भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता?
भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता,
रात-रात भर शोर मचाता?
दिन में रहता मौन समाधि,
रात बने संगीत का गांधी!
टर्र-टर्र की ऐसी तान,
सो न सके पूरा मकान!
मच्छर बोला—“गायक जी,
काहे करते रियाज़ जी?”
मेंढक बोला—“मूर्ख मच्छर!
मैं हूँ जंगल का सुपरस्टार!
मेरी आवाज़ सुनकर ही तो,
बरसता है मेघों का प्यार!”
बगुला बोला—“वाह उस्ताद!
खूब बजाते अपना नाद!
एक ज़रा-सी तान सुनाओ,
पास में आकर सुर बतलाओ!”
मेंढक बोला—“दूर रहो जी,
मेरे सुर से जलते हो जी!
मेरी आवाज़ में है दम,
तुम क्या जानो संगीत का गम!”
तभी वहाँ पर आया हाथी,
बोला—“बंद करो बरसाती!
टर्र-टर्र से फटा है माथा,
किसने तुझको गायक बनाया?”
मेंढक बोला—“सुन गजराज,
कला नहीं है कोई मोहताज!
मेरी आवाज़ का है जलवा,
दुनिया भर में मेरा जलसा!”
हाथी बोला—“ठीक है भाई,
एक प्रतियोगिता रखवाई!
जो सबसे ऊँचा गाना गाए,
वही जंगल का रत्न कहलाए!”
मेंढक ने फिर गला फुलाया,
पेट गुब्बारे-सा फैलाया,
टर्र-टर्र की ऐसी मारी,
काँप उठी तालाब की क्यारी!
तभी अचानक आया साँप,
मेंढक जी के उड़ गए भाप!
टर्र-टर्र सब भूल गए,
सीधे पानी में कूद गए!
हाथी बोला—“कहाँ गए गायक?
कहाँ गया संगीत का नायक?
अभी तलक थे बड़े सितारे,
अब क्यों छिपते हो बेचारे?”
मेंढक बोला—“बात है न्यारी,
जान है सबसे अधिक प्यारी!
गाना-वाना बाद में होगा,
पहले साँप का नाशा होगा!”
साँप ने पूछा—“क्यों महाराज,
बंद हुआ क्या सुर का साज़?”
मेंढक बोला—“अरे जनाब,
डर के आगे बंद किताब!”
तभी मच्छर ने बात सुनाई,
हँसते-हँसते शाम बिताई—
“भई मेंढक, तू क्यूँ टर्राता,
जब ख़तरा देख छिप जाता?
शेर बने तो शेर ही रहना,
वरना चुपचाप पानी में रहना!”
ढक बोला—“सुनो भाई,
बात तुम्हारी समझ में आई!
टर्राना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार,
पर ख़तरे में भागना भी व्यवहार!”
हा हा ही ही, हू हू हू,
भई मेंढक, अब मत टर्राना यूँ!
हा हा ही ही, हू हू हू,
टर्राना कम, अक्ल लगाना—
वरना साँप करेगा कुकड़ू-कूँ
No comments:
Post a Comment