वन में तपकर लौह हुआ जो, वो ज्वाला फिर आई है।
जिसे समझकर मौन तपस्वी तुमने किया उपहास,
वही धनंजय खड़ा सामने, लिये प्रलय का पाश!
जिस भुजा ने देवों तक से युद्ध किया अभय होकर,
आज खड़ी है दोनों भुजा कौरव सम्मुख भय खोकर।
दुर्योधन मत समझो वन ने मुझको दुर्बल कर डाला,
भूख मिली तो धैर्य मिला, संकट से भीषण बल आया।
न राज्य-लालसा मुझे यहाँ, न यश का मोह बुलाता है,
जिसके छीने मान तुम्हीं ने वही अर्जित करने आता है।
कहाँ गया वो दर्प तुम्हारा, कहाँ गई वो कुत्सित वाणी?
कहाँ गया वो हास्य सभा का,कहाँ गई वो कुटिल कहानी?
जिस नारी के केश खिंचे थे, उस सभा में शपथ शेष है,
उस अबला के अपमानों का ऋण अभी तक अवशेष है।
आज परीक्षा मेरी नहीं कौरव आज तुम्हारी बारी,
देखें किसमें लहु शेष है, देखें किसकी साँसें भारी!
आज न पूछो कौन अकेला,कौन खड़ा किस ओर,
आज धनुष ही वचन कहेंगे, बाण करेंगे शोर।
प्रतिशोध की आग नहीं मैं, न्याय पुण्य की ज्वाला हूँ,
कुन्ती पुत्र धनंजय मैं , धर्म मर्म कर्म रखवाला हूँ।
तेरह वर्षों की मौन तपस्या आज है मुखरित होने को,
समर क्षेत्र के सकल दिशाओं में रण मुखरित होने को।
आज नहीं तो फिर कब होगा सत्य-साहस का मान?
आओ! देखूं कौन बचाता अपनी मिथ्या मान।
अब तक धूल सही है वन की, अब रण-धूल उड़ाऊँगा,
कुन्ती पुत्र धनंजय मैं , धर्म मर्म कर्म रखवाला हूँ।
तेरह वर्षों की मौन तपस्या आज है मुखरित होने को,
समर क्षेत्र के सकल दिशाओं में रण मुखरित होने को।
आज नहीं तो फिर कब होगा सत्य-साहस का मान?
आओ! देखूं कौन बचाता अपनी मिथ्या मान।
अब तक धूल सही है वन की, अब रण-धूल उड़ाऊँगा,
अब तक मौन रहा जो गाण्डीव, उसकी नाद सुनाऊँगा।
संख्या का अभिमान न करना, बाण हमारे बोलेंगे,
संख्या का अभिमान न करना, बाण हमारे बोलेंगे,
कुरु वंश के योद्धा सारे अपने शौर्य को तोलेंगे!
आज न कोई क्षमा-विनय, न कोई मिथ्या अभिमान,
आज न कोई क्षमा-विनय, न कोई मिथ्या अभिमान,
रण में केवल कर्म बोलेंगे, कौन धनुर्धर, कौन महान!
आज दिशाएँ कंपित होगी, गिरिशिखर भी डोलेंगे,
आज मेरे प्रत्यंचा घोष से सुप्त प्राण जग जाएँगे!
आज न बादल गरजेंगे, न बिजली ही चमकेगी,
आज प्रत्यंचा की ध्वनि से रणभूमि ये दहकेगी।
आज दिशाएँ कंपित होगी, गिरिशिखर भी डोलेंगे,
आज मेरे प्रत्यंचा घोष से सुप्त प्राण जग जाएँगे!
आज न बादल गरजेंगे, न बिजली ही चमकेगी,
आज प्रत्यंचा की ध्वनि से रणभूमि ये दहकेगी।
आज प्राची पर अरुण प्रभा है, आज तम का अवसान,
उठो कुरुवंश आज सुनो तुम गाण्डीव गर्जन-गान!
एक-एक अपमान हृदय में, अग्नि बनकर जलता था,
एक-एक अन्याय समय में, अंकित होकर फलता था!
सुनो! यह केवल धनुष नहीं यह धर्म का घोष है,
ये बाण नहीं हैं मात्र हमारे ये काल आक्रोश है।
आज पार्थ के बाण लिखेंगे, रणभूमि इतिहास,
न्याय फलेगा धर्म फलेगा मिटे अधर्मी पाश।
आज पार्थ का नाद दिवस है अम्बर में अंगार ,
देख आज इतिहास सुनेगा गाण्डीव की टंकार !
देख आज इतिहास सुनेगा गाण्डीव की टंकार !
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