आदमी को समझना आसान नहीं है।वह जैसा दिखाई देता है, हमेशा वैसा होता नहीं।कभी वह अपने भीतर की आवाज़ सुनता है,और कभी उसी आवाज़ से बचता रहता है।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
खुद को पहचानने की फुर्सत नहीं मगर,
दुनिया समझने की रखता है ख्वाब भी।
इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।
शायद इसी उलझन का नाम ज़िंदगी है।इंसान बाहर बहुत कुछ खोजता रहता है,जबकि कुछ सवाल उसके भीतर ही बैठे होते हैं।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
[अंतरा — शहर और भटकाव]
शहर को भटकता, तन्हाई ना मिटती,
रात के सन्नाटों में रखता है आग भी।
पढ़ के हीं सीख ले ये चीज़ नहीं आदमी,
ठोकर के जिम्मे नसीहतें किताब भी।
वक़्त को गंवाता है कल के भरोसे पर,
वक़्त से माँगता बीता हुआ हिसाब भी।
वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता।हम अक्सर यह बात तब समझते हैं,जब लौटकर देखने के लिए बहुत कुछ पीछे छूट चुका होता है।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
[अंतरा — भावनाएँ और दूरी]
दिल की जज़्बातों को रखना ना मुमकिन,
लफ़्ज़ों में भर के पहुँचाता आवाज़ भी।
जो पास है उसकी कदर नहीं है इसको,
जो दूर है उसे देखता जैसे आफ़ताब भी।
अँधेरों में छुपता है आदमी ये जान कर,
चाँदनी है अच्छी पर दिखते हैं दाग भी।
जिसे हम अपने सबसे करीब समझते हैं,कई बार उसी को सबसे कम समझ पाते हैं।दूरी हमेशा जगह की नहीं होती।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
[अंतरा — स्वयं से संघर्ष]
खुद से अकड़ता है, खुद से ही लड़ता,
जाने ज़िद कैसी है, कैसा रुआब भी।
इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।
आदमी दुनिया से जीतने की कोशिश करता है।लेकिन सबसे लंबी लड़ाई अक्सर अपने आप से होती है।और उसका कोई दर्शक नहीं होता।
शौक भी तो पाले हैं, दारू शराब क्या,
जीने की ज़िद पे मरने को बेताब भी।
कभी-कभी इंसान जीवन को समझते-समझते उसे जीना ही भूल जाता है।फिर अचानक उसे एहसास होता है कि समय कितना आगे निकल चुका है।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
[समापन — धीमा, लगभग बातचीत की तरह]
जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।
शायद आदमी ऐसा ही है।वह विरोधाभासों से बना हुआ है।उसके भीतर प्रेम भी है, क्रोध भी;उम्मीद भी है और निराशा भी।वह खुद को ढूँढ़ता रहता है,और उसी तलाश में पूरी उम्र गुज़ार देता है।
इंसान की ये फ़ितरत समझे तो आखिर कौन,
कि दिल में सवाल है और मन में जवाब भी।
सवाल शायद खत्म नहीं होंगे।जवाब भी हमेशा पूरे नहीं मिलेंगे।लेकिन शायद इंसान होने का अर्थ ही यही है—चलते रहना, पूछते रहना,और अपने भीतर झाँकते रहना।
जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है, दाँत भी दिमाग भी।
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इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
खुद को समझने की फुर्सत नहीं मगर,
दुनिया समझने का दावा है हर पहर।
शहरों में भटकन तन्हाई की आग है,
इंसान की फ़ितरत क्या कितने नकाब,
सवालों में होते अक्सर जीने के राज़ ।
है सच की तलाश ओढ़े झूठे लिबास भी
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
शहरों में भटकन तन्हाई की आग है,
रातों के सन्नाटों में लिए कई ख्वाब है।
पढ़ के हीं सीख ले ये चीज नहीं आदमी,
ठोकर पर गिरकर हीं सीख लेता आदमी।
ज़ख़्मों से पूछता है दवा और इलाज भी।
पढ़ के हीं सीख ले ये चीज नहीं आदमी,
ठोकर पर गिरकर हीं सीख लेता आदमी।
ज़ख़्मों से पूछता है दवा और इलाज भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
दिल में जज्बातें सजाता बेहिसाब,
लफ्जों में भर के रखता है कई राज।
जो पास है उसकी कदर नहीं है इसको ,
जो दूर है आफ़ताब समझता है उसको।
लफ्जों में भर के रखता है कई राज।
जो पास है उसकी कदर नहीं है इसको ,
जो दूर है आफ़ताब समझता है उसको।
चाँदनी में खुद के ही दागों से डरता और
आईना दिख जात तो होता नाराज़ भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
खुद से अकड़ता है खुद से हीं लड़ता,
खुद से अकड़ता है खुद से हीं लड़ता,
उठने की चाह में गिरता संभालता।
शौक भी तो पाले क्या दारू शराब है,
फूंकता है धुंआ और पीता तेजाब है।
कि जीने की जिद पर मरने को बेताब भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
कि जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।
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