दृढ़ निश्चयी अनिरुद्ध अड़ा है
ना कोई विरुद्ध खड़ा है।
जग की नज़रों में काबिल पर
चेतन अंतर रूद्ध डरा है।
घन तम गहन नियुद्ध पड़ा है
चित्त किंचित अवरुद्ध बड़ा है।
अभिलाषा के श्यामल बादल
काटे क्या अनुरुद्ध पड़ा है।
स्वयं जाल ही निर्मित करता
और स्वयं ही क्रुद्ध खड़ा है।
अजब द्वंद्व है दुविधा तेरी
मन चितवन निरुद्ध बड़ा है।
तबतक जगतक दौड़ लगाते
जबतक मन सन्निरुद्ध पड़ा है।
किस कीमत पे जग हासिल है
चेतन मन अबुद्ध अधरा है।
अरि दल होता किंचित हरते
निज निज से उपरुद्ध अड़ा है।
किस शिकार का भक्षण श्रेयकर
तू तूझसे प्रतिरुद्ध पड़ा है।
निज निश्चय पर संशय अतिशय
मन से मन संरुद्ध लड़ा है।
मन चेतन संयोजन क्या जब
खुद से तेरा युद्ध पड़ा है।
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