क से काली नहीं—
कौआ लिखो!
ग से गणेश नहीं—
गिद्ध लिखो!
भ से भोले नहीं—
भैंस लिखो!
प से पैगम्बर नहीं—
पाड़ा लिखो!
क से कौआ—
सामान्य!
क से काली—
सावधान!
ग से गिद्ध—
प्राकृतिक!
ग से गणेश—
धार्मिक!
भ से भैंस—
प्राणी!
भ से भोलेनाथ—
आस्था की कहानी
प से पाड़ा—
शब्द!
प से पैगम्बर—
मजहब!
अक्षर वही—
ध्वनि वही—
व्याकरण वही—
फिर यह अंतर क्यों?
क्यों भाई?
अक्षर तो वही था,
वाणी भी वही थी—
फिर नाम बदलते ही
नियम क्यों बदल गया?
कहानी क्यों बदल गई
क्यों
कौआ—धर्मनिरपेक्ष,
गिद्ध—धर्मनिरपेक्ष,
भैंस—धर्मनिरपेक्ष,
गधा—धर्मनिरपेक्ष!
और काली से धर्म ,
गणेश से आस्था मर्म
भोले आए—भक्ति तब
पैगम्बर आए—मजहब!
शायद
कौआ आया—सबका निकला,
गिद्ध आया—प्रकृति महान;
गधा आया—सर्वधर्मनिरपेक्ष,
क्योंकि उसका कोई धर्म नहीं—
या शायद कोई पहचान नहीं!
क्योंकि जात पूछकर
गिद्ध नोचते नहीं
झपटते वक्त किसी का क्या मजहब है
सोचते नहीं
और गधा ,भैंस
कुछ भी समझते नहीं
उनके लिए सारे धर्म
सारे मजहब
सारी जाति
होती है एक बराबर
प्रश्न न काली का है,
न गणेश का,
न पैगम्बर का,
न भोलेनाथ का।
प्रश्न तो कौवों का है
प्रश्न भैसों का है
प्रश्न गधों का है
प्रश्न गिद्धों का है
क्योंकि
ये पाए जाते हैं हर धर्म में
कौआ न हिन्दू, न मुसलमान,
गिद्ध न मंदिर, न मस्जिद जान;
गधा न पूछे जात-पंथ
“कौआ धर्म से ऊपर,
गिद्ध मजहब से पार,
गधा सबसे निष्पक्ष
इसलिए ये सारे होते हैं निष्पक्ष!
धर्म निरपेक्ष।
इसीलिए धर्म निरपेक्षता महान
क्योंकि कौआ,गिद्ध और गधा
रचते इसका विधान।
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