ऐसा आपने लोगों को अक्सर कहते हुए सुना होगा—
“ईश्वर की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।”
इस कथन को मानने वाले लोगों का विश्वास है कि इस सृष्टि में घटने वाली प्रत्येक घटना के पीछे ईश्वर ही कारण है। उनके अनुसार जो कुछ भी हो रहा है—अच्छा हो या बुरा—सब कुछ ईश्वर की इच्छा से ही घट रहा है। अर्थात, ईश्वर की मर्जी के बिना इस जगत में कुछ भी घट ही नहीं सकता।
यदि इस सिद्धांत को हम बिना विवेक के पूर्णतः सत्य मान लें, तो इसके अत्यंत गंभीर और खतरनाक दुष्परिणाम हो सकते हैं।
यदि कोई अपराधी किसी निर्दोष व्यक्ति की हत्या कर दे, तो वह यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है कि यह सब ईश्वर की मर्जी से हुआ।
यदि कोई चोर चोरी करे, तो वह भी यही तर्क दे सकता है कि जब ईश्वर की इच्छा के बिना पत्ता तक नहीं हिलता, तो चोरी कैसे हो सकती है?
इस प्रकार यह सिद्धांत मनुष्य को उसके कर्तव्य, जवाबदेही और नैतिक उत्तरदायित्व से मुक्त कर देता है।
यही नहीं, यह विचार मनुष्य को एक गहरी दुविधा में डाल देता है—
यदि संसार में इतनी हिंसा है, इतने अपराध हैं, इतना अन्याय है, तो क्या इन सबके लिए ईश्वर ही जिम्मेदार है?
एक बार एक संत से उनके शिष्य ने इसी प्रकार का प्रश्न पूछा।
शिष्य ने कहा—
“यदि इस जगत में घटने वाली सारी घटनाओं के पीछे ईश्वर ही कारण है, तो फिर एक साधारण मनुष्य की क्या जिम्मेदारी है? यदि कोई हिंसा करता है, कोई अपराध करता है, तो उसमें उस व्यक्ति की कोई जवाबदेही कैसे बनती है? क्योंकि ईश्वर की मर्जी के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।”
संत मुस्कुराए। उनके चेहरे पर करुणा थी, आँखों में गहरी स्पष्टता।
उन्होंने कहा—
“तुमने प्रश्न ठीक पूछा है, पर उत्तर को समझने के लिए दृष्टि को सूक्ष्म बनाना होगा।”
संत ने एक उदाहरण दिया—
“मान लो, एक गाय को एक खूंटी से बाँध दिया गया है। गाय की गर्दन एक रस्सी से बंधी है, और वह रस्सी उसे एक निश्चित परिधि के भीतर ही घूमने की अनुमति देती है।
यह निश्चित है कि वह गाय उस परिधि के बाहर नहीं जा सकती।
पर यह भी उतना ही सत्य है कि उस परिधि के भीतर वह पूरी तरह स्वतंत्र है—
वह चाहे तो बैठ सकती है, खड़ी रह सकती है, घास खा सकती है, या इधर-उधर घूम सकती है।”
संत ने आगे कहा—
“उस परिधि के भीतर गाय जो भी करती है, उसके परिणाम उसी को भुगतने होते हैं।
यदि वह अपने दायरे में कोई जहरीली वस्तु खा ले, तो उसका दुष्परिणाम उसी को झेलना होगा।
यदि वह अपने मालिक को सींग मार दे, तो दंड भी उसी को भोगना पड़ेगा।
खूंटी उसे बाँधती है, पर उसके कर्मों की जिम्मेदारी उससे नहीं छीनती।”
फिर संत ने मनुष्य की ओर संकेत करते हुए कहा—
“ठीक इसी प्रकार ईश्वर ने भी मनुष्य को कुछ निश्चित नियमों की परिधि में रखा है।
मनुष्य का शरीर, मन और बुद्धि कुछ प्राकृतिक और नैतिक नियमों के अधीन कार्य करते हैं।
यदि मनुष्य आग में हाथ डालेगा, तो वह जलेगा।
यदि वह पानी में जाएगा, तो उसे तैरने का प्रयास करना ही पड़ेगा, अन्यथा वह डूब जाएगा।
इस सृष्टि में ऐसे अनगिनत नियम हैं, जिनका उल्लंघन कोई भी नहीं कर सकता—न राजा, न संत, न साधारण मनुष्य।”
संत ने स्पष्ट शब्दों में कहा—
“ईश्वर ने मनुष्य को स्वतंत्रता दी है, पर स्वेच्छाचार नहीं।
मनुष्य अपने दायरे के भीतर पूर्णतः स्वतंत्र है, पर उस स्वतंत्रता के उपयोग के लिए वही उत्तरदायी है।”
जिस प्रकार गाय अपनी परिधि के भीतर स्वतंत्र है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपने जीवन की सीमाओं के भीतर स्वतंत्र है।
पर उस स्वतंत्रता का उपयोग यदि वह हिंसा, अपराध, छल या अन्याय के लिए करता है, तो उसके परिणाम भी उसी को भुगतने होंगे।
संत ने दृढ़ स्वर में कहा—
“इस सृष्टि में जो भी हिंसा हो रही है, जो भी अपराध हो रहे हैं, उनमें ईश्वर की कोई मर्जी शामिल नहीं है।
यह सब मनुष्य द्वारा अपनी स्वतंत्रता के दुरुपयोग का परिणाम है।
ईश्वर ने कर्म करने की शक्ति दी है, पर कर्म का चुनाव मनुष्य स्वयं करता है।”
अंत में संत ने उस प्रसिद्ध कथन का रहस्य खोलते हुए कहा—
“यह सत्य है कि ईश्वर की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।
पर यह भी उतना ही सत्य है कि वह पत्ता कैसे, किस दिशा में और किस वेग से हिलेगा—यह उसकी अपनी स्वतंत्रता है।
और उस दिशा में हिलने से जो भी परिणाम होंगे, अच्छे या बुरे—उन्हें उस पत्ते को ही भुगतना होगा।”
यही ईश्वर की परफेक्टनेस है—
न पूर्ण नियंत्रण, न पूर्ण अराजकता—
बल्कि नियमों के भीतर दी गई स्वतंत्रता,
और स्वतंत्रता के साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारी।
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