Saturday, September 26, 2026

शिकार हो चले थे

 हम सोच के बड़ा ये खुशगवार हो चले थे ।

बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।
मशरूफ जगह जीने कि, मुझको है मयस्सर ।
ये मान के बेफिक्र हम , हज़ार हो चले थे ।

छोटी छोटी हारों से दुखता था मेरा मन ।
छोटी छोटी बातों से टूटता था मेरा मन ।
छोटे तरीकों से , जीता जान लोगों से ।
खुदा का हज़ार शुक्रगुजार हो चले थे ।

ये जनता था नाम में , रखा कुछ भी नही ।
ये मानता था मान में , रखा कुछ भी नही ।
पर जीवन ये मेरा कि , नाम और शान पे ।
ख़ुद से खुश- नाराज , कई बार हो चले थे ।

मालूम न था गम के साये मुझपे भी छाएंगे ।
दुःख के बादल के छाये , मुझपे भी आएँगे ।
औरों को देखा रोते तो , खोली आँख थोडी ।
कि रोते लोगों से , दरकिनार हो चले थे ।

ये बीबी ये बच्चे , ये घर बार ये सपना ।
जाने किस किस को , समझा था मैं अपना ।
पर मौत के बिछावन से हुआ जब रु ब रु ।
ख़ुद ही ख़ुद से हम लाचार हो चले थे ।

देखता हूँ आंखों से , आँख पर नहीं हूँ मैं ।
सोंचता हूँ सांसों पे , नाक पर नही हूँ मैं ।
शरीर ने आख़िर में, छोड़ा जब ख़ुद का साथ।
बड़ी देर से इस सच के , दीदार हो चले थे ।

दोस्तों के वास्ते

 कभी भी बेहिचक 

खखार सकते हो 
बिना खौफ पे 
मार सकते हो टंगड़ी 
लताड़ सकते हो

खी खी करके हसने में भी 
हिचक नहीं होती 
दोस्तों के सामने रोने में भी 
झिझक नहीं होती

गर निभानी पड़ जाये 
वो दोस्ती नहीं 
तकरार से टूट जाये 
नहीं दोस्ती कोई

जाने अनजाने कई बार 
फसा जाते है 
यार जब भी याद आते है 
सपनों में भी हसांते है

दोस्त हाथ मिलाते है 
गन्दगी फैलाते है 
फ़ैलाने का अधिकार है 
हां दोस्तों के वास्ते 
मुझे ये भी स्वीकार है

क से काली नहीं

क से काली नहीं—
कौआ लिखो!
ग से गणेश नहीं—
गिद्ध लिखो!
भ से भोले नहीं—
भैंस लिखो!
प से पैगम्बर नहीं—
पाड़ा लिखो!

क से कौआ—

सामान्य!

क से काली—

सावधान!

ग से गिद्ध—

प्राकृतिक!

ग से गणेश—

धार्मिक!

भ से भैंस—

प्राणी!

भ से भोलेनाथ—

आस्था की कहानी

प से पाड़ा—

शब्द!

प से पैगम्बर—

मजहब!

अक्षर वही—

ध्वनि वही—

व्याकरण वही—

फिर यह अंतर क्यों?

क्यों भाई?
अक्षर तो वही था,
वाणी भी वही थी—
फिर नाम बदलते ही
नियम क्यों बदल गया?

कहानी क्यों बदल गई

क्यों

कौआ—धर्मनिरपेक्ष,
गिद्ध—धर्मनिरपेक्ष,
भैंस—धर्मनिरपेक्ष,
गधा—धर्मनिरपेक्ष!

और काली से धर्म ,
गणेश से आस्था मर्म
भोले आए—भक्ति तब
पैगम्बर आए—मजहब!

शायद

कौआ आया—सबका निकला,

गिद्ध आया—प्रकृति महान;

गधा आया—सर्वधर्मनिरपेक्ष,

क्योंकि उसका कोई धर्म नहीं—

या शायद कोई पहचान नहीं!

क्योंकि जात पूछकर 

गिद्ध नोचते नहीं

झपटते वक्त किसी का क्या मजहब है

सोचते नहीं 

और गधा ,भैंस

कुछ भी समझते नहीं 

उनके लिए सारे धर्म

सारे मजहब

सारी जाति 

होती है एक बराबर

प्रश्न न काली का है,

न गणेश का,

न पैगम्बर का,

न भोलेनाथ का।

प्रश्न तो  कौवों का है

प्रश्न भैसों का है

प्रश्न गधों का है

प्रश्न गिद्धों का है

क्योंकि

ये पाए जाते हैं हर धर्म में

कौआ न हिन्दू, न मुसलमान,

गिद्ध न मंदिर, न मस्जिद जान;

गधा न पूछे जात-पंथ

“कौआ धर्म से ऊपर,

गिद्ध मजहब से पार,

गधा सबसे निष्पक्ष

इसलिए ये सारे होते हैं निष्पक्ष!

धर्म निरपेक्ष।

इसीलिए धर्म निरपेक्षता महान

क्योंकि कौआ,गिद्ध और गधा

रचते इसका विधान।

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