Monday, November 4, 2024

तुझ से लाख टके है बेहतर तेरी बकरी माई

 सच कहता हूँ बात बराबर, सुन ले मेरे भाई,

तुझ से लाख टके है बेहतर तेरी बकरी माई।
तू मेरा दिमाग चबाये, और बकरी ये पत्ता,
तू बातों से मुझे पकाए बात बुरी पर सच्चा।
घर की बकरी से घर का भोजन चलता है सारा,
पर बकरी का दाना पानी घास पात हीं चारा।
डेंगू वेन्गु मच्चड़ वच्चड़ सबसे हमें बचाए,
दूध पिला के बूढ़े को भी झटपट रोड भगाए
इस बकरी को दुह दुह के गाँधी बन गए पठ्ठा ,
उम्र पचासा पार गए फिर भी तरुणी से ठठ्ठा।
इतनी छोटी सी बकरी पर ऐसी इसकी जात ,
पीकर गाँधी दूध इसी के खट्टे कर दिए दांत।
जय हो बकरी माई, तेरी महिमा अपरंपार,
सच में जीवन जीने का बस तू हीं है आधार।
इसीलिए कहता हूँ सुन लो भैया और भौजाई,
बार बार दुहराते जाओ जय हो बकरी माई।

कुदरत तेरा करतब देखा,

 कुदरत तेरा करतब देखा,

एक बीज में बरगद देखा।

रोज रोज ये सूरज कैसे,
पूरब से उग जाता है।
सुबह गुलाबी दिन मे तपता,
शाम को ये डूब जाता है।
रात को कैसे जा छिपता है,
अनजाने ये सरहद देखा,
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

पानी में मछली रहती क्यों?
पर चिड़िया इसमें मरती क्यों?
सर्प सरकता रेंग रेंग कर,
छिपकीली छत पे चढ़ती क्यों?
कोयल कूके बाग में आके,
मकसद क्या अनजाने देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

नाजाने क्या मकसद देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

अजय अमिताभ सुमन

दिन में दिखते रात हैं इनके

 दिन में दिखते रात हैं इनके,

ऑफिस से आघात हैं इनके।
दफ्तर में आये हैं जबसे,
कुर्सी पर बैठे हैं तबसे।
बॉस मेल मीटिंग की मार,
क्लाइंट से तन हुआ बेजार।
एक खतम तब दुजा काम,
कुर्सी बोले करो आराम।
वर्कलोड का बोझ है भारी,
चाय भी ठंडी, कब पी सारी?
क्या हो सन्डे क्या हो मन्डे,
फन ना कोई सब हैं गन डे।
कहाँ भी जाएँ ये बेचारे,
वर्कलोड के रहते मारे।
फटे फटे जज्बात हैं इनके,
दिन में दिखते रात हैं इनके।

अजय अमिताभ सुमन

शोर शराबा धूम धड़ाम, सबके सब ईश्वर के नाम

 सबके सब ईश्वर के नाम।


शोर शराबा धूम धड़ाम,
सबके सब ईश्वर के नाम।
फुल वोल्युम मे चलता गाना,
सड़कों पे सब करें हंगामा।
हस्पिटल हो कोई पास,
इन्हें फिकर ना कोई खास।
दारू पे ना रोक है कोई,
पुलिस की ना टोक है कोई।
चलता हुक्का चलता भांग,
आधे रोड पे करते जाम।
स्वर्ग का जैसे टिकट मिला हो,
ईश्वर का वरदान फला हो।
कोई रोए या चिल्लाए,
पूरी दुनिया भाड़ में जाए।
सब कुछ जायज है सब ठीक,
प्रभु नाम पर फलते ढ़ीठ।
करते हरकत उट पटांग,
सबके सब ईश्वर के नाम।

अजय अमिताभ सुमन

अगर डाक्टर माँगे पैसा,

 

अगर डाक्टर माँगे पैसा,
दोष कहो तुम किसका कैसा?
एक करोड़ के नीचे भैया,
बने ना कोई डाक्टर भैया।
कॉलेज का इतना फी भरकर,
जो कोई भी बनता डॉक्टर।
उसको फिर फिक्र हो कैसे,
सेवा का फ़िर जिक्र हो कैसे?
दर्द की कीमत लगती भारी,
हॉस्पिटल की भी लाचारी।
सिस्टम का इलाज ना कोई,
क्यों गरीब नवाज़ हो कोई?
अगर डॉक्टर मांगे धन है,
सोच प्रश्न क्यों गुढ़ गहन है?
सिस्टम से सब हुए लाचार,
कि पेशा अब बना व्यापार।

अजय अमिताभ सुमन

प्रश्न चिन्ह सा लक्ष्य दृष्टि में

 प्रश्न चिन्ह सा लक्ष्य दृष्टि में,निज बल से सृष्टि रचता हूँ।

फुटपाथ पर रहने वाला,ऐसे निज जीवन गढ़ता हूँ।

माना द्रोण नहीं मिलते हैं,भीष्म दृष्टि में ना रहते हैं।
परशुराम से क्या अपेक्षण,श्राप गरल हीं तो मिलते हैं।

एकलव्य सा ध्यान लगाकर,निज हीं शास्त्र संधान चढ़ाकर।
फूटपाथ पर मैं पढ़ता हूँ,निज जीवन रक्षण करता हूँ।

ऐसे हीं रण मैं लड़ता हूँ,जीवन रण ऐसे लड़ता हूँ।

ओ मरघट के मूल निवासी

 ओ मरघट के मूल निवासी,भोले भाले शिव कैलाशी।

यदा कदा मन आकुल व्याकुल,जग जाता अंतर सन्यासी।
जब जग बन्धन जुड़ जाते हैं,भाव सागर को मुड़ जाते हैं।
इस भव में यम के जब दर्शन,मन इक्छुक होता वनवासी।
ओ मरघट के मूल निवासी,भोले भाले शिव कैलाशी।
अति दूर है धाम तुम्हारे,किस भांति शिव धाम पधारे।
हम तो कर कर करम सब हारे,तन शक्ति भर रह उपवासी।
मन ईक्षण है चाह तुम्हारा,चेतन प्यासा छांह तुम्हारा।
ईधर उधर प्यासा बन फिरता,कभी मथुरा कभी काशी ।
ओ मरघट के मूल निवासी,भोले भाले शिव कैलाशी।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

कौन हूँ मैं ? ये मिट्टी? मिट्टी से बीज, बीज से तना

कौन हूँ मैं ?
ये मिट्टी?
मिट्टी से बीज,
बीज से तना ,
तना से शाखें ,
शाखों से पत्ती ,
पत्ती से कली ,
कली से फूल,
फूल से फल,
फल से अन्न,
अन्न से रक्त,
रक्त से कोशिका ,
कोशिका से ऊतक ,
ऊतक से मांस,
मांस से पेशी,
पेशी से मज्जा,
मज़्ज़ा से अस्थि
अस्थि से देह,
और देह से श्वांस ,
श्वांस से प्राण ,
प्राण से मैं
मिट्टी हूँ मैं,
मिट्टी से ,
बीज,
तना ,
शाखें ,
पत्ती ,
कली ,
फूल,
फल,
अन्न,
रक्त,
कोशिका ,
ऊतक ,
मांस,
पेशी,
मज्जा,
अस्थि
देह,
श्वांस ,
प्राण ,
प्राण से मैं
मिट्टी हूँ मैं,

मैं, मेरा घर, मेरा छोटा सा घर,

 मैं,


मेरा घर,
मेरा छोटा सा घर,
एक छोटे से गाँव में।

और गाँव,
मेरा गाँव,
मेरा छोटा सा गाँव,
एक शहर के पास।

और शहर,
मेरा शहर ,
वो छोटा सा शहर,
एक राज्य में।

और राज्य ,
मेरा राज्य ,
मेरा छोटा सा राज्य
मेरे इस देश में।

और देश,
मेरा देश,
मेरा प्यारा देश ,
ऐसे सैंकड़ों देश,
इस धरती पे।

और धरती,
ये धरती,
मेरी प्यारी धरती,
मेरी छोटी सी धरती,
घुमती गोल गोल,
सूरज के चारों ओर,
अन्य ग्रहों के साथ।

और सूरज,
मेरा सूरज,
मेरा प्यारा सूरज,
घुमता गोल गोल,
अपने ग्रहों के साथ,
एक आकाश गंगा के पीछे।

और आकाश गंगा,
मेरी आकाश गंगा,
जहाँ हजारों तारे,
करोड़ो तारे,
जहाँ ब्लैक होल्स,
हजारों ब्लैक होल्स,
करोड़ो ब्लैक होल्स,
अनगिनत ब्लैक होल्स।

जहाँ तारे,
हजारों तारे,
करोड़ों तारे,
बनते, मिटते।

और ऐसी आकाश गंगा,
हजारों आकाश गंगा,
करोड़ों आकाश गंगा,
अनगिनत आकाश गंगा,
जनमती आकाश गंगा,
बनती आकाश गंगा ,
बिगड़ती आकाश गंगा,
मिटती आकाश गंगा।

एक आकाश में ,
और वो आकाश ,
ऐसे हजारों आकाश,
ऐसे अनगिनत आकाश ।

एक समय में ,
और ऐसा एक समय,
हरेक सेकंड में।
जहाँ एक सेकंड,
करोड़ों सेकंड,
अनगिनत सेकंड,
महा समय में।

जहाँ वॉर्म होल्स,
एक वॉर्म होल्स ,
अनगिनत वॉर्म होल्स।

तोड़ते, मरोड़ते,
आकाश को,
समय को,
महाकाश को।

जहाँ ऐसे हजारों आकाश ,
महाकाश,
बनते, बिगड़ते,
मिटने,
समय में,
इस महासमय में।
और मैं इनका हिस्सा,
अदना सा हिस्सा।

मैं,
मेरा घर,
मेरा छोटा सा घर,
इस अनंत ब्रह्मांड में।

आंगना में सोना जईसन

 आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,

देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

मह मह महकेला आम के मंजरिया,आम के मंजरिया,
कुहू कुहू कुहुकेले काली रे कोईलिया, काली रे कोईलिया।
रस रस टपकेला महुआ जे गछिया कि,
बिनत में होखे लागल भोर, कि बिनत में होखे लागल भोर।
आंगना में जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

हरिहर पातवा ह घरती के सड़िया, कि घरती के सड़िया
सेमर के फूलवा से शोभेला सेजरिया, कि शोभेला सेजरिया।
देखि के सजल रुप ऋतुराज बिहँसेले,
भौरा मचावे लागल शोर , कि भौरा मचावे लागल शोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

गेंदवा के फूलवा ह सोना के गहनवा, कि सोना के गहनवा,
रंगे रंगे फूलवा से शोभेला लहँगवा , कि शोभेला लहँगवा।
श्रीनाथ 'आशावादी, अंखिया निहारे देखि,
गउआँ ई रस में विभोर , कि गउआँ ई रस में विभोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

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