रात हुई, हम बिस्तर पर थे, ओढ़ चादर महारानी,
नींद खड़ी थी द्वार पे लेकर सपनों की राजधानी।
ज्यों ही आँख लगी हमारी, तूने बिगुल बजाया,
तकिया बोला—“हे भगवान! फिर किसको जगवाया?”
नींद गई ससुराल हमारे, सपने हुए पराए,
पड़ोसी बोले—“कौन पटाखे आधी रात चलाए?”
छींक, तू बड़ा सताती!
एक दिवस हमने नाक पकड़कर तुझसे प्रश्न उठाया—
“किस विभाग में नौकरी करती, किसने तुझे बनाया?
जब हम खाली बैठे होते, तब तू मुँह लटकाती,
बॉस के आगे, इश्क़ के भीतर, तू क्यों दौड़ी आती?”
बोली छींक—“हुज़ूर, हमारा टाइम नहीं है फिक्स,
जहाँ मिले गंभीर माहौल, वहीं लगाते मिक्स!”
छींक, तू बड़ा सताती!
अब तो तुझसे हाथ जोड़कर इतनी विनती करते,
आने से पहले एक संदेशा भेज दिया कर, डरते!
मीटिंग में तू छुट्टी ले ले, इश्क़ में मौन धरे,
परीक्षा में अवकाश मना ले, मंदिर में भी न उतरे!
घर में जब हम मूँगफली के दाने छील रहे हों,
तब आना जी, दस-पंद्रह की खेप खुशी से दे जाओ!
छींक, तू बड़ा सताती!
नाक हमारी, राज तुम्हारा, कैसी यह मनमानी,
हम मालिक कहलाते फिर भी, तू निकली महारानी!
रुमालों का खर्च बढ़ा दिया, इज़्ज़त की निकली हवा,
तेरे आगे नाक कटाकर, घूम रहे हम बेवजह!
फिर भी तुझसे बैर न ठानें, आखिर तू है अपनी,
बस इतना कर—समय देखकर बजा लिया कर बीन अपनी!
छींक, तू बड़ा सताती!
No comments:
Post a Comment