरमाप्यते,
डमरूध्वनिना सदा, हि विश्वे शिवः प्रवर्तते।

(डमरूनादमाश्रितं शिवं, नृत्यम् अतुलं महेश्वरम्)


जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई

गवाह सारे सच के, अखबार खा गई, 
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई। 

बेईमानों के नमक का, कर्जा बहुत था भारी,
चटी थी फाइल सारी, गुनाहगार की बीमारी।
कि कुर्सी के काले चिट्ठे , किरदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई। 

घिसे हुए थे चप्पल,लाचार की कहानी,
कि धूल में सने सब ,बेगार की जुबानी।
कंकालों पर हुए जो , अत्याचार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई। 

खोखली सी फ़ाइल  खोखली तहरीरें,
जो सच की भेंट चढ़ी, ये स्याह सी तक़दीरें।
खुद्दारों की जो थी वो, आवाज़ खा गई,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।

थी भूख की ये मारी, आदत की थी लाचारी,
दफ्तर के सारे सारे , दलालों  से थी यारी,
सच के जो भी थे सारे , चौकीदार खा गई ,
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।

तफसीस क्या करें हम, दफ्तर के सब अधिकारी,
दीमक से भी सौदा करते, दीमक भी है व्यापारी।
दफ्तर के फर्जी किस्से, ओहदेदार खा गई।
जालिम ये दीमक सारी, मक्कार खा गई।

अजय अमिताभ सुमन

Saturday, November 2, 2024

बुद्धं शरणं प्राप्य

 बुद्धं शरणं प्राप्य, धीरं शान्तिं ददाति यः।

अज्ञानतमसः शत्रुं, ज्ञानदीपप्रकाशकम्॥ १ ॥


करुणासागरं शान्तं, दुःखत्राणं महाश्रयम्।

सर्वजीवहिते युक्तं, तथागतं नमाम्यहम्॥ २ ॥


बोधिवृक्षसमासीनं, चिन्मुद्रामणिनायकम्।

संसरामृतनाशाय, धर्मचक्रं प्रवर्तकम्॥ ३ ॥


सम्यग्दृष्टिप्रदं शुद्धं, सम्यक्संकल्पनायकम्।

आहिंसायाः प्रणेतेर्यं, बुद्धं तं प्रणमाम्यहम्॥ ४ ॥


चतुर्नयप्रदं श्रेष्ठं, मार्गदर्शनकारकम्।

सर्वदुःखविनाशाय, तं बुद्धं शरणं व्रजे॥ ५ ॥


निर्वाणप्राप्तिकारणं, मोक्षदं सततं महम्।

संसरक्लेशहारिणं, धीरं बुद्धं नमाम्यहम्॥ ६ ॥


प्रज्ञावन्तं तपोनिष्ठं, शीलसम्पन्नमुत्तमम्।

ध्यानसमाधिसंयुक्तं, तं बुद्धं प्रणमाम्यहम्॥ ७ ॥


सर्वक्लेशविनाशाय, सर्वजीवहिते रतम्।

सर्वत्र विजयं यान्तं, बुद्धं धीरं नमाम्यहम्॥ ८ ॥

कृष्ण में अभिव्यक्ति है-Long

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की,
कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।
कृष्ण पक्ष के कृष्ण रात्रि में कृष्ण अति अँधियारे थे ,
तब विधर्मी कंस संहारक गिरिधर वहीं पधारे थे।
वृंदावन कुंजों में प्रेम के प्रवाह कृष्ण,
कुरुक्षेत्र धूलि में न्याय की राह कृष्ण
गोपियों के चित्त में अनुराग के सागर हैं ,
अर्जुन के संशय में हैं ज्ञान के गागर हैं
कृष्ण प्रेम की अनुभूति हैं , कृष्ण प्रेम का विस्तार हैं ,
कृष्ण भाव की गहराई हैं कृष्ण भाव के संसार हैं ।
मीरा के हृदय में रहते अनहद वो नाद कृष्ण,
अर्जुन के संशय में कहते गीता-संवाद कृष्ण।
प्रेम की पराकाष्ठा भी हैं ज्ञान की परिभाषा ,
जीवन के द्वंद्वों में हैं धर्म विजय की आशा।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,
काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।
सुदामा चावल में प्रेम का प्रसाद कृष्ण,
मित्रता के मूल्य का अनुपम संवाद कृष्ण।
कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए,
पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए।
इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर,
कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़।
पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी ,
कंस आदि के मर्दन कर्ता कृष्ण अति बलशाली।
वो कान्हा थे योगि राज पर भोगी बनकर नृत्य करें,
जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे।
सारंग धारी कृष्ण हरि ने वत्सासुर संहार किया ,
बकासुर और अघासुर के प्राणों का व्यापार किया।
मात्र तर्जनी से हीं तो गिरि धर ने गिरि उठाया था,
कभी देवाधि पति इंद्र को घुटनों तले झुकाया था।
जब पापी कुचक्र रचे तब वो चक्र चलाते हैं,
कुटिल दर्प सर्वत्र फले तब दृष्टि वक्र उठाते हैं।
उरग जिनसे थर्र थर्र काँपे पर्वत जिनके हाथों नाचे,
इन्द्रदेव भी कंपित होते हैं नतमस्तक जिनके आगे।
एक हाथ में चक्र हैं जिनके मुरली मधुर बजाते हैं,
गोवर्धन धारी डर कर भगने का खेल दिखातें है।
जैसे गज शिशु से कोई डरने का खेल रचाता है,
कारक बन कर कर्ता का कारण से मेल कराता है।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया कृष्ण ,
काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं कृष्ण ।
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,
धर्म कर्म मर्म आदि जिनके अनुकूल हो।
सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र कृष्ण ,
सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र कृष्ण 
साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,
लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।
युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,
पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।
वो व्याप्त है नभ में जल में चल में थल में भूतल में,
बीत गया जो पल आज जो आने वाले उस कल में।
उनसे हीं बनता है जग ये वो हीं तो बसते हैं जग में,
जग के डग डग में शामिल हैं शामिल जग के रग रग में।
क्षण-क्षण परिवर्तन में शाश्वत आधार कृष्ण ,
काल के प्रवाह में कालातीत विस्तार कृष्ण
कृष्ण केवल नाम नहीं, अनंत संवाद कृष्ण,
मौन में भी बोलते, अज्ञेय निर्विवाद कृष्ण।
अंतिम निष्कर्ष नहीं, सतत विचार कृष्ण,
चेतना की यात्रा के अनंत विस्तार कृष्ण।
नाम परे, रूप परे, शब्दों के पार कृष्ण
कृष्ण स्वयं प्रश्न में, द्वंदों के पार कृष्ण।
आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत कृष्ण,
चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत कृष्ण।
क्षण-क्षण परिवर्तन में शाश्वत आधार कृष्ण ,
काल के प्रवाह में कालातीत विस्तार कृष्ण
वे सरल भी, जटिल भी, सहज भी, गंभीर भी,
वे धरा के निकट भी पर ब्रह्म जैसे धीर भी।
मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,
सृष्टि की सृजना संरक्षण संहारण में।
रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,
सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।
कृष्ण सर्व सत्व आदि तत्व अनेकार्थ है,
काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।
कृष्ण में आरंभ है, नभ धरा विस्तार है,
कृष्ण जगत मूल में, कृष्ण में संसार है।
कृष्ण ही जिज्ञासा, कृष्ण ही समाधान,
कृष्ण ही साधना हीं, कृष्ण ही निर्वाण।
कंस अरि कृष्ण कान्हा गोविन्दम घन श्याम,
अमिताभ कर रहा है प्रभु शत शत प्रणाम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अभिनंदनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण पद पूजनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अरि मर्दनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण चरण वन्दनम
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन
कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन


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कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की,

कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।

राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,

काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।

कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए,

पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए।

इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर,

कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़।

पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी ,

कंस आदि के मर्दन कर्ता कृष्ण अति बलशाली।

वो कान्हा थे योगि राज पर भोगी बनकर नृत्य करें,

जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे।

सारंग धारी कृष्ण हरि ने वत्सासुर संहार किया ,

बकासुर और अघासुर के प्राणों का व्यापार किया।

मात्र तर्जनी से हीं तो गिरि धर ने गिरि उठाया था,

कभी देवाधि पति इंद्र को घुटनों तले झुकाया था।

जब पापी कुचक्र रचे तब वो चक्र चलाते हैं,

कुटिल दर्प सर्वत्र फले तब दृष्टि वक्र उठाते हैं।

उरग जिनसे थर्र थर्र काँपे पर्वत जिनके हाथों नाचे,

इन्द्रदेव भी कंपित होते हैं नतमस्तक जिनके आगे।

एक हाथ में चक्र हैं जिनके मुरली मधुर बजाते हैं,

गोवर्धन धारी डर कर भगने का खेल दिखातें है।

जैसे गज शिशु से कोई डरने का खेल रचाता है,

कारक बन कर कर्ता का कारण से मेल कराता है।

मीरा हृदय में बहते एक अनहद हैं नाद कृष्ण,

अर्जुन संशय में कहते गीता-संवाद कृष्ण

वृंदावन कुंजों में प्रेम के प्रवाह कृष्ण,

कुरुक्षेत्र धूलि में न्याय की राह कृष्ण

सुदामा चावल में प्रेम का प्रसाद कृष्ण,

मित्रता के मूल्य का अनुपम संवाद कृष्ण।

क्षण-क्षण परिवर्तन में शाश्वत आधार कृष्ण ,

काल के प्रवाह में कालातीत विस्तार कृष्ण

कृष्ण केवल नाम नहीं, अनंत संवाद हैं,

मौन में भी बोलते, अज्ञेय निर्विवाद हैं।

वे सरल भी, जटिल भी, सहज भी, गंभीर भी,

वे धरा के निकट भी पर ब्रह्म जैसे धीर भी।

वे अंतिम निष्कर्ष नहीं, सतत विचार हैं,

वे चेतना की यात्रा के अनंत विस्तार हैं।

कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,

धर्म कर्म मर्म आदि जिनके अनुकूल हो।

सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र हैं,

सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र हैं।

साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,

लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।

युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,

पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।

कृष्ण केवल नाम नहीं, अनंत संवाद हैं,

मौन में भी बोलते, अज्ञेय निर्विवाद  हैं।

आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत भी,

चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत भी।

मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,

सृष्टि की सृजना संरक्षण संहारण में।

रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,

सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।

कृष्ण सर्व सत्व आदि तत्व अनेकार्थ है,

काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।

कृष्ण में आरंभ है, नभ धरा विस्तार है,

कृष्ण जगत मूल में, कृष्ण में संसार है।

कृष्ण ही जिज्ञासा, कृष्ण ही समाधान,

कृष्ण ही साधना हीं, कृष्ण ही निर्वाण।

कंस अरि कृष्ण कान्हा गोविन्दम घन श्याम,

अमिताभ कर रहा है प्रभु शत शत प्रणाम

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अभिनंदनम

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण पद पूजनम

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण अरि मर्दनम

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण चरण वन्दनम

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण भज रे मन

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