बदल रहा संसार निरंतर,
मैं अबदला रहा अनंतर।
माता गर्भाशय अभ्यन्तर,
भ्रूण स्थापित रहा निरंतर।
अंधकार के उस आवरण में,
मौन पड़ा था मैं जीवन में।
नयन नहीं थे, दृष्टि समाहित,
श्वास नहीं थी, चेतन स्थापित।
झूले में मैं ही खिलता था,
कदम बढ़ाते गिर पड़ता था।
माँ की उँगली थामे चलता,
पिता के कंधों पर था पलता।
मुझमें ही थी हँसी ठिठोली,
बाल्यकाल के वो हमजोली।
माटी के घर, कागज की नावें,
कितनी प्यारी थीं वो यादें।
गुड़िया, कंचे, खेल निराले,
मित्रों संग दिन बीतने वाले।
कल तक जो संसार हमारा,
आज नहीं है कहीं दुबारा।
मैं ही तो था तरुणाई में,
यौवन की उस अंगड़ाई में।
नव उमंग की लहरें उठतीं,
आँखों में संभावनाएँ बसतीं।
दिवास्वप्न मन को आते थे,
उड़नखटोले तन को भाते थे।
आकाशों को छूने की चाहत,
नित नवीन कुछ करने की राहत।
प्रेम, प्रणय, अनुराग के क्षण,
मन में उठते कितने स्पंदन।
कभी विरह की पीड़ा सहता,
कभी मिलन के सपने गढ़ता।
प्रौढ़ उम्र में तन के ताने,
जीवन के उत्तरदायित्व पुराने।
सपनों का संसार सँभाला,
अपनेपन का दीप जला डाला।
कर्मक्षेत्र में दिन ढलते थे,
कर्तव्यों के पथ चलते थे।
अपनों की मुस्कान के खातिर,
भूल गया निज सुख का सागर।
संतति के सपनों में जीता,
उनकी खुशियों में मन रीता।
कल तक जो उँगली थामे थे,
आज वही संबल बन जाते।
बुढ़ापे में शक्ल ठिकाने,
तन पर उम्र लिखे अफसाने।
केश हुए श्वेत, त्वचा सिकुड़ी,
चाल हुई कुछ धीमी-सी मुड़ी।
दाँत गिरे, दृष्टि भी धुँधली,
स्मृतियों की गठरी है खुलती।
कभी अतीत पुकारे आकर,
कभी समय ले जाए बहाकर।
बचपन से पचपन तक अबतक,
बदल रहा तन मेरा अबतक।
कल जो था, वह आज नहीं है,
आज का कल में राज नहीं है।
भ्रूण, वृद्ध मन का सपना है,
रूप-रंग तन का गहना है।
शैशव, यौवन, प्रौढ़ अवस्था,
कालचक्र की सहज व्यवस्था।
बचपन बीता, यौवन बीता,
जीवन का हर सावन बीता।
ऋतुएँ बदलीं, वर्ष बदलते,
तन के सारे रूप बदलते।
मैंने देखा तन को बदलते,
अपने ही आकार में ढलते।
कल का चेहरा आज नहीं है,
पर मैं बदला, यह बात नहीं है।
ये तन-मन ही मात्र नहीं हूँ,
बदल रहा जो गात्र नहीं हूँ।
नाम, रूप, पहचान परे मैं,
सुख-दुःख के व्यवधान परे मैं।
मन में चिंतन आता-जाता,
स्वप्न नया आकार बनाता।
बुद्धि बदलती, मत बदलता,
समय के संग जग बदलता।
साक्षी बन सब देख रहा हूँ,
अपने भीतर लेख रहा हूँ।
हँसते-रोते जीवन भर में,
अचल रहा हूँ परिवर्तन में।
तन की सीमा, मन की माया,
इनसे मेरा नहीं सरोकार।
जन्म-मरण के इस पथ पर भी,
मैं हूँ इन सबसे निराकार।
न मैं शैशव, न तरुणाई,
न वृद्धावस्था की परछाई।
न मैं देह, न देह का बंधन,
न मैं मन का क्षणिक स्पंदन।
नित्य, निरंतर, चिर-अविकारी,
चेतन सत्ता सबसे न्यारी।
न आदि मेरा, न अंत कहीं है,
परिवर्तन का मुझमें भय नहीं है।
तन मिट्टी में मिल जाएगा,
मन भी मौन हो जाएगा।
नाम, रूप, संबंध सभी कुछ,
कालचक्र में खो जाएगा।
फिर भी जो सब देख रहा है,
जो हर पल को लेख रहा है।
उसका कोई क्षय नहीं है,
उसका कोई लय नहीं है।
तन-मन के इस पार कहीं पर,
मौन खड़ा हूँ साक्षी बनकर।
बदल रहा संसार निरंतर,
मैं अबदला रहा अनंतर।
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