Thursday, July 10, 2025

ईश्वर की मर्जी

ऐसा आपने लोगों को अक्सर कहते हुए सुना होगा—
“ईश्वर की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।”

इस कथन को मानने वाले लोगों का विश्वास है कि इस सृष्टि में घटने वाली प्रत्येक घटना के पीछे ईश्वर ही कारण है। उनके अनुसार जो कुछ भी हो रहा है—अच्छा हो या बुरा—सब कुछ ईश्वर की इच्छा से ही घट रहा है। अर्थात, ईश्वर की मर्जी के बिना इस जगत में कुछ भी घट ही नहीं सकता।

यदि इस सिद्धांत को हम बिना विवेक के पूर्णतः सत्य मान लें, तो इसके अत्यंत गंभीर और खतरनाक दुष्परिणाम हो सकते हैं।
यदि कोई अपराधी किसी निर्दोष व्यक्ति की हत्या कर दे, तो वह यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है कि यह सब ईश्वर की मर्जी से हुआ।
यदि कोई चोर चोरी करे, तो वह भी यही तर्क दे सकता है कि जब ईश्वर की इच्छा के बिना पत्ता तक नहीं हिलता, तो चोरी कैसे हो सकती है?

इस प्रकार यह सिद्धांत मनुष्य को उसके कर्तव्य, जवाबदेही और नैतिक उत्तरदायित्व से मुक्त कर देता है।
यही नहीं, यह विचार मनुष्य को एक गहरी दुविधा में डाल देता है—
यदि संसार में इतनी हिंसा है, इतने अपराध हैं, इतना अन्याय है, तो क्या इन सबके लिए ईश्वर ही जिम्मेदार है?

एक बार एक संत से उनके शिष्य ने इसी प्रकार का प्रश्न पूछा।
शिष्य ने कहा—
“यदि इस जगत में घटने वाली सारी घटनाओं के पीछे ईश्वर ही कारण है, तो फिर एक साधारण मनुष्य की क्या जिम्मेदारी है? यदि कोई हिंसा करता है, कोई अपराध करता है, तो उसमें उस व्यक्ति की कोई जवाबदेही कैसे बनती है? क्योंकि ईश्वर की मर्जी के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।”

संत मुस्कुराए। उनके चेहरे पर करुणा थी, आँखों में गहरी स्पष्टता।
उन्होंने कहा—

“तुमने प्रश्न ठीक पूछा है, पर उत्तर को समझने के लिए दृष्टि को सूक्ष्म बनाना होगा।”

संत ने एक उदाहरण दिया—

“मान लो, एक गाय को एक खूंटी से बाँध दिया गया है। गाय की गर्दन एक रस्सी से बंधी है, और वह रस्सी उसे एक निश्चित परिधि के भीतर ही घूमने की अनुमति देती है।
यह निश्चित है कि वह गाय उस परिधि के बाहर नहीं जा सकती।
पर यह भी उतना ही सत्य है कि उस परिधि के भीतर वह पूरी तरह स्वतंत्र है—
वह चाहे तो बैठ सकती है, खड़ी रह सकती है, घास खा सकती है, या इधर-उधर घूम सकती है।”

संत ने आगे कहा—

“उस परिधि के भीतर गाय जो भी करती है, उसके परिणाम उसी को भुगतने होते हैं।
यदि वह अपने दायरे में कोई जहरीली वस्तु खा ले, तो उसका दुष्परिणाम उसी को झेलना होगा।
यदि वह अपने मालिक को सींग मार दे, तो दंड भी उसी को भोगना पड़ेगा।
खूंटी उसे बाँधती है, पर उसके कर्मों की जिम्मेदारी उससे नहीं छीनती।”

फिर संत ने मनुष्य की ओर संकेत करते हुए कहा—

“ठीक इसी प्रकार ईश्वर ने भी मनुष्य को कुछ निश्चित नियमों की परिधि में रखा है।
मनुष्य का शरीर, मन और बुद्धि कुछ प्राकृतिक और नैतिक नियमों के अधीन कार्य करते हैं।
यदि मनुष्य आग में हाथ डालेगा, तो वह जलेगा।
यदि वह पानी में जाएगा, तो उसे तैरने का प्रयास करना ही पड़ेगा, अन्यथा वह डूब जाएगा।
इस सृष्टि में ऐसे अनगिनत नियम हैं, जिनका उल्लंघन कोई भी नहीं कर सकता—न राजा, न संत, न साधारण मनुष्य।”

संत ने स्पष्ट शब्दों में कहा—

“ईश्वर ने मनुष्य को स्वतंत्रता दी है, पर स्वेच्छाचार नहीं।
मनुष्य अपने दायरे के भीतर पूर्णतः स्वतंत्र है, पर उस स्वतंत्रता के उपयोग के लिए वही उत्तरदायी है।”

जिस प्रकार गाय अपनी परिधि के भीतर स्वतंत्र है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपने जीवन की सीमाओं के भीतर स्वतंत्र है।
पर उस स्वतंत्रता का उपयोग यदि वह हिंसा, अपराध, छल या अन्याय के लिए करता है, तो उसके परिणाम भी उसी को भुगतने होंगे।

संत ने दृढ़ स्वर में कहा—

“इस सृष्टि में जो भी हिंसा हो रही है, जो भी अपराध हो रहे हैं, उनमें ईश्वर की कोई मर्जी शामिल नहीं है।
यह सब मनुष्य द्वारा अपनी स्वतंत्रता के दुरुपयोग का परिणाम है।
ईश्वर ने कर्म करने की शक्ति दी है, पर कर्म का चुनाव मनुष्य स्वयं करता है।”

अंत में संत ने उस प्रसिद्ध कथन का रहस्य खोलते हुए कहा—

“यह सत्य है कि ईश्वर की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।
पर यह भी उतना ही सत्य है कि वह पत्ता कैसे, किस दिशा में और किस वेग से हिलेगा—यह उसकी अपनी स्वतंत्रता है।
और उस दिशा में हिलने से जो भी परिणाम होंगे, अच्छे या बुरे—उन्हें उस पत्ते को ही भुगतना होगा।”

यही ईश्वर की परफेक्टनेस है—
न पूर्ण नियंत्रण, न पूर्ण अराजकता—
बल्कि नियमों के भीतर दी गई स्वतंत्रता,
और स्वतंत्रता के साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारी

Wednesday, July 9, 2025

भौकों , लेकिन काटो नहीं

एक गाँव में महात्मा पधारे। जैसे ही वे गाँव की सीमा पर पहुँचे, देखा कुछ बच्चे मैदान में खड़े हैं लेकिन खेल नहीं रहे। महात्मा ने मुस्कराते हुए पूछा,

"बच्चों, खेल क्यों नहीं रहे?"

एक छोटा बच्चा आगे बढ़ा और बोला,

"महात्मा जी, हमारी गेंद उस पीपल के पेड़ के नीचे चली गई है। वहाँ एक खतरनाक कुत्ता रहता है। जो भी वहाँ गया, वह काटा गया। हम डरते हैं।"

महात्मा ने कहा,
"ओह, डर ने तुम्हारे खेल को रोक दिया है? चलो, मैं देखता हूँ उस डर का क्या हाल है।"

बच्चे उन्हें रोकते रहे, लेकिन महात्मा धीरे-धीरे पीपल के पेड़ की ओर बढ़े। झाड़ियों के बीच से वही कुत्ता निकला—बड़ा, भयंकर, लाल आँखों वाला। वह ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा। लेकिन महात्मा शांत रहे, जैसे हवा में कोई हलचल ही न हो।

कुत्ता हैरान रह गया। कोई तो था जो उससे डर नहीं रहा था।

कुत्ता धीमे स्वर में बोला,
"तुम मुझसे नहीं डरते?"

महात्मा ने मुस्कराकर उत्तर दिया,
"जो किसी को डराता नहीं, उसे डरने की आवश्यकता नहीं होती।"

कुत्ता थोड़ा भावुक हुआ।
"मैं भी अब थक चुका हूँ। सब मुझसे डरते हैं, और मैं सब से। यह जीवन व्यर्थ लगने लगा है। मुझे जीने की कोई राह बताइए।"

महात्मा ने कहा,
"डर से भरा जीवन, जीवन नहीं होता। अगर तुम सच में बदलना चाहते हो, तो किसी को नुकसान पहुँचाना बंद करो। प्रेम और अहिंसा से जियो।"

कुत्ते ने सिर झुका लिया और वचन दिया कि अब वह किसी को काटेगा नहीं।

दिन बीते, महीने गुज़रे। अब कुत्ता शांत हो गया था। वह न किसी को काटता, न भौंकता। गाँव वाले पहले तो चौंके, फिर उसके साथ निर्दयी व्यवहार करने लगे। बच्चे उसे पत्थर मारते, सुई चुभाते, लेकिन वह भाग जाता, कुछ कहता नहीं।

धीरे-धीरे उसका शरीर क्षीण हो गया, और वह एक गुफा में जाकर अकेला रहने लगा। उसका एक ही सपना रह गया था—महात्मा को एक बार फिर देखना।

उसकी प्रार्थना रंग लाई। एक दिन महात्मा फिर गाँव में आए। उन्होंने देखा कि अब वही बच्चे उस पीपल के पेड़ के नीचे खेल रहे हैं। पूछने पर बच्चों ने बताया,
"अब वो कुत्ता डरावना नहीं रहा। अब तो मरने की हालत में है, गुफा में पड़ा है।"

महात्मा उसे खोजते हुए गुफा में पहुँचे। कुत्ता कमजोर और घायल था, लेकिन उन्हें देखकर उसकी आंखों में जीवन लौट आया।

महात्मा ने पूछा,
"तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?"

कुत्ता बोला,
"मैंने आपकी बात मानी। किसी को काटा नहीं, डराया भी नहीं। अब सब मुझे सताते हैं, मुझ पर हँसते हैं, चोट पहुँचाते हैं। पर मैं खुश हूँ कि मैं अहिंसक बना रहा।"

महात्मा की आँखें नम हो गईं। उन्होंने कहा,
"तुमने मेरी बात आधी समझी। मैंने तुम्हें काटने से मना किया था, लेकिन भौंकने से नहीं। अहिंसा का अर्थ यह नहीं कि तुम अपने बचाव का अधिकार खो दो।
जो बिना काटे भी भौंकना जानता है, वही सच्चा अहिंसक होता है।"

महात्मा ने आगे समझाया,
"कभी-कभी जीवन में ऐसा अभिनय भी ज़रूरी होता है, जिससे लोग यह जानें कि हम कमज़ोर नहीं हैं। प्रेम का यह मतलब नहीं कि तुम पीड़ित रहो। प्रेम के साथ विवेक भी ज़रूरी है।"

कुत्ते की आंखों में एक नई चमक आ गई। अब उसने काटना नहीं सीखा, लेकिन भौंकना फिर से शुरू किया। अब कोई उसे तंग करने की हिम्मत नहीं करता।



हमें किसी को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए। प्रेम और अहिंसा के मार्ग पर चलना चाहिए। लेकिन साथ ही, हमें अपनी रक्षा करना भी आना चाहिए। लोग हमें कमज़ोर न समझें, इसके लिए कभी-कभी हमें "भौंकना" भी आना चाहिए — बिना काटे। यह संतुलन ही सच्ची अहिंसा है।

वेवक्त बेसहारा हुआ

 हुकुमत की जंग में रिश्ते, नाते , सच्चाई, जुबाँ की कीमत कुछ भी नहीं होती । सिर्फ गद्दी हीं महत्त्वपूर्ण है। सिर्फ ताकत हीं काबिले गौर होती है। बादशाहत बहुत बड़ी कीमत की मांग करती है। जो अपने रिश्तों को कुर्बान करना जानता है , वो ही पूरी दुनिया पे हुकूमत कर पाता है । औरंगजेब, सिकन्दर, अशोक इत्यादि इसके अनेक उदाहरणों में से एक है । ये महज इत्तिफाक नहीं है कि पूरी दुनिया का मालिक अक्सर अकेला हीं होता है।

वेवक्त बेसहारा हुआ ना सिंहासन का उतारा हुआ,

बड़ी मुश्किल से है उठता विश्वास का हारा हुआ।


तुम दुश्मनों  की  फौज पे अड़े रहे थे ठीक हीं,

घर भी तो देख लेते क्या क्या था बिगाड़ा हुआ।


थी रोशनी से ईश्क तो जुगनू से रखते वास्ता,

कोई अपना भी तेरा क्या जो दूर का सितारा हुआ।


नजरें मिलानी  खुद से आसां  नहीं थी वाइज,

हँसे भी कोई  कैसे फटकार का लताड़ा हुआ?


ये ओहदा ये शोहरतें कुछ काम भी ना आई ,

नसीब का था मालिक नजरों का उतारा हुआ।


थे कुर्बान  रिश्ते  नाते  हुकूमतों  की जंग में,

बादशाह क्या था आखिर तख्त का बेचारा हुआ।


जिक्र-ए-आसमाँ है ठीक पर इसकी भी फिक्र रहे,

टिकता नहीं है कोई धरती का उखाड़ा हुआ।


जश्न भी मनाए कैसे आखिर वो किस बात का,

था सिकन्दर-ए-आजम भी वक्त का दुत्कारा हुआ।

बिछिया

हर गाँव की कोई एक शाम ऐसी होती है, जो वक्त के कैलेंडर में नहीं, यादों की किसी धुँधली खिड़की में अटकी रहती है—जहाँ धूप का रंग फीका होता है, हवाओं में पुरानी कहानियाँ तैरती हैं, और चूल्हे की आँच में किसी की थकी आँखों का सपना सुलगता है। यह कहानी भी एक ऐसे ही गाँव की है — जहाँ माँ की ममता, पिता की निःशब्द जिम्मेदारी, और एक मासूम बालक की आँखों में जलती उम्मीदें हर रोज़ अपने संघर्ष की पाठशाला में दाखिल होती हैं।

यह सिर्फ़ अनिमेश की कहानी नहीं है, जो किताबों के पन्नों के पीछे दुनिया से भागता है, बल्कि यह बिछिया की भी कहानी है — एक अधेड़ औरत, जो हर रोज़ झाड़ू में अपने अपमान को समेटकर घरों की चुप्पियों को साफ करती है।

यह कहानी गरीबी की है, मगर उससे भी ज़्यादा यह एक न्याय-अन्याय के उस सूक्ष्म क्षण की कहानी है — जब एक ग़लतफहमी सिर्फ़ किसी की इज़्ज़त नहीं, उसकी ज़िन्दगी लील जाती है। जब सच्चाई इतनी धीमी हो जाती है कि भीड़ की आवाज़ों में खो जाती है, और एक 'माफ़ी' उम्र भर की कालिख बनकर दिल के किसी कोने में बैठ जाती है।

चार दशकों बाद, जब अनिमेश एक भाषण में “मानवता और नैतिकता” पर बोल रहा होता है, तो मंच से उतरते समय किसी अजनबी  की आँखें उसे अचानक ठिठका देती हैं — वो आँखें, जिनमें कुछ जाना-पहचाना, कुछ अधूरा-सा झलकता है...

कहीं ये... क्या बिछिया की कोई परछाई लौट आई है...?
या...वो माफ़ी... अब भी वक्त की सीढ़ियों पर उसका इंतज़ार कर रही है...?

अध्याय 1: नवम्बर की ठंडी शाम

नवम्बर की वह शाम जैसे वक़्त की मुंडेर पर ठहरी हुई थी।सूरज की आख़िरी किरणें पश्चिम के नीले-पीले आकाश में धीरे-धीरे डूब रही थीं।गाँव के बाहर ऊँचे-ऊँचे यूकेलिप्टस के पेड़, अपनी लम्बी-लम्बी परछाइयाँ ज़मीन पर बिछा रहे थे —और वह परछाइयाँ ऐसी लगतीं, जैसे किसी झुर्रीदार बुज़ुर्ग औरत के हड्डीदार हाथ धीरे से बच्चों के सिर पर साया कर रहे हों,उन्हें ठण्ड से बचा रहे हों, या शायद किसी अनकही दुआ में लपेट रहे हों।

धूल भरी पगडंडियाँ साँझ की हल्की सी नमी में भीगकर चुप थीं।गाँव की कच्ची गलियों से आती गायों की हँकाई, पनघट की बाल्टियों की खनक,और कहीं दूर से आती किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ —ये सब मिलकर उस शाम को और भी ज़्यादा जीवित, मगर उदास बना देते थे।

आँगन में माँ झाड़ू लगा रही थी।झाड़ू की सरसराहट के साथ उड़ी धूल चूल्हे के धुएँ में मिलकर गुम हो जाती थी,और उस धुएँ में भीगी हुई मिट्टी की गंध पूरे घर को एक पुराने उपन्यास की तरह बना देती थी —वह उपन्यास, जिसके हर पन्ने पर बचपन की उँगलियों के निशान थे,जहाँ हर पंक्ति में माँ की डाँट, पिता की सीख, और दादी की कहानियों की गूँज छुपी हुई थी।

इसी घर के एक कोने में, दीवार से सटा हुआ एक छोटा सा कमरा था —वहीं, लकड़ी की पुरानी मेज़ पर झुका बैठा था अनिमेश।दुबली काठी, हल्की भूरी आँखें, साँवला रंग और माथे पर पसीने की महीन बूँदें,जिन्हें उसने शायद खुद भी कभी महसूस नहीं किया था।

मेज़ पर किताबें बिखरी पड़ी थीं —गणित की किताब के ऊपर विज्ञान की कॉपी, और उसके किनारे से झाँकती हिंदी की गाइड।ये किताबें उसके लिए केवल पन्नों का ढेर नहीं थीं —ये उसकी दुनिया की सबसे मज़बूत दीवारें थीं।

“अगर कोई मुझसे पूछे,” अनिमेश अक्सर अपने आप से कहता था,“दुनिया की सबसे मज़बूत जगह कौन-सी है?तो मैं कहूँगा — किताब के पन्नों के पीछे का कोना।वहाँ कोई मेरा पीछा नहीं कर सकता… वहाँ मैं सबसे ज़्यादा सुरक्षित हूँ…”

ये किताबें उसके डर छुपाती थीं — परीक्षा का डर, गलती का डर, और कभी नाकाम होने का डर।ये किताबें उसकी आशाएँ भी संभालती थीं —बड़े होकर कुछ बनने की चाह, माँ-पापा को गर्व महसूस कराने की ख्वाहिश, और उस ख़ुशी की कल्पना,जब परीक्षा में उसका नाम सबसे ऊपर लिखा जाएगा।

नवम्बर की उस शाम ठंड तेज हो चली थी।हवाओं में यूकेलिप्टस के पत्तों की सरसराहट गूँजती थी,जैसे कोई पुरानी कहानी बार-बार दोहराई जा रही हो।

अनिमेश रजाई में घुसा, किताब पर झुका हुआ था।उँगलियाँ ठंड से हल्की-हल्की काँप रही थीं,मगर मन में उसके पिता की आवाज़ हर काँप को रोकने की कोशिश कर रही थी:

“बेटा, आदमी को सबसे ज़्यादा आगे बढ़ाने वाली चीज़ उसकी योग्यता है।पैसा, नाम, शोहरत — सब बाद में आते हैं…”

उसने धीरे से अपनी उँगलियों को रजाई के अंदर गर्म किया,फिर किताब का पन्ना पलटा, और होंठ भींचकर पढ़ाई में डूब गया।

उसके दिल में उस वक़्त एक ही संकल्प था —“माँ-पापा का नाम ऊँचा करूँगा…चाहे ठंड कितनी भी हो, चाहे नींद कितनी भी सताए,मुझे बस पढ़ना है… सीखना है…”

उसने आँखें बंद कीं, तो देखा —माँ की साड़ी का आँचल, पिता का सीधा कंधा, और उनकी उम्मीदों की गठरी, अनिमेश के कन्धों पर रखी हुई थी।

रजाई के अंदर वो गठरी और भी भारी लगती थी —मगर उसके मन ने कहा:“डर मत… ये बोझ नहीं, यही तो तुम्हारी असली ताक़त है…”और यूँ, उस नवम्बर की ठंडी साँझ में,सूरज ढलने के बाद भी,एक मासूम बच्चा, किताबों के पन्नों के बीच,अपनी उम्मीदों की मशाल जलाए बैठा था —ताकि दिसम्बर की परीक्षा में उजाला फैला सके…

अध्याय 2: कामवाली 
 
घर में काम करने आती थी बिछिया — पचास बरस की अधेड़ मुसलमान औरत, झुकी हुई कमर, बिखरे बाल, हाथ में झाड़ू और चेहरे पर गहरी थकन की सिलवटें।

लोग उसे नाम से नहीं, रंग से पुकारते थे — “बिछिया”।काले रंग वाली बिछिया, जिसके कपड़े पुराने और चिथड़े थे, मगर हाथों की सफ़ाई में ज़रा कमी न थी।

उसके हाथ का झाड़ू आँगन में गिरी पत्तियों को भी डराता था।और वह काम करते-करते बीड़ी सुलगाती, धुएँ में जैसे अपना दर्द उड़ा देती।

बिछिया की चुप्पी किसी तिजोरी की तरह थी — बाहर से खामोश, भीतर एक ज्वालामुखी।उसके अपने बच्चे नहीं थे, मगर अनिमेश को देखती तो आँखों में कुछ पिघल जाता।कभी वह अनिमेश की किताबों को उलट-पलट कर देखती — पढ़ नहीं पाती थी, पर पन्नों की ख़ुशबू सूँघ लेती।

माँ (डाँटते हुए):“अरी बिछिया! जल्दी हाथ चलाओ, शाम हो गई!”बिछिया (बीड़ी सुलगाते हुए, हौले से):“हौले हौले भी काम होता है बीबी जी…”

अनिमेश (मुस्कुराकर):“बिछिया, तुम पढ़ नहीं सकती?”

बिछिया:“पढ़ने की क़िस्मत नहीं लिखी बेटा… तेरी क़िस्मत में पढ़ना लिखा है, पढ़ ले…”

बिछिया वहीँ झाड़ू लगाकर जा चुकी थी, आँगन में उसका छाया-सा अक्स रह गया था।
उसे क्या पता था, कुछ हफ़्तों में यही आँगन उस औरत के लिए अदालत बन जाएगा, जहाँ कोई वकील नहीं, सिर्फ़ गुस्से में डूबे लोग होंगे…

अध्याय 3: चुप्पी

गाँव की सबसे पुरानी गली के आख़िर में एक टूटी-फूटी झोंपड़ी थी — जहाँ बिछिया का बचपन बीता था।

उसका असली नाम सुलताना बी था, पर यह नाम गाँववालों की ज़बान से धीरे-धीरे मिट गया।रंग, जात, और ग़रीबी की गर्द ने उसका असली नाम दबा दिया, और रह गई बस एक आवाज़ — “बिछिया”।

बिछिया के पिता, रज्जाक मियाँ, फूस की टट्टी में रहते थे।छोटी सी दुकान चलाते थे, कभी-कभी दूसरों के खेतों में मज़दूरी भी करते।माँ — हलीमा बी — घर पर बकरी पालती, गोबर से उपले थापती।

बिछिया की सबसे पहली यादों में है —माँ का पसीने से भीगा चेहरा और आँखों में थकान की चुप्पी।बकरी का बच्चा जो उसने छुपकर गोद में खिलाया था।और आँगन में पड़े टूटे खिलौने, जिन्हें वह गले से लगाकर सो जाती।

बारह बरस की होते-होते, बिछिया की माँ ने उसे धीरे-धीरे समझाना शुरू किया —“बेटी, हम जैसी औरतों की ज़िंदगी में ख़ुशियाँ नहीं ठहरतीं, मुस्कुराना भी सोच-समझकर…”

माँ की यह बात बिछिया को शुरू में समझ नहीं आई।पर जल्दी ही, उसे ज़िंदगी ने ख़ुद समझा दिया।

पन्द्रह साल की उम्र में उसकी शादी कर दी गई, गाँव से पाँच कोस दूर, चिलचिलाती धूप में।शौहर नाम था इस्माइल मियाँ — उम्र पैंतीस साल।चेहरे पर उगी दाढ़ी, आँखों में हमेशा एक सख़्त परछाई।

शादी के पहले साल बिछिया ने सपने देखे थे —“शायद अब मेरा भी घर होगा, एक प्यारा सा बच्चा…”

मगर किस्मत का नक़्शा कुछ और था।बिछिया की गोद कभी नहीं भरी।

सिर्फ़ दो साल बीते थे, कि इस्माइल मियाँ ने दूसरी शादी कर ली।नई बीवी, उम्र में कम, रंग में गोरी, नाक में सोने की लौंग, कलाई में चूड़ियाँ।

बिछिया की दुनिया वहीं ढह गई —वह चुप रही, मगर उसके भीतर कुछ हमेशा के लिए टूट गया।

नई बीवी ने उसे नौकरानी बना दिया।रसोई से लेकर आँगन तक, घर की हर ईंट पर बिछिया के पसीने के दाग़ थे।

रात को अकेले अपने बिस्तर पर पड़ी रहती — दीवार पर छिपकली रेंगती, छत पर धुंधला सा चाँद, और उसके गाल पर ठंडी आँसू की लकीर।

धीरे-धीरे, बिछिया को एक साथी मिला — बीड़ी।जब भी दिल भारी होता, वह माचिस जलाती, कश खींचती — धुएँ के साथ दर्द भी जैसे बाहर निकलता।

उसकी उँगलियों में बीड़ी की गंध बस गई, बालों में राख की महक।लोग मज़ाक उड़ाते — “बीड़ी पीने वाली औरत!”मगर बिछिया को परवाह नहीं थी — बीड़ी से उसे पल भर की राहत मिलती।

कभी-कभी बीड़ी के लिए पैसे कम पड़ते तो इस्माइल मियाँ की जेब से चुपचाप सिक्का निकाल लेती।दो-तीन बार पकड़ी भी गई।उस दिन बहुत मारा गया, मगर बिछिया फिर भी घर नहीं छोड़ पाई।

“कहाँ जाएगी? दुनिया में किसी औरत की अपनी ज़मीन नहीं होती…”

इस्माइल मियाँ ने कहा — “अब तेरी रोटी तू खुद कमाना!”बिछिया ने आस-पड़ोस में झाड़ू-पोंछा का काम पकड़ लिया।गाँव की गलियों में उसका झुकता बदन, झाड़ू की आवाज़ और बीड़ी का धुआँ रोज़ देखा जा सकता था।

वह पसीने से भीगती, मगर बोलती नहीं थी।उसे चुप रहने की आदत हो गई थी।

बिछिया के मन में एक कोना था, जहाँ उसने अपने सारे सपनों को बंद कर रखा था।कभी-कभी उस कोने से आवाज़ आती:

“माँ बन पाती तो सब बदल जाता…”“गोरी होती तो इस्माइल मुझे छोड़ता नहीं…”

मगर ये आवाज़ें दबा दी जातीं — बीड़ी के कश में, धुएँ में, और झाड़ू की आवाज़ में।

बिछिया (मन ही मन):“मैं भी तो किसी की बेटी थी…”

दूसरी बीवी (तिरस्कार से):“अब तू नौकरानी ही ठीक है, बूढ़ी और काली…”

बिछिया (आँखें झुकाकर):“हाँ बीबी जी…”

उस रात, जब बिछिया अनिमेश के घर से लौटकर टूटी चारपाई पर लेटी,उसने चुपचाप आसमान की ओर देखा। धुंधले चाँद को देखा, जो बादलों के पीछे छुपा था — ठीक उसकी तरह, जो सबके घर में काम करती थी, मगर किसी की ज़िन्दगी में जगह न थी।

और न जाने क्यों, उस दिन उसने ख़ुद से कहा —“ये लड़का, अनिमेश, अलग है… पढ़ता है, मगर किसी से घृणा नहीं करता…”

अध्याय 4: नोटों के भार

ठंड अपने चरम पर पहुँचने लगी थी। हवा में एक अजीब सी नमी थी, जैसे सुबह की ओस अब तक ज़मीन को थामे बैठी हो। पेड़ सूनी शाख़ों के साथ खड़े थे — मानो जीवन की आस छोड़ चुके हों, और पुरानी पत्तियों की याद में गुमसुम खड़े हों।

रसोई की चूल्हे की आँच भी उस सर्द हवा के आगे कमज़ोर पड़ रही थी, मगर माँ के हाथों की ऊष्मा अब भी उतनी ही गाढ़ी और सच्ची थी। माँ की उँगलियाँ पसीने की हल्की महक के साथ बँधी हुई रस्सी जैसी थीं, जो परिवार की ज़िम्मेदारियों को थामे रखती हैं।

माँ को जाते-जाते रुकना पड़ा — जैसे दिल ने कहा हो, “अभी कुछ बहुत ज़रूरी रह गया है।” उन्होंने अपनी पुरानी किनारीवाली साड़ी के पल्लू की तह से दो हज़ार रुपये निकाले। वो नोट थोड़े से मुड़े हुए थे, जैसे वक्त के थपेड़ों ने उन्हें भी झुकना सिखा दिया हो।

माँ ने उन नोटों को थामे-थामे कुछ पल तक देखा। उनकी आँखों में खेत की सूखती फसलें, घर का खर्च, और गाँव के छोटे चाचाजी की चिंताएँ तैर गईं। फिर बहुत धीमी, लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा:

“बेटा, ये रुपये संभालकर रखना — गाँव के छोटे चाचाजी को दे देना। खेत में दवा डालनी है, फसल सूख रही है। ये रुपये बहुत ज़रूरी हैं।”

उस वक़्त उनकी आवाज़ में माँ कम, और जीवन की थकी हुई परिपक्वता ज़्यादा थी। जैसे उनके शब्दों में हर वह चिंता गुँथी हो, जो किसी भी किसान परिवार की पीढ़ियों से होती आई है — सूखा, महंगाई, मौसम की बेरुख़ी और समय की मार।

अनिमेश ने काँपते हाथों से वो नोट पकड़े। उस छोटे से हाथ में अचानक ज़िम्मेदारी का भार आ गिरा था — इतना भारी कि उसकी हथेलियों में पसीना छलक आया।

नोटों की खुशबू में उसे मिट्टी की महक महसूस हुई — उस मिट्टी की, जिसमें उसके पूर्वजों के पसीने की सोंधी गंध थी। उसमें धूप से झुलसी मेहनत की महक थी, और कहीं गहराई में एक अनजाना डर भी था।

“कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए…”

उसका दिल जोर-जोर से धड़क उठा।

माँ का हाथ अपने बालों पर महसूस कर, उसने धीरे से कहा:“चिंता मत करो माँ…”

मगर उसकी आवाज़ में आत्मविश्वास से ज़्यादा डर था, और माँ की आँखें वो डर पढ़ भी सकीं, पर कुछ बोली नहींं — जैसे जानती हों कि कुछ डर ऐसे होते हैं, जिनसे बेटा खुद ही लड़कर बड़ा होता है।

वो धीरे से पलटा, और रुपये को अपनी किताब के पन्नों के बीच रख दिया — वही किताब जो अब तक उसके लिए बस अक्षरों का संसार थी, अब अचानक एक तिज़ोरी बन गई थी।

पन्नों में छुपे वो नोट अब उसे अपनी सांसों से भी कीमती लगने लगे।उसने किताब को छाती से लगाया — जैसे किसी गुप्त ख़जाने को सीने में छुपा लिया हो।

रात का आकाश धीरे-धीरे गहराने लगा। आँगन में चाँदनी ऐसे बिछ गई थी, जैसे किसी ने दूध का कटोरा उलट कर ज़मीन को सर्द सफ़ेद चादर ओढ़ा दी हो।

गाँव की गलियों से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आती, और फिर उसी तेज़ी से ख़ामोशी लौट आती — जैसे पूरी रात कोई अदृश्य पहरेदार बनकर सब पर नज़र रख रहा हो।

अनिमेश रजाई में दुबककर पढ़ने लगा।उसके इर्द-गिर्द किताबों का ढेर था — गणित की मुश्किल संख्याएँ, विज्ञान के सूत्र, हिंदी की कहानियाँ।

मगर उन पन्नों में सबसे कीमती वो दो हज़ार रुपये थे — जिनके बोझ ने उसके बचपन को एक पल में किशोर कर दिया था।

रात के सन्नाटे में उसे माँ की थकी हुई खाँसी सुनाई दी, जो बार-बार रुक-रुककर आती — जैसे माँ का शरीर कह रहा हो, “अब और नहीं…”

पिता की धीमी आवाज़ भी आती — किसी काम की चर्चा, खेत के हालात की चिंता।

ये सब आवाज़ें उसके लिए जानी-पहचानी थीं — मगर आज वो अनजानी-सी भी लग रही थीं। आज वो सिर्फ़ आवाज़ें नहीं थीं, आज वो ज़िम्मेदारियों की याद दिलाती घंटियाँ थीं।

अनिमेश की आँखें थकीं, और एक बार फिर उस किताब की ओर उठीं, जिसमें नोट छुपाए हुए थे।
एक क्षण को उसे लगा, वो नोट उस पर भी नज़र रखे हुए हैं — जैसे वो कह रहे हों, “हम पर भरोसा रखना… कहीं भूल मत करना…”

आँखें धीरे-धीरे भारी होने लगीं।थकान और डर का मिला-जुला बोझ उसकी पलकों को बंद कर रहा था।“कल सुबह देखूँगा… सब ठीक होगा…”

यह सोचते-सोचते, नोटों के भार और किताबों की खुशबू के बीच, अनिमेश नींद की आगोश में चला गया।

चाँद आँगन में चुपचाप चमकता रहा — जैसे गवाही देने के लिए कि उस रात उसने देखा, एक मासूम बच्चे के डर और भरोसे की सबसे सच्ची तस्वीर।

अध्याय 5: हलचल

सुबह जैसे ही गाँव की गलियों में सूरज की पहली रोशनी उतरी,उसके साथ ही हवा में रसोई के धुएँ और गोबर के चूल्हों की मिली-जुली गंध तैरने लगी।

मुर्गे की बांग ने रात के सन्नाटे की चादर को फाड़कर रख दिया,और गली के कुत्ते उस आवाज़ पर कुछ पल भौंक कर चुप हो गए —जैसे सबने मिलकर मान लिया हो कि अब दिन शुरू हो गया है।

माँ की चाय उबालने की आवाज़,पानी से बर्तन धोने की खटपट,पिता के गले की हल्की खाँसी,और दूर कहीं से आती बैल के गले में बँधी घंटी की टन-टन —इन सबने मिलकर एक परिचित सा संगीत रचा,जो हर सुबह घर को ज़िंदा कर देता था।

अनिमेश की नींद टूटी।उसने रजाई में से आधा चेहरा बाहर निकाला।ठंड अब भी चुभ रही थी, मगर आज उसे ठंड से ज़्यादा किसी और चीज़ ने जगाया था —वो याद, कि दो हज़ार रुपये किताब में रखे हैं।“जरा देख लूँ…”

उसने किताब पलटी,फिर दूसरी, फिर तीसरी…चेहरे की रंगत बदलने लगी — जैसे किसी ने दिल पर बर्फ़ रख दी हो।

किताब के पन्ने खरखराए,मगर नोट की मुलायम सी सनसनाहट कहीं नहीं आई।

आँखें फैल गईं। दिल ज़ोर से धड़कने लगा — जैसे सीने में बँधी ढोलक बज रही हो।“नहीं… कहीं तो होंगे… शायद कल दूसरी किताब में रख दिए हों…”

उसने फिर पलटा।उसका हाथ काँपने लगा।सर्द हवा अब बदन के पार होने लगी थी।हर बार पन्ना पलटते हुए उसे वो पल याद आ रहा था,जब माँ ने रुपये थमाए थे —

वो शब्द:“ये रुपये बहुत ज़रूरी हैं बेटा…”

और उसने कैसे कहा था —“चिंता मत करो माँ…”

अब चिंता उसकी रग-रग में उतर चुकी थी।माथे पर पसीना था, हाथ ठंडे थे, और दिल जैसे सूखता जा रहा था।

कुछ ही पलों में घर के बाकी लोग भी जाग गए।माँ ने आवाज़ दी:“अनिमेश! बेटा, वो रुपये दे देना, चाचाजी आते ही होंगे।”

ये सुनते ही उसकी टाँगें जैसे जड़ हो गईं।कंठ सूख गया।उसने होंठ खोले, पर आवाज़ न निकली।

माँ आकर खड़ी हो गईं।उनकी आँखों में भरोसे की चमक थी — वो भरोसा जिसे तोड़ने की कल्पना भी अनिमेश ने कभी नहीं की थी।

उसने धीमी आवाज़ में कहा:“माँ… वो… रुपये… नहीं मिल रहे…”

माँ की आँखों में एक पल को हैरानी तैर गई,फिर चिंता की रेखाएँ खिंच गईं।“क्या? कैसे? कहाँ रखे थे?”

बिस्तर के नीचे, तकिये के अंदर, किताब के हर पन्ने, हर पुरानी कॉपी…माँ, पिता और अनिमेश — तीनों खोज में जुट गए।

हर पन्ना पलटते हुए अनिमेश का दिल डूबता गया।हर बार लगता, “शायद अब मिल जाए…” —पर अगली ही बार दिल पर चोट होती: “नहीं…”

उसने माँ की आँखों में मायूसी देखी।पिता की आँखों में चुपचाप चिंता थी।उन्होंने कुछ नहीं कहा, मगर चुप्पी बोल रही थी।ये चुप्पी तीर बनकर उसके बालमन में धँस गई।“माँ-पापा मुझसे नाराज़ तो नहीं?… सब मेरी ग़लती है… सब…”

उसकी उम्र छोटी थी, मगर मन पर आया बोझ उम्र से बड़ा था।उसे लग रहा था जैसे उसने सिर्फ दो हज़ार रुपये नहीं, माँ का भरोसा और पिता की उम्मीद खो दी हो।

ख़ुद को कोसता जा रहा था:“मुझे और ध्यान रखना चाहिए था… मैंने लापरवाही की…”

उसी बीच आँगन से आवाज़ आई —गाँव के छोटे चाचाजी आ गए थे, जो वो रुपये लेने आए थे।माँ बाहर निकलीं।माँ की आवाज़ काँपी, फिर भी धीमी रही:“भैया… रुपये… नहीं मिल रहे…”

चाचाजी चुप रहे।उनकी आँखों में कुछ पल के लिए आश्चर्य था, फिर चिंता उतर आई।कुछ देर बाद पिता ने अपने पर्स से दो हज़ार रुपये निकालकर चाचाजी को दे दिए।

बात वहीं ख़त्म नहीं हुई —घर की हवा अब बदल चुकी थी।

अनिमेश का मन और भी संकुचित हो गया।उसके लिए किताबें भी भारी लगने लगीं, और पन्ने काँटों जैसे चुभने लगे।

माँ चुप थीं।माँ की चुप्पी किसी डाँट से ज़्यादा डरावनी थी।वो वो शब्द थे, जो बोले नहीं गए — मगर महसूस हुए।

अध्याय 6: शक की सुई

अनिमेश पर शक करना जैसे किसी ने सोचा भी नहीं—वह लड़का जो पूरी सर्दी में किताबों से चिपका रहता था, जो स्कूल में सबसे आगे था, जिस पर उसके पिता को गर्व था। शक की सुई घूमती-घूमती उस पर जा ठहरी, जो हमेशा से निशब्द थी, निरीह थी—बिछिया

धीरे-धीरे घर में और बाहर बात फैलने लगी।लोगों की आवाज़ें फुसफुसाहट में बदल गईं —“कहीं बिछिया ने तो…?”“अरे वो तो… पहले भी…”

और बिछिया — वो जो रोज़ झाड़ू-पोछा करती थी —वो शक की दीवार के उस पार खड़ी कर दी गई।

इस एक सुबह ने, उस दो हज़ार रुपये की क़ीमत से कहीं ज़्यादा,अनिमेश के दिल में एक ऐसा डर बो दिया,जिसकी जड़ें बहुत गहरी थीं —भरोसे का डर, खोने का डर, और अपने कारण किसी निर्दोष पर आघात का डर।

बिछिया रोज़ की तरह आई।उसके हाथ में वही पुरानी झाड़ू, पीठ पर पुरानी शॉल — जो ठंड रोकने की नाकाम कोशिश करती थी।मुँह पर बासी मुस्कुराहट,और आँखों में थकी हुई लकीरें —जैसे उसकी ज़िंदगी की झाड़ू ने उसके दिल को भी बिखेर कर रख दिया हो।

मगर आज माहौल कुछ बदला हुआ था।माँ की नज़रें पल–भर के लिए बिछिया पर अटक गईं —और वही एक पल बिछिया को भीतर तक चुभ गया।

माँ ने कुछ कहा नहीं।बिछिया के कानों में बस उस एक पल की खामोशी गूँजती रही।“क्या मैं… सच में चोर लगती हूँ?”

काम करते हुए उसका मन भाग कर अतीत में चला गया।वो दिन याद आया जब उसने अपने पति के जेब से दो रुपये चुराए थे —सिर्फ़ बीड़ी के लिए।उस दिन के बाद उसके पति की घृणा ने उसे हर दिन खा लिया था।

अब लगता था कि उसी एक पाप की सजा अब तक मिल रही है।“मेरी काली किस्मत… जहाँ जाती हूँ, चोर ही कहलाती हूँ…”

उसी बीच पड़ोस की औरतें आँगन में हँस–हँस कर बातें कर रही थीं —मगर हर हँसी में एक कील छुपी हुई थी।

“अरे, बिछिया पर तो पहले भी चोरी का इल्ज़ाम लगा था…”“काली है, बीड़ी पीती है… भरोसा कौन करे…”“मुँह पे तो कुछ कहेंगे नहीं, पर सच तो सबको पता है…”

ये शब्द उसके कान में नाग की तरह फुफकारते रहे।उसने घर के कोने में जाकर मुँह छुपा लिया।बीड़ी के लिए माचिस जलाते हाथ काँप गए।आँखें भर आईं।

“हे अल्लाह… मैं तो अब बीमार भी रहती हूँ… हिम्मत भी नहीं रही… फिर भी लोग…”बीड़ी का कड़वा धुआँ उसकी आँखों को जलाता रहा,मगर दिल की जलन उससे कहीं तेज़ थी।

धीरे–धीरे लोग भी घर में आकर सलाह देने लगे।गाँव का चौकीदार आया, बोला:“देखिए, ग़रीब घर में रखी चीज़ पर निगाह जल्दी पड़ती है… काम वाली पर ही नज़र रखिए…”

दूसरी औरत ने कहा:“बिछिया की आदतें तो सब जानते हैं… भगवान ही बचाए…”

कोई बोला:“उसके पास से बीड़ी का ढेर मिला… रुपया आया कहाँ से?”

अनिमेश को ये सब सुनकर और डर लगने लगा।वो अपने कमरे में बैठकर किताबों को घूरता रहा —जैसे उनसे जवाब माँग रहा हो। दिल में खटका हुआ —“कहीं… कहीं मेरी वजह से…?”मगर मासूम दिल को समझ नहीं आता था कि शक की आग कितनी तेज़ होती है —और उसमें कोई भी जल सकता है।

रात ढलने लगी।चाँदनी फिर से आँगन में उतरी,मगर आज वो दूध जैसी नहीं, राख जैसी लग रही थी।बिछिया की परछाईं दीवार पर लंबी होती चली गई —जैसे उस पर लगा इल्ज़ाम उसके पीछे–पीछे चलता हो,और उसे कभी चैन से जीने न दे।

अध्याय 7: मंदिर का घंटा

गरीबी, शक और समाज के द्वेष का त्रिकोण बहुत पुराना है।यह त्रिकोण वैसा ही है जैसे किसी पुराने कुएँ में गिरी हुई कोई पुरानी बाल्टी — जिसे हज़ार बार ऊपर खींचा गया, पर हर बार खाली निकली। उसमें जो भरा होता है, वो सिर्फ़ एक गंध होती है — कुंठा, अभाव और अधजल।

बिछिया के साथ भी वही हुआ — जैसे ही लोगों को पैसे ग़ायब होने के बात की पता चला, मोहल्ले की दीवारें बोल उठीं।

नहीं, सही कहें तो दीवारें नहीं, दीवारों की दरारों में छिपे हुए शक के साँप फुँफकार उठे।

फुसफुसाहटों की वह धीमी आवाज़ पहले आँगन में गूँजी —“हो न हो, बिछिया ने ही चुराए होंगे!”

यह वाक्य नहीं था — यह एक सामाजिक शंखनाद था। जैसे ही यह गूंजा, सबने अपने-अपने भीतर छिपे 'न्यायाधीश' को बाहर निकाल लिया।

अब बिछिया न कोई औरत थी, न कोई इंसान।

वह सिर्फ़ एक सुविधाजनक दोषी थी — एक ऐसी मूरत जिस पर हर कोई अपनी भड़ास, असफलता और अभाव की कालिख पोत सकता था।

जैसे मंदिर का घंटा सबके लिए बजता है,बिछिया भी पूरे मोहल्ले का घंटा बन गई —जिसे जब मन किया, बजा दिया।

रिश्तेदारों को वर्षों पुरानी जलन याद आ गई —

किसी को बिछिया का "बिना मर्द के भी मुस्कराना" खलता था,

किसी को उसका दूसरों से ‘कम बोलना’ संदेहास्पद लगता था।

कामवाली, जो कभी उसके साथ बैठकर चूल्हे पर रोटियाँ सेंकती थी, अब उसकी पीठ पीछे कहने लगी —

“हमेशा अलग-थलग रहती थी, ज़रूर कुछ न कुछ गड़बड़ है।”

फिर भीड़ का मनोविज्ञान सक्रिय हुआ —जिसे मनोवैज्ञानिक “Projection of Personal Frustration on the Weakest” कहते हैं —

हर किसी ने अपनी मन की गांठें बिछिया पर खोल दीं।

किसी को अपने पति से गुस्सा था,

किसी को अपने बेटे की बेरोज़गारी साल रही थी,

किसी को अपनी बेटी का अधूरा सपना कचोटता था,

और किसी को हर महीने की कम पगार से आत्मसम्मान कुचलता महसूस होता था।

पर अफ़सोस! इन सबका समाधान समाज को एक बलि की बकरी चाहिए थी — और बिछिया सबसे आसान निशाना थी।

उसे बुलाया गया —न कानून, न सुनवाई, न गवाह —बस भीड़, आँखें, और फुसफुसाहटों का गठजोड़।

उससे पूछा गया,

फिर दोबारा पूछा गया,

फिर आवाज़ ऊँची की गई,

फिर ज़बान तेज़ हुई,

फिर हाथ बढ़े —

उसकी झोंपड़ी खँगाली गई,

बिस्तर की तहें उधेड़ी गईं,

जेबें टटोली गईं,

कपड़े तक उतरवा लिए गए।

और मिला क्या?

बीड़ी के आठ-दस पुराने पैकेट।

बस — यही बन गया न्याय का आधार।

लोगों ने नतीजा सुना दिया —

“देखा? चोर है! बीड़ी की लत ने बिगाड़ दिया।”

कोई नहीं पूछता कि बीड़ी पीना चोरी का प्रमाण कैसे हो सकता है।

कोई नहीं सोचता कि बीड़ी का वह कश एक ग़रीब की आत्मा पर लगी राख को ढँकने की कोशिश हो सकती है —

एक पल का सुकून, उस बदन के लिए जो हर दिन सौ गालियाँ, सौ अपमान और सौ झूठे वादे सहता है।

पर तर्क?

भीड़ के न्याय में तर्क की जगह नहीं होती।

वहाँ सिर्फ़ भावना चलती है —

और भावना भी नहीं,

बल्कि “सामूहिक कुंठा का न्याय”।

जिस समाज में हर दूसरा इंसान किसी न किसी वजह से टूटा हो,

वहाँ टूटे हुए पर पत्थर फेंकना आसान हो जाता है।

बिछिया की टूटन लोगों को अपनी जैसी लगी —

और किसी का खुद जैसा टूटना लोगों को सबसे ज़्यादा अखरता है।

यह घटना उस गाँव के इतिहास में दर्ज नहीं हुई।

अख़बारों में नहीं छपी।

पुलिस में कोई रिपोर्ट नहीं बनी।

क़ानून की कोई धारा नहीं टूटी।

पर जो टूटा — वह एक स्त्री का आत्मसम्मान था।

और समाज?

समाज ने अगले दिन वही किया जो वह हर बार करता है —

“भूल जाना।”

लज्जा:

दिसम्बर आया। परीक्षा आयी और चली गई । जनवरी में रिजल्ट भी आ गया। अनिमेश स्कूल में फर्स्ट आया था। अनिमेश के पिताजी ने खुश होकर अनिमेश को साईकिल खरीद दी । स्कूल में 26 जनवरी मनाने की तैयारी चल रही थी । अनिमेश के मम्मी पापा गाँव गए थे। परीक्षा के कारण अनिमेश अपने कमरे की सफाई पर ध्यान नहीं दे पाया था। अब छुट्टियाँ आ रही थी। वो अपने किताबों को साफ़ करने में गया । सफाई के दौरान अनिमेश को वो 2000 रूपये किताबों के नीचे पड़े मिले। अनिमेश की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। तुरंत साईकिल उठा कर गाँव गया और 2000 रूपये अपनी माँ माँ को दे दिए।

बिछिया के बारे में पूछा। मालूम चला वो आजकल काम पे नहीं आ रही थी। परीक्षा के कारण अनिमेश को ये बात ख्याल में आई हीं नहीं कि जाने कबसे बिछिया ने काम करना बंद कर रखा था। अनिमेश जल्दी से जल्दी बिछिया से मिलकर माफ़ी मांगना चाह रहा था। वो साईकिल उठाकर बिछिया के घर पर जल्दी जल्दी पहुँचने की कोशिश कर रहा था । उसके घर का पता ऐसा हो गया जैसे की सुरसा का मुंह । जितनी जल्दी पहुँचने की कोशिश करता , उतना हीं अटपटे रास्तों के बीच उसकी मंजिल दूर होती जाती।खैर उसका सफ़र आख़िरकार ख़त्म हुआ। उसकी साईकिल बीछिया के घर के सामने रुक गई । उसका सीना आत्म ग्लानि से भरा हुआ था । उसकी धड़कन तेज थी । वो सोच रहा था कि वो बिछिया का सामना कैसे करेगा। बिछिया उसे माफ़ करेगी भी या नहीं । उसने मन ही मन सोचा कि बिछिया अगर माफ़ नहीं करेगी तो पैर पकड़ लेगा। उसकी माँ ने तो अनिमेश को कितनी हीं बार माफ़ किया है । फिर बिछिया माफ़ क्यों नहीं करेगी ? और उसने कोई गलती भी तो नहीं की। तभी एक कड़कती आवाज ने उसकी विचारों के श्रृंखला को तोड़ दिया । अच्छा ही हुआ, उस चोर को खुदा ने अपने पास बुला लिया। ये आवाज बिछिया के पति की थी । उसके पति ने कहा , खुदा ने उसके पापों की सजा दे दी । हुक्का पीते हुए उसने कहा, 2000 रूपये कम थोड़े न होते हैं बाबूजी । इतना रुपया चुराकर कहाँ जाती । अल्लाह को सब मालूम है । बिछिया को टी. बी. हो गया था। उस चोर को बचा कर भी मैं क्या कर लेता। और उसपर से मुझे परिवार भी तो चलाना होता है।

अध्याय 9: कालिख

बिछिया के पति ने बिछिया की रामकहानी कुछ यूँ बयाँ की ।

उस घटना के बाद सर्दी ने जैसे बिछिया की साँसों पर बर्फ की परत चढ़ा दी थी।उसका झुर्रियों से भरा चेहरा और भी मुरझा गया।बीड़ी के धुएँ ने फेफड़ों को खोखला कर डाला —अब हर सुबह खाँसी का ऐसा दौरा पड़ता, जैसे सीने में कोई शूल चुभ रहा हो।

गाँव की गलियों में उसका झुका हुआ कद, काँपते हाथ,और बार-बार रुक-रुक कर ली जाने वाली साँसें देखने वाले को भी दया से ज़्यादा डर दे जातीं।

“अल्लाह… अब कितना बचा है मेरे पास…”उसने कई बार सोचा, मगर फिर खाँसी के साथ सब धुँधला हो जाता।

जिन गलियों से रोज़ गुजरती थी,वहीं अब कानों में फुसफुसाहटें घुल जातीं: यही है वो… चोर औरत…”“बीड़ी की लत ने बर्बाद कर दिया…”

घर की औरतें बर्तन धोते-धोते मुँह फेर लेतीं।बच्चे उँगली दिखा कर हँसते:“बिच्छू आ गई…”

उसका नाम अब “बिछिया” नहीं,महज़ एक ताना बन चुका था —जिसे कोई भी, कभी भी, मज़ाक में उछाल देता।

बिछिया बेचारी अकेली घुट घुट कर जी रही थी। अकेलेपन में उसे बिड़ी का साथ मिला। बिड़ी पीकर वो अपने सारा गम भुला देती। अधेड़ थी बिछिया । कितना अपमान बर्दास्त करती ? मन पे किए गये वार तन पर असर दिखाने लगे। उपर से बीड़ी की बुरी लत। बिछिया बार बार बीमार पड़ने लगी थी। खांसी के दौरे पड़ने लगे थे। काम करना मुश्किल हो गया। घर पे हीं रहने लगी। हालांकि उसके पति ने अपनी हैसियत के हिसाब से उसका ईलाज कराया। पर ज़माने की जिल्लत ने बिछिया में जीने की ईक्छा को मार दिया था। तिस पर से उसके पति की खीज और बच्चों का उपहास। बिछिया अपने सीने पे चोरी का ईल्जाम लिए हुए इस संसार से गुजर गई थी।

अध्याय 9: रुकी हुई माफ़ी 

अनिमेश सीने में पश्चाताप की अग्नि लिए घर लौट आया। उसके पिताजी ने पूछा , अरे ये साईकिल चला के क्यों नही आ रहे हो ? ये साईकिल को डुगरा के क्यों आ रहे हो? दरअसल अनिमेश अपने भाव में इतना खो गया था कि उसे याद हीं नहीं रहा कि वो साईकिल लेकर पैदल हीं चला आ रहा है। उसने बिछिया के बारे में तहकीकात की।

बिछिया अब इस दुनिया में नहीं थी। बिछिया की मृत्यु का कारण सिर्फ़ टी.बी. नहीं था; उसकी आत्मा पर लगे उस दाग़ ने उसे तोड़ दिया था, जो वह कभी धो नहीं पाई।

अनिमेश की माफ़ी, जो वह अपने दिल में लिए आया था, अब हवा में तैरती रह गई। वह न रो सका, न कुछ कह सका—बस भारी कदमों से वापस लौट आया।

समय बहता रहा — जैसे गाँव के तालाब में हर बरसात के बाद पानी का रंग थोड़ा बदल जाता है, वैसे ही ज़िन्दगी भी रंग बदलती रही।

अनिमेश बड़ा हुआ, पढ़ा, निकला, आगे बढ़ा — वह शहर गया, नौकरियों में आया, नाम कमाया।वह शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत है, समाजसेवा से जुड़ा है, और अपने गाँव के लिए पुस्तकालय और स्कूल भी खुलवाया है।  

आज वह गाँव के प्रतिष्ठित विद्वानों में गिना जाता है — न्याय, नैतिकता और संवेदनशीलता पर उसके व्याख्यान सुने जाते हैं। किंतु जब भी वह 'चरित्र निर्माण' या 'मानव मूल्य' की बात करता है, तो बिछिया की सूरत एक पल को उसकी आँखों के आगे तैर जाती है — वह टूटी चारपाई, वह झुर्रियों से भरा चेहरा, और वह मौन जो कभी टूटा नहीं, सिर्फ़ बुझ गया।

अनिमेश जानता है — उसने जानबूझकर कुछ नहीं किया था। पर कभी-कभी वक्त सबसे बड़ी सज़ा उसी की सजा देता है जिससे अंजाने में हीं सही ऐसी चूक हो जाती है ,जो उसकी आत्मा को द्रवित करती रहती है— और वो चूक होती है "समय पर सच को पहचान न पाना।"

 उसकी स्मृति पटल के एक कोने के भीतर अब भी अँधेरा है जहाँ बिछिया का चेहरा धुँधले धुँधले बादलों की तरह तैरता है, और उसकी अंतरात्मा के भीतर एक पुकार हमेशा गूंजती रहती है : "माफ़ करना!"

वह माफ़ी, जो कभी बिछिया तक नहीं पहुँच पाई।वह माफ़ी, जो आज भी अधूरी है। और यही अधूरापन उसकी आत्मा को आज भी चुपचाप कचोटता है।

समर्पण

सुबह का वक्त था।  राजा महेंद्र सिंह राठौड़ अपने रथ में बैठकर रानी अरुणिमा सिंह के साथ नौका विहार हेतु अपने महल से बाहर जा रहे थे। अपनी रानी के साथ वो अकेले समय व्यतीत करना चाह रहे थे। इसलिए 2-4 विश्वासपात्र सेवकों को ही साथ रखा था। घोड़े द्रुत गति से आगे बढ़े चले जा रहे थे। आस पास का दृश्य बड़ा ही मनोरम था।अचानक रथ के पहिए की कील निकल गई। आस पास नजदीक कोई बनाने वाला था भी नही। दोनों को अपने रथ से नीचे उतरना पड़ा।

अभी धूप चढ़ ही रही थी। दोपहर तक रथ के ठीक होने की उम्मीद थी। रानी पास ही शाही शिविर लगाकर आराम करने लगी। राजा महेंद्र सिंह अपने घोड़े पे बैठकर आस पास घूमने लगे। चारो तरफ चिड़ियाँ चहचहा रही थीं। फूलों की खुशबू से वातावरण सुगंधित हो उठा था। राजा ने रानी से अपने साथ घोड़े पर चलने को कहा। रानी आराम करना चाह रही थी। इच्छा नही होने पर भी राजा की भावना का सम्मान करते हुए घोड़े पर बैठ गई। दोनों साथ साथ चलते 2-3 मील आगे बढ़ आये। पास ही एक मनोरम तालाब था। राजा उस तालाब में उतरकर जल क्रीड़ा का आनंद लेने लगे। रानी दोपहर के जलपान की व्यवस्था को देखने के लिए वापस शिविर में लौट आयी।

राजा के सेवक उनसे दूर चले गए ताकि उनकी जल क्रीड़ा में व्यवधान ना पहुँचे। काफी सुकून मिल रहा था राजा को। अचानक उनको लगा किसी ने जल में उनके पैरों को छुआ। राजा को लगा शायद किसी जलीय पौधे से उनके पैर का स्पर्श हुआ है। वो नजर अंदाज करके फिर तालाब में जल क्रीड़ा का आनंद लेने लगे। थोड़ी देर में फिर ऐसा लगा किसी ने उनके भुजा को स्पर्श किया हो। राजा का मन आशंकित हो उठा। वो तुरंत तालाब के किनारे जाने की कोशिश करने लगे। थोड़ी देर में लगा किसी ने उनको अपनी बाहों में जकड़ लिया। राजा की धड़कने तेज हो उठी। फिर उन्होंने देखा उनको एक खूबसूरत जलपरी ने अपनी बाहों के घेरे में जकड़ रखा था। उसकी आँखों में प्रणय निवेदन था। राजा का मन चंचल हो उठा। अचानक तालाब में अनेक जलपरियाँ दृष्टिगोचित हो उठी। सबकी आंखों में राजा के प्रति प्रणय निवेदन था। राजा घबरा उठे। रानी को जोर जोर से चिल्लाकर बुलाने लगे। 

अचानक उनकी नींद खुल गयी। रानी को अपने पास देख कर उन्हें बड़ा अच्छा लगा। जब रानी ने उनसे घबराने का कारण पूछा तो राजा ने अपने सपने की बात बता दी। रानी हंसने लगीं, बोली मर्दों के सपनों में चुड़ैलें परियाँ बनकर आती हैं। 

राजा ने पूछा: क्या आपके सपने में पर पुरुष आते हैं ?

रानी: हाँ देवता हैं, पिता आते हैं, गुरुदेव आते हैं।

राजा: नही नही, प्रणय निवेदन के साथ कोई पर पुरुष आता है क्या ?

रानी की भृकुटि तन गई। गुस्साते हुए उन्होंने उत्तर दिया: महाराज आपने मुझे पुरुष समझ रखा है क्या ? मेरे सपने में भी आपके अलावा किसी पर पुरुष को प्रणय निवेदन के साथ आने की अनुमति नही है।

राजा दुखी हो उठे। वो अपनी पत्नी को बहुत प्रेम करते थे। उन्हें अपनी पत्नी का उत्तर सुनकर गर्व हुआ साथ ही स्वयं के सपने की बात याद कर ग्लानि भी हुई। उनके मन में अनगिनत शंका के बादल मंडराने लगे। क्या वो कामी है ? क्या उनका प्रेम रानी के प्रति झूठा है ? क्या वो इतने कमजोर हैं कि सपनों में दूसरी स्त्रियों को आने की इजाजत दे देते हैं ?

राजा को शांत देख कर रानी ने अपने पति के मन में उठते शंका के बादल को भांप लिया।

 रानी ने कहा: महाराज उदास न हों। पुरुष स्वभावतः ही चंचल होते हैं, जबकि स्त्रियां दृढ़ प्रतिज्ञ और स्थिर। 

राजा ने पूछा: क्या ये सत्य है ?

रानी: हाँ महाराज, देखिए रावण, दुर्योधन आदि ने हमेशा से स्त्रियों को वासना की नजर से देखा है। पुरुष ही स्त्रियों के पीछे भागते है। स्त्रियाँ पुरुष के पीछे नही भागती। ये प्रकृति का अंग है। 

एक शादी शुदा स्त्री अपने पति के प्रति स्वभावतः समर्पित होती हैं। जबकि पुरुष के साथ ऐसा नही है। माता गांधारी के बारे में सर्व विदित है कि महाराज धृतराष्ट्र के अंधा होने के कारण उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध लिया, पर जब गांधारी गर्भवती हुई तो महाराज धृतराष्ट्र ने एक दासी के साथ सहवास कर एक पुत्री का जन्म दिया, जिसका पति जयद्रथ था।

राजा: पर द्रौपदी के तो पाँच पाँच पति थे। फिर आप कैसे कह सकती हैं कि स्त्रियाँ स्वभावतः एक मार्गी होती हैं ?

रानी: महाराज आपको ज्ञात है , स्वर्गोरण के दौरान जब द्रौपदी मरणासन्न हुई तो युधिष्ठिर ने उसका कारण क्या बताया था ? चूँकि द्रौपदी सिर्फ अर्जुन को प्यार करती थी इसलिए उसने पांच पति धर्म का पालन सही तरीके से नही किया था। महाराज द्रौपदी ने सिर्फ अर्जुन का वरण किया था, इसीलिए पांच पतियों के थोपे जाने के बावजूद सिर्फ अर्जुन को प्यार करती रही। स्त्रियाँ स्वभावतः एक मार्गी ही होती हैं। 

आप देखिए आपने सिर्फ द्रौपदी का उदाहरण दिया। यहाँ तो भगवान श्रीकृष्ण 16,000 से ज्यादा स्त्रियों के साथ शादी करते हैं और तो और अर्जुन ने 4-4 शादियाँ की थी। भीम ने 3, तो युद्धिष्ठिर, नकुल और सहदेव ने 2-2 शादियाँ की थी। मैं पुरुष की निंदा नही कर रही बल्कि वास्तविकता बता रही हूँ महाराज।

राजा : पर कुंती ने भी तो सूर्य, इंद्र और अश्विनी कुमारों से सहवास किया था।

रानी : पर वो तो अपनी पति की आज्ञा और सहमति से। कर्ण का जन्म तो खेल खेल में हो गया था। कुंती का मन चंचल तो नही था। पुरुष का मन तो चंचल होता ही है। इसीलिए जब जब कोई भी पुरुष तपस्या करता है तो अप्सराएँ भेजी जाती हैं, ध्यान भंग करने के लिए। विश्वामित्र और मेनका इसके जीते जागते उदाहरण है परन्तु जब कोई स्त्री तपस्या करती है तो क्या कोई पुरुष भेजा गया उसका ध्यान भंग करने के लिए ? बड़े बड़े सम्राटों का वध करने के विष कन्यायें भेजी जाती हैं क्योंकि पुरुष का मन कमजोर होता है, उनका मन विचलित हो जाता है।  स्त्रियों के साथ ऐसा नही होता।  

महाराज को अपनी विदुषी पत्नी के तर्कसंगत बातों का उत्तर नही सूझ रहा था। 

फिर भी महाराज ने जालंधर की पत्नी और गौतम मुनि के पत्नी अहिल्या का उदाहरण दिया। 

रानी हँसते हुए बोली , महाराज ये तो आप जानते ही हैं, भगवान विष्णु और चन्द्र देवता ने जालंधर कि पत्नी और गौतम मुनि के पत्नियों के सतीत्व हरण छल से किया था। इन दोनों ने उनके पतियों का रूप धारण करके ही उनका सतीत्व हरण किया था। 

राजा : हां रानी, बात तो आपकी सही प्रतीत हो रही है। रावण ने भी सीता का हरण छल से ही किया था। 

लेकिन महारानी आप एक बात तो आप जानती ही हैं कि वृहस्पति की पत्नी तारा ने अपने पति का त्याग कर अपने प्रेमी चन्द्र देवता का वरण किया था और बुद्ध को जन्म दिया। फिर आप कैसे कह सकती है कि स्त्री का मन चंचल नहीं होता ?

महाराज को लगा था कि शायद के उदाहरण उनको कुछ बचा सकता है। पर उनका ये हथियार भी खाली गया। रानी ने कहा कि चंचल तो चन्द्र देव को ही कहा गया है , तारा को नहीं। इसका एक ही कारण है कि तारा ने अपने प्रेम का वरण किया था जबकि चन्द्र देव ने दूसरे की पत्नी का हरण। स्त्री जब प्रेम का चुनाव कर लेती है तो फिर पीछे नहीं हटती। जबकि पुरुष का प्रेम तो बदलते रहता है।  स्त्रियाँ धरा की भांति है जो पुरुष रूपी बादल का इन्तजार करती है।  ये तो पुरुष है जो बदलते समय के साथ इधर उधर भटकते हुए प्रेम की बारिश करते रहता है।      

रानी लगातार बोलती जा रहे थे और राजा अपनी महारानी की विद्वतापूर्ण बातों को ध्यानपूर्वक सुनते रहे।  

हाँ महाराज, स्त्रियाँ अपने प्रेम का वरण करती हैं जबकि पुरुष किसी भी हाल में प्रेम चाहता है, चाहे इसके लिए स्त्री का हरण ही क्यों न करना पड़े। स्त्रियों को संतानोत्पत्ति करनी होती है, उसे गर्भधारण करना होता है, इसीलिए उसका शांत होना जरुरी है। उसका एकांगी होना जरुरी है। उसका एकनिष्ठ होना जरुरी है जबकि पुरुष को हमेशा सहवास के लिए तैयार रहना पड़ता है। इसीलिए स्त्रियों के पास अंडाणु एक विशेष समय ही तैयार मिलते हैं, जबकि पुरुष के पास करोड़ों शुक्राणु हमेशा तैयार रहते हैं इसीलिए पुरुष का चंचल होना जरुरी है।  यदि स्त्रियाँ भी पुरुष की तरह हो जाएं तो वे हमेशा गर्भधारण करती रहेंगी।  इसीलिए प्रकृति ने स्त्री हो शांत को एक निष्ठ बनाया है और पुरुष को चंचल।  इसीलिए छल और चंचलता पुरुष का स्वभाव है जबकि समर्पण एक निष्ठता स्त्री का। वरण स्त्री का स्वभाव है जबकि हरण पुरुष का।  

महाराज को रानी की बात स्वीकार करनी ही पड़ी पर वो हारकर भी जीत गए थे। अपनी आत्म ग्लानि के भाव से बाहर निकल चुके थे जबकि रानी जीतकर कर हार गई थी और हार कर भी खुश थी। ये रानी का प्रेम था, ये रानी का समर्पण था।

ईमानदार बेईमानी

 अरोड़ा साहब का कपड़ों के इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का दिल्ली में बहुत बड़ा कारोबार था। अक्सर वो चीन के व्यापारियों से संपर्क करके उनसे कपड़ों के एक्सपोर्ट का आर्डर लेते, फिर अपनी फैक्ट्री में कपड़ों को बनवा कर चीन भेज देते। इस काम में अरोड़ा साहब को बहुत मुनाफा होता था। उनकी इंपोर्ट और एक्सपोर्ट डिपार्टमेंट में बहुत बड़ी पहुंच थी। अरोड़ा साहब इस बात का बराबर ख्याल रखते कि दिवाली या नए वर्ष के समय एक्सपोर्ट डिपार्टमेंट के सरकारी कर्मचारियों के पास बख्शीश समय पर पहुंच जाए। ये अरोड़ा साहब की दिलदारी का ही प्रभाव था कि उनके एक कॉल के आते ही सरकारी कर्मचारी उनकी फाइल को आगे बढ़ा देते थे। इस कारण से अरोड़ा साहब अपने बिजनेस में काफी आगे निकल गए। उनके आगे बढ़ने में कुछ विश्वस्त कर्मचारियों का भी बहुत बड़ा योगदान था। उनका मैनेजर नीरज और क्लर्क सुभाष उनके प्रति बहुत ही वफादार थे। अरोड़ा साहब भी अपने मैनेजर नीरज और अपने क्लर्क सुभाष पर बहुत विश्वास करते थे।

यह बात जगजाहिर है कि जब भी कोई व्यापारी अपने व्यापार में आगे बढ़ना चाहता है कुछ गैर कानूनी तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ता है। अरोड़ा साहब की प्रगति से यह बात तो बिल्कुल साफ थी कि अरोड़ा साहब भी कुछ गैर कानूनी तौर तरीकों का इस्तेमाल करते थे। इंपोर्ट एक्सपोर्ट डिपार्टमेंट में इस बात का बराबर ध्यान रखा जाता था कि किसी एक व्यापारी की धाक न चले। सरकार की तरफ से इस बात का दिशा निर्देश दिया जाता था कि सारे व्यापारियों को बराबर का मौका मिले। इधर अरोड़ा साहब अपनी पहुंच का इस्तेमाल अपनी सारी फाइलों को आगे बढ़ाने में बराबर कर रहे थे। जब भी उनकी एक फाइल आगे बढ़ जाती तो अपनी बाकी और फाइलों को अपनी आगे बढ़ी हुई फाइल के साथ लगवा देते। इस तरीके से एक ही बार में बहुत सारा काम करवा लेते।

अपनी इस तरह की क्रिया-पद्धति का इस्तेमाल करते हुए और अरोड़ा साहब ने अपने बिजनेस को बहुत ज्यादा फैला लिया। इसका नतीजा यह हुआ कि कपड़ों के व्यवसाय में उनके जितने भी प्रतिस्पर्धी थे उनको अरोड़ा साहब से जलन होने लगी। अरोड़ा साहब के प्रतिस्पर्धीयों ने एक्सपोर्ट इम्पोर्ट डिपार्टमेंट में कंप्लेंट कर दिया। अरोड़ा साहब के प्रतिस्पर्धीयों ने यह तर्क दिया कि एक बार में 10-12 फाइलें इकट्ठे आगे कराकर अरोड़ा साहब गैरकानूनी काम कर रहे हैं। साहब के लिए मुश्किल की घड़ी आ गई। किसी ने अरोड़ा साहब को बताया कि कोई एक सरकारी नोटिफिकेशन है जिसके हिसाब से यदि कोई संबंधित फाइलें हैं तो उन सारी संबंधित फाइलों को इकट्ठे लगाया जा सकता है। लेकिन मुश्किल बात यह थी कि वह नोटिफिकेशन लगभग 15 साल पहले आई थी।वो कब आई थी इसका पता लगाना मुश्किल था। अरोड़ा साहब के लिए उस नोटिफिकेशन का मिलना बहुत जरूरी था, लेकिन ये काम था बहुत कठिन। खैर इस काम को किसी भी हाल में होना ही था। अरोड़ा साहब को नीरज और सुभाष पर बहुत भरोसा था। उन्होंने अपने इस काम के लिए अपने मैनेजर नीरज और अपने क्लर्क सुभाष को लगाया। अरोड़ा साहब ने उन दोनों को काफी हिदायत दी यह बात किसी को भी मालूम नहीं चलनी चाहिए।

ये नीरज और सुभाष के लिए भी परीक्षा की घड़ी थी। सवाल ये था कि काम की शुरुआत कैसे की जाए? वह नोटिफिकेशन जो कि लगभग 15 साल पहले आया था, उसके बारे में तहकीकात कैसे की जाए? उन दोनों ने दिमाग लगाया। सबसे पहले रिकॉर्ड रूम जाकर जितनी फाइलें सरकारी डिपार्टमेंट में थी , उसकी तहकीकात शुरू करनी चाहिए। नीरज में जाकर रिकॉर्ड रूम के इंचार्ज से उस नोटिफिकेशन के बारे में पूछा। रिकॉर्ड रूम के इंचार्ज ने कहा कि तकरीबन 7 साल पहले की सारी फाइलें और नोटिफिकेशन यहां से हटा दी जाती हैं। रिकॉर्ड रूम के इंचार्ज अहमद ने कहा कि आप जाकर फाइलिंग डिपार्टमेंट में पता कीजिए वहां पर हो सकता है कि आप तो कोई जानकारी मिल सके।

नीरज के पास कोई और उपाय नहीं था। वह फाइलिंग डिपार्टमेंट में गया। वहां जाने पर पता चला कि फाइलिंग डिपार्टमेंट का इंचार्ज अभी तक आया नहीं है। तकरीबन दिन के 11:30 बज गए थे और उस समय भी फाइलिंग डिपार्टमेंट का इंचार्ज नहीं आया था। सुभाष ने कहा; साहब इस डिपार्टमेंट का हाल भी हमारे ऑफिस के महेश जैसा है। नीरज भी हंसने लगा। उसके ऑफिस में महेश कभी भी 11:00 बजे से पहले नहीं आता था। नीरज ने खिसियाती हुई हंसी में कहा ; भाई महेश जैसे आदमी केवल हमारे ऑफिस में ही नहीं बल्कि हर जगह है। कामचोर लोगों की कोई कमी नहीं है। खैर अब काम आगे कैसे किया जाए?

सुभाष ने नीरज को सलाह दी कि फाइलिंग डिपार्टमेंट के किसी और क्लर्क से बातचीत की जाए। उन दोनों के पास कोई और उपाय नहीं था। वह दोनों फाइलिंग डिपार्टमेंट में दूसरे क्लर्क के पास गए और अपनी समस्या के बारे में बताया। उस क्लर्क ने कहा कि आप जो भी समस्या लेकर आए हैं उसका समाधान तो फाइलिंग डिपार्टमेंट में नहीं है। आपको लिस्टिंग डिपार्टमेंट में जाना चाहिए।

नीरज और सुभाष के सामने आशा की किरणें क्षीण होती जा रही थी। वह दोनों लिस्टिंग डिपार्टमेंट में गए। वहां पर जाकर तकरीबन 15 साल पहले आए नोटिफिकेशन के बारे में पूछताछ की। वहां पर उन लोगों को यह ज्ञात हुआ कि रिकॉर्ड डिपार्टमेंट में ही आदिल नाम का बहुत पुराना मुलाजिम रहता है। वह आदिल ही उनकी सहायता कर सकता है।

दोनों वापस फिर रिकॉर्ड रूम में गए। उस रिकॉर्ड रूम में फाइलों के ढेर के पीछे आदिल मिला। आदिल से उन लोगों ने तकरीबन 15 साल पहले नोटिफिकेशन के बारे में पूछा। आदिल ने कहा कि वह यहां पर लगभग 12 साल से है। इस कारण से वह उन फाइलों के बारे में तो नहीं बता सकता है। हाँ इतना तो जरूर बता सकता है कि वह फाइलें लिस्टिंग ब्रांच में ही हो सकती है। आदिल ने बताया कि लिस्टिंग ब्रांच में ही इंटरनेट का नया ब्रांच खुला है। इंटरनेट ब्रांच में जितनी भी बंद हो चुकी फ़ाइलें हैं ,उनका साइबर रिकॉर्ड मौजूद है।

दोनों के सामने आशा की किरणें दिखाई पड़ने लगी। दोनों जाकर लिस्टिंग ब्रांच के साइबर सेल के बारे में तहकीकात करने लगे। साइबर सेल का ब्रांच दूसरी बिल्डिंग में था। सुभाष को रास्ता पता था। सुभाष के पीछे पीछे नीरज चलने लगा। वहां पर जाकर गेटकीपर ने बताया कि साइबर सेल तीसरी मंजिल पर है। नीरज जाकर तीसरी मंजिल पर साइबर सेल के बारे में पता किया, वहां पर ज्ञात हुआ कि वह दूसरी मंजिल पर है। नीरज और सुभाष काफी चिढ़ गए थे। खैर जब दोनों दूसरी मंजिल पर गए और साइबर सेल के बारे में तहकीकात की तो वहां पर एक महिला कर्मचारी मिली। उस महिला ने दुपट्टे नहीं डाल रखे थे। उसके कपड़ों के नीचे से उसका सारा बदन दिख रहा था।उस महिला कर्मचारी ने नीरज और सुभाष को बताया कि तीसरी मंजिल पर ही पिछले साइड में छोटा सा साइबर सेल खुला है आप वहां जाकर तहकीकात कर सकते हैं। नीरज और सुभाष को ऐसा लगने लगा था कि शायद उन्हें वह नोटिफिकेशन मिल नहीं पाएगा। उस पर से उस महिला कर्मचारी की निर्लज्जता ने दोनों को और परेशान कर दिया। पता नहीं क्यों इन सरकारी डिपार्टमेंट में कोड ऑफ ड्रेस नहीं हैं। इस तरह तो मर्दों के ध्यान काम पर क्या खाक लगेगा? वो तो इन मैडम लोगों को निहारने में हीं लगे रहेंगे। सुभाष भी खिन्न हो चुका था। उसने खीजते हुए कहा, हम इतनी कोशिश कर रहें हैं फिर भी कुछ पता नहीं चल पा रहा है। किस तरह का डिपार्टमेंट है ये?किसी को ठीक से पता हीं नहीं है नोटिफिकेशन के बारे में? सारे के सारे लोगों का ध्यान तो बदन दिखाने और बदन निहारने में हीं लगा हुआ है। काम पे ध्यान क्या खाक लगेगा। पता नहीं किसी को नोटिफिकेशन के बारे जानकारी है भी या नहीं ? हताश हुए सुभाष को ढांढस बढ़ाते हुए नीरज ने कहा, कोई बात नहीं, हमारे हाथ में तो कर्म ही हैं। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश ही कर सकते हैं। इतनी कोशिश कर ली, तो चल के बाहर ऊपर भी देख लेते हैं।

जब नीरज और सुभाष तीसरी मंजिल की पिछली साइड में गए तो वहाँ दरवाजे बंद मिले। निराशा के बादल दोनों के सामने छाने लगे। दोनों लौट हीं रहे थे कि सुभाष के जान पहचान का कोई दूसरा क्लर्क मिला ।उसने बताया कि अभी 3 दिन पहले यह डिपार्टमेंट यहां से हटकर छठी मंजिल पर चला गया है। आप दोनों को वहां जाना पड़ेगा।

नीरज और सुभाष काफी थक गए थे। दोनों ने नीचे आकर गर्म गरम चाय पी फिर छठी मंजिल पर गए। छथि मंजिल पे एक छोटा सा कमरा था और उस कमरे में एक पुरुष और 2 महिला कर्मचारी मिले। नीरज ने उनसे नोटिफिकेशन के बारे में पूछा तो उन लोगों ने बताया आप बिल्कुल ठीक जगह आए हैं ।लेकिन यहाँ पे सारे के सारे रिकॉर्ड हैं कहां? सारी फाइलों को लाइब्रेरी भेज दिया है।

इतनी ज्यादा दौड़ धूप से नीरज और सुभाष परेशान हो चुके थे। उन्होंने नीचे आकर फिर गरमा गरम चाय पी, समोसा खाया, और पहुंच गए लाइब्रेरी में ।वहाँ पे दोनों नोटिफिकेशन के बारे में पता कर पता करने लगे। जब लाइब्रेरियन से नोटिफिकेशन के बारे में पूछा तो वहां बताया गया कि जितने भी पुराने नोटिफिकेशन है उसका प्रिंट आउट अब यहां से हटा दिया गया है और वो सारे के सारे प्रिंट आउट नई ब्रांच के कंप्यूटर सेल में मिलेंगे।

नीरज और सुभाष दोनो को गुस्सा आने लगा। पता नहीं ये किसने अरोड़ा साहब को नोटिफिकेशन के बारे में बता दिया। नोटिफिकेशन तो जैसे सुरसा का मुँह हो गया था। खत्म होने का नाम हीं नहीं ले रहा था। इधर इतनी दौड़ धूप से परेशान सुभाष ने कहा, अब रहने देते है, कल कोशिश करेंगे। नीरज ने झिड़क कर कहा, नहीं चलो अभी। सुभाष आराम करने लगा।नीरज ने कहा, इतने दिनों से तुम यहाँ आते जाते हो, कोई जान पहचान भी नहीं है क्या? तिस पर सुभाष ने कहा रोज का आना जाना तो आपका भी यहाँ लगा रहता है। आप हीं जान पहचान निकाल लो ना।उसपर से आपकी तरह मुझे सैलरी भी तो समय पर नहीं मिलती।दिया तो उतना हीं जलेगा जितना की उसमे तेल पड़ा हो।

आपसी नोक झोंक और ऊपर नीचे करते हुए दोनी काफी थक चुके थे। धीरे-धीरे चलते हुए लाइब्रेरी के सेकंड फ्लोर पर पहुंचे और वहां पर जाकर उन लोगों ने उस नोटिफिकेशन के बारे में पूछताछ की। वहां पर उन्हें बताया गया कि यहां पर तकरीबन 40 साल से पहले की सारी नोटिफिकेशन की डिजिटल कॉपी मौजूद है। उसने नीरज को वहां पर एक कंप्यूटर के सामने बैठा दिया और कहा कि वह इन नोटिफिकेशन की छानबीन कर सकता है।

नीरज के साथ वहां पर सुभाष भी बैठ गया। पर कंप्यूटर सेल के इंचार्ज ने सुभाष को वहां पर बैठने से मना कर दिया। उसने कहा कि यहां पर केवल नीरज बैठ सकता है यहां पर क्लर्क नहीं बैठ सकते। नीरज के सामने बहुत बड़ी समस्या थी। उन 40 साल के सारी फाइलों, नोटिफिकेशन में से एक नोटिफिकेशन को निकालना। यानी कि लगभग 600-700 फाइलों में से किसी एक फाइल में पड़े एक नोटिफिकेशन को पढ़ना। यह कैसे हो?

नीरज ने हिम्मत नहीं हारी और उसने अपना दिमाग लगाया। उसे यह बताया गया था कि तकरीबन 15 साल पहले की फाइलों में इस तरह की नोटिफिकेशन आई थी। नीरज 10 साल पहले की फाइलों को पढ़ना शुरू किया। और तकरीबन 3 साल पीछे जाते हीं उसको वह नोटिफिकेशन मिल गया। मेहनत तो काफी करनी पड़ी पर इस बात से दोनों को बहुत खुशी हुई कि उनकी मेहनत सफल हुई।

नीरज ने तुरंत हीं उस नोटिफिकेशन की कॉपी ली और अपने मोबाइल से उसका फोटो खींच लिया। जैसे ही नीरज उस नोटिफिकेशन को अपने व्हाट्सएप से अरोड़ा साहब के मोबाइल पर भेजना चाहा, सुभाष ने उसे ऐसा करने से रोक लिया। सुभाष ने कहा कि यह बात काफी गुप्त है। यदि व्हाट्सएप पर किसी और ने देख लिया तो समस्या खड़ी हो सकती है। नीरज ने सुभाष की बात मान ली।

सुभाष ने अरोड़ा साहब के मोबाइल पर फोन किया तो उस फोन को अरोड़ा साहब के सेक्रेटरी दीपक ने रिसीव किया। सुभाष ने दीपक से कहा कि एक बहुत ही जरूरी मैसेज है ,अरोडा साहब को बताना है। दीपक ने पूछा क्या है मैसेज? सुभाष ने मैसेज बताने से मना कर दिया। सुभाष को इस समय अपने आप पर काफी अभिमान आ रहा था। दरअसल दीपक साहब का सेक्रेटरी था और इस बात का उसे हमेशा घमंड रहता था कि जितनी भी गुप्त बातें थीं वो उन सारी बातों को वह जानता था। कितनी हीं बार उसने सुभाष को झिड़क दिया था।। लेकिन इस बार पाशा सुभाष के हाथ में था। दीपक बार-बार पूछ रहा था सुभाष से , लेकिन सुभाष ने कहा जाकर साहब से कहो कि वह नोटिफिकेशन मिल गया है। दीपक को ये बात समझ में नहीं आ रही थी कि आखिर में वह कौन सा नोटिफिकेशन है जिसके बारे में सुभाष को पता है और उसे पता नहीं है? सेक्रेटरी और क्लर्क के बीच जंग चल रहा था। जंग में हमेशा जीतने का आदि रहा सेक्रेटरी इस अनपेक्षित हार से परेशान और दुखी हो चला। इधर हमेशा पराजित होने वाला क्लर्क जीत के इस मौके को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। अंत में जीत सुभाष की हुई। दीपक ने सुभाष की बात को और अरोड़ा साहब तक पहुंचा दिया।

अब पाशा सुभाष के हाथों में थी। उसने नीरज से कहा कि आप यह मत बताइएगा कि कंप्यूटर से नोटिफिकेशन को निकाला है । सुभाष ने नीरज से कहा कि आप यह बता दीजिएगा कि उस नोटिफिकेशन को सुभाष ने बहुत सारी फाइलों को छानबीन करके पैसा खिला कर निकाला है। दरअसल इस मौके का इस्तेमाल सुभाष कुछ पैसे कमाने के लिए करना चाह रहा था। नीरज बहुत ही ईमानदार आदमी था। उसने ऐसा करने से मना कर दिया।नीरज ने कहा कि यदि अरोड़ा साहब पूछेंगे कि फाइलें उसने कैसे निकाली है तो वह इस बात को बता देगा कि कंप्यूटर से निकाली है। यदि यह नहीं पूछा कि किस तरह से नोटिफिकेशन निकाला गया है तो वह अपनी तरफ से बताएगा नहीं।

नीरज ने शक की निगाहों से सुभाष की तरफ देखा।सुभाष को नीरज का उड़की शक की निगाहों देखना गवारा न लगा। सुभाष ने कहा कि अरोड़ा साहब भी तो उसे हर महीने की सैलरी बराबर समय पर नहीं देते। वह अपनी काम को पूरी ईमानदारी से करता है। ऐसा कोई काम नहीं करता है जिससे अरोड़ा साहब को नुकसान पहुंचे। फिर भी यदि वह बीमार पड़ता है तो अरोड़ा साहब उसके पैसे काट लेते हैं। हॉस्पिटल में जाने पर यदि ऑफिस नहीं आता है तो उस दिन की पगार उसे काट ली जाती है। यहां तक कि उसके जितने भी ओवरटाइम के पैसे हैं ,जितने भी बोनस के पैसे हैं उन पैसों को मांगने पर भी एक बार में वह पैसे नहीं मिलते। नीरज बाबू आपको तो पैसे समय पर मिल जाते हैं। आपका तो पैसा छुट्टी लेने पर नहीं कटता। यदि उसकी ईमानदारी के साथ भी बेईमानी की जा रही है तो वह भी वैसी बेईमानी क्यों न करें। वैसे भी उसकी बेईमानी से अरोड़ा साहब को तो कोई नुकसान नहीं पहुँचता, अलबत्ता उसे फायदा जरूर हो जाता है। नीरज चाह कर भी सुभाष को यह नहीं बता पाया कि उसके भी बोनस के पैसे समय पर नहीं मिलते।

नीरज ने कहा कि यदि कोई लोमड़ी की तरह व्यवहार कर रहा है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम भी लोमड़ी की तरह ही व्यवहार करने लगो। नीरज ने सुभाष से पूछा, क्या तुमने साधु और बिच्छू की कहानी नहीं सुनी है? नीरज बोलता गया। उसने सुभाष को कहानी याद दिलाई। एक साधु था। वह तालाब में सुबह सुबह स्नान करने गया हुआ था। वहां पर उसने एक बिच्छू को देखा। उस तालाब में वह बिच्छू डूब कर मरने वाला था। साधु बार बार अपने हथेली में बिच्छू को लाकर किनारे पर डालने की कोशिश करता, और बिच्छू बार बार साधु को डंक मारता।साधु का स्वभाव था बिच्छू को बचाना और बिच्छू का स्वभाव था साधु को काटना।

गिद्ध सड़े गले मांस को खाकर जिंदा रहता है। पर गिद्ध के सड़े गले मांस के खाने के हंस का स्वभाव तो नहीं बदलता। कौए को लाख मिठाई खिला दो, पर वो काँव काँव हीं करेगा। कौए को देखकर तोता तो राम नाम जपना तो नहीं छोड़ता। माना कि अरोड़ा साहब तुम्हारे साथ बेईमानी करते हैं, न्याय नहीं करते पर इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम भी उनके साथ बेईमानी करने लगो। अरोड़ा साहब के स्वभाव में हीं बेईमानी है। वो व्यवसायी है, व्यापार केवल ईमानदारी के भरोसे चलता भी नहीं। तुम तो अपने स्वभाव में रहो।

राम और रावण दोनों को दुनिया याद रखती है। राम अपने स्वभाव के कारण जाने जाते हैं और रावण अपने कर्मों के कारण। दुर्योधन के रास्ते को युद्धिष्ठिर ने कभी नहीं अपनाया। इसी तरीके से तुम भी अपने रास्ते से मत चूको। माना कि अरोड़ा साहब समय पर पैसे नहीं देते, पर पूरे पैसे दे तो देते हैं। यदि छुट्टी के पैसे काटते हैं तो उनसे बात करो। इन सारी बातों को मन मे क्यों रखते हो?

सुभाष ने कहा कि मुझे यह सारी बातें समझ में नहीं आती है। पढ़ा लिखा आदमी नहीं हूं। मैं तो सिर्फ इतना जानता हूं कि मेरी ईमानदारी के साथ बेईमानी की जाती है। तो फिर मैं अरोड़ा साहब साथ में थोड़ी सी बेईमानी क्यों न करूं? प्रभु श्रीराम समुद्र के किनारे 3 दिन तक याचना करते रहे, आखिर में जब उन्होंने धनुष ताना तभी समुद्र उनके आगे झुका।

याद कीजिए पांडवों ने भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन आदि का वध कैसे किया?यहाँ तक कि राम ने भी बाली का शिकार छिप कर हीं किया था।सियार के सामने कोई हनुमान चालीसा का पाठ करता है क्या? भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा? यदि कोई जंगल के कानून से चलता है तो उसको जंगल के कानून हीं समझ आते है। कोई अच्छा है इसका मतलब ये नहीं कि वो कमजोर है।

नीरज ने कहा कि सच्चाई के रास्ते पर चलने के लिए असीम ताकत चाहिए होती है।यदि तुम किसी की बेईमानी से प्रभावित होते हो इसका कुल मतलब इतना हीं है कि तुम कमजोर हो। होना ये चाहिए कि तुम्हारी अच्छाई का असर बेईमानों पे हो।तुमने गौतम बुद्ध और अंगुलिमाल की कहानी नहीं सुनी क्या?गौतम बुद्ध के प्रभाव में आकर अंगुलिमाल कैसे बौद्ध भिक्षु बन गया?नारद मुनि के कारण डाकू रत्नाकर महाकवि वाल्मीकि बन गया।यदि तुममे पहाड़ की ऊंचाई पर चढ़ने का सामर्थ्य नहीं है तो इसमें पहाड़ की चोटी क्या दोष? कोई ना कोई तो पहाड़ की चोटी पर चढ़ता हीं है। यदि स्वयं में सामर्थ्य नहीं है तो कम से कम रास्ते की महत्ता का अपमान तो मत करो।

खैर तुम तो मानोगे नहीं।तुमको जो करना है करो। मेरी तो स्वभाव में बेईमानी है ही नहीं।भाई मैं तो सुबह सुबह उठकर रोज ध्यान करता हूं। ध्यान में ईश्वर से यह प्रार्थना करता हूं कि जिन सिद्धांतों का पालन मेरे पिता ने किया है , उन सिद्धांतों और आदर्शों पर मैं टिका रहूं। और एक बात और है, मैं चाह कर भी बेईमानी नहीं कर सकता। नीरज ने वह नोटिफिकेशन सुभाष के हाथ में पकड़ा दिया और वहां से चल दिया।अरोड़ा साहब अपनी करनी का फल भुगतेंगे और तुम अपनी करनी का। मैं तो अपने रास्ते इसलिए चलता हूँ कि मुझे सुकून मिलता है और इससे मेरा दिल हल्का रहता है।

सुभाष ने कहा , आपकी बात सही है, लेकिन आदर्शों से दुनिया नहीं चलती। मेरे बाबूजी गांव से आये थे। उन्हें हॉस्पिटल दिखाने के लिए चार दिन की छुट्टी ली थी। अरोड़ा साहब ने पैसे काट लिए।बोनस के पैसे भी नहीं दे रहे हैं। हालांकि पैसे पूरे दे देते हैं, पर समय पर नहीं मिलने पर क्या फायदा। इन आदर्शों के भरोसे दवाई कहाँ से लाऊं? मैं तो ठहरा गँवार आदमी। आपकी तरह पढा लिखा नहीं। मुझे तो बस इतना पता है कि जिस मरीज को जैसी बीमारी हो, उसे वैसी हीं दवा दिया जाना चाहिए। जंगल के कानून से जीने वाले व्यक्ति भक्ति के पाठ से कभी नहीं सुधरते। ईमानदारी कभी भी बेइमानी का इलाज नहीं हो सकती। बेईमानी तो बेईमानी से हीं पछाड़ खा सकती है।

नीरज ने सुभाष की फिर समझाने की कोशिश की। उसने कहा कि बेईमानी को ठीक करने का ठेका उसने अपने सर पर क्यों उठा रखा है। बेईमानों को सजा देने का काम तो ईश्वर का है। तुमको दिखाई नहीं पड़ता, अरोड़ा साहब को बी.पी. है, मधुमेह है, थाइरॉयड की बीमारी है? मसाला खा नहीं सकते, मीठा खा नहीं सकते, तितापन, खट्टापन ,धूल धक्कड़ से एलर्जी है उनको। दूध , दही से परहेज करना पड़ता है।ये सारी बेईमानियां उनके शरीर से निकल रही है। तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती क्या?

सुभाष ने कहा कि चलिए मान लिया कि अरोड़ा साहब को अपनी करनी का फल मिल रहा है, पर इससे उसको क्या फायदा हुआ? अरोड़ा साहब के बी.पी., मधुमेह या थाइरॉयड , एलर्जी होने से उसके पिता का इलाज तो संभव नहीं हो पा रहा है ना? और यदि बेईमानी की सजा उसे मिलती है तो उसे कोई अफसोस नहीं होगा। कम से कम उसके पिता का इलाज तो संभव हो पायेगा। नीरज को समझ आ गया कि भैंस के आगे बीन बजाने से कोई फायदा होने वाला नहीं।

तकरीबन आधे घंटे बाद अरोड़ा साहब वहां पर आए। सुभाष और नीरज दोनों की प्रसंशा खुले दिल से करने लगे। जब नीरज ने अरोड़ा साहब को उस नोटिफिकेशन को दिखाना चाहा , साहब ने कहा कि नोटिफिकेशन सुभाष ने व्हाट्सएप से पहले ही भेज दिया है। अरोड़ा साहब ने सुभाष को बुलाकर कहा, जितने पैसे खर्च हुए हैं, जाकर दीपक से ले लेना। नीरज चुप चाप देखता रहा।सुभाष ने 5000/- रुपये नोटिफिकेशन के खर्चे के नाम पर ले लिए। उन रुपयों से उसने अपने बीमार पिता के लिए दवाईयाँ खरीदी और गाँव भेज दिया। बेईमानी के नमक का हक अदा हो चुका था।

नाम का झमेला

शाम के धूसर उजाले में, जब मैं—चिंतन चतुर्वेदी—ऑफिस की अपार थकान और बॉस की डाँट को दिल में दबाए, दोने-सा चेहरा लेकर घर में घुसा, तो मुझे सामने दिखाई दिया मेरा लाडला बेटा—मनोहर मोक्ष—जिसका मुँह फूला हुआ था जैसे किसी ने उसमें चार रसगुल्ले ठूँस दिए हों और ऊपर से “मुँह मत खोलो!” कह दिया हो।

बेटा (स्वर में नाराज़गी की बादशाहत लिए, आँखों में न्यायपालिका की पैनी दृष्टि):“पापा! आज क्लास में मैडम ने मेरे नाम का मतलब पूछा। मैं हकला गया… और पूरी क्लास ठहाके लगाकर ऐसे हँसी, जैसे मैं स्टेज पर चप्पल पहनकर कथक कर रहा होऊँ! पापा, आपने पहले क्यों नहीं बताया कि ‘मनोहर मोक्ष’ का मतलब क्या होता है? मैं क्या आपके विचारों की USB ड्राइव हूँ जो सब ऑटोमेटिक डाउनलोड हो जाएगा?”

मैं (पसीना पोंछते हुए, पिता-धर्म निभाने के संघर्ष में):“बेटा… ‘मनोहर मोक्ष’ का मतलब है—वो व्यक्ति जो इतना मनोहारी हो कि देखकर पड़ोस की कमला जी भी दाँतों तले ऊँगली दबा लें, और फिर भी इतना निर्विकार हो कि पड़ोसन की तारीफ़ पर भी मन न डोले… यानी मोह-माया से मुक्त!”

बेटा (आँखें गोल, जैसे जेम्स बॉन्ड किसी गुप्त राज़ का पर्दाफाश कर रहा हो):“मतलब आप चाहते हैं कि मैं पॉपकॉर्न, बैटमैन का असली खिलौना और PS5 सब छोड़ दूँ? पापा, मुझे साधु बनाना है या सुपरहीरो?”

 मैं (मन ही मन हँसी रोकते हुए, लेकिन चेहरे पर गंभीरता की मोटी परत):“नहीं बेटा, मकसद सिर्फ़ इतना है कि बड़े होकर तुम्हारी चाहतें इतनी कम हो जाएँ कि EMI के ज़माने में भी दिल हल्का रहे और नींद गहरी।”

 बेटा (व्यंग्य का गदा उठाते हुए):“फिर पापा, आपने खुद का नाम ‘मनोहर मोक्ष’ क्यों नहीं रखा? आप तो ‘चिंतन चतुर्वेदी’ क्यों बन बैठे? क्या आप मोह-माया में PhD करना चाहते थे?”

 मैं (थोड़ी शर्मिंदगी, थोड़ी सच्चाई):“मेरा नाम मेरे परदादा जी ने रखा बेटा… उस समय बच्चों को नाम चुनने का लोकतांत्रिक अधिकार नहीं मिलता था… आज भी नहीं मिलता।”

 बेटा (तर्क की तलवार चमकाते हुए):“पर दादाजी का नाम ‘धरमदास दूबे’ है, फिर सब लोग उन्हें ‘आशावादी जी’ क्यों कहते हैं? क्या ये भी इमेज मेनेजमेंट का प्राचीन फार्मूला है?”

 मैं (दर्शनशास्त्र के रंग में रंगते हुए):“नहीं बेटा! वो इसलिए क्योंकि दादाजी कभी हार नहीं मानते—even बिजली का बिल तीन गुना हो जाए, तब भी कहते हैं, ‘कोई बात नहीं बेटा, सब ठीक होगा!’ बस, लोग उनकी आशा से ज़्यादा प्रभावित हैं, नाम से कम।”

 बेटा (चेहरे पर शरारती मुस्कान):“तो आप लोगों ने मेरे नाम से ‘दूबे’ क्यों हटाया? ताकि जाति से नहीं, मेरी मुस्कुराहट और मोक्ष से पहचान हो?”

मैं (गंभीरता से):“बिल्कुल! यही वजह थी।”

बेटा (गंभीर होकर):“तो क्या ब्राह्मण होना बुरा है?”

मैं (संवेदनशीलता को थामते हुए):“नहीं बेटा! जाति बुरी नहीं, पर पहचान को केवल उसी तक सिमटाना बुरा है… बाकी विस्तार के लिए दादाजी से पूछ लेना, वो रोज़ शाम को गोबर गैस प्लांट के पास विचार मंच लगाते हैं।”

तभी रसोई से मम्मी—भावना भारती—करछी हाथ में लिए, अद्भुत आत्मविश्वास के साथ बाहर निकलीं, जैसे किचन की संसद में पारित बिल को जनता को पढ़कर सुना रही हों।

मम्मी (मुस्कुराकर):“क्या हो रहा है? फिर से दुनिया का संविधान लिख रहे हो क्या? बेटा, तुम्हारे पापा बचपन से ही ऐसे थे—आधा जवाब देते, आधा अगले जनम में देने का वादा कर देते!”

बेटा (विजयी मुस्कान के साथ):“मम्मी, चाचाजी का नाम ‘प्रशांत गौतम’ क्यों है? दूबे क्यों नहीं?”

मम्मी (मीठी मुस्कुराहट के साथ):“क्योंकि बेटा, हमारा गोत्र ‘गौतम’ है—यानी हम ऋषि गौतम की परंपरा से आते हैं… इसी को चाचाजी ने अपनाया, ताकि नाम में भी थोड़ा इतिहास और थोड़ा स्टाइल दोनों रहे!”

बेटा (और गहरा गोता लगाते हुए):“तो क्या सारे दूबे लोग गौतम गोत्र के होते हैं?”

मैं (सिर खुजाते हुए):“नहीं बेटा, दूबे, त्रिवेदी, चतुर्वेदी उपनाम वेदों के आधार पर बने; गोत्र ऋषियों के आधार पर। दोनों का तालमेल शादी-ब्याह में काम आता है… जैसे रिमोट में बैटरी डालने से टीवी चलता है, वैसे ही नाम और गोत्र से रिश्ता तय होता है!”

बेटा (जोश में):“मतलब आप और मम्मी एक ही गोत्र के नहीं हो?”

मम्मी (जल्दी से):“नहीं! हम अलग-अलग गोत्र के हैं, इसलिए ही शादी हो पाई!”

इतने में पड़ोसन—कमला जी—अपने खटर-पटर झोले के साथ आ धमकीं, कान में झुमके हिलाते हुए:

कमला जी (मुस्कुराकर):“अरे, अरे! लगता है आज घर में 'जाति-गोत्र महोत्सव' चल रहा है! बेटा, पूछ ले—मैं भी बीच-बीच में जानकारी डाल दूँगी!”

बेटा (झट से):“कमला आंटी, आपका नाम क्यों सिर्फ़ ‘कमला’ है? आगे कुछ क्यों नहीं?”

कमला जी (हँसते हुए):“बेटा, बचपन में नाम रखवाने का टाइम कम था, इसलिए ‘कमला’ पर ही काम चला लिया! अब पति का नाम जोड़ूँ तो ‘कमला वर्मा’ हो जाता है—लेकिन काम पड़ोसन कहकर भी चल जाता है!”

उतनी देर में चाचाजी—प्रशांत गौतम—भी अख़बार मोड़कर चर्चा में कूद पड़े:

चाचाजी:“बेटा, गोत्र का मतलब सिर्फ़ कुल परंपरा है, जैसे ब्रांड की फैमिली लाइन!”
 
बेटा (शरारती मुस्कान के साथ):“तो चाचाजी, आप ऋषि हो?”

चाचाजी (हँसकर):“नहीं बेटा, बस दफ्तर में कभी-कभी ऋषि जैसी चुप्पी साध लेता हूँ!”

बेटा:“पापा, मेरे दोस्त ‘वेदांत त्रिवेदी’ का नाम क्यों रखा गया?”

मैं (थके स्वर में):“वेदांत मतलब वेदों का सार, त्रिवेदी मतलब तीन वेद पढ़ा हुआ… पर बेटा, पढ़ाई नाम से नहीं, मेहनत से आती है!”

बेटा (व्यंग्य में लिपटी मासूमियत):“मतलब लोग बड़ा नाम रखकर भी उतने बड़े नहीं निकलते?”

मैं (मुस्कुराकर):“कभी-कभी हाँ, पर ज़्यादातर ये परंपरा की निशानी है… जैसे शादी के कार्ड पर 'सादर निमंत्रण' लिखा होता है, चाहे मेहमान आएँ या न आएँ!”

अब बेटे ने छोड़ा सबसे घातक प्रश्न:

बेटा:“पापा, ‘झा’ का मतलब क्या होता है?”

पूरा घर जैसे स्टैच्यू हो गया!मैं (गहरी साँस लेकर):

“बेटा… ये मैं कल बताऊँगा!” बेटा (शक भरी मुस्कान के साथ):

“पक्का?”

मैं:“पक्का!”

सच कहूँ तो मुझे आज तक नहीं पता “झा” का असली मतलब क्या होता है…

इसलिए अब सोच रहा हूँ बेटे को कहूँ—

बेटा, नाम रख लो ‘मिश्रा’,
क्योंकि कम से कम ये बताने में दिक्कत नहीं होगी कि:“बेटा, मिश्रा मतलब… मिश्रण! जैसे हँसी, तर्क, परंपरा, आधुनिकता—सबका मज़ेदार संगम!”

सरकार बाबा आदम की

बाबरी मस्जिद के ढहने पे कोई टोके नहीं
गोधरा हत्या कांड पे कोई बोले नही

सी. डब्लू. जी. घोटाले हो तो हो
२-जी स्कैम हो तो कुछ ना कहो

१९८४ सिख हत्या कांड को 
कोई गलत नहीं ठहराये
और चारा घोटाले को सब 
सही ही बतलाये

लोकपाल की बात जरूर करती है
पर लोक पाल लाने से बहुत डरती है

कि जो कुछ भी करे ,
उसे कोई गलत बताने वाला ना हो
अगर हो कोई इस दुनिया में 
तो इसकी हर बात से सहमत हो

रहना चाहती है सरकार इस दुनिया में 
बाबा आदम की तरह
इव और सर्पेंट के साथ

Tuesday, July 8, 2025

बड़ा कौन

सीनियर एडवोकेट चढ्ढा जी, जो अदालत में तर्कों के तूफ़ान मचाने के लिए जाने जाते थे, उस दिन अपने जूनियर राघव के साथ दोपहर का भोजन कर रहे थे। राघव नया-नया आया था और कानून की दुनिया में अब तक उसे सिर्फ दो बातें समझ आई थीं — पहली, सीनियर को 'जी' लगाकर बुलाना अनिवार्य है, और दूसरी, कभी भी चाय के साथ समोसा शेयर मत करना।

राघव बड़े ही श्रद्धा भाव से चढ्ढा जी की हर बात को वैसे हीं सुन रहा था जैसे कक्षा में विद्यार्थी गणित की 'कैसे भी समझ में नहीं आने वाली प्रमेय' को सुनते हैं। तभी चढ्ढा जी की आँखें कोने में बैठे एक शख्स पर पड़ीं। उन्होंने राघव की ओर झुकते हुए रहस्यमयी स्वर में कहा:

"राघव, देखो उधर... वो हैं वर्मा जी। ज्ञान के साक्षात भंडार।"

राघव ने झट गर्दन घुमाई और देखा — एक व्यक्ति, जिसकी मूँछें पवनचक्की की तरह गोल थीं, चाय में बिस्कुट डुबोते हुए ध्यानमग्न मुद्रा में बैठे थे, मानो मानवाधिकार और मैरी बिस्किट के बीच कोई कानूनी सहमति कराने जा रहे हों।

वर्मा जी ने चढ्ढा जी की ओर देखा और सकुचाते हुए बोले,
"चढ्ढा जी, ये तो बड़े लोगों का बड़प्पन है जो उन्हें छोटे लोगों में अच्छाई दिख जाती है। हम जैसों की क्या औकात है आपके सामने?"

चढ्ढा जी मुस्कुरा दिए, जैसे किसी पुराने गवाह की गवाही उनके पक्ष में चली हो। बोले,
"वर्मा जी, सीनियर एडवोकेट तो क्रिकेट के कप्तान जैसी महज एक उपाधि है। धोनी कप्तान है, पर सचिन वाली बात उसमें कहाँ?"

वर्मा जी गदगद हो उठे। बोले,
"आपके तर्कों ने तो मुझे निरुत्तर कर दिया। साबित हो गया कि आप सीनियर एडवोकेट ऐसे ही नहीं बने हैं।"

Monday, July 7, 2025

माया का अरण्य-एक रहस्यपूर्ण यात्रा

हिमालय की तलहटी में, बादलों से ढके एक पुराने गाँव की तंग गलियों में अक्सर एक रहस्यमय अरण्य की कहानियाँ गूँजती थीं। कहते थे, वह अरण्य बाहर से उतना ही गहरा था जितना भीतर से—हर टेढ़ी शाख़, हर झुकती परछाईं, हर पत्ता किसी न किसी दबी हुई इच्छा का अक्स बनकर सामने आता था।

इसी गाँव में रहते थे तीन मित्र—अर्जुन, मालविका और नितिन।
अर्जुन, ऊँची कद-काठी, गंभीर आँखों वाला; उसके दिल में एक अनकहा प्रश्न पलता था—क्या ऐसा प्रेम संभव है जो कभी ख़त्म न हो?
मालविका, चश्मा ठीक करते हुए दुनिया को तौलती नज़र से देखती; वह सच जानने को बेचैन रहती थी, वह ज्ञान चाहती थी जो हर भ्रम को चीर दे।
और नितिन—तीनों में सबसे हँसमुख, मज़ाक उड़ाने में माहिर, पर भीतर से एक ऐसे सुख की तलाश में, जो सोमवार की सुबह भी साथ रहे।

कई बार चौपाल पर, धूप के उतरते-उतरते, तीनों की बातें इसी रहस्यमय अरण्य पर आ टिकतीं।
नितिन हँसी में उड़ा देता, “अरे यार, कोई जंगल तुम्हें प्रेम, ज्ञान या सुख थाल में रखकर थोड़ी देगा!”
मालविका हल्की मुस्कुराहट के साथ कहती, “पर अगर वह जंगल सच में हमारे भीतर का ही प्रतिबिंब है, तो क्यों न एक बार देखा जाए?”
और अर्जुन, जो बाहर से सबसे शांत दिखता, भीतर से सबसे बेचैन था—धीमे स्वर में कहता, “शायद वही हमें उस प्रश्न का उत्तर दे सके, जो अब तक किसी से नहीं मिला…”

एक बार शाम को, जब हवा में नमी थी और चाय की भाप में पहाड़ों की ठंडक घुल रही थी, नितिन ने हल्के अंदाज़ में कहा,
“सुना है, जो सच्चे दिल से जाए, उसे वहाँ कुछ न कुछ ज़रूर मिलता है… या कम से कम कुछ ऐसा दिखता है, जो सारी ज़िंदगी याद रहे!”

मालविका की आँखें चमक उठीं, “अगर सच में कुछ मिला तो?”
अर्जुन ने थोड़ी देर चुप रहकर कहा, “तो कल सुबह चलते हैं।”
नितिन ने हँसकर कहा, “सच कहूँ तो कल रविवार है… बाकी कुछ न भी मिला, तो पिकनिक तो हो ही जाएगी!”

अगली सुबह, जब सूरज की पहली किरण पहाड़ की चोटी को छू रही थी, तीनों चल पड़े। रास्ता पथरीला था, जंगली फूलों की महक हवा में घुली थी, और मन में एक हल्का सा डर भी।

जैसे-जैसे वे भीतर बढ़े, पेड़ों की छाँव घनी होती गई। धूप के टुकड़े ज़मीन पर गिरते तो ऐसा लगता जैसे कोई पुरानी भाषा में कुछ लिख रहा हो। दूर कहीं चिड़ियों की आवाज़ आती, तो लगता वे भी कुछ कहना चाहती हैं।

तभी अचानक धुंध के बीच से एक वृद्ध साधु प्रकट हुए। उनका चेहरा जैसे समय की सिलवटों से बना हो, और आँखें गहरी झील की तरह शांत।

साधु ने धीमे से पूछा, “तुम लोग क्या ढूँढने आए हो?”

अर्जुन थोड़ा हिचकिचाया, पर बोला, “ऐसा प्रेम जो डर से परे हो… जो ख़त्म न हो।”
मालविका ने आत्मविश्वास से कहा, “मुझे ऐसा ज्ञान चाहिए जो हर भ्रम को पार कर जाए।”
नितिन मुस्कुराया, “और मुझे ऐसा सुख, जो सोमवार की अलार्म घड़ी से भी न डरे!”

साधु की मुस्कान थोड़ी गहरी हो गई, “याद रखो, यह अरण्य तुम्हारे मन का दर्पण है। जो भीतर है, वही बाहर दिखेगा… मगर जो यहाँ दिखेगा, वह स्थायी नहीं होगा।”

इतना कहकर वे धुंध में खो गए।

नितिन ने धीरे से कहा, “उम्मीद है टिकट नहीं कटेगा!”
मालविका हँसी, पर उसकी आँखों में हल्का संशय भी था।

थोड़ा और आगे बढ़ते ही हवा जैसे भारी हो गई। पेड़ों की शाखाएँ आपस में गुँथकर एक रास्ता बना रही थीं, जैसे उन्हें बुला रही हों।

तभी अर्जुन के सामने एक स्वर्ण महल उभर आया। उसकी मीनारों पर सूरज की किरणें नाच रही थीं, दीवारें रहस्य से सजी थीं, और दरवाज़े पर लिखा था—“अमर प्रेम”।

अर्जुन का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। यह वही था, जिसकी उसे तलाश थी। उसने हाथ बढ़ाया, पर जैसे ही दीवार को छुआ, महल रेत की तरह ढह गया, और सुनहरी धूल उड़कर आसमान में गुम हो गई। अर्जुन की मुट्ठी में कुछ पल के लिए धूल थी, पर वह भी हवा में विलीन हो गई।

नितिन ने मज़ाक में कहा, “तेरे लिए स्पेशल ऑर्डर था, पर वारंटी छोटी थी!”
अर्जुन ने मुस्कुरा कर देखा, पर उसकी आँखों में थोड़ी नमी थी।

थोड़ी दूर, मालविका के सामने एक विशाल पुस्तक प्रकट हुई, “सर्वज्ञान” शीर्षक के साथ। पन्नों से रोशनी फूट रही थी, जैसे हर उत्तर उसमें छुपा हो।

मालविका ने काँपते हाथों से पहला पन्ना खोला… शब्द धुंधले होने लगे, पन्ने स्याह हो गए, और कुछ ही पलों में पूरी किताब हवा में गायब हो गई।

नितिन बोला, “लो, तेरी किताब भी ऑफलाइन हो गई!”
मालविका हल्का सा मुस्कुराई, पर उसकी मुस्कुराहट के पीछे निराशा छुपी थी।

अब नितिन के सामने एक नीला सरोवर उभरा। उसकी लहरों पर चाँदी की चमक थी, और लहरों पर शब्द उभरे—“अविनाशी सुख”।

नितिन ने मज़ाक में कहा, “चलो, देखते हैं ये कितनी देर ठहरता है!”
जैसे ही उसने पानी छूना चाहा, पूरा सरोवर काले धुएँ में बदलकर गायब हो गया।

नितिन ने कंधे उचका कर कहा, “कम से कम सेल्फ़ी तो खींच लेता!”

थोड़ी देर तीनों चुप रहे। हवा में कुछ बदल गया था। अरण्य अब और भी गहरा लगने लगा, पर डर कम था, और जिज्ञासा ज़्यादा।

वे अरण्य के बीचों-बीच एक पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए। अब हवा भी शांत थी, मानो सब देख रही हो।

वही वृद्ध साधु फिर प्रकट हुए।

साधु ने पूछा, “कहो, क्या पाया?”

अर्जुन ने धीमे स्वर में कहा, “प्रेम को पकड़ना चाहा, वह रेत बनकर उड़ गया।”
मालविका बोली, “ज्ञान को पाना चाहा, वह धुंध बन गया।”
नितिन ने हँसते हुए कहा, “और सुख को छूना चाहा, वह धुएँ में बदल गया!”

साधु थोड़ी देर चुप रहे, फिर बोले, “यही इच्छा का स्वभाव है—वह प्रतीक से जन्म लेती है। महल, पुस्तक, सरोवर… ये प्रतीक हैं। प्रतीक मन को स्पर्श करते हैं, संवेदना जगाते हैं, फिर इच्छा उन्हें थामना चाहती है। पर प्रतीक क्षणिक हैं, इसलिए अंत में खालीपन ही बचता है।”

मालविका ने पूछा, “तो क्या चाहना ही छोड़ दें?”
साधु बोले, “छोड़ने की कोशिश भी इच्छा है। बस देखो—पूरी ईमानदारी से, बिना भागे, बिना पकड़े। प्रतीक आएँगे, जाएँगे, पर जब तुम देख लोगे कि वे टिकने वाले नहीं, तब मन मौन हो जाएगा। और उस मौन में वही प्रेम, वही ज्ञान, वही सुख प्रकट होगा, जो किसी रूप में बँधता नहीं।”

उस क्षण तीनों की आँखों में हल्की मुस्कुराहट थी—न कोई भारीपन, न कोई शिकायत।

अर्जुन ने आँखें बंद कीं, और उसने एक ऐसा प्रेम महसूस किया, जो किसी के होने या न होने पर निर्भर नहीं था।
मालविका को एहसास हुआ कि असली ज्ञान सवालों के पार मौन में है।
और नितिन ने पहली बार ऐसा सुख चखा, जिसके लिए कोई वजह नहीं चाहिए थी।

जब वे गाँव लौटे, सब वही था—वही रास्ते, वही चौपाल, वही चाय की दुकान। पर अब उनके भीतर कुछ बदल चुका था। न दौड़ थी, न डर। बस एक सहज मौन और हल्की सी मुस्कुराहट… और वही उस रहस्यमय अरण्य का असली उपहार था।

और शायद यही सबसे बड़ा रहस्य था—इच्छा प्रतीक से बंधती है; पर जब तुम प्रतीक को बस देखना सीख जाते हो, तब इच्छा का बंधन टूट जाता है… और जो शेष रहता है, वही सच्चा है।

Thursday, July 3, 2025

शब्दों के दाँव

हस्तिनापुर के राजसभा भवन की विशाल और भव्य छत पर लगे सुवर्णकलश प्रातःकालीन सूर्य की स्वर्णिम किरणों से दमक रहे थे। जैसे-जैसे सूर्य की आभा तीव्र होती गई, सभा के गुंबद पर जड़ा हर रत्न, हर नक्काशीदार पत्थर अपने भीतर सजीवता का एहसास कराने लगा। सभा भवन के भीतर भी रोशनी की लहरें फैल गईं, जिनसे वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति का चेहरा मानो प्रकाश में नहाया हुआ प्रतीत हो रहा था। सभा का मंडप भरा हुआ था — राजकुल के पराक्रमी योद्धा, दूर-दूर से पधारे नरेश, ऋषि-मुनि, विद्वानजन और पुरोहितगण सभी वहाँ एकत्र थे।

परंतु उस दिन की भव्यता के बीच भी हवा में एक अदृश्य उदासी तैर रही थी। उपस्थित सभी को आभास था कि कुछ असाधारण होने वाला है — कुछ ऐसा, जो केवल वर्तमान को नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भविष्य को बदल देगा। जैसे कोई अलक्षित तूफ़ान सभा भवन की अदृश्य परिधि पर दस्तक दे रहा हो।

सिंहासन पर महाराज धृतराष्ट्र विराजमान थे। उनकी नेत्रहीन आँखें बाहर से स्थिर दिखती थीं, पर भीतर कहीं मन में लहरें उठ रही थीं — भय, शंका और एक अव्यक्त दुःख की लहरें। वे जानते थे कि उनका पुत्र दुर्योधन जो कुछ करने जा रहा है, वह अनर्थ का मार्ग खोल सकता है, फिर भी वे उसे रोक पाने में असमर्थ थे।

सभा के एक ओर पांडव खड़े थे — युधिष्ठिर, जिनका चेहरा गम्भीर था और मस्तक पर चिंता की रेखाएँ साफ़ झलक रही थीं; उनके ठीक पीछे भीम, जिनके वक्षस्थल की मांसपेशियाँ क्रोध से तन गई थीं और आँखों में आक्रोश की ज्वाला दहक रही थी; अर्जुन, जिनकी दृष्टि बार-बार सभा में बैठे राजाओं की ओर जाती और फिर तुरंत लौटकर शकुनि पर टिक जाती; नकुल और सहदेव भी मौन थे, परन्तु उनके चेहरे पर गहन असमंजस और व्याकुलता की छाया थी।

दूसरी ओर कौरवों की पंक्ति में दुर्योधन की आँखों में एक विचित्र उत्साह की चमक थी, मानो विजय उसे पहले से ही दृष्टिगोचर हो रही हो। उसके पीछे खड़ा था गांधार का राजा शकुनि — मुख पर स्थिर मुस्कुराहट, दृष्टि में अडिग आत्मविश्वास, और मन में अचूक योजना। उसके मुखमंडल पर वह रहस्यमय संतोष था, जो केवल वही व्यक्ति धारण कर सकता है जिसने चाल रच दी हो और विरोधी को जाल में फँसते देख रहा हो।

सभा की गहन चुप्पी को धृतराष्ट्र की गूँजती हुई आवाज़ ने भंग किया। उन्होंने सभा के समक्ष द्यूत क्रीड़ा का प्रस्ताव रखा। क्षणभर के लिए सभा में एक सिहरन-सी दौड़ गई। युधिष्ठिर का मन भीतर से कांप उठा। उन्हें स्मरण था कि द्यूत क्रीड़ा कितने अनर्थ ला सकती है। वे जानते थे कि इस खेल के पीछे दुर्योधन और शकुनि का कोई न कोई षड्यंत्र छुपा है। उनका अंतर्मन कह रहा था कि यह केवल विनोद का खेल नहीं होगा, अपितु परिणाम भयावह होंगे।

युधिष्ठिर का मन धर्म और भय के बीच झूलने लगा। वे सोचने लगे कि क्या धर्म केवल बाहरी मर्यादा निभाना है, या भीतर की चेतना की पुकार को सुनना भी धर्म का ही रूप है? उनके लिए यह प्रश्न इतना सरल नहीं था — यह उनके अस्तित्व का प्रश्न था।

सभा का वातावरण अब और भी गम्भीर हो चुका था। तभी शब्दों का खेल आरम्भ हुआ। वह खेल जिसमें न तो तलवारें खिंचीं, न ही किसी ने शस्त्र उठाए — केवल शब्द थे, पर वे शब्द किसी भी अस्त्र से अधिक घातक सिद्ध हो सकते थे।

शकुनि की आँखों में छल की चमक उभरी। वह मुस्कुराते हुए बोला: “धर्मराज! आप तो स्वयं को सत्यवादी कहते हैं। क्या आप द्यूत को अधर्म मानते हैं?”

युधिष्ठिर का मन जैसे चौंक गया। वे जानते थे कि जुआ अधर्म की ओर ले जाता है, पर वे क्षत्रिय भी थे — जिन्हें किसी भी चुनौती से पीछे हटना समाज में कायरता का प्रतीक माना जाता। क्षणभर के लिए सभा में बैठे सभी राजाओं, मंत्रियों और ऋषियों की दृष्टि उन पर टिक गई।

युधिष्ठिर ने संकोच से उत्तर दिया: “हाँ, जब इसका दुरुपयोग हो, तो यह अधर्म है। परन्तु यदि दोनों पक्ष समान रूप से खेलें, तो यह केवल एक खेल है। किन्तु मामा, यह खेल प्रायः दुर्भावना का कारण बनता है, और संबंधों में विष घोल देता है।”

शकुनि की मुस्कुराहट और गहरी हो गई। वह जानता था कि धर्मराज को सीधे युद्ध के लिए उकसाना व्यर्थ होगा। उसने युधिष्ठिर की आस्था, उनके धर्मबोध और सबसे बढ़कर क्षत्रिय प्रतिष्ठा को लक्ष्य किया। सभा के समक्ष उसने चुनौती दी: “तो क्या आप जैसे क्षत्रिय इस खेल से डरते हैं? क्या श्रेष्ठ योद्धा बुद्धि के युद्ध से भाग सकते हैं?”

सभा में कानाफूसी शुरू हो गई। सभा में बैठे कई नरेशों ने नजरें उठाकर युधिष्ठिर की ओर देखा — उनके नेत्रों में जिज्ञासा भी थी और अनकहा दबाव भी। युधिष्ठिर ने सभा पर दृष्टि डाली — यह दृष्टि उन पर बोझ की तरह थी, मानो वह क्षण-क्षण उनका साहस परख रही हो।

युधिष्ठिर ने धीमे स्वर में कहा: “मेरा संदेह अपने मन पर नहीं, इस खेल की निष्पक्षता पर है। आप पासों के अद्वितीय ज्ञाता हैं, और मैं इस विद्या में निष्णात नहीं। क्या ऐसा असमान खेल धर्म के अनुकूल होगा?”

शकुनि का मुख तिरछी मुस्कुराहट से खिल उठा। उसने सभा की ओर देखते हुए कहा: “धर्मराज! क्या चतुरता पाप है? क्या आप अपने भाइयों की नीति, बुद्धि और संयम पर भरोसा नहीं रखते? क्या आप सभा में स्वीकार करेंगे कि आप जैसे धर्मज्ञ, मुझ जैसे वृद्ध से हार जाएँगे?”

सभा में सन्नाटा पसर गया। यह सीधा प्रहार था युधिष्ठिर के आत्मविश्वास पर। सभा की मौन दृष्टि अब उन पर और भी गहराई से टिकी थी।

युधिष्ठिर के भीतर द्वंद्व चरम पर पहुँच गया। धर्म की रक्षा कैसे हो? क्या इनकार कर देना धर्म है, या चुनौती स्वीकार करना? उनके मुख पर चिंता की रेखाएँ और गहरी हो गईं।

शकुनि ने अंतिम प्रहार किया: “धर्मराज! क्षत्रिय का कर्तव्य है युद्ध करना — और द्यूत भी तो एक युद्ध है, मस्तिष्क का युद्ध। धर्म तो यही कहता है कि कर्तव्य करो, फल की चिंता मत करो। यदि आप भविष्य के भय से वर्तमान कर्तव्य का त्याग करेंगे, तो क्या यह भी धर्म के विपरीत नहीं होगा?”

युधिष्ठिर का हृदय मानो काँप उठा। वे यह भाँप गए कि सभा में उनका इनकार कायरता माना जाएगा। उनके अंतर्मन ने फिर भी चेतावनी दी कि यह खेल अनर्थकारी होगा, परंतु धर्म की मर्यादा का पालन और क्षत्रिय गौरव का दबाव भारी पड़ गया।

सभा के मध्य बहुमूल्य पासे लाए गए — सुन्दर, चिकने और चित्ताकर्षक। शकुनि ने पासों को हाथ में लेकर धीरे से कहा: “धर्मराज! आपके और मेरे बीच यह खेल निष्पक्ष होगा। परन्तु पासे मैं चलूँगा, क्योंकि दुर्योधन मेरे पक्ष में खेल रहा है, और आप अपने पक्ष में।”

युधिष्ठिर का मन फिर डगमगाया — यह शर्त अन्यायपूर्ण थी। उन्होंने प्रश्न किया: “क्या आप मुझसे निष्पक्षता छीनना चाहते हैं?”

शकुनि तुरंत बोला: “क्या आप मुझ पर अविश्वास करते हैं? क्या यह धर्म के विरुद्ध नहीं है?”

वह तर्क इतना सशक्त था कि सभा भी मौन हो गई। युधिष्ठिर के भीतर की नैतिकता और बाहरी सम्मान की जंग में बाहरी दबाव जीत गया। उन्होंने सिर झुकाकर मौन सहमति दे दी।

उसी क्षण दुर्योधन की दृष्टि में असीम संतोष था, और शकुनि के चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट फैल गई — क्योंकि युद्ध उसने जीत लिया था, बिना कोई पासा फेंके, केवल शब्दों की शक्ति से।

यह वह क्षण था जब शकुनि ने धर्मराज को उनके अपने सिद्धांतों की बेड़ियों में बाँध दिया। वह खेल जो अब शुरू होना था, उसके परिणाम पूर्वनिश्चित थे। और यही सबसे बड़ी विडंबना थी — कि युधिष्ठिर ने धर्म की रक्षा के लिए जो निर्णय लिया, वही निर्णय उनके धर्म की सबसे कठोर परीक्षा बन गया।

उस दिन सभा में कोई रक्त नहीं बहा, कोई तलवार नहीं खिंची, परंतु एक धर्मात्मा राजा की अंतरात्मा पर पहला घाव लगा। वह अदृश्य घाव ऐसा था, जिसने आगे चलकर महाभारत के महायुद्ध की भूमिका रच दी — एक युद्ध, जिसने इतिहास को रक्तरंजित अध्याय में बदल दिया। वह युद्ध जिसने लाखों और करोड़ों लोगो को मृत्यु का ग्रास बना दिया.

और उस दिन उस सभा में सबने देख लिया कि सबसे घातक शस्त्र तलवार नहीं, बल्कि शब्द होते हैं — और सबसे बड़ा छल वही होता है, जो धर्म के नाम पर किया जाए।

Wednesday, July 2, 2025

प्रोब्लेम

प्रोब्लेम इस बात में नही है
कि वो बड़ा आदमी है ,
प्रोब्लेम इस बात में है
की वो अपने आप को बड़ा आदमी समझता है .

प्रोब्लेम इस बात में नही है
कि वो अपने आप को बड़ा आदमी समझता है ,
प्रोब्लेम इस बात में है
कि वो जितना बड़ा आदमी है ,
अपने आपको उससे बड़ा आदमी समझता है .

प्रोब्लेम इस बात में भी नही है
कि वो जितना बड़ा आदमी है ,
अपने आपको वो उससे बड़ा समझता है .
प्रोब्लेम इस बात में है
कि अपने आपको जितना बड़ा आदमी समझता है
उससे अपने आपको ज्यादा बड़ा आदमी दिखाता है .

प्रोब्लेम इस बात में भी नही है
कि वो अपने आपको ज्यादा बड़ा दिखाता है ,
प्रोब्लेम दरअसल इस बात में है
कि वो जो कुछ भी दिखाता है ,
मुझे सब कुछ दिखता है .

प्रोब्लेम इस बात में भी नही है
कि वो जो कुछ भी दिखाता है
मुझे सब कुछ दिखता है ,
प्रॉब्लम दरअसल इस बात में है
कि मुझे जो भी दिखाता है
वो सब मुझे खलता है .

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