Sunday, August 25, 2024

फिर कैसे विश्राम हो कोई ?

फिर कैसे विश्राम हो कोई ?

अथक परिश्रम नहीं आराम, 
ना कर्मों को अल्प विराम। 

जीवन  के कई झगड़े सारे, 
सुलझाने  हैं  लफड़े  सारे। 

भाव कई मन को बसते हैं, 
गीत कहानी  बन फलते हैं ।

ज्ञान पड़ा इस जग में इतना, 
कैसे पढ़ सब कर लूँ अपना? 

इक्क्षाओं से उलझन  बढ़ती, 
कतिपय ना मन  सुविधा गढ़ती। 

दुविधा का परिणाम ना कोई , 
फिर कैसे विश्राम हो कोई ?
फिर कैसे विश्राम हो कोई ?

अजय अमिताभ सुमन 

Saturday, August 3, 2024

उमस

ये गर्मी उमस की है गर्मी ना बस की। 

जाती ना तन से खुजली अपरस की। 

टप टप टप टप टप टप चलता पसीना।

कि घातक दुपहरी सा जलता महीना।  

लुकछिप कर बिजली ये आती है जाती। 

कि कूलर से कमरे की गरमी ना जाती।

कपड़े सब मैले हम धोए कहाँ पर। 

रह रह कर बारिश आ जाती है छत पर। 

गिली पड़ी है चादर जस की तस की। 

ये गर्मी उमस की, है गर्मी ना बस की। 

Sunday, July 28, 2024

ट्युसन से ना मिले आराम

ट्युसन से ना मिले आराम

होम वर्क मिले सुबहो शाम, ट्युसन से ना मिले आराम, 
पाँच दिन छुट्टी की कर दे  , दे दे  खाँसी और  जुकाम। 

दूध देख के उल्टी आती , भिन्डी भी है बहुत सताती,
खाने की भी चीज है कोई ,बैगन कटहल लौकी भाजी।

मैगी बर्गर गरम समोसे , छोले कुलचे इडली डोसे , 
दूध मलाई मक्खन हलवा ,दादी भर भर नरम पड़ोसे।

छोटा सा हीं बालक हूँ मैं, छोटा सा हीं काम पड़ा है, 
सच्चे भक्तों की सुनते हो , भगवन तेरा नाम बड़ा है। 

तुझे कुछ भी छिपा नहीं कुछ, इतना सा माँगू वरदान,
मोच टांग में टीचर को दे , बस इतना सा हीं अरमान। 

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, July 26, 2024

आहट

गर्मी की लहरें क्या आफत बड़ी थी, 

तपती दुपहरी में शामत पड़ी थी। 


खिड़की से आती थी लू की वो लपटें, 

जी को बस ठंडक की चाहत बड़ी थी। 


जरूरी नहीं कि लू लहरी कुछ नम हो, 

इतना हीं काफी कि गर्मी कुछ कम हों। 


बारिश जो आई है ठंडक जो लाई है 

मेघों की आहट से राहत बड़ी थी। 


अजय अमिताभ सुमन

Saturday, June 22, 2024

मर्ज

आजादी से पहले, आजादी से आज तक, 
बदलते रहे ईलाज, पर मर्ज वही आज तक। 
ये मुल्क है जनाब, थे एक नहीं कल भी ,
हाँ अब भी बिखरे हुए, कि दर्द वही आजतक। 
टुकड़े हुए थे देश के,जिस शक ओ शुबहा पर,
जमा हुआ है रूह में , वो गर्द अभी आज तक। 
बात यूँ है अमन की , मिट गया जो भी चला , 
रह गया है बाकी वो,  कर्ज अभी आज तक। 

अजय अमिताभ सुमन

Saturday, June 15, 2024

जमात

क्या  गिद्ध  की जमात  है  भाई,

आपस   में   सब   करे  लड़ाई।  

जब  भी  चीता   कोई      आए,

बन   जाए   सब   भाई    भाई।

गिद्ध  लोमड़  की  बात  यही है,

गीदड़   की  भी  जात  यही  है।

छल  करने  को हीं सब मिलते ,

फिर क्या ये फिर क्या वो भाई। 


अजय अमिताभ सुमन

Saturday, June 8, 2024

जंजीर

जंजीर


जहाँ आदम की जात और बाते हों पीर की। 

प्यादे की चाल और  बातें वजीर की। 

खेत हो किसानों के गेहूं अमीर की। 

अमन के नाम पर बातें हो तीर की। 

देख कहीं तो क्या हिंद आ गये है हम? 

कि चीखती पुकार पर बाते जंजीर की। 


अजय अमिताभ सुमन

Sunday, April 21, 2024

खंजर

पुराना सा कोई मंजर, सीने में खल गया,

ये उठा दर्द और जी मचल गया। 

बेफिक्री के आलम में यादों का खंजर,

चला तो क्या बुरा था, कि तू संभल गया,


अजय अमिताभ सुमन

Sunday, March 10, 2024

आजमाइस

मैदान में शिकस्त की,

फिर से गुंजाइश हो,

उस शख्स के हौसले की,

फिर क्या आजमाइश हो?

कोई जीत भी जाए,

पर वो हारेगा क्या?

कि लड़खड़ाकर जिसको,

संभलने की ख्वाहिश हो। 


अजय अमिताभ सुमन

Saturday, March 2, 2024

जात आदमी के

आसां नहीं समझना हर बात आदमी के,

कि हंसने पर हो जाते वारदात आदमी के।

बुझते नहीं कफन से,अरमां दफ़न दफ़न से,

जलते हैं तन बदन से, आलात आदमी के।

कि दिन में है बेचैनी और रातों को उलझन,

संभले नहीं संभलते  हालात आदमी के।

खुदा भी इससे हारा, इसे चाहिए जग सारा,

जग बदले पर बदले ना , जात आदमी के।


अजय अमिताभ सुमन

Sunday, February 25, 2024

बाजार में हिला नहीं

बाजार में हिला नहीं

तू भी क्या चीज है,कि नाम का गिला नहीं ,
शोहरत की दौड़ में थे सब, तू हिला नहीं।
लोग रोजी रोटी और , शरारत के पीछे,
तू खुद की ईमां और शराफत के पीछे।
दौलत की फ़िक्र में थे, सब तू मिला नहीं,
माजरा ये क्या है , बाजार में हिला नहीं।

अजय अमिताभ सुमन

Saturday, February 17, 2024

रंजिशें

राह में तो फूल थे,
कई खिले हुए,
वो थे रंजिशों के मारे,
जहर चुने हुए।
खामोशियों के दौर ने ,
हुनर क्या दे दिया,
कहा भी ना था मैंने ,
थे वो सुने हुए।

अजय अमिताभ सुमन

Saturday, February 10, 2024

मृत होकर मृतशेष रहे

या मर जाये या मारे चित्त,
में कर के ये दृढ निश्चय,

शत्रु शिविर को जो चलता हो ,
हार फले कि या हो जय।

समरअग्नि अति चंड प्रलय हो,
सर्वनाश हीं रण में तय हो,

तरुण बुढ़ापा ,युवा हीं वय हो ,
फिर भी मन से रहे अभय जो।

ऐसे युद्धक अरिसिंधु में , 
मिटकर भी सविशेष रहे।

जग में उनके अवशेष रहे ,
शूर मृत होकर मृतशेष रहे।

अजय अमिताभ सुमन 

Friday, February 2, 2024

बिन बोले सुन पाता कौन?

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बिन बोले सुन पाता कौन?

जो प्यासा पानी को कहता ,
अक्सर उसकी प्यास मिटी है,
जो निज हालत रोता रहता, 
कबतक उसकी सांस टिकी है?
बिना जुबां कटते जीव जंतु, 
छंट जाते सब पादप तंतु।
कहने वाले की सब सुनते, 
गूंगे तो चुप रह जाते मौन ।
न्याय मिले क्या हक़ ना मांगो,
बिन बोले सुन पाता कौन?

अजय अमिताभ सुमन 
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Thursday, February 1, 2024

ओ परबत के मूल निवासी

ओ परबत के मूल निवासी, भोले भाले शिव कैलाशी।
जब जब होता व्याकुल जग से, तब तुझको देखे अविनाशी।
भव तम को मन मुड़ जाता हैं ,घन जग बंधन जुड़ जाता हैं।
अंधकार तब होता डग में , काँटे बिछ जाते हैं पग में।
विचलित मन अब तुझे पुकारे, तमस हरो हे अपरिभाषी।
ओ परबत के मूल निवासी,भोले भाले शिव कैलाशी।
शिव शक्ति हीं राह हमारी, शिव की भक्ति चाह हमारी।
एक लक्ष्य हीं मेरा तय हो ,शिव कदमों में निजमन लय हो।
यही चाह ले इत उत घुमुं , अमरनाथ बदरीनाथ काशी।
ओ परबत के मूल निवासी,भोले भाले शिव कैलाशी।

अजय अमिताभ सुमन

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