आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,
और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
देखकर राजा ने सोचा गर यह वन खो जाएगा,
शेर का भोजन यकीनन यह यहीं हो जाएगा।
करुणागत राजा ने उसको राह से उठा लिया,
उस अभागे भिक्षु को निजअश्व पर बैठा लिया।
वो भिखारी स्वर्ण रंजित अश्व पे विस्मित हुआ,
साथ राजा का मिला निज भाग्य पे चकित हुआ।
नृप भी विस्मित हुआ भिक्षुक को यूँ देखकर,
ढो रहा पोटली क्यों भिक्षुक अश्व पर बैठकर?
अश्व हीं जब चल रहा है बोझ लेकर राह में,
पोटली का बोझ लेकर चल रहे क्यों बांह में?
आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,
और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
समझाया राजा ने भिक्षु कंधे को ना बोझ ढो,
अश्व पर बैठे हो तुम तो अश्व को ही बोझ दो।
राजा की बातों को सुनकर मुसकाया था मंद हीं,
भिक्षुक वो कहने लगा था बातें रुक कर चंद हीं।
आपने मुझको बैठाया कम नहीं उपकार है,
पर पोटली भी अश्व ढोये ये नहीं स्वीकार है।
अश्व तो पहले बेचारा ढो रहा मेरे बोझ को ,
हे राजा विनती है छोटी पोटली ना बोझ दो।
और कुछ तो कर सकूँ ना नृप तेरी राह में,
कम से कम ये पोटली रहने दे मेरी बाँह में।
आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,
और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
सोच के दिल को मेरे थोड़ा सा इत्मीनान है,
पोटली का बोझ मुझपे अश्व को आराम है।
एक राजा जा रहा था शेर की शिकार में,
पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
भिक्षुक तुम भी कैसे हो ना इसका कोई बोध है ,
पोटली का बोझ किसपे बुद्धि को अवरोध है?
या कि खुद की बाहों में या कि रख दो अश्व पे,
तेरा और तेरी पोटली का भार होगा अश्व पे।
राजा मुख सुन भिक्षुक बोला क्या है तेरी चाह में ,
बोला तू भी तो नादां है राजा फंसा अहम वाह में ।
आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,
और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
राजन अपनी पीठ पर चल रहे राज्य भार धर ,
सोचते तुम कर्म तेरा व्यर्थ ना अहंकार कर।
जिस धरा पर तू खड़ा है, वो भी तेरी तो नहीं,
जिस प्रजा पर राज तेरा वो भी तो तेरी नहीं।
जिस बदन से राज करता, वह बदन तेरा कहाँ,
जिस धारा से जी रहा तू, वो तरल तेरा कहाँ।
जिस हवा पर तू है फलता वह तेरा कैसे हुआ?
जिस जगत में तू है चलता, वह तेरा कैसे हुआ?
देख तो जगत का कारण छुपा क्यों निगाह में ,
बोझ तेरे राज्य का ईश्वर पर तू क्यों डाह में ?
आखेट को ऊत्सुक था राजा शेर की वो थाह में,
और पोटली लेके खड़ा था एक भिक्षुक राह में।
कल जो आने वाला है और गुजर जो कल गया ,
ना है तेरा कुछ भी राजन ना कर्म ना फल गया।
जीत उसकी हार उसकी प्रभु का संसार है ,
और तू नाहक हीं सोचे राज्य निज के भर है ।
इस जगत का बोझ प्रभु पर भार भी संसार का,
पर चला तू भार लेके निज के हीं अहंकार का।
कर भी क्या सकता है तू क्या क्या है तेरे हाथ में,
ज्यों मै लेकर चल रहा हूं पोटली ले हाथ में।
सब समपर्ण उन पर कर उन प्रभु की पांव में ,
बोझ लेके चल ना राजन जा पड़ो उन छाव में।
आखेट को ऊत्सुक वो राजा चल पड़ा उस राह में ,
पोटली लेके खड़ा वो भिक्षुक कह रहा जिस चाह में
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