अब “चप्पल थेरेपी” की लोकप्रियता इस हद तक पहुँच गई कि मोहल्ले की लेडीज़ मीटिंग में बाकायदा इसका सरकारी सा ऐलान हो गया।
एक महिला ने गंभीरता से कहा—“नाम बदलकर ‘चप्पल योग’ रखो, ये सुनकर लोग समझेंगे ये कोई आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट है।”
दूसरी ने आँखें मटकाईं—“नहीं-नहीं, ‘चप्पल साधना’ रखो, इससे आध्यात्मिक फील आएगी।”
मामा ने तुरन्त कुर्सी खिसका कर कहा—“नाम चाहे ‘योग’ रखो या ‘साधना’… पेटेंट और लाइसेंस मेरा होगा। रॉयल्टी के साथ चप्पल फ्री।”
खाना न खाने वालों के लिए – प्लेट में सब्ज़ी रखते ही घरवालों को एक-एक ब्रांडेड चप्पल थमा दी जाती।
पढ़ाई से बचने वालों के लिए – किताब के ऊपर चप्पल रख दो, बच्चा अपने आप किताब खोल देगा… और खोले भी इस डर से कि कहीं चप्पल क्लास टेस्ट में कन्वर्ट न हो जाए।
सोने से मना करने वालों के लिए – तकिए के पास चप्पल रख दो, बच्चा करवट बदलकर ऐसे सो जाएगा जैसे वो कोई मूक फिल्म का सीन हो।
अब मोनू, जो पहले गली के शैतान बच्चों की ब्लैकलिस्ट में था, अब मोहल्ले का सेलिब्रिटी बन चुका था। लोग उसे देखकर कहते—
“अरे ये रहा ‘चप्पल थेरेपी मास्टर’! बचाओ बचाओ!”
बच्चे उससे ऐसे भागते जैसे कुत्ते से डरकर भागते हैं, लेकिन माएं उसे देखते ही आशीर्वाद बरसातीं—
“तू बहुत बड़ा करेगा बेटा, तेरा नाम इतिहास में लिखा जाएगा… रबर सोल वाले गोल्डन अक्षरों में।”
होली के बाद कीर्तन मंडली में भी चप्पल थेरेपी का रंग चढ़ गया।
एक बार एक अंकल का मन भजन गाने का नहीं हुआ, तो मंडली ने एक-एक चप्पल हाथ में लेकर कहा—
“भजन गा, वरना लय बदल देंगे तेरी।”
अंकल ने ऐसी ऊँची आवाज़ में गाया कि अगला मोहल्ला भी तालियाँ बजाने लगा… और गलती से डीजे वाला भी वही धुन बजाने लगा।
एक दिन एक लोकल न्यूज़ चैनल पहुँचा—“बच्चों को सुधारने का अनोखा तरीका – चप्पल थेरेपी।”
रिपोर्टर ने मामा से पूछा—“ये आइडिया कहाँ से आया?”
मामा ने कैमरे के सामने गंभीर चेहरा बनाकर कहा—
“प्रेरणा हमें महात्मा गांधी से मिली… बस लाठी की जगह चप्पल रख दी, जिससे देश में प्रेम फैले।”
फिर मामा अचानक भाषण मोड में आ गया—
“सोचो, अगर बापू के दांडी मार्च में लाठियों की जगह सभी के हाथ में चप्पल होती, तो अंग्रेज़ सोचते—ये नमक लेने आए हैं या जूते बेचने? और जब वो चप्पल देखकर घबराते, तो हम कह देते—डरो मत, ये अहिंसक फुटवियर मूवमेंट है।”
मामा ने आंख दबाकर कहा—“वैसे गांधीजी भी खुश हो जाते, कि अहिंसा अब पैरों के रास्ते भी फैल रही है।”
मामी ने पीछे से फुसफुसाकर कहा—“प्रेम तो तू फैलाता नहीं, ये सब मोनू की बदमाशी का फल है।”
लेकिन मामा रुके नहीं—
“और हाँ, अगर ये तरीका दिल्ली में चला दिया जाए, तो सोचो… खेसरीबवाल साहब प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहते—‘हम मुफ्त बिजली, पानी के साथ अब मुफ्त चप्पल भी देंगे। जो सड़क पर गड्ढा देखे, वो ठेकेदार को तुरंत दिखा दे।’ और अगर कोई मंत्री वादे पूरे न करे, तो जनता कहे—‘सर, फ्लिप-फ्लॉप तो आपके बयान हैं, चप्पल तो बस प्रतीक है।’”
पंडाल में बैठे कुछ लोग हँसते-हँसते कुर्सी पकड़कर बैठ गए।
मोहल्ला महोत्सव में “चप्पल वाले दूध पीने” की प्रतियोगिता में मोनू ने बाज़ी मारी।
ट्रॉफी पर लिखा था—“स्लिपर सम्राट 2025 – पिलाओ और खिलाओ।”
मंच पर बैठे चीफ गेस्ट, जो स्थानीय नेता थे, मज़ाक में बोले—
“ये चप्पल थेरेपी तो गज़ब है, मैं अपनी चुनावी रैलियों में लागू करूँगा। जो वोट न डाले, उसे चप्पल थमा दूँगा।”
मामा ने तुरंत तंज कसा—“अरे ऐसा मत करना, नहीं तो अगली बार वोट की जगह लोग तुम्हें चप्पल ही डाल देंगे।”
तभी मोनू माइक पकड़कर बोला—“मैं अब नया बिज़नेस शुरू करूँगा—‘चप्पल ऑन रेंट’। चाहे दूध पिलाना हो, सब्ज़ी खिलानी हो, होमवर्क कराना हो—मुझसे चप्पल लो, बच्चा तुरंत सुधर जाएगा। रिफंड पॉलिसी नहीं है।”
पूरा पंडाल हँसी के ठहाकों से गूंज उठा।
मामी ने मोनू को गोद में उठाकर कहा—“देखना, एक दिन ये बच्चा देश का पहला ‘चप्पल मंत्री’ बनेगा।”
मोनू ने शरारती हंसी के साथ कहा—“और तब मैं संसद में सबको दूध पिलाऊँगा… चप्पल दिखा के! और जो न पिए, उसे ‘फ्लिप-फ्लॉप’ मीटिंग में भेज दूँगा।”
पूरा मोहल्ला हँसते-हँसते लोटपोट हो गया, और उसी दिन से “चप्पल वाले दूध” का किस्सा मोहल्ले की ‘महान गाथाओं’ में दर्ज हो गया—जहाँ चप्पल सिर्फ पाँव में नहीं, दिल में भी बसती थी। खेसरीबवाल साहब को जब ये बात पता चली वो पहुँच गए मुहल्ले में और अपने चिर-परिचित अंदाज़ में माइक पकड़ा, चश्मा ठीक किया गला साफ़ किया और बोलने लगे : “भाइयों और बहनों… आज मैं आपको एक ऐसी क्रांति के बारे में बताने आया हूँ, जो न बिजली फ्री है, न पानी फ्री, लेकिन दिल और दिमाग दोनों को फ्री कर देगी!”
भीड़ में हलचल हुई। मोनू, जो पहली पंक्ति में बैठा था, चिल्लाया — “फ्री वाई-फाई?”
खेसरीबवाल मुस्कुराए, “उससे भी बड़ी चीज़… चप्पल थेरेपी!”
मोनू ने आँखें फैलाकर पूछा, “सर, ये क्या अस्पताल में होगी?”
खेसरीबवाल ने कहा, “नहीं मोनू, ये तुम्हारे मोहल्ले में होगी, और तुम्हारे जैसे लोगों पर सबसे पहले लागू होगी।”भीड़ ठहाके मारने लगी।
खेसरीबवाल ने हाथ उठाकर भीड़ को शांत किया, “देखिए, शहर में ट्रैफिक जाम, पड़ोसियों की चुगली, ससुराल की राजनीति, और सोशल मीडिया की नफरत — सबका इलाज है यह चप्पल थेरेपी। एक थप्पड़ से काम नहीं चलेगा, चप्पल का असर दिमाग तक जाता है।”
मोनू फिर खड़ा हो गया, “सर, चप्पल साइज का चुनाव हम करेंगे या पार्टी?”
खेसरीबवाल ने गंभीरता से कहा, “मोनू, राष्ट्रीय चप्पल आयोग बनेगा, वही तय करेगा।
खेसरीबवाल बोले, “हर मोहल्ले में चप्पल डिस्पेंसरी खुलेगी, जहां ट्रेनिंग मिलेगी — कैसे सही निशाना लगाएँ, ताकि बगल वाले को लगे भी और इज्जत भी बनी रहे। चुनाव जीतने के बाद पहला बजट चप्पल थेरेपी पर ही खर्च करेंगे।
मोनू ने ताली बजाते हुए चिल्लाया, “सर, अगर मैं चप्पल फेंकने में टॉपर बन गया तो?”
खेसरीबवाल ने मुस्कुराकर बोले, “तो तुम्हें पार्टी का चप्पल ब्रांड एंबेसडर बना देंगे!”
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