देख के बेबी गधा बोला, चोटी वाली दीदी,
हे ईश्वर! ये ऐसा कैसा, सर में पूँछ उगा दी!
चोटी में जब रिबन बाँधा, चमकी लाल-गुलाबी,
देख के मुर्गा बांग भूल गया, मुर्गी हुई नवाबी!
आगे लटके, पीछे झटके, हवा में करे सवारी,
चोटी तेरी देख के दीदी, हँसती दुनिया सारी!
दीदी बोलीं, चुप रे गधे, फैशन की है आँधी,
तेरी अक्ल तो घास चर गई, बातें करे सयानी!
गधा बोला, सुनो दीदी जी, बात समझ न आई,
मैं तो मक्खी दूर भगाऊँ, तुम इससे क्या करती जी?
सर पे चोटी, दुम तो पीछे, मेरी समझ ना आया
तुमने उल्टा सिस्टम क्यों ये, अपने सर अपनाया?
इतनी मेहनत, इतना खर्चा, इतना टाइम लगाती,
चोटी लंबी करके आखिर, क्या हासिल कर पाती?
दीदी बोलीं, बेबी गधे, तर्क तेरा है पूरा कच्चा,
तेरी दुम से मक्खी भागे, मेरा स्टाइल अच्छा!
आगे बोलीं, लोग देखकर, मेरी तारीफ करते,
मेरे फैशन के चर्चे तो, गली-गली में चलते!
दर दिखना मेरा हक़ है, समझे ओ नादान!
बस सवाल फैशन का हीं है ना कोई विज्ञान।
गधा बोला: बिल्कुल दीदी, इसमें नहीं प्रतिवाद
बस फैशन को काम बताकर, करना मत विवाद
दुम मेरी है काम की की अपनी, चोटी तेरी शान,
शायद छोटी आप सही और पुँछ मेरी पहचान!
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