Friday, November 1, 2024

बकरी माई

 सच कहता हूँ बात बराबर, सुन ले मेरे भाई,

तुझ से लाख टके है बेहतर तेरी बकरी माई।
तू मेरा दिमाग चबाये, और बकरी ये पत्ता,
तू बातों से मुझे पकाए बात बुरी पर सच्चा।
घर की बकरी से घर का भोजन चलता है सारा,
पर बकरी का दाना पानी घास पात हीं चारा।
डेंगू वेन्गु मच्चड़ वच्चड़ सबसे हमें बचाए,
दूध पिला के बूढ़े को भी झटपट रोड भगाए
इस बकरी को दुह दुह के गाँधी बन गए पठ्ठा ,
उम्र पचासा पार गए फिर भी तरुणी से ठठ्ठा।
इतनी छोटी सी बकरी पर ऐसी इसकी जात ,
पीकर गाँधी दूध इसी के खट्टे कर दिए दांत।
जय हो बकरी माई, तेरी महिमा अपरंपार,
सच में जीवन जीने का बस तू हीं है आधार।
इसीलिए कहता हूँ सुन लो भैया और भौजाई,
बार बार दुहराते जाओ जय हो बकरी माई।

कौन हूँ मैं ? ये मिट्टी? मिट्टी से बीज

कौन हूँ मैं ?

ये मिट्टी?
मिट्टी से बीज,
बीज से तना ,
तना से शाखें ,
शाखों से पत्ती ,
पत्ती से कली ,
कली से फूल,
फूल से फल,
फल से अन्न,
अन्न से रक्त,
रक्त से कोशिका ,
कोशिका से ऊतक ,
ऊतक से मांस,
मांस से पेशी,
पेशी से मज्जा,
मज़्ज़ा से अस्थि
अस्थि से देह,
और देह से श्वांस ,
श्वांस से प्राण ,
प्राण से मैं
मिट्टी हूँ मैं,
मिट्टी से ,
बीज,
तना ,
शाखें ,
पत्ती ,
कली ,
फूल,
फल,
अन्न,
रक्त,
कोशिका ,
ऊतक ,
मांस,
पेशी,
मज्जा,
अस्थि
देह,
श्वांस ,
प्राण ,
प्राण से मैं
मिट्टी हूँ मैं,

आंगना में सोना जईसन

 आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,

देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

मह मह महकेला आम के मंजरिया,आम के मंजरिया,
कुहू कुहू कुहुकेले काली रे कोईलिया, काली रे कोईलिया।
रस रस टपकेला महुआ जे गछिया कि,
बिनत में होखे लागल भोर, कि बिनत में होखे लागल भोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

हरिहर पातवा ह घरती के सड़िया, कि घरती के सड़िया
सेमर के फूलवा से शोभेला सेजरिया, कि शोभेला सेजरिया।
देखि के सजल रुप ऋतुराज बिहँसेले,
भौरा मचावे लागल शोर , कि भौरा मचावे लागल शोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।

गेंदवा के फूलवा ह सोना के गहनवा, कि सोना के गहनवा,
रंगे रंगे फूलवा से शोभेला लहँगवा , कि शोभेला लहँगवा।
श्रीनाथ 'आशावादी, अंखिया निहारे देखि,
गउआँ ई रस में विभोर , कि गउआँ ई रस में विभोर।
आंगना में सोना जईसन उतरल किरीनियाँ कि,
देखी जिया हुलसेला मोर, कि देखी जिया हुलसेला मोर।
=====

अवि

 दूध मलाई मख्खन हलवा, देखो परियां लाई,

जन्मदिन पर अवि के मेरे ,खुशियाँ हरपल छाई ।
सजी रहे थाली में तेरे लड्डू की मिठास,
प्यारी सी मुस्कान अवि की प्यारी प्यारी खास।

भरे रहे जीवन में तेरे खुशियाँ अपरम्पार ,
हर सुबह हो सुबह सुनहरी हर रात हो प्यार।
जैसे फूल महकते हैं डालों पर सजकर खिलकर,
वैसे तू खुशियों से चमके खिले रहे मंज़िल पर।

भेज रहा हूँ खूब सजाकर प्रेम आशिष हजार ,
प्रेम आनंद और अपनापन तुझे मिले बार-बार।
दूध मलाई मख्खन हलवा, देखो परियां लाई,
मेरे प्यारे अवि को, जन्मदिन की ढेरों बधाई।

ओ मेरी कविते तू कर परिवर्तित अपनी भाषा

ओ मेरी कविते, तू कर परिवर्तित अपनी भाषा,

तू फिर से सजा दे ख्वाब नए प्रकटित कर जन मन व्यथा।
ये देख देश का नर्म पड़े ना गर्म रुधिर,
भेदन करने है लक्ष्य भ्रष्ट हो ना तुणीर।

तू भूल सभी वो बात की प्रेयशी की गालों पे,
रचा करती थी गीत देहयष्टि पे बालों पे।
ओ कविते नहीं है वक्त देख सावन भादों,
आते जाते है मेघ इन्हें आने जाने दो।

कविते प्रेममय वाणी का अब वक्त कहाँ है भारत में?
गीता भूले सारे यहाँ भूले कुरान सब भारत में।
परियों की कहे कहानी कहो समय है क्या?
बडे मुश्किल में हैं राम और रावण जीता।

यह राष्ट्र पीड़ित है अनगिनत भुचालों से,
रमण कर रहे भेड़िये दुखी श्रीगालों से।
बातों से कभी भी पेट देश का भरा नहीं,
वादों और वादों से सिर्फ हुआ है भला कभी?

राज मूषको का उल्लू अब शासक है,
शेर कर रहे न्याय पीड़ित मृग शावक है।
भारत माता पीड़ित अपनों के हाथों से ,
चीर रहे तन इसका भालों से , गडासों से ।

गर फंस गए हो शूल स्वयं के हाथों में,
चुकता नहीं कोई देने आघातों में।
देने होंगे घाव कई री कविते ,अपनों को,
टूट जाये गर ख्वाब उन्हें टूट जाने दो।

राष्ट्र सजेगा पुनः उन्हीं आघातों से,
कभी नहीं बनता है देश बेकार की बातों से।
बनके राम कहो अब होगा भला किसका ?
राज शकुनियों का दुर्योधन सखा जिसका।

तज राम को कविते और उनके वाणों को,
तू बना जन को हीं पार्थ सजा दे भालों को।
जन में भड़केगी आग तभी राष्ट्र ये सुधरेगा,
उनके पुरे होंगे ख्वाब तभी राष्ट्र ये सुधरेगा।

तू कर दे कविते बस इतना ही कर दे,
निज कर्म धर्म है बस जन मन में भर दे।
भर दे की हाथ धरे रहने से कभी नहीं कुछ भी होता,
बिना किये भेदन स्वयं ही लक्ष्य सिध्ह नहीं होता।

तू फिर से जन के मानस में ओज का कर दे हुंकार,
कि तमस हो जाये विलीन और ओझल मलिन विकार।
एक चोट पे हो जावे परजीवी यहां सारे मृत ,
जनता का हो राज यहां पर, जन गण मन हो सारे तृप्त।

कि इतिहास के पन्नों पे लिख दे जन की विजय गाथा ,
शासक , शासित सब मिट जाएँ हो यही राष्ट्र की परिभाषा।
जीवन का कर संचार नवल सकल प्रस्फ़ुटित आशा,
ओ मेरी कविते, तू कर परिवर्तित अपनी भाषा,
तू फिर से सजा दे ख्वाब नए प्रकटित कर जन मन व्यथा।

Wednesday, October 30, 2024

तिनका तिनका सजा सजाकर



तिनका तिनका सजा सजाकर,

अवनि को महकाता कौन?

धारण करता जो सृष्टि को,

पर सृष्टि में रहता मौन।


कैसे वन वन उड़े कपोती?

अग्नि से निकले क्यों ज्योति? 

किस भांति बगिया में कलरव,

कोयल की गायन होती?


भिन्न भिन्न से रंग सजाकर ,

गुलों में रख आता है,

हर सावन में इन्द्रधनुष को ,

अम्बर में चमकाता कौन?


तिनका तिनका सजा सजाकर,

अवनि को महकाता कौन?

धारण करता जो सृष्टि को,

पर सृष्टि में रहता मौन।


अजय अमिताभ सुमन

Sunday, October 27, 2024

दो लॉयर गंभीर

 एक कोर्ट में देखा मैंने बड़ी हुई थी भीड़,

भिड़ने को तैयार थे बैठे दो लॉयर गंभीर।
बहस चली तो लड़ने बैठे वो दोनों अधिवक्ता,
अति अचंभित जज साहब थे क्या दोनों थे वक्ता।
सूझ रहा उपाय न कोई दोनों वक्ता वीर,
भिड़ने को तैयार थे बैठे दो लॉयर गंभीर।

बोले क्यों लड़ते हैं दोनों ऐसे भी क्यों ज्ञानी,
इतने भारी अधिवक्ता फिर कैसी ये नादानी।
बैठ भी जाएं दोनों भाई ले ले चाय की चुस्की,
इस सलाह पर एक वक्ता ने मारी थोड़ी मुस्की।
और चलाई निज जिह्वा से जहर बुझी सी तीर,
भिड़ने को तैयार थे बैठे दो लॉयर गंभीर।

कैसे पीऊं चाय मैं साहब मैं मॉडर्न वकील,
और चाय की चुस्की से वो आती ना है फील।
आती ना है फील ये सुनकर बोले दूजे वक्ता,
ना जाने ये कड़वी कौफी क्यों पीते अधिवक्ता।
इससे तो अच्छी है भाई मिठी सी हीं खीर,
भिड़ने को तैयार थे बैठे दो लॉयर गंभीर।

देख के दोनों को यूँ लड़ते जज भी हुए अधीर,
बंद करें भी बहस का मुद्दा गलती हुई गंभीर।
अगर न दोनों वक्ता साहब साथ ले सकते चाय।
दोनों पियें ठंडा पानी, यही बचा उपाय।
ये कोर्ट है फ़िर क्यों लड़ते कि जैसे कश्मीर,
भिड़ने को तैयार थे बैठे दो लॉयर गंभीर।

अजय अमिताभ सुमन

Friday, October 25, 2024

वेदना

इस जगत में वेदना का, 

दरअसल निदान क्या हो? 

कष्ट पीड़ा से हो मुक्ति,

वेदना परित्राण क्या हो। 

शक्ति संचय से अगर हीं, 

वेदना परित्याग त्याग हो तो, 

पद प्रतिष्ठा से अगर, 

संवेदना परित्याग हो तो। 

जग को जीता हुआ, 

जग त्याग बिन बोले हुए। 

क्यों सिकंदर जा रहा था, 

हाथ को खोले हुए।

हिम शिखर सी भी ऊंचाई, 

प्राप्त कर निर्मुक्त हो,

क्या तुझे दृष्टति है मानव, 

जो पीड़ा से मुक्त हो?

शक्ति संचय से कदाचित, 

नर की चाहत बढ़ हीं जाती,

पद प्रतिष्ठा मान शक्ति ,

नर के सर में चढ़ ही जाती।

किंतु हासिल सुख हो अक्षय,

धन आदि परिमाण क्या हो?

इस जगत में वेदना का ,

दरअसल निदान क्या हो?

Tuesday, October 22, 2024

कुदरत तेरा करतब देखा

 कुदरत तेरा करतब देखा,

एक बीज में बरगद देखा।

रोज रोज ये सूरज कैसे,
पूरब से उग जाता है।
सुबह गुलाबी दिन मे तपता,
शाम को ये डूब जाता है।
रात को कैसे जा छिपता है,
अनजाने ये सरहद देखा,
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

पानी में मछली रहती क्यों?
पर चिड़िया इसमें मरती क्यों?
सर्प सरकता रेंग रेंग कर,
छिपकीली छत पे चढ़ती क्यों?
कोयल कूके बाग में आके,
मकसद क्या अनजाने देखा।
कुदरत तेरा करतब देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

नाजाने क्या मकसद देखा,
एक बीज में बरगद देखा।

अजय अमिताभ सुमन

Wednesday, October 16, 2024

लायर विग

 गर माथे लायर विग होती,सोचो शामत होती कैसी?

भरी भरी सी इस गर्मी में,उमस में आफत नर्मी में।

पसीना तर तर कर आता,क्या लायर सबमिट कर पाता।

गर्दन पे हो लॉयर बैंड ,लॉयर की बजाते बैंड।

गर्मी का मौसम जब आए,सूझे ना फिर कोई उपाय।

माथे विग और चढ़ा हो कोट,क्या लॉयर को मिलेगी ओट।

ये तो अच्छी बात हुई है,सर पे विग ना चढ़ी हुई है।

जो कुछ भी लगते बचकाने,क्यों अंग्रेजी बात हम माने?


अजय अमिताभ सुमन 

Friday, October 4, 2024

मद विष प्याला

 आज टूटी हुई जन्धा लेकर पछताता था मतवाला,

ज्ञात हुआ दुर्योधन को जो पीता था विष का हाला।
रक्त से लथपथ शैल गात व शोणित सिंचित काया,
कुरुक्षेत्र की धरती पर लेटा एक नर मुरझाया।
कौन जानता था जिसकी आज्ञा से शस्त्र उठाते थे ,
जब वो चाहे भीष्म द्रोण तरकस से वाण चलाते थे ।
इधर उधर हो जाता था जिसके कहने पर सिंहासन ,
जिसकी आज्ञा से लड़ने को आतुर रहता था दु:शासन।
सकल क्षेत्र ये भारत का जिसकी क़दमों में रहता था ,
धृतराष्ट्र का मात्र सहारा सौ भ्राता संग फलता था ।
क्या धर्म है क्या न्याय है सही गलत का ज्ञान नहीं,
जो चाहे वो करता था क्या नीतियुक्त था भान नहीं।
तन पे चोट लगी थी उसकी जंघा टूट पड़ी थी त्यूं ,
जैसे मृदु माटी की मटकी हो कोई फूट पड़ी थी ज्यूं।
कुछ और नहीं था हाँ वो था एक मद का हीं तो विष प्याला,
हाँ मद का हीं विष प्याला अबतक पीता मद विष प्याला।

Sunday, September 22, 2024

नहीं किसी का भक्त हूँ भाई

 नहीं किसी का भक्त हूँ भाई


पंथों में ना सख़्त हूँ भाई,
अंधा कोई भक्त हूँ भाई।

मैं करता हूँ खुद की पूजा,
मेरा ईश्वर मैं ना दुजा।
जन्म से खुद को हिन्दू पाऊँ
पड़े जरूरत सिख बन जाऊँ।
कभी जरूरत मुस्लिम भो हूँ,
कभी बनूँ मैं मैौद्ध ईसाई।
क्योंकि मैं अनासक्त हूँ भाई,
नहीं पंथ का भक्त हूँ भाई।

पंथ ज्ञान के रस्ते सारे,
तो सब के सब हुए हमारे।
गणित कभी बायो पढ़ता हूँ,
पुस्तक से खुद को गढ़ता हूँ।
पर इनकी ना करता पूजा,
पड़े जरूरत पढ़ता दुजा।
निजप्रज्ञा अभिवर्धन राही,
ज्ञानासक्त हरवक्त भाई?
नहीं किसी का भक्त हूँ भाई।

मेरा तन हीं मेरा धन हैं,
तनमन अर्पित हीं निज मन है।
मैं हूँ तो ये पंथ है सारे,
देश धर्म भी बने हमारे।
मुझसे हीं ये सब फलते हैं,
खुद में हीं अनुरक्त हूँ भाई।
नहीं किसी का भक्त हूँ भाई,
पंथों में ना सख़्त हूँ भाई।

अजय अमिताभ सुमन

कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की

कृष्ण में अभिव्यक्ति है शक्ति की भक्ति की,
कर्म से आसक्ति तो फल से भी विरक्ति की।
राधा के कान्हा तो शकुनि के छलिया हैं,
काल दुर्योधन के मुरली के रसिया हैं।
कल्मष विकर्म आदि पातक प्रतिकूल वो,
धर्म कर्म मर्म आदि जिनके अनुकूल हो।
सृष्टि की क्रिया प्रतिक्रिया के चक्र हैं,
सृष्टि के कर्ता भी कारक पर अक्र हैं।
साम,दाम,दंड, भेद ,विषदंत आवेग आदि,
लोभ का संवेग ना हीं मोह संवेग व्याधि।
युद्ध हो समक्ष गर जो शस्त्रों में दक्ष हैं,
पक्ष ना विपक्ष में ना कोई समकक्ष है।
सीमित ना प्रतिमा , ना शब्दों के बंधन में,
वो तो हैं अंतरतम  अनुभव  स्पंदन में।
वो उत्तर हैं प्रश्नों के, रचते हैं प्रश्न  खुद,
अगम, अगोचर, किन्तु सहज बोधयुक्त।
कृष्ण केवल नाम नहीं, अनंत संवाद हैं,
मौन में भी बोलते, अज्ञेय निर्विवाद  हैं।
आगत जो काल भी है , काल जो व्यतीत भी,
चल रहा जो आज भी है , गुजरा अतीत भी।
मन की चंचलता में, चित्त के अवधारण में,
सृष्टि की सृजना संरक्षण संहारण में।
रूप रंग देह धारी दृश्य दृष्टित भिन्न वो,
सृष्टि की भिन्नता से भिन्न अवच्छिन्न वो।
कृष्ण सर्व सत्व आदि तत्व अनेकार्थ है,
काम,क्रोध,भोग आदि मोक्ष भी परमार्थ है।

Sunday, September 15, 2024

धर्म निरपेक्षी गिद्ध

धर्म निरपेक्षी गिद्ध

धर्मनिरपेक्षी गिद्ध है भैया,

ये तो भारी सिद्ध है भैया।

इस गिद्ध की आदत ऐसी,
भारत के किसी नर के जैसी ।
घात लगाए दूर से रहता,
दंगा मुर्दा सूंघ के रहता।
इसी बात की इसको चिंता,
भाड़ में जाए बाकी जनता।
कोई दुर्घटना हो जाए,
घड़ियाली ये नीर बहाए।
अभिनय मैं अति सिद्ध है
भैया, धर्मनिरपेक्षी गिद्ध है भैया।

अगर भ्रांति ना भारत में हो,
अगर शांति हाँ भारत में हो,
तब इसको होती परेशानी,
छद्म क्रांति की रचे कहानी।
जाति धर्म ना देखे भाई,
एक लाश हीं देखे भाई।
इसके देखे एक बराबर,
सब मुर्दों का टेस्ट बराबर।
अमन शांति का ना अभिलाषी,
छुपा हुआ ये भारतवासी।
रक्तातुर अति शीघ्र है भैया
धर्मनिरपेक्षी गिद्ध है भैया।

अजय अमिताभ सुमन

Saturday, September 7, 2024

धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,


धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?
सी.एन.जी. का नाम बढ़ेगा,
कबतक आखिर कबतक?
जनता की पीड़ा तो हर लो,
कीमत आटे की कम कर लो।
रोटी के अन्धे क्या गाए ,
बेहतर भारत कब तक?
भूख मिटी तो सब नाचेंगे ,
बेस्ट देश है सब गाएंगे।
पेट क्षुधा की मार है भारी ,
देश प्रेम पे अब तक।
भारत की तुम गाथा गाते,
पावन मिट्टी कथा बताते।
दिल की अपनी पीड़ सुनाएं,
व्यथा बताएं कब तक?
सारे जहाँ से सच्चा कैसे?
देश हमारा अच्छा कैसे?
कंधे पर क्यों झंडा लाएं?
त्राण मिलेगा कब तक?
धनिया नींबू दाम बढ़ेगा,
कब तक बोलो कब तक?


अजय अमिताभ सुमन

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