Friday, December 8, 2017

रोज उठकर सबेरे , नोट कि तलाश में


रोज उठकर सबेरे , नोट कि तलाश में .
चलाना पड़ता है मीलों , पेट कि खुराक में .

सच का दमन पकड़ के , घर से निकालता है जो .
झूठ कि परिभाषाओं से , गश खा जाता है वो .

बन गयी बाज़ार दुनिया , बिक रहा सामान है .
जो है ऊँची जगह पे , उतना ही बेईमान है .

औरों की बातें है झूठी , औरों की बातो में खोट .
और मिलने पे सड़क पे , छोडे न एक का भी नोट .

तो डोलते नियत जगत में , डोलता ईमान है .
और भी डुलाने को , मिल रहे सामान है .

औरतें बन ठन चली है , एक दुकान सजाए हुए .
जिस्म पे पोशाक तंग है , आग दहकाए हुए .

तो तन बदन में आग लेके , चल रहा है आदमी .
ख्वाहिशों की राख़ में भी , जल रहा है आदमी .

खुद की आदतों से अक्सर , सच ही में लाचार है .
आदमी का आदमी होना , बड़ा दुशवार है .



अजय अमिताभ सुमन 




कितना सरल है सच


कितना सरल है सच?
कितना कठिन है सच कहना.

कितना सरल है प्रेम?
कितना कठिन है प्यार करना

कितना कठिन है दुश्मन?
कितना सरल है दुश्मनी करना.
कितना कठिन है नफरत?
कितना सरल है नफरत करना.
कितना सरल है राह प्रभु की?
कितना कठिन है प्रभु डगर पे चलना. 



अजय अमिताभ सुमन 

मैं अनेक हूँ


सड़क पे एक्सीडेन्ट में लोगो को मरते देख
डरने वाला आदमी , 

ऑफिस में लेट पहुँचने के डर से
सड़क पे सरपट दौड़ लगाने वाला आदमी .

ऑफिस में अपने से छोटे स्टाफ को
झूठ बोलने पे गाँधी का लेक्चर देने वाला आदमी ,

और घर पे पडोसी को एवोइड करने के लिए 
बेटे से झूठ कहलवाने वाला आदमी .

बेटे को टी वी से चिपक कर क्रिकेट देखने पे
जोर से डपटने वाला आदमी , 

और ऑफिस से लौटते वक्त एक दुकान के सामने खड़े हो
मिनटों क्रिकेट का लुत्फ़ उठाने वाला आदमी .

कोर्ट में क्लर्क के एक्स्ट्रा पैसे मांगने पे
झुंझलाने वाला आदमी ,

और रोड पे एक का सिक्का मिलने पे 
चुपचाप जेब में रखने वाला आदमी .

सुबह जल्दी उठने का निश्चय कर
रात को जल्दी सोने वाला आदमी ,

और सुबह थोड़ा और थोड़ा और कर 
देर से उठकर झुंझलाने वाला आदमी .

मैं अनेक हूँ .


अजय अमिताभ सुमन




इन आँखों का दर्शन कैसा


इन आँखों का दर्शन कैसा 
देह अगन नयनों पे भारी. 

इन कानों का श्रवण कैसा
मनोरंजन  कानों    पे हावी.

चरण   स्पर्श करूँ मैं कैसे 
वसनयुक्त   कर  स्पन्दन.

इर्ष्याग्रस्त है मेरी जिह्वा 
कैसे   करूं   मैं प्रभु नमन.

तेरे   वास   को   पहचानू   मैं 
नहीं घ्राण मेरी ऐसी विकसित. 

चाह  अनंत  मन भागे पीछे 
बोध   दोष    व्यसनों से ग्रसित.

राह मेरा पर  बाधा प्रभु 
मन का रचा हुआ संसार. 

पथिक मैं और मंजिल तू
जाऊं  कैसे  मन के पार.

मन  मेरा संसार प्रक्षेपित 
नमन,कथन,वचन अस्वस्थ. 

चाह अमिताभ दर्शन हो तेरा 
प्रभु बिन इन्द्रिय अस्त्र. 



अजय अमिताभ सुमन 




नितीश तुम्हारी जय हो



जय हो , जय हो 
नितीश तुम्हारी जय हो .

जय हो एक नवल बिहार की .
सुनियोजित विचार की .
और सशक्त सरकार की .
कि तेरा भाग्य उदय हो .
तेरी जय हो .

जाति-पाति पोषण के साधन 
कहाँ होते ?
धर्मं आदि से पेट नहीं 
भरा करते .

जाति पाति की बात करेंगे जो 
मुह की खायेंगें .
काम करेंगे वही यहाँ 
टिक पाएंगे .

विकास विकास और विकास 
संकल्प सही तुम्हारा है .
शिक्षा और सुशासन चहुँ ओर 
तुम्हारा नारा है .

हर गांव नगर घर और डगर डगर
हर रात दिन वर्ष और हर पहर 
नितीश तुम्हारा यही सही है एक विचार
हो उर्जा का समुचित सुनियोजित संचार 

रात घनेरी बीती 
सबेरा आया है .
जन-गण मन में व्याप्त 
नितीश का साया है . 

गौतमबुद्ध की धरा 
इस पावन संसार में .
लौट आया सम्मान 
शब्द बिहार में . 

हर गली गली में जोश 
उमंग अब छाया है .
बलरहित बाहुबली
मलीन कान्त काया है .

है विश्वास नितीश भारत को 
सबक सिखाओगे .
है विकास मंत्र जनतंत्र की
पाठ पढ़ाओगे. 

है बात दिले अमिताभ 
काश ये हो पाता.
भारत को भी एक नितीश 
गर मिल पाता.

फिर जाति –पाति करने वाले 
मिट जायेंगे .
धर्मं आदि के जोंक कहाँ 
टिक पाएंगे .

फिर भारत का परचम 
चहुँ ओर लहराएगा . 
आर्यावर्त का नाम 
धरा पे छाएगा .

भारत को भी अब 
नितीश की तलाश है .
सुधर नेता ही इस 
देश कि आस है .

कुत्सित राजनीतिज्ञों का 
अमिताभ क्षय हो .
भारत तेरी शक्ति बढे 
आसिमित अक्षय हो .

राष्ट्र को कोटि कोटि नमन
तेरी विजय हो . 
तेरी जय हो, तेरी जय हो.



अजय अमिताभ सुमन 

अपंग पिता के लिए


भगवन,

कितनी खूबसूरत है तेरी दुनिया।

ये झरने का कल कल संगीत
ये चिड़ियों का चहचहाना,
ये फूलों की सुगंध,
ये क्षितिज के पार 
बादलों की ओट से
सूरज का आ जाना।

फूल फूल पे नृत्य करते भौरें,
और आनंदमय मोर,
ये रंग बिरंगी तितलियाँ
और टर्र टर्र मेढकों का शोर।

दूर दूर तक लहलहाते पेड़
हवा के साथ झूमते मुस्कुराते,
और झूमती हरी भरी धरती 
दूर दूर तलक पौधे लहराते।

आकाश में सूरज से
आँख मिचौली करते मेघ,
और ह्रदय स्पंदित
पंछियों की कतार देख।

काश¡¡¡¡¡

भगवन दे देते ऐसी टेक्नोलॉजी

कि

ये हरी भरी धरती
ये लहलहाते खेत,
ये फूलों की सुगंध
ये काले काले मेघ।

एक बक्शे में भरकर
ले जा पाता ,

ये
थोड़ा सा 
पूरा आकाश,

अपने अपंग पिता के पास।




अजय अमिताभ सुमन

एक भैंस


क भैंस
जन्म लेती है ,

घास खाती है,  
दूध देती है,
दही देती है, 
घी देती है. 

वो झूठ नहीं बोल सकती,
वो निंदा नहीं कर सकती,
किसी का उपहास नहीं कर सकती.

इसलिए बच्चे जनती है नि-स्वार्थ,
 
ताकि आदमी को, 

दूध मिल सके, 
दही मिल सके, 
घी मिल सके .

अंत में बूढी हो, 
चढ़ जाती है किसी कसाई के हाथ, 

क्योंकि,

भैंस कपटी नहीं होती,
आदमी की तरह,  
निज स्वार्थ साध नहीं सकती. 






अजय अमिताभ सुमन

चलोगे क्या फरीदाबाद ?



रिक्शेवाले से लाला पूछा 
चलोगे क्या फरीदाबाद ?

उसने बोला झटाक से उठकर
बिल्कुल तैयार हूँ भाई साब.

मैं तैयार हूँ भाई साब 
की सामान क्या है तेरे साथ ?

तोंद उठाकर लाला बोला
आया तो मैं खाली हाथ .

आया तो मैं खाली हाथ 
की साथ मेरे घरवाली है .

और देख ले पीछे भैया 
वो हथिनी मेरी साली है .

वो हथिनी मेरी साली है 
कि क्या लोगे किराया ?

देख के तीनों लाला हाथी
रिक्शा भी चकराया.

रिक्शावाला बोला पहले 
आजमा लूँ अपनी ताकत .

दुबला पतला चिरकूट मैं तुम
तीनों के तीनों आफत .

तीनों के तीनों आफत पहले
बैठो तो इस रिक्शे पर 

जोर लगा के देखूं मैं फिर 
चल पाता है रिक्शा घर ?

चल पाता है रिक्शा घर
कि जब उसने जोर लगाया .

टूनटूनी कमर वजनी रिक्शा 
चर चर चर चर चर्राया .

रिक्शा चर मर चर्राया
कि रोड ओमपुरी गाल. 

डगमग डगमग रिक्शा डोले
हुआ बहुत ही बुरा हाल. 

हुआ बहुत ही बुरा हाल 
कि लाला ने जोश जगाया .

ठम ठोक ठेल के रिक्शे ने 
तो परबत भी झुठलाया .

परबत भी को झुठलाया
कि क्या लोगे पैसा बोलो ?

गस खाके बोला फिर रिक्शा 
दे दो दस रूपये किलो .

दो दस रूपये किलो लाला 
बोला समझा क्या सब्जी .

मैं लाला इंसान हूँ भाई 
साली और मेरी बीबी .

साली और मेरी बीबी
फिर बोला वो रिक्शेवाला .

ये तोंद नहीं मशीन है भैया 
सबकुछ पचनेवाला .

सबकुछ पचनेवाला भाई 
आलू बैगन टमाटर

कहाँ लिए डकार अभीतक 
कटहल मुर्गे खाकर .

कटहल मुर्गे खाकर कि 
सरकारी अजब किराया है .

शेखचिल्ली के रूपये दस 
और दस हाथी का भी भाड़ा है ? 

अँधेरी है नगरी भैया 
और चौपट करार है.

एक तराजू हाथी,चीलर
तौले ये सरकार है .

एक आंख से देखे तौले 
सबको अजब बीमार है . 

इसी पोलिसी का अ़ब तक 
रिक्शेवाला शिकार है .




अजय अमिताभ सुमन 

सवालात हीं कुछ ऐसे हैं



यहाँ कत्ल नही देखते , देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के , अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।

बेखौफ घुमती है , कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी , बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।

हर तारीख दर तारीख पे , देते हैं तारीख बस।
इंसाफ के रखवालों के , सौगात हीं कुछ ऐसे हैं ।

हम आह भी भरते है , तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के , खैरात ही कुछ ऐसे है।

फाइलों पे धुल पड़ी , चाटती हैं दीमक ।
कानून के रखवालों के , तहकीकात ही कुछ ऐसे है।

उछालते हैं शौक से , हर एक के जनाजे को ।
शहर के रखवालों के , जज्बात ही कुछ ऐसे हैं ।

आते हैं फैसले फरियादी की मौत के बाद ।
की फैसलेदारों के , इन्साफ ही कुछ ऐसे हैं ।

फरियाद अपनी लेके , बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है , सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।



अजय अमिताभ सुमन


ये कैसा इन्तेजार है



एक नन्ही सी गुडिया थी , एक नन्हा सा गुड्डा था ।
रुनझुन पायल छनकाती ये , वो हौले साज सजाता था ।

इनके खेल की अजब कहानी , बनती ये परियों की रानी ।
बोने आते खूब शोर मचाते , ये उनको मार भागता था ।

ना जात पता था नन्हे को , ना जात पता था नन्ही को ।
जब मिलते भर मन मिलते , की जग सारा हँस पड़ता था ।

फिर वही हुआ जो होता है , की दोनों को फटकार लगी ।
तब जाके उनको पता लगा , ये लड़की थी वो लड़का था ।

पढने को घर वो छोड़ चला , उसने पूछा कब आओगे ।
आँखों से कहा था नन्हे ने , जब भी दिल से तुम बुलाओगे ।

बीत गए बरसों बरसो अब , दोनों के है अपने संसार ।
फिर नन्हे को भुला नही , की लौट के कब तुम आओगे ।

ये बात पता है इसको भी , की मिल के मिल नही सकते ।
गैर नही है दोनों फिर , अपना भी तो कह नही सकते ।

कभी मिलेंगे दोनों फिर , इसका इसको एतबार है ।
ऐ रब तु ही जाने फिर , ये कैसा इन्तेजार है ।
ये क्यूँ इन्तेजार है ।


अजय अमिताभ सुमन


कुत्ते और इन्सान



कुत्ते
तीन तरह के होते है,

एक जो दुम हिलाते हैं
आदतन,

कुत्ते जो दुम हिलाते है
वो काटते नहीं
तलवे चाटते नहीं,

दूजे जो तलवे चाटते है
आदतन,

कुत्ते जो तलवे चाटते है
वो  दुम हिलाते नहीं
काटते नहीं,

तीजे जो काटते है
आदतन,

कुत्ते जो काटते है
वो तलवे चाटते नहीं
दुम हिलाते नहीं,

और
इन्सान,

दुम भी हिलाते है
तलवे भी चाटते है
काटते भी है,

जरुरतन.




अजय अमिताभ सुमन 

खुदा



खुदा शायरों के लिए हमेशा चुनिंदा विषय रहा है . खुदा पे एक बात जो महान शायर मिर्जा ग़ालिब ने कही थी , ध्यान देने वाली बात है की विभिन्न शायरों ने उस बात का जवाब कैसे दिया . मिर्जा ग़ालिब ने खुदा की हर जगह मौजूदगी को अपने शेर में व्यक्त किया , जिसे बात के शायरों ने अपने अपने ढंग से बयाँ किया .उन चुनिंदा रचनाओं को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ. उम्मीद है आप इसे पसंद करेंगे . 

 ज़ाहिद, शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर,
या वो जगह बता, जँहा खुदा नहीं।
                                                                 मिर्जा ग़ालिब 
 
 मस्जिद खुदा का घर है, पीने की जगह नहीं,
काफ़िर के दिल में जा, वहा खुदा नहीं।
                                                                  इकबाल 
 
काफ़िर के दिल से आया हूँ, मैं ये देख कर फ़राज़,
खुदा मौजूद है वहाँ, पर उसे पता नहीं।
                                                                 फ़राज़ 
 
घर से मस्जिद बहुत दूर , चलो की यूँ कर लें 
एक रोते हुए बच्चे को हसाया जाए। 
                                                                  नीदा फ़ाज़ली 
 
 हर जर्रा चमकता है , अनवर-ए-इलाही से। 
हर साँस ये कहती है , हम हैं तो खुदा भी है। 
 
                                                                 अकबर इलाहाबादी 
 

कौन सी शै है की जिसमे नहीं जलवा तेरा ,
हम को तू ही नज़र आता है , हम जिधर देखते हैं। 
 
                                                                 हैरत इलाहाबादी 
 
 
 पत्थर के खुदा हम वहां भी पाये ,
हम चाँद से आज लौट आये। 
  
                                                                 कैफ़ी आजमी 

सक्सेसफुल एडवोकेट



सक्सेसफुल एडवोकेट वो हैं,

जिनका,
 
कोई ईमान नहीं,
कोई सिद्धांत नहीं,
कोई दोस्त नहीं,
कोई दुश्मन नहीं,
कोई जुबान नहीं,
कोई स्वाभिमान नहीं,
कोई धर्म नहीं,
कोई राष्ट्र नहीं,
 
 
सिवाय पैसे के,


जो होती है.
चिड़िया की आंख.
 
 
जिसके लिए.


वो तोड़ देते हैं,   
मरोड़ देते हैं,  
 
अपनी ईमानदारी ,  
अपने सिद्धांत,  
अपने दोस्त,  
अपने दुश्मन , 
अपनी जुबान , 
अपना स्वाभिमान,
अपना धर्म  ,
अपनी राष्ट्र भक्ति,
 
 
पानी की तरह.



अजय अमिताभ सुमन 
 

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