पूछा शराबी से मैं
है गम तुझे किस बात का ,
डूबा हुआ है अब तक
तू किस ख्याल में .
किस बात की उदासी है,
किस बात का मलाल है,
क्यों ज़िंदगी के रास्ते में,
तेरा ऐसा हाल है?
ज़माने की चाल से
परेशां मैं उम्र भर ,
फसाँ हुआ था अबतक ,
मुश्किल जंजाल मैं .
ज़माने की बातें भी
कहाँ कभी सुलझी है ,
अपनी हीं बातों में
दुनियां ये उलझी है .
यहाँ हर शख़्स के चेहरे पर,
कोई दूसरा चेहरा है,
जो दिखता है वो होता नहीं,
जो होता है वो कहता नहीं।
तलाशते तलाशते
जवाब इस दुनियाँ का ,
बन गया था अक्सर
खुद हीं सवाल मैं .
होश में भी होकर
क्या करती ये दुनियाँ ,
क्या कहती ये दुनियाँ
क्या सुनती ये दुनियाँ .
कोई रुतबे का भूखा है,
कोई शोहरत का ग़ुलाम,
कोई रिश्तों को बेच रहा,
कोई बेच रहा ईमान।
कभी औरों पे हँसती है
कभी अपनों पे रोती है
रहा इसके तरीकों से
मैं बवाल में.
कि होश में रहकर भी
करना क्या काम है ,
झूठी मुठी बातें हीं
करती आवाम हैं .
बेहोशी में यारों
मजा है जन्नत का .
छोड़ो भी फँसे हो क्यों
इस मायाजाल में .
तेरी बातें मेरे
समझ के नाकाबिल है ,
जाहिल से लोग मुझे
कहते फिर जाहिल है .
अमिताभ एक अर्ज है
गर निभ गयी है दुश्मनी तो
छोड़ दो अब जैसे भी
हूँ खुश फिलहाल मैं .
न मैं फ़रिश्ता हूँ यहाँ,
न कोई गुनहगार हूँ,
जैसा भी हूँ, अपने हिस्से की,
ज़िंदगी का हक़दार हूँ।
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