रसोई की चूल्हे की आँच भी उस सर्द हवा के आगे कमज़ोर पड़ रही थी, मगर माँ के हाथों की ऊष्मा अब भी उतनी ही गाढ़ी और सच्ची थी। माँ की उँगलियाँ पसीने की हल्की महक के साथ बँधी हुई रस्सी जैसी थीं, जो परिवार की ज़िम्मेदारियों को थामे रखती हैं।
माँ को जाते-जाते रुकना पड़ा — जैसे दिल ने कहा हो, “अभी कुछ बहुत ज़रूरी रह गया है।” उन्होंने अपनी पुरानी किनारीवाली साड़ी के पल्लू की तह से दो हज़ार रुपये निकाले। वो नोट थोड़े से मुड़े हुए थे, जैसे वक्त के थपेड़ों ने उन्हें भी झुकना सिखा दिया हो।
माँ ने उन नोटों को थामे-थामे कुछ पल तक देखा। उनकी आँखों में खेत की सूखती फसलें, घर का खर्च, और गाँव के छोटे चाचाजी की चिंताएँ तैर गईं। फिर बहुत धीमी, लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा:
“बेटा, ये रुपये संभालकर रखना — गाँव के छोटे चाचाजी को दे देना। खेत में दवा डालनी है, फसल सूख रही है। ये रुपये बहुत ज़रूरी हैं।”
उस वक़्त उनकी आवाज़ में माँ कम, और जीवन की थकी हुई परिपक्वता ज़्यादा थी। जैसे उनके शब्दों में हर वह चिंता गुँथी हो, जो किसी भी किसान परिवार की पीढ़ियों से होती आई है — सूखा, महंगाई, मौसम की बेरुख़ी और समय की मार।
अनिमेश ने काँपते हाथों से वो नोट पकड़े। उस छोटे से हाथ में अचानक ज़िम्मेदारी का भार आ गिरा था — इतना भारी कि उसकी हथेलियों में पसीना छलक आया।
नोटों की खुशबू में उसे मिट्टी की महक महसूस हुई — उस मिट्टी की, जिसमें उसके पूर्वजों के पसीने की सोंधी गंध थी। उसमें धूप से झुलसी मेहनत की महक थी, और कहीं गहराई में एक अनजाना डर भी था।
“कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए…”
उसका दिल जोर-जोर से धड़क उठा।
माँ का हाथ अपने बालों पर महसूस कर, उसने धीरे से कहा:“चिंता मत करो माँ…”
मगर उसकी आवाज़ में आत्मविश्वास से ज़्यादा डर था, और माँ की आँखें वो डर पढ़ भी सकीं, पर कुछ बोली नहींं — जैसे जानती हों कि कुछ डर ऐसे होते हैं, जिनसे बेटा खुद ही लड़कर बड़ा होता है।
वो धीरे से पलटा, और रुपये को अपनी किताब के पन्नों के बीच रख दिया — वही किताब जो अब तक उसके लिए बस अक्षरों का संसार थी, अब अचानक एक तिज़ोरी बन गई थी।
पन्नों में छुपे वो नोट अब उसे अपनी सांसों से भी कीमती लगने लगे।उसने किताब को छाती से लगाया — जैसे किसी गुप्त ख़जाने को सीने में छुपा लिया हो।
रात का आकाश धीरे-धीरे गहराने लगा। आँगन में चाँदनी ऐसे बिछ गई थी, जैसे किसी ने दूध का कटोरा उलट कर ज़मीन को सर्द सफ़ेद चादर ओढ़ा दी हो।
गाँव की गलियों से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आती, और फिर उसी तेज़ी से ख़ामोशी लौट आती — जैसे पूरी रात कोई अदृश्य पहरेदार बनकर सब पर नज़र रख रहा हो।
अनिमेश रजाई में दुबककर पढ़ने लगा।उसके इर्द-गिर्द किताबों का ढेर था — गणित की मुश्किल संख्याएँ, विज्ञान के सूत्र, हिंदी की कहानियाँ।
मगर उन पन्नों में सबसे कीमती वो दो हज़ार रुपये थे — जिनके बोझ ने उसके बचपन को एक पल में किशोर कर दिया था।
रात के सन्नाटे में उसे माँ की थकी हुई खाँसी सुनाई दी, जो बार-बार रुक-रुककर आती — जैसे माँ का शरीर कह रहा हो, “अब और नहीं…”
पिता की धीमी आवाज़ भी आती — किसी काम की चर्चा, खेत के हालात की चिंता।
ये सब आवाज़ें उसके लिए जानी-पहचानी थीं — मगर आज वो अनजानी-सी भी लग रही थीं। आज वो सिर्फ़ आवाज़ें नहीं थीं, आज वो ज़िम्मेदारियों की याद दिलाती घंटियाँ थीं।
अनिमेश की आँखें थकीं, और एक बार फिर उस किताब की ओर उठीं, जिसमें नोट छुपाए हुए थे।
एक क्षण को उसे लगा, वो नोट उस पर भी नज़र रखे हुए हैं — जैसे वो कह रहे हों, “हम पर भरोसा रखना… कहीं भूल मत करना…”
आँखें धीरे-धीरे भारी होने लगीं।थकान और डर का मिला-जुला बोझ उसकी पलकों को बंद कर रहा था।“कल सुबह देखूँगा… सब ठीक होगा…”
यह सोचते-सोचते, नोटों के भार और किताबों की खुशबू के बीच, अनिमेश नींद की आगोश में चला गया।
चाँद आँगन में चुपचाप चमकता रहा — जैसे गवाही देने के लिए कि उस रात उसने देखा, एक मासूम बच्चे के डर और भरोसे की सबसे सच्ची तस्वीर।
अध्याय 5: हलचल
सुबह जैसे ही गाँव की गलियों में सूरज की पहली रोशनी उतरी,उसके साथ ही हवा में रसोई के धुएँ और गोबर के चूल्हों की मिली-जुली गंध तैरने लगी।
मुर्गे की बांग ने रात के सन्नाटे की चादर को फाड़कर रख दिया,और गली के कुत्ते उस आवाज़ पर कुछ पल भौंक कर चुप हो गए —जैसे सबने मिलकर मान लिया हो कि अब दिन शुरू हो गया है।
माँ की चाय उबालने की आवाज़,पानी से बर्तन धोने की खटपट,पिता के गले की हल्की खाँसी,और दूर कहीं से आती बैल के गले में बँधी घंटी की टन-टन —इन सबने मिलकर एक परिचित सा संगीत रचा,जो हर सुबह घर को ज़िंदा कर देता था।
अनिमेश की नींद टूटी।उसने रजाई में से आधा चेहरा बाहर निकाला।ठंड अब भी चुभ रही थी, मगर आज उसे ठंड से ज़्यादा किसी और चीज़ ने जगाया था —वो याद, कि दो हज़ार रुपये किताब में रखे हैं।“जरा देख लूँ…”
उसने किताब पलटी,फिर दूसरी, फिर तीसरी…चेहरे की रंगत बदलने लगी — जैसे किसी ने दिल पर बर्फ़ रख दी हो।
किताब के पन्ने खरखराए,मगर नोट की मुलायम सी सनसनाहट कहीं नहीं आई।
आँखें फैल गईं। दिल ज़ोर से धड़कने लगा — जैसे सीने में बँधी ढोलक बज रही हो।“नहीं… कहीं तो होंगे… शायद कल दूसरी किताब में रख दिए हों…”
उसने फिर पलटा।उसका हाथ काँपने लगा।सर्द हवा अब बदन के पार होने लगी थी।हर बार पन्ना पलटते हुए उसे वो पल याद आ रहा था,जब माँ ने रुपये थमाए थे —
वो शब्द:“ये रुपये बहुत ज़रूरी हैं बेटा…”
और उसने कैसे कहा था —“चिंता मत करो माँ…”
अब चिंता उसकी रग-रग में उतर चुकी थी।माथे पर पसीना था, हाथ ठंडे थे, और दिल जैसे सूखता जा रहा था।
कुछ ही पलों में घर के बाकी लोग भी जाग गए।माँ ने आवाज़ दी:“अनिमेश! बेटा, वो रुपये दे देना, चाचाजी आते ही होंगे।”
ये सुनते ही उसकी टाँगें जैसे जड़ हो गईं।कंठ सूख गया।उसने होंठ खोले, पर आवाज़ न निकली।
माँ आकर खड़ी हो गईं।उनकी आँखों में भरोसे की चमक थी — वो भरोसा जिसे तोड़ने की कल्पना भी अनिमेश ने कभी नहीं की थी।
उसने धीमी आवाज़ में कहा:“माँ… वो… रुपये… नहीं मिल रहे…”
माँ की आँखों में एक पल को हैरानी तैर गई,फिर चिंता की रेखाएँ खिंच गईं।“क्या? कैसे? कहाँ रखे थे?”
बिस्तर के नीचे, तकिये के अंदर, किताब के हर पन्ने, हर पुरानी कॉपी…माँ, पिता और अनिमेश — तीनों खोज में जुट गए।
हर पन्ना पलटते हुए अनिमेश का दिल डूबता गया।हर बार लगता, “शायद अब मिल जाए…” —पर अगली ही बार दिल पर चोट होती: “नहीं…”
उसने माँ की आँखों में मायूसी देखी।पिता की आँखों में चुपचाप चिंता थी।उन्होंने कुछ नहीं कहा, मगर चुप्पी बोल रही थी।ये चुप्पी तीर बनकर उसके बालमन में धँस गई।“माँ-पापा मुझसे नाराज़ तो नहीं?… सब मेरी ग़लती है… सब…”
उसकी उम्र छोटी थी, मगर मन पर आया बोझ उम्र से बड़ा था।उसे लग रहा था जैसे उसने सिर्फ दो हज़ार रुपये नहीं, माँ का भरोसा और पिता की उम्मीद खो दी हो।
ख़ुद को कोसता जा रहा था:“मुझे और ध्यान रखना चाहिए था… मैंने लापरवाही की…”
उसी बीच आँगन से आवाज़ आई —गाँव के छोटे चाचाजी आ गए थे, जो वो रुपये लेने आए थे।माँ बाहर निकलीं।माँ की आवाज़ काँपी, फिर भी धीमी रही:“भैया… रुपये… नहीं मिल रहे…”
चाचाजी चुप रहे।उनकी आँखों में कुछ पल के लिए आश्चर्य था, फिर चिंता उतर आई।कुछ देर बाद पिता ने अपने पर्स से दो हज़ार रुपये निकालकर चाचाजी को दे दिए।
बात वहीं ख़त्म नहीं हुई —घर की हवा अब बदल चुकी थी।
अनिमेश का मन और भी संकुचित हो गया।उसके लिए किताबें भी भारी लगने लगीं, और पन्ने काँटों जैसे चुभने लगे।
माँ चुप थीं।माँ की चुप्पी किसी डाँट से ज़्यादा डरावनी थी।वो वो शब्द थे, जो बोले नहीं गए — मगर महसूस हुए।
अध्याय 6: शक की सुई
अनिमेश पर शक करना जैसे किसी ने सोचा भी नहीं—वह लड़का जो पूरी सर्दी में किताबों से चिपका रहता था, जो स्कूल में सबसे आगे था, जिस पर उसके पिता को गर्व था। शक की सुई घूमती-घूमती उस पर जा ठहरी, जो हमेशा से निशब्द थी, निरीह थी—बिछिया।
धीरे-धीरे घर में और बाहर बात फैलने लगी।लोगों की आवाज़ें फुसफुसाहट में बदल गईं —“कहीं बिछिया ने तो…?”“अरे वो तो… पहले भी…”
और बिछिया — वो जो रोज़ झाड़ू-पोछा करती थी —वो शक की दीवार के उस पार खड़ी कर दी गई।
इस एक सुबह ने, उस दो हज़ार रुपये की क़ीमत से कहीं ज़्यादा,अनिमेश के दिल में एक ऐसा डर बो दिया,जिसकी जड़ें बहुत गहरी थीं —भरोसे का डर, खोने का डर, और अपने कारण किसी निर्दोष पर आघात का डर।
बिछिया रोज़ की तरह आई।उसके हाथ में वही पुरानी झाड़ू, पीठ पर पुरानी शॉल — जो ठंड रोकने की नाकाम कोशिश करती थी।मुँह पर बासी मुस्कुराहट,और आँखों में थकी हुई लकीरें —जैसे उसकी ज़िंदगी की झाड़ू ने उसके दिल को भी बिखेर कर रख दिया हो।
मगर आज माहौल कुछ बदला हुआ था।माँ की नज़रें पल–भर के लिए बिछिया पर अटक गईं —और वही एक पल बिछिया को भीतर तक चुभ गया।
माँ ने कुछ कहा नहीं।बिछिया के कानों में बस उस एक पल की खामोशी गूँजती रही।“क्या मैं… सच में चोर लगती हूँ?”
काम करते हुए उसका मन भाग कर अतीत में चला गया।वो दिन याद आया जब उसने अपने पति के जेब से दो रुपये चुराए थे —सिर्फ़ बीड़ी के लिए।उस दिन के बाद उसके पति की घृणा ने उसे हर दिन खा लिया था।
अब लगता था कि उसी एक पाप की सजा अब तक मिल रही है।“मेरी काली किस्मत… जहाँ जाती हूँ, चोर ही कहलाती हूँ…”
उसी बीच पड़ोस की औरतें आँगन में हँस–हँस कर बातें कर रही थीं —मगर हर हँसी में एक कील छुपी हुई थी।
“अरे, बिछिया पर तो पहले भी चोरी का इल्ज़ाम लगा था…”“काली है, बीड़ी पीती है… भरोसा कौन करे…”“मुँह पे तो कुछ कहेंगे नहीं, पर सच तो सबको पता है…”
ये शब्द उसके कान में नाग की तरह फुफकारते रहे।उसने घर के कोने में जाकर मुँह छुपा लिया।बीड़ी के लिए माचिस जलाते हाथ काँप गए।आँखें भर आईं।
“हे अल्लाह… मैं तो अब बीमार भी रहती हूँ… हिम्मत भी नहीं रही… फिर भी लोग…”बीड़ी का कड़वा धुआँ उसकी आँखों को जलाता रहा,मगर दिल की जलन उससे कहीं तेज़ थी।
धीरे–धीरे लोग भी घर में आकर सलाह देने लगे।गाँव का चौकीदार आया, बोला:“देखिए, ग़रीब घर में रखी चीज़ पर निगाह जल्दी पड़ती है… काम वाली पर ही नज़र रखिए…”
दूसरी औरत ने कहा:“बिछिया की आदतें तो सब जानते हैं… भगवान ही बचाए…”
कोई बोला:“उसके पास से बीड़ी का ढेर मिला… रुपया आया कहाँ से?”
अनिमेश को ये सब सुनकर और डर लगने लगा।वो अपने कमरे में बैठकर किताबों को घूरता रहा —जैसे उनसे जवाब माँग रहा हो। दिल में खटका हुआ —“कहीं… कहीं मेरी वजह से…?”मगर मासूम दिल को समझ नहीं आता था कि शक की आग कितनी तेज़ होती है —और उसमें कोई भी जल सकता है।
रात ढलने लगी।चाँदनी फिर से आँगन में उतरी,मगर आज वो दूध जैसी नहीं, राख जैसी लग रही थी।बिछिया की परछाईं दीवार पर लंबी होती चली गई —जैसे उस पर लगा इल्ज़ाम उसके पीछे–पीछे चलता हो,और उसे कभी चैन से जीने न दे।
अध्याय 7: मंदिर का घंटा
गरीबी, शक और समाज के द्वेष का त्रिकोण बहुत पुराना है।यह त्रिकोण वैसा ही है जैसे किसी पुराने कुएँ में गिरी हुई कोई पुरानी बाल्टी — जिसे हज़ार बार ऊपर खींचा गया, पर हर बार खाली निकली। उसमें जो भरा होता है, वो सिर्फ़ एक गंध होती है — कुंठा, अभाव और अधजल।
बिछिया के साथ भी वही हुआ — जैसे ही लोगों को पैसे ग़ायब होने के बात की पता चला, मोहल्ले की दीवारें बोल उठीं।
नहीं, सही कहें तो दीवारें नहीं, दीवारों की दरारों में छिपे हुए शक के साँप फुँफकार उठे।
फुसफुसाहटों की वह धीमी आवाज़ पहले आँगन में गूँजी —“हो न हो, बिछिया ने ही चुराए होंगे!”
यह वाक्य नहीं था — यह एक सामाजिक शंखनाद था। जैसे ही यह गूंजा, सबने अपने-अपने भीतर छिपे 'न्यायाधीश' को बाहर निकाल लिया।
अब बिछिया न कोई औरत थी, न कोई इंसान।
वह सिर्फ़ एक सुविधाजनक दोषी थी — एक ऐसी मूरत जिस पर हर कोई अपनी भड़ास, असफलता और अभाव की कालिख पोत सकता था।
जैसे मंदिर का घंटा सबके लिए बजता है,बिछिया भी पूरे मोहल्ले का घंटा बन गई —जिसे जब मन किया, बजा दिया।
रिश्तेदारों को वर्षों पुरानी जलन याद आ गई —
किसी को बिछिया का "बिना मर्द के भी मुस्कराना" खलता था,
किसी को उसका दूसरों से ‘कम बोलना’ संदेहास्पद लगता था।
कामवाली, जो कभी उसके साथ बैठकर चूल्हे पर रोटियाँ सेंकती थी, अब उसकी पीठ पीछे कहने लगी —
“हमेशा अलग-थलग रहती थी, ज़रूर कुछ न कुछ गड़बड़ है।”
फिर भीड़ का मनोविज्ञान सक्रिय हुआ —जिसे मनोवैज्ञानिक “Projection of Personal Frustration on the Weakest” कहते हैं —
हर किसी ने अपनी मन की गांठें बिछिया पर खोल दीं।
किसी को अपने पति से गुस्सा था,
किसी को अपने बेटे की बेरोज़गारी साल रही थी,
किसी को अपनी बेटी का अधूरा सपना कचोटता था,
और किसी को हर महीने की कम पगार से आत्मसम्मान कुचलता महसूस होता था।
पर अफ़सोस! इन सबका समाधान समाज को एक बलि की बकरी चाहिए थी — और बिछिया सबसे आसान निशाना थी।
उसे बुलाया गया —न कानून, न सुनवाई, न गवाह —बस भीड़, आँखें, और फुसफुसाहटों का गठजोड़।
उससे पूछा गया,
फिर दोबारा पूछा गया,
फिर आवाज़ ऊँची की गई,
फिर ज़बान तेज़ हुई,
फिर हाथ बढ़े —
उसकी झोंपड़ी खँगाली गई,
बिस्तर की तहें उधेड़ी गईं,
जेबें टटोली गईं,
कपड़े तक उतरवा लिए गए।
और मिला क्या?
बीड़ी के आठ-दस पुराने पैकेट।
बस — यही बन गया न्याय का आधार।
लोगों ने नतीजा सुना दिया —
“देखा? चोर है! बीड़ी की लत ने बिगाड़ दिया।”
कोई नहीं पूछता कि बीड़ी पीना चोरी का प्रमाण कैसे हो सकता है।
कोई नहीं सोचता कि बीड़ी का वह कश एक ग़रीब की आत्मा पर लगी राख को ढँकने की कोशिश हो सकती है —
एक पल का सुकून, उस बदन के लिए जो हर दिन सौ गालियाँ, सौ अपमान और सौ झूठे वादे सहता है।
पर तर्क?
भीड़ के न्याय में तर्क की जगह नहीं होती।
वहाँ सिर्फ़ भावना चलती है —
और भावना भी नहीं,
बल्कि “सामूहिक कुंठा का न्याय”।
जिस समाज में हर दूसरा इंसान किसी न किसी वजह से टूटा हो,
वहाँ टूटे हुए पर पत्थर फेंकना आसान हो जाता है।
बिछिया की टूटन लोगों को अपनी जैसी लगी —
और किसी का खुद जैसा टूटना लोगों को सबसे ज़्यादा अखरता है।
यह घटना उस गाँव के इतिहास में दर्ज नहीं हुई।
अख़बारों में नहीं छपी।
पुलिस में कोई रिपोर्ट नहीं बनी।
क़ानून की कोई धारा नहीं टूटी।
पर जो टूटा — वह एक स्त्री का आत्मसम्मान था।
और समाज?
समाज ने अगले दिन वही किया जो वह हर बार करता है —
“भूल जाना।”
लज्जा:
दिसम्बर आया। परीक्षा आयी और चली गई । जनवरी में रिजल्ट भी आ गया। अनिमेश स्कूल में फर्स्ट आया था। अनिमेश के पिताजी ने खुश होकर अनिमेश को साईकिल खरीद दी । स्कूल में 26 जनवरी मनाने की तैयारी चल रही थी । अनिमेश के मम्मी पापा गाँव गए थे। परीक्षा के कारण अनिमेश अपने कमरे की सफाई पर ध्यान नहीं दे पाया था। अब छुट्टियाँ आ रही थी। वो अपने किताबों को साफ़ करने में गया । सफाई के दौरान अनिमेश को वो 2000 रूपये किताबों के नीचे पड़े मिले। अनिमेश की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था। तुरंत साईकिल उठा कर गाँव गया और 2000 रूपये अपनी माँ माँ को दे दिए।
बिछिया के बारे में पूछा। मालूम चला वो आजकल काम पे नहीं आ रही थी। परीक्षा के कारण अनिमेश को ये बात ख्याल में आई हीं नहीं कि जाने कबसे बिछिया ने काम करना बंद कर रखा था। अनिमेश जल्दी से जल्दी बिछिया से मिलकर माफ़ी मांगना चाह रहा था। वो साईकिल उठाकर बिछिया के घर पर जल्दी जल्दी पहुँचने की कोशिश कर रहा था । उसके घर का पता ऐसा हो गया जैसे की सुरसा का मुंह । जितनी जल्दी पहुँचने की कोशिश करता , उतना हीं अटपटे रास्तों के बीच उसकी मंजिल दूर होती जाती।खैर उसका सफ़र आख़िरकार ख़त्म हुआ। उसकी साईकिल बीछिया के घर के सामने रुक गई । उसका सीना आत्म ग्लानि से भरा हुआ था । उसकी धड़कन तेज थी । वो सोच रहा था कि वो बिछिया का सामना कैसे करेगा। बिछिया उसे माफ़ करेगी भी या नहीं । उसने मन ही मन सोचा कि बिछिया अगर माफ़ नहीं करेगी तो पैर पकड़ लेगा। उसकी माँ ने तो अनिमेश को कितनी हीं बार माफ़ किया है । फिर बिछिया माफ़ क्यों नहीं करेगी ? और उसने कोई गलती भी तो नहीं की। तभी एक कड़कती आवाज ने उसकी विचारों के श्रृंखला को तोड़ दिया । अच्छा ही हुआ, उस चोर को खुदा ने अपने पास बुला लिया। ये आवाज बिछिया के पति की थी । उसके पति ने कहा , खुदा ने उसके पापों की सजा दे दी । हुक्का पीते हुए उसने कहा, 2000 रूपये कम थोड़े न होते हैं बाबूजी । इतना रुपया चुराकर कहाँ जाती । अल्लाह को सब मालूम है । बिछिया को टी. बी. हो गया था। उस चोर को बचा कर भी मैं क्या कर लेता। और उसपर से मुझे परिवार भी तो चलाना होता है।
अध्याय 9: कालिख
बिछिया के पति ने बिछिया की रामकहानी कुछ यूँ बयाँ की ।
उस घटना के बाद सर्दी ने जैसे बिछिया की साँसों पर बर्फ की परत चढ़ा दी थी।उसका झुर्रियों से भरा चेहरा और भी मुरझा गया।बीड़ी के धुएँ ने फेफड़ों को खोखला कर डाला —अब हर सुबह खाँसी का ऐसा दौरा पड़ता, जैसे सीने में कोई शूल चुभ रहा हो।
गाँव की गलियों में उसका झुका हुआ कद, काँपते हाथ,और बार-बार रुक-रुक कर ली जाने वाली साँसें देखने वाले को भी दया से ज़्यादा डर दे जातीं।
“अल्लाह… अब कितना बचा है मेरे पास…”उसने कई बार सोचा, मगर फिर खाँसी के साथ सब धुँधला हो जाता।
जिन गलियों से रोज़ गुजरती थी,वहीं अब कानों में फुसफुसाहटें घुल जातीं: यही है वो… चोर औरत…”“बीड़ी की लत ने बर्बाद कर दिया…”
घर की औरतें बर्तन धोते-धोते मुँह फेर लेतीं।बच्चे उँगली दिखा कर हँसते:“बिच्छू आ गई…”
उसका नाम अब “बिछिया” नहीं,महज़ एक ताना बन चुका था —जिसे कोई भी, कभी भी, मज़ाक में उछाल देता।
बिछिया बेचारी अकेली घुट घुट कर जी रही थी। अकेलेपन में उसे बिड़ी का साथ मिला। बिड़ी पीकर वो अपने सारा गम भुला देती। अधेड़ थी बिछिया । कितना अपमान बर्दास्त करती ? मन पे किए गये वार तन पर असर दिखाने लगे। उपर से बीड़ी की बुरी लत। बिछिया बार बार बीमार पड़ने लगी थी। खांसी के दौरे पड़ने लगे थे। काम करना मुश्किल हो गया। घर पे हीं रहने लगी। हालांकि उसके पति ने अपनी हैसियत के हिसाब से उसका ईलाज कराया। पर ज़माने की जिल्लत ने बिछिया में जीने की ईक्छा को मार दिया था। तिस पर से उसके पति की खीज और बच्चों का उपहास। बिछिया अपने सीने पे चोरी का ईल्जाम लिए हुए इस संसार से गुजर गई थी।
अध्याय 9: रुकी हुई माफ़ी
अनिमेश सीने में पश्चाताप की अग्नि लिए घर लौट आया। उसके पिताजी ने पूछा , अरे ये साईकिल चला के क्यों नही आ रहे हो ? ये साईकिल को डुगरा के क्यों आ रहे हो? दरअसल अनिमेश अपने भाव में इतना खो गया था कि उसे याद हीं नहीं रहा कि वो साईकिल लेकर पैदल हीं चला आ रहा है। उसने बिछिया के बारे में तहकीकात की।
बिछिया अब इस दुनिया में नहीं थी। बिछिया की मृत्यु का कारण सिर्फ़ टी.बी. नहीं था; उसकी आत्मा पर लगे उस दाग़ ने उसे तोड़ दिया था, जो वह कभी धो नहीं पाई।
अनिमेश की माफ़ी, जो वह अपने दिल में लिए आया था, अब हवा में तैरती रह गई। वह न रो सका, न कुछ कह सका—बस भारी कदमों से वापस लौट आया।
समय बहता रहा — जैसे गाँव के तालाब में हर बरसात के बाद पानी का रंग थोड़ा बदल जाता है, वैसे ही ज़िन्दगी भी रंग बदलती रही।
अनिमेश बड़ा हुआ, पढ़ा, निकला, आगे बढ़ा — वह शहर गया, नौकरियों में आया, नाम कमाया।वह शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत है, समाजसेवा से जुड़ा है, और अपने गाँव के लिए पुस्तकालय और स्कूल भी खुलवाया है।
आज वह गाँव के प्रतिष्ठित विद्वानों में गिना जाता है — न्याय, नैतिकता और संवेदनशीलता पर उसके व्याख्यान सुने जाते हैं। किंतु जब भी वह 'चरित्र निर्माण' या 'मानव मूल्य' की बात करता है, तो बिछिया की सूरत एक पल को उसकी आँखों के आगे तैर जाती है — वह टूटी चारपाई, वह झुर्रियों से भरा चेहरा, और वह मौन जो कभी टूटा नहीं, सिर्फ़ बुझ गया।
अनिमेश जानता है — उसने जानबूझकर कुछ नहीं किया था। पर कभी-कभी वक्त सबसे बड़ी सज़ा उसी की सजा देता है जिससे अंजाने में हीं सही ऐसी चूक हो जाती है ,जो उसकी आत्मा को द्रवित करती रहती है— और वो चूक होती है "समय पर सच को पहचान न पाना।"
उसकी स्मृति पटल के एक कोने के भीतर अब भी अँधेरा है जहाँ बिछिया का चेहरा धुँधले धुँधले बादलों की तरह तैरता है, और उसकी अंतरात्मा के भीतर एक पुकार हमेशा गूंजती रहती है : "माफ़ करना!"
वह माफ़ी, जो कभी बिछिया तक नहीं पहुँच पाई।वह माफ़ी, जो आज भी अधूरी है। और यही अधूरापन उसकी आत्मा को आज भी चुपचाप कचोटता है।
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