वो झुक गया है आज फिर, मसला रोटी का है,
वो चूक गया है आज फिर, मसला रोटी का है।
छोटों की हर डांट को सहने लगा वो हँस हँसकर,
जिन्हें सिखाया उन्हीं की सुनता जमीन में धंस धंसकर।
सिर को झुकाना सीख लिया, होठों को सिल लिया है,
भाई कुर्सी के आगे बोले कौन कुर्सी से मिल लिया है
हर ज़ुल्म देखकर भी अब निगाहें फेर लेता है वो
पेट की आग में जलकर ज़मीर बेच देता है वो
कल तक जो बात ज़मीर को मंज़ूर न थी उसको,
आज वही सब ठीक है कह रहा ,मसला रोटी का है।
वो झुक गया है आज फिर, मसला रोटी का है,
वो चूक गया है आज फिर, मसला रोटी का है।
दावा था उसका बिक नहीं सकता कभी बाजार में,
आज भाव पूछता है अपना कितना है खरीददार में
कभी इंसान था बन गया मशीन ना जाने कब पता,
आज अनाम है गुलाम है पर उसकी नहीं कोई खता
न नाम की पहचान है, न काम का सम्मान है,
हुक्म बजाना ही अब उसकी नई पहचान है।
अन्याय पर वो चुप है आज पेट ने ये सीख दी,
वो टूट गया है आज फिर ,मसला रोटी का है।
वो रुक गया है आज फिर मसला रोटी का है।
वो चूक गया है आज फिर, मसला रोटी का है।
कभी उसकी आवाज़ में इंक़लाब पलता था,
उसके लफ़्ज़ों से बड़े-बड़ों का ताज हिलता था।
आज आवाज़ उठाने से पहले हिसाब करता है,
कितनी तनख़्वाह बचेगी, नफा नुक़सान करता है।
ज़मीर मर गया है या कि ज़िंदा दफन हो गया,
देख तो लिबास है या कि मुर्दा कफ़न हो गया
वो कहता है ख़ामोशी में भी एक मजबूरी है,
वो चुप है पर गलत नहीं मसला रोटी का है
वो झुक गया है आज फिर, मसला रोटी का है
वो झुक गया है आज फिर, मसला रोटी का है,
वो चूक गया है आज फिर, मसला रोटी का है।
वो झुक गया है आज फिर वो चूक गया है आज फिर
पेट की आग का है मसला जमीर के खाक का है