एक मुर्गा सोचा सीना तान,
अब न कभी होगा बिहान,
जो मैं ना बोलूँगा कुकड़ू-कूँ,
हा हा ही ही, हू हू हू!
बोला—“मेरे दम पर दुनिया,
मेरे दम पर चाँद-सितार,
मेरी बाँग से सूरज जागे,
मैं ही हूँ दिनकर सरकार!”
मुर्गी बोली—“बड़े मियाँ,
किस खेत की मूली हो मियाँ?
कल जो तुमको खाँसी आई,
सूरज ने छुट्टी न मनाई!”
मुर्गा बोला—“चुप बदज़ात!
तुझको क्या ब्रह्मांड की बात?
आज न बाँग लगाऊँगा,
सूरज को भूखा सुलाऊँगा!”
रात गई, फिर भोर हुई,
सूरज की पेशी और हुई!
बिना बुलाए हाज़िर होकर,
चमका ऐसे आँखें खोलकर!
मुर्गा देख हुआ हैरान,
लुट गया उसका स्वाभिमान!
बोला—“यह कैसा अन्याय?
बिना बुलाए सूरज आय!”
तभी किसान ने दरवाज़ा खोला,
मुर्गे को देखकर यूँ बोला—
“आज न बाँग? बड़े नवाब!
क्या सरकार ने किया ख़िताब?”
र्गा बोला—“सुन किसान,
मैं हूँ कलाकार महान!
मेरी बाँग की कीमत आँको,
पहले मेरी तनख़्वाह बाँटो!”
किसान बोला—“वाह उस्ताद!
काम न धेला, माँगे प्रसाद!
तेरी बाँग के बिना बिहान,
फिर भी चलता मेरा मकान!”
हा हा ही ही, हू हू हू,
मुर्गे का निकला कुकड़ू-कूँ!