Thursday, July 17, 2025

आदमी वाले आंसू

 एक आदमी

सो सकता है,
जब
नींद नहीं आती।

एक आदमी
खा सकता है ,
जब
क्षुधा नहीं सताती।

जानवर
उकसाने पर
गुर्राते हैं ,
आदमी गुर्राने को
उकसाता है।

जानवरों के
मौसम होते है
प्यार करने को,
आदमी को
मौसम बेमौसम
प्यार का भुत
सताता है।

और

आदमी की आँखों से
झर सकते है
घड़ियाली आसूँ
पर घड़ियालों से
नहीं आ सकते
आदमी वाले आंसू

अंगुलिमाल

 इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता

तुम कितना खाते हो ?
इससे भी कुछ फर्क नहीं पड़ता
कि तुम क्या पाते हो ?

इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता
कि तुमने कितना कमाया है ?
इससे भी कुछ फर्क नहीं पड़ता
तुमने क्या क्या गंवाया है ?

दबाया है कितनों को
कुछ पाने के लिए ?
जलाया है कितनों को
अपना मुकाम बनाने के लिए ?

इससे भी फर्क नहीं पड़ता
तुमने दूजों को रुलाया है ,
फर्क इससे भी नहीं पड़ता
की अपनों को भी सताया है।

फर्क इससे पड़ता है
कि तुम हँस सकते हो ,
छोड़ के बंधन सारे दुखों के
उत्सव में बस सकते हो।

अंगुलिमाल हो या की रत्नाकर
इससे खुदा को नहीं मतलब कोई ,
छिपे हुएं हैं बुद्ध हर इक इंसान में
फर्क इससे पड़ता है कि तुम भी
खुदा हो सकते हो।

इगो मैनेजमेंट

 ये दुनिया क्या है .

दुनिया में अनगिनत ईगो 
छोटे छोटे इगो 
बड़े बड़े इगो 
छोटे इगो का बड़े इगो से 
बड़े इगो का छोटे इगो से 
तकरार बार बार 
लगातार 
कंटीन्यूअस

आपस में लड़ते इगो 
आपस में मरते इगो 
छोटी छोटी बातों पे 
झगड़ते इगो 
बड़ी बड़ी बातों पे 
रगड़ते इगो
संभलते इगो 
बिगड़ते इगो

लड़ते इगो 
झगड़ते इगो 
रगड़ते इगो 
संभलते इगो 
बिगड़ते इगो
एंड व्हाट इस वर्ल्ड 
नथिंग बट इगो मैनेजमेंट

क से काली नहीं

[Verse 1]
K se kaali nahi
Koun se Ganesh nahi
Koun se Bhairon nahi
Koun se Paigambar nahi
Koun se Ganesha
Koun se Bhense
Koun se Ganeshnath
Koun se Paigambar

[Verse 2]
Koun se kaali
Koun se Gidd
Koun se Ganesha
Koun se Bhense
Koun se Ganeshnath
Koun se Paigambar
Koun se Ganeshnath
Koun se Bhense
Koun se Ganeshnath

[Chorus]
Koun sa dharm nirpeksh
Koun sa gidd dharm nirpeksh
Koun sa bhens dharm nirpeksh
Koun sa gadha dharm nirpeksh
Koun sa dharm nirpeksh
Aur kaali se dharm
Ganesh se astha marm
Bhole aaye bhakti tab
Paigambar aaye mazhab
Shayad

[Verse 3]
Koun aaya
Sab ka nikla
Gidd aaya
Pragti mahan
Gadha aaya
Sarvadhar nirpeksh
Kyun ki uska koi dharm nahi
Ya shayad koi pehchan nahi

[Verse 4]
Kyun ki jaat poochkar
Git nochte nahi
Dhart waqt kisi ka kya mazhab hai
Sochte nahi
Aur gadha bhens
Kuch bhi samajhte nahi

[Outro]
Koun na hindu na musalman
Gidd na mandir na masjid
Gadha na pooche jaat panth
Koun dharm se upar
Koun mazhab se paar
Gadha sabse nishpaksh
Isliye
Yeh sare hote hain nishpaksh
Dharmanirpeksha
Isliye
 Dharmanirpekshata mahan
Kyun ki koun
Gidd aur gadha
Rachte iska vidhan

नल की टुटी

 वो वकील हैं

इसलिए
यदि लाइब्रेरी के पानी के नल की टुटी खुली है
तो इस बात को लिब्ररियन के पास ले जाएँगे
आपनी फरियाद सुनाएँगे
अनसुनी होने पे अपनी बात
छात्रों में आवाज फैलंगे
कौमी अवाम जगाएंगे
थाने में रपट लिखाएँगे
सब कुछ करेंगे
नल में लकड़ी ठुसने के सिवा

एक द्रष्टा

 अनगिनत पृथ्वियां

इसके भीतर

अनगिनत कहानियां
इसके भीतर

प्रेम की
वार की

अनगिनत राज्य
अनगिनत राजे
इसके भीतर

अनगिनत दृश्य
आते जाते
दुहराते
अनगिनत समय से

और
सबमे संलिप्त
और सबसे निर्लिप्त

आकाश की भांति
होता है योगी
एकदम अछूता

एक द्रष्टा

भिक्षाटन

 प्रेमी की याचना

प्रेमिका से,
प्रेम की।

प्रेमिका की याचना
प्रेमी से,
प्रेम की।

पिता का पुत्र से,
पुत्र का पिता से।

पति का पत्नी से,
पत्नी का पति से।

मित्र की याचना मित्र से
प्रेम की,
पुरुष की याचना स्त्री से
प्रेम की।

प्रेमी भी याचक
प्रेमिका भी याचक,
पिता भी याचक
पुत्र भी याचक,
माता भी याचक
मित्र भी याचक,
स्त्री भी याचक
पुरुष भी याचक,
प्रेम के।

सबमें प्रभाव प्रेम का,
सबमें अभाव प्रेम का।

एक अभाव  याचक,
पर दूजा वाचक।

और
ये सृष्टि क्या?


भिक्षाटन।

पिता के पास

 भगवन

कितनी खूबसूरत है तेरी दुनिया।

ये झरने का कल कल संगीत
ये चिड़ियों का चहचहाना,

ये फूलों की सुगंध,
ये क्षितिज के पार
बादलों की ओट से
सूरज का आ जाना।

फूल फूल पे नृत्य करते भौरें,
और आनंदमय मोर,
ये रंग बिरंगी तितलियाँ
और टर्र टर्र मेढकों का शोर।

दूर दूर तक लहलहाते पेड़
हवा के साथ झूमते मुस्कुराते,
और झूमती हरी भरी धरती
दूर दूर तलक पौधे लहराते।

आकाश में सूरज से
आँख मिचौली करते मेघ,
और ह्रदय स्पंदित
पंछियों की कतार देख।

काश¡¡¡¡¡

भगवन दे देते ऐसी टेक्नोलॉजी

कि

ये हरी भरी धरती
ये लहलहाते खेत,
ये फूलों की सुगंध
ये काले काले मेघ।

एक बक्शे में भरकर
ले जा पाता ,

ये
थोड़ा सा
पूरा आकाश,

अपने अपंग पिता के पास।

Wednesday, July 16, 2025

ऑफिस में भूचाल आ गया

 

ऑफिस में भूचाल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया।

आते हीं आलाप करेगा,
अनर्गल प्रलाप करेगा,
हृदय रुग्ण विलाप करेगा,
भाँति भ्रांति अशांति सन्मुख,
जी का एक जंजाल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया ।

अब कोई संवाद न होगा,
होगा जो बकवाद हीं होगा,
अकारण विवाद भी होगा,
हरे शांति और हरता है सुख,
सच में हीं बवाल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया।

कार्य न कोई फलित हुआ है,
जो भी है, निष्फलित हुआ है,
साधन भी अब चकित हुआ है,
साध्य हो रहा, हार को उन्मुख,
कुकर्म घृणित महाकाल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया।

धन धान्य करे संचय ऐसे,
मीन प्रेम बगुले के जैसे,
तुम्हीं बताओ कह दूं कैसे,
कर्म बुरा है मुख भी दुर्मुख,
ऑफिस में फिलहाल आ गया,
हाँ फिर से चांडाल आ गया।

कष्ट क्लेश होता है अक्षय,
हरे प्रेम बढ़े घृणा अतिशय,
शैतानों की करता है जय,
प्रेम ह्रदय से रहता विमुख,
कुर्म वाणी विकराल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया।

कोई विधायक कार्य न आये,
मुख से विष के वाण चलाये,
ऐसे नित दिन करे उपाय,
बढ़े वैमनस्य, पीड़ा और दुख,
ख़ुशियों का अकाल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया।

बतलाये खुद को वो ज्ञानी,
पर महाचंड वो है अज्ञानी,
मूर्खों में नहीं कोई सानी,
सरल कार्य में धरता है चुक,
बुद्धि का हड़ताल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया,

आफिस में भुचाल आ गया ,
देखो फिर चांडाल आ गया।

Thursday, July 10, 2025

शक्ति का भ्रमजाल"

शहर के बीचोंबीच एक आलीशान इमारत थी — "अहंकार टावर्स"। इसके पेंटहाउस में रहते थे रविरंजन नारायण, जिन्हें सब रावण बाबू कहते थे। क्यों? क्योंकि वो दस चीज़ों में माहिर थे — कंपनी चलाना, भाषण देना, गूगल से भी तेज़ जवाब देना, और दूसरों की गलती पकड़ना। बस एक चीज़ में फेल थे — अपनी गलती मानना।

रावण बाबू कहते थे —

> "देखिए, मैं शिवभक्त हूँ, MBA हूँ, TED Talk दे चुका हूँ, और जो कहता हूँ वही कानून है।"



उनकी कंपनी में एक लड़की आई — सीता शर्मा। इंटर्न थी, लेकिन आँखों में आत्मसम्मान और आवाज़ में सच्चाई थी। रावण बाबू को ये दोनों चीज़ें बर्दाश्त नहीं थीं।

एक दिन उन्होंने अपने PA से कहा —

> "सीता को मेरे केबिन में बुलाओ, और कहो कि ये ‘मेंटॉरिंग सेशन’ है।"



PA ने कहा, "सर, ये ठीक नहीं लगेगा…"

रावण बाबू मुस्कराए —

> "ठीक लगेगा या नहीं, इसका फैसला CEO करता है, HR नहीं।"



और वहीं से शुरू हुआ उनका पतन — मगर उन्हें कुछ पता नहीं चला। जैसे हर तानाशाह सोचता है कि जनता चुप है, मतलब सब ठीक है। दरअसल जनता डरी हुई थी।


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इसी इमारत के तीसरे फ्लोर पर रहता था दीपक यादव, जिसे लोग दुर्योधन भैया के नाम से जानते थे। खुद को "जनता का नेता" मानता था, मगर असल में उसे जनता से एलर्जी थी।

वो न्यूज़ चैनलों पर जा-जाकर चिल्लाता —

> "मुझे नीचा दिखाने की साजिश हो रही है। औरतें सवाल न पूछें, साड़ी पहनें और चुप रहें।"



एक दिन एक पत्रकार — डॉली मिश्रा — ने उससे सवाल पूछ लिया,

> "आपने पंचायत के फंड से अपने फार्महाउस का स्वीमिंग पूल बनवाया है, क्या कहेंगे?"



दुर्योधन भैया तमतमाए, बोले —

> "देश खतरे में है! ये विदेशी विचारधारा है! राष्ट्रवाद को बदनाम किया जा रहा है!"



सभा ताली बजा रही थी। भीड़ में बुद्धि नहीं होती, बस तालियों की गूंज होती है।


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अहंकार टावर्स के बेसमेंट में था करणाल सिंह का सर्विलांस ऑफिस — जिसे लोग कंस साहब कहते थे। उसका मानना था कि उसके रिश्तेदार ही उसके पतन के ज़िम्मेदार हैं, इसलिए उसने सबका फोन टेप कर रखा था।

जब उसकी बहन ने बेटे का नाम कृष्ण रखा, तो वो चौंका —

> "अरे! यही तो मेरा काल है! इसको बचपन में ही निबटा देना चाहिए।"



उसने CCTV लगवाए, AI ट्रैकर रखवाए, और पूरे परिवार को एक डिजिटल जेल में डाल दिया।

पर एक दिन, उसका भांजा कृष्णा पांडे, जो इंस्टाग्राम पर मीम बनाता था, लाइव आ गया और कहने लगा —

> "कंस अंकल! आपसे बड़ा डरे हुए लोग और कोई नहीं। आपने डर को ही सत्ता बना लिया है।"



लोग हँसे, शेयर किया, और कंस साहब ट्रेंड करने लगे — पर ग़लत कारण से।


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पंचायत भवन के सामने रहता था बालीराम चौधरी, उर्फ़ बाली अंकल। ऊँची जात, तगड़ा शरीर, और मुँह में पान मसाला — गाँव पर राज करता था।

उसका भाई सुग्रीव बड़ा सरल था। पर बाली अंकल ने उसकी बीवी को कह दिया —

> "देखो बहनजी, ये तो नालायक है। तुम पंचायती कामों के लायक हो, मेरे साथ रहो।"



गाँव वालों ने गर्दन झुका ली। किसी ने कुछ नहीं कहा। बाली बाबू मुस्कराते रहे —

> "जब पब्लिक चुप हो जाए, तो समझो मैं सही हूँ।"



फिर आया राम शर्मा, RTI फाइलें लेकर। उसने घोटालों की सूची निकाली, बैंक स्टेटमेंट, दस्तख़तों की फोटो, सब कुछ उजागर कर दिया।

बाली अंकल बोले —

> "राम ने पीठ पीछे वार किया। धोखा है ये!"
(और फेसबुक पर स्टेटस डाला: #BackStabbedByBhakt)




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अब कहानी के चारों कोनों से शक्ति चिल्ला रही थी,
"हम सर्वोपरि हैं!"
पर सच्चाई धीरे-धीरे कदम रख रही थी…

एक दिन सबके दरवाजे पर दस्तक हुई —
– रावण बाबू की कंपनी पर यौन उत्पीड़न का केस,
– दुर्योधन भैया का चुनाव रद्द,
– कंस साहब के खिलाफ मानवाधिकार आयोग का नोटिस,
– बाली अंकल की सरपंची रद्द।

सबने कहा —

> "हमें बताया क्यों नहीं गया कि हम गलत कर रहे हैं?"



सीता ने उत्तर दिया —

> "कहा था, पर तब आपके इर्द-गिर्द लोग तालियाँ बजा रहे थे। आपको सच नहीं, सिर्फ चापलूसी सुनाई दे रही थी।"




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अंतिम दृश्य:

चारों शक्तिमान अब एक ही रिट्रीट सेंटर में बैठे थे, जिसे "गर्व मुक्ति केंद्र" कहते थे। सफेद कुर्ते में, सिर झुकाए, बगल में ‘How Not To Be A Dictator’ किताब रखी थी।

रावण बाबू बोले —

> "हम सब तो अपने आपको ही भगवान समझ बैठे थे…"



राम शर्मा, जो अब एक शिक्षक बन गया था, मुस्कुराकर बोला —

> "सत्ता जब विवेक को खा जाती है, तब आदमी को अपने पाप दिखते ही नहीं।
और जब दिखते हैं, तब तक वो Instagram पर वायरल हो चुके होते हैं… और कोर्ट में पेशी शुरू हो जाती है।"




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सीख:

इस कहानी से क्या सीख मिलती है?

शक्ति बुरी चीज़ नहीं है।
लेकिन जब शक्ति को कोई चुनौती न मिले, जब उसके चारों ओर सिर्फ हाँ में हाँ मिलाने वाले हों, जब कोई उसे "गलत" कहने की हिम्मत न करे —
तो वही शक्ति धीरे-धीरे एक आत्ममुग्ध राक्षस बन जाती है।

और फिर जब पाप का घड़ा फूटता है —
तो इंसान को अपनी आवाज़ सुनाई देती है, पर बहुत देर से।

क्लिप

 दफ़्तर का वह कमरा जहाँ चाय की केतली रोज़ाना समय से पहले सीटी मारती थी, कम्प्यूटर की मशीनें खुद से पहले जाग जाती थीं और कर्मचारी नींद से लड़ते हुए टेबल पर टकरा-टकरा कर जागते थे—वहीं एक कोने में भगवती सफ़ाई में लगी रहती थी। कोई उसे धन्यवाद नहीं देता, पर वो हर कोने को वैसे ही चमकाती जैसे किसी मंत्री का दफ़्तर हो।

उसी चमकाने की प्रक्रिया में, एक दिन भगवती की नज़र कुछ टेढ़ा-मेढ़ा, धातु जैसा चमकते हुए एक चीज़ पर पड़ी। धूल में सना हुआ, हल्का जंग लगा और बेइज़्ज़ती से झुका हुआ—वह था एक पुराना, भूला-बिसरा क्लिप।

अब भला आज के समय में क्लिप की भी कोई ज़रूरत है? भगवती ने उसे देखा, फिर मन में सोचा, "ये तो वो चीज़ है जो कभी बाबू लोगों की जान हुआ करती थी, आजकल तो हर कोई कहता है– ‘भेज दो’, ‘स्कैन कर लो’, ‘मेल डाल दो’! और हम जैसे लोग जो झाड़न चलाते हैं, उन्हें भेजने के लिए झाड़न का कोई बटन नहीं होता क्या?”

क्लिप वहीं पड़ा रहा, जैसे कोई बूढ़ा सैनिक रिटायरमेंट के बाद अख़बार के कोने में बैठा हो, जिसे ना कोई पूछता है, ना कोई सलाम करता है। कभी वह भी कुर्ते की जेब में गर्व से बैठता था, किसी फाइल के ऊपर शान से कसता था, और बाबू लोग उसे टेढ़ा करते हुए कहते थे— "कस दीजिए इसे, वरना पन्ने भाग जाएँगे।" अब तो फाइलें बादलों में रहती हैं और दस्तावेज़ हवा में आते-जाते हैं।

क्लिप मन ही मन बड़बड़ा रहा था, "एक ज़माना था जब हम कागज़ों को जोड़ा करते थे, और आज देखो, लोग रिश्ते तक अनजाने ‘लॉग-इन’ से जोड़ लेते हैं! और जब टूटते हैं तो कहते हैं, ‘नेटवर्क इशू था’!”

इसी दफ़्तर में एक चरित्र और था—रघुनाथ बाबू। वो उन विरले जीवों में से थे जो आज भी कागज़ में विश्वास रखते थे। उनके पास फाइलों का ढेर रहता था, इतना कि अगर उसे जलाया जाए तो कैंटीन में महीने भर की रोटियाँ सेंकी जा सकें। उन्हें डिजिटल माध्यम से भय था, और उनके कंप्यूटर का ‘माउस’ अक्सर आलू के चिप्स की तरह व्यवहार करता था—ना क्लिक करता, ना सरकता।

और एक दिन, वही हुआ जो अक्सर तब होता है जब कोई चीज़ भूली जाती है। एक बड़ी मीटिंग थी। बाहर आंधी चल रही थी और भीतर रघुनाथ बाबू अपने पन्नों की सेना लेकर बैठे थे। खिड़की खुली और एक झोंका आया। यह झोंका सिर्फ़ हवा नहीं था, यह उन सारे दस्तावेज़ों की आज़ादी का पैग़ाम था जिन्हें सालों से क्लिप का इंतज़ार था। पन्ने उड़ने लगे। किसी का वेतन-पत्र, किसी की छुट्टी-अनुमोदन पर्ची, और किसी का बकाया बिल—सब उड़ते हुए मानो नाच कर कह रहे थे, "हमें क़ैद नहीं चाहिए!"

प्रबन्धक जी की टाई भी हल्की सी हिल गई। उन्होंने अपनी गम्भीर आवाज़ में कहा, “रघुनाथ बाबू, क्या आप सच में अपने कागज़ों को पंख लगाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं?”

रघुनाथ बाबू को जैसे बिजली का झटका लगा। अब तो उनका आत्म-सम्मान भी पन्नों के साथ उड़ने को तत्पर था।

उसी क्षण भगवती को कुछ याद आया। वो दौड़ी और उस कोने से, जहाँ क्लिप अब तक अनदेखा पड़ा था, उसे उठाया। उसके पल्लू से क्लिप को रगड़ा। एक समय के योद्धा की तरह क्लिप फिर से चमकने लगी। तन से भले ही हल्का जंग रहा हो, पर मन अब भी लोहे का था।

भगवती ने बिना कुछ कहे, कागज़ों को एकत्र किया और क्लिप को ऐसे कसा जैसे वो किसी अंतिम परीक्षा में बैठा हो। और फिर सब कुछ थम गया। पन्ने शांत। मीटिंग शांत। प्रबन्धक की भौंहें भी, पहली बार, नीचे की ओर झुकीं।

रघुनाथ बाबू की आँखों में आँसू थे—या तो गर्व के, या डर के कि कहीं अब क्लिप भी रिटायर न कर दी जाए।

प्रबन्धक बोले, "आज की इस संकट घड़ी में, जब ईमेल फेल हो जाता, क्लाउड गायब हो जाता और बैकअप भी बैकफुट पर चला जाता—तब ये छोटी-सी क्लिप हमारी साख बचा गई।"

क्लिप मुस्कुरा नहीं सकी, क्योंकि उसमें मुँह नहीं था। पर अगर होता, तो शायद कहती, "आज भी जो जोड़ता है, वही टिकाता है।"

उसी दिन से क्लिप को डिब्बे में नहीं, टेबल पर रखा गया। अब वह केवल धातु की वस्तु नहीं थी, वह भरोसे की आख़िरी रेखा बन चुकी थी।

और संध्या, जो रोज़ कहती थी "मैं सब डिजिटल कर देती हूँ", उस दिन चुपचाप नोट्स लेने लगी… कागज़ पर, और... हाँ, उन्हें क्लिप से जोड़कर।

क्लिप जानती थी कि ये युग कितना भी बदल जाए, जब कुछ सच में बिखरता है, तब पी. डी. एफ.  नहीं, वही पुरानी, धातु की क्लिप काम आती है।

दफ़्तर में चाहे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आ जाए, चाहे बॉस 'क्लाउड में सोचो' कहें—पर जब खिड़की खुले और पन्ने भागने लगें, तो वही क्लिप काम आती है जो छुट्टी भी नहीं मांगती और प्रमोशन की भी उम्मीद नहीं रखती।"

इसलिए ध्यान रखें — जीवन हो या दफ़्तर, रिश्ते हों या रिपोर्ट, जोड़ने वाला हमेशा चुप होता है, पर उसी से सब जुड़ा रहता है। और हाँ… कभी भूल से भी झाड़न को कम मत आँकना — वरना अगली बार आपकी प्रतिष्ठा भी रद्दी के साथ बह सकती है!

अपराध न्यूटन का

अर्जुन अपने 5 भाइयों के साथ मुजफ्फपुर में रहता था। उसके पिता सरकारी मुलाजिम थे । गुजर बसर लायक बमुश्किल कमा पाते थे । अक्सर खाने पीने के लिए अन्य भाइयों के साथ उसको छीना झपटी करनी पड़ती थी। मन लायक भरपूर खाना यदा कदा ही नसीब होता था।  

गर्मी की छुट्टियों में उसके मम्मी पापा गाँव गए थे। वो ट्यूशन के चक्कर में शहर ही रुक गया था। रोज सुबह उठता, चिउड़ा के साथ हॉर्लिक्स मिला कर खाता, ट्यूशन वाले मकान के पास एक होटल में बैठकर चावल और आलू की भुजिया दबा कर खाता और फिर शाम को घर लौट आता। खाने में कोई रोक टोक नहीं थी। जिस होटल में जितना चाहो, खाओ, जो चाहो खाओ। पहले मम्मी पापा होटल का खाना खाने नहीं देते थे। और अब समोसे, जलेबी, रसगुल्ले, पकौड़े सब दबा कर चट किये जा रहे थे। दरअसल पढ़ने से ज्यादा आनंद उसे खाने में आ रहा था।

वो मैट्रिक का विद्यार्थी था। शहर के एक छोटे से स्कूल में पढ़ रहा था। एक दिन उसने देखा, उसका मित्र मुकेश न्यूटन को गाली बक रहा था। पूछने पर मुकेश ने बताया, न्यूटन दुनिया का सबसे बड़ा क्रिमिनल है। भाई अगर ईश्वर ने सेब उसकी गोद में गिराया तो खा लेता। अब ये गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत देने की क्या जरूरत थी? भाई ने फिजिक्स में एक चैप्टर बढा दिया। कितने बच्चे हर साल मेन्टल टार्चर से गुजरते हैं इस गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के कारण। भाई लड़कियाँ प्यार करने की चीज होती है। अब कोई उनकी चमड़ी उधेर कर सेल बायोलॉजी पढ़ने लगे दोष किसका? ये सेब भी तो खाने के लिए ही होता है , सोचने के लिए थोड़े ही न होता है  खाने में कोई रोक टोक नहीं थी। जिस होटल में जितना चाहो, खाओ, जो चाहो खाओ। पहले मम्मी पापा होटल का खाना खाने नहीं देते थे। और अब समोसे, जलेबी, रसगुल्ले, पकौड़े सब दबा कर चट किये जा रहे थे।

ये बॉटनी का मेडल भी इसी किस्म का क्रिमिनल है। भगवान ने मटर के दाने बनाये हैं खाने के लिए, और भाई साहब 20 साल तक एक्सपेरिमेंट करते रहे मटर के साथ । पादरी थे , क्या बढ़िया भजन कीर्तन करते । क्या बढ़िया से मटर का दाना भुनकर खाते। पर नहीं इन्हें तो हमारे उपर जेनेटिक्स का चैप्टर लादना था। कितने बेचारे इस फिजिक्स और बोटनी के चक्कर में गल जाते हैं ।

मुकेश की बातों का जवाब तो वो दे नहीं पाया, अलबत्ता सेव और मटर के दानों की बात उसे खुब पसंद आई। घर जल्दी जल्दी आकर फ्रिज से दो सेब निकाले और खा गया। फिर मटर की बारी थी । आज कोई रोकने वाला नहीं था। फिर सिंकारा आधा ग्लास पी गया। वो जान रहा था कि सिंकारा टॉनिक है। फिर भी उसका टेस्ट अच्छा लगता था। लिहाजा आधी गिलास खाली कर दी।

फिर सो गया। पेशाब लगी। गुस्सा आते हुए वो भगवान को गाली देने लगा। ये आदमी को बार बार पेशाब क्यों लगती है, मुँह क्यों धोना पड़ता है? हर रोज नहाना क्यों पड़ता है?भगवान ने ये सिस्टम बनाया ही क्यों? क्या फायदा इससे? खैर इससे किसको फायदा हुआ और क्या फायदा हुआ, ये सोचकर उसको कुछ मिला नहीं। बड़बड़ाते हुए उसे पेशाब करने जाना ही पड़ा।

अगले दिन बारिश हो रही थी। उसकी इक्छा हुई आज छुट्टी कर ली जाए। पर घर में अकेले बैठकर करता क्या? साइकिल लेकर चल बड़ा ट्यूशन पढ़ने। बीच बीच में बिजली भी कड़क रही थी। जाने से पहले चिउड़ा और हॉर्लिक्स भर-पेट फांक लिया। ट्यूशन पढ़ते वक्त अचानक लगा भीतर कुछ हलचल सी हो रही है। सेब, मटर, चिउड़ा, हॉर्लिक्स ने असर दिखाने शुरू कर दिए थे।

किसी तरह जैसे तैसे कर के उसने समय काटा। उसे जोर से पखाना लगा था। जैसे ही ट्यूशन से बाहर निकला, अपनी साइकिल लेकर जोर से घर भागा। पर हाय से दुर्भागय। रास्ते में सड़क जाम, बीच बीच में बूंदों की बारिश और ऊपर से जोर का पखाना। आज उसे भगवान पर जोर से गुस्सा आया। पता नहीं तूने ये पखाना करने का सिस्टम ही क्यों बनाया। इससे तुझे क्या मिला? अगर आदमी को बनाना ही था तो केवल खाने का सिस्टम बनाता । आखिर इस पखाने से किसका भला हुआ है ? पर जवाब देने वाला कोई न मिला।

जाम बढ़ता ही गया और पैखाने का प्रेशर भी। वो आसमान की तरफ करके भगवान से प्रार्थना करने लगा। पर जाम खत्म होने का नाम हीं नहीं ले रहा था। वो प्रार्थना कर रहा था , हे ईश्वर इस तरह मुझे नरक की सजा मत दो। वो सोच रहा था शायद नरक इसी को कहते हैं। उसने भगवान से बड़ी आर्त भाव से विनती की। है ईश्वर, या तो ये जाम खोल दो, या तो ये धरती फाड़ दो और मुझे सीता मैया की तरह इस धरती में समा लो। उसके सामने का मंदिर भी शौचालय की तरह ही दिखाई पड़ रहा था।

पैखाने की तीव्रता ने उसकी प्रार्थना को नई ऊंचाई प्रदान की। ईश्वर तक उसकी पुकार पहुंच गई। बारिश  तेज हो गई। जाम ख़त्म हो गई। वो रॉकेट की तरह घर की तरफ भागने लगा। पर उसकी अभी अंतिम परीक्षा बाकी थी। बिल्कुल घर के पास आकर उसकी साइकिल गढ़े में गिर गई। खैर किसी तरह संभलकर वो उठा फिर शौचालय में जाकर जमकर पेट साफ किया। अजीब आनंद की अनुभूति हो रही थी आज। ईश्वर ने एक ही दिन उसे स्वर्ग और नरक दोनों के दर्शन करा दिए थे।

अगले दिन सुबह उठने पर उसने देखा , उसकी हाथों में सूजन आ गई है। शायद गढ़े में गिरने के बाद उसे चोट लग गई थी। मम्मी , पापा भी गाँव से आ गए थे। डॉक्टर के पास जाने पर ज्ञात हुआ, हड्डी मे मामूली फ्रैक्चर है। हाथ पे प्लास्टर चढ़ गया। डॉक्टर ने 2 महीने तक प्लास्टर रखने को कहा था। पर एक महीने के भीतर ही खुजली शुरू हो गई। कभी पेन, अभी पेंसिल डालकर वो पलास्टर खुजाता, पर खुजली थी कि सुरसा का मुँह बन गई थी। जितना खुजाता,वो बढ़ती ही जाती। उसे रहा न गया और चाकू उठाकर प्लास्टर काट डाला।

उसके हाथ काले पड़ गए थे। नई चमड़ी आने लगी थी। खुजली तो मिट गई पर पापा की डांट पड़ी। उसे फिर डॉक्टर के पास ले जाया गया। सोच रहा था कि वो क्या बहाने देगा।

सोचा कि बोल दूंगा, नहाते वक्त प्लास्टर भीग गया था। पर वो एक महीने से प्लास्टर के चक्कर में नहा नहीं रहा था। ये उसके शरीर से निकलती हुई बदबू बता रही थी। पर बहाने तो बताने ही थे। कहते हैं आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है। उसकी दिमागी ट्यूब लाइट जल गई। डॉक्टर को उसने बताया, उसके भतीजे ने उसके प्लास्टर पर पैखाना कर दिया था। सुनकर डॉक्टर साहब हँस पड़े।

खैर प्लास्टर फिर चढ़ गया। एक महीना फिर बीत गया। फिर वो ही बर्दाश्त के बाहर की खुजली। फिर वो ही कुढ़न। उसे मुकेश की वो बातें केमिस्ट्री के चेन रिएक्शन की तरह याद आने लगी।

क्या ही बढ़िया होता, अगर न्यूटन ने सेब खा लिया होता। न फिर गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत होता, न फिजिक्स में एक चैप्टर बढ़ता, ना मुकेश उस दिन सेब और टमाटर के बारे में कहता, न वो उस दिन सेब और टमाटर खाता, न उसका पेट झड़ता, न वो साइकिल तेज चलाता, न वो गढ़े में गिरता, न चोट लगती, न हाथ की हड्डी टूटती, न प्लास्टर चढ़ता, न खुजली होती, न प्लास्टर काटता, न फिर प्लास्टर चढ़ता और न फिर ये खुजली होती। उसकी नजरों में न्यूटन ही दुनिया का महानतम अपराधी था।

अमृत बना जहर

 भारत की राजधानी दिल्ली में निजामुद्दीन क्षेत्र में निजामुद्दीन बस स्टैंड है। निजामुद्दीन बस स्टैंड से रोड आगे की तरफ इंडिया गेट की तरफ जाती है।रास्ते में सबसे पहले एक  गोलंबर आता है। उसी गोलंबर के पास किसी फकीर का मकबरा है। यहाँ से रोड आगे बढ़ती है तो एक बहुत बड़ा पुल आता है जो कि लगभग 1.50 किलोमीटर लंबा है। उसके बाद  अगला बस स्टैंड आता है जोकि  गोल्फ कोर्स के पास है। सड़क आगे बढ़ती है और फिर वह दाहिने की तरफ मुड़ जाती है और लगभग 2 किलोमीटर के बाद चिड़ियाघर का बस स्टैंड आता है।

दिल्ली में साधारण तरीके से हर एक किलोमीटर पर बस स्टैंड मिल जाता है लेकिन निजामुद्दीन के पास इस तरह की परिस्थितियां हैं कि निजामुद्दीन बस स्टैंड के पास गोलंबर होते हुए पूर्व क्रॉस करने के बाद लगभग 2 किलोमीटर के बाद बस स्टैंड है और फिर गोल्फ कोर्स के बस स्टैंड से 2.5 किलोमीटर आगे चिड़ियाघर का बस स्टैंड है। गोल्फ कोर्स का बस स्टैंड पर यात्री लगभग ना के बराबर ही उतरते हैं। इस कारण से देखा जाए तो निजामुद्दीन के बाद चिड़ियाघर के पास ही यात्री उतरते हैं। इन दोनों जगहों के बीच कम से कम 4 किलोमीटर 5 किलोमीटर का फासला है।

निजामुद्दीन बस स्टैंड से गोलंबर लगभग 1 किलोमीटर दूर है और उसी मुहाने पर किसी फकीर का मक़बरा है । इस फकीर के मकबरे के आस-पास कोई भी बस स्टैंड नहीं है ,इसीलिए साधारणतया जिसको भी उस फकीर के मकबरे पर जाना होता है वह निजामुद्दीन बस स्टैंड पर रुक के वहीं से पैदल लगभग 1 किलोमीटर की दूरी तय करता है।

जून का महीना था। दिल्ली में बहुत ही भीषण गर्मी पड़ रही थी। मैं भी बस पर चढ़ा हुआ था और आगे जा रहा था चिड़ियाघर की तरफ। इस भयंकर गर्मी में बस में बैठना बड़ा मुश्किल हो रहा था इसीलिए मैं ड्राइवर के पास ही खड़ा था ।बस वहां पर निजामुद्दीन स्टैंड पर रूकती है और वहां पर लगभग 50-55 वर्ष का एक बुड्ढा फकीर, जिसकी दाढ़ी बहुत लंबी,  कपड़े फटे हाल  ,बाल बेतरतीब थे, वह चढ़ा। उस फकीर ने टिकट भी नहीं लिया और वह मेरे आस पास आकर खड़ा हो गया। मैंने उसकी उम्र का ध्यान रखते हुए जगह  दे दिया । वह मेरे आगे खड़ा हो गया बस ड्राइवर के पास और वह धीरे-धीरे बस ड्राइवर से बात करने लगा।

भाई साहब बड़ी भीषण गर्मी है। हालत खराब हो गई है ।ड्राइवर ने गाड़ी चलाना जारी रखा । ड्राइवर ने फकीर की तरफ देखा और अपनी सहमति दे दी। फकीर ने फिर कहा भाई साहब आप लोगों को गर्मी नहीं लगती है क्या? इतनी भीषण गर्मी में गाड़ी चलाना पड़ता है।

ड्राइवर ने कहा क्या करें नौकरी का सवाल है । पेट का सवाल है। गाड़ी चलाना ही पड़ता है ।परेशानी तो है लेकिन जिंदगी यही है । फकीर ने उस ड्राइवर को अपनी बातों में उलझाए रखा और उसके प्रति सहानुभूति दिखाते रहा ।ड्राइवर भी फकीर की बात से सहमत था और वह भी बोल रहा था भाई साहब आप बहुत अच्छे हैं और आप बिल्कुल सही फरमा रहे हैं।

गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ती जा रही थी। उस फकीर ने ड्राइवर से कहा भाई यह जो मकबरा है जरा यहां पर गाड़ी थोड़ी देर के लिए  रोक देना मुझे वही उतरना है ।अल्लाह आपको बहुत दुआ देगा। ड्राइवर ने उसकी बात अनसुनी कर दी ।गाड़ी और आगे बढ़ती जा रही थी ।धीरे-धीरे वह गोलंबर नजदीक आते जा रहा था ।फकीर ने उसे याचना करना जारी रखा। ड्राइवर साहब आप दिखने में बड़े भले मानस हो। बड़े अच्छे इंसान हो ।इस फकीर पर कृपा कर दो गाड़ी थोड़ी देर के लिए रोक दो।  बार-बार याचना करने पर ड्राइवर बोला बाबा बात सही बोल रहे हैं लेकिन यह मेरी भी नौकरी का सवाल है। इस गोलंबर पर ट्रैफिक पुलिस हमेशा रहती है ।पकड़े जाने पर चालान हो जाएगा।

फकीर अपनी विनती जारी रखा। उसने कहा बच्चे थोड़ी देर के लिए रोक दोगे तो इस फकीर की दुआएं आपके काम आएगी। तुम गाड़ी रोकना मत , धीमा ही कर देना, मैं उतर जाऊंगा । इसके बाद बहुत आगे बस स्टैंड है, वहां से आने में मेरी हालत खराब हो जाएगी, ऊपर से इस गर्मी की मार देख रहे हो ।अल्लाह आपका बहुत भला करेगा । आप बड़े नेक बंदे हो। गाड़ी रोक देना भाई ।फकीर के मुंह से अमृत जैसी मीठी वाणी निकल रही थी । वह बार-बार ड्राइवर की खुशामद कर रहा था और उसे रोकने की विनती कर रहा था।

ड्राइवर को गुस्सा आने लगा।  इस फकीर को बात समझ में नहीं आ रही है ट्रैफिक पुलिस से पकड़े जाने के बाद चालान हो जाता है।  वह फकीर की बात को अनसुनी करने लगा। फकीर  लगातार अपनी खुशामदी जारी रखा ।वह ड्राइवर की लगातार बड़ाई कर रहा था ,कि वह अल्लाह का बड़ा नेक बंदा है, दिखने में बड़ा अच्छा है ,और उसे फकीर पर उसे कृपा करनी चाहिए, इस फकीर की दुआएं उसकी बड़ी काम आएगी। और यह जो मजार के फकीर बाबा है उनकी भी दुआ उसको लगेगी । गाड़ी जरा थोड़ी देर के लिए रोक देना भाई।

मैंने देखा कि ड्राइवर ने उस फकीर की बात बिल्कुल अनसुनी कर दी और गाड़ी जैसे ही मक़बरे के पास आई उसने गाड़ी की रफ्तार उसने थोड़ी तेज कर दी।  फकीर बहुत जोर-जोर से विनती करने लगा ,अरे अल्लाह के नेक बंदे अल्लाह ,तुझे दुआ देगा, मैं भी तुझे दुआ दूंगा, थोड़ी देर के लिए गाड़ी रोक देगा तो क्या होगा, देख यहां पर कोई ट्रैफिक पुलिस भी नहीं है , जरा गाड़ी रोक दें । ड्राइवर और तेज चला कर गाड़ी भगाने लगा । फकीर ने देखा कि उस का मकबरा का स्टैंड छूटता गया है।  फकीर से विनती की भाई, मैं अब थोड़ा सा आगे आ गया हूं , अब तो रोक दो। कम से कम यहां से तो लौट जाऊंगा। लेकिन ड्राइवर ने उसकी बात नहीं सुनी और गाड़ी पुल पर चढ़ा दी। बस  लगभग 1 किलोमीटर आगे निकल चुकी थी। धीरे-धीरे फकीर का गिड़गिड़ाना गुस्सा में बदलने लगा। अरे भाई तू मुझे इतना आगे लेकर आ गया है ।यहां से तो पीछे जाने में मेरी हालत खराब हो जाएगी। यह गर्मी देख, यह धूप देख ,अब तो यहां पर रोक दे। तू ने वैसे ही मेरा काम इतना खराब कर दिया।  बदत्तमीज इंसान मुझे यहां तो उतार दे ।

उसके बदतमीज शब्द का संबोधन करने पर ड्राइवर पर बड़ा प्रतिकूल असर पड़ा और ड्राइवर ने गाड़ी को और तेज कर दिया। फकीर ने देखा कि गाड़ी लगभग 2 किलोमीटर आगे आ चुकी है।  वह फिर गिड़गिड़ाने लगा, अरे ड्राइवर साहब  गोल्फ कोर्स के बस स्टैंड पर तो रोक दो ,  मैं वैसे ही इतना आगे आ चुका हूं।

ड्राइवर नहीं माना। फकीर की आवाज तेज हो उठी। तूने मेरा दिमाग खराब कर रखा है बेवकूफ इंसान । बस स्टैंड पार हो गया। इसका  नतीजा यह हुआ कि जो फकीर के मुंह से अब तक जो अमृत की वाणी निकल रही थी, वह बिल्कुल बदल गई और उसने ड्राइवर को गाली देना शुरु कर दिया।

अरे बदतमीज, कमबख्त, बेवकूफ, मूर्ख इंसान ,अल्लाह तुझे नरक में डालेगा , तेरे लिए नरक में भी जगह नहीं मिलेगी, तेरे शरीर से खून फूटेंगे, नीच आदमी तूने इस बूढ़े फकीर को सताया है, कितनी दूरी तक ले कर आ गया, क्या मिलेगा तुझे।

ड्राइवर को गुस्सा आ गया और बोला कि तूने तो टिकट भी नहीं लिया है। तुझे जेल में जाना चाहिए । मूर्ख अनपढ़ गंवार बेतरतीब आदमी , खुद टिकट नहीं ले रहा है और मुझे बोल रहा है।  और फकीर में लगातार गाली गलौज जारी रही। फकीर उसको गाली देता रहा और ड्राइवर भी उसको गाली देता रहा ।कभी-कभी फकीर ने अपने हाथ से उस को धक्का दे दिया , तो ड्राइवर ने भी फकीर को ढकेल दिया। इस तरह से हाथापाई की नौबत आ गई।

आखिरकार चिड़ियाघर का बस स्टैंड आ गया और वहां पर  फकीर  उस चिड़ियाघर के बस स्टैंड पर उतर गया। उसने उतरने के बाद भी  ड्राइवर को गाली देना जारी रखा। फकीर की अमृतमय खुशामदी भरे लहजे वाली वाणी जहर में परिवर्तित हो चुकी थी।

चप्पल थेरेपी


रमेश को उस दिन ऐसा आश्चर्य हुआ, जैसा उसे कॉमर्स की बैलेंस शीट देखकर भी कभी नहीं हुआ था। हुआ यूँ कि घर में घुसते ही चार साल का मोनू उसके सामने आया और बिना किसी भूमिका के उसके हाथ में एक पुरानी, घिसी हुई, लेकिन शाही अंदाज़ में महकती चप्पल ठूंस दी।

रमेश ने चौंककर कहा, "अरे, ये क्या? मैं कोई चप्पल स्टैंड हूँ क्या?"मोनू ने कुछ जवाब नहीं दिया, बस ऐसे मुँह फुला लिया मानो कह रहा हो—"अगर नहीं पकड़ी तो दुनिया का अंत हो जाएगा।"

रमेश ने भी दिल्ली यूनिवर्सिटी वाला रौब दिखाया—"नहीं लूँगा!"तभी फ्लैट के माहौल को बचाने के लिए मामा आ गए, "अरे भाई, पकड़ लो, वरना ये दूध नहीं पियेगा।"

रमेश के दिमाग में सवाल उठा—"दूध पीने का इससे क्या लेना-देना? क्या ये ‘चप्पल फ्लेवर’ वाला दूध पीता है?" लेकिन मजबूरी में चप्पल ले ली।

फिर तो मानो मोनू में चप्पल वितरण योजना का भूत सवार हो गया। एक-एक करके वही चप्पल मामा के हाथ, फिर मामी के हाथ में थमा दी। अब नज़ारा ऐसा था जैसे कोई चप्पल सम्मेलन चल रहा हो—तीनों हाथ में चप्पल लिए खड़े और सामने मोनू, मानो कह रहा हो—"ठीक है, अब दूध पीता हूँ।"

मामी ने उसे दूध का गिलास थमाया, और मोनू धीरे-धीरे सिप करने लगा, जैसे किसी फाइव-स्टार होटल के कॉकटेल का मज़ा ले रहा हो। रमेश को समझ ही नहीं आया—"ये हो क्या रहा है?"

मामा ने हँसते हुए कहा, "अरे, ये कहानी सुनो..." और फिर दिवाली वाले किस्से की फाइल खोल दी।

उस समय रमेश लक्ष्मी नगर के होस्टल में रहकर कॉमर्स और साथ में कंपनी सेक्रेटरी की तैयारी कर रहा था। मामा नोएडा में प्राइवेट कंपनी में अकाउंटेंट थे, तनख्वाह कम थी, और गाँव में मामी व छोटा मोनू रहते थे।

दिवाली पर मामा की सैलरी थोड़ी बढ़ी, तो मामी और मोनू को गाँव से बुला लिया। गाँव का खुला माहौल छोड़कर मोनू पहली बार फ्लैट में आया। गाँव में वो तितलियों के पीछे भागता, पेड़ों पर चढ़ता, मुर्गियों के पीछे दौड़ लगाता। यहाँ फ्लैट की चार दीवारें और मामी की "बालकनी में मत जाना" वाली पाबंदी ने उसे बेचैन कर दिया था।

दिवाली के दिन मामी ने रमेश-स्पेशल मेन्यू बनाया—लिट्टी-चोखा, धनिया चटनी, मूली-टमाटर का सलाद। प्लेटें सजीं, खुशबू फैली, और सब खाने बैठे ही थे कि मोनू ने अचानक ऐलान कर दिया—"ओआ... ओआ..." (यानि टॉयलेट)।

मामा ने खाना छोड़ा और मोनू को लेकर बाहर निकले। थोड़ी देर बाद वापस आए तो हाथ में वही पुरानी चप्पल थी, और मोनू को धमकाते हुए बोले, "ये टॉयलेट का बहाना कर बालकनी भाग रहा था!"

मोनू ने मुँह लटका लिया, लेकिन उसकी आँखों में चालाकी चमक रही थी।थोड़ी देर बाद मौका पाकर, उसने एक ऐसा बदला अटैक किया, जिसे इतिहास में "थाली अटैक 2019" कहा गया—सीधे रमेश की थाली में पेशाब कर दिया, और मासूम बनकर बोला, "ओ दया..." (यानि हो गया)।

उसके बाद जो मामा ने चप्पल से कुटाई की, वो मोहल्ले में मिसाल बन गई। मकान नंबर 302 में उस दिन चप्पल की आवाज़ 60 डेसीबल पार कर गई थी।

शाम को दूध का टाइम आया, तो मोनू ने एक नया नियम बना दिया—"अब मैं दूध तभी पियूँगा, जब सबके हाथ में चप्पल होगी।" उस दिन से लेकर अगले चार महीने तक, मोनू ने ये नियम ऐसे लागू किया जैसे कोई सरकारी आदेश हो।

होली के मौके पर रमेश फिर मामा के घर आया। जैसे ही बैठा, मोनू दौड़कर आया और उसके हाथ में वही ऐतिहासिक चप्पल थमा दी। फिर मामा और मामी को भी एक-एक चप्पल पकड़वाई। अब तीनों ऐसे लग रहे थे जैसे किसी चप्पल भक्ति संप्रदाय के सदस्य हों।

मोनू दूध पीते-पीते हँस रहा था, और पूरा घर ठहाकों से गूंज रहा था।किसी ने मज़ाक में कहा, "इसका पेटेंट करा दो—‘चप्पल वाले दूध’ का।"

दूसरे ने जोड़ा, "और टैगलाइन होगी—‘पीयो, वरना पड़ेगी!’"

मोनू ने दूध खत्म किया, चप्पल को शेल्फ पर वापस रखा, और बालकनी में जाकर जीत के अंदाज़ में बोला—"अब मैं खेलूँगा।"

अगर चाहें, तो मैं इसका अगला भाग लिख सकता हूँ जिसमें "मोनू की चप्पल थेरेपी" पूरे मोहल्ले में फैल जाती है और हर बच्चे के माता-पिता इससे फायदा उठाने लगते हैं।क्या मैं वो अगला भाग भी बना दूँ?

होली वाले दिन की “चप्पल वाले दूध” घटना के बाद रमेश तो अपने दिल्ली लौट गया, लेकिन उस दिन जो बीज बोया गया, वो देखते-देखते पूरे मोहल्ले में एक नई क्रांति का रूप लेने लगा।

मामा ने हँसते-हँसते मज़ाक में कहा था—“इसका तो पेटेंट करा देंगे।”लेकिन मामी को ये बात दिल से लग गई। उन्होंने मोहल्ले की दूसरी औरतों से हँसते-हँसते कह दिया—“अरे, देखो, हमारा मोनू दूध तभी पीता है जब सबके हाथ में चप्पल हो। तुम भी ट्राई करना, हो सकता है तुम्हारा गुड्डू भी सब्ज़ी खा ले।”

और बस, वहीं से मोहल्ले में “चप्पल थेरेपी” का पहला बीज पड़ा।

मोहल्ले के सामने वाले फ्लैट में मिसेज़ शर्मा का बेटा गुड्डू तीन साल का था और सब्ज़ी देखते ही “ना” में गर्दन ऐसे घुमा देता था जैसे सरकारी ऑफिस में फाइल पास न होने का इशारा हो।

मामी ने मिसेज़ शर्मा को समझाया—“देखो, तुम गुड्डू को खाने से पहले एक-एक चप्पल सबके हाथ में पकड़ा दो। और कहना—‘खा ले, वरना पड़ेगी’। डर के मारे खुद खा जाएगा।”

अगले दिन मिसेज़ शर्मा ने पूरे परिवार को चप्पल पकड़ाई—दादी, पापा, चाची, और खुद भी।गुड्डू ने पहली बार अपने जीवन में पालक की सब्ज़ी खाई और ऊपर से रोटी भी मांगी। मोहल्ले में खबर फैल गई—चप्पल थेरेपी वर्क्स!

तीसरे माले पर पिंकी नाम की लड़की रहती थी, जिसे होमवर्क करने से इतनी नफ़रत थी कि उसकी कॉपी में धूल जम गई थी।उसकी मम्मी ने मामी से प्रेरित होकर उसे पढ़ाने से पहले चार लोगों को लाइन में खड़ा कर दिया—सबके हाथ में चप्पल।

मम्मी बोली—“होमवर्क कर, वरना पड़ेगी।”पिंकी ने पहले तो सोचा ये ड्रामा है, लेकिन जैसे ही चप्पल हवा में हल्की-सी लहराई, वो इतनी तेज़ी से लिखने लगी कि मोहल्ले के लोग देखने आ गए—“वाह, कितनी फास्ट राइटिंग!”

अब “चप्पल थेरेपी” की लोकप्रियता इस हद तक पहुँच गई कि मोहल्ले की लेडीज़ मीटिंग में बाकायदा इसका सरकारी सा ऐलान हो गया।

एक महिला ने गंभीरता से कहा—“नाम बदलकर ‘चप्पल योग’ रखो, ये सुनकर लोग समझेंगे ये कोई आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट है।”

दूसरी ने आँखें मटकाईं—“नहीं-नहीं, ‘चप्पल साधना’ रखो, इससे आध्यात्मिक फील आएगी।”

मामा ने तुरन्त कुर्सी खिसका कर कहा—“नाम चाहे ‘योग’ रखो या ‘साधना’… पेटेंट और लाइसेंस मेरा होगा। रॉयल्टी के साथ चप्पल फ्री।”

खाना न खाने वालों के लिए – प्लेट में सब्ज़ी रखते ही घरवालों को एक-एक ब्रांडेड चप्पल थमा दी जाती।

पढ़ाई से बचने वालों के लिए – किताब के ऊपर चप्पल रख दो, बच्चा अपने आप किताब खोल देगा… और खोले भी इस डर से कि कहीं चप्पल क्लास टेस्ट में कन्वर्ट न हो जाए।

सोने से मना करने वालों के लिए – तकिए के पास चप्पल रख दो, बच्चा करवट बदलकर ऐसे सो जाएगा जैसे वो कोई मूक फिल्म का सीन हो।

अब मोनू, जो पहले गली के शैतान बच्चों की ब्लैकलिस्ट में था, अब मोहल्ले का सेलिब्रिटी बन चुका था। लोग उसे देखकर कहते—

“अरे ये रहा ‘चप्पल थेरेपी मास्टर’! बचाओ बचाओ!”

बच्चे उससे ऐसे भागते जैसे कुत्ते से डरकर भागते हैं, लेकिन माएं उसे देखते ही आशीर्वाद बरसातीं—

“तू बहुत बड़ा करेगा बेटा, तेरा नाम इतिहास में लिखा जाएगा… रबर सोल वाले गोल्डन अक्षरों में।”

होली के बाद कीर्तन मंडली में भी चप्पल थेरेपी का रंग चढ़ गया।

एक बार एक अंकल का मन भजन गाने का नहीं हुआ, तो मंडली ने एक-एक चप्पल हाथ में लेकर कहा—

“भजन गा, वरना लय बदल देंगे तेरी।”

अंकल ने ऐसी ऊँची आवाज़ में गाया कि अगला मोहल्ला भी तालियाँ बजाने लगा… और गलती से डीजे वाला भी वही धुन बजाने लगा।

एक दिन एक लोकल न्यूज़ चैनल पहुँचा—“बच्चों को सुधारने का अनोखा तरीका – चप्पल थेरेपी।”

रिपोर्टर ने मामा से पूछा—“ये आइडिया कहाँ से आया?”

मामा ने कैमरे के सामने गंभीर चेहरा बनाकर कहा—

“प्रेरणा हमें महात्मा गांधी से मिली… बस लाठी की जगह चप्पल रख दी, जिससे देश में प्रेम फैले।”

फिर मामा अचानक भाषण मोड में आ गया—

“सोचो, अगर बापू के दांडी मार्च में लाठियों की जगह सभी के हाथ में चप्पल होती, तो अंग्रेज़ सोचते—ये नमक लेने आए हैं या जूते बेचने? और जब वो चप्पल देखकर घबराते, तो हम कह देते—डरो मत, ये अहिंसक फुटवियर मूवमेंट है।”

मामा ने आंख दबाकर कहा—“वैसे गांधीजी भी खुश हो जाते, कि अहिंसा अब पैरों के रास्ते भी फैल रही है।”

मामी ने पीछे से फुसफुसाकर कहा—“प्रेम तो तू फैलाता नहीं, ये सब मोनू की बदमाशी का फल है।”

लेकिन मामा रुके नहीं—

“और हाँ, अगर ये तरीका दिल्ली में चला दिया जाए, तो सोचो… खेसरीबवाल  साहब प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहते—‘हम मुफ्त बिजली, पानी के साथ अब मुफ्त चप्पल भी देंगे। जो सड़क पर गड्ढा देखे, वो ठेकेदार को तुरंत दिखा दे।’ और अगर कोई मंत्री वादे पूरे न करे, तो जनता कहे—‘सर, फ्लिप-फ्लॉप तो आपके बयान हैं, चप्पल तो बस प्रतीक है।’”

पंडाल में बैठे कुछ लोग हँसते-हँसते कुर्सी पकड़कर बैठ गए।

मोहल्ला महोत्सव में “चप्पल वाले दूध पीने” की प्रतियोगिता में मोनू ने बाज़ी मारी।

ट्रॉफी पर लिखा था—“स्लिपर सम्राट 2025 – पिलाओ और खिलाओ।”

मंच पर बैठे चीफ गेस्ट, जो स्थानीय नेता थे, मज़ाक में बोले—

“ये चप्पल थेरेपी तो गज़ब है, मैं अपनी चुनावी रैलियों में लागू करूँगा। जो वोट न डाले, उसे चप्पल थमा दूँगा।”

मामा ने तुरंत तंज कसा—“अरे ऐसा मत करना, नहीं तो अगली बार वोट की जगह लोग तुम्हें चप्पल ही डाल देंगे।”

तभी मोनू माइक पकड़कर बोला—“मैं अब नया बिज़नेस शुरू करूँगा—‘चप्पल ऑन रेंट’। चाहे दूध पिलाना हो, सब्ज़ी खिलानी हो, होमवर्क कराना हो—मुझसे चप्पल लो, बच्चा तुरंत सुधर जाएगा। रिफंड पॉलिसी नहीं है।”

पूरा पंडाल हँसी के ठहाकों से गूंज उठा।

मामी ने मोनू को गोद में उठाकर कहा—“देखना, एक दिन ये बच्चा देश का पहला ‘चप्पल मंत्री’ बनेगा।”

मोनू ने शरारती हंसी के साथ कहा—“और तब मैं संसद में सबको दूध पिलाऊँगा… चप्पल दिखा के! और जो न पिए, उसे ‘फ्लिप-फ्लॉप’ मीटिंग में भेज दूँगा।”

पूरा मोहल्ला हँसते-हँसते लोटपोट हो गया, और उसी दिन से “चप्पल वाले दूध” का किस्सा मोहल्ले की ‘महान गाथाओं’ में दर्ज हो गया—जहाँ चप्पल सिर्फ पाँव में नहीं, दिल में भी बसती थी।  खेसरीबवाल साहब को जब ये बात पता चली वो पहुँच गए मुहल्ले में और अपने चिर-परिचित अंदाज़ में माइक पकड़ा, चश्मा ठीक किया गला साफ़ किया और बोलने लगे : “भाइयों और बहनों… आज मैं आपको एक ऐसी क्रांति के बारे में बताने आया हूँ, जो न बिजली फ्री है, न पानी फ्री, लेकिन दिल और दिमाग दोनों को फ्री कर देगी!”

भीड़ में हलचल हुई। मोनू, जो पहली पंक्ति में बैठा था, चिल्लाया — “फ्री वाई-फाई?”

खेसरीबवाल मुस्कुराए, “उससे भी बड़ी चीज़… चप्पल थेरेपी!”

मोनू ने आँखें फैलाकर पूछा, “सर, ये क्या अस्पताल में होगी?”

खेसरीबवाल ने कहा, “नहीं मोनू, ये तुम्हारे मोहल्ले में होगी, और तुम्हारे जैसे लोगों पर सबसे पहले लागू होगी।”भीड़ ठहाके मारने लगी।

खेसरीबवाल ने हाथ उठाकर भीड़ को शांत किया, “देखिए, शहर में ट्रैफिक जाम, पड़ोसियों की चुगली, ससुराल की राजनीति, और सोशल मीडिया की नफरत — सबका इलाज है यह चप्पल थेरेपी। एक थप्पड़ से काम नहीं चलेगा, चप्पल का असर दिमाग तक जाता है।”

मोनू फिर खड़ा हो गया, “सर, चप्पल साइज का चुनाव हम करेंगे या पार्टी?”

खेसरीबवाल ने गंभीरता से कहा, “मोनू, राष्ट्रीय चप्पल आयोग बनेगा, वही तय करेगा। 

खेसरीबवाल बोले, “हर मोहल्ले में चप्पल डिस्पेंसरी खुलेगी, जहां ट्रेनिंग मिलेगी — कैसे सही निशाना लगाएँ, ताकि बगल वाले को लगे भी और इज्जत भी बनी रहे। चुनाव जीतने के बाद पहला बजट चप्पल थेरेपी पर ही खर्च करेंगे। 

मोनू ने ताली बजाते हुए चिल्लाया, “सर, अगर मैं चप्पल फेंकने में टॉपर बन गया तो?”

खेसरीबवाल ने मुस्कुराकर बोले, “तो तुम्हें पार्टी का चप्पल ब्रांड एंबेसडर बना देंगे!”


डिजिटल भी और सिंगल भी

पबजी गेम में उसकी शिकारी निगाहें दुश्मनों को बड़ी मुश्तैदी से साफ कर रहीं थी। तकरीबन आधे घंटे की मशक्कत के बाद वो जोर जोर से चिल्लाने लगा। हुर्रे, हुर्रे, हिप हिप हुर्रे। आखिरकार लेबल 30 पार कर ही लिया। डेढ़ घंटे की जद्दोजहद के बाद उसने पबजी गेम का 30 वां लेबल पार कर लिया था। उसी जीत का जश्न मना रहा था। हुर्रे, हुर्रे, हिप हिप हुर्रे।

पिछले दो घंटे से उसके हाथ मोबाइल पर लगातार जमे हुए थे। कड़ी मेहनत के बाद सफलता हासिल हुई थी । अब फ्लैट की बॉलकोनी में जाकर आती जाती कारों को निहारने लगा। एक कार, फिर दूसरी, फिर तीसरी, फिर चौथी::::::::::::::::::।कबूतर की तरह अपने फ्लैट नुमा घोसले से बाहर आकर आसमान में उड़ते हुए कभी कबूतरों को देखता, कभी लम्बी लम्बी अट्टालिकाओं के बीच आँख मिचौली करते सूरज को । चेहरे पे जीत की खुमारी छाई हुई थी। सीने में अहम की दहकती हुई ज्वाला प्रज्वलित थी , पर अहम का प्रक्षेपण गौण। किसपे करे अपने मान का अभिमान? खुद हीं खेल, खुद हीं खिलाड़ी, खुद हीं दर्शक, खुद हीं शिकारी। अलबत्ता जीत का सेलिब्रेशन डिजिटल हो गया था। व्हाट्सएप्प, फेसबुक और इंस्टाग्राम पे अपनी जीत का स्टेटस अपडेट कर फ्रिज से कोक और पिज्जा निकाली और खाने लगा। व्हाट्सएप्प, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर उसके दोस्तों के कंमेंट और डिजिटल मिठाइयाँ आने लगीं। वो भी उनका जवाब डिजिटल इमोजी से देने लगा।

थोड़ी देर में दरवाजे की घंटी बजी। वो जाकर दरवाजा खोला। सामने मैथ के टीचर थे। वो झुँझला उठा। शीट मैन, सर को भी अभी आना था ।झुंझलाते हुए 10 किलो का स्कूल बैग लेकर स्टडी रूम में मैथ के टीचर के साथ चल पड़ा।

शाम के 5 बज रहे थे। मुमुक्षु अपने बेटे सत्यकाम को मैथ टीचर के साथ स्टडी रूम में जाते हुए देख रहा था। उसका बेटा सत्यकाम एक नामी गिरामी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ता था। उसकी दिनचर्या रोजाना तकरीबन 6.30 सुबह शुरू हो जाती। मुमुक्षु की पत्नी अपने बेटे को सुबह 6.30 से हीं उठाने का प्रयत्न करने लगती। वो थोड़ा और, थोड़ा और करके 5-5 मिनट की मोहलत लेते रहता। लगभग 7.15 बिछावन से उसका मोह भंग होता। फिर आनन फानन में मुंह धोता, नहाता, कपड़ा पहनता और स्कूल के 10 किलो का बस्ता लेकर अपने पापा मुमुक्षु के साथ 8 बजे तक स्कूल पहुंच जाता।

फल, हरी सब्जियों से उसकी जैसे जन्मजात दुश्मनी थी। सत्यकाम की माँ लंच में उसके लिए पिज्जा, बर्गर या फ्रेंच फ्राई रख देती। दोपहर को लगभग 2.30 बजे स्कूल से होमवर्क के बोझ के साथ लौट जाता। घर आकर रोटी दाल और सब्जी के साथ सलाद खाता और फिर उसकी निगाएँ मोबाइल पे टिक जाती। बीच बीच मे कार्टून चैनल भी चला देता। इतने में 4 बज जाते।

मुमुक्षु के पास सत्यकाम को पढ़ाने के लिए समय नहीं था। केवल स्कूल की पढ़ाई के भरोसे स्कूल में अव्वल आना टेढ़ी खीर थी। लिहाजा होम ट्यूशन लगा रखे थे।

शाम को 4 बजे मैथ टीचर 1 घंटे के लिए आते थे। 5 बजे लौट जाते। फिर आधे घंटे का ब्रेक। फिर 6 से 7 बजे तक साइंस टीचर। फिर आधे घंटे ब्रेक। 7 बजे टी. वी. पे सत्यकाम का प्रिय डोरेमन का कार्टून आता था। वो डोरेमन देखते हुए रोटी सब्जी खाता। फिर 8 से 9.30 तक होम वर्क कराने वाले टीचर का समय था। तकरीबन इसी समय मुमुक्षु आफिस से घर आता था। होम वर्क पूरा करके सत्यकाम फिर 1 घंटे के लिए मोबाइल पे लग जाता। और दूध पीकर लगभग 11 बजे सो जाता फिर सुबह तैयार होकर स्कूल जाने के लिए।

आज रात को सत्यकाम पे जीत की खुमारी शायद ज्यादा ही चढ़ी हुई थी। शायद जीत का आनंद उसके होम वर्क के बोझ से ज्यादा भारी पड़ रहा था। रात को सपने में दो तीन बार उठ कर उसने हिप हिप हुर्रे की भाव भंगिमा बनाई।

मुमुक्षु को उसका खुद का बचपन , गांव में उगती सुरज की सुनहली किरण , मुर्गे की बांग, चिड़ियों की चहचहाहट, सरसों के खेत की भीनी भीनी खुशबूं याद आने लगीं। कोयल की मधुर पुकार उसे सुबह सुबह उठा देती। नहा धोकर बाहर निकलता तो उसके दोस्तों की टोली घर के बाहर इन्तेजार करती मिलती। फिर सब साथ चल पड़ते महुआ बीनने। मोती के दानों की तरह घास के बीच झिलमिल झिलमिल करते महुए के फल बच्चों का इन्तेजार करती।

अपने पीतल के थाली को सब सूरज की रोशनी में रख देते। जब पीतल की थाली गर्म हो जाती तो उससे अपने बोरे की इस्त्री करके सारे बच्चे स्कूल नंगे पांव पहुंच जाते। भृंग राज के पत्तों से स्लेट को बिल्कुल साफ रखा जाता। कोई कोई भाग्यवान हीं चप्पल पहनता और उसे बच्चों में विशिष्ट माना जाता। भटकुइयां के बेर मुमुक्षु और उसके दोस्तों के प्रिय आहार हुआ करते।

इधर मास्टरजी पहला क्लास ख़त्म के क्या जाते, मुमुक्षु अपने दोस्तों के साथ रफ्फूचक्कर हो जाता। शैतानों की टोली जामुन के पेड़ पे धमा कौचडी मचाती मिलती। बंदरों की तरह एक डाल से दूसरे दाल और उछलते हुए बंदरों के जामुन को हजम कर जाते। और तो और बारिश के मौसम में जब स्कूल में पानी जमता तब तीन महीने की छुट्टी तय हो जाती। मुमुक्षु को एक एक कर अपने बचपन के दिन याद आने लगे।

बारिश की मौसम में स्कूल की छुट्टियों में वो अपने दोस्तों के साथ चील चिलोर, आइस बाइस, कबड्डी, चीका, गिल्ली डंडा खेलता। कागज के नाव बनाकर पानी में तैरते हुए देखता। शीशम और तरकुल के पत्तों को चबाकर पान की तरह मुँह लाल करता। आम की आँठी से सिटी बजातता । मक्के के खेत में बने मचान पे बच्चों की टोली जमती और पास के हीं खेतों से मुली , मिर्च , टमाटर निकाल कर भोज किया जाता ।

होली में होलिका के लिए मुमुक्षु की टोली गाँव के सारे पुराने लकड़ियों को दीमक की तरह चट कर जाते। होली के कुछ दिन पहले उसकी टोली का आतंक इतना बढ़ जाता कि बूढों की खटिया भी होलिका के दहन में खप जाती । होलिका दहन पर लुकार भांजना, ठंडी में घुर के पास बैठकर आग तापना, पुआल की चटाई पे अपने दोस्तों के साथ सोना, ये सारी बातें धीरे धीरे मुमुक्षु के मानस पटल पे एक एक करके याद आने लगी।

अभी सत्यकाम के हाथों में सारे क्रिकेट के मैच लाइव आते है। तब मुमुक्षु को अपने दोस्तों के साथ पांडेय जी के खिड़की के पीछे चोरों की तरह देखता। हालाकि उस चोरी में भी अति आनंद की पुर्ति होती। महाबीरी झंडा में गदका खेलना, कठपुतलियों का नाच देखना, शहर जाकर सर्कस का आनंद लेना।

मुमुक्षु को अपने बेटे और तरस आता था। उसे याद आया कि बचपन में उसके बड़े भाई जब शहर से लौटकर गाँव आ रहे थे तो वो अपने भाई के प्रेम में पड़कर साईकल से कूद कर पैदल हीं दौड़ गया था, क्योंकि साईकिल उसके भाई से मिलने में बाधा पहुंचा रही थी। आज सत्यकाम को फेसबुक पे हाय करके ही काम चलाना पड़ता था।

हालांकि मुमुक्षु को अतिशय प्रेम मिला तो कुटाई भी उसी हिसाब से मिली। मुमुक्षु को अनायास हीं बच्चों की अपनी वो पिटाई याद आ गई जब वो अपने दोस्तों के साथ पीपल के डंठल को बीड़ी बनाकर पी रहा था। इधर मुमुक्षु अपने बेटे को मारने के बारे में सोच तक नहीं सकता था। उसकी पत्नी बीच में आ जाती। उस पर उसके बेटे का अकेलापन। मुमुक्षु को खुद भी मारने की जरूरत महसुस नहीं होती। अलबत्ता सत्यकाम की शरारत तो वैसी होती भी नहीं थी। उसके स्कूल ने उसे काफी संस्कारी बना दिया था।

मुमुक्षु को अपनी शरारत याद आने लगी। उस समय ब्लैक एंड व्हाइट टी.वी. का जमाना होता था। रामायण सीरियल के आने पर सारा गाँव ठहर जाता था। जब कभी आस पास शादी होती और फ़िल्म चलती तो मुमुक्षु की चांडाल चौकड़ी रात को दो तीन गांव ओर कर पहुँच जाती फ़िल्म देखने। यदि फ़िल्म अमिताभ बच्चन की होती तो उसका मजा ही अलग होता।

अँधेरा क्या होता है , ये सत्यकाम बताना भी मुश्किल था। चारो तरफ प्रकाश हीं प्रकाश। एक तो लाइट जाती नहीं। जाती भी है तो तुरंत आ जाती है। उपर से इन्वर्टर। पता हीं नहीं चलता, क्या दिन, क्या रात।

उधर गाँव में जब मुमुक्षु अमवस्या की रात में बरगद के पेड़ के चारों तरफ जुगनुओं की बारात देखता तो ऐसा लगता कि सारे तारे जमीं पे आ गए हैं। बारिश के मौसम में मेढकों की टर्र टर्र और झींगुर की झंकार से सारा वातावरण गुंजायमान हो उठता। बाँस के पत्तों के बीच चिड़ियों की चहचहाहट से ऐसा लगता , किसी ने वीणा की तार छेड़ दी हो।

जामुन के पेड़ से कलाबाजियां खाते हुए तलाब में छलांग लगाना, गांज पर से धान की पुआल पे कूदना, पिता की की मार से बचने के लिए मड़ई में जाकर छुपना, आम के टिकोड़ों और पीपल के कलियों को नमक से साथ खाना, बरगद के पेड़ पर दोला पाति खेलना और फगुआ में झूम झूम के फगुआ के गीत गाना। क्या दिन थे वो।

बरसात के मौसम में कागज के नाव को बहाना, पीले पीले मेढकों को भगाना, खेतों में मछलियों को पकड़ना, गिल्ली डंटा खेलना, पतंग उड़ाना। जीतने पे चिल्लाना और हारने पे हिप हिप हुर्रे करके दोस्तों को चिढ़ाना। तब जीत भी साथ साथ होती, हार भी साथ साथ।

अब सब कुछ बदल गया है। सब कुछ डिजिटल भी है और सिंगल भी।

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