तू दीप जलाता मंदिर में, मन का अँधियारा कौन हरे?
तू फूल चढ़ाता चरणों में, मन का उजियारा कौन रचे?
तू घंट बजाता मंदिर में, क्या मन की घंटी बजती है?
तू थाल सजाता मंदिर में ना अंतर-ज्योति सजती है?
तू गीता का उपदेश सुने , कर्मों की चर्चा करता तू,
पर फल की इच्छा है मन में,निष्काम कहाँ रहता तू?
तू लाख बहाने गढ़ता है, व्यस्तत अपना संसार लिए,
कहे समय ना मिलता है , इतने सारे व्यापार लिए।
तू राम-कथा का ज्ञाता है, पर राम-मार्ग से दूर खड़ा,
तू कृष्ण-प्रेम का गायक है,पर पकर्म-मार्ग से दूर रहा?
तेरे मन में ना लहर उठी,ना प्रीत जगी ना आस उठी।
अधरों पे मिथ्या राम नाम,ना दिल में कोई प्यास उठी।
कभी मंदिर में चले गए ,पूजा वन्दन और नृत्य किए।
शिव पे थोड़ी सी चर्चा ,कुछ बात किए घर चले गए।
ज्ञानी से थोड़ी जिज्ञासा,कौतुहल वश कुछ बातेें की।
दिन में की और रातें की,जग में तुमने बस बातें की।
मन में रखते रहने से मात्र कुछ प्रश्न कुछ जिज्ञासा,
ना मिल पाता परम तत्व, जब तक ना कोई पिपासा।
प्रभु वहीं प्रकट हो जाता है,जहाँ मन द्वेष अहंकार डरे।
वो प्रेम जहाँ निष्कपट मिले, करुणा जहाँ विस्तार करे,
बिना भक्ति के बिना भाव के,ईश्वर का अर्चन कैसा?
ज्यों बैठ किनारे सागर तट पे ,सागर के दर्शन जैसा।