Thursday, October 22, 2026

जीवन की आपा धापी में

 

जीवन के थपेड़ो और झंझावातों से लड़ते और बिखरते आदमी के लिए बचपन की सुनहली यादें किसी स्वप्नवत मीठी दवाई के जैसी होती है , जो मिल तो नहीं सकती परन्तु इसकी यादगारी हीं चित्त को ठंडक पहुँचाने के लिए काफी होती हैं ।

  

थकने लगा रातों को सोते

जाग-जाग कर मैं।

 

जीवन की आपा धापी में

भाग भाग कर मैं।

 

वो तितली का पंख पकड़ना

आने लगा है याद,

 

वो चॉकलेट के लिए मैं

कैसे करता था फरियाद।

 

वो हृदय को कम्पित

करते थे कैसे गुब्बारे,

 

वैसा विस्मय कहाँ है

संभव कैसे भी हो नजारे।

 

वो चंदा मामा की रातें,

दादी की परियों की बातें ,

 

इंद्रधनुष पे विस्मित होना,

जब भी होती थी बरसातें।

 

काश कोई लेके चलता

मुझको बचपन की छाँव,

 

वो आम गुठली की सीटी

और कागज की नाव।

 

कि जामुन के पेड़ बैठ फिर

मन भर जामुन लाता,

 

माता के हाथों से चावल

भाग-भाग फिर खाता।

सत तप का आचार बढा कर

ऐसे पुण्यात्माएं जो जीवन के तमाम झंझावातों के बीच भी ईश्वर के प्रति समर्पित रहती हैं और जिनके सानिध्य में हृदय प्रभु प्रेम से हर्षोल्लादित रहता है,  उन तपस्वियों एवं ईश्वर-पथगामियों के चरणों में यह गीत सादर समर्पित है।

सत तप का आचार बढा कर,मन संचित विकार घटा कर,

ज्ञान-सुधा का पान करें जो, प्रभु-शोध में प्राण धरें जो।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।


अहंकार ना लेश है फलता,समता का दीपक है जलता।

शुभ भावों के पुष्प चढ़ाते प्रभु का रस पी तृप्त हो जाते।,

क्रोध-काम के पार जो रहते, साक्षी बन संसार जो लखते, 

संचित ना करते तिनके तिनके ,मोह-मुक्त जीवन पथ चलते।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।


ज्ञान दीप ले हर घर घर पर,जग से घन तम को हर हर कर,

दुःख पीड़ा इस जग के सह कर,जाने जग माया में बह कर।

माया सत का व्यव्हार नहीं है ,जग का किंचित सार नहीं है ,

इनके डग जग यूँ  होते ,जग का हो जग ना रहते,

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।


ध्यान योग की जली ज्योत है ,चिरानंद के विपुल श्रोत हैं ,

सत्य-शोध के नित्य अनुरागी,द्वेष-रहित, निष्काम वैरागी।

सत्य-सार का मंथन करते,नश्वर में अनश्वर चखते,

क्षणभंगुर संसार के भीतर,शाश्वत सत्ता का पथ वरते ।

उनके पग हम कविता धरते उनके डग हम कविता रचते

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।

उनके पथ अभिनंदन करते, नत मस्तक हम वंदन करते।

====

क्षमा दया करुणा हित गामी , शक्ति पुंज अतुलित हैं ज्ञानी,

जग की पीड़ा स्वयं सहें जो,दुखियों के आँसू हर लें जो।

पग पग में निस्सार महीं है, ईश्वर का विस्तार नहीं है।

जैसे जल के ऊपर तल पर ,पंक तल से निकल निकल कर।

प्रेम की जिनसे विणा बहती ,ज्ञान सुधा जग मग जग करती।


वैसा हीं निदान रहे

किस राह के अनुरागी हो ,

देहासक्त या कि त्यागी हो?

जीवन का क्या परंतु हो

मरण का क्या हेतु हो। 

चित्त में पर इसका भान हो ,

ना कोई अभिमान हो।

किंचित कोई परिणाम हो किंचित कोई परिणाम।

जीवन में रहे ध्यान हाँ जीवन में रहे ध्यान।


है प्रयास में अणुता तो क्या,

ना राह में ऋजुता तो क्या?

प्रभु की अभिलाषा में किंतु ,

ना हो लघुता ध्यान ,जीवन में रहे ध्यान हाँ जीवन में रहे ध्यान।चाहे कोई परिणाम हो चाहे कोई परिणाम।


कितनी प्रज्ञा धूमिल हुई है ?

अंतर्संज्ञा घूर्मिल हुई है ?

अंतर पथ अवरोध पड़ा ,

क्या हो किंतु अनुमान ,जीवन में रहे ध्यान हाँ जीवन में रहे ध्यान।

चाहे कोई परिणाम हो चाहे कोई परिणाम।


बुद्धि शुद्धि या तय कर लो ,

वाक्शुद्धि चित्त लय कर लो ,

दिशा भ्रांत हो बैठो ना मन,

संशुद्धि संधान  ,जीवन में रहे ध्यान हाँ जीवन में रहे ध्यान।

चाहे कोई परिणाम हो चाहे कोई परिणाम।


कर्मयोग कहीं राह सही है ,

भक्ति की कहीं चाह बड़ी है,

जिसकी जैसी रही प्रकृत्ति ,

मुक्ति वैसा निदान।

जीवन में रहे ध्यान हाँ जीवन में रहे ध्यान।

चाहे कोई परिणाम हो चाहे कोई परिणाम।

आनंद हीं बाधा है

 

तूने रूप छोड़ा,

रंग छोड़ा।

स्वाद छोड़ा ,

गंध छोड़ा।

 

राग भी ,

विराग भी,

प्यार भी,

और त्याग भी।

 

मिथ्या,

संसार छोड़ा,

झूठा,

आचार छोड़ा।

 

अब झूठ से

विरक्त हो,

न सत्य से

आसक्त हो।

 

ये सत्य है,

अनासक्त हो,

फिर भी आनंद से,

विरक्त हो ?

पर ध्यान भी तो,

नाव है,

क्यों रत इनमे

पाव है ?

 

कि तप छोड़ो,

त्याग भी,

ये राग भी,

वैराग भी।

 

आनंद हीं बाधा है,

आनंद की चाह में।

तेरा ईश्वर रोड़ा बना है,

ईश्वर की राह में।

एक प्रतिबिंबित दर्पण

क्या है एक आदमी । दिन  भर प्रेम , नफरत , आशा , निराशा , इर्ष्या , उत्साह इत्यादि अनेक भावनाओं के समंदर में गोते रहने के अलावा करता हीं क्या है ? और ये भावनाएं आती कहाँ से , ये भावनाएं होती है ? ये सारी आशाएं , भावनाएं आदमी पर आरोपित किये गए विचारों के प्रतिफलन मात्र हीं तो है और आदमी क्या है  एक दर्पण की भांति यंत्रवत प्रतिफलन और प्रतिक्षेपित करता मात्र एक यंत्र ।

  

प्यार करोगे,

तो एक प्रेमी हूँ मैं 

गर दुलार,

तो स्नेही हूँ मैं।

नफरत, तिरस्कार का ,

इबादत, उपकार का ।

हताश हूँ, फटकार पे ,

निराश हूँ, दुत्कार पे ।

उपहास से हूँ, क्लेशग्रस्त ,

और परिहास से, द्वेषत्रस्त ।

अनादर पे, रोष हूँ मैं ,

प्रसंशा पे, मदहोश हूँ मैं ।

हार का, संताप हूँ ,

जीत का, उल्लास हूँ ।

सम्मान हूँ, जहाँ आदर है ,

अभिमान हूँ, जहाँ सादर है ।

भरोसे का विश्वास हूँ मैं ,

उत्साही की आस हूँ मैं ।

ममता मिले, तो वात्सल्य ,

करुणा मिले, तो संवेदन ।

दया मिले, तो विनम्रता ,

क्षमा मिले, तो समर्पण।

छल करोगे, तो संशय हूँ ,

घृणा क्रोध अतिशय हूँ 

विश्वास टूटे, तो बिखरता हूँ मैं 

अपनों से जुड़ू, तो निखरता हूँ मैं

संवेदना मिले, तो पिघलता हूँ मैं 

असंवेदना में भी संभलता हूँ मैं

मैं कोई एक स्वरूप नहीं,

कोई निश्चित अनुरूप नहीं।

तुम जिस भाव से मुझे देखोगे,

उसी भाव में मुझको पाओगे।

तुम्हारे व्यवहार का विस्तार हूँ,

तुम्हारे संस्कारों का आकार हूँ।

तुम्हारी दृष्टि का प्रतिरूप हूँ,

तुम्हारे अंतर्मन का स्वरूप हूँ।

म्हारे भावों का संचार हूँ,

तुम्हारे व्यवहार का प्रतिकार हूँ।

तुम्हारी दृष्टि, तुम्हारा विचार,

मुझमें पाता अपना आकार।

भावों के संसार निरंतर,

और इनके संप्रेषण ।

कर रहा परिलक्षित हूँ मैं,

एक प्रतिबिंबित दर्पण ।

खुद से तेरा युद्ध पड़ा है

 

दृढ़ निश्चयी अनिरुद्ध अड़ा है

ना कोई विरुद्ध खड़ा है।


जग की नज़रों में काबिल पर

चेतन अंतर रूद्ध डरा है।

 

घन तम गहन नियुद्ध पड़ा है

चित्त किंचित अवरुद्ध बड़ा है।


अभिलाषा के श्यामल बादल

काटे क्या अनुरुद्ध पड़ा है।


स्वयं जाल ही निर्मित करता

और स्वयं ही क्रुद्ध खड़ा है।


अजब द्वंद्व है दुविधा तेरी

मन चितवन निरुद्ध बड़ा है।


तबतक जगतक दौड़ लगाते

जबतक मन सन्निरुद्ध पड़ा है।


किस कीमत पे जग हासिल है

चेतन मन अबुद्ध अधरा है।


अरि दल होता किंचित हरते

निज निज से उपरुद्ध अड़ा है।


किस शिकार का भक्षण श्रेयकर

तू तूझसे प्रतिरुद्ध पड़ा है।


निज निश्चय पर संशय अतिशय

मन से मन संरुद्ध लड़ा है।


मन चेतन संयोजन क्या जब

खुद से तेरा युद्ध पड़ा है।

आदमी का आदमी होना बड़ा दुश्वार है

 

रोज उठकर सबेरे

पेट के जुगाड़ में,


क्या न क्या करता रहा है

आदमी बाजार में।


सच का दमन पकड़ के

घर से निकलता है जो,


झूठ की परिभाषाओं से

गश खा जाता है वो।

 

औरों की बातें है झूठी

औरों की बातों में खोट,


और मिलने पे सड़क पे

छोड़े ना दस का भी नोट।


तो डोलते हुए जगत में

डोलता इंसान है,


डिग रहा है आदमी कि

डिग रहा ईमान हैं।

 

झूठ के बाज़ार में हैं

खुद हीं ललचाए हुए,


रूह में चाहत बड़ी है

आग लहकाए हुए।


तो तन बदन में आग लेके

चल रहा है आदमी,

 


आरजू की ख़ाक में भी

जल रहा है आदमी।

 

टूटती हैं हसरतें जब

रुठतें जब ख्वाब हैं,


आदमी में कुछ बचा जो

लुटती अज़ाब हैं।


इन दिक्कतों मुसीबतों में

आदमी बन चाख हैं,


तिस पे ऐसी वैसी कैसी

आदतें गुस्ताख़ है।

 

उलझनों में खुद उलझती

ऐसी वैसी आदतें,


आदतों पे खुद हैं रोती

कैसी कैसी आदतें।


जाने कैसी आदतों से

अक्सर हीं लाचार है,


आदमी का आदमी

होना बड़ा दुश्वार है।

इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी

 

इन्सान की ये फितरत

है अच्छी खराब भी,


दिल भी है दर्द भी है

दाँत भी दिमाग भी ।


खुद को पहचानने की

फुर्सत नहीं मगर,


दुनिया समझाने की

रखता है ख्वाब भी।

 

शहर को भटकता

तन्हाई ना मिटती ,


रात के सन्नाटों में

रखता है आग भी।


पढ़ के हीं सीख ले ये

चीज नहीं आदमी,


ठोकर के जिम्मे

नसीहतों की किताब भी।

 

दिल की जज्बातों को

रखना ना मुमकिन,


लफ्जों में भर के

पहुँचाता आवाज भी।


अँधेरों में छुपता है

आदमी ये जान कर,


चाँदनी है अच्छी पर

दिखते हैं दाग भी।

 

खुद से अकड़ता है

खुद से हीं लड़ता,


जाने जिद कैसी है

कैसा रुआब भी।


शौक भी तो पाले हैं

दारू शराब क्या,


जीने की जिद पे

मरने को बेताब भी।

Monday, October 19, 2026

है तेरी खिदमत में कितने

बह रही है ज्ञान गंगा, तू भी इसमें हाथ धो ले
हैतेरी खिदमत में कितने, डिग्री की दुकान खोले
भेद नहीं करती ये गंगा, कला व विज्ञानं में
कोई मेहनत की जरुरत, है नहीं स्नान में
ले ले प्रतिष्ठा डूब दे दे गंग के प्रधान बोले
है तेरी खिदमत में कितने, डिग्री की दुकान खोले
गंग तट पर भीर बहुत है पर न तू घबराना
खोल पाप की गठरी वही पञ्च डूब दे आना
जा के विमला गंग तरन की थोरी सि सामान लेले
है तेरी खिदमत में कितने, डिग्री की दुकान खोले
जब प्रतिष्ठा की डिग्रीया तेरे हाथ आएगी
माँ शारदे तेरी प्रगति देख कर जल जाएगी
बहुत कर चुकी फेल वो सबको अब तो थोरा वो भी रोले
है तेरी खिदमत में कितने, डिग्री की दुकान खोले;

Wednesday, October 14, 2026

मेरी छत चमक चमक के कह रही है

[Intro: Flute opening, vintage Hindi film sad, mournful, loud and clear Indian male Vocal, dramatic sarangi, harmonium, tabla, dholak]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज छुपा मेरी लाज बचा 

[Eco]

[Spoken Word: theatrical male voice, comic seriousness]

इश्क़ में दिल रूठ जाए तो भरोसा टूट  जाता है,
मगर बाल टूट जाएँ तो आदमी लुट जाता है!

[Verse 1: classic 1950s Hindi playback singing, clear diction, expressive vibrato]

मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।
जो तू नहीं तो कंघी-कंघा सब बेकार है,
छत पर ठंडी लगती है, मुझको बुखार है।

[Pre-Chorus: rising violins, playful tabla rolls, increasing vocal intensity]

रे मुझको बुखार है, गई सब बहार है!

[Build Up: accelerating dholak, dramatic orchestral flourish, male voice rising]

बची हुई जो भी है वो श्रृंगार तो बचा ,बहार तो बचा  !

रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ!

[Chorus: loud and clear male vocals, grand vintage Bollywood sad and morunful, catchy melody]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज तो छुपा मेरी लाज तो बचा 

[Eco]

[Hook: catchy, emphatic, repeated sad phrase]

छत चमके, माथा दमके,
बाल कहाँ हैं, दिख रहे छन छन के!

[Echo: vintage theatrical vocal echo, repeat the final words]

गंजा ना बना… ना बना… ना बना…
ओ राजा आजा आज  नाजा नाजा…

[Interlude: 1950s Hindi film flute ,tabla and dholak, no vocals]

[Verse 2: expressive male playback voice, comic melancholy, clear Hindi pronunciation]

तेल शीशी रोती मालिश को तरस रही,
कंघी मेरे हाथ में सवाल कर रही।
बोली तेरे सिर पे अब तो मेरा क्या काम है,
चार बालों की हिफाज़त सुबह-शाम है।

[Pre-Chorus: mock-tragic delivery, violin tremolo, tabla build-up]

सुबह-ओ-शाम है कि ये जीवन बेज़ार है!

[Breakdown: sudden soft harmonium and solo voice, exaggerated sorrow]

अरे तेल भी उदास है,
कंघी भी निराश है,
चार बाल बचे हैं,
बस उन्हीं के चर्चे होते है!

[Build Up: rising strings, rolling tabla, dramatic orchestral crescendo]

चार बालों की इज़्ज़त का सवाल है,
ये नहीं कोई मामूली बाल-बवाल है!

[Chorus: full vintage, loud male lead, group backing vocals]

बचे हुए जो भी है सर पे  ना खा भी जा

रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ!

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज तो  छुपा मेरी लाज तो बचा 

[Eco]

[Refrain: repeat with a comic group response]

रे मुझको गंजा ना बना!
अरे उस्तरा मत चला!
रे मुझको गंजा ना बना!
मेरी इज़्ज़त तो बचा!

[Verse 3: theatrical comic singing, jaunty rhythm, clarinet and dholak]

नाई की दुकान पर मैं जब भी जाता हूँ,
बाल कटने से पहले ही घबराता हूँ।
नाई बोले, बैठ जा, आज नया स्टाइल दूँ,
जो बचे हैं चार , उनको भी विदा कर दूँ!

[Bridge: spoken dialogue, comic pauses, orchestra stops between lines]

मैं बोला—नाई जी, ज़रा हाथ सँभाल के!
वो बोला—बैठिए हुज़ूर, निकलेंगे कमाल के!

मैं बोला—चार बाल हैं, इनको रहने दीजिए!
वो बोला—फिक्र न कीजिए, बस मुझे मेरा काम करने दीजिए!

[Breakdown: soft piano, suspenseful strings, whispered comic tension]

मैं सहमते हुए बोला रे नाई तू बड़ा चालाक है,
हाथों में उस्तरा नापाक है!

[Drop: sudden full orchestral hit, emphatic male singing, comic drum accent]

उस्तरा नापाक है कि मेरी छत लाचार है!

बन रहा है चाँद अब मेरा छत इसे बचा भी जा

रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ!

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज तो छुपा मेरी लाज तो बचा 

[Bridge]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज छुपा मेरी लाज बचा 

[Chorus: grand 1950s Bollywood finale, loud clear male vocals, full strings, brass, tabla and dholak]

मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ!

[Post-Chorus: exuberant group vocals, playful call and response]

लीजिए कंघी! — बेकार है!
लीजिए तेल! — बेकार है!
नाई से बचना! — दुश्वार है!
चार बालों पर ही संसार है!

[Hook: loud, catchy, repeated male chorus]

चार बाल हैं, चार बाल हैं,
यही तो मेरे जीवन का कमाल है!
चार बाल हैं, चार बाल हैं,
इनसे ही मेरी शान बरकरार है!

[Refrain: full orchestra, repeat the main melody]

बची खुची है लाज उसे ना लुटा भी जा

रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ,

[Outro: slowing orchestra, dramatic spoken punchline, final piano and violin flourish]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 

ना ना ना नाजा ना ना ना नाजा 

बाल आजा बाल आजा 

राजा नाजा राजा आजा

मेरी राज छुपा मेरी लाज बचा 

[Spoken Word: deadpan comic delivery]
डॉक्टर ने कहा—बालों की चिंता छोड़ दीजिए!
मैंने कहा—डॉक्टर साहब, बाल रहने तो दीजिए!

[Echo: fading male voice]
राजा आजा आजा आजा

ना जा ना जा ना जा

बाल आजा आजा आजा

[End: final flute hit, short comic pause, vintage film ending]

===



[Intro – Temple Bells + Harmonium + Soft Flute]
[Instrumental: 8 bars, vintage violins gradually enter]
[Male Vocal – Soft Alaap, Dramatic Devotional Style]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 
ना ना ना  नाजा ना ना ना नाजा 
बाल आजा बाल आजा 
राजा नाजा राजा आजा

[Eco]

ह ह ह हा नाजा हा... हा...आजा 
हे प्रभु... मेरे बाल बचा... ओ मेरे दाता... मेरी लाज बचा...

[Verse 1 – Solo Male Vocal, Gentle Dholak]

मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा, 
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 
जो तू नहीं तो कंघी-कंघा सब बेकार है, 
छत पर ठंडी लगती है, मुझको बुखार है।

[Pre-Chorus – Rising Violins, Increasing Vocal Emotion]
रे मुझको बुखार है, गई सब बहार है...
[Echo – Male Chorus, Temple Bell Accents]
बहार है... (बहार है...) बेज़ार है... (बेज़ार है...)
[Hook – Catchy, Repetitive, Strong Melody]

बची हुई जो भी है वो श्रृंगार तो बचा ,बहार तो बचा  
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा, 
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।

[Chorus – Full Orchestra, Dholak, Manjira, Group Singing]

मेरी छत! (चमक चमक!) कह रही! (आ भी जा!) 
मुझको गंजा! (ना बना!) तुझे कसम है! (मेरी आ!)

[Bridge]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 
ना ना ना  नाजा ना ना ना नाजा 
बाल आजा बाल आजा 
राजा नाजा राजा आजा

[Eco]

[Post-Chorus – Playful Echo]

मेरी आ... (मेरी आ...) बाल बचा... (बाल बचा...)

[Interlude 1 – Flute, Sitar, Tabla Rolls, Vintage Violins]
[Verse 2 – Comic Pathos, Solo Male Vocal]

तेल शीशी रोती मालिश को तरस रही, 
कंघी मेरे हाथ में सवाल कर रही। 
बोली तेरे सिर पे अब तो मेरा क्या काम है, 
चार बालों की हिफाज़त सुबह-शाम है।

[Pre-Chorus – Melodramatic Build-Up]

सुबह-शाम है... जीवन बेकार है...
[Echo – Soft Male Chorus]
बेकार है... (बेज़ार है...) लाचार है... (लाचार है...)

[Hook – Full Voice, Vintage Film Song Style]

लाचार है जीवन कि अब अब छोड़ के ना जा 
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा, 
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।

[Bridge – Music Drops to Harmonium and Soft Tabla]
[Spoken Male Vocal – Dramatic Prayer]

[Bridge]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 
ना ना ना  नाजा ना ना ना नाजा 
बाल आजा बाल आजा 
राजा नाजा राजा आजा

[Eco]

हे प्रभु! ये कैसी विपदा आई? 
सर पे धरती, बालों में जुदाई! 
तेल भी रोए, कंघी भी हारे, 
चार बाल बचे हैं, वो भी बेचारे!

[Bridge Build-Up – Violins Rise, Temple Bells Ring]
[Male Vocal – High Emotional Pitch]

अब तो दया करो भगवान, बालों की रख लेना शान!
[Call and Response – Lead Singer and Male Chorus]
[Lead] मेरे बाल कहाँ हैं?
[Chorus] गायब हैं! गायब हैं!
[Lead] मेरी शान कहाँ है?
[Chorus] गायब है! गायब है!
[Lead] नाई से कौन बचाए?
[Chorus] भगवान बचाए! भगवान बचाए!
[Instrumental Interlude – Comic Shehnai, Dholak, Sitar and Flute]
[Verse 3 – Rhythmic Storytelling, Playful Vocal Delivery]

नाई की दुकान पर मैं जब भी जाता हूँ, 
बाल कटाने से पहले ही घबराता हूँ। 
नाई बोले, बैठ जा, आज नया स्टाइल दूँ, 
जो बचे हैं चार बाल, उनको भी विदा कर दूँ!

[Music Stop – Sudden Silence]
[Spoken Dialogue – Nervous Male Voice]

अरे नाई भैया! रहम करो! जो बचे हैं, उन पर तो तरस करो!
[Comic Chorus – Energetic Dholak and Manjira]

रे नाई बड़ा चालाक है, हाथों में उस्तरा नापाक है! 
उस्तरा नापाक है कि ये छत लाचार है, 
बचे हुए जो भी हैं उनको ना कहा भी जा 
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।

[Hook – Grand Reprise, Full Male Chorus]
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा, 

[Final Chorus – Grand 1950s Bollywood Orchestra]

मेरी छत! (चमक चमक!) कह रही! (आ भी जा!) 
मुझको गंजा! (ना बना!) तुझे कसम है! (मेरी आ!)
[Echo – Gradually Fading Male Chorus]
मेरी आ... (मेरी आ...) बाल बचा... (बाल बचा...) 
गंजा ना बना... (ना बना...) हे प्रभु... (हे प्रभु...)

[Bridge]

अ अ अ आजा अ अ अ आजा 
ना ना ना  नाजा ना ना ना नाजा 
बाल आजा बाल आजा 
राजा नाजा राजा आजा

[Eco]

[Outro – Slow Harmonium, Soft Flute, Temple Bells]
हे प्रभु... मेरे बाल बचा... आज बचा , मेरी लाज ... बचा...

[Final Comic Pause – One Temple Bell, Tiny Dholak Hit]
[Vintage Gramophone Crackle – Fade Out]

मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।
जो तू नहीं तो कंघी-कंघा सब बेकार है,
छत पर ठंडी लगती है, मुझको बुखार है।
रे मुझको बुखार है, गई सब बहार है,
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 

तेल शीशी रोती मालिश को तरस रही,
कंघी मेरे हाथ में सवाल कर रही।
बोली  तेरे सिर पे अब तो मेरा क्या काम है,
चार बालों की हिफाज़त सुबह-शाम है।
सुबहो शाम है कि ये जीवन बेज़ार है।
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 

नाई की दुकान पर मैं जब भी जाता हूँ,
बाल कटाने से पहले ही घबराता हूँ।
नाई बोले, बैठ जा, आज नया स्टाइल दूँ,
जो बचे हैं चार बाल, उनको भी विदा कर दूँ!
रे नाई बड़ा चालाक है, हाथों में उस्तरा पाक है,
उस्तरा पाक है कि ये ये छत लाचार है।
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 

बीवी मेरी देखकर मुझको मुस्कुराने लगी,
मेरे चमकते माथे पर चाँद बनाने लगी।
बोली, रात में बिजली का बिल बच जाएगा,
तेरे सिर का रिफ्लेक्शन घर चमकाएगा!
घर चमकाएगा कि ना कोई श्रृंगार है
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 

मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ।
जो तू नहीं तो कंघी-कंघा सब बेकार है,
छत पर ठंडी लगती है, मुझको बुखार है।
रे मुझको बुखार है, गई सब बहार है,
बालों से खाली सही, दिल में प्यार अपार है!
मेरी छत चमक चमक के कह रही है आ भी जा,
रे मुझको गंजा ना बना, तुझे कसम है मेरी आ। 

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