Friday, October 2, 2026

ओ खुजली

😂 ओ खुजली! तू बहुत सताती
एक ध्यानमग्न योगी की करुण-पुकार — हास्य कविता
ओ खुजली! तू बहुत सताती,
बार-बार क्यों तू आ जाती?
जब भी बैठूँ ध्यान लगाने,
तू आ जाती मुझे सताने!
आँखें मूँद, लगाऊँ ध्यान,
मन में गूँजे प्रभु का गान,
अभी शांति की लहर है आती,
तू पीठ पर डमरू बजाती!
ओ खुजली! कुछ तो शर्म कर,
योगी हूँ, थोड़ा तो रहम कर!
कौन शत्रुता तू है निभाती,
जो हर पल मुझको तड़पाती?
माथे पर जब ध्यान लगाऊँ,
तब तू ठुड्डी पर चढ़ आऊँ!
ठुड्डी खुजलाऊँ, पीठ मचलती,
पीठ खुजलाऊँ, नाक उछलती!
खुजली बोली, “सुन ओ बाबा,
मत समझो मुझको कोई अजूबा!
जब तक तन से मोह न जाएगा,
मेरा आना-जाना चलता जाएगा!”
योगी बोला, “वाह रे ज्ञानी!
तूने भी दी बात सयानी!
मोह छोड़ने बैठा था मैं,
तुझमें ही उलझा रहता हूँ मैं!”
फिर दोनों में हुई सुलह,
योगी ने ली गहरी साँस,
जैसे ही वह ध्यान में बैठा,
खुजली बोली— “मैं हूँ पास!” 😂
ओ खुजली! तू बहुत सताती,
बार-बार क्यों तू आ जाती?
जग को छोड़ प्रभु को ध्याऊँ,
तुझसे कैसे मुक्ति पाऊँ?

गांडीव की टंकार

तेरह वर्ष की रजनी बीती, अब प्राची मुस्काई है,
वन में तपकर लौह हुआ जो, वो ज्वाला फिर आई है।
जिसे समझकर मौन तपस्वी तुमने किया उपहास,
वही धनंजय खड़ा सामने, लिये प्रलय का पाश!

जिस भुजा ने देवों तक से युद्ध किया अभय होकर,
आज खड़ी है दोनों भुजा कौरव सम्मुख भय खोकर।
दुर्योधन मत समझो वन ने मुझको दुर्बल कर डाला,
भूख मिली तो धैर्य मिला, संकट से भीषण बल आया।

न राज्य-लालसा मुझे यहाँ, न यश का मोह बुलाता है,
जिसके छीने मान तुम्हीं ने वही अर्जित करने आता है।
कहाँ गया वो दर्प तुम्हारा, कहाँ गई वो कुत्सित वाणी?
कहाँ गया वो हास्य सभा का,कहाँ गई वो कुटिल कहानी?

जिस नारी के केश खिंचे थे, उस सभा में शपथ शेष है,
उस अबला के अपमानों का ऋण अभी तक अवशेष है।
आज परीक्षा मेरी नहीं कौरव आज तुम्हारी बारी,
देखें किसमें लहु शेष है, देखें किसकी साँसें भारी!

आज न पूछो कौन अकेला,कौन खड़ा किस ओर,
आज धनुष ही वचन कहेंगे, बाण करेंगे शोर।
प्रतिशोध की आग नहीं मैं, न्याय पुण्य की ज्वाला हूँ,
कुन्ती पुत्र धनंजय मैं , धर्म मर्म कर्म रखवाला हूँ।

तेरह वर्षों की मौन तपस्या आज है मुखरित होने को,
समर क्षेत्र के सकल दिशाओं में रण मुखरित होने को।
आज नहीं तो फिर कब होगा सत्य-साहस का मान?
आओ! देखूं कौन बचाता अपनी मिथ्या मान।

अब तक धूल सही है वन की, अब रण-धूल उड़ाऊँगा,
अब तक मौन रहा जो गाण्डीव, उसकी नाद सुनाऊँगा।
संख्या का अभिमान न करना, बाण हमारे बोलेंगे,
कुरु वंश के योद्धा सारे अपने शौर्य को तोलेंगे!

आज न कोई क्षमा-विनय, न कोई मिथ्या अभिमान,
रण में केवल कर्म बोलेंगे, कौन धनुर्धर, कौन महान!
आज दिशाएँ कंपित होगी, गिरिशिखर भी डोलेंगे,
आज मेरे प्रत्यंचा घोष  से सुप्त प्राण  जग जाएँगे!

आज न बादल गरजेंगे, न बिजली ही चमकेगी,
आज प्रत्यंचा की ध्वनि से रणभूमि ये दहकेगी।
आज प्राची पर अरुण प्रभा है, आज तम का अवसान,
उठो कुरुवंश आज सुनो तुम गाण्डीव  गर्जन-गान!

एक-एक अपमान हृदय में, अग्नि बनकर जलता था,
एक-एक अन्याय समय में, अंकित होकर फलता था!
सुनो! यह केवल धनुष नहीं यह धर्म का घोष है,
ये बाण नहीं हैं मात्र हमारे ये  काल आक्रोश है।

आज पार्थ के बाण लिखेंगे, रणभूमि  इतिहास,
न्याय फलेगा धर्म फलेगा मिटे अधर्मी पाश।  
आज पार्थ का नाद दिवस है अम्बर में अंगार ,
देख आज इतिहास सुनेगा गाण्डीव की टंकार !

नक़ाफी है शायद मेरा इंसान होना

लोग पूछते हैं मुझसे मेरे मज़हब का नाम,
नक़ाफी है शायद , मेरा इंसान होना।

आँख का अंधा भी कहलाता है नयनसुख यहाँ,
फिर क्यों ज़रूरी है नाम-ओ-निशान होना।

जात पूछी, कभी पूछा मेरा कुल कभी देश,
मेरी समझ ना आये होता क्या इंसान होना।

रंग अलग, रूप अलग, भाषा अलग हो तो क्या,
ख़ून सबका एक  फिर क्यों अनजान होना।

मैंने इंसान को इंसान की नज़र से देखा,
मेरी पूजा भी यही, मेरा यही ईमान होना।

कौन ऊँचा है, कौन नीचा—ये सवालों के सिवा,
काश दुनिया में बचे बस इतना इंसान होना।

किस किताब में लिखा है कि बँटे आदमी,
किस ज़ुबाँ ने सिखाया है यहाँ हैवान होना।

मज़लूम की आहों को जो सुन ले दिल से,
शायद उससे बड़ा कोई नहीं इंसान होना।

मुझे पहचानना हो तो मजहब ना पूछो,
मेरी ख्वाहिश यही ना बेईमान होना।

लोग पूछते रहें मुझसे मेरे मज़हब का नाम,
मैं कहूंगा  मज़हब मेरा बस  इंसान होना।

Thursday, October 1, 2026

पापा की यादें

तब पापा उठ डांट लगाते , देर तलक  सो जाने में।।
नींद कहाँ अब आती हमको, ख़ुद को रोज़ सुलाने में।।

वो मिट्टी की खुशबू आती है, बरसातों के मौसम में,
मन फिर से बच्चा हो जाता है, बीते पल दोहराने में।।

दरवाज़े की आहट सुनकर, पल भर को चुप हो जाता,
फिर खुशियों से हँस पड़ता , पापा के घर में आने में।।

आँगन में तब  अनुशासन था, पापा का तब  क्रोध रहा,
उनकी डाँट में प्यार छिपा था, मुझको  राह दिखाने में।

आज वही आँगन सूना है , आँगन जैसे मौन हुआ है ,
मन उनको अब ढूँढ़ रहा है, सूने घर को बगियाने में।।

फिर भी अंतस के अंतर में, पापा  वैसे ही रहते हैं,
जैसे कल ही साथ खड़े थे , हँसने और रुलाने में।।

जिन राहों पर साथ चले थे, आज अकेला चलता हूँ,
पाँव थकें तो यादें आतीं, उनकी  राह बताने  में।।

एक दिया अब भी जलता पापा दिल  के कोने में,
जैसे अब भी पास खड़े हो मुझको गले लगाने में।।

आज भरा घर सामानों से, देखो पापा दिल  खाली,
क्या-क्या खोया मैंने आखिर, आगे बढ़ते जाने में।।

अब चौखट से पूछ रहा हूँ, पापा कहाँ हैं कैसे हैं ,,
कैसे मन की बात बताऊँ, दिल की पीड़ जताने में।।

जब तक साँसें होंगी मेरी, पापा दिल में याद रहेंगे,
हर धड़कन में नाम रहेगा, सुख-दुख के अफ़साने में।।

जब तक ये जीवन है मेरा, नेक विरासत अपनाऊंगा ,
पापा कोई  कसर ना होगी सारी   सीख निभाने में ।। 

क्या खूब अख़्तियार है

क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

नशा चढ़ता है और दिखने लगता उसपे असर।
कि जाम उठाते हीं झुकने लगता है इस कदर।
आने लगती है लबों पर हर बेबस के लिए आवाज
जो भी दिल में दबा था कहने लगता है बे-हिसाब।
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी  जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

नशा बढ़ता है तो बढ़ती है अदब की रौशनी,
हर अजनबी में देखे फिर इंसान की ज़िंदगी।
वो सुनता है ख़ामोशी को, बड़े गौर से जनाब,
ना काटे किसी की ना करे  किसी की  ख़राब।
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

मयख़ाने में पूछो तो हर शख़्स का अफ़साना है,
किसी के हाथ में जाम है, तो  दिल में पैमाना है,
कोई पीकर खोए ख़ुद को कोई चुकाए अपना हिसाब,
कोई जाम से बिगड़ जाए, पर ये सीखता आदाब।”
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

न आँखों में गुरूर आए, न लहजे में कोई ख़राबी,
न होंठों पर शोर कोई, न बातों में कोई बेताबी।
जाम हाथ में आए तो उसके दिल हो जाए साफ़ ,
कि वो दूर था खुद से आज आ गया  ख़ुद के पास
क्या खूब ये अख़्तियार है, इस पीने पे भी  जनाब,
कि अच्छा पीने से पहले, और उम्दा पीने के बाद।

ओ मृगतृष्णा की रेखा

अरी मन की प्रथम तरंग, तू कौन अनाम कहानी,
क्षण में सावन बरसा दे, क्षण में नयन में पानी।

ओ स्मृति-वन की मृगनयनी, री बीते क्षण की छाया,
जिसको पाया, उसको खोया, खोया तो फिर माया।

अरी अभिलाषा की चपला, ओ मृगतृष्णा की रेखा,
दूर क्षितिज तक दौड़ लगाती, पास न आए लेखा।

कभी गगन में उड़ती जाती, कभी धूल में गिर जाती,
एक कण में विश्व समेटे, विश्व मिले तो भरमाती।

तू ही स्वप्न सजाती मन में, तू ही स्वप्न मिटाती,
तू ही दीप जलाती भीतर, तू ही आँधी बन जाती।

हे इच्छा की अनगिन शाखा, तृष्णा तेरा विस्तार,
एक मिले तो दूजा माँगे, कब थमे यह व्यापार?

रे मन! तेरा कौन किनारा, कौन तेरा विस्तार,
कहाँ रुके तेरी गति कभी, कहाँ रुके विचार?

तर्क-शिखर पर चढ़ता मन, भाव-सलिल में बहता,
एक पुरानी स्मृति की चिनगी, अंतर-वन में दहता।

जितना बाँधूँ, उतना छूटे, जितना रोकूँ भागे,
दमन-जाल में फँसा मन ही, प्रतिरोध की ज्वाला जागे।

अरी विस्मृति! तू क्या मिटाए इस चंचल मन की गति?
जिसे दबाया, वही उभरा; जिसे समझा, वहीं मुक्ति।

न मन को जीत, न मन को बाँध, उसकी गति पहचान,
जिस क्षण मन को समझ लिया, खुल गया निज विधान।

तब जाना—मन शत्रु नहीं, यह मन ही मन का साथी,
जिसे समझा, वह शांत हुआ, मिटने लगी व्यथा सारी।

My Blog List

Followers

Total Pageviews