कौन हूँ मैं?
ये मिट्टी?
मिट्टी से बीज,
बीज से तना,
तने से शाखें,
शाखों से पत्ती,
पत्ती से कली,
कली से फूल,
फूल से फल,
फल से अन्न,
अन्न से रक्त,
रक्त से कोशिका,
कोशिका से ऊतक,
ऊतक से मांस,
मांस से पेशी,
पेशी से मज्जा,
मज्जा से अस्थि,
अस्थि से देह,
देह से श्वांस,
श्वांस से प्राण,
प्राण से—
मैं।
देह से इंद्रियाँ,
इंद्रियों से अनुभूति,
अनुभूति से संवेदना,
संवेदना से भावना,
भावना से इच्छा,
इच्छा से संकल्प,
संकल्प से कर्म,
कर्म से अनुभव,
अनुभव से स्मृति,
स्मृति से विचार,
विचार से बुद्धि,
बुद्धि से विवेक।
प्रशंसा—खुशी।
डाँट—दुःख।
प्रेम—प्रसन्नता।
ईर्ष्या—क्रोध।
भाव बदलते हैं।
विचार बदलते हैं।
मन बदलता है।
फिर—
मेरा नाम।
मेरा शरीर।
मेरा घर।
मेरा परिवार।
घर से गाँव,
गाँव से शहर,
शहर से राज्य,
राज्य से देश,
देश से धरती।
धरती से सौरमंडल,
सौरमंडल से आकाशगंगा,
आकाशगंगा से आकाश
अनगिनत आकाश।
तारों से आगे—
अंधकार।
अंधकार में—
ब्लैक होल
वॉर्म होल।
और
वॉर्म होल से आगे—
रहस्य।
एक छोर।
दूसरा छोर।
एक दूरी।
दूसरी दूरी।
और फिर—
अनंत आकाश।
और मैं—
इस विराट में
एक कण।
फिर समय—
क्षण,
सेकंड,
मिनट,
घंटा,
दिन,
सप्ताह,
महीना,
वर्ष,
दशक,
सदी,
शताब्दी,
सहस्राब्दी—
अनंत।
हर सेकंड
अनगिनत घटनाएँ।
हर घटना
एक कहानी।
हर कहानी
एक जीवन।
हर जीवन
एक क्षण।
और उस क्षण में—
मैं।
लेकिन—
यदि देह बदलती है,
मन बदलता है,
भाव बदलते हैं,
विचार बदलते हैं,
स्मृतियाँ बदलती हैं,
नाम बदलता है,
घर बदलता है,
गाँव बदलता है,
शहर बदलता है,
राज्य बदलता है,
देश बदलता है,
धरती बदलती है,
तारे बदलते हैं,
आकाशगंगाएँ बदलती हैं,
समय बहता है,
कहानियाँ मिटती हैं—
तो मैं इनमें से
कौन हूँ?
मैं देह नहीं—
क्योंकि देह बदलती है।
मैं मन नहीं—
क्योंकि मन बदलता है।
मैं भाव नहीं—
क्योंकि भाव आते-जाते हैं।
मैं विचार नहीं—
क्योंकि विचार उठते-मिटते हैं।
मैं स्मृति नहीं—
क्योंकि स्मृति भी धुँधली पड़ती है।
मैं नाम नहीं—
क्योंकि नाम मुझे दिया गया।
मैं घर नहीं—
क्योंकि घर मेरे बाहर है।
मैं गाँव नहीं,
शहर नहीं,
राज्य नहीं,
देश नहीं—
क्योंकि ये सब
मुझसे बड़े हैं,
मुझसे बाहर हैं।
मैं धरती नहीं—
क्योंकि धरती भी
ब्रह्मांड में एक कण है।
मैं सौरमंडल नहीं,
आकाशगंगा नहीं—
क्योंकि मैं
इनका केवल एक हिस्सा हूँ।
मैं ब्लैक होल नहीं,
वर्महोल नहीं—
क्योंकि वे भी
अनंत रहस्यों का हिस्सा हैं।
मैं समय नहीं—
क्योंकि समय
मेरे सामने बहता है।
मैं कहानी नहीं—
क्योंकि कहानियाँ
मेरे सामने जन्मती और मिटती हैं।
तो फिर—
जो बदलता है
वह मैं नहीं।
जो आता है
वह मैं नहीं।
जो जाता है
वह मैं नहीं।
जो जन्मता है
वह मैं नहीं।
जो मिटता है
वह मैं नहीं।
और जो यह सब
देखता है—
वही?
श्वांस आती है।
श्वांस जाती है।
विचार आता है।
विचार जाता है।
खुशी आती है।
दुःख आता है।
प्रेम आता है।
क्रोध आता है।
बचपन आता है।
यौवन आता है।
वृद्धावस्था आती है।
समय आता नहीं—
बस बहता है।
तारे जन्मते हैं।
तारे बुझते हैं।
आकाशगंगाएँ बदलती हैं।
कहानियाँ बनती हैं।
कहानियाँ मिटती हैं।
और—
मैं देखता हूँ।
सबको।
लगातार।
मौन।
अचल।
साक्षी।
फिर—
साक्षी भी एक नाम है।
तो नाम भी गया।
रूप गया।
सीमा गई।
दूरी गई।
स्थान गया।
समय गया।
कहानी गई।
“मेरा” गया।
“मैं” भी—
क्षण भर को
मौन हो गया।
और जब “मैं” भी
मौन हो गया—
तब क्या बचा?
न देह।
न मन।
न भाव।
न विचार।
न स्मृति।
न नाम।
न घर।
न गाँव।
न शहर।
न राज्य।
न देश।
न धरती।
न सौरमंडल।
न आकाशगंगा।
न ब्लैक होल।
न वर्महोल।
न समय।
न क्षण।
न कहानी।
न सीमा।
न दूरी।
न बाहर।
न भीतर।
न आरंभ।
न अंत।
बस—
मौन।
और उसी मौन में—
एक बोध।
बिना नाम का।
बिना रूप का।
बिना सीमा का।
कि—
जो कुछ था,
जो कुछ है,
जो कुछ होगा—
उससे अलग
मैं कुछ नहीं।
और उससे पूरा
मैं कुछ कम भी नहीं।
मिट्टी का कण हूँ—
पर मिट्टी से अलग नहीं।
एक क्षण हूँ—
पर समय से अलग नहीं।
एक जीवन हूँ—
पर अनगिनत जीवनों से अलग नहीं।
ब्रह्मांड का अंश हूँ—
पर ब्रह्मांड से अलग नहीं।
और शायद—
यही खोज थी।
मिट्टी से चला था
“मैं” खोजने।
देह मिली।
मन मिला।
भाव मिले।
स्मृतियाँ मिलीं।
घर मिला।
गाँव मिला।
शहर मिला।
धरती मिली।
तारे मिले।
आकाशगंगाएँ मिलीं।
अनंत मिला।
समय मिला।
कहानियाँ मिलीं।
सबको पीछे छोड़ता गया—
और अंत में
जहाँ पहुँचा—
वहीं से यात्रा शुरू हुई थी।
अपने भीतर।
मिट्टी हूँ मैं।
मिट्टी से आया हूँ।
समय में एक क्षण हूँ।
ब्रह्मांड में एक कण हूँ।
अनंत का एक अंश हूँ।
और उस अनंत के सामने
खड़ा मेरा प्रश्न
कौन हूँ मैं?
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