😂 ओ खुजली! तू बहुत सताती
एक ध्यानमग्न योगी की करुण-पुकार — हास्य कविता
ओ खुजली! तू बहुत सताती,
बार-बार क्यों तू आ जाती?
जब भी बैठूँ ध्यान लगाने,
तू आ जाती मुझे सताने!
आँखें मूँद, लगाऊँ ध्यान,
मन में गूँजे प्रभु का गान,
अभी शांति की लहर है आती,
तू पीठ पर डमरू बजाती!
ओ खुजली! कुछ तो शर्म कर,
योगी हूँ, थोड़ा तो रहम कर!
कौन शत्रुता तू है निभाती,
जो हर पल मुझको तड़पाती?
माथे पर जब ध्यान लगाऊँ,
तब तू ठुड्डी पर चढ़ आऊँ!
ठुड्डी खुजलाऊँ, पीठ मचलती,
पीठ खुजलाऊँ, नाक उछलती!
खुजली बोली, “सुन ओ बाबा,
मत समझो मुझको कोई अजूबा!
जब तक तन से मोह न जाएगा,
मेरा आना-जाना चलता जाएगा!”
योगी बोला, “वाह रे ज्ञानी!
तूने भी दी बात सयानी!
मोह छोड़ने बैठा था मैं,
तुझमें ही उलझा रहता हूँ मैं!”
फिर दोनों में हुई सुलह,
योगी ने ली गहरी साँस,
जैसे ही वह ध्यान में बैठा,
खुजली बोली— “मैं हूँ पास!” 😂
ओ खुजली! तू बहुत सताती,
बार-बार क्यों तू आ जाती?
जग को छोड़ प्रभु को ध्याऊँ,
तुझसे कैसे मुक्ति पाऊँ?
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