Friday, November 6, 2026

अश्वत्थामा आ पहुंचा रक्त कुंड लिए नर मुंड लिए

जिसके सम्मुख झुकते नृप थे, करते  थे आज्ञा स्वीकार,

जिसके भय से कंपित हो ,जाते थे  अरिदल अति अपार।

आश्वस्त रहा सिंहों की भाँति  गज सा मस्त रहा जीवन में,

तन चींटी  से  बचा रहा था आज वो ही योद्धा उस क्षण में।


पड़ा हुआ था दुर्योधन हो कर वन पशुओं के समक्ष लाचार,

कभी शिकारी जो वन फिरता आज स्वयं हीं बना शिकार।

आज उसी के रक्त-रंजित तन पर, मंडराते थे वन्य विहंग,

कालचक्र की गति देखो कैसी, बदल गए  जीवन के रंग।


मरना   तो   सबको   होता एक दिन वो  बेशक मर जाता,

योद्धा   था  ये   बेहतर होता   रण   क्षेत्र   में अड़  जाता।

या  मस्तक  कटता  उस  रण  में और देह को देता त्याग ,

या झुलसाता शीश अरि का पर जल में छुप निकला भाग।


एक  वीरोचित एक योद्धा  का उसको  ना  सम्मान मिला ,

कुकर्म रहा  फलने  को बाकी नहीं शीघ्र परित्राण मिला।

टूट  पड़ी थी  जंघा   उसकी   उसने   बेबस  कर   डाला,

होना  था अपकर्ष फलित सम्मान रहित मृत्यु का प्याला। 


जंगल के  पशु जंगल के घातक  नियमों से हीं  चलते  है,

उन्हें ज्ञात क्या धैर्य प्रतीक्षा  गुण  जो मानव में बसते  हैं।

पर जाने क्या डर ऐसा था  योद्धा के उस मांसल तन ने ,

हिंसक  सारे बैठ पड़े थे दमन  भूख  का करके मन में।


घुप्प अँधेरा नीरव  रात्रि में  सरक सरक  के चलते सांप , 

हौले  आहट  त्वरित  हो रहे  यम के वो  मद्धम पदचाप।

धर्म   पुण्य   का संहारक   अधर्म   अतुलित  अगाधा , 

दक्षिण   से अवतरित हो रहा  था  अश्वत्थामा  विराधा।


नेत्रों में प्रतिशोध धधकता, मुख पर थी ज्वाला विकराल,

केश बिखराए, देह रक्तमय, मुखमंडल था रक्तिम लाल।

मस्तक पर मणि दमक रही थी, जैसे अग्नि का हो द्वार,

पग पग  पर मृत्यु नाचती, बन उसका सहचर प्रगाढ़  ।


एक  हाथ   में  शस्त्र सजा के  दूजे  कर नर मुंड लिए,

द्रोणपुत्र यम सा हीं दिखता था हाथों में रक्त कुंड लिए  ।

अश्वत्थामा आ पहुंचा  रक्त  कुंड  लिए  नर   मुंड   लिए

अश्वत्थामा आ पहुंचा  रक्त  कुंड  लिए  नर   मुंड   लिए।

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