Thursday, October 1, 2026

पापा की यादें

तब पापा उठ डांट लगाते , देर तलक  सो जाने में।।
नींद कहाँ अब आती हमको, ख़ुद को रोज़ सुलाने में।।

वो मिट्टी की खुशबू आती है, बरसातों के मौसम में,
मन फिर से बच्चा हो जाता है, बीते पल दोहराने में।।

दरवाज़े की आहट सुनकर, पल भर को चुप हो जाता,
फिर खुशियों से हँस पड़ता , पापा के घर में आने में।।

आँगन में तब  अनुशासन था, पापा का तब  क्रोध रहा,
उनकी डाँट में प्यार छिपा था, मुझको  राह दिखाने में।

आज वही आँगन सूना है , आँगन जैसे मौन हुआ है ,
मन उनको अब ढूँढ़ रहा है, सूने घर को बगियाने में।।

फिर भी अंतस के अंतर में, पापा  वैसे ही रहते हैं,
जैसे कल ही साथ खड़े थे , हँसने और रुलाने में।।

जिन राहों पर साथ चले थे, आज अकेला चलता हूँ,
पाँव थकें तो यादें आतीं, उनकी  राह बताने  में।।

एक दिया अब भी जलता पापा दिल  के कोने में,
जैसे अब भी पास खड़े हो मुझको गले लगाने में।।

आज भरा घर सामानों से, देखो पापा दिल  खाली,
क्या-क्या खोया मैंने आखिर, आगे बढ़ते जाने में।।

अब चौखट से पूछ रहा हूँ, पापा कहाँ हैं कैसे हैं ,,
कैसे मन की बात बताऊँ, दिल की पीड़ जताने में।।

जब तक साँसें होंगी मेरी, पापा दिल में याद रहेंगे,
हर धड़कन में नाम रहेगा, सुख-दुख के अफ़साने में।।

जब तक ये जीवन है मेरा, नेक विरासत अपनाऊंगा ,
पापा कोई  कसर ना होगी सारी   सीख निभाने में ।। 

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