Monday, January 31, 2022

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:22

 

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मन की प्रकृति बड़ी विचित्र है। किसी भी छोटी सी समस्या का समाधान न मिलने पर उसको बहुत बढ़ा चढ़ा कर देखने लगता है। यदि निदान नहीं मिलता है तो एक बिगड़ैल घोड़े की तरह मन ऐसी ऐसी दिशाओं में भटकने लगता है जिसका समस्या से कोई लेना देना नहीं होता। कृतवर्मा को भी सच्चाई नहीं दिख रही थी। वो कभी दुर्योधन को , कभी कृष्ण को दोष देते तो कभी प्रारब्ध कर्म और नियति का खेल समझकर अपने प्रश्नों के हल निकालने की कोशिश करते । जब समाधान न मिला तो दुर्योधन के प्रति सहज सहानुभूति का भाव जग गया और अंततोगत्वा स्वयं द्वारा दुर्योधन के प्रति उठाये गए संशयात्मक प्रश्नों पर पछताने भी लगे। प्रस्तुत है दीर्ध कविता “दुर्योधन कब मिट पाया का बाइसवाँ भाग।
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मेरे भुज बल की शक्ति क्या दुर्योधन ने ना देखा?
कृपाचार्य की शक्ति का कैसे कर सकते अनदेखा?
दुःख भी होता था हमको और किंचित इर्ष्या होती थी,
मानवोचित विष अग्नि उर में जलती थी बुझती थी।
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युद्ध लड़ा था जो दुर्योधन के हित में था प्रतिफल क्या?
बीज चने के भुने हुए थे क्षेत्र परिश्रम ऋतु फल क्या?
शायद मुझसे भूल हुई जो ऐसा कटु फल पाता था,
या विवेक में कमी रही थी कंटक दुख पल पाता था।
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या समय का रचा हुआ लगता था पूर्व निर्धारित खेल,
या मेरे प्रारब्ध कर्म का दुचित वक्त प्रवाहित मेल।
या स्वीकार करूँ दुर्योधन का मतिभ्रम था ये कहकर,
या दुर्भाग्य हुआ प्रस्फुटण आज देख स्वर्णिम अवसर।
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मन में शंका के बादल जो उमड़ घुमड़ कर आते थे,
शेष बची थी जो कुछ प्रज्ञा धुंध घने कर जाते थे ।
क्यों कर कान्हा ने मुझको दुर्योधन के साथ किया?
या नाहक का हीं था भ्रम ना केशव ने साथ दिया?
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या गिरिधर की कोई लीला थी शायद उपाय भला,
या अल्प बुद्धि अभिमानी पे माया का जाल फला।
अविवेक नयनों पे इतना सत्य दृष्टि ना फलता था,
या मैंने स्वकर्म रचे जो उसका हीं फल पलता था?
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या दुर्बुद्धि फलित हुई थी ना इतना सम्मान किया,
मृतशैया पर मित्र पड़ा था ना इतना भी ध्यान दिया।
क्या सोचकर मृतगामी दुर्योधन के विरुद्ध पड़ा ,
निज मन चितवन घने द्वंद्व में मैं मेरे प्रतिरुद्ध अड़ा।
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अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित

 


दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:21

 


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किसी व्यक्ति के चित्त में जब हीनता की भावना आती है तब उसका मन उसके द्वारा किये गए उत्तम कार्यों को याद दिलाकर उसमें वीरता की पुनर्स्थापना करने की कोशिश करता है। कुछ इसी तरह की स्थिति में कृपाचार्य पड़े हुए थे। तब उनको युद्ध स्वयं द्वारा किया गया वो पराक्रम याद आने लगा जब उन्होंने अकेले हीं पांडव महारथियों भीम , युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, द्रुपद, शिखंडी, धृष्टद्युम आदि से भिड़कर उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया था। इस तरह का पराक्रम प्रदर्शित करने के बाद भी वो अस्वत्थामा की तरह दुर्योधन का विश्वास जीत नहीं पाए थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था आखिर किस तरह का पराक्रम दुर्योधन के विश्वास को जीतने के लिए चाहिए था? प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का इक्कीसवां भाग।
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शत्रुदल के जीवन हरते जब निजबाहु खडग विशाल,
तब जाके कहीं किसी वीर के उन्नत होते गर्वित भाल।
निज मुख निज प्रशंसा करना है वीरों का काम नहीं,
कर्म मुख्य परिचय योद्धा का उससे होता नाम कहीं।
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मैं भी तो निज को उस कोटि का हीं योद्धा कहता हूँ,
निज शस्त्रों को अरि रक्त से अक्सर धोता रहता हूँ।
खुद के रचे पराक्रम पर तब निश्चित संशय होता है,
जब अपना पुरुषार्थ उपेक्षित संचय अपक्षय होता है।
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विस्मृत हुआ दुर्योधन को हों भीमसेन या युधिष्ठिर,
किसको घायल ना करते मेरे विष वामन करते तीर।
भीमसेन के ध्वजा चाप का फलित हुआ था अवखंडन ,
अपने सत्तर वाणों से किया अति दर्प का परिखंडन।
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लुप्त हुआ स्मृति पटल से कब चाप की वो टंकार,
धृष्टद्युम्न को दंडित करते मेरे तरकश के प्रहार।
द्रुपद घटोत्कच शिखंडी ना जीत सके समरांगण में,
पांडव सैनिक कोष्ठबद्ध आ टूट पड़े रण प्रांगण में।
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पर शत्रु को सबक सिखाता एक अकेला जो योद्धा,
प्रतिरोध का मतलब क्या उनको बतलाता प्रतिरोद्धा।
हरि कृष्ण का वचन मान जब धारित करता दुर्लेखा,
दुख तो अतिशय होता हीं जब रह जाता वो अनदेखा।
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अति पीड़ा मन में होती ना कुरु कुंवर को याद रहा,
सबके मरने पर जिंदा कृतवर्मा भी ना ज्ञात रहा।
क्या ऐसा भी पौरुष कतिपय नाकाफी दुर्योधन को?
एक कृतवर्मा का भीड़ जाना नाकाफी दुर्योधन को?
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अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित


दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:20

 

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कृपाचार्य और कृतवर्मा के जीवित रहते हुए भी ,जब उन दोनों की उपेक्षा करके दुर्योधन ने अश्वत्थामा को सेनापतित्व का भार सौंपा , तब कृतवर्मा को लगा था कि कुरु कुंवर दुर्योधन उन दोनों का अपमान कर रहे हैं। फिर कृतवर्मा मानवोचित स्वभाव का प्रदर्शन करते हुए अपने चित्त में उठते हुए द्वंद्वात्मक तरंगों को दबाने के लिए विपरीत भाव का परिलक्षण करने लगते हैं। प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का बीसवां भाग।
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क्षोभ युक्त बोले कृत वर्मा नासमझी थी बात भला ,
प्रश्न उठे थे क्या दुर्योधन मुझसे थे से अज्ञात भला?
नाहक हीं मैंने माना दुर्योधन ने परिहास किया,
मुझे उपेक्षित करके अश्वत्थामा पे विश्वास किया?
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सोच सोच के मन में संशय संचय हो कर आते थे,
दुर्योधन के प्रति निष्ठा में रंध्र क्षय कर जाते थे।
कभी मित्र अश्वत्थामा के प्रति प्रतिलक्षित द्वेष भाव,
कभी रोष चित्त में व्यापे कभी निज सम्मान अभाव।
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सत्यभाष पे जब भी मानव देता रहता अतुलित जोर,
समझो मिथ्या हुई है हावी और हुआ है सच कमजोर।
अपरभाव प्रगाढ़ित चित्त पर जग लक्षित अनन्य भाव,
निजप्रवृत्ति का अनुचर बनता स्वामी है मानव स्वभाव।
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और पुरुष के अंतर मन की जो करनी हो पहचान,
कर ज्ञापित उस नर कर्णों में कोई शक्ति महान।
संशय में हो प्राण मनुज के भयाकान्त हो वो अतिशय,
छद्म बल साहस का अक्सर देने लगता नर परिचय।
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उर में नर के गर स्थापित गहन वेदना गूढ़ व्यथा,
होठ प्रदर्शित करने लगते मिथ्या मुस्कानों की गाथा।
मैं भी तो एक मानव हीं था मृत्य लोक वासी व्यवहार,
शंकित होता था मन मेरा जग लक्षित विपरीतअचार।
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मुदित भाव का ज्ञान नहीं जो बेहतर था पद पाता था,
किंतु हीन चित्त मैं लेकर हीं अगन द्वेष फल पाता था।
किस भाँति भी मैं कर पाता अश्वत्थामा को स्वीकार,
अंतर में तो द्वंद्व फल रहे आंदोलित हो रहे विकार?
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अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित


दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:19

 

कृपाचार्य दुर्योधन को बताते है कि हमारे पास दो विकल्प थे, या तो महाकाल से डरकर भाग जाते या उनसे लड़कर मृत्युवर के अधिकारी होते। कृपाचार्य अश्वत्थामा के मामा थे और उसके दु:साहसी प्रवृत्ति को बचपन से हीं जानते थे। अश्वत्थामा द्वारा पुरुषार्थ का मार्ग चुनना उसके दु:साहसी प्रवृत्ति के अनुकूल था, जो कि उसके सेनापतित्व को चरितार्थ हीं करता था। प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया का उन्नीसवां भाग।
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विकट विघ्न जब भी आता ,
या तो संबल आ जाता है ,
या जो सुप्त रहा मानव में ,
ओज प्रबल हो आता है।
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भयाक्रांत संतप्त धूमिल ,
होने लगते मानव के स्वर ,
या थर्र थर्र थर्र कम्पित होते ,
डग कुछ ऐसे होते नर ।
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विकट विघ्न अनुताप जला हो ,
क्षुधाग्नि संताप फला हो ,
अति दरिद्रता का जो मारा ,
कितने हीं आवेग सहा हो ।
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जिसकी माता श्वेत रंग के ,
आंटे में भर देती पानी,
दूध समझकर जो पी जाता ,
कैसी करता था नादानी ।
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गुरु द्रोण का पुत्र वही ,
जिसका जीवन बिता कुछ ऐसे ,
दुर्दिन से भिड़कर रहना हीं ,
जीवन यापन लगता जैसे।
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पिता द्रोण और द्रुपद मित्र के ,
देख देखकर जीवन गाथा,
अश्वत्थामा जान गया था ,
कैसी कमती जीवन व्यथा।
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यही जानकर सुदर्शन हर ,
लेगा ये अपलक्षण रखता ,
सक्षम न था तन उसका ,
पर मन में आकर्षण रखता ।
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गुरु द्रोण का पुत्र वोही क्या ,
विघ्न बाधा से डर जाता ,
दुर्योधन वो मित्र तुम्हारा ,
क्या भय से फिर भर जाता ?
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थोड़े रूककर कृपाचार्य फिर ,
हौले दुर्योधन से बोले ,
अश्वत्थामा के नयनों में ,
दहक रहे अग्नि के शोले ।
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घोर विघ्न को किंचित हीं ,
पुरुषार्थ हेतु अवसर माने ,
अश्वत्थामा द्रोण पुत्र ,
ले चला शरासन तत्तपर ताने।
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित


Saturday, January 29, 2022

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:33

अश्रेयकर लक्ष्य संधान हेतु क्रियाशील हुए व्यक्ति को अगर सहयोगियों का साथ मिल जाता है तब उचित या अनुचित का द्वंद्व क्षीण हो जाता है। अश्वत्थामा दुर्योधन को आगे बताता है कि कृतवर्मा और कृपाचार्य का साथ मिल जाने के कारण उसका मनोबल बढ़ गया और वो पूरे जोश के साथ लक्ष्यसिद्धि हेतु अग्रसर हो चला। 
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कृपाचार्य कृतवर्मा सहचर 
मुझको फिर क्या होता भय, 
जिसे प्राप्त हो वरदहस्त शिव का 
उसकी हीं होती जय।
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त्रास नहीं था मन मे  किंचित 
निज तन मन व प्राण का,
पर चिंता एक सता रही 
पुरुषार्थ त्वरित अभियान का।
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धर्माधर्म  की  बात नहीं 
न्यूनांश ना मुझको दिखता था,
रिपु मुंड के अतिरिक्त ना 
ध्येय अक्षि में टिकता था।
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ना सिंह भांति निश्चित हीं  
किसी एक श्रृगाल की भाँति,
घात लगा हम किये प्रतीक्षा 
रात्रिपहर व्याल की भाँति।  
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कटु  सत्य है दिन में लड़कर 
ना इनको हर सकता था,
भला एक हीं  अश्वत्थामा  
युद्ध  कहाँ लड़ सकता  था?
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जब तन्द्रा में सारे थे छिप कर 
निज अस्त्र उठाया मैंने ,
निहत्थों पर चुनचुन कर हीं 
घातक शस्त्र चलाया मैंने।
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दुश्कर,दुर्लभ,दूभर,मुश्किल 
कर्म रचा जो बतलाता हूँ , 
ना चित्त में अफ़सोस बचा 
ना रहा ताप ना पछताता हूँ। 
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तन मन पे भारी रहा बोझ अब 
हल्का  हल्का लगता है,
आप्त हुआ है व्रण चित्त का ना 
आज ह्रदय में फलता है।  
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जो सैनिक  योद्धा  बचे हुए थे 
उनके  प्राण प्रहारक  हूँ , 
शिखंडी  का  शीश  विक्षेपक   
धृष्टद्युम्न  संहारक  हूँ।
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जो पितृवध से दबा हुआ 
जीता था कल तक रुष्ट हुआ,
गाजर मुली सादृश्य  काट आज 
अश्वत्थामा तुष्ट  हुआ। 
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अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित
 

Sunday, August 22, 2021

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:18


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इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् सत्रहवें भाग में दिखाया गया जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा ने देखा कि पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कोई और नहीं , अपितु कालों के काल साक्षात् महाकाल कर रहे हैं तब उनके मन में दुर्योधन को दिए गए अपने वचन के अपूर्ण रह जाने की आशंका होने लगी। कविता के वर्तमान भाग अर्थात अठारहवें भाग में देखिए इन विषम परिस्थितियों में  भी अश्वत्थामा ने हार नहीं मानी और निरूत्साहित पड़े कृपाचार्य और कृतवर्मा को प्रोत्साहित करने का हर संभव प्रयास किया। प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया का अठारहवाँ भाग।
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अगर  धर्म  के  अर्थ  करें तो  बात  समझ  ये आती है,
फिर मन के अंतरतम में कोई दुविधा रह ना पाती  है।
भान हमें  ना  लक्ष्य हमारे  कोई पुण्य विधायक  ध्येय,
पर  अधर्म  की राह नहीं हम भी ना  मन  में  है  संदेह।  
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बात सत्य है अटल तथ्य ये  बाधा अतिशय भीषण है  ,
दर्प होता  योद्धा को जिस बल का पर एक परीक्षण है ।  
यही समय है हे कृतवर्मा निज भुज बल के चित्रण  का,
कैसी शिक्षा मिली हुई क्या असर हुआ है शिक्षण का। 
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लक्ष्य समक्ष हो विकट विध्न तो झुक  जाते हैं  नर अक्सर,
है  स्वयं सिद्ध करने को योद्धा चूको ना  स्वर्णिम अवसर।
आजीवन  जो भुज बल का  जिह्वा से  मात्र पदर्शन करते,
उचित सर्वथा  भू अम्बर भी कुछ तो इनका दर्शन करते।
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भय करने का समय नहीं ना विकट विघ्न गुणगान का,
आज अपेक्षित योद्धा तुझसे  कठिन  लक्ष्य संधान का।  
वचन  दिया  था जो हमने  क्या  महा  देव से  डर जाए?
रुद्रपति  अवरोध   बने हो  तो  क्या डर कर  मर जाए?
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महाकाल के अति सुलभ  दर्शन  नर  को ना ऐसे   होते ,
जन्मों की हो अटल तपस्या तब जाकर अवसर मिलते।
डर कर मरने से श्रेयकर है टिक पाए हम इक क्षण को,
दाग  नहीं  लग   पायेगा  ना  प्रति बद्ध  थे निज प्रण को।
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जो  भी  वचन  दिया  मित्र  को  आमरण  प्रयास  किया,
लोग  नहीं  कह  पाएंगे  खुद  पे  नाहक  विश्वास किया।
और   शिव   के  हाथों  मरकर भी क्या हम मर पाएंगे?
महाकाल   के  हाथों   मर  अमरत्व   पूण्य   वर पाएंगे।
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अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, August 15, 2021

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-17

 

इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् सोलहवें  भाग में दिखाया गया जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा पांडव पक्ष के बाकी   बचे हुए जीवित योद्धाओं का संहार करने का प्रण लेकर पांडवों के शिविर के पास पहुँचे तो वहाँ उन्हें एक विकराल पुरुष पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा करते हुए दिखाई पड़ा। उस महाकाल सदृश पुरुष की उपस्थिति मात्र हीं कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा के मन में भय का संचार उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त थी ।कविता के वर्तमान भाग अर्थात् सत्रहवें भाग में देखिए थोड़ी देर में उन तीनों योद्धाओं  को ये समझ आ गया कि पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कोई और नहीं , अपितु कालों के काल साक्षात् महाकाल कर रहे थे । यह देखकर कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा के मन में दुर्योधन को दिए गए अपने वचन के अपूर्ण रह जाने के भाव मंडराने लगते हैं। परन्तु अश्वत्थामा न केवल स्वयं के डर पर विजय प्राप्त करता है अपितु सेनापतित्व के भार का बखूबी संवाहन करते हुए अपने मित्र कृपाचार्य और कृतवर्मा को प्रोत्साहित भी करता है। प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का सत्रहवाँ भाग।

वक्त  लगा था अल्प बुद्धि  के कुछ तो जागृत होने में,
महादेव से  महा काल  से  कुछ  तो  परीचित होने में।
सोंच पड़े  थे  हम  सारे  उस  प्रण का रक्षण कैसे  हो ?
आन पड़ी थी विकट विघ्न उसका उपप्रेक्षण कैसे हो?

मन में  शंका के बादल सब उमड़ घुमड़ के आते थे ,
साहस जो भी बचा हुआ था सब के सब खो  जाते थे। 
जिनके  रक्षक महादेव  रण में फिर  भंजन हो कैसे? 
जयलक्ष्मी की नयनों का आखिर अभिरंजन हो कैसे?

वचन दिए थे जो मित्र को निर्वाहन हो पाएगा क्या?
कृतवर्मा  अब तुम्हीं कहो हमसे ये हो पाएगा क्या?
किस बल से महा शिव  से लड़ने का  साहस लाएँ?
वचन दिया जो दुर्योधन को संरक्षण हम कर पाएं?

मन  जो  भी  भाव निराशा के क्षण किंचित आये थे ,
कृतवर्मा  भी हुए निरुत्तर शिव संकट बन आये  थे।
अश्वत्थामा   हम  दोनों  से  युद्ध  मंत्रणा  करता  था ,  
उस क्षण जैसे भी संभव था हममें साहस भरता था ।

बोला  देखों  पर्वत  आये  तो चींटी   करती है क्या ?
छोटे छोटे  पग उसके पर वो पर्वत से डरती  क्या ?
जो  संभव  हो  सकता उससे वो पुरुषार्थ रचाती है ,
छोटे हीं   पग उसके  पर पर्वत मर्दन कर जाती है।

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-16

 

इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् पन्द्रहवें भाग में दिखाया गया जब अर्जुन के शिष्य सात्यकि और भूरिश्रवा के बीच युद्ध चल रहा था और युद्ध में भूरिश्रवा सात्यकि पर भारी पड़ रहा था तब अपने शिष्य सात्यकि की जान बचाने के लिए अर्जुन ने बिना कोई चेतावनी दिए युद्ध के नियमों की अवहेलना करते हुए अपने तीक्ष्ण वाणों से भूरिश्रवा के हाथ को काट डाला। कविता के वर्तमान भाग अर्थात् सोलहवें भाग में देखिए जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा पांडव पक्ष के सारे बचे हुए योद्धाओं का संहार करने हेतु पांडवों के शिविर के पास पहुँचे तो वहाँ उन्हें एक विकराल पुरुष उन योद्धाओं की रक्षा करते हुए दिखाई पड़ा। उस विकराल पुरुष की आखों से अग्नि समान ज्योति निकल रही थी। वो विकराल पुरुष कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा के लक्ष्य के बीच एक भीषण बाधा के रूप में उपस्थित हुआ था, जिसका समाधान उन्हें निकालना हीं था । प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का सोलहवाँ भाग।

हे  मित्र  पूर्ण करने को तेरे  मन की अंतिम  अभिलाषा,
हमसे कुछ  पुरुषार्थ फलित हो  ले उर  में ऐसी  आशा।
यही  सोच  चले थे  कृपाचार्य  कृतवर्मा पथ पे मेरे संग,
किसी विधी डाल सके अरिदल के रागरंग में थोड़े भंग।

जय के मद में पागल पांडव कुछ तो उनको भान कराएँ,
जो कुछ बित रहा था हमपे थोड़ा उनको ज्ञान कराएँ ?
ऐसा हमसे कृत्य रचित हो लिख पाएं कुछ ऐसी गाथा,
मित्र तुम्हारी मृत्यु लोक में कुछ तो कम हो पाए व्यथा।

मन में ऐसा भाव लिए था कठिन लक्ष्य पर वरने को ,
थे दृढ प्रतिज्ञ हम तीनों चलते प्रति पक्ष को हरने को।
जब पहुंचे खेमे अरिदल योद्धा रात्रि पक्ष में सोते थे ,
पर इससे दुर्भाग्य लिखे जो हमपे कम ना होते थे।

प्रतिपक्ष शिविर के आगे काल दीप्त एक दिखता था,
मानव जैसा ना दिखता यमलोक निवासी दिखता था।
भस्म लगा था पूरे तन पे सर्प नाग की पहने माला ,
चन्द्र सुशोभित सर पर जिसके नेत्रों में अग्निज्वाला।

कमर रक्त से सना हुआ था व्याघ्र चर्म से लिपटा तन,
रुद्राक्ष हथेली हाथों में आयुध नानादि तरकश घन।
निकले पैरों से अंगारे थे दिव्य पुरुष के अग्नि भाल,
हेदेव कौन रक्षण करता था प्रतिपक्ष का वो कराल?

कौन आग सा जलता था ये देख भाव मन फलता था,
गर पांडव रक्षित उस नर से ध्येय असंभव दिखता था।
प्रतिलक्षित था चित्तमें मनमें शंका भाव था दृष्टित भय,
कभी आँकते निजबल को और कभी विकराल अभय।

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, August 1, 2021

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-15


इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् चौदहवें भाग में दिखाया गया कि प्रतिशोध की भावना से ग्रस्त होकर अर्जुन द्वारा  जयद्रथ का वध इस तरह से किया गया कि उसका सर धड़ से अलग होकर उसके तपस्वी पिता की गोद में गिरा और उसके तपस्या में लीन  पिता  का  सर  टुकड़ों  में  विभक्त  हो गया  कविता  के  वर्तमान  प्रकरण  अर्थात् पन्द्रहवें भाग में देखए महाभारत युद्ध नियमानुसार अगर दो योद्धा आपस में लड़ रहे हो तो कोई तीसरा योद्धा हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। जब अर्जुन के शिष्य सात्यकि और भूरिश्रवा के बीच युद्ध चल रहा था और युद्ध में भूरिश्रवा सात्यकि पर भारी पड़ रहा था तब अपने शिष्य सात्यकि की जान बचाने के लिए अर्जुन ने बिना कोई चेतावनी दिए अपने तीक्ष्ण बाण से भूरिश्रवा के हाथ को काट डाला। तत्पश्चात सात्यकि ने भूरिश्रवा का सर धड़ से अलग कर दिया। अगर शिष्य मोह में अर्जुन द्वारा युद्ध के नियमों का उल्लंघन करने को पांडव अनुचित नहीं मानते तो धृतराष्ट्र द्वारा पुत्रमोह में किये गए कुकर्म अनुचित कैसे हो सकते थे ?  प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का पंद्रहवां भाग।

महा   युद्ध   होने   से पहले  कतिपय नियम  बने पड़े थे,
हरि   भीष्म  ने  खिंची   रेखा उसमें योद्धा  युद्ध लड़े थे।
एक योद्धा योद्धा से लड़ता हो प्रतिपक्ष पे गर अड़ता हो,
हस्तक्षेप वर्जित था बेशक निजपक्ष का योद्धा मरता हो।

पर स्वार्थ सिद्धि की बात चले स्व प्रज्ञा चित्त बाहिर था,
निरपराध का वध करने में पार्थ निपुण जग जाहिर था।
सव्यसाची का शिष्य सात्यकि एक योद्धा से लड़ता था,
भूरिश्रवा  प्रतिपक्ष    प्रहर्ता   उसपे   हावी   पड़ता  था।

भूरिश्रवा यौधेय विकट  था  पार्थ शिष्य शीर्ष हरने को,
दुर्भाग्य प्रतीति परिलक्षित थी पार्थ शिष्य था मरने को।
बिना  चेताए  उस योधक  पर  अर्जुन  ने  प्रहार किया,
युद्ध में  नियमचार  बचे जो  उनका  सर्व संहार किया।

रण के नियमों  का उल्लंघन  कर अर्जुन  ने प्राण लिया ,
हाथ काटकर  उद्भट  का कैसा अनुचित दुष्काम किया।
अर्जुन से दुष्कर्म  फलाकर  उभयहस्त से हस्त गवांकर,
बैठ गया था भू पर रण में एक हस्त योद्धा  पछताकर।

पछताता था  नियमों  का  नाहक   उसने सम्मान किया ,
पछतावा कुछ और बढ़ा जब सात्यकि ने दुष्काम किया।
जो  कुछ  बचा  हुआ  अर्जुन  से वो दुष्कर्म  रचाया था,    
शस्त्रहीन हस्तहीन योद्धा  के  सर  तलवार चलाया  था ।  
कटा  सिर  शूर का  भू पर विस्मय  में था वो पड़ा हुआ,
ये   कैसा  दुष्कर्म फला था  धर्म  पतित हो  गड़ा  हुआ?
शिष्य मोह में गर अर्जुन का रचा कर्म  ना कलुसित था, 
पुत्र मोह  में  धृतराष्ट्र  का अंधापन   कब  अनुचित था?

कविता के अगले भाग अर्थात् सोलहवें भाग में देखिए अश्वत्थामा ने पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कर रहे महादेव को कैसे प्रसन्न कर प्ररिपक्ष के बचे हुए सारे सैनिकों और योद्धाओं का विनाश किया ।

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, July 24, 2021

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-14


इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् तेरहवें भाग में अभिमन्यु के गलत तरीके से किये गए वध में जयद्रथ द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका और तदुपरांत केशव और अर्जुन द्वारा अभिमन्यु की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए रचे गए प्रपंच के बारे में चर्चा की गई थी। कविता के  वर्तमान प्रकरण अर्थात् चौदहवें भाग में देखिए कैसे प्रतिशोध की भावना से वशीभूत होकर अर्जुन ने जयद्रथ का वध इस तरह से किया कि उसका सर धड़ से अलग होकर उसके तपस्वी पिता की गोद में गिरा और उसके पिता का सर टुकड़ों में विभक्त हो गया। प्रतिशोध की भवना से ग्रस्त होकर अगर अर्जुन जयद्रथ के निर्दोष तपस्वी पिता का वध करने में कोई भी संकोच नहीं करता , तो फिर प्रतिशोध की उसी अग्नि में दहकते हुए अश्वत्थामा से जो कुछ भी दुष्कृत्य रचे गए , भला वो अधर्म कैसे हो सकते थे? प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का चौदहवाँ भाग।

निरपराध थे  पिता  जयद्रथ  के पर   वाण चलाता था,
ध्यान  मग्न  थे परम  तपस्वी पर  संधान लगाता था।
प्रभुलीन के चरणों में गिरा कटा हुआ जयद्रथ का सिर ,
देख पुत्र का  शीर्ष विक्षेपण  पिता हुए थे अति अधीर।

और भाग्य  का खेला ऐसा मस्तक फटा तात का ऐसे,
खरबूजे का फल हाथ से  भू पर  गिरा हुआ हो  जैसे।
छल प्रपंच जग जाहिर अर्जुन केशव से बल पाता था ,
पूर्ण हुआ प्रतिशोध मान कर चित में मान सजाता था।

गर भ्राता  का  ह्रदय  फाड़ना  कृत्य  नहीं  बुरा  होता,
नरपशु भीम का प्रति शोध रक्त पीकर  हीं पूरा होता।
चिर प्रतिशोध की अग्नि जो पांचाली में थी धधक रही ,
रक्त पिपासु चित उसका था शोला  बनके भड़क रही।

ऐसी ज्वाला भड़क रही जबतक ना  चीत्कार हुआ,
दु:शासन का रक्त लगाकर जबतक ना श्रृंगार हुआ।
तबतक केश खुले रखकर शोला बनकर जलती थी ,
यदि धर्म था अगन चित में ले करके  जो फलती थी।

दु:शासन उर रक्त हरने  में, जयद्रथ जनक के  वधने में ,
केशव अर्जुन  ना  कुकर्मी  गर  छल प्रपंच के  रचने में।
तो   कैसा   अधर्म   रचा   मैंने वो धर्म स्वीकार किया। , 
प्रतिशोध की वो अग्नि हीं निज चित्त अंगीकार किया?

गर  प्रतिशोध हीं ले लेने का मतलब धर्म विजय होता ,
चाहे  कैसे  भी  ले  लो  पर  धर्म पुण्य  ना  क्षय होता।
गर  वैसा  दुष्कर्म  रचाकर  पांडव  विजयी  कहलाते,
तो किस मुँह से कपटी सारे मुझको कपटी कह पाते?

कविता के अगले भाग अर्थात् पन्द्रहवें भाग में देखिए अश्वत्थामा आगे बताता है कि अर्जुन ने अपने शिष्य सात्यकि के प्राण बचाने के लिए भूरिश्रवा का वध कैसे बिना चेतावनी दिए कर दिया।

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday, July 19, 2021

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-13

 

इस दीर्घ रचना के पिछले भाग अर्थात् बारहवें  भाग में आपने देखा अश्वत्थामा ने दुर्योधन को पाँच कटे हुए नर कंकाल  समर्पित करते हुए क्या कहा। आगे देखिए वो कैसे अपने पिता गुरु द्रोणाचार्य के अनुचित तरीके के किये गए वध के बारे में दुर्योधन ,कृतवर्मा और कृपाचार्य को याद दिलाता है। फिर तर्क प्रस्तुत करता है कि उल्लू  दिन में  अपने शत्रु को हरा नहीं सकता इसीलिए वो रात में हीं  घात लगाकर अपने शिकार पर प्रहार करता है। पांडव के पक्ष में अभी भी पाँचों पांडव , श्रीकृष्ण , शिखंडी , ध्रीष्टदयुम्न आदि और अनगिनत सैनिक मौजूद थे जिनसे दिन में लड़कर अश्वत्थामा जीत नहीं सकता था । इसीलिए उसने  उल्लू से सबक सीखकर रात में हीं घात लगाकर पड़ाव पक्ष पे प्रहार कर नरसंहार रचाया। और देखिए अभिमन्यु के गलत तरीके से किये गए वध में जयद्रथ द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका और तदुपरांत केशव और अर्जुन द्वारा अभिमन्यु की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए रचे गए प्रपंच। प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का  तेरहवां भाग।

पिता मेरे गुरु द्रोणाचार्य थे चक्रव्हयू के  अद्भुत ज्ञाता,
शास्त्र शस्त्र गूढ़ ज्ञान के ज्ञानी रणशिल्प के परिज्ञाता।
धर्मराज ना टिक पाते थे भीम नाकुलादि पांडव भ्राता ,
पार्थ  कृष्ण को अभिज्ञान था वो  कैसे संग्राम   विज्ञाता।
  
इसीलिए  तो  यदुनंदन  ने कुत्सित  मनोव्यापार  किया ,
संग युधिष्ठिर कपट रचा कर प्राणों पे अधिकार किया।
अस्वत्थामा  मृत  हुआ  है   गज  या  नर  कर  उच्चारण,
किस मुँह धर्म का दंभ भरें वो   दे   सत्य  पर सम्भाषण।

धर्मराज का धर्म लुप्त  जब गुरु ने असत्य स्वीकारा था,
और  कहाँ  था  धर्म ज्ञान  जब छल से शीश उतारा था ।
एक  निहथ्थे   गुरु   द्रोण   पर  पापी  करता  था  प्रहार ,
धृष्टद्युम्न  के  अप्कर्मों  पर  हुआ   कौन  सा  धर्माचार ?

अधर्म राह का करके पालन और असत्य का उच्चारण ,
धर्मराज  से  धर्म  लुप्त था  और  कृष्ण  से  सत्य   हरण। 
निज  स्वार्थ   सिद्धि   हेतु पांडव  से जो कुछ  कर्म  हुआ ,
हे कृपाचार्य गुरु द्रोणाचार्य को छलने में क्या धर्म हुआ ?

बगुलाभक्तों के चित में क्या छिपी हुई होती है आशा,
छलिया बुझे जाने  माने किचित छल प्रपंच  की भाषा।
युद्ध  जभी कोई  होता है  एक  विजेता  एक  मरता  है ,
विजय पक्ष की आंकी जाती समर कोई कैसे लड़ता है?

हे  कृपाचार्य  हे  कृतवर्मा  ना  सोंचे  कैसा काम  हुआ ?
हे  दुर्योधन ना अब   देखो ना  युद्धोचित  अंजाम हुआ?
हे  कृतवर्मा  धर्म   रक्षण की    बात हुई  है आज वृथा ,
धर्म न्याय का क्षरण हुआ  है रुदन करती आज पृथा।

गज कोई क्या मगरमच्छ से जल में लड़ सकता है क्या?
जो जल का है चपल खिलाड़ी उनपे अड़ सकता है क्या?
शत्रु  प्रबल  हो   आगे  से  लड़ने  में  ना  बुद्धि का काम , 
रात्रि प्रहर में हीं उल्लू अरिदल का करते काम तमाम।

उल्लूक सा  दौर्वृत्य  रचाकर  ना  मन  में  शर्माता   हूँ , 
कायराणा  कृत्य  हमारा  पर मन हीं मन  मुस्काता हूँ ।  
ये बात सही है छुप छुप के हीं रातों को संहार किया ,
कोई  योद्धा जगा नहीं  था बच  बच के प्रहार किया।

फ़िक्र  नहीं  है  इस  बात की ना  योद्धा  कहलाऊँगा,
दाग  रहेगा  गुरु पुत्र  पे   कायर   सा  फल  पाऊँगा।
इस दुष्कृत्य  को बाद हमारे समय  भला कह पायेगा?
अश्वत्थामा  के चरित्र  को  काल  भला  सह  पायेगा?

जब भी कोई नर या नारी प्रतिशोध का करता  निश्चय ,
बुद्धि लुप्त हो हीं  जाती  है और ज्ञान का होता है क्षय। 
मुझको  याद  करेगा  कोई  कैसे    इस का ज्ञान नहीं ,
प्रतिशोध  तो  ले  हीं  डाला बचा हुआ बस भान यहीं ।

गुरु  द्रोण  ने पांडव को हरने हेतु जब चक्र रचा,
चक्रव्यहू के पहले वृत्त में जयद्रथ ने कुचक्र रचा।
कुचक्र  रचा  था  ऐसा  कि  पांडव  पार ना पाते थे ,
गर  ना  होता जयद्रथ  अभिमन्यु  मार ना पाते थे।  

भीम युधिष्ठिर जयद्रथ पे उस दिन अड़ न पाते थे ,
पार्थ कहीं थे फंसे नहीं सहदेव नकुल लड़ पाते थे।  
अभिमन्यु तो चला गया फंसा हुआ उसके अन्दर ,
वध फला अभिमन्यु का बना जयद्रथ काल कंदर।   

अगर पुत्र के  मरने पर अर्जुन को क्रोध हुआ अतिशय,
चित्त में अग्नि प्रतिघात की फलित हुई थी क्षोभ प्रलय।
अभिमन्यु  का  वध अगर ना युद्ध नियामानुसार हुआ ,
तो जयद्रध को हरने में वो कौन युद्ध का नियम फला?

जयद्रथ  तो  अभिमन्यु  के  वध  में  मात्र  सहायक था ,
छल  से वध रचने वालों में  योद्धा था  अधिनायक था।
जयद्रथ  को  छल  से  मारा  तथ्य  समझ में आता  हैं ,
पर  पिता  को वधने में क्या पुण्य समझ ना आता है।   

सुदूर किसी गिरी केअंतर और किसी तरुवर के नीचे,
तात जयद्रथ परम तपस्वी चित्त में परम ब्रह्म को सींचे।
मन में तन में ईश जगा के मुख में बस प्रभु की वाणी ,
कहीं  तपस्या  लीन  मगन  थे  पर पार्थ वो अभिमानी।

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, July 10, 2021

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-12

 

इस दीर्घ रचना के पिछले भाग अर्थात् ग्यारहवें भाग में आपने देखा कि युद्ध के अंत में भीम द्वारा जंघा तोड़ दिए जाने के बाद दुर्योधन मरणासन्न अवस्था में  हिंसक जानवरों के बीच पड़ा हुआ था। आगे देखिए जंगली शिकारी पशु बड़े धैर्य के साथ दुर्योधन की मृत्यु का इन्तेजार कर रहे थे और उनके बीच फंसे हुए दुर्योधन को मृत्यु की आहट को देखते रहने के अलावा कोई चारा नहीं था। परंतु होनी को तो कुछ और हीं मंजूर थी । उसी समय हाथों में  पांच कटे हुए  नर कपाल लिए अश्वत्थामा का आगमन हुआ  और दुर्योधन की मृत्यु का इन्तेजार कर रहे वन पशुओं की ईक्छाएँ धरी की धरी रह गई। आइये देखते हैं अश्वत्थामा ने दुर्योधन को पाँच कटे हुए नर कंकाल  समर्पित करते हुए क्या कहा?  प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का  बारहवां भाग।  

आश्वस्त रहा सिंहों की भाँति  गज सा मस्त रहा जीवन में,
तन चींटी  से  बचा रहा था आज वो ही योद्धा उस क्षण में।
पड़ा   हुआ  था  दुर्योधन  होकर  वन   पशुओं  से  लाचार,
कभी शिकारी बन वन फिरता  आज बना था वो शिकार।

मरना   तो   सबको   होता एक दिन वो  बेशक मर जाता,
योद्धा   था  ये   बेहतर    होता   रण   क्षेत्र   में अड़  जाता।
या  मस्तक  कटता  उस  रण  में और देह को देता त्याग ,
या झुलसाता शीश अरि का निकल रही जो उससे आग।

पर  वीरोचित एक   योद्धा  का उसको  ना  सम्मान मिला ,
कुकर्म रहा  फलने  को बाकी नहीं शीघ्र परित्राण मिला।
टूट  पड़ी थी  जंघा   उसकी   उसने    बेबस  कर   डाला,
मिलना  था अपकर्ष फलित  सम्मान रहित मृत्यु प्याला। 

जंगल  के  पशु  जंगल के घातक   नियमों से  चलते  है,
उन्हें ज्ञात  क्या  धैर्य प्रतीक्षा  गुण  जो मानव  बसते  हैं।
पर जाने क्या पाठ पढ़ाया मानव के उस मांसल तन ने ,
हिंसक  सारे बैठ पड़े थे दमन  भूख  का करके मन में।

सोच  रहे  सब  वन  देवी   कब निज  पहचान कराएगी?
नर  के  मांसल भोजन का कब तक  रसपान कराएगी?
कब  तक कैसे इस नर का हम सब  भक्षण कर पाएंगे?
कब  तक  चोटिल   घायल  बाहु नर   रक्षण कर पाएंगे?

पैर हिलाना मुश्किल था अति उठ बैठ ना चल पाता था ,
हाथ  उठाना  था  मुश्किल  जो  बोया था  फल पाता था।
घुप्प अँधेरा नीरव  रात्रि में  सरक सरक  के चलते सांप , 
हौले  आहट  त्वरित  हो रहे  यम के वो  मद्धम पदचाप।

पर  दुर्योधन  के  जीवन  में  कुछ  पल  अभी बचे   होंगे ,
या    गिद्ध,  शृगालों   के  कति पय   दुर्भाग्य   रहे   होंगे।
गिद्ध, श्वान  की  ना होनी थी  विचलित रह  गया व्याधा,
चाह  अभी   ना   फलित हुई   ना फलित   रहा  इरादा।

उल्लू  के सम  कृत रचा  कर महादेव की कृपा पाकर,
कौन आ रहा सन्मुख  उसके देखा जख्मी  घबड़ाकर?
धर्म   पुण्य   का    संहारक   अधर्म   अतुलित  अगाधा , 
दक्षिण   से अवतरित हो रहा  था  अश्वत्थामा  विराधा।

एक  हाथ   में  शस्त्र सजा के  दूजे  कर नर मुंड लिए,
दिख  रहा  था   अश्वत्थामा   जैसे  नर्तक  तुण्ड  जिए।
बोला  मित्र  दुर्योधन   तूझको  कैसे  गर्वित  करता हूँ,
पांडव कपाल सहर्ष तेरे चरणों को अर्पित करता हूँ।

भीम , युधिष्ठिर धर्मयुद्ध ना करते बस  छल हीं करते थे ,
नकुल और सहदेव विधर्मी छल से हीं बच कर रहते थे।
जिस  पार्थ ने भीष्म  पितामह का अनुचित संहार किया,
कर्ण मित्र जब विवश हुए छलसे  कैसे वो प्रहार किया।

वध  करना  हीं  था दु:शासन का  भीम  तो  कर देता,
केश  रक्त  के   प्यासे   पांचाली  चरणों   में धर देता।
कृपाचार्य क्या बात हुई दु:शासन का रक्त पी पीकर,
पशुवत कृत्य रचाकर निजको कैसे कहता है वो नर। 

कविता के अगले भाग , अर्थात् तेरहवें भाग में देखिए कैसे अश्वत्थामा ने अपने द्वारा रात्रि में छल से किये गए हत्याओं , दुष्कर्मों को  उचित ठहराने के लिए दुर्योधन , कृपाचार्य और कृतवर्मा के सामने कैसे कैसे तर्क प्रस्तुत किए?

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday, July 8, 2021

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-11

इस दीर्घ कविता के दसवें भाग में दुर्योधन  द्वारा श्रीकृष्ण को हरने का असफल प्रयास और उस असफल प्रयास के प्रतिउत्तर में श्रीकृष्ण वासुदेव द्वारा स्वयं के  विभूतियों के प्रदर्शन का वर्णन किया गया है।अर्जुन सरल था तो उसके प्रति कृष्ण मित्रवत व्यवहार रखते थे, वहीं  कपटी दुर्योधन के लिए वो महा कुटिल थे। इस भाग में देखिए , युद्ध के अंत में भीम द्वारा जंघा तोड़ दिए जाने के बाद मरणासन्न अवस्था में दुर्योधन  हिंसक जानवरों के बीच पड़ा हुआ था। जानवर की वृत्ति रखने वाला योद्धा स्वयं को जानवरों के बीच असहाय महसूस कर रहा था । अधर्म का आचरण करने वाले व्यक्ति का अंजाम जैसा होना चाहिए , कुछ इसी तरह का अंजाम दुर्योधन का हुआ था। प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का  ग्यारहवां भाग। 

छल प्रपंच  का अर्जन करके कपटी  दुर्योधन फलता,
तिनका तिनका अनल दबाकर सीने में जलता रहता।
धृतराष्ट्र  सुत  कलुसित  मन लेकर जीता था जीवन में,
ज्यों नागों का राजा सीधा फन करके चलता हो वन में।

बाल्य काल में जो भ्राता  को विष का पान कराता था,
लाक्षा  गृह  में पांडव सब मर जाए जाल बिछाता था।
श्यामा  ने  तो  खेल खेल  में थोड़ा सा परिहास किया ,
ना  कोई  था  कपट  रचा ना वहमी  ने विश्वास किया।
 
वो  हास ना  समझ  सका  था  परिहास का ज्ञान नहीं ,
भाभी  के  परिहासों से चोटिल होता  अभिमान कहीं?
जो श्यामा के हंसने को समझा था अवसर अड़ने को ,
हँसना तो  मात्र बहाना था वो  था हीं तत्पर लड़ने को।

भला  खेल में   भी  कोई  क्या  घन  षड्यंत्र रचाता   है?
था खेल  युद्ध ना  आडम्बर   मिथ्या प्रपंच    चलाता है?
भरी सभा में पांचाली  का कर सकता जो   वस्त्र हरण,
आखिर वोहीं तो सोच सके कैसे हरि का हो तेजहरण।

चिंगारी  तो  लहक  रही थी बस एक तिनका काफी था ,
ना  सवाल  था संधि का  कोई ना सवाल था माफ़ी का।
जो जलता हो क्रोध अनल में आखिर जग को क्या देता?
वो  तो  काँटों  का  था  पौधा  यदु नंदन   को क्या  देता ?

भीष्म द्रोण  जब साथ खड़े थे उसको भय कैसे होता?
और मित्र  हो अंग राज  तब  जग में  क्षय कैसे  होता?
कोई  होता और  समक्ष   दुर्योधन  को  फलना हीं था,
पर  हरि  हो  जाएं विपक्ष  तब अहंकार हरना  हीं था।

भीष्म, द्रोण और कर्ण का रक्षण काम न कोई आया ,
छल के पासे  फेंक फेंक कर  शकुनी  तब पछताया । 
काम ना आई ममता माँ की कपट काम ना आता था ,
जब   भीम  ने छल  से  जंघा  तोड़ी    तब   गुर्राता   था।         

आज वोही कपटी अभिमानी भू पे पड़ा हुआ था  ऐसे,
धुल धूसरित हो जाती हो  दूब  धरा पर  सड़ के जैसे।
अति भयावह दृश्य गजब था उस काले अंधियारे का,
ना कोई ज्योति गोचित ना परिचय था उजियारे का।

उल्लू  सारे  वृक्ष  पर बैठे  आस  लगाए  थे  भक्षण  को,
जिह्वा उनकी आग उगलती ना आता कोई रक्षण को।
निशा  अंधेरी  तिमिर  गहन और  कुत्ते घात लगाते थे,
गिद्ध  शृगाल  थे  प्रतिद्वंदी  सब लड़ते थे चिल्लाते  थे।

जो जीवन भर जंगल के पशुओं जैसा करता व्यवहार,
घात  लगा  कर शत्रु की  गर्दन   पे रखता था   तलवार।  
लोमड़  जैसी  आंखे  जिसकी और गिद्धों से थे आचार,
वो हीं  दुर्योधन पड़ा हुआ था  गिद्धों   के आगे  लाचार।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-10

 दीर्घ कविता के इस भाग में दुर्योधन के बचपन के कुसंस्कारों का संछिप्त परिचय  , दुर्योधन  द्वारा श्रीकृष्ण को हरने का असफल प्रयास और उस असफल प्रयास के प्रतिउत्तर में श्रीकृष्ण वासुदेव द्वारा स्वयं के  विभूतियों के प्रदर्शन का वर्णन किया है। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व एक दर्पण की भांति है, जिसमे पात्र को वो वैसे  हीं दिखाई पड़ते हैं  , जैसा कि वो स्वयं है। दुर्योधन जैसे कुकर्मी और कपटी व्यक्ति के लिए वो छलिया है जबकि अर्जुन जैसे सरल ह्रदय व्यक्ति के लिए एक सखा ।  युद्ध शुरू होने से पहले जब अर्जुन और दुर्योधन दोनों गिरिधर की सहायता प्राप्त करने हेतु उनके पास पहुँचते हैं तो यदुनंदन दुर्योधन के साथ छल करने में नहीं हिचकते। प्रस्तुत है दीर्घ कविता "दुर्योधन कब मिट पाया " का दसवाँ भाग।


किसी मनुज में अकारण अभिमान यूँ हीं न जलता है ,
तुम जैसा वृक्ष लगाते हो वैसा हीं तो फल फलता है ।  
कभी चमेली की कलियों  पे मिर्ची ना तीखी आती है  ,
सुगंध चमेली का  गहना वो इसका हीं फल पाती है।

जो बाल्यकाल में भ्राता को विष देने का साहस करता,
कि लाक्षागृह में धर्म राज जल जाएं दु:साहस करता।
जो हास न समझ सके और   परिहास का ज्ञान नहीं ,
भाभी के परिहासों से चोटिल होता  अभिमान कहीं?

दुर्योधन की मति मारी थी  न इतना भी विश्वास किया,
वो हर लेगा गिरधारी को असफल किंतु प्रयास किया।
ये बात सत्य है  श्रीकृष्ण  को कोई हर सकता था क्या?
पर  बात तथ्य है दु:साहस ये दुर्योधन  कर सकता था।

कहीं उपस्थित वसु देव और कहीं उपस्थित देव यक्ष,
सुर असुर भी  नर  पिशाच  भी माधव  में होते  प्रत्यक्ष।
एक भुजा में पार्थ उपस्थित  दूजे  में सुशोभित हलधर ,
भीम ,नकुल,सहदेव,युधिष्ठिर नानादि आयुध गदा धर।

रिपु भंजक  की  उष्ण नासिका से उद्भट सी श्वांस चले,
अति कुपित हो अति वेग से माधव मुख अट्टहास फले।
उनमें  स्थित  थे   महादेव  ब्रह्मा  विष्णु क्षीर सागर भी ,
क्या सलिला क्या जलधि जलधर चंद्रदेव दिवाकर भी।

देदीप्यमान उन हाथों  में शारंग शरासन,  गदा , शंख ,
चक्र खडग नंदक चमके जैसे विषधर का तीक्ष्ण डंक।
रुद्र  प्रचंड  थे   केशव  में,  केशव में दृष्टित  नाग पाल ,
आदित्य सूर्य और इन्द्रदेव भी  दृष्टित  सारे लोकपाल।

परिषद कम्पित थर्रथर्रथर्र नभतक जो कुछ दिखता था ,
अस्त्र वस्त्र या शाश्त्र शस्त्र हो ना केशव से छिपता था।
धूमकेतु   भी   ग्रह   नक्षत्र और   सूरज  तारे   रचते   थे,
जल थल सकल चपल अचल भी यदुनन्दन में बसते थे।

कहीं प्रतिष्ठित  सूर्य  पुत्र  अश्विनी  अश्व  धारण  करके,
दीखते  ऐसे  कृष्ण  मुरारी  सकल विश्व  हारण करते।
रोम  कूप से बिजली कड़के गर्जन करता विष  भुजंग,
दुर्योधन  ना सह पाता था   देख  रूप गिरिधर  प्रचंड ?

कभी  ब्रज  वल्लभ के हाथों से  अभिनुतन सृष्टि रचती,
कभी प्रेम पुष्प की वर्षा होती बागों में कलियां खिलती।
कहीं आनन  से अग्नि वर्षा  फलित  हो  रहा था संहार,
कहीं हृदय  से सृजन करते थे इस जग  के पालन हार।

जब वक्र दॄष्टि कर देते थे संसार उधर जल पड़ता था,
वो अक्र  वृष्टि कर देते थे संहार उधर फल पड़ता था।
स्वासों का आना जाना सब जीवन प्राणों का आधार,
सबमें व्याप्त दिखे केशव हरिकी हीं लीलामय संसार।

परिषद कम्पित थर्रथर्रथर्र नभतक जो कुछ दिखता था ,
अस्त्र वस्त्र या शाश्त्र शस्त्र हो ना केशव से छिपता था।
धूमकेतु   भी   ग्रह   नक्षत्र  भी  सूरज  तारे   रचते   थे,
जल थल सकल चपल अचल भी यदुनन्दन में बसते थे।

सृजन तांडव का नृत्य दृश्य  माधव  में हीं सबने देखा,
क्या  सृष्टि का  जन्म चक्र क्या मृत्यु का लेखा जोखा।
हरि में दृष्टित थी पृथा हरी हरि ने खुद में आकाश लिया,
जो दिखता था था स्वप्नवत पर सबने हीं विश्वास किया।

देख विश्वरूप श्री कृष्ण का किंचित क्षण को घबराए,
पर वो भी क्या दुर्योधन जो नीति धर्म युक्त हो पाए।
लौट  चले  फिर  श्री कृष्ण करके दुर्योधन सावधान,
जो लिखा भाग्य में होने को ये युद्ध हरेगा महा प्राण।

बंदी  करने  को  इक्छुक था हरि पर क्या  निर्देश फले ?
जो   दुनिया  को   रचते  रहते  उनपे क्या  आदेश फले ?
ये  बात  सत्य   है  प्रभु  कृष्ण  दुर्योधन  से  छल करते थे,
षडयंत्र  रचा  करता  आजीवन  वैसा  हीं  फल रचते  थे।

ऐसा कौन सा पापी था जिसको हरि ने था छला नहीं,
और कौन था पूण्य जीव जो श्री हरि से था फला नहीं।
शीश पास जब पार्थ पड़े था दुर्योधन नयनों के आगे  ,
श्रीकृष्ण ने बदली करवट छल से पड़े पार्थ के आगे।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

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