Friday, November 6, 2026

ज्यों बैठ किनारे सागर तट पे

तू दीप जलाता मंदिर में, मन का अँधियारा कौन हरे?
तू फूल चढ़ाता चरणों में, मन का उजियारा कौन रचे?
चंदन से मस्तक रंग डाला, कब अंतर्मन पर शुद्ध हुआ?
माला के मनके गिनते हो, पर मन प्रभु अवरुद्ध  रहा?
तू घंट बजाता मंदिर में, क्या मन की घंटी बजती है?
तू थाल सजाता मंदिर में ना अंतर-ज्योति सजती है?
तू गीता का उपदेश सुने , कर्मों की चर्चा करता तू,
पर फल की इच्छा है मन में,निष्काम कहाँ रहता तू?
तेरे मन में ना लहर उठी,ना प्रीत जगी ना आस उठी।
अधरों पे मिथ्या राम नाम,ना दिल में कोई प्यास उठी।
कभी मंदिर में चले गए ,पूजा वन्दन और नृत्य किए।
शिव पे थोड़ी सी चर्चा की,कुछ वाद किए घर चले गए।
ज्ञानी से थोड़ी जिज्ञासा,कौतुहल वश कुछ बातेें की।
हाँ दिन में की और रातें की,जग में तुमने बस बातें की।
तू लाख बहाने गढ़ता है, व्यस्तता का ये संसार लिए,
कहे समय ना मिलता है , अपने सारे व्यापार लिए।
तू राम-कथा का ज्ञाता है, पर राम-भाव से दूर खड़ा,
तू कृष्ण-प्रेम का गायक है, पर प्रेम-मार्ग से दूर रहा?
तू शिव की महिमा गाता है, पर विष को पीना सीखा क्या?
तू बुद्ध-शरण की बात करे, पर मौन में जीना सीखा क्या?
ना वो केवल मंदिर में है, ना मस्जिद में,  गुरुद्वारों में,
ना केवल शास्त्र अक्षर में, न केवल संत-विचारों में।
वो प्रेम जहाँ निष्कपट मिले, करुणा जहाँ विस्तार करे,
वो वहीं प्रकट हो जाता है, जहाँ मन द्वेष अहंकार डरे।
मन में रखते रहने से मात्र कुछ प्रश्न कुछ जिज्ञासा,
ना मिल पाता परम तत्व, जब तक ना कोई पिपासा।
और ईश्वर को क्या खोया कहीं,जो ढूढ़े उसको किधर कहीं ?
हृदय ईश प्रेम पुष्प  खिला नहीं, चर्चा से ईश्वर मिला कहीं ?
बिना भक्ति के बिना भाव के,ईश्वर का अर्चन कैसा?
ज्यों बैठ किनारे सागर तट पे ,सागर के दर्शन जैसा।

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