इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
खुद को समझने की फुर्सत नहीं मगर,
दुनिया समझने का दावा है हर पहर।
इंसान की फ़ितरत क्या कितने नकाब,
सवालों में होते अक्सर जीने के राज़ ।
है सच की तलाश ओढ़े झूठे लिबास भी
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
शहरों में भटकन तन्हाई की आग है,
रातों के सन्नाटों में लिए कई ख्वाब है।
पढ़ के हीं सीख ले ये चीज नहीं आदमी,
ठोकर पर गिरकर हीं सीख लेता आदमी।
ज़ख़्मों से पूछता है दवा और इलाज भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
दिल में जज्बातें सजाता बेहिसाब,
लफ्जों में भर के रखता है कई राज।
जो पास है उसकी कदर नहीं है इसको ,
जो दूर है आफ़ताब समझता है उसको।
चाँदनी में खुद के ही दागों से डरता और
आईना दिख जात तो होता नाराज़ भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
खुद से अकड़ता है खुद से हीं लड़ता,
उठने की चाह में गिरता संभालता।
शौक भी तो पाले क्या दारू शराब है,
फूंकता है धुंआ और पीता तेजाब है।
कि जीने की जिद पर मरने को बेताब भी।
इन्सान की ये फितरत है अच्छी खराब भी,
दिल भी है दर्द भी है दाँत भी दिमाग भी ।
कि जीने की जिद पे मरने को बेताब भी।
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